Dec 26, 2010

२-जी घोटाला या सब्सिडी?


 हम तो जब २००० में पहली बार अमरीका गए थे तो रास्ते में खीरे छीलने के लिए एक छोटा सा चाकू ले गए थे तो चेकिंग वालों ने उसे खतरनाक मान कर रखवा लिया था । अब तो ९/११ के बाद हो सकता है सेफ्टी पिन भी नहीं ले जाने देते होंगे । आज के अखबार में भ्रष्टाचार पर महासंग्राम पर एन.डी.ए. की रैली में कई छोटे-बड़े नेताओं को मंच पर तलवारें लहराते हुए देखा तो अजीब नहीं लगा क्योंकि यह हमारे लोकतंत्र की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है । जब-तब कार्यकर्ता नेताओं को तलवारें देकर अभिनन्दन करते हैं तो क्या वह ऐसे ही है ? कभी न कभी तो उन तलवारों का प्रयोग होना ही चाहिए ।

जब यह समाचार पढ़ रहे थे तो तोताराम आ गया । हमने कहा- तोताराम, अब भ्रष्टाचार को कोई नहीं बचा सकता । देख, जन-सेवक तलवारें लहराते हुए निकल पड़े हैं ।

तोताराम ने कहा- मास्टर, यह विरोध बिना बात किया जा रहा है । राजा, जिनके नाम से सरकार पर निशाना साधा जा रहा है, वे बेचारे कह रहे हैं कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया । वे तो 'पहले आओ : पहले पाओ' की परम्परा का निर्वाह कर रहे थे । यह परंपरा हमारे देश में वैसे भी बहुत पुरानी है । जब किसी राज्य में राजा के बारे में फैसला नहीं हो पाता था यही तरीका अपनाया जाता था । जो भी अगले दिन नगर के मुख्यद्वार पर मिलता था उसी को राजा बना दिया जाता था । उस समय का किसी के भी विरोध करने का प्रमाण नहीं मिलता । फिर आज ही विरोध क्यों ?

हमने कहा- विरोध क्यों नहीं । इससे सरकार को एक लाख छियत्तर हज़ार करोड़ का नुकसान हुआ है ।


बोला- कोई नुकसान नहीं हुआ है । जिसे तुम नुकसान कह रहे हो उसे सब्सिडी क्यों नहीं मान लेते । इस सब्सिडी के कारण ही तो फोन काल इतने सस्ते हुए हैं । यदि फोन कंपनियों को यह स्पेकट्रम सस्ता नहीं मिलता तो फोन काल इतने सस्ते कैसे होते ? इन्हें राजा ने दिया और इन कंपनियों ने प्रजा को दे दिया । ये तो बिजली के तार हैं । उत्पादक और उपभोक्ता तो कोई और हैं । यह एक प्रकार की अप्रत्यक्ष सब्सिडी है । किसानों को सब्सिडी दी जाती है, हज के लिए सब्सिडी दी जाती है तो यह भी देश में फोन सेवा के विस्तार के लिए दी गई सब्सिडी ही है । इसके लिए बेचारे राजा और प्रधान मंत्री को इतना हड़काने की क्या ज़रूरत है ? पहले भी तो, पहले आने वालों को स्पेक्ट्रम पहले दिया गया था । अब इस बात का कोई क्या करे कि इस घोषणा के समय कुछ लोग पहले से ही टेबल के नीचे घुसे बैठे थे । तुझे चाहिए तो चल तुझे भी दिला देते हैं कोई न कोई स्पेक्ट्रम । मगर लेना-देना तो कुछ है नहीं और बिना बात टाँग अड़ाता है ।

तुझे पता है अमरीका में मक्के पर किसानों को सब्सिडी दी जाती है । किसान गायों को मक्का खिलाते हैं तो उनका मांस सस्ता पड़ता है । उस सस्ते मांस से मेकडोनाल्ड सस्ते मीट-बर्गर जनता को बेचता है । अंततः तो यह सब्सिडी जनता को ही मिली ना ? अब बेचारे मोबाइल का धंधा करने वालों को बिना बात लतियाने से क्या फायदा ? वे तो सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं को जनता तक पहुँचा रहे थे । दूत, कुटनी और दलाल अवध्य होते हैं । सरकार और भी तो पैसा जनता में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बाँट ही रही है । और यह बता, क्या इस तथाकथित घोटाले से क्या सरकार का बजट घाटा बढ़ा ? यदि नहीं, तो फिर कैसा और किसका नुकसान ?

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई । एक युवक अंदर आया और बोला- तोताराम जी कौनसे हैं ? तोताराम ने उत्तर दिया- कहिए, हमीं है ।

युवक ने कहा- टाटा, अम्बानी, राजा और राडिया ने अपना केस लड़ने के लिए आपको याद किया है ।


२३-१२-२०१०


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Dec 24, 2010

सांता क्लाज़ विदाउट दाढ़ी


आज पत्नी का अड़सठवाँ जन्मदिन है | कोई बहुत ज्यादा स्वस्थ तो नहीं है, दवाओं के सहारे काम चल रहा है मगर हिम्मत बाँध कर साथ निभा रही है | शादी को भी साढ़े इक्यावन साल हो गए हैं | आज कई दिनों बाद कोहरा कुछ कम है और धूप भी ठीक-ठाक निकली है | दोपहर का खाना खाकर चबूतरे पर बैठे मूँगफली खा रहे हैं और शाम के खाने के बारे में भी तय किया है कि आज बाज़ार से जलेबी और बड़े ले आएँगे सो 'पौष-बड़ा' के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की नौ प्रतिशत वृद्धि, सचिन का पचासवाँ शतक और भारत को सबसे ईमानदार प्रधान मंत्री मिलने - पत्नी की वर्षगाँठ के बहाने सब को एक साथ सेलेब्रेट कर ही डालेंगे |

तभी एक सज्जन चबूतरे के पास आकर रुके | हम उन्हें पहचान तो नहीं सके मगर कद-काठी कुछ-कुछ जानी-पहचानी सी लगी, कहा- आओ बंधु, आज पत्नी का जन्मदिन है | इसी उपलक्ष्य में मूँगफली खाओ | उसने पत्नी को जन्मदिन की बधाई दी और एक मूँगफली उठाते हुए कहा- आपने मुझे पहचाना कि नहीं ? हमने कहा- झूठ क्यों कहें भाई, नहीं पहचाना |

बोला- मैं सांताक्लाज़ हूँ | पिछली बार आपके यहाँ आया था और एक काली कार से मरते-मरते बचा था | आपने मुझे अपने यहाँ चाय पिलवाई थी और आग जलाकर हम साथ-साथ तापे थे |

हमें सब याद आ गया,पूछा- तो इस बार समय से पहले ही कैसे आ गए और वह भी दिन में ? कहने लगा- क्या बताएँ मास्टर जी, अब रात में घूमने-फिरने का ज़माना नहीं रहा | वैसे ही शाम से लोग पिए हुए घूमते रहते हैं और फिर साल के आखिरी हफ्ते में तो पता नहीं किस नए साल का स्वागत करते हैं और कैसा क्रिसमस मानते हैं कि दारू के अलावा कुछ सूझता ही नहीं | सो सोचा दिन में ही आपसे मिल आऊँ | सो चला आया |
हमने कहा- भैया, अच्छा किया | हम भी सर्दी के मारे इस नए साल के चक्कर में नहीं पड़ते | जैसा भी होगा अगले दिन सुबह उठ कर मना लेंगे | जैसा ३१ दिसंबर वैसा ही १ जनवरी | वही तनाव और अपराध, वही झूठ और फरेब | वही आधी रात को पेट्रोल और खाने-पीने की चीजों के बढ़ते दाम | खैर तुम सुनाओ, हमने देखा कि तुम कुछ लँगड़ा कर चल रहे थे, क्या बात है ?


बोला- क्या सुनाना है | बुढ़ापे में लगी चोट क्या कभी पूरी तरह से ठीक होती है ? बस चल रहा है |

हमने पूछा- और तुमने अपनी ड्रेस भी बदल दी है | न सफ़ेद दाढ़ी, न लाल कपड़े, न पीठ पर उपहारों का थैला | हमारी तरह साधारण मोटा कुर्ता, बंडी और टोपा |

कहने लगा- अब कहाँ पहले वाली बात है | लोगों ने बड़े-बड़े माल्स में संता की ड्रेस पहना कर सेल्समैन खड़े कर दिए है जो बच्चों को ललचाकर पैसे ऐंठते हैं | कुछ लोग संता का वेश बना कर चोरी तक करने लग गए हैं | अभी आपने अमरीका की खबर पढ़ी या नहीं कि एक आदमी सांता का वेश बनाकर चोरी करते हुए पकड़ा गया | मैंने सोचा क्यों बिना बात शंका पैदा की जाए सो सादे वेश में ही चला आया | और आजकल लोग स्वार्थ के लिए वेश को लज्जित कर रहे हैं | बड़े धर्माधिकारियों की सीडियाँ जारी हो रही हैं | स्वामी जी सेक्स के द्वारा आत्मा को परमात्मा से मिलवा रहे हैं | चर्चो में इतने यौन अपराध बढ़ रहे हैं कि पोप तक को उनके लिए माफ़ी माँगनी पड़ रही है | मगर इस ढोंग के तंत्र को तोड़ना किसी के बस में नहीं है | सब धर्म, जाति, रंग नस्ल के बाहरी रूप को लेकर लड़ रहे हैं | इंसानी रिश्तों की किसी को फ़िक्र नहीं है |

खैर मास्टर जी, मेरी क्रिसमस और हैप्पी न्यू ईयर | ये रख लीजिए बच्चों के लिए | और उसने अपनी जेब टटोलते हुए दो छोटी-छोटी टाफियाँ निकालीं और हमारे हाथ पर रख दीं |

हम काफी देर टॉफी सहित उसका हाथ थामे रहे | न वह बोला और न हम |

२३-१२-२०१०
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Dec 23, 2010

साध्य और साधन


गाँधी जी की एक बात बहुत महत्त्वपूर्ण है किन्तु उसको जीवन में उतारना सरल नहीं है । वे कहते थे- यदि आपका लक्ष्य पवित्र है तो उसको प्राप्त करने के साधन भी पवित्र होने चाहिएँ अन्यथा अपवित्र साधनों से प्राप्त किया गया लक्ष्य पवित्र नहीं रह जाएगा । तिलक महाराज ने जब अपना आन्दोलन चलाया तो उन्होंने 'एक पैसा' फंड शुरु किया । इसका सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि उनका आन्दोलन वास्तव में जनता का आन्दोलन बने । सब उसमें बराबर के भागीदार बनें । कोई धन-बल से आन्दोलन को हथिया न ले ।

किसी लक्ष्य में सहयोग देने में दाता का भाव सबसे महत्त्वपूर्ण होता है । आज भी गिलहरी द्वारा सेतुबंध के निर्माण में दिए गए सहयोग की चर्चा बड़े आदर से होती है । भगवान बुद्ध जब धर्मप्रचार के लिए निकले थे तो लोग अपने-अपने हिसाब से उसमें सहयोग दे रहे थे । एक दिन शाम को उनके प्रिय शिष्य आनंन्द ने पूछा- शास्ता, आज की सभी भेंटों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भेंट कौनसी है ? बुद्ध ने सारे हीरे-जवाहरात, सोने-चाँदी को छोड़ एक अधखाया अनार उठा कर कहा – यह अधखाया अनार । आनंद चकित । कैसे ? बुद्ध ने स्पष्ट किया- जिस बुढ़िया ने यह अनार भेंट किया है, हो सकता है उसके पास इसके अलावा देने के लिए और कुछ हो ही नहीं । वह इसे खा रही होगी । हो सकता है कि उसे और भूख रही हो किन्तु उसने अपनी भूख की परवाह नहीं की और स्वयं भूखे रहकर यह अनार मुझे भेंट में दे दिया हो । पर जिन लोगों ने स्वर्ण, रत्न दिए हैं उनके पास अभी भी अपार सम्पदा है, उन्हें इस दान से कोई फर्क नहीं पड़ा है । इसलिए बुढ़िया का यह अधखाया अनार सबसे बड़ा दान है, सबसे बड़ी भेंट है, सर्वस्व समर्पण है इसलिए अतुल्य है । भगवान कृष्ण ने दुर्योधन के मेवों से अधिक महत्त्व विदुर-पत्नी के शाक-पात को दिया ।

जिसे भारतीय बोध कथाओं और चिंतन का थोड़ा सा भी ज्ञान है उसे ये बातें बहुत नई और विचित्र नहीं लगेंगी । इस आलेख के शुरु में इन बातों का ज़िक्र करने का कारण है- दो खबरें । एक खबर है इंडोनेशिया की । जहाँ कुछ समय पहले तूफान और उसके बाद ज्वालामुखी के विस्फोट की दो प्राकृतिक आपदाएँ आईं । इन घटनाओं के बाद एक समाचार आया कि किसी पामेला एंडरसन नामक माडल ने किसी पत्रिका को एक न्यूड पोज देकर मिले २५ हजार डालर इंडोनेशिया की एक संस्था 'वेव्स फॉर वाटर' को दान दिए जो लोगों को साफ पानी उपलब्ध करवाती है । इसके बाद एफ.पी.आई. नामक एक इस्लामी संस्था का बयान आया कि इंडोनेशिया पर ये प्राकृतिक आपदाएँ इसलिए आईं कि उसने पामेला एंडरसन की हराम की कमाई का पैसा दान में लिया । किसी माडल का जीविकोपार्जन का साधन ही जब फोटो खिंचवाना है तो यह पैसा चोरी, डाका या हराम का तो नहीं कहा जा सकता । यह बात और है कि आपको इस प्रकार उपार्जन नहीं करना चाहें यदि आपके पास जीविका के कोई और शालीन साधन उपलब्ध है ।

विकिलीक्स के अनुसार इसी प्रकार का एक और समाचार है- पाकिस्तानी आतंकवादी हज के बहाने बार-बार अरब देशों में जाते थे और वहाँ के अमीर लोगों द्वारा निकाली गई ज़कात में से अपने देश के गरीब लोगों को हज़ करवाने के नाम पर चंदा लाते थे । उस चंदे के धन से मुम्बई आतंकवादी हमलों की साजिश रची गई ।

इन दोनों घटनाओं से दो पक्ष उभरते हैं । एक तो माडल द्वारा दिया गया दान- जिसे आप उसके व्यवसाय के प्रति अपनी व्यक्तिगत धारणा के कारण बुरा बता सकते हैं मगर उसका उद्देश्य बुरा नहीं था । यह दान किसी संकीर्ण मज़हबी या सांप्रदायिकता के भाव से भी नहीं दिया गया था । इस मामले में अधिक से अधिक यह हो सकता था कि संस्था के अधिकारी उसमें से गबन करके लाख-दो लाख रुपया हड़प जाते । इसी तरह दूसरा दान है जकात में से हज़ के लिए चंदा । हो सकता है कि चंदा देने वाले का उद्देश्य शुद्ध मज़हबी रहा हो । मगर इसमें कोई बड़ा मानवीय दृष्टिकोण नज़र नहीं आता । यह एक प्रकार से स्वर्ग प्राप्ति के लालच में दी गई फीस है ।

आज जब सारी दुनिया में चंदा एक बहुत बड़ा धंधा बन गया है और सभी तरह के चालाक लोग और यहाँ तक कि सरकारें तक इसमें घुस गए हैं तो फिर या तो पुण्य अपने हाथों से लिया जाए या फिर बहुत सोच-समझकर दान दिया जाए । पाकिस्तानी सरकार आतंकवाद से लड़ने के नाम पर मिल रहे चंदे के बल पर चल रही है । अपने यहाँ भी गौशाला का चंदा खाने का रिवाज़ बहुत पुराना है । अनाथालय, भंडारा, मंदिर निर्माण आदि बहुत से कामों के लिए चंदा चुगने वाले बसों से लेकर टी.वी. तक में दिख जाएँगे ।

इसलिए सबसे मुख्य बात यह है अब दान किसी मज़हब के नाम से नहीं बल्कि महत्त्वपूर्ण मानवीय कार्य के लिए दिया जाए जिस पर निर्विवाद और निःस्वार्थ लोगों की निगरानी हो वरना कोई पता नहीं कि आपका दान किसी आपराधिक कार्य को बल प्रदान कर रहा हो । तभी हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि दान किसे दिया जाए ?

