May 8, 2026

07-05-2026 बरामदा मेट गाला मॉर्निंग


07-05-2026 


बरामदा मेट गाला मॉर्निंग 


 आज तोताराम एक अजीब सा लबादा और कमर पर एक गमछा बांधे प्रकट हुआ । इस गरमी में बड़ा विचित्र लगा । हमारा तो छह महिने का ‘मात्र लुंगी’ काल चल रहा है जैसे अंग्रेजी राज में वायसराय सर्दी में दिल्ली में रहते थे और गरमी में लवाज़में के साथ शिमला चले जाते थे ठीक वैसे ही । या फिर वैसे जैसे गरमियों में स्कूलों का समय बदल जाता है । 


हमने कहा- यह क्या तमाशा है । क्या अघोरियों का वेश बना रखा है । जनता को ऊटपटाँग हरकतों से प्रभावित करने वाले बाबाओं की तरह गरमी में पंचाग्नि तप का तमाशा कर रहा है । 


बोला- जब मोदी जी ने संसद में प्लास्टिक की बोतलों से बनी जैकेट का प्रदर्शन किया था तब तो कुछ नहीं बोला था तू । और तो और गोदीमीडिया उस पर विशेष कार्यक्रम करने लगा । और तोताराम कुछ प्रेरक और नया करे तो तमाशा ! 


हमने कहा- सही बात है सेठ कांच भी पहने तो हीरा और गरीब हीरा भी पहने तो कांच । ब्रांड अम्बेडसर बनना, प्रेरणा देना नहीं, कर्म करके दिखाना अधिक महत्वपूर्ण होता है । फिर भी तेरे इस गूदड़ का क्या विशेष अर्थ और संदेश है । 


बोला- तुझे पता है एक वार्षिक आयोजन होता है न्यूयार्क में ‘मेट गाला नाइट’ ? इसे फैशन की सबसे बड़ी रात माना जाता है । इसकी एक टिकट होती है 1 करोड़ रुपए की और अगर टेबल रिजर्व करवाओ तो साढ़े तीन करोड़ । इस बार इसमें कई भारतीय भी शामिल हुए थे जैसे ईशा अंबानी, करण जौहर, मनीष मल्होत्रा, सुधा रेड्डी आदि । सो मैंने सोचा अपने बरामदे में आम आदमी के लिए एक सस्ता ‘मेट गाला मॉर्निंग’ आयोजित कर लिया जाए तो बरामदे के लिए कुछ फंड इकट्ठा हो जाएगा । सो पिताजी के जमाने का एक कंबल और यह गमछा बांध कर आ गया ।

 

बहुत गर्मी लग रही है, कहते हुए तोताराम ने उस गूदड़ को बरामदे के एक कोने में पटक दिया ।  




हमने कहा- तोताराम, ये सब कुंठित धनवान लोगों के नाटक हैं । अन्यथा इन वस्त्रों की क्या कोई उपयोगिता है ?  शादी के लंबे गाउन या किसी लबादे का क्या अर्थ है । न तो उसे पहनकर कोई कुछ काम कर  सकता है, न ही उसे पहनकर कोई सोता है, न ही ऐसे वस्त्र आरामदायक होते हैं । 


बोला- तो फिर ये लोग इन पर इतना खर्च क्यों करते हैं, क्यों पहनते हैं ? 


हमने कहा- जब व्यक्ति के पास अपार धन आ जाता है और धन की सार्थकता का पता नहीं होता तो वह ऐसे ही करता है । शास्त्रों ने धन की तीन गतियाँ बताई हैं- 



"दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। 

यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥"

( धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न देता है, न भोगता है, उसके धन की तीसरी गति—नाश—होती है)। 


भोग की भी एक सीमा होती है । अधिक भोग आपको क्षीण करता है । दान की कोई सीमा नहीं होती । वह जरूरी है । न दोगे तो भी तुम्हारे साथ जाने वाला नहीं है । इसलिए अच्छा है अपने हाथ से परोपकार कर जाओ । और परोपकार का भी भ्रम मत पालो क्योंकि तुम इसे अपने साथ लेकर नहीं आये थे । यह यहीं से, यहीं के लोगों के साथ, यहीं के लिए कमाया हुआ है । 


