Oct 16, 2021

सही समय पर सही कार्यवाही

सही समय पर सही कार्यवाही 


हमने कहा- तोताराम, जब मोदी सरकार ने हमारा सातवें वेतन आयोग का एरियर नहीं दिया तो हमने उन्हें एक अंतर्देशीय पत्र लिखा और इमेल भी किया. किसी का कोई उत्तर नहीं मिला लेकिन हमारे डाटा का मंत्रालय ने दुरुपयोग अवश्य  किया. इसके बाद मोदी जी और उनकी सरकार द्वारा किये गए महान कामों की विस्तृत सूचना ज़रूर नियमित रूप से आने लगी. 'मन की बात' को सुनने के लिए आग्रह सहित मेसेज भी आने लगे. और तो और सुनने में कोई बाधा आने पर समाधान के लिए रास्ता भी बताया गया था. 

आज तोताराम बहुत सभ्य बनते हुए बोला- मान्यवर, बीच में आपकी बात काटने के लिए क्षमा चाहता हूँ. या तो आपको ज्ञान नहीं है या फिर आप व्यंग्य कर रहे हैं. भारत में लोकतंत्र है इसलिए सरकार मोदी जी की नहीं जनता की है, आपकी, हमारी, सबकी है. 

जैसे ही तोताराम ने तत्सम शब्दावली में अपनी बात शुरू की तो हमें किसी अनिष्ट की आशंका होने लगी. ऐसी ही मनः स्थिति में शकटार चाणक्य से कहता है- तुम हँसो मत चाणक्य, तुम्हारे क्रोध से अधिक तुम्हारी हँसी से डर लगता है.

हमने सजग होते हुए कहा- यदि देश में लोकतंत्र होता तो क्या किसानों की बात नहीं सुनी जाती ? क्या उनसे पूछे बिना चुपके-चुपके कानून बना दिए जाते ? और उन नियमों के विरुद्ध शांतिपूर्वक सत्याग्रह करने पर कोई मजिस्ट्रेट उनके सिर फोड़ने का आदेश दे सकता था ? दो दिन पहले सुधरने का आदेश देने के बाद तीसरे दिन उन पर जीप चढ़ा दी जाती ? क्या वहाँ जाने वाले विपक्ष के नेताओं को बिना किसी नियम और वारंट के गिरफ्तार कर लिया जाता  ?

तोताराम ने प्रतिवाद किया- .मोदी जी सही समय पर सही निर्णय लेते हैं.उन्हें ज्यादा बोलने की आदत नहीं है.अब जब तेरा एरियर मिल गया तो चुप बैठ. 

हमने कहा-  वह मिल गया पर डी.ए. वाला १८ महीने का एरियर फिर ड्यू हो गया. इसके लिए तो साफ़ कह दिया है कि नहीं मिलेगा. गैस की सबसीडी भी गुपचुप बंद कर दी. लेकिन तेरी यह सही समय पर सही निर्णय लेने की बात कुछ समझ में नहीं आई.

बोला-  मध्यप्रदेश में कर्मवीर के संपादक डॉ. राकेश पाठक गाँधी जयंती पर साबरमती आश्रम में प्रार्थना करने के लिए आश्रम के पास ही एक होटल में रुके हुए थे कि पुलिस ने उन्हें २ अक्तूबर की सुबह छह बजे ही होटल से उठा लिया और आश्रम की जगह थाने ले गई. और बारह बजे छोड़ा.

हमने पूछा-  लेकिन गाँधी जयंती को कोई व्यक्ति आश्रम में दर्शन करने आये और उठा लिया जाए. इसका क्या मतलब ? क्या वह कोई आतंकवादी था ? इससे क्षुब्ध होकर एक पत्रकार ने लिखा है- ‘गांधी का देश, गांधी का प्रदेश, गांधी का आश्रम, गांधी जयंती, साबरमती आश्रम को प्रणाम करने गए वरिष्ठ पत्रकार और एडिटर्स गिल्ड के सदस्य डॉक्टर पाठक को एक नहीं बल्कि दो बार पुलिस द्वारा हिरासत में लिया जाना, खादी के कपड़े तक ना पहनने देना - अचंभित करता है।’