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् । । गीता १७:२०
अर्थात् 'देना ही है' इस भाव से किसी ऐसे को दिया दान जो बदले में उपकार न कर सके, और स्थान, समय और पात्र की पात्रता को ध्यान में रख कर दिया जाये, वह दान सात्त्विक कहलाता है ।

५-१२-२०१०


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Dec 22, 2010

रिकार्ड और रिजल्ट

आज तोताराम आया तो हमने उसे कहा- पहले चेहरा पोंछ फिर चबूतरे पर चढ़ना । उसे बड़ा अजीब लगा, बोला- क्यों चेहरे पर क्या लगा हुआ है ? हमने कहा- बड़ी मुश्किल से मावठ (राजस्थान में सर्दियों की बरसात) थमी है और चबूतरा सूखा है । तेरे चेहरे से नूर टपक रहा है, कहीं चबूतरा फिर गीला न हो जाए ।

तोताराम चिढ़ कर बोला- तेरे जैसे मनहूस आदमी पर गुस्सा तो बहुत आता है पर क्या करें- 'न तो कूँ और न मो कूँ ठौर' । खैर, कुर्सी तो मँगवा, आज मैं जूट के इस सड़े कट्टे पर नहीं बैठूँगा । आज तो हालत यह हो रही है कि 'आज मैं ऊपर, आसमाँ नीचे' ।

हमने फिर छेड़ा- कभी-कभी ज्यादा शीर्षासन करने से ऐसे हो जाता है ।


तब तक पोता कुर्सी ले आया था । तोताराम हमें घूरता हुआ कुर्सी पर बैठ गया और बोला- आज केवल चाय से काम नहीं चलेगा । पकौड़े भी बनवा ले । खबर ही ऐसी लाया हूँ कि उछल पड़ेगा ।

पूछा- ऐसी क्या खबर है ? क्या भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता मिल गई या २-जी स्पेक्ट्रम का पैसा रिकवर हो गया या पाकिस्तान ने आतंकवादी शिविर नष्ट कर दिए या स्विस बैंक का काला पैसा देश वापिस आ गया या प्याज फिर से पच्चीस रुपए पर आ गया ?

तोताराम ने कहा - नहीं, ऐसी कोई छोटी-मोटी खबर नहीं है । सचिन ने दक्षिणी अफ्रीका के खिलाफ अपना पचासवाँ टेस्ट शतक बना कर इतिहास रच दिया ! बता, किस खिलाड़ी ने बनाए हैं इतने शतक ? ब्रेडमैन ने भी नहीं । अभी टाइम्स मैगजीन के मुखपृष्ठ पर सचिन का फोटो आया है और उसके वन डे में दोहरे शतक को सबसे बड़ी खेल घटना माना गया है ।

-और पचासवाँ शतक बनाने के बाद भारत आउट हो गया होगा ।
-क्या तूने मैच देखा था ?
-नहीं, मगर जब किसी की केवल रिकार्ड पर ही निगाह होती है तो ऐसा ही होता है । देखा नहीं, द्रविड के भी जैसे ही बारह हज़ार रन पूरे हुए तो वह भी आउट हो गया । पर पारी की हार से तो भारत को कोई नहीं बचा सका, न सचिन, न द्रविड ।
-पर दक्षिणी अफ्रीका की ६२० रन की पारी की चमक तो सचिन के ५० वें शतक से कम हो ही गई ।
-तू चमक को लिए फिरता है । बात तो परिणाम की है । और परिणाम यह है कि भारत एक पारी और २५ रन से हारा और दक्षिणी अफ्रीका जीता । सचिन कितने भी रिकार्ड बना ले पर जब तक भारत वर्ल्ड कप नहीं जीतता तब तक कोई भी चमक कपिल से ज्यादा नहीं हो सकती ।

तोताराम ने कहा- मास्टर, तेरी यही सबसे बड़ी खराबी है कि तू खुश होना जानता ही नहीं ।

हमने कहा- तोताराम, ऐसी बात नहीं है । हमें भी सचिन की उपलब्धि से खुशी है मगर क्या तुझे नहीं लगता कि किसी महल का दीपक देखकर कब तक जमना-जल में खड़े रहकर पूस की रात काटी जा सकती है ? मुकेश अम्बानी ने पाँच हज़ार करोड़ का घर बनवा लिया मगर अपने घर की टपकती छत को इसी आधार पर कैसे भूला जा सकता है ? मुकेश ने 'दुनिया मुट्ठी में कर ली' मगर आम आदमी के हाथ से तो दाल-प्याज तक फिसल गए । करोड़ों बच्चों को क्रिकेट क्या, स्कूल, खेल के मैदान तो दूर, पूरा सा भोजन नहीं मिलता । किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो ९ प्रतिशत जी.डी.पी. पर क्या गर्व करें ? मनमोहन जी के ईमानदार होने पर गर्व करें या उनकी नाक के नीचे होने वाले लाखों करोड़ के घोटाले पर सिर पीटें ? गाय बहुत सुन्दर है मगर दूध नहीं देती तो क्या उसे चाटें ? गाँधी जी ने कहा था कि किसी देश की प्रगति उस देश के सबसे गरीब आदमी की हालत से नापी जानी चाहिए । खेल-तमाशे, मेले-उत्सव, नाच-गाने, दो रोटी मिलने के बाद ही अच्छे लगते हैं । सच तो यह है तोताराम, कि यदि आज कोई मृत्यु का सरल, बिना दर्द का साधन निकल आए और सरकार उसे जनता को उपलब्ध करवादे तो सच मान, इस देश के करोड़ों लोग तत्काल तैयार हो जाएँगे । जीवन के प्रति इतनी निराशा हमें तो इस उनहत्तर साल के जीवन मे आज पहली बार दिखाई दी है ।
किस रिकार्ड और किस चमक को देखकर इस सूचीभेद्य अंधकार को काटें । कहते हैं 'रात भर का है मेहमाँ अँधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा' मगर जब रात खत्म होगी तभी तो सवेरा आएगा ।

कहते-कहते हमारी आँखों गीली हो गईं, हमने कंधे पर रखे गमछे से उन्हें पोंछा । तोताराम ने हमारे कन्धे पर हाथ रख दिया, बोल वह भी कुछ नहीं सका । बोलने को था भी क्या ?

इस बीच पता नहीं कब चाय ठंडी हो गई ? पत्नी को फिर से चाय गरम करने के लिए कहने का भी मन नहीं हुआ ।

प्रिय पाठको, हम आपकी खुशी से जलते नहीं है बल्कि यही सोच कर खुश हैं कि चलो कोई तो खुश है, भले ही गफलत में ही सही ।

२०-१२-२०१०


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Dec 20, 2010

हिंदू आतंकवाद


दिग्विजय सिंह जी,
चमचे और मीडिया वाले आपको प्यार से या पता नहीं, उल्लू बनाने के लिए 'दिग्गी-राजा' कहते हैं और आप भी अपने को राजा मानकर खुश हो लेते हैं, वैसे असलियत तो जो है वह है ही । हमें भी कुछ लोग बनाने के लिए प्रिंसिपल साहब कहते हैं जब कि हम भूतपूर्व वाइस प्रिंसिपल हैं । और वाइस प्रिंसिपल भी कैसे ? सारी ज़िंदगी पूरे दिन क्लासें पढ़ाते रहे, कापियाँ जाँचते रहे, हाज़री लेते रहे, फीस जमा करते रहे । केवल रिटायरमेंट से पहले एक साल के लिए इस पद पर स्थापित हुए । तब भी हमने तो प्रिंसिपल से कह दिया- बंधु, न तो हमें पैसे का हिसाब-किताब आता है और न ही प्रशासन । आप कहेंगे तो दो क्लास फालतू पढ़ा देंगे और फिर भी आप नहीं निभा सको तो वापिस लौट जाएँगे । बेचारे भले आदमी थे सो निभ गई । अब जब हमें कोई प्रिंसिपल कहता है तो हम यह सोच कर सावधान हो जाते हैं कि अब यह उल्लू बनाने वाला है सो तत्काल सुधार कर देते हैं कि हम प्रिंसिपल नहीं रहे ।

अब न आपके पास कोई जागीर है और न हमारे पास कोई अधिकार । हमारे पास तो खैर, कभी भी नहीं रहे । आपके पास तो दस साल तक मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्रित्व रहा हुआ है । अब दिल्ली में रह कर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए हिंदू आतंकवाद पर वक्तव्यों से दिग्विजय कर रहे हैं । गृहमंत्री के रूप में चिदंबरम ने सारे देश-दुनिया को देखकर भगवा आतंकवाद का आविष्कार किया और राहुल बाबा ने भी 'भारत की खोज' करने के बाद अमरीकी राजदूत को एक मन्त्र दिया कि इस देश को इस्लामिक आतंकवादी संगठनों की बजाय हिंदू कट्टरपंथी संगठनों से अधिक खतरा है जैसे कि इस्लामिक अतिवादी संगठन तो उनका हुक्म मानते हैं और इनके कहते ही अपनी गतिविधियां बंद कर देंगे ।

हम न तो कहीं के मुख्यमंत्री रहे, न गृहमंत्री हैं और न ही कभी भारत की खोज करने के लिए किसी प्लेन या हेलिकोप्टर का जुगाड़ हुआ, फिर भी नौकरी के दौरान कोई, गोडफादर न होने के कारण बहुत धक्के खाने पड़े हैं । इस चक्कर में हमने भी इस देश को थोड़ा बहुत देखा है । थोड़ा बहुत इतिहास भी पढ़ा है और इतिहास पढ़ने से अधिक उसके शोध में टाँग अड़ाई है और उसी के आधार पर कुछ चामत्कारिक मान्यताएँ स्थापित की हैं । उन्हीं मान्यताओं के आधार पर हम इस हिंदू आतंकवाद के बारे में कुछ कहना चाहते हैं ।

हमारा ख्याल है कि महमूद गज़नवी एक श्रद्धालु तीर्थयात्री था और वह मथुरा और सोमनाथ की यात्रा करने आया था और तीर्थयात्रा करके अपने देश चला गया था । इन मंदिरों के पुजारियों ने खुद ही मंदिर का खजाना चोरी कर लिया और उस बेचारे भले आदमी का नाम लगा दिया । वह तो अपने देश में बैठा था । अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए आ भी नहीं सका और अब तक इतिहास में यही पढ़ाया जा रहा है कि महमूद गज़नवी ने भारत पर आक्रमण किया और सोमनाथ और मथुरा के मंदिरों को लूट ले गया । पता नहीं, अर्जुन सिंह जी से इतिहास की किताबों में यह संशोधन करवाने से कैसे छूट गया । अब तो उनके दुबारा आने की संभावना नहीं है सो अब तो नए मंत्री की जिम्मेदारी है इस झूठ को ठीक करवाने की ।

शाहजहाँ के काल में आने वाले विदेशी पर्यटकों ने बीस करोड़ रुपए खर्च करके बीस साल में ताजमहल बनवाने जैसी छोटी-मोटी घटना का उल्लेख नहीं किया तो यहाँ के कुछ इतिहासकार कहने लगे कि शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया ही नहीं । उसने तो तेजोमहालय नामक एक शिव मंदिर को नया रूप देकर उसे ताजमहल नाम दे दिया । जब शिवाजी ने बघनखे से बेचारे अफज़ल खान को मारना चाहा तो उसने भी तलवार निकाल ली और लोगों ने इतिहास में लिख दिया कि अफज़ल खान शिवाजी को धोखे से मारना चाहता था ।

हमारा ख्याल है कि यह ओसामा भी कोई छद्म हिंदू ही है जो मुसलमान नाम से दुनिया में आतंक फैला कर इस्लाम को बदनाम कर रहा है वरना तो इस्लाम तो शांति और प्रेम का धर्म है । जो भी यहाँ आया प्रेम और शांति का सन्देश लेकर आया जैसे महमूद गज़नवी, मोहम्मद गौरी, बाबर, अहमद शाह अब्दाली, नादिर शाह आदि । और उसी प्रेम से प्रभावित होकर बहुत से हिंदू अपने क्रूर धर्म को छोड़कर मुसलमान बन गए तो इसमें किसका दोष ?

यदि अफगनिस्तान के मुसलमान मूर्ति-भंजक होते तो वे सैंकडों वर्ष पहले ही बामियान में बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ चुके होते । मगर ऐसा नहीं हुआ । दो हजार साल तक ये मूर्तियाँ सुरक्षित खड़ी रहीं । और अब २००० में ही ऐसा क्या हो गया कि ये मूर्तियाँ टूट गईं । इन्हें भी यहाँ के किसी हिंदू ने ही तोड़ा है । ज़रा सख्ती से जाँच करवाएँगे तो सच निकल आएगा । वैसे इसे मान लेने के लिए हमारी यह तर्कपूर्ण मान्यता ही काफी है ।

हमें तो लगता है कि गवांतेनामो की जेल में भी सारे हिंदू ही तो हैं जो मुसलमान नाम और रूप धर कर अमरीका में आतंकवाद फैला रहे थे । इनकी इस चालाकी से बिना बात ही इस्लाम बदनाम हो रहा है ।

कश्मीर के पंडित कश्मीर की सर्दी से बचने के लिए जलवायु परिवर्तन के लिए जम्मू और दिल्ली में आकर बस गए और मजे से सरकारी सहायता के पैसे से मौज कर रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्हें कश्मीर से निकाल दिया । जब कि कश्मीर में युवा बेचारे पत्थर फेंक कर दो सौ रुपए में किसी तरह से गुजर कर रहे हैं । आपने अफज़ल गुरु का फोटो देखा ? बेचारा कितना निरीह और डरा हुआ लगता है ? क्या ऐसा सीधा-सादा व्यक्ति कुछ ऐसा-वैसा कर सकता है ? हमें तो लगता है कि बेचारे को बिना बात फँसा दिया गया है । और फिर वह 'उस्ताद' नहीं 'गुरु' है और गुरु तो हिंदू होता है । हमारी संस्कृति में तो गुरु को भगवान का दर्जा दिया गया है और इस गुरु से ऐसा बर्ताव ?

और सारी बातों को छोड़ भी दें तो यह तो सत्य है कि इस्लाम तो केवल १५०० वर्ष पहले आया है इससे पहले तो इस देश में और इसके आसपास सारे हिंदू ही तो थे । इन सब के पूर्वज भी हिंदू ही थे । तो इस बात को मानने में क्या ऐतराज हो सकता है कि यह सारी खुराफात हिंदू ही कर रहे हैं ।

कुछ कट्टर हिंदुओं ने एक यह भी गलत मान्यता फैला रखी है कि फारस में इस्लाम के उदय के बाद अपने धर्म को बचाने के लिए अग्निपूजक पारसियों (राहुल बाबा के दादाजी के पूर्वज भी पारसी ही थे ) को भाग कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी । इसी तरह से अजमेर वाले ख्वाजा साहिब भी अपने आप को मध्य एशिया में एडजस्ट नहीं कर पाने के कारण अजमेर आ गए थे । राहुल बाबा को कह दीजिएगा कि ऐसी अफवाहों पर विश्वास नहीं करें ।

हमारे पास और भी ऐसी राष्ट्रीय एकता बढ़ाने वाली खोजें हैं । जब भी आप कहेंगे तभी उपलब्ध करवा देंगे । बस, आप तो हमारा नाम किसी राज्यपाल , किसी विश्विद्यालय के वाइस चांसलर, पी.एच.डी., राज्य सभा की सदस्यता या शांति पुरस्कार के लिए आगे बढ़वा दीजिए ।

धन्यवाद ।

१-१२-२०१०
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Dec 10, 2010

घर लौटने को बेताब काला धन


७-१२-२०१०

आज कई दिनों के बाद धूप निकली थी और ठण्ड भी कुछ कम थी सो चबूतरे पर बैठ कर तोताराम के साथ चाय पी रहे थे कि एक सज्जन पधारे । आते ही बोले- सर, मैं आपको कुछ लौटने आया हूँ । हमें आश्चर्य हुआ कि आज पहली बार कोई कुछ लौटने आया है नहीं तो कोई आज तक लौट कर नहीं आया- बिना कोई गाना गाए कि 'कोई लौटा दे मेरे ...’ । लगा, शायर के विचारों के विरुद्ध गया वक्त भी लौट कर आ सकता है । मगर हमें यह ध्यान नहीं आ रहा था कि आज तक हमने इसे क्या दिया है जिसे यह लौटने आया है ?