ज्ञानहीन धनवानों के साथ अनेक झूठे और स्वार्थी प्रशंसक चिपके रहते हैं और उन्हें ऐसे ही फालतू कामों में उलझाकर झूठी सार्थकता और यश का भरोसा दिलाते रहते हैं जबकि समाज के लिए कुछ न करने वाले ऐसे धनवानों के मरने जीने का कोई अर्थ नहीं होता ।




 


बोला- तो क्या ईशा अंबानी ने जो हीरे मोतियों की चोली पहनी है, या सुधा  रेड्डी ने 250 करोड़ का हार पहना है या करण जौहर ने गलीचा सा ओढ़ रखा है उसका कोई महत्व नहीं है । हो सकता है इन वस्त्रों में गर्मी सर्दी नहीं लगती हो, यह खाना अच्छी तरह से पचता हो, या कब्ज नहीं होती हो, या दाँत न सड़ते हों या बाल न झड़ते, सफेद होते हों । 


हमने कहा- अगर इनसे ऐसा कुछ होता तो फिर धनवान तो न बूढ़े होटे, न बीमार पड़ते और न मरते । अगर इन बातों में कोई दम होता तो क्या कभी बिरला, टाटा या अज़ीम प्रेम जी को ऐसे कार्यक्रमों में क्यों नहीं देखा  ? भारत में समाज सेवा के लिए सबसे अधिक दान देने वालों में टाटा का नंबर पहला है । 


याद रख, त्यागने से महावीर,बुद्ध, ईसा, गाँधी, नेहरू बड़े बने हैं ऐसे ऊटपटाँग कपड़े पहनने और वस्तुएं बटोरने से नहीं । यह दुनिया गांधी की दीवानी उनकी आधी धोती के कारण नहीं उनके त्याग और कर्मों के कारण है । लाखों का पेन और लाखों का चश्मा खरीद लेने से कोई शिक्षित, लेखक और बुद्धिजीवी नहीं बन जाता । 



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08-05-2026 झूठ और बाललीला


08-05-2026 


झूठ और बाललीला   




तोताराम आते ही बोला- अब केवल शर्म से काम नहीं चलेगा । अब तो कठोर दंड का विधान होना चाहिए । 


हमने पूछा- किस बात के लिए । नकली रेमडेसीवीयर बनाने के लिए, नकली कफ सीरप बनाने के लिए, प्रसाद के लिए चर्बी वाला घी सप्लाई करने के लिए, नकली डिग्री से डाक्टरी करके लोगों को मार डालने के लिए, झूठेवादों से जनता के वोट लेकर सत्ता पर काबिज हो जाने और फिर उसे जुमला कहकर मुकर जाने के लिए । किस अपराध के लिए कठोर दंड का विधान होना चाहिए । 


बोला- नहीं, ये तो हमारी अर्थव्यवस्था के सांस्कृतिक कार्यक्रम हैं जो सत्ता से मिलकर, उसे चुनावी चंदा देकर व्यवस्थित रूप से चलते रहते हैं । 


हमने पूछा- तो फिर किस अपराध के लिए  कठोर दंड का विधान चाहिए ?


बोला- अमित शाह जी ने कहा था कि अब ऐसा समय आने वाला है कि अंग्रेजी बोलने वालों को शर्म आएगी ।

 

हमने कहा- सच बात है । हमें तो अब भी जब मोदी जी, या जय शाह अंग्रेजी बोलते हैं तो शर्म आती है ।  


बोला- मैं सब समझता हूँ तू कहाँ और क्या बोल रहा है लेकिन सच बात यह है कि अंग्रेजी ने हमारे राष्ट्र की अस्मिता और सम्मान को ही ठेस नहीं पहुंचाई है बल्कि हमारे देश के बच्चों को झूठा और मक्कार बना डाला है । वैसे यह खोज अमित शाह जी की नहीं है । यह उच्च स्तर का सत्य तो उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने खोजा है । 


हमने कहा- क्या है वह अंग्रेजी का आपराधिक कृत्य जिसे उपाध्याय जी ने खोजा है ?