बोला-  इस संपादक ने छह सितंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला ख़त पीएमओ को मेल किया था- ‘सत्याग्रह आश्रम गांधी की सादगी और सत्य का प्रतीक है। गुजरात की सरकार आश्रम का काया-कल्प करने जा रही है। लगभग 1246 करोड़ रुपये से संग्रहालय को मेमोरियल का रूप दिये जाने की तैयारी है। सत्याग्रह आश्रम गांधी जी की सादगी और शुचिता का प्रतीक है। उसे आधुनिक संग्रहालय जैसा रूप देना आश्रम की मूल आत्मा को नष्ट करने जैसा है। दुनिया का हर देश महापुरुषों की धरोहर को उनके मूल स्वरूप में ही सुरक्षित-संरक्षित रखने की ओर अग्रसर है। हमें भी बापू के सत्याग्रह आश्रम को मूल स्वरूप में ही सहेज कर रखना चाहिये।मैं यह भी सूचित कर रहा हूँ कि आगामी दो अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन सत्याग्रह आश्रम को बचाने के लिये हम सब आवाज़ उठायेंगे। गांधीवादी तरीक़े से जिसे जैसा उचित लगेगा वैसा प्रतिरोध दर्ज करायेंगे।’

और देखा, सही समय पर सही कार्यवाही हो गई.






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Oct 11, 2021

हम किस पर भड़कें


हम किस पर भड़कें 


आज हमारा मूड खराब है लेकिन कमजोर का मूड खराब हो तो भी वह अपना जी जलाने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकता है ? और जी का भी यह हाल है कि उसमें जलने लायक बहुत कम सामान शेष रह गया है. सूखी हड्डियां बिना चिकनाई के अब क्या जलें. सरसों का तेल ही दो सौ रुपए हो गया है तो शुद्ध देशी घी की चिकनाई के बारे में तो सोचना ही व्यर्थ है. यदि किसी सेवक, वित्तमंत्री या फ्री टीके लगवाने वाली सरकार का मूड खराब हो तो वह रसोई गैस, डीजल और पेट्रोल की कीमत बढ़ा सकती है. किसी देशभक्त सत्ताधारी नेता का मूड खराब हो तो आन्दोलनकारी किसानों पर जीप चढ़ा सकता है. हम किस पर गुस्सा निकालें. बस, बरामदे में बैठे-बैठे भुनभुना रहे थे कि तोताराम प्रकट हुआ. 

हम उसी पर झपटे- तोताराम, हम किस पर भड़कें ?

बोला- क्यों क्या भड़कना ज़रूरी है ? देख वर्ष ऋतु समाप्त हो गई है. निर्मल चाँदनी छिटकने लगी है. अब वर्षा के काले बादल कहीं नज़र नहीं आते. नीले आकाश में कहीं-कहीं मोदी जी की दाढ़ी के समान श्वेत बादल तैरते हुए दिखाई दे जाते हैं. नवरात्रा शुरू हो गए है. रसिक युवा युवतियां तरह-तरह सुन्दर वस्त्रों में सजधजकर गरबा के बहाने एक पंथ कई काज करने के लिए निकलने लगे हैं. अखबारों में व्रतियों के लिए नए-नए व्यंजनों के नुस्खे आ रहे हैं. दुर्गा की भक्ति कर, फलाहार कर. पंडित खरीददारी के शुभ मुहूर्त बता रहे हैं तो खरीददारी कर. कुछ दिन बाद शरद पूर्णिमा आएगी. सोच, किन किन मिक्स मेवों की खीर बनाएगा. सुविधा हो तो सुमित्रानन्दन पन्त  जी की तरह ' चांदनी रात में नौका विहार' कर. 

हमने कहा- धनवानों के लिए तो हर मौसम आनंद के लिए होता है लेकिन गरीब के लिए तो सर्दी, गरमी और वर्षा सभी मौसम परेशान करने वाले होते हैं. हमारा दुःख बहुत बड़ा नहीं है. हम अमरीका की एक पत्रिका 'विश्वा' का संपादन करते हैं. उस संस्था का २० वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन अमरीका के क्लीवलैंड में ९-१० अक्तूबर को हो रहा है, निमंत्रण भी है लेकिन 'वीजा' एक्सपायर हो गया. अमरीकन एम्बेसी के रुटीन काम बंद हैं. क्या करें ? यह गुस्सा किस पर निकालें ? किस पर भड़कें ? 