पूछा तो बोला- मास्टर जी, मैं स्विस बैंक का मैनेजर हूँ और बैंक में जमा आपके देश का पैसा लौटाने आया हूँ ।


हमने कहा- मगर अभी तो यह भी तय नहीं हुआ है कि हमारे देश का कितना पैसा तुम्हारे यहाँ जमा है ? सरकार ने चार संस्थानों को ठेका दिया है यह पता करने के लिए कि स्विस बैंक में हमारा कितना पैसा है ? जब सही पता चल जाएगा तब उसके हिसाब से बोरे सिलवाने का टेंडर निकालेंगे, लाने के लिए किसी कंपनी को ठेका देंगे, फिर लाने का काम शुरु होगा । अभी तो संभव नहीं है ।

बोला- कुल पैसे का पता करने के लिए ठेका देने की ज़रूरत नहीं है । वह तो अभी कुछ दिन पहले जब शांताकुमार जी संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष सत्र में भाग लेने के लिए गए थे, तभी हमने उन्हें बता दिया था कि मात्र सत्तर लाख करोड़ रुपया जमा है आपके देश का । सो पता लगाने के लिए ठेका देने की ज़रूरत नहीं है । और हम तो सोच रहे हैं कि आप कहें तो हम खुद ही लाकर यहाँ डाल दें ।

हमने कहा- भाई, अब तक तो कोई यह पता भी नहीं कर सकता था कि आपके बैंक में किसका खाता है और किसके कितने पैसे जमा हैं और अब तुम खुद ही सब बताते फिर रहे हो और बताते भी क्या यहाँ लाकर पटकने के लिए उतावले हो रहे हो । क्या बात है ?

कहने लगा- साहब, हमें अब तक पता नहीं था कि यह पैसा चोरी का है । हमारे यहाँ जमा करवाने वाले तो कहते थे कि साहब किसी तरह लोगों की सेवा करके यह थोड़ा बहुत कमाया है । रखने के लिए घर भी नहीं है । सो आप अपने यहाँ रख लीजिए । जब ज़रूरत होगी तो आकर ले जाएँगे । मगर लेने कोई नहीं आया । अब तो हमारे पास रखने के लिए भी जगह नहीं है ।

हमें भी उसकी बातों में मज़ा आने लगा था सो कहा- मगर तुमने उसकी बातों पर विश्वास कैसे कर लिया ? अरे, महमूद गज़नवी, नादिर शाह, अहमद शाह अब्दाली, अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों के लूटने के बाद बचा ही क्या होगा जो लोग इतना धन जमा करवा गए और तुमने बिना सोचे-समझे जमा भी कर लिया ?

कहने लगा- सर, जमा करवाने वालों ने कहा था कि हमारा देश सोने की चिड़िया है । विभिन्न देशों द्वारा इतनी लूट के बाद भी उसकी समृद्धि में कोई कमी नहीं आई है । और आजादी के बाद तो यह चिड़िया केन्द्र में जा बैठी है और उसके पंखों से लगातार काला सोना झरता है । सत्ताधारी, जिनके हाथ लंबे हैं वे अधिक; और जो विपक्षी हैं, जिनके हाथ थोड़े छोटे हैं, वे कुछ कम; और जो बहुत छोटे लोग हैं जैसे सरपंच, पंच, नरेगा वाले, वे भी कुछ न कुछ पा ही जाते हैं । आजकल सेवा में बड़ा स्कोप है ।

तोताराम ने, जो अभी तक चुप बैठा था, चुटकी ली- तभी तुम योरप के गोरे लोग इतना कष्ट उठा कर सेवा करने के लिए एशिया, अफ्रीका गए ।

कहने लगा- वो तो प्रभु की आज्ञा थी कि ये अभागी काली आत्माएँ हैं । जाओ, इन्हें ईसाई बनाओ और इनका उद्धार करो । सो धर्म की आज्ञा का पालन करने के लिए जाना पड़ा । वैसे हमें अब भी धर्म पर पूरी श्रद्धा है । जब हमें पता चला कि यह पाप की कमाई है तो हम उसे वापिस करने के लिए बेताब हो गए । शांताकुमार लाए नहीं, नहीं तो हम उनके साथ ही भेज देते । बोले कि हम सत्ता में नहीं है इसलिए तुम दिल्ली बात करो ।

हमने कहा- तो दिल्ली जाओ ना । यहाँ क्यों आ गए ?

कहने लगा- गया था दिल्ली । अडवानी जी चुनावों के समय कह रहे थे कि काला धन वापिस लाऊँगा । सो पहले उन्हीं से मिला तो कहने लगे- अभी टाइम नहीं है । यदि मैं तुमसे काला धन लेने में लग गया तो यू.पी.ए. ससंद चला लेगा और मैं नहीं चाहता कि संसद चले । अब यही तो एक मुद्दा बचा है अगले चुनाव के लिए ।

हमने कहा - तो फिर मनमोहन सिंह जी से मिल लेते । वे भी कह रहे थे कि चुनावों के बाद सौ दिन में कार्यवाही करेंगे ।
उसने ज़वाब दिया- उनसे क्या मिलता ? वे तो जब भी संसद में कुछ उल्टा-सीधा होने लगता है तो विदेश यात्रा पर चले जाते हैं या मौन व्रत धारण कर लेते हैं ।

तो भाई, वित्त मंत्री प्रणब मुकर्जी हैं, सबसे सीनियर नेता ।


मिला था, मिला था उनसे भी । कहने लगे- यहाँ पैसे की कोई कमी नहीं है । पहले से ही इतना पड़ा है कि कामनवेल्थ गेम्स, २-जी स्केम, नरेगा, अनाज घोटाले, हथियार खरीदने, सड़कें बनवाने के बाद भी खत्म नहीं हो रहा है । विदेशी मुद्रा भण्डार उफना पड़ रहा है । और ऊपर से ग्रोथ-रेट नौ प्रतिशत से ऊपर जाए जा रही है सो अलग । अब क्या-क्या सँभालें ? अगर तुम यह पैसा दे जाओगे तो फिर कोई न कोई स्केम करने के लिए जी ललचाएगा । और फिर वैसे ही लोग दिल्ली से कर्नाटक तक ज़मीन हड़पने में लगे हुए हैं । ज़मीन है ही कहाँ जिस पर इस पैसे को रखने ले किए गोदाम बनवाएँ । अनाज रखने तक के लिए तो जगह नहीं है । वही खुले में पड़ा सड़ रहा है । अभी तुम अपने पास ही रखो ।

कहने लगा - मैं सोचता हूँ यदि यह काम निबट जाए तो क्रिसमस अपने देश जाकर ही मनाऊँ । अभी तो आप लोग चाय पीजिए । कल मैं फिर आपकी सेवा में हाज़िर होऊँगा ।

पता नहीं, भगवान क्या चाहता है ? यह कोई सामान्य स्थिति नहीं है । तोताराम और हमने चुपचाप एक दूसरे की ओर देखते रहे ।




८-१२-२०१०

आज सवेरे-सवेरे स्विस बैंक का मैनेजर तोताराम से भी पहले आ गया । कल भी उसे चाय नहीं पिलवाई थी सो तोताराम का इंतज़ार किए बिना ही चाय बनवा ली । अभी चाय चल ही रही थी कि तोताराम भी आ गया ।

हमने सुझाव दिया- जब कोई भी लेने को राजी नहीं है तो अपने पास ही रख लो ।
बोला- साहब, समझ में आने के बाद चोरी की कमाई अपने पास रखना भी चोरी करने के बराबर ही है ।
- तो फिर हमें ही यह चोरी की कमाई रखने का पाप क्यों चढ़ा रहे हो ?
- हम आपको एक सर्टिफिकेट दे देंगे कि यह धन हमने मास्टर जी को अपने पास तब तक रखने के लिए दिया है जब तक कि इसका मालिक लेने नहीं आए या सरकार इसे लेने के लिए राजी न हो जाए ।

हमने अपनी मज़बूरी बताई- भाई, देखो हमारे कब्जे में यह एक ही कमरा है जिसमें आधे में तो हमारी किताबें भरी हैं और आधे में हम मियाँ-बीवी सोते हैं । नया कमरा बनवाने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं । पेंशन में बस, राम-राम करके काम चलता है । और मान लो यदि टिन का एक कमरा बनवा भी लें तो उसमें इतने पैसे आएँगे नहीं । बरसात आई तो भीग जाएँगे या फिर लोग ही उठा ले जाएँगे । जब सरकार को पता चलेगा तो पता नहीं कौन-कौन हिसाब पूछने लगेगा ? हम कौन से मंत्री हैं जो सारे कुकर्मों के बावज़ूद बच जाएँगे । हमें तो कोई भी बेचारी नीरा यादव की तरह जेल में डाल देगा ।

- तो फिर एक उपाय है कि आप अपने यहाँ स्विस बैंक ही खोल लीजिए ।
- मगर यह तो झूठ है और पेटेंट कानून का उल्लंघन है ।
- अरे जब अमरीका हजारों वर्षों से भारत में इलाज के काम आने वाली हल्दी का पेटेंट ले सकता है, जापान कढ़ी का पेटेंट ले सकता है तो आप स्विस बैंक का नाम यूज क्यों नहीं कर सकते ?
- भाई, अमरीका की बात और है, वह तो बासमती चावल भी बेच रहा है । और फिर स्विस बैंक तो दुनिया में एक ही है और वह स्विटज़रलैंड में है ।
- कोई पूछे तो कह देना इसका फुल फॉर्म 'सकल विश्व इंडियन स्केम सहकारी बैंक' है । आपके यहाँ पहले भी तो 'उल्हासनगर सिंधी एसोसिएशन' की चीजें मेड इन यू.एस.ए. के नाम से बिका करती थीं । 'जैपान' नाम से आपके यहाँ एक कंपनी जापान का भ्रम पैदा कर रही है कि नहीं ?

हमने तंग होकर कहा- ठीक है बैंक खोल लेंगे मगर रुपया रखने को जगह तो हो ।

उसने इसका भी उपाय बताया, कहने लगा- आप यह सत्तर लाख करोड़ का चेक रख लीजिए । हमारे सर से तो यह पाप का भार उतरे, प्रतीकात्मक रूप से ही सही । जब भी कोई माँगने आए तो आप उसे डिमांड ड्राफ्ट बना कर दे दीजिएगा । और जब वह हमारे पास आएगा तो हम उसे पेमेंट कर देंगे ।

हम चुप रहे तो उसने एक तीर और फेंका, कहने लगा- सोचिए , जब इतना धन देश में आ जाएगा तो ३० साल तक टेक्स लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, पचास करोड़ लोगों को नौकरी दी जा सकेगी, ५०० पावर प्रोजेक्ट लगाए जा सकेंगे ।

अब तोताराम बोला- ठीक है, तुम्हारी मर्जी । पर हम जानते है कि चील के घोंसले में कभी मांस सुरक्षित बचा है क्या ? जब तक ये सेवक रहेंगे तब तक कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है । दो-चार बरस बाद फिर यह धन काला होकर आपके पास ही आना है । आप कहते है तो हम यह चेक रख लेते हैं । पर अगर कभी कोई झंझट पड़ा तो आपकी जिम्मेदारी होगी ।
उसने कहा- उसकी चिंता मत कीजिए । कोई झंझट पड़ा तो हम कह देंगे कि यह हमारी ही फ्रेंचाइजी है ।

उसके जाने के बाद तोताराम ने कहा- मास्टर, मुझे तो लगता है कि इसे योरप और अमरीका वालों ने भेजा है | जब काला धन यहाँ आ जाएगा तो वे लोग हमें फिर से अनाप-शनाप हथियार बेच कर यह पैसा झटक लेंगे | यदि यह पैसा स्विस बैंक के पास ही रहता तो कभी न कभी, वक्त-ज़रूरत देश के काम आ सकता था |

अब हम क्या कहते । आगे क्या होगा, राम जाने । वैसे आप की क्या राय है ?


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Dec 8, 2010

तोताराम और मनमोहन जी का एहसान


इस साल बरसात ज्यादा ही हुई और दिवाली तक भी पीछा नहीं छूटा । अब जाकर बरसात बंद हुई तो सर्दी भी जल्दी ही आ गई । अभी तो दिसंबर शुरु ही हुआ है कि पारा पाँच डिग्री पर चला गया और ऊपर से कोहरा । वैसे हमारी कौन सी फ्लाईट लेट हो रही है मगर दिन में कोहरा पड़ने से फिर रात और दिन बराबर हो जाते हैं । दिन में धूप निकलने से कुछ राहत मिल जाया करती थी मगर अब वह भी नहीं । दिन में भी रात जैसी ठिठुरन । सुबह होते ही लाइट चली गई थी । बाहर बैठने से कोई फायदा नहीं, हवा है । अंदर बैठ कर अखबार पढ़ सकने जैसी रोशनी नहीं सो रजाई में बैठे-बैठे ही समाचार सुन रहे थे कि बाहर से तोताराम की आवाज़ आई- अरे मक्खीचूस, इतनी बचत करके क्या करेगा ? लाइट तो जला ले । हम ज़वाब देते उससे पहले तो तोताराम हमारी रजाई के अंदर ।

कहने लगा- लाइट बंद क्यों कर रखी है ? हमने कहा- तुमने सुना नहीं कि ‘लाइट सेव्ड इज लाइट जेनरेटेड’ मतलब कि ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा का उत्पादन है । सो ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं ।

तोताराम कहने लगा- अरे, अब तो बिजली-बिजली रोना छोड़ । अब तो तेरे लिए मनमोहन सिंह जी, जो भी आता है उसी से, दो-चार परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए करार कर तो रहे हैं । अभी फ़्रांस के राष्ट्रपति आए तो साढ़े छः अरब डालर की दर से छः संयंत्रों का समझौता किया कि नहीं । इससे पहले ओबामा जी आए तो भी दस हजार करोड़ का एक समझौता किया ही था । और अब रूस के राष्ट्रपति आ रहे हैं तो उनसे भी कुछ इंतज़ाम करवाएँगे । अब और क्या चाहता है तू मनमोहन सिंह जी से ? क्या नरेगा वाला पैसा भी लगा दें, तेरे लिए बिजली बनवाने के लिए ?