बोला- उन्होंने सप्रमाण बताया है कि अंग्रेजी में एक कविता है-


जॉनी जॉनी 

यस पापा 

ईटिंग शुगर 

नो पापा 

ओपन योअर माउथ 

हा हा हा

 

अब बताओ इतना बड़ा झूठ इस देश के बच्चों को अंग्रेजी कविताओं के माध्यम से सिखाया जा रहा है । सत्यवादी हरिश्चंद्र के देश में यह सब कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है । यह देश तो है ही सत्य का ।

 

हमने कहा- तो फिर देश के सभी अंग्रेजी स्कूलों को संस्कृत माध्यम कर दिया जाना चाहिए । अंग्रेजी बोलने वाले देशों से सभी संबंध तोड़ लेने चाहियें । 


बोला- नहीं, बस पाठ्यक्रम से ऐसी झूठ सिखाने वाली कविताएं निकाल देनी चाहियें । 


हमने कहा- लेकिन तोताराम, हमें तो अंग्रेज इतने अनैतिक नहीं लगे बल्कि किसी हद तक हमसे ज्यादा लोकतान्त्रिक थे । स्वतंत्रता से पहले बहुत से भारतीयों जैसे श्याम जी कृष्ण वर्मा,सावरकर, लाल हरदयाल, मदन लाल ढींगरा, गाँधी आदि ने ब्रिटेन में रहते थे हुए भारत की आजादी के लिए काम किया, संगठन बनाए, अखबार निकाले लेकिन उन्हें कभी भी स्टेंस स्वामी, सुधा भारद्वाज, हैनी बाबू, तेलतुंबड़े, उमर खालिद, देवांगना कलिता, नताशा नरवाल आदि की तरह बिना मुकदमे के अनिश्चितकाल तक के लिए हिरासत में नहीं रखा ।  वहाँ की किसी सुषमा स्वराज ने नहीं कहा कि भारत मूल के ऋषि सुनक को प्रधानमंत्री बनाया गया तो मैं सिर मुंडवा लूँगी । 


बोला- फिर भी जब कविता में जॉनी अपने पापा से चीनी खाने के बारे में झूठ बोलता है तो इससे गलत मेसेज तो जाता ही है । इस कविता से बच्चे आज थोड़ी चीनी के लिए झूठ बोलना सीख रहे हैं कल को झूठ बोलकर नीरव मोदी, ललित मोदी, माल्या, मेहुल चौकसे आदि की तरह कोई बड़ा घोटाला भी कर सकते हैं । कल को दो करोड़ नौकरी हर साल का बड़ा झूठ भी बोल सकते हैं । बुराई बढ़े उससे पहले ही उसे जड़ से समाप्त कर देना चाहिये । तभी कवियों ने कहा है- 


पावक बैरी रोग ऋण सपनहुँ राखिए नाहिं 

ये थोड़े हू बढ़त पुनि माह जातं से जाहिं  


हमने कहा- लेकिन तोताराम, अपने हिन्दी साहित्य में सूर का एक बहुत प्रसिद्ध पद है-


मैया मोरी, मैं नहिं माखन खायो।

भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो॥

चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो।

मैं बालक बहिंयन को छोटो, छींको केहि बिधि पायो॥

ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो।

तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो॥

जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो।

यह ले अपनी लकुटि-कमरिया, बहुतहि नाच नचायो॥

'सूरदास' तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो॥ 


इसमें सबको पता हैं कि कृष्ण झूठ बोल रहे हैं लेकिन फिर भी माँ उसे हँसकर गले से लगा लेती है । क्या इससे झूठ बोलने का मेसेज नहीं जाता । 

इसी तरह जब एक बार कृष्ण हाँडी में से मक्खन चुराते हुए रँगे हाथों पकड़े जाते हैं तो वे कहते हैं कि मैं मक्खन चुरा नहीं रहा था बल्कि हाँडी में गिर गई चींटी निकाल रहा था । 


बोला- यह झूठ नहीं । यह कृष्ण की बाललीला है ।और हमारे यहाँ लीला का लाइसेंस तो भगवान, देवता ही क्या छोटे बड़े नेताओं सभी को है । 


हमने कहा- और हाँ, भले ही तुम लोग अंग्रेजी से जॉनी जॉनी कविता हटवा सको या नहीं  लेकिन कम से कम कृष्ण के पर्यायवाची शब्दों में से ‘माखनचोर’ तो हटवा ही दो । 


-रमेश जोशी  



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May 7, 2026

07-05-2026 आज और यहाँ कैसे, प्रभु !