बोला- बीते दिनों कंगना रानावत का पासपोर्ट भी रिन्यू नहीं हो पाया तो खबर पढ़ी थी कि कंगना महाराष्ट्र सरकार पर भड़की. सो अगर भड़काना ज़रूरी हो तो महाराष्ट्र सरकार पर भड़क ले.  

हमने कहा- लेकिन हमारा काम कोई महाराष्ट्र सरकार के कारण थोड़े ही रुका हुआ है. 

बोला- बात भड़कने की ही तो है. अमरीका वाले तो मोदी जी की ही नहीं सुनते. उलटे लोकतंत्र और गाँधी के उपदेश पिलाने लगते हैं. सो तेरे वीसा के नवीनीकरण पर क्या ध्यान देंगे. वैसे भारत में भी सभी सरकारों पर भड़कना संभव नहीं. कहीं का मुख्यमंत्री भड़कने वालों पर लट्ठ चलवा देगा, तो कहीं कोई मंत्री-पुत्र जीप चढ़ा देगा,  तो कहीं का डी. एम. सिर फोड़ने का आदेश दे देगा.महाराष्ट्र, राजस्थान, केरल आदि की सरकार पर भड़क ले, कोई खतरा नहीं.  जैसे कंगना को महाराष्ट्र सरकार पर भड़कने पर बिना मांगे सुरक्षा उपलब्ध करवा दी गई वैसे ही तुझे भी कोई छोटा-मोटा पुरस्कार-सम्मान देकर  उपकृत कर दिया जाएगा.

और किसी पर भी भड़कने की हिम्मत नहीं है तो गाँधी नेहरू पर भड़क ले. हो सकता है इसी बहाने प्रज्ञा ठाकुर की तरह लोक सभा का टिकट ही मिल जाए.  


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Oct 8, 2021

क्या टाइमिंग है

क्या टाइमिंग है 


आज तोताराम ने आते ही अपने स्मार्ट फोन की स्क्रीन हमारी आँखों के एकदम पास करते हुए कहा- देख.

हमने कहा- इसे थोड़ा दूर कर. इतना पास से कैसे देखें ?

तोताराम से अपना स्मार्ट फोन थोड़ा दूर किया तो हमने देखा और कहा- मोदी जी खुद ही अपना एक बड़ा और बढ़िया-सा, सफ़ेद लेस वाला काला छाता ताने हुए.

बोला- अब अपने मोदी जी छत्रपति हो गए. 

हमने कहा- छाता तो बरसात में करोड़ों लोग लगाते हैं. तो क्या सभी को छत्रपति कहेगा. छत्रपति का मतलब होता है वह राजसी व्यक्ति होता है जिसके साथ पर कोई सेवक उस पर छाता ताने हुए चलता है. मोदी जी बहुत आत्मनिर्भर व्यक्ति हैं और खुद को सेवक कहते हैं. तूने मार्क किया कि नहीं, मोदी जी अपना छाता खुद पकड़े हुए हैं.

बोला- फिर भी यह छाता उनका ही है तो छत्रपति होने में क्या कमी है ?

हमने कहा- हमें तो कोई ऐतराज़ नहीं है लेकिन शिव सेना वाले मानें तब ना. पिछले साल जनवरी में शिव सेना ने बड़ा बवाल मचा दिया था जब शिव सेना के स्वघोषित नेता दिल्ली के शिव भगवान गोयल ने एक पुस्तक छपवाई थी- 'आज के शिवाजी मोदी जी' . दोनों की दाढ़ी की सेटिंग से किताब का कवर भी बढ़िया बनाया है . काफी समानता लग रही थी दोनों में. 

बोला- यह शिव भगवान है कौन ? 

हमने कहा- वही जो दिल्ली में क्रिकेट स्टेडियम में पिचें खोदता फिरा करता था. अब शिव सेना ने इसे निकाल दिया है. 

बोला- क्या फर्क पड़ता है. इस महान ग्रन्थ के प्रणयन के फलस्वरूप कहीं भाजपा में अडजस्ट हो जाएगा.

हमने कहा- लेकिन तोताराम, बरसात तो हो ही नहीं रही थी फिर छाता किसलिए ? 

बोला- मौसम का क्या भरोसा. आदमी को अपना साधन साथ रखना चाहिए.  अभी तुझे एक और वीडियो दिखाता हूँ जिसमें मोदी जी के छाते पर बरसात और बर्फ दोनों गिर रही हैं. और तो और बिजली भी कड़क रही है.   