हमने कहा- भैया, यह खर्चा हमारे लिए नहीं, भारत की सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए कर रहे हैं जिससे अगले चुनाव में कोई तो उपलब्धि बताई जा सके । अब २-जी स्पेक्ट्रम तो कोई उपलब्धि रही नहीं ।

तोताराम बोला- विकास के लिए इतनी सिद्दत से किए गए प्रयत्नों को जान बूझ कर छोटा करने की कोशिश मत कर । अरे, जब बिजली बनेगी तो सारे राष्ट्र के ही काम आएगी । राज चाहे किसी भी पार्टी का हो । यह तो अगली पीढ़ियों के लिए पेड़ लगाने जैसा पवित्र काम है ।

हमने फिर अपनी बात रखी- यदि यह वास्तव में केवल विकास के लिए बिजली की ही बात है तो भी हमें क्या फायदा ? हमें तो दो सौ रुपए महिने से ज्यादा की बिजली जलानी नहीं । यदि सारे महिने भी बिजली न आए तो भी मिनिमम चार्जेज तो देना ही पड़ेगा जैसे कि एक भी काल न करो तो भी लेंडलाइन का दो सौ रुपया महीना तो देना ही पड़ेगा । वैसे यह देश जब बिजली का आविष्कार भी नहीं हुआ था तब मशालों और दिए की रोशनी में ही सोने की चिड़िया बन गया था । ये परमाणु बिजली घर हमारे लिए नहीं, अम्बानियों के लिए लगाए जा रहे हैं । पता है, मुकेश अम्बानी के घर का बिजली का एक महिने का बिल कितना है ? सत्तर लाख रुपए । हमारी-तुम्हारी सारी ज़िंदगी की नौकरी की तनख्वाह और पेंशन भी सत्तर लाख नहीं बनेगी ।

तोताराम अम्बानी का भक्त है क्योंकि आज तक जो दुनिया किसी की मुट्ठी में नहीं हुई उसे मुकेश ने अपनी मुट्ठी में जो कर लिया । बोला- तेरा घर है एक लाख रुपए का और बिजली का बिल आता है दो सौ रुपए महीने । मुकेश का घर है चार हजार पाँच सौ करोड़ का और उसका महीने का बिजली का बिल केवल सत्तर लाख । घर की कीमत के हिसाब से उसका बिजली का बिल आना चाहिए नब्बे लाख रुपए महिना । हर महिने वह बिजली पर बीस लाख रुपए कम खर्च कर रहा है । और क्या चाहता है ? क्या इतना बड़ा आदमी लालटेन जलाकर रहे ? कुछ तो देश की इमेज का ख्याल कर ।

हम ऐसे सकारात्मक चिंतन वाले को और क्या कह सकते थे, कहा- तो ठीक है तोताराम, कल कहीं से एक सोलर लालटेन का इंतज़ाम कर फिर यह बिजली का कनेक्शन ही कटवा देते हैं । वैसे कटवा तो आज ही देते और अपने वाली लालटेन जलाना शुरु कर देते मगर सरकार हमें केरोसिन जलाने जितना गरीब नहीं मानती । उसके हिसाब से हम सवर्ण हैं और हर सवर्ण सेठ होता है । गरीब तो रामविलास पासवान और मायावती जैसे दलित हैं । फिर तेरे मनमोहन जी को लिख देते हैं कि साहब, हमारी तरफ से चाहे जितने अरब-खरब डालर के समझौते करें पर हम पर कोई एहसान लादने की ज़रूरत नहीं है ।

८-१२-२०१०

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Dec 2, 2010

विकिलीक्स का असांज और हिलरी का असमंजस


हिलरी जी,
नमस्ते । हम तो आपके बहुत पहले से ही प्रशंसक हैं । तब से, जब आप मात्र एक वकील और क्लिंटन जी की पत्नी ही थीं सांसद तो खैर आप बाद में बनीं हैं । जब क्लिंटन जी उस प्रशिक्षु मोनिका वाले केस में फँस गए थे तब आपने एक सच्ची और आदर्श भारतीय पत्नी की तरह उनको बचाने के लिए मौन धारण कर लिया था और महिला स्वतंत्रता वाली औरतों के बहकावे में नहीं आईं । बड़ा समझदारी का निर्णय था । जो हो गया सो तो हो ही गया, चाहे क्लिंटन की फजीहत हो और चाहे आपका अपमान । अगर उस समय गुस्से में आकर बोल पड़तीं तो मियाँ जी की और किरकरी होती और राष्ट्रपति पद की पेंशन से भी हाथ धो बैठते । अच्छा किया । पर हम इतना ज़रूर जानते हैं कि आपने घर में उनकी अच्छी तरह से खबर ली होगी । बस उसी दिन से हम आपकी कूटनीति और ज़ब्त करने की क्षमता के कायल हो गए थे ।

अब यह विकिलीक्स वाला लफड़ा आ गया । वैसे लोग कह रहे हैं कि अमरीका की बड़ी किरकिरी हो रही है । पर आप और हम जानते हैं कि इससे कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं । यह सब तो होता ही रहता है । क्या घर में नल लीक नहीं करता ? पहले जब स्याही वाला पेन चलता था तो क्या उसकी स्याही लीक नहीं होती थी ? आपने देखा होगा कि बहुत से लोगों की सर्दियों में प्रायः नाक लीक करने लग जाती है । कुछ लोग सावधान नहीं होते तो नाक का वह द्रव पदार्थ कभी-कभी मुँह में भी प्रवेश कर जाता है । कई पशु वर्षा ऋतु में अधिक घास खा जाते हैं तो वे भी पीछे से लीक होकर सड़कें गंदी करते फिरते हैं । जिन देशों के पास बिना मेहनत के जब ज्यादा धन आ जाता है तो वे भी दुनिया में गंदगी लीक करते फिरते हैं, जैसे कि आज कल के नवधनाढ्य वर्ग के लाडले सपूत । क्या जब डेयरी के दूध की थैली लाते हैं तो कभी-कभी वह लीक नहीं होती ? क्या घर-घर की बातें ऐसे ही लीक नहीं होतीं ? मोनिका वाली बात भी तो लीक हो गई थी । निक्सन के वाटर गेट का वाटर भी तो लीक हो गया था । क्या हुआ दो-चार दिन थू-थू हुई और फिर सब ठीक हो गया । क्लिंटन जी फिर से ठहाके लगाने लग गए । सो यह विकी लीक वाला लीकेज भी बंद हो जाएगा ? ‘एम-सील’ की तरह आपके यहाँ भी लीकेज ठीक करने के लिए कुछ न कुछ ज़रूर आता होगा । हमारे यहाँ तो किसी भी केस को निबटाने का सब से बढ़िया तरीका यह है कि या तो फ़ाइल गायब करवादो या उस दफ्तर में ही आग लगवा दो । न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी । लिखने को तो हम ओबामा जी को भी लिख सकते थे मगर वे तो इधर-उधर कम ही जाते हैं मगर आपको तो ट्रेवलिंग सेल्समैन की तरह सारी दुनिया में घूमना पड़ता है । क्या पता, कब कोई, क्या सवाल कर ले ?

वैसे लीक करने को टपकना भी कहते हैं । टपकना एक निरंतर प्रक्रिया है । तभी विद्वानों ने कहा है- 'बूँद बूँद से घट भरे, टपकत रीतो होय' ।
इस सूचना-घट रूपी मोबाइल का मेसेज बोक्स समय-समय पर खाली करते रहना चाहिए । और फिर हम तो कहते हैं कि ऐसे सद्वाक्यों का संग्रह करने से क्या फायदा ? इनका तो मुखारविंद से बोलकर ही सुख लिया जाना चाहिए । मौखिक होने से कभी भी बयानों से मुकरा जा सकता है, जैसे कि हमारे नेता । जब कुछ भी, जिसे हमने अन्तरंग क्षणों में कहा है, सरे आम प्रकट हो जाए तो एक बार तो अजीब लगता ही है । किसी भले आदमी को शर्म भी आ सकती है । मगर यह कमज़ोर आदमियों की बीमारी है । नेताओं को शर्माना शोभा नहीं देता । शर्म तो कुलवधुओं का शृंगार है । वेश्या के मामले में तो यह दुर्गुण माना जाता है । सो शर्म को झटकिये और काम पर चलिए ।

बेताल की तरह हम भी आपको लीक करने, मतलब कि टपकने, के बारे में एक कहानी सुनाते हैं । एक बुढ़िया थी । उसकी झोंपड़ी टपकती थी । एक बार सर्दी का मौसम था । बारिश के आसार बनने लगे । बुढ़िया बड़बड़ाने लगी- मुझे शेर से भी इतना डर नहीं लगता जितना टपूकड़े से लगता है । बरसात में भीगता-भीगता एक शेर उस झोंपड़ी के पास खड़ा था । उसने सोच- यह टपूकड़ा तो लगता है कि मुझ से भी खतरनाक जानवर है । तभी एक कुम्हार अपने गधे को ढूँढता हुआ वहाँ आ गया । बिजली की कौंध में उसने शेर को अपना गधा समझा और कान पकड़ कर घर ले गया । शेर ने उसे टपूकड़ा समझ कर चूँ तक नहीं की ।

सो टपूकड़े को इतना खतरनाक समझने से कभी-कभी उस शेर जैसी हालत हो सकती है । इसलिए आप इससे बिलकुल भी मत घबराइए । वैसे हमें विश्वास है कि आप घबरा भी नहीं रही होंगी । इतने बड़े देश को पता नहीं क्या-क्या करना पड़ता है ? ऐसे ही घबराने लगे तो हो ली दुनिया की थानेदारी ।



अब कोई पूछने वाला तो हो भाई क्या है उस विकीलीक में ? यही कि किसी को 'कुत्ता' कह दिया, किसी को नंगा । अजी हमारे यहाँ कहावत है- ‘हमाम में सभी नंगे होते हैं' । सभी अपनी निजी बातों में ऐसी ही ‘संसदीय-भाषा’ का प्रयोग करते हैं । पहले किसिंगर और निक्सन के निजी वार्तालाप में हमारी नेता इंदिरा जी को 'बूढ़ी चुड़ैल' कहा गया था । यह 'प्रशंसा' तो बहुत पहले लीक हो गई थी मगर किसी भी देश भक्त या कांग्रेस भक्त ने कोई विरोध प्रकट नहीं किया । वैसे आप जानती हैं कि विरोध प्रकट करके भी हम क्या कर लेते ? यह बात और है कि अब, जब सुदर्शनजी ने सोनियाजी के बारे में कुछ कहा तो भक्तों ने बड़ा हल्ला मचाया और एक ने तो कोर्ट में केस भी कर दिया । गोरे लोगों की बात और है । उनकी गाली को हमने कभी गाली नहीं माना । वे हमें प्यार से 'ज़मीन पर हगने वाला काला आदमी' और 'कुत्ता' कहा करते थे । और हम 'यस सर' कह दिया करते थे । ठीक भी है, गोरे लोगों का हगा हुआ तो गुरुत्वाकर्षण के नियमों के विरुद्ध कहीं अंतरिक्ष में चला जाता है ।

वैसे जहाँ तक कुत्ते की बात है तो ओबामा जी ने खुद स्वीकार किया है कि विरोधी पार्टी वाले उन्हें 'कुत्ता' कहते हैं । कुत्ता कोई बुरा शब्द नहीं है । एक फिल्म में तो राजेश खन्ना शर्मीला टैगोर को 'कुत्ती चीज' कहता है । प्यार में इस शब्द के बड़े अध्यात्मिक मायने हैं । कबीर दास तो अपने को 'राम की कुतिया' कहते हैं-
कबीर कुतिया राम की मुतिया मेरो नाउँ ।
गले राम की जेवड़ी जित खेंचे तित जाउँ । ।
राजनीति में इतनी भक्ति और समर्पण संभव नहीं है फिर भी कभी न कभी अपने स्वार्थ ले किए किसी न किसी का कुत्ता बनना ही पड़ता है ।

यदि यह विकिलीक वाला लीकेज नहीं भी होता तो भी सारी दुनिया जानती ही है कि किस देश का क्या चरित्र है । एक बार अमरीका ने रूस की जासूसी करने के लिए यू.टू. नामक बहुत ऊँचाई पर उड़ने वाला एक विमान भेजा जो ज़मीन पर से किसी भी राड़ार की पकड़ में नहीं आता था । यह बात आइजनहावर के ज़माने की है । रूस ने कहा- अमरीका हमारी जासूसी करने के लिए विमान भेज रहा है । अमरीका ने मना किया । रूस ने फिर कहा- हमने उसे मार गिराया है । तो अमरीका ने कहा- हाँ, हमारा एक विमान रास्ता भटक गया था, हो सकता है यह वही विमान रहा हो । रूस ने फिर कहा- हमने उस विमान को गिरा लिया है, उसका पाइलट जिंदा है, हमारी हिरासत में है और उसने सब कुछ कबूल लिया है । तो अमरीका अपने वाली पर उतर आया और कहा- हाँ, हमने जासूसी की है और करते रहेंगे । रूस ने कहा- 'अब की बार जब कोई विमान हमारे यहाँ आया तो हम उस अड्डे को ही नष्ट कर देंगे जिससे वह उड़ कर आया होगा' । इसके बाद अमरीका ने कोई विमान नहीं भेजा । खैर, अभी तो ऐसी कोई चुनौती है नहीं । अगर इस विकिलीक के कारण ऐसी कोई समस्या आई तो देखेंगे । अभी से क्या परेशान होना ।

वैसे दुहरा आचरण करने वाले की भी बड़ी समस्याएँ होती हैं । सच बोलने वाले को कुछ भी याद नहीं रखना पड़ता । चाहे आधी रात को उसे उठाकर पूछो तो भी कोई समस्या नहीं । वही बोलना है जो हमेशा बोलता है । मगर झूठ बोलने वाले को बहुत याद रखना पड़ता है कि किसको, कब, क्या बताया था ? जब अमरीका सारी दुनिया में तरह-तरह के धंधे करता है तो कई तरह की बहियाँ रखनी पड़ती हैं, कई तरह के उलटे-सीधे काम करने पड़ते हैं, जाने किस-किस को क्या-क्या कहना पड़ता है । कभी भी, कुछ भी लीक होने का डर रहता है । नामी-बेनामी प्रोपर्टी का धंधा करने वाले के सैंकड़ों प्लाट होते हैं । तो कभी-कभी चक्कर में भी पड़ ही जाता है । मगर ऐसी छोटी-मोटी बातों के कारण धंधा तो नहीं छोड़ा जा सकता ना ।

खैर, अमरीका की इस स्थिति के बारे में फिर कभी बात करेंगे । अभी तो इस लीकेज को ठीक करवाइए । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाटक का मुखौटा उतार कर, किसी न किसी तरह इस विकी लीक वाले जूलियन असांजे को ठिकाने लगवाइए । वैसे इंटरपोल ने वारंट जारी करके इस शुभ कार्य का श्रीगणेश कर तो दिया है । और आपके बगलबच्चे कनाड़ा के प्रधान मंत्री के सलाहकार कॉलेज के प्रोफ़ेसर टॉम फ्लेनेगन ने तो असांज की हत्या करने की नेक और लोकतांत्रिक सलाह भी साफ़-साफ़ दे ही दी है । यदि ज्ञान के पुजारी एक गुरु ने ही सत्य का गला घोंटने की सलाह दी है, तो ये पश्चिम का पढ़ा-लिखा तालिबान ही है ? अब देर किस बात की- शुभस्य शीघ्रं ।

१-१२-२०१०

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Nov 25, 2010

बुढ़ापे में परीक्षा

मनमोहन जी भाई साहब,
सत् श्री अकाल । यह ‘भाई साहब’ संबोधन आर.एस.एस. वाला नहीं है यह तो अपने डिपार्टमेंट वाला है क्योंकि आप भी मास्टर रहे और हमने भी जीवन भर राष्ट्र निर्माण ही किया । हुआ या नहीं या कितना हुआ यह तो भगवान जाने पर हमने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी । साठ के होते ही छुट्टी हो गई मगर तभी ऊपर स्वर्ग में सीट का निर्माण करने में जुट गए । कितना क्या हो पाएगा यह तो वहाँ जाकर पता चलेगा । आपको तो नौकरी से छुट्टी मिलते ही नरसिंह राव साहब ने पकड़ लिया और जोत दिया राष्ट्र निर्माण में । अच्छा भला अमरीका की तरह भारत का निर्माण करने में लगे हुए थे कि अब ये बी.जे.पी. वाले आपकी परीक्षा लेने पर उतर आए लेकिन अपने वाले बच्चे को नहीं देखते जो नक़ल करते पकड़ा गया । और परीक्षा भी ऐसी वैसी नहीं, हाईस्कूल वाली । आजकल इसे सेकेंडरी स्कूल परीक्षा कहते हैं । अपने जमाने में इसी को मेट्रिक भी कहा जाता था । तब यह बहुत बड़ी चीज हुआ करती थी । उस ज़माने में कहते हैं कि आठवीं पास भी मास्टर और यहाँ तक कि तहसीलदार बन जाया करता था । आजकल तो चपरासी बनने के लिए भी कम से कम दसवीं पास चाहिए । तभी दसवीं पास की कद्र भी चपरासी जितनी ही रह गई है ।

वैसे तो अध्यापन आपने भी किया है इसलिए परीक्षा पास करने के गुर जानते ही होंगे । पर बात यह है कि आपने कालेजों में पढ़ाया है और हमने स्कूल मास्टरी में ही जिंदगी गुजारी है सो जब २१ नवंबर के अखबार में पढ़ा कि आपको लग रहा है कि आप दसवीं की तरह एक के बाद एक टेस्ट दे रहे हैं तो सोचा कि क्यों न आपकी कुछ मदद की जाए । लोग तो तमाशा देख रहे हैं पर जो संकट के समय मदद करे वही सच्चा मित्र होता है-
धीरज, धरम, मित्र अरु नारी । आपत काल परखिए चारी । ।

तो एक सच्चे मित्र और शुभचिंतक की तरह से आपको सलाह दे रहे हैं । आशा है कुछ काम आएँगी ।