07-05-2026 


आज और यहाँ कैसे, प्रभु  !






आज फिर ब्रह्ममुहूर्त में आँख खुल गई । लगता है ऐसा होना कोई अलौकिक या आध्यात्मिक संकेत हैं । तोताराम के आने में अभी विलंब है । हाँ, सुबह सुबह की हवा से ऑक्सीजन खींच कर दीर्घायु होने का भ्रम पाले बहुत से लोग जाने जाने कहाँ कहाँ से कहाँ कहाँ के लिए निकल पड़ते हैं । अचानक एक बड़ी सौम्य,  दुग्ध धवल दाढ़ी और मूँछ युक्त, लंबा चोगे/ लबादे जैसा कोट, काली पेंट/ पायजामी,  काले बूट, कंधे पर अंग वस्त्रम जैसा कुछ धारण किए, सीने से एक हरी सी फ़ाइल चिपकाए एक आकर्षक और प्रभावशाली आकृति बरामदे के सामने से गुजरी ।

 

हमारे मुँह से हठात निकल पड़ा- मोदी जी, आप ! आज और यहाँ ? आपको तो इस समय बंगाल के नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए किसी विशिष्ट परिधान में तैयार होने में व्यस्त होना था । 


तभी तोताराम प्रकट हुआ और बोला- मास्टर, तुझे भ्रम हुआ है । ये मोदी जी नहीं, हमारे राष्ट्रगीत के रचनाकार महान मानवतावादी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं । मोदी जी होते तो क्या इस तरह चुपचाप प्रकट हो जाते । दस दिन पहले से रास्ता पुलिस बल और सुरक्षाकर्मियों के द्वारा किला बना दिया गया होता, सड़क पर खुलने वाले हर घर और खिड़की पर तैनाती हो जाती, कमांडो, कारें, सौ-पचास फोटोग्राफर होते । 



हमने गुरुदेव के चरण छुए, कहा- धन्य भाग्य जो आपके दर्शन हुए । आप तो हमारे जन्म से एक साल पहले ही दिवंगत हो गए थे । 2021  के पिछले चुनाव में मोदी जी भी बिल्कुल आपके ही वेश में बंगाल में घूम रहे थे । यह बात और है कि बंगाल के लोगों को उनमें  न तो आपकी सौम्यता और न ही अंतर्राष्ट्रीय मानवतावाद के दर्शन हुए । लेकिन अबकी बार तो मोदी जी ने झालमुड़ी खाकर और कुछ ने मछली खाकर चुनाव का रुख ही बदल दिया । और सबसे ऊपर ‘SIR’ की चालाकी और महिला रिजर्वेशन के नाम पर काम  बन गया लेकिन जीतते ही एक पुरुष को ममता जैसी साड़ी पहनाकर, कमर से रस्सी बांधकर अपमानित करके घुमाते हुए कुछ उद्दंड कार्यकर्ताओं ने संकेत दे दिया कि महिलाओं का कैसा सम्मान होने वाला है । 


कवीन्द्र बोले- मैंने तो बहुत पहले ही लिखा था-

मन हो निर्भय जहाँ, 

ज्ञान मुक्त हो जहाँ 

ऊंचा हो शीश जहाँ 

भारत को उसी स्वर्ग में तुम जाग्रत करो । लेकिन लोग हैं कि देश को ही एक मानवीय दृष्टि से नहीं देख रहे हैं और न ही देखने दे रहे हैं । जाति,धर्म और कट्टर राष्ट्रवाद के नाम पर भेदभाव फैलाकर,फूट डालकर अपनों पर ही शासन करना चाहते हैं तो कौन बचा सकता है देश को विनाश से । मैंने तो लीग ऑफ नेशंस बनने और प्रथम विश्वयुद्ध से भी पहले कट्टर राष्ट्रवाद के खतरे को भाँप लिया था । जो पहले जर्मनी में साकार हुआ और नस्लीय विनाश से कलंकित हुआ और अब उसी तरीके से दुनिया को विनाश की आग में धकेला जा रहा है । 


अब तक चुप तोताराम बोल पड़ा- गुरुदेव,  इस समय तो आपको मोदी जी के स्वागत के लिए कोलकाता में होना चाहिए था । आपको पता है इस महान विजय के लिए शांतिदूत ट्रम्प तक ने मोदी जी को बधाई दी है । 


कवीन्द्र बोले- पता है, जैसे तुम यहाँ एक धर्म के नाम पर गर्व कर रहे हो वैसे ही वह अमेरिका को फिर से ग्रेट बनाना चाहता है । यह दुनिया टुकड़ों में न बनती है, न विकसित होती है । यह बड़ी सोच से ही बचेगी । छोटी सोच और छोटे लोगों ने हमेशा इस दुनिया को दुखी किया है ।

 

मैं अब चलता हूँ । शपथ ग्रहण से बचकर ही तो इधर घूम रहा हूँ लेकिन कब तक ? जो भी बंगाल में तांडव होना है उसे देखना भी है और बचाने का प्रयत्न भी करना है ।अंग्रेजों के समय में बंगाल के विभाजन को भी हमने ही रोका था । 

  

हम कुछ और बोलते तब तक अचानक गुरुदेव गायब ! 


 



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May 6, 2026

06-05-2026 लोक, परलोक और स्वप्न


06-05-2026 


 लोक, परलोक और स्वप्न 



अगर ब्रह्म है तो वह और उससे जुड़ा सब कुछ सर्वत्र व्याप्त है । ऐसे ही हर मुहूर्त ब्रह्म का ही मुहूर्त होता है फिर भी ब्राह्मणों ने उस  संशयात्मक और दुविधापूर्ण समय को ब्रह्म मुहूर्त कहा है जब यही पता नहीं चलता की दिन है कि रात ? सूरज छुपा या उगने वाला है । पक्षी भी सुबह और शाम चहचहाते ही हैं । फिर भी ब्राह्मणों के अनुसार ब्रह्ममुहूर्त अर्थात सुबह कोई चार-साढ़े चार बजे हमारी नींद खुल गई । और नींद का भी क्या है ? खुले, न खुले । अब तो उस मधुमती भूमिका में हैं जब जन्म और मृत्यु का, सुषुप्ति और जागृति का भेद ही समाप्त हो जाता है । जैसे कि इस कलयुग में बैक डेट में जाकर फिर से राम का युग अर्थात त्रेता युग लाने वाले आडवाणी जी को अब यह भी पता नहीं होगा कि वे ‘रामरथ’ पर सवार हैं, या बिहार बेऊर जेल में हिरासत में, प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं या हमारी तरह बरामदे में बैठे ऊंघ रहे हैं । 



वैसे तोताराम के अनुसार हमारी नींद अभी तक नहीं खुली है । हम अब भी गाँधी-नेहरू युग के स्वप्न में जी रहे हैं जब अपने सिद्धांतों के विपरीत चौरी-चौरा कांड होने पर गाँधी अपने प्रचंड आंदोलन को समाप्त कर देते हैं, नेहरू चीन से भौतिक पराजय को संसद में स्वीकार करते हैं और अपनी भूल मानते हैं या शास्त्री जी रेल दुर्घटना के बाद त्यागपत्र दे देते हैं । 


जैसे ही तोताराम आया, हमने कहा- तोताराम, आज ब्रह्ममुहूर्त में एक बड़ा विचित्र स्वप्न आया । 



बोला- बताने की जरूरत ही नहीं है । आया होगा स्वप्न कि मोदी जी ने कोरोना के बहाने हजम किया हुआ 18 महिने के डी ए का एरियर 2029 के आम चुनाव में उलट दिया । जैसी औकात वैसे स्वप्न । तुझे कहाँ से 2047 तक विकसित भारत का स्वप्न आने वाला है । वह तो परम राष्ट्रभक्त, प्रतिबद्ध और अहर्निश सेवामहे के जज्बे वाले मोदी जी को ही आ सकता है । 


हमने कहा- नहीं, ऐसा कोई छोटा-मोटा या चुनावी स्वप्न नहीं था । वास्तव में बड़ा अधिनायकवादी और अलोकतांत्रिक स्वप्न था । 