वैसे कई चीजें जो जवानी में इतना तकलीफ नहीं देतीं जितनी बुढ़ापे में, जैसे कि शादी, संतान, इश्क, परीक्षा आदि । अब सलमान रुश्दी को ही देख लीजिए, उमर साठ से ऊपर है मगर इश्क फरमाने से बाज़ नहीं आते । जवान और चालू औरतें आती हैं और उल्लू बनाकर खिसक लेती हैं । बुढ़ापे की औलाद ज्यादा लाड़-प्यार के कारण बिगड़ जाती है और बड़ी होकर बहुत दुःख देती है । वैसे आजकल तो छोटे बच्चों को भी कूट-पीट कर सुधारने का अधिकार नहीं रहा फिर जवान बेटा आप पर ही हाथ छोड़ दे तो क्या कर लेंगे । बुढ़ापे में शादी करने पर जवान पड़ोसियों का आना-जाना बढ़ जाता है और कहीं जाओ तो पीछे से चिंता लगी रहती है कि पता नहीं नई बीवी क्या गुल खिला रही होगी । बुढ़ापे की बीवी की फरमाइशें भी ज्यादा होती हैं । खुद को जवान दिखाने के लिए रोज़ बाल रँगने पड़ते हैं और अकड़ कर भी चलना पड़ता है जिससे कमर में दर्द होने लग जाता है । और बुढ़ापे में परीक्षा देना भी कम कष्ट का काम नहीं है ।

आपने तो लगातार ही सारी पढ़ाई और परीक्षाएँ निबटा दीं । हम तो बारहवीं पास करते ही मास्टर बन गए थे और फिर बी.ए., एम.ए. और बी.एड. सभी नौकरी करते हुए पास कीं । बी.ए. और एम.ए. तो खैर सत्ताईस बरस की उम्र तक निबटा दीं मगर बी.एड. काफी देर से की । हम जानते हैं कि कैसे, क्या नैया पार लगी । वैसे याद तो सब कर लेते थे मगर चूँकि लिखने का अभ्यास छूट गया था सो लगता था कि पेपर पूरा ही नहीं कर पाएँगे तीन घंटे में । अब आपको सतत्तर साल की उम्र में हाई स्कूल की परीक्षा देनी पड़ रही है । बात तो चिंता की है । एम.ए. में तो एक ही सब्जेक्ट होता है पर हाई स्कूल अर्थात मेट्रिक में तो पाँच-सात सब्जेक्ट होते हैं । इसीलिए पुराने लोग मेट्रिक को बहुत बड़ी चीज मानते थे । हमसे मास्टर बनने के बाद एक बार एक बुजुर्ग ने पूछा- कहाँ तक पढाई की रे छोरे ? हमने कहा- ताऊ. एम.ए. कर ली है । तो कहने लगे- ठीक है बेटा, अब हिम्मत करके मेट्रिक भी कर ले तो और भी अच्छी नौकरी मिल जाएगी । एक ही वाक्य में उन्होंने हमारी मेरिट से पास की एम.ए. की ऐसी-तैसी कर दी । अब कहाँ तो आपकी हार्वड या ओक्सफोर्ड की एम.ए. और डी.लिट. और कहाँ अब विपक्ष के चक्कर में मेट्रिक की परीक्षा ।

वैसे अब भी आपको कोई न कोई यूनिवर्सिटी पी.एच.डी. दे सकती है मगर ये उससे संतुष्ट होने वाले नहीं हैं । लाने को तो नकली सर्टिफिकेट भी लाया जा सकता है मगर ये स्विस बैंक की सूचना कबाड़ने वाले 'स्वामी' उस नकली सर्टिफिकेट का भी भंडा-फोड़ कर सकते हैं । एक ओपन स्कूल जैसी भी चीज आजकल चल निकली है जिसमें सुनते हैं बहुत नक़ल चलती है और परीक्षा में सारे सब्जेक्ट एक साथ पास होने का झंझट भी नहीं है । एक साल में एक सब्जेक्ट पास कर लो, वह आपका जमा हो जाएगा । इस तरह आप पाँच साल में भी मेट्रिक कर सकते हैं मगर विपक्ष वालों को तो इतना धैर्य नहीं है । वे तो अभी सर्टिफिकेट देखना चाहते हैं । इससे पहले भी हर साल रिपोर्ट कार्ड देखा करते थे ।

अपने जमाने में तो मास्टर लोग कुंजी लाने से मना करते थे मगर आजकल कई तरह की कुंजियाँ बाज़ार में आ गई हैं । मास्टर लोग खुद ही कुंजी से पढ़ाते हैं और कमीशन देने वाले प्रकाशक की कुंजी खुद बच्चों को रेफर करते हैं । कई तरह की पास बुक्स भी आजकल बाजार में आती हैं- ट्वंटी फोर आवर सीरीज, वन वीक सीरीज, स्योर शोट आदि । कई तरह के गेस पेपर भी आते हैं जिन्हें पेपर सेट करने वालों द्वारा छद्म नामों से छापा जाता है । कई स्कूल तो पास करवाने की गारंटी भी देते हैं । हम यह सब आप की काबिलियत पर शंका के कारण नहीं बल्कि शक्ति और समय बचाने की दृष्टि से कह रहे हैं । अब आपके पास इतना समय कहाँ ? देश का विकास करें कि पढाई करें या बुढ़ापे में इन बदमाश बच्चों को सँभालें । अब बच्चे तो बच्चे ही हैं ना ? सब्जी लाने के लिए पैसे दो और ये उसी पैसे में से चाकलेट खा जाएँ । ज्यादा बड़े हों तो सिनेमा देखने चले जाएँ या बीयर में ही सब्जी के पैसे लुटा आएँ । अब बाप घर सँभाले या बच्चों के पीछे घूमता रहे । एक बार जब हम बच्चे थे तो एक खेत में घुस कर चार काचर (ककड़ी) तोड़ लिए । चार थे हम लोग सो हमें तो उन चार काचरों में से एक ही हाथ लगा पर जब शिकायत पिताजी के पास पहुँची तो हमारी पिटाई पूरे चार काचरों जितनी हुई । अब एक नादान बच्चे ने १ लाख ७६ हजार करोड़ के दस काचर तोड़ लिए । शिकायत आपके पास है । अब आप भी क्या करें ? बच्चे ने दस काचर तोड़े मगर उसके हाथ तो केवल दस परसेंट ही लगे बाकी नब्बे परसेंट तो औरों ने ही खा लिए । अब आप बच्चे को उलटा भी लटका दें तो एक काचर से ज्यादा निकलने वाला नहीं । और वह भी पेट में से निकला काचर किस काम का बचा होगा ?


वैसे जहाँ तक परीक्षा की बात है तो उसमें अध्यापकों की कृपा भी बहुत काम आती है । विद्यार्थी को, कुछ भी न जानते हुए भी वे प्रेक्टिकल में पूरे नंबर दिलवा सकते हैं । और परीक्षा में भी नक़ल में मदद कर सकते हैं । आजकल मास्टर इस कृपा के बदले में ट्यूशन पढ़ने वालों को विशेष महत्व देते हैं । यदि सारे साल ट्यूशन न पढ़ सको तो मय ब्याज के पूरे साल की ट्यूशन फीस एक साथ दे दो तो भी मान जाते हैं । गुरु जी फीस न दे सकने वाले कुछ गरीब किन्तु घनघोर सेवाभावी शिष्यों पर भी अपनी कृपा दृष्टि रखते हैं ।

कुछ भी हो, आप पर तो टीचर मेडम की कृपा दृष्टि है ही सो नैया पार लग ही जाएगी । जल्दी से मेट्रिक पास करके इन विपक्षियों का मुँह बंद कर ही दीजिए ।

२३-११-२०१०

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Nov 23, 2010

देयर वाज ए दलित राजा

जंगल और शेर दोनों ही घटते जा रहे हैं मगर अब भी जंगल का राजा शेर को ही कहा जाता है । कोई एक-आध बचा है तो सर्कस में तमाशे दिखा रहा है या रणथम्भौर में मुकेश अम्बानी के स्वागत में परेड कर रहा है । वैसे ठीक भी है, जंगल में तो पोचर घूम रहे हैं खाल, दाँत, माँस छीलकर एक्सपोर्ट करने के लिए । नाम राजा मगर सरकारी गाड़ी, बंगला, नौकर - कुछ नहीं मिलते । जो बजट आता है उसे वन-अधिकारी खा जाते हैं । खुद ही शिकार करके लाना पड़ता है । यदि बीमार हो जाए तो अमरीका जाकर इलाज करवाना तो दूर की बात है, पट्टी बाँधने के लिए कोई साधारण पशु-कम्पाउंडर भी नहीं मिलता । कोई आदर्श सोसाइटी ही नहीं तो फ्लेट हथियाने की भी सुविधा नहीं । राजा होकर भी पड़े रहो किसी गुफा में । सब्जियों का राजा आलू को कहा जाता है मगर भाव चढ़ रहे हैं लहसुन और प्याज के । जिन्होंने अपने खजाने को दारू और रंडियों में नहीं लुटाया और महलों में होटल खोल कर बैठ गए वे ढाबा चलाकर रोटी खा रहे हैं । नहीं तो राजा लोग या तो एयर इण्डिया के दफ्तर के आगे साठ साल से सलाम की मुद्रा में खड़े हैं या किसी दफ्तर की चौकीदारी कर रहे हैं । कई बरसों पहले पढ़ने को मिला था कि बहादुरशाह ज़फर का वंशज चाँदनी चौक में कपड़ों पर इस्त्री करता है । लखनऊ के नवाब का वंशज ताँगा चलाता है । कहा भी है- 'सबै दिन जात न एक समाना' ।


पहले क्षत्रिय ही राजा हुआ करते थे । कभी कभी कोई राजा जायज़ संतान के बिना मर जाता था और भले आदमियों की चल जाती थी तो किसी भले ब्राह्मण को गद्दी पर बैठा दिया जाता था । ब्राह्मण से कभी राज सँभला है ? सो फिर किसी बाहुबली के पास चला जाता था । बाहुबली ही क्षत्रिय होता है । यदि जन्मना न भी हो तो वह अपनी ताकत के बल पर अपने को क्षत्रिय मनवा लेता था । भारत पर विदेशियों के हमले होने लगे और एक दिन उन्होंने इस देश पर अपना राज भी जमा लिया । ये या तो राज करते थे या सैनिक होते थे । सैनिक भी राजा ही होता है । उसे राजा के नाम पर लूटने की आजादी होती है । फिर आए अंग्रेज, जो भले ही इंग्लैण्ड में जेब ही काटते रहे हों मगर यहाँ आकर तो सभी अधिकारी बन जाते थे- अंग्रेज बहादुर । जो हिंदू राजा थे वे इनको राजा मान चुके थे और मनमाना टेक्स वसूल करके इन्हें पहुँचाते थे और बचे हुए पैसों से या तो दारू पीते थे या लड़कियाँ उठवाते थे । यही स्वर्णयुग कोई दो हज़ार साल तक चला ।

इतने लंबे काल में कोई दलित राजा नहीं हुआ । काशी में था एक डोम । आज वहाँ उसे डोम-राजा कहा जाता है । डोम शब्द उस समय का 'दलित' ही रहा होगा । एक बार उसने हरिश्चंद्र नाम के एक राजा को खरीद कर अपना साम्राज्य बढ़ाना चाहा । किसी राजा को खरीदने वाला वह पहला व्यक्ति था । यह डोम राजा बहुत उदार था । उसने सवर्ण हरिश्चंद्र को सीधे ही मणिकर्णिका घाट का सी.ई.ओ. बना दिया । तभी विष्णु नाम के एक बँधुआ-मजदूरी-विरोधी कार्यकर्त्ता ने हरिश्चंद्र को मुक्त करवा दिया और डोम राजा को मुआवजा भी नहीं दिया । इसके बाद किसी दलित के राजा बनने का वर्णन नहीं मिलता ।

इसके बाद देश में लोकतंत्र आ गया और फिर तो दलितों को भी बहुत सारे अधिकार मिल गए । कई मुख्यमंत्री बने, राज्यपाल बने, राष्ट्रपति भी बने मगर रहे दलित के दलित ही । पता नहीं यह कैसा दलितत्त्व है जो कोई भी पद पाकर खत्म नहीं होता । पहले तो किसी भी जाति का हो मगर राजा बनते ही क्षत्रिय बन जाता था । लोकतंत्र में दलित होने में राजा होने से भी ज्यादा फायदे हैं । ले-दे कर अब जाकर कहीं एक राजा दलित हुआ है । तो सबके पेट में दर्द होने लगा है । कहते हैं या तो राजा रहो या दलित रहो । दोनों नहीं हो सकते । क्योंकि तुमने 'कुछ' लोगों को 'कुछ' सस्ते में 'कुछ' बेच दिया है ।


अरे भाई, राजा है, उसका राज है, जो चाहे बेच दे । लोग तो, कोई खरीदने वाला हो तो लाल किले की नकली रजिस्ट्री अपने नाम बनवाए फिर रहे हैं । मुग़ल बादशाह ने अंग्रेजो को ज़मीन बेच दी कि नहीं बंगाल में ? और वहीं से फैलाते-फैलाते उन्होंने सारे हिंदुस्तान पर कब्ज़ा कर लिया । शिवाजी ने एक कवि से एक ही कविता बावन बार सुनी और उसे बावन गाँव दे दिए । क्यों भाई, किसे पूछा था ? कृष्ण ने दो मुट्ठी चावल के बदले तो अपने क्लास-फेलो सुदामा को दो लोकों का राज दे दिया । तब किसी ने नहीं पूछा कि इतना सस्ता सौदा क्यों कर लिया ? टेंडर क्यों नहीं निकलवाए ? वह दलित नहीं था इसलिए सवर्णों ने कोई विरोध नहीं किया । अब एक दलित राजा ने 'कुछ' बेच दिया तो पीछे ही पड़ गए ।

इन सदाचारियों से कोई पूछे कि भई, क्या बेच दिया ? तो सही ढंग से बता नहीं पा रहे हैं । सोना, चाँदी, घर, मकान, ज़मीन क्या बेच दिया ? कहते हैं कोई ‘२-जी’ स्पेक्ट्रम बेच दिया । पता नहीं, कोई खाने की चीज है या पहनने की ? एस.एम.एस तक तो करना आता नहीं और बात कर रहे हैं बड़ी-बड़ी टेकनोलोजी की । अरे, पहले भी तो बिना टेंडर के ही बेच दिया था- कुछ स्पेक्ट्रम-वेक्ट्रम जैसा कुछ । 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर । शास्त्रों में भी कहा गया है “जिस रास्ते से '(प्रमोद)महाजन' जाते हैं वही सही रास्ता है” सो यह राजा भी बेचारा उसी रास्ते पर ही तो चला है । अब किसे पता था कि सूचना निकलने से पहले ही खरीदने वाले कुर्सी के नीचे छुप कर बैठे थे ।

इससे पहले भी तो सरकारी कारखाने बिके हैं और सस्ते में । कांग्रेस के राज में सिंदरी का खाद कारखाना धूल के भाव बेच दिया गया और फिर एन.डी.ए. के राज में बाल्को का अल्यूमिनियम का कारखाना पाँच सौ करोड़ में बेच दिया जिसमें पाँच हज़ार करोड़ का तो भंगार ही बताया जाता है । कहते हैं कि यह स्पेक्ट्रम बहुत महँगा बिक सकता था । तो खरीद लेते । किसने मना किया था ? पहले भी तो कभी-कभी ऐसा होता था कि कि राजा के मरने के बाद अगले दिन जो भी महल के दरवाजे पर सुबह-सुबह सबसे पहले मिलता था उसे ही राजा बना दिया जाता था । सो स्पेक्ट्रम के मामले में ऐसा हो गया तो क्या आसमान टूट पड़ा ? एक दलित है, इतने रुपए कभी न देखे, न सुने सो हजारों करोड़ की बात आते ही बेच दिया । अपने हिसाब से तो ठीक ही बेचा था । अब बनिए से तो पार पाना न किसी दलित राजा के बस का है और न किसी सवर्ण राजा के । धंधा करना तो बनिया ही जानता है । तुम लोगों से ही धंधा होता तो क्यों तो सरकारी कारखाने बेचते और क्यों सरकारी कारखाने घाटे में चलते ?