बोला- अब ऐसा कुछ नहीं हो सकता । मोदी जी के होते हिन्दू असुरक्षित हो सकता है लेकिन लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं । देखा नहीं, कैसे गंगोत्री से गंगासागर तक, कश्मीर से कच्छ और कोंकण तक लोकतंत्र की पताका फहरा रही है । किस तरह बंगाल में स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव हुए और मदर ऑफ डेमोक्रेसी गौरवान्वित हो गई । फिर भी तेरा स्वप्न क्या था ? वैसे इस उम्र में मरने, यमदूत आदि के स्वप्न स्वाभाविक होते हैं । और जिन्होंने घपले किए हुए हैं उनको ईडी की क्लीन चिट के बावजूद यमराज की असली एप्सटीन फ़ाइल खुलने का डर सताता रहता है जो इसी तरह स्वप्न में प्रकट होता है ।



हमने कहा- नहीं ऐसा कुछ नहीं । हाँ, स्वप्न में हमें ऐसा आभास हुआ कि हम वोट डालने गए तो वहाँ मतदान अधिकारी ने बताया कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है ही नहीं । 


बोला- तो क्या हो गया ? सर्वोच्च न्यायालय ने भी तो पिछले दिनों बंगाल में सूची से छूट गए या जानबूझकर छोड़ दिए गए मतदाताओं की अपील पर कहा नहीं था कि अगर एक बार वोट नहीं डालोगे तो क्या हो जाएगा ? 


हमने कहा- तो फिर मोदी जी भी तो 75 के हो रहे हैं ।जा बैठें अपने गुरु आडवाणी के साथ बरामदे में या चल दें झोला उठाकर हिमालय की किसी गुफा में और सुधारें परलोक । लेकिन नहीं, खुद को तो एक बार क्या, तीन तीन बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भी तसल्ली नहीँ है । पिले पड़े हैं चुनावी रैली, रोड़ शो, केदारनाथ की गुफा में फोटोग्राफरों की उपस्थिति में ध्यान लगाने या रामेश्वरम में मौनव्रत साधने, या काशी विश्वनाथ मंदिर के सामने त्रिशूल लहराकर और डमरू बजाकर फ़ोटो खिंचवाने में । अभी से 2047 के एजेंडा चला रहे हैं ।लगता है काल पर विजय प्राप्त कर ली है ।  


बोला- अगर तूने वोट डाल भी दिया तो तेरे एक वोट से क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा । 


हमने कहा- तोताराम, बात चुनाव में जीत हार के फ़र्क़ की नहीं है । यह लाखों शहीदों के बलिदान और प्रयत्नों से प्राप्त स्वतंत्रता और लोकतंत्र के अधिकार और सम्मान की बात है । हमारे भारतीय होने के प्रमाण का प्रश्न है । यह हमारा अपमान है । बात हमारे 84 वर्षों से इस धरती के साथ खून पसीने के रिश्ते की है । हम अमित शाह के जन्म के पहले 1961 में राजस्थान में पंचायत के चुनाव करवा चुके हैं । असली डिग्री है । 40 साल देश भर में जगह जगह हजारों बच्चों को पढ़ाया है जो देश विदेश में जाने कहाँ कहाँ फैले हुए हैं और ये हमारा मताधिकार छीन लेंगे । यह वैसे ही है  जैसे कोई आदेश निकालकर किसी गुलाम का नाम, धर्म, भाषा बदल दे ।  हमें नहीं चाहिए किसी पार्टी की मुफ़्त की मछली या झालमुड़ी या हजार दो हजार रुपए । 


अगर किसी देश में कोई भी वैध मतदाता कहता है कि मैंने पिछले चुनाव में वोट दिया था और अब मेरा नाम काट दिया गया तो ऐसे में जब तक उसका फैसला नहीं हो चुनाव ही नहीं होने चाहियें । बात चुनाव होने मात्र की और जीत-हार की नहीं, चुनाव की विश्वसनीयता की है । 


ऐसे चुनाव को समय अवैध मानेगा । काल सबका मूल्यांकन करेगा । वह कोई यशगान करने वाला भाट मीडिया या संसद में ‘ हो ही, हो ही चिल्लाने वाले व्यक्तित्वहीन सांसद नहीं हैं । 


 



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