इसका फोटो देखा है ? कितना मासूम और कमसिन लगता है । इसके बस का इतने रुपए ( १ लाख ७६ हजार करोड़ ) को खाना तो दूर, हिसाब करना भी मुश्किल है । यह कौन सा हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड में पढ़ा अर्थशास्त्री है । इतने रुपए तो किसी रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने भले ही देखे हों, साधारण आदमी से तो इतनी बड़ी गिनती भी नहीं हो सकती । एक गरीब आदमी के एक बहुत बड़ी लाटरी निकल आई । लाटरी कम्पनी वालों ने सोचा- यदि इसे एक बार में ही इतने बड़े इनाम के बारे में बता दिया तो हो सकता है इसका हार्ट फेल हो जाएगा । सो एक मनोवैज्ञानिक को भेजा कि इसे ज़रा ढंग से बताना । मनोवैज्ञानिक ने उसे धीरे-धीरे बताना शुरु किया कि यदि तुम्हारे एक हजार की लाटरी लग जाए तो तुम क्या करोगे ? एक लाख की लाटरी लग जाए तो क्या करोगे ? वह भी बड़े मजे से बताता गया ? मगर परेशान ज़रूर हो रहा था । जब मनोवैज्ञानिक ने पूछा- यदि तुम्हारे एक करोड़ की लाटरी लग जाए तो क्या करोगे ? उसने चिढ़ कर कहा- आधा तुम्हें दे दूँगा । सुनते ही डाक्टर का हार्ट फेल हो गया ।

सब एक दलित के प्रति निष्करुण हो रहे हैं । यह तो भला हो करुणा के निधि का जिन्होंने अपनी करुणा के प्रताप से एक दलित को बचा लिया मगर कब तक ? जब सारा गाँव ही पीछे पड़ गया तो क्या किया जा सकता था । और तो और अम्मा, जिसे वात्सल्य की मूर्ति माना जाता है, नहीं पिघली और अंत में बाल-दिवस के उपलक्ष्य में एक राजा-बेटा की, एक राजा भैया की बलि लेकर ही मानीं । राजा एक लुप्त होती प्रजाति है और लुप्त होती प्रजातियों के बचाने के लिए वैसे भी सारी दुनिया में अभियान चल रहे हैं तो भारत में क्यों नहीं ? हमें विश्वास रखना चाहिए कि जल्दी ही कोई न कोई और ऐसा ही प्रतापी राजा भैया, राजा बेटा, राजा बाबू इस महान लोकतंत्र को प्राप्त होगा ।

१५-११-२०१०

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Nov 20, 2010

तोताराम का मौन व्रत


अभी तक तोताराम नहीं आया । हम चाय पी चुके थे । अंदर जाने के लिए चबूतरे से उठ ही रहे थी कि तोताराम की सवारी नुक्कड़ के पास आती दिखाई दी । सोचा पहले ही चाय का आर्डर क्यों दिया जाए, क्या पता घर से पीकर ही आ रहा हो । तोताराम आकर चुपचाप बैठ गया । कोई चार-पाँच मिनट निकल गए । पता नहीं क्या बात है । हमेशा अमर सिंह और स्वर्गीय प्रमोद महाजन और राखी सावंत की तरह हर बात में बिना बात टपक पड़ने वाले तोताराम ने आज इतना बड़ा कोमर्शियल ब्रेक कैसे ले लिया ? अंत में हमें ही श्री गणेशायानमः करना पड़ा- क्या बात है, आज मैना ने कुछ कह दिया क्या ? तोताराम ने 'ना' में सर हिलाया । हमने अगला प्रश्न किया- चाय पीकर आया है क्या ? फिर 'ना' में मुंडी हिली ।
- पिएगा ?
अबकी बार 'हाँ' में खोपड़ी ऊपर-नीचे हुई ।

अब हमारा भी धीरज चुकने लगा, थोड़ा आवाज़ ऊँची करके कहा- क्या 'मैं चुप रहूँगी' की नायिका की तरह यह पाँच किलो की तूँबड़ी हिला रहा है, मुँह में जुबान नहीं है क्या ?
फिर वही मुर्गे की डेढ़ टाँग । 'ना' में सर हिला ।

हमने लगा, हो सकता है कोई विशेष बात है इसलिए सारा गुस्सा थूक कर पूछा- क्या दाढ़ में दर्द है या बिहार में तीन सौ सभाओं को संबोधित करके लालू जी तरह गला बैठ गया है ?
फिर वही 'ना' में सर हिला ।

अब हमारा धैर्य चुक गया । यदि सत्तर का दशक होता और यह हमारा विद्यार्थी होता तो एक ठीक-ठाक सी चपत जमा चुके होते या कान ही उमेठ दिया होता । मगर यह इक्कीसवीं शताब्दी है एक वरिष्ठ नागरिक तो दूर, आप कसाब तक को नहीं डाँट सकते अन्यथा मानवाधिकार वालों के पेट में दर्द होने लग जाएगा । इसलिए एक कागज और पेन्सिल लाकर उसके सामने रख दिए और कहा- प्रभु जी, इस सर-संचालन से हमारी संतुष्टि नहीं हो रही है । कृपया बोल नहीं सकते तो कुछ लिख ही दो ।

तोताराम ने लिखा- मैं चुप रहूँगा । कोई बीमारी नहीं है ।
- क्या मौन व्रत है ?
- नहीं ।
- तो फिर बोल
- नहीं ।
- तो फिर क्या तुझे बुलवाने के लिए मनमोहन जी की तरह सर्वोच्च न्यायालय का आदेश लाना पड़ेगा ? क्या तेरे किसी सहयोगी ने १.७६ लाख करोड़ का घोटाला कर लिया है ? क्या यह गठबंधन की कोई शर्त है ? क्या तूने भी कोई गोपनीयता की शपथ ले रखी है ? देख, कुछ ऐसे अवसर होते हैं जब न बोलना भी गलती की स्वीकृति मान लिया जाता है । 'मौनं स्वीकृति लक्षणं' । अरे, 'मौनी बाबा' कुछ तो बोल । पूरा सच नहीं तो युधिष्ठिर की तरह अर्ध-सत्य ही बोल मगर बोल तो सही । क्या तेरी दाढ़ी में तिनका है ?

तोताराम ने अपनी चार दिन से न बनाई हुई दाढ़ी पर हाथ फेरा और फिर निश्चिन्त होते हुए सर हिला दिया ।

हमने पत्नी को आवाज़ लगाई- हमें लगता है कि आज तोताराम का मौन व्रत के साथ-साथ कोई उपवास भी है, सो पकौड़ों की एक प्लेट ही लाना ।
तभी तोताराम चिल्लाया- भाभी, एक नहीं, दो प्लेटें लाना । मेरा कोई व्रत नहीं है ।

हमें तसल्ली हुई, चलो तोताराम का मुँह तो खुला । अब मनमोहन जी का मुँह न खुलने के तनाव को विपक्षी झेलें जिनकी आँखें छींकें पर लगी हैं कि अब गिरा और तब गिरा । अपने तो वही संतों वाली दिवाली है ।

१८-११-२०१०

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Nov 19, 2010

जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी


चार-पाँच दिन से अखबार में ओबामा-ओबामा पढ़कर खोपड़ी भन्ना गई । मीडिया की हालत भक्त प्रह्लाद जैसी हो रही थी- खंभ में राम, खड्ग में राम, मुझमें राम, तुझमें राम । जहाँ देखूँ तहँ राम ही राम । ऐसी हालत तो राम के वनवास की अवधि समाप्त होने पर अयोध्यावासियों की भी नहीं हुई होगी । जैसे ही ९ तारीख़ को तोताराम आया, हम उसी पर पिल पड़े- पहुँचा आया, महामहिम को जकार्ता ?

वह पट्ठा भी कौन-सा चूकने वाला था, बोला- क्या किया जाए, जब प्लेन में सलमान खुर्शीद के लिए ही जगह नहीं थी तो मैं कहाँ से घुस जाता । हाँ, जगह होती तो पहुँचा आने में क्या बुराई थी । वे जब हमारे लिए इतनी दूर से लाव-लश्कर के साथ, इतना खर्चा करके, उड़ कर आ सकते हैं तो क्या हम इतने गए-गुजरे हैं कि जकार्ता तक छोड़ कर भी नहीं आ सकते ?

हमने कहा- वे न तो तेरे दर्शन करने आए थे और न ही तुझे दर्शन देने । उनके देश की तो आजकल हालत ज़रा ऐसे ही चल रही है सो कुछ न कुछ बेचने आए थे सो बेच गए दस अरब डालर का माल और रोज़ ९०० करोड़ का सुरक्षा व्यवस्था का खर्चा करवा गए सो अलग ।



तोताराम कहने लगा- अरे, हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं । हमारे लिए दस अरब क्या बड़ी चीज़ है । ७९ हज़ार करोड़ रुपए तो हमने अभी-अभी खेलों में खर्चे हैं और यदि मिल जाए तो ओलम्पिक करवाने का माद्दा भी रखते हैं । हजारों करोड़ का तो हमारे यहाँ अनाज खुले में पड़े सड़ जाता है । आज मित्र यदि थोड़ा परेशानी में है तो क्या हुआ ? उसके यहाँ आजकल बहुत बेकारी चल रही है, सौ-पचास हजार लोगों को रोजगार मिल जाएगा । लोग दुआ देंगे । वैसे अमरीका के लिए तेरे ये दस अरब डालर कोई बड़ी रकम भी नहीं है । तुझे पता है, उस पर आज भी 1345 अरब डालर का कर्जा है । यह तो घर आए को हाथ का उत्तर देने वाली बात थी ।

हमने कहा- बेकार तो अपने यहाँ भी चार करोड़ हैं । उनकी फ़िक्र क्यों नहीं करते ?

कहने लगा- अपने यहाँ तो लोगों को आदत है बेकारी की । नौकरी पर होते हैं तो ही कौन-सा काम करके निहाल करते हैं ? और फिर ‘नरेगा’ और ‘बी.पी.एल.’ में सारी सुविधाएँ दे तो रखी हैं । वहाँ के लोगों का खर्चा बहुत है भैया । बिना दारू पिए लोगों से खाना नहीं खाया जाता । कार भी सभी को मेंटेन करनी पड़ती है । सो क्या हो गया थोड़ी-बहुत मदद कर दी तो । तुलसीदास जी ने भी कहा है- “जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी । तिनहिं विलोकत पातक भारी । । ”

और फिर यह १० अरब डालर कोई दान में थोड़े ही दिए हैं । अगला बदले में माल भी तो देगा । भले ही लोगों को दाल-रोटी न मिलें पर शक्ति संतुलन के नाम पर हथियार तो खरीदने ही पड़ेंगे, अमरीका से नहीं तो फ़्रांस से, फ़्रांस से नहीं तो ब्रिटेन से । और फिर अपने यहाँ के लोगों को भी तो रोजगार मिलेगा ही- इन प्लेनों को चलाने में, इनकी सफाई करने में, इनमें तेल-पानी भरने में । अमरीका ने भी तो पी.एल. ४८० के तहत हमारी मदद की थी जब स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय हमारे यहाँ अनाज की कमी थी तब । भले ही गेंहूँ लाल था, आटा गूँदने पर रबड़ की तरह खिंचता था, थोड़ी ही देर में रोटी एकदम चीमड़ हो जाती थी, उसके साथ गाजर घास के बीज भी आ गए थे पर बखत पर काम तो चल गया । और फिर तू यह क्यों भूल जाता है कि ओबामा जी ने हमें बराबर का दर्जा दिया है । संसार से आतंकवाद मिटाने के लिए हमारे महत्व को रेखांकित किया है ।

हमने कहा- तोताराम, हमें तो लगता है, अमरीका हमें बाँस पर चढ़ा रहा है । हमें अफ़गानिस्तान में उलझाकर खुद खिसक जाएगा । हम में वही मियाँ जी वाली होगी कि 'नमाज़ छुड़ाने गए थे और रोज़े गले पड़ गए' ।

तोताराम ने एक ही वाक्य में हमारा मुँह बंद कर दिया, बोला- जब इतना ही डर लगता है तो महाशक्ति बनने का मोह क्यों पाल रहा है ? जब अपने दरवाजे सँकडे हों तो महावतों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए । महाशक्ति का मतलब होता है बात और बिना बात हर किसी फ़टे में टाँग फँसाना, न खुद जीना और न दूसरों को सुख से जीने देना ।

१०-११-२०१०

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Nov 15, 2010

चश्मे का हिसाब-किताब


कुछ बातें ऐसी हैं जिनके लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता । वे अपने आप हो जाती हैं । न चाहने पर भी हो जाती हैं । जैसे कि मौत, रिटायरमेंट और किसी का वरिष्ठ नागरिक होना । पहले दिवाली के दूसरे दिन सब एक सिरे से मोहल्ले के सभी बड़े स्त्री-पुरुषों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया करते थे । हम सोचा करते थे कि कभी तो हम इतने बड़े होंगे ही कि मोहल्ले के बच्चे-जवान हमारे पैर छूने के लिए आया करेंगे मगर किस्मत की बात कि वरिष्ठ नागरिक बने हुए चार साल हो गए मगर कोई भी पैर छूने नहीं आता । हम अपने मन में तो यह जानते ही हैं कि हममें उम्र बढ़ने के बावज़ूद बुजुर्गों वाली गंभीरता नहीं आई है । और कभी-कभी हमें यह लगता है कि बच्चों को भी हमारी इस कमी का पता चल गया है या फिर हो सकता है कि अब वह चलन ही खत्म हो गया । सब एस.एम.एस. और फोन से ही काम चला लेते हैं । आने-जाने की ज़हमत उठाने की ज़रूरत ही नहीं । आदत से लाचार हमीं अपने से बड़ों के चरण छूने जाते हैं । मगर अब उनकी संख्या काफी कम हो गई है । हो सकता है कि दस-पाँच बरस में या तो वे या फिर हमारी ही ‘जै राम जी की’ हो जाएगी ।

वैसे तोताराम तो कोई दो घंटे से ही आया बैठा है । पर तोताराम के आने को हम आना नहीं मानते क्योंकि वह तो रोजाना ही आता है । वैसे इसका एक कारण यह भी है कि जब घर में ज़्यादा काम होता है तो हम दोनों की पत्नियाँ यही चाहती हैं कि यदि हम घर के अंदर न आएँ तो अधिक सुविधा रहेगी । तोताराम के आज दोपहर में भी जमे होने का एक कारण यह भी हो सकता है । तभी एक युवा पत्रकार आ गया । हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं । अभी वह संघर्ष कर रहा है । मतलब कि उसे खबरें देने के पैसे नहीं मिलते । हाँ, वह लोगों की छोटी-मोटी खबरें छपवा कर उनसे चाय-पानी का जुगाड़ ज़रूर कर लेता है । वैसे, जब से अखबारों के कई-कई संस्करण निकलने लगे हैं तब से अखबार का नाम भले ही राष्ट्रीय हो मगर उनका चरित्र स्थानीय क्या, गली-मोहल्ले जैसा हो गया है । एक जिला मुख्यालय के भी शहरी और ग्रामीण संस्करण निकलने लगे हैं । अखबार में छपी अपनी खबर को देख कर व्यक्ति फूला नहीं समाता कि अब तो सारा संसार उसे पढ़ रहा होगा मगर असलियत यह है कि पन्द्रह किलोमीटर दूर के गाँव में पढ़े जा रहे अखबार में वह खबर हो ही नहीं । इस प्रकार विज्ञापन भी अधिक मिल जाते हैं और जहाँ तक खबरों के संकलन का प्रश्न है तो आप न्यूज एजेंसियों से इंटरनेट पर ही कमरे में बैठे-बैठे दुनिया भर की खबरें और फोटो डाउनलोड कर सकते हैं ।

तो युवा पत्रकार आया, हमारे पैर छुए और एक-दो अखबारों के दिवाली की बधाई के विज्ञापनों से भरे पन्ने हमारे सामने फैला दिए । हमें लगा, हमारी साधना सफल हुई । कोई तो आया । जैसे कि कोई साधारण आदमी आमरण अनशन पर बैठ जाए और शाम तक उसे सँभालने के लिए कोई न आए । ऐसे में कोई गली का युवा नेता ही आ जाए और कहे कि हम आपकी माँगों को सरकार तक पहुँचाएँगे । अनशन तोड़िये और यह शिकंजी पीजिए । बस, कुछ इसी शैली में हमारा मान रह गया । हमने उसे आशीर्वाद दिया, चाय ऑफर की । उसने विज्ञापनों की भीड़ में से एक चार लाइन का समाचार निकाल कर पढ़वाया । 'मास्टर रमेश जोशी का पुराना चश्मा पचास लाख में नीलाम हुआ' । हमें लगा, यह कारस्तानी भी तोताराम की ही है । असलियत हम जानते है फिर भी एक गर्व की अनुभूति जैसी कुछ हुई । 'पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही' वाली शैली में । सोचने लगे कि अब उन लोगों को पता चलेगा, आँखें फट जाएँगी जिन्होंने हमारी पुस्तकों को पाँच सौ रुपए के पुरस्कार के लायक भी नहीं समझा । तभी एक सज्जन, जिन्हें हम जानते नहीं थे, हमें बधाई देकर बैठकर गए । हमने उन्हें भी चाय प्रस्तुत की ।

चाय पीते-पीते उन्होंने पूछा- मास्टर साहब, इतना महँगा चश्मा किसने खरीदा ?
हम ज़वाब देते इससे पहले ही तोताराम बोल पड़ा- इससे क्या फर्क पड़ता है कि किसने खरीदा ?

तभी युवा पत्रकार बीच में कूदा- समाचार देने तो तोताराम जी आए थे । इनको तो पता होगा ही ।

अब बारी तोताराम की थी, बोला- तुम तो पत्रकार हो । तुम्हें तो मालूम होना चाहिए कि समाचार का सूत्र बताने के लिए संवाददाता को कोई बाध्य नहीं कर सकता ।
अब तक चुप बैठा, अनजान सज्जन कहने लगा- यह ठीक है कि आपको बताने के लिए कोई बाध्य नहीं कर सकता मगर आयकर विभाग के नियमों के अनुसार जिसने भी खरीदा है उसे तो बताना पड़ेगा ही कि इतना पैसा कहाँ से आया ?

आज पता नहीं तोताराम क्यों आक्रामक मुद्रा में था, बोला- लगता है आप आयकर विभाग से हैं । तो महोदय, जब किसी ने मोनिका लेविंस्की की क्लिंटन द्वारा हस्ताक्षरित 'वह' ड्रेस करोड़ों में खरीदी थी तब आप कहाँ थे ? जब मर्लिन मुनरो की प्रथम प्रेमलीला वाला पलंग किसी ने करोड़ों में खरीदा था आपने क्या किया था ?

आयकर विभाग वाला सज्जन पहले तो अचकचा गया मगर फिर कुछ कानूनी हो गया- हमारा विभाग विदेशों में हुए घपलों के लिए जिम्मेदार नहीं है ।

तोताराम बोला- तो फिर यही बता दीजिए कि सचिन तेंदुलकर का बल्ला बयालीस लाख में खरीदने वाला कौन है ? अमिताभ बच्चन के साथ खाना खाने की नीलामी बारह लाख में छुड़ाने वाला कौन है ? उन्हें दो लाख तीस हज़ार का चश्मा किसने भेंट किया ? चलो छोटी-मोटी बातें तो छोड़िये, मुकेश अम्बानी ने मात्र चालीस करोड़ सालाना तनख्वाह में दस हज़ार करोड़ का बँगला कैसे बनवा लिया ? बाबा रामदेव को करोड़ों का हेलीकोप्टर किसने भेंट किया ? और मान लो हमने ही खरीद लिया मास्टर का चश्मा तो क्या घपला कर दिया ?

हमें आयकर विभाग का अधिक अनुभव तो नहीं है पर इतना ज़रूर जानते हैं कि वे आपसे कुछ भी पूछ सकते हैं मगर आप उनसे कुछ नहीं पूछ सकते । टेक्स का एक पैसा कम जमा हो जाए तो मनमाना ब्याज लगा देंगे पर अगर आपने भूल से टेक्स ज्यादा जमा करवा दिया तो वापिस मिलेगा या नहीं इसकी गारंटी नहीं है । हमने पेन कार्ड बनवाते समय सभी कुछ ठीक लिख कर दिया था पर उन्होंने कार्ड में हमारे नाम की स्पेलिंग गलत छाप दी । पूछने गए तो कहने लगे- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । बस, पैसे का हिसाब ठीक होना चाहिए ।

आयकर वाला कहने लगा- मगर जब तोताराम जी या आप अपना रिटर्न भरेंगे तब तो सब दिखाना ही पड़ेगा और इनकम का सोर्स बताना ही पड़ेगा ना ?

अब तोतराम ने छक्का मारा, कहने लगा- जी, हमने ही ख़रीदा है चश्मा । समाचार में यह कहाँ लिखा है कि नकद खरीदा या किस्तों में ? और हाँ, पेमेंट भी हम ही करेंगे मगर पाँच रुपए रोजाना की किस्तों में । ले लेना खर्चे का हिसाब-किताब ।

अब तो आयकर विभाग वाले की शक्ल देखने लायक थी ।

फिर भी हम नहीं चाहते थे कि त्यौहार के दिन मिठास कम हो सो पत्नी से कुछ मिठाई लाने के लिए आवाज़ लगाई ।

७-११-१०

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Nov 13, 2010

नारियल, कुत्ता, ओबामा और तोताराम


पत्नी का दिवाली की सफाई का कार्यक्रम आज छोटी दिवाली तक भी चल ही रहा था । इसलिए हो सकता है चाय मिलने में अधिक विलंब हो, सो हमने कहा- तोताराम, आज उधर बगल वाले प्लाट में पेड़ के नीचे बैठते हैं । वहाँ जाकर देखा तो पाया कि नीम के पेड़ के नीचे पटाखों के ढेर सारे छिलके बिखरे पड़े थे । सो कुर्सियाँ खींच कर बेल के पेड़ के नीचे सरका ली, मगर तोताराम दूर ही खड़ा रहा ।

हमने उसका हाथ पकड़ कर खींचा- आ जा, बैठ जा । अभी चाय आने में पता नहीं कितनी देर लगेगी ।

कहने लगा- कोई बात नहीं, मैं यहीं खड़े-खड़े इंतज़ार कर लूँगा ।

हमें बड़ा अजीब लगा, पूछा- क्या किसी ने तुझे खड़ा रहने की सजा दे रखी है ? बोला- नहीं, ऐसी बात नहीं है पर ऊपर देख, एक सूखा-सा बेल का फल लटक रहा है । क्या पता, मैं इसके नीचे बैठूँ और वह फल मेरे सर पर गिर पड़े ।

हमें हँसी आ गई । अरे, यह सब 'काकतालीय न्याय' वाली बात है । क्या कहीं कौए के बैठने से पेड़ की डाल टूटती है ? कभी संयोग हो गया तो इसका मतलब यह नहीं है कि जब-जब भी कौआ बैठेगा तब-तब डाल टूटेगी ही । हमने तो कभी नहीं सुना कि पेड़ के नीचे बैठे किसी व्यक्ति का सर फल गिरने से फूट गया हो । यह तो ज़रूर पढ़ा है कि सिद्धार्थ को बरगद के पेड़ के नीचे बैठने से ज्ञान प्राप्त हुआ था । न्यूटन पेड़ के नीचे बैठा था तो पेड़ से गिरने वाले सेव को देखकर उसे गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत पता चल गया । प्राचीन काल में पेड़ों के नीचे बैठकर ही विद्यार्थी ऊँचे से ऊँचा ज्ञान प्राप्त कर लिया करते थे । और तू है कि पेड़ के नीचे थोड़ी देर बैठने से ही घबरा रहा है । अरे, हमारी तो संस्कृति ही पेड़ों के नीचे विकसित हुई है । तभी तो 'आरण्यक' नामक ग्रन्थ हमारे यहीं पाए जाते हैं ।

कहने लगा- मास्टर, ज़माना बहुत आगे बढ़ गया है और उसी हिसाब से उसकी समस्याएँ भी । तुमने पढ़ा नहीं कि ओबामा जी के आने से पहले मणि-भवन के नारियल के पेड़ों के फल तोड़ दिए गए हैं । क्या पता, ओबामा जी का घुसना हो और फल का गिरना हो और अरबों रुपए खर्च करके किए जा रहे उनके स्वागत के रंग में भंग पड़ जाए । भले ही नारियल का फल बहुत बड़ा नहीं होता और उसके अपने आप गिरने की संभावना भी नहीं होती फिर भी भाग्य का कुछ भी पता नहीं । यदि गिर जाए तो बड़ी तगड़ी चोट लगती है । क्या पता, ब्रेन हेमरेज हो जाए । तो यह तेरा बेल का एकमात्र फल क्या पता, मेरे सर पर ही न गिर पड़े ।

हमने कहा- तो तू अपने को ओबामा समझ रहा है जिसके सर को पेड़ों पर लगे फलों से भी खतरा हो । यदि इतना ही डर लग रहा है तो तू भी अपने साथ पासपोर्ट बनवाकर किसी सूँघने वाले कुत्ते को अपने साथ ले आता ।

बोला- भले ही आजकल पुलिस आदमी से ज्यादा कुत्तों पर विश्वास करने लग गई हो पर कोई भी ज़मीन पर खड़ा कुत्ता नारियल के पेड़ पर लगे फल में घुसे विस्फोटक को नहीं सूँघ सकता ।

हमने कहा- कोई कुत्ता नारियल के फलों में घुसे विस्फोटक को नहीं सूँघ सकता और जब फलों को कटवाना ही था तो कुत्ते को लाने का खर्चा करने की क्या ज़रूरत थी । और वैसे भी अपने यहाँ कहावत भी तो है कि 'कुत्ता नारियल का क्या करेगा' ?

तोताराम कहने लगा- क्या पता, बुश साहब की तरह राजघाट जाने से पहले समाधि की सुरक्षा जाँच करवाने के लिए कुत्ते को उस पर चढ़ाना हो ? मगर ओबामा जी गाँधी जी के भक्त हैं । वे ऐसा तो हरगिज नहीं करेंगे ।


अभी तक तोताराम पेड़ के नीचे आकर नहीं बैठा तो हमें ही स्टूल को धूप में लाना पड़ा । हालाँकि धूप बहुत तेज नहीं थी फिर भी कार्तिक की धूप है, सुहानी भी कैसे हो सकती है । हमने बात जारी रखते हुए कहा- तोताराम, तू बिना बात ही डर रहा है । आज तक बता किस महान पुरुष की मौत पेड़ से गिरे फल की चोट से हुई है । लिंकन, कैनेडी, महात्मा गाँधी, इंदिराजी, राजीव गाँधी, बेनजीर, मुजीब, भंडार नायके सभी तो षडयंत्रों का शिकार हुए हैं ।

बोला- तुझे नहीं पता, ये खुराफाती लोग बड़े चालाक हैं । चोर चौकीदार से ज्यादा चतुर होता है । गृहस्थ को तो दिन भर काम करके रात को आराम करना होता है ताकि दूसरे दिन फिर काम पर जा सकें, पर इन खुराफातियों को कौन सी ड्यूटी करनी होती है । इन्हें तो सारे दिन ये खुराफातें ही सोचनी हैं । किसने सोचा होगा कि सर्जरी करके कुत्ते के पेट में विस्फोटक फिट कर दो और फिर रिमोट से उनका विस्फोट कर दो । यह बात और है कि संयोग से वह कुत्ता जहाज में बैठाए जाने से पहले ही फट गया । प्रिंटर के कार्ट्रिज में स्याही की जगह विस्फोटक भरकर कार्गो प्लेन में चढ़ा दो और मौका देखकर रिमोट से विस्फोट कर दो । ये तो तक्षक के भी बाप हैं जो परीक्षित को काटने के लिए फल में कीड़ा बनकर परीक्षित के पास पँहुच गया और दे ही दिया आतंकवादी गतिविधि को अंजाम ।

हमने पूछा- तोताराम, इन खुराफातियों में इतनी अक्ल और ट्रेनिंग कहाँ से आती है ? क्या इसका कोई स्कूल होता है ?

बोला- शीत-युद्ध के समय अमरीका ने ही रूस को घेरने के लिए उसकी सीमा से लगे मुस्लिम देशों में ऐसे खुराफाती स्कूल खुलवाए थे और इन्हें बहुत सहायता भी दी थी । अब ये आत्मनिर्भर हो गए है और अमरीका के लिए सिर दर्द भी । गलती किसी की और नारियलों से बचते फिर रहे हैं बेचारे ओबामा । इसी को कहते हैं 'बंदर की बला तबेले के सर' ।

हमने कहा- चलो भई, कब-कब आते हैं ऐसे मेहमान, दस-बीस पेड़ों के फल ही तो कटे हैं । यहाँ तो छोटे-मोटे आयोजन के लिए ही जाने कितने पेड़ काट दिए जाते हैं । आजकल तो वैसे भी इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया जा रहा है तो जाने कितने हजार एकड़ कृषि भूमि और कितने लाख पेड़ बलि चढ़ रहे हैं इस विकास की ।

तेरे साथ हम भी कामना कर ही देते हैं कि 'यात्रा सफल हो' पर असली पता तो कुछ दिनों के बाद लगेगा जब सब अपने-अपने हाथ सँभालेंगे कि मिलाए गए कौन-कौन से हाथ सलामत हैं और कौन से गायब ।

४-११-२०१०

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तोताराम की आवाज़ का पेटेंट


आज तोताराम नहीं आया । नौ बज गए । अब उसके आने की कोई उम्मीद लगती । जैसे ही हम अंदर जाने लगे तो एक उजबंग से सज्जन के साथ तोताराम आता दिखाई दिया । हमने रोकना चाहा, तो बोला- अभी जल्दी में हूँ, वकील से मिलना है ।

हमने पूछा- तेरा वकील से क्या काम आ पड़ा ? क्या कहीं तूने भी आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में फ्लेट तो नहीं कबाड़ा था ?

कहने लगा- मौका मिलने पर कौन चूकता है, पर मैं अभी इतना बड़ा आदमी नहीं बना कि उस सोसाइटी में फ्लेट कबाड़ सकूँ । मुख्यमंत्रियों, सेनाध्यक्षों का पेट भरे तो किसी और का नंबर आए ना । मैं तो अपने इस ब्रदर-इन-ला के काम से जा रहा हूँ ।

हमने कहा- तेरे सभी सालों को हम जानते हैं । ये सज्जन उन में से तो कोई भी नहीं हैं ।

कहने लगा- इनकी और मेरी एक ही समस्या है और उसी के कानूनी हल के लिए हम वकील की सलाह लेने जा रहे हैं इसलिए हम दोनों ब्रदर-इन-ला हुए कि नहीं ?

ब्रदर-इन-ला की इस नई व्युत्पत्ति ने हमें आश्चर्यचकित कर दिया ।

हमने कहा- अच्छी बात है । चले जाना, एक-एक चाय तो हो जाए ।

दरअसल हमारी रुचि चाय पिलाने में इतनी नहीं थी जितनी कि कानूनी मामले को जानने में थी ।

हमने पूछा- तुम्हारे साले साहब, सॉरी, ब्रदर-इन-ला की क्या समस्या है ?

तोताराम ने बताया कि इन सज्जन का नाम है 'नवारी लाल' । हमें नाम बड़ा अजीब लगा । पूछने पर तोताराम की जगह वे सज्जन खुद ही बताने लगे- जैसे आप तोताराम जी के भाई साहब हैं वैसे ही हमारे भी । सो भाई साहब, बात यह है कि नाम तो हमारा बनवारी लाल है और हम टीचर के बताए अनुसार बड़े 'बी' से अपना नाम शुरु करते थे मगर जब से एक महानायक 'बिग बी' बन गए तो हमने सोचा- 'राड़ से बाड़ भली' । अपना क्या है, छोटे बी से अपना नाम लिखना शुरु कर लिया करेंगे । फिर पता चला कि उनके साहबजादे भी फिल्मों में चल निकले हैं तो स्माल बी उनके लिए रिज़र्व हो जाएगा । सो कोई टोके उससे पहले ही मैंने अपना स्माल बी भी हटा दिया और अब मात्र 'नवारी लाल' रह गया हूँ । सोचता हूँ, कोई इन बचे हुए तीन अक्षरों को भी कब्ज़ा ले उससे पहले ही इनका तो पेटेंट करवा लूँ ।

अब हम तोताराम की तरफ मुखातिब हुए- तो महाशय तोताराम जी बताइए, आप किस चीज का पेटेंट करवाने जा रहे हैं ? कहीं अपनी आवाज़ का पेटेंट तो नहीं करवाने जा रहे, अमिताभ बच्चन की तरह ? ठीक भी है, इस गुरु गंभीर आवाज़ का पेटेंट करवा ही लेना चाहिए । ऐसी आवाज़ सदियों में ही किसी एक को भगवान अता फरमाता है ।

 तोताराम कहने लगा- मैं सब समझता हूँ तुम्हारा इशारा । ठीक है, मेरी आवाज़ मनमोहन सिंह जी की तरह शालीन है पर है तो विशिष्ट ना । और मुझे मालूम है कि तू इसे अपनी भाषा में 'मिमियाती' हुई आवाज़ कहेगा । मगर याद रख मिमियाती आवाज़ का भी महत्व होता है । क्या दहाड़ती आवाज़ के बल पर अडवानी जी प्रधान मंत्री बन सके ? और मान लो बन भी जाते तो कितना टिक पाते ? और मान लो अटल जी की तरह किसी तरह टिक भी जाते तो क्या दूसरी टर्म के लिए चुने जाते ? और मान लो चुने भी जाते तो क्या ओबामा और मिशेल को इस तरह नचा पाते जैसे कि मनमोहन जी ने दिल्ली और मुम्बई में नचा दिया ? यह इस मिमियाती आवाज़ का ही कमाल है । सो जब तक कोई और दूसरा कूद नहीं पड़े उससे पहले मैं भी अपनी इस मिमियाती आवाज़ का पेटेंट करने जा रहा हूँ । 

हम सोच रहे थे कि ज़माना कितना बदल गया है । राम ने धनुष-बाण का, कृष्ण ने बाँसुरी का, शिव ने त्रिशूल का, विष्णु ने सुदर्शन चक्र का, सरस्वती ने वीणा का पेटेंट नहीं करवाया और लोग हैं कि अपनी आवाज़ का पेटेंट करवा रहे हैं । अरे भाई, आवाज़ क्या अपनी है ? यह तो भगवान की दी हुई है ? और किसे पता है, कब बंद हो जाए मगर नहीं साहब, यह हमारी आवाज़ है और हम इसका पेटेंट करवाएँगे । ठीक है करवाइए । हमें क्या ?

८-११-२०१०

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Nov 4, 2010

पचास लाख में चश्मे की नीलामी



आज जब रोज हजारों करोड़ की रिश्वत, घोटालों और निवेश की खबरें पढ़ते है तो हमें उस दिन को याद करके हँसी आ जाती है जब हम रिटायर होने वाले थे । बड़े बाबू ने हिसाब लगाकर बताया था-गुरु जी, आपको रिटायरमेंट पर पूरे पाँच लाख मिलेंगे । हमने कहा- बड़े बाबू, उस समय आप हमारे साथ रहना क्योंकि हमारी गणित कमज़ोर है । क्या पता, गिनने में गलती हो जाए । जब बड़े बाबू ने बताया कि यह रकम आपको नकद नहीं मिलेगी बल्कि आपके बैंक खाते में जमा होगी तब कहीं जाकर तसल्ली हुई । चलो,जितना आसानी से गिना जा सके उतना ही थोड़ा-थोड़ा करके निकलवाते रहेंगे ।

तभी तोताराम ने हमारा ध्यान भंग किया- मास्टर, तेरा चश्मा कितने में बेचेगा ?
हमने कहा- बेचना क्या है, तू ऐसे ही ले जा । इसके ग्लास बोतल के पेंदे जैसे हैं और इतने भारी कि दो चार मिनट में ही नाक दुखने लग जाती है । पोती भी कह रही थी- बाबा, अब इस चश्मे को छोड़ दो नया बनवा लो । छोड़ना तो है ही ।
बोला- फिर तू अखबार कैसे पढ़ेगा ? दूसरा है क्या ?


हमने उत्तर दिया- अब अखबार पढ़ने के कोई सेन्स नहीं है । रोज एक जैसी खबरें आती हैं । सवेरे-सवेरे वही हत्या, गबन, घोटाले, एक्सीडेंट, बलात्कार, चोरी, डाका पढ़-पढ़ कर जी घबराने लगता है । और जब से यह पढ़ा है कि शहीदों की विधवाओं के मकान भी मुख्य मंत्री और जनरल हड़प गए तो डर लगने लग गया है । कलियुग क्या, महाकलियुग आ गया है । सोचते हैं, अखबार पढ़ना ही छोड़ दें । वैसे कभी कभार कोई चिट्ठी-पत्री लिखनी हुई तो देख विचारेंगे । नया बनवा लेंगे । तू तो इसे ले ही जा ।

तोतराम बोला- बंधु, मैं कोई चीज मुफ्त में नहीं लेता । तेरे चश्मे की नीलामी करते हैं । जितने मिल जाएँ, तेरे ।

अब हमें भी इस खेल में मजा आने लगा था । सो पत्नी से चश्मा मँगवाया । चश्मा हमारे सामने स्टूल पर रख दिया गया । तोताराम ने हमारी पत्नी से कहा- भाभी, आप यहीं रुको । गवाह के हस्ताक्षर भी तो होंगे । चाय नीलामी के बाद बना लेना । आप बिडर होंगी । तो बोलो, मास्टर रमेश जोशी के चश्मे की रिज़र्व प्राइस है बयालीस लाख एक रुपए ।

पत्नी भी इस खेल में शामिल हो गई और अंदर से बेलन ले आई और दो-तीन बार स्टूल पर ठोंक कर बोली- चिक्की के दादाजी के चश्मे की रिजर्व बोली है बयालीस लाख एक रुपए । जो भी सज्जन इससे ज्यादा की बोली लगाना चाहते हैं, लगा सकते हैं ।

पत्नी की आवाज़ की गूंज भी खत्म नहीं हुई थी कि तोताराम बोल पड़ा- पचास लाख । और कोई चौथा व्यक्ति उस समय आसपास भी नहीं था सो अगली बोली लगने की संभावना नहीं थी । पत्नी ने फिर तीन बार स्टूल पर बेलन ठोंका- पचास लाख एक, पचास लाख दो, पचास लाख तीन । और घोषणा कर दी कि पचास लाख में चश्मा तोताराम जी का हुआ ।

तोताराम ने कहा- भाभी, आप गवाह रहना । और अपनी जेब से चेक निकाल कर हमारे हाथ पर रख दिया । पूरे पचास लाख की रकम लिखी हुई थी ।

हमने कहा- तोताराम, यह नाटक ठीक तेरी योजना के अनुसार पूरा हुआ पर हमें यह बात अभी तक समझ में नहीं आई कि तुमने चश्मे की बोली बयालीस लाख एक रुपए ही क्यों लगाई ? इतनी बड़ी बोली में एक रुपए का क्या महत्व है ? पूरे बयालीस लाख क्यों नहीं रखा ?

कहने लगा- बात एक नहीं, एक लाख रुपए की भी नहीं है । मुझे तो अपने मास्टर का एक रिकार्ड बनवाना था सो बनवा दिया । अरे, जब सचिन का पुराना बल्ला बयालीस लाख में बिक सकता है तो एक राष्ट्र निर्माता का वह चश्मा जिससे उसने देश के लिए बड़े-बड़े सपने देखे हैं, बयालीस लाख से अधिक में क्यों नहीं बिक सकता ? इतना कह कर उसने पचास लाख का एक चेक हमारे हाथ पर रख दिया । अब तो तोताराम की इस मजाक की योजना पूरी तरह से स्पष्ट हो गई । यदि यह नाटक नहीं होता तो उसे क्या पता था कि चश्मा पचास लाख में नीलाम होगा ।

हमने कहा- तोताराम, तेरे खाते में तो पचास लाख पैसे भी नहीं हैं फिर यह चेक काटने का क्या मतलब ? मान ले यह चेक हमने बैंक में डाल दिया तो ?

कहने लगा- मास्टर, ऐसा मत करना नहीं तो मुझे जेल की सजा हो जाएगी । इस देश में भले ही करोड़ों-अरबों का घपला करने वालों पर कार्यवाही न हो, देशद्रोहियों को फाँसी देने का निर्णय लेने में बरसों लग जाए मगर चेक अनादरण के मामले में फटाफट सजा हो जाएगी । प्लीज, बैंक में मत डाल देना ।

हम इस चेक को कौन सा बैंक में डालने वाले थे हम तो तोताराम से मज़ाक कर रहे थे । हमने वह चेक पता नहीं कहाँ रख दिया जैसे कि बच्च्चों के चूरण की पुड़िया में निकलने वाले खेलने के नोट ।

३१-१०-२०१०

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श्रम और संबंधों की आराधना का रामराज्य : दीपावली



दुनिया की सभी प्राचीन सभ्यताएँ प्रकृति के सान्निध्य में कृषि-जीवन से उपजी हैं । उनके सभी उत्सव भी उसी से जुड़े हुए हैं । यूँ तो होली भी फसल के समय ही आती है । संसार के सभी स्थानों में एकाधिक फसलें नहीं होतीं किन्तु दीपावली पर घर आने वाली फसलें तो संसार के सभी भागों में होती हैं इसलिए विभिन्न नामों से सर्वत्र ही यह श्रम-सिद्धि के उत्सवों का समय है ।

समस्त भारत में दीपावली श्रम और संबंधों की आराधना का एक उत्सव-संकुल है जिसमें अर्जन और विसर्जन का एक अद्भुत अध्यात्मिक समन्वय है । दुर्गापूजा, दशहरा, धनतेरस, नर्क-चतुर्दशी, रूप-चतुर्दशी, दिवाली, गोवर्धन-पूजा, अन्नकूट, भैया-दूज, यम-द्वितीया और सूर्य-षष्ठी इस शृंखला के प्रमुख पर्व हैं । और इन सबसे ऊपर है भगवान राम का चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटना और रामराज्य की स्थापना । यह रामराज्य ही भारत की चिन्तना का चरमोत्कर्ष है ।



इस उत्सव-शृंखला के सभी दिनों में निहित श्रम और संबंधों पर विचार करें तो दुर्गा-पूजा, जिसका सन्देश है कि बहुत बड़ी नकारात्मक शक्ति का विनाश सब के सामूहिक प्रयत्न के बिना नहीं हो सकता । इसी सामूहिक शक्ति से उपजती है दुर्गा । 

दशहरे पर रावण-वध, केवल भोग पर आधारित सभ्यता के अपने की दुष्कर्मों से नष्ट हो जाने का एक आँख खोल देने वाला आख्यान है । 

समाज के ईमानदार श्रम का पुण्य-फल है धनतेरस पर घर आई फसल । तभी 'कराग्रे वसते लक्ष्मी' माना गया है और राजस्थानी में मेहनत की कमाई को 'दशों नाखूनों की कमाई' कहा गया है । श्रम करने वाले को ही अपने श्रम के पुरस्कार स्वरूप रूप सँवारने का अधिकार है मगर इसके साथ ही कैसा कटु सत्य भी जोड़ दिया गया है कि नर्क चतुर्दशी भी आज ही है । इसप्रकार श्रमसाध्य भोग को भी जीवन का अंतिम सत्य नहीं बनने दिया । फिर दिवाली । 


अंदर-बाहर के तम को मिटा कर ही रामराज्य आता है । अगले दिन मानव समृद्धि की आधार गौवंश की पूजा- मानवेतर प्राणियों तक के प्रति कृतज्ञता का पर्व । और साथ ही अन्नकूट भी- समृद्धि में सब की साझेदारी की स्वीकृति । मंदिरों में नई फसल के अन्न से बना प्रसाद 'अन्नकूट' बँटता है और प्रतीकात्मक रूप से उस प्रसाद की लूट भी होती है- 'समान वितरण का दर्शन' । भैया-दूज और यम द्वितीया भी- सहोदरी संबंधो से लेकर मृत्यु के देवता तक से नाता जोड़ने का दिन । और फिर समस्त सृष्टि के आधार सगुण, साक्षात् देव सूर्य की आराधना । इस सन्दर्भ में यह भी याद कर लें कि क्या हमने कभी सुबह उठकर सूर्य के दर्शन करने, उसके प्रति कृतज्ञता और पूजा निवेदित करने की सोची है ? यदि नहीं, तो फिर इस पर्व को कैसे आत्मसात कर सकेंगे ?



अब देखें कि कैसे ये सब रामराज्य में समाहित हैं । राम वन गमन से लेकर अयोध्या लौटने तक, अकेले न तो सेतुबंध का निर्माण करते हैं और न ही अकेले रावण को मारते हैं । इसमें गिलहरी से गीधराज तक, शबरी से शिव तक, निषाद से नल-नील तक समाज के सभी वर्गों का सहयोग लेते हैं । वे वशिष्ठ जी को कहते भी हैं कि ये सब उस संकट-सागर मेरे लिए बेड़े के समान थे । विभीषण पर रावण द्वारा छोड़ी गई शक्ति को वे अपने ऊपर ले लेते हैं । लक्ष्मण-मूर्छा के समय वे कहते हैं कि अब विभीषण को दिए गए वचन का क्या होगा ? वन-गमन के समय सरयू पार करते समय उन्हें केवट को कुछ भी न दे पाने पर संकोच होता है । घर में अनेक सेवकों के होते हुए भी सीता घर के काम स्वयं करती हैं । वन से लौट कर सबसे पहले कैकेयी के आवास पर जाते हैं । वनवास से आकर वे भरत की जटाएँ खुद अपने हाथ के खोलकर धोते हैं । अंगद को अयोध्या से जाते समय वे अपने गले की माला निकाल कर पहनाते हैं । संबंधों की इतनी सूक्ष्म समझ ।

राम के राज्य में सब अपने -अपने धर्म का निर्वाह करते हैं । यहाँ तक कि पनघट पर पुरुष स्नान भी नहीं करते । राम जब 'उत्तरकांड' में अपनी प्रजा से बातें करते समय वे कहते हैं-

जो अनीति कछु भाखौं भाई । तो मोहू बरजहु भयय बिसराई ।।

मतलब कि सबकी सच्ची सहमति । राजा का कोई आतंक नहीं ।

अंत में वे तुलसी के शब्दों में रामराज्य का सार इस प्रकार माना जा सकता है-
राज नीति बिनु, धन बिनु धरमा । प्रभुहि समरपे बिनु सतकरमा ।।

इस प्रकार नीति बिना चलने वाले राज्य, बिना धर्माचरण के प्राप्त किए किए गए धन और सर्वहिताय समर्पित कर्मों के बिना न तो सच्ची दिवाली हो सकती है और न ही हमारे आदर्शों के रामराज्य की स्थापना ।


सच्ची लक्ष्मी की आराधना के लिए दिवाली का प्रकाश हमें यही चेतना और मार्ग दर्शन प्रदान करे ।


३-११-२०१०पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Nov 3, 2010

ज्योति कलश छलके - हैप्पी दिवाली



[ ज्योति कलश छलके - 'भाभी की चूड़ियाँ ' फ़िल्म का सुप्रसिद्ध चित्र-पट-गीत की तर्ज़ पर आधारित ]

दीवाली पर जेब कट गई |
शोर, धुएँ से फिज़ाँ अट गई |
और पटाखों के सड़कों पर
फैले हैं छिलके | ज्योति कलश छलके |

सबके खाली टेंट हो गए |
नोट गिफ्ट की भेंट हो गए |
संबंधों पर जो खर्चे हैं
वे प्राफिट कल के | ज्योति कलश छलके |

कैसी अंधी दौड़ चल रही |
सबमें होड़ा-होड़ चल रही |
आँख मूँदकर निबल जनों से
पीछे धन, बल के | ज्योति कलश छलके |

कोई काम न करना चाहे |
माल मुफ्त का चरना चाहे |
धर्म-कर्म सब हुआ उपेक्षित
सब आशिक फल के | ज्योतिकलश छलके |

निर्धन जन से आँख चुराई |
धनिकों को दे रहे बधाई |
ऊँची, भारी बातें करते
पर मन के हलके | ज्योतिकलश छलके |

घर आगे गोबरधन रचते |
गोपालन से बचते फिरते |
गोपाष्टमी खिलाया गुड़
फिर खा कागज, छिलके | ज्योति कलश छलके |

रूप चतुर्दशी देह निहारें |
मन की कालिख नहीं उतारें |
भगत नोट के नहा रहे हैं
उबटन मल-मल के | ज्योति कलश छलके |

खेलें जुआ, सत्य ना बोले |
करें मिलावट औ' कम तोलें |
दर्पण में मुँह देख-देखकर
मुड़ -मुड़ कर मुळकें | ज्योति कलश छलके |

दो नंबर की लक्ष्मी आई |
पर इसमें आनंद न भाई |
सच्ची लक्ष्मी तब प्रकटे
जब श्रम सीकर झलकें | ज्योति कलश छलके |

मुख से बोलें राम-राम सा |
पर स्वारथ से सदा काम सा |
राम मिलेंगे धर्म-न्याय से
वन-वन चल-चल के | ज्योति कलश छलके |


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