हमने कहा- लेकिन प्लेन की सीढ़ियों के आसपास खड़े लोगों में से तो किसी ने भी छाता नहीं लगा रखा है. 

बोला- तुझे पता होना चाहिए कि मोदी जी के प्लेन की सीढ़ियों पर कदम रखते ही बरसात शुरू हुई और जैसे ही मोदी जी सीढ़ियाँ उतर कर कारपेट पर आए, बरसात बंद.

मोदी जी की टाइमिंग तो देख. 

हमने कहा- लोग तो कह रहे हैं कि जब मज़ाक उड़ा तो भक्तों ने उस वीडियों से छेड़छाड़ करके उसमें बरसात की बूँदें टपका दीं और नकली बिजली चमकवा दी. यह किया तो गलत गया है. और तो और न्यूयॉर्क टाइम्स ने बताया है कि उसके नाम से मोदी जी के लिए  'लास्ट, बेस्ट होप ऑफ़ अर्थ'  शीर्षक से चलाई गई खबर एक घटिया जालसाज़ी है.

बोला- देख,  मोदी जी असली, प्लेन असली, छाता असली, हवाई अड्डा असली. अब एक चीज थोड़ी इधर-उधर अडजस्ट कर भी दी तो क्या फर्क पड़ गया. इमेज के धंधे में इतना तो चलता ही है. 





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Oct 2, 2021

आज आ रहे हैं.....

आज आ रहे हैं....


तोताराम ने बैठने से पहले ही न्यूज ब्रेक कर दी, बोला- आज आ रहे हैं .

हमने कहा- अच्छा है लेकिन क्या इधर से भी निकलेंगे ? हमारा ख़याल है इधर से निकलने वाले नहीं हैं. अगर ऐसा होता तो अपनी गली की सफाई हो जाती. दस-दिनों से कूड़ेदान जो गैस और पेट्रोल की कमाई से सरकारी खजाने की तरह उफन रहे हैं, शायद खाली कर दिए जाते.  अपने सामने वाली नाली भी साफ़ कर दी जाती. बदबू को दूर करने के लिए चूना या डीडीटी छिड़क दी जाती. 

बोला-  यह सब तो होता ही है. वैसे सब नेता जानते हैं कि वे खुद अपने समय किस प्रकार अपने से बड़े नेताओं  को उल्लू बनाने के लिए कूड़ा गद्दे के नीचे खिसका दिया करते थे. तुझे क्या पता नहीं अपने पास मंडी में अटल जी, सोनिया जी, अशोक जी जाने कौन-कौन आये लेकिन सारी गन्दगी कनातों के पीछे छुपा दी गई. सब यही कला अपनाते हैं. एशियाड के समय खेल गाँव से स्टेडियम तक की सड़क के दोनों तरफ चद्दरें खड़ी कर दी गईं. लोसएंजिलस  में ओलम्पिक के समय फ्लाई ओवरों के नीचे रहने वाले लोगों को ट्रकों से दूर छुड़वा दिया गया. खुद मोदी जी ने ट्रंप के के स्वागत में झोंपड़ियों को सात फुट ऊंची दीवार से छुपा दिया. शिंजो आबे को गंगा-आरती दिखाने के समय घाटों पर इत्र नहीं छिड़कवाया गया ?  लेकिन जब ऐसा कोई भी नाटक नहीं हो रहा है तो यह तो समझ ही ले कि इधर कोई नेता क्या, ढंग का आदमी तक नहीं आ रहा है. 

हमने कहा- तो फिर हमें क्या समाचार दे रहा है ? हमारी तरफ से कोई भी आए कोई भी जाए. 

बोला-  कोई सामान्य समाचार नहीं है. मोदी जी आ रहे हैं. अमरीका की तीन दिन की यात्रा से. 

हमने कहा- यह तो कोरोना का चक्कर था नहीं तो वे हर महिने-दस दिन में जाते ही रहते विदेश.

बोला- तभी तो समाचार विशेष हो गया.

हमने कहा- तो वहाँ की विशेष उपलब्धि क्या है ?

बोला- सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह है कि अमरीका वालों को दिखा दिया कि भारत भी कुछ कम नहीं है. उसके राष्ट्राध्यक्ष के पास भी वैसा ही प्लेन है जैसा की तुम्हारे राष्ट्रपति के पास. 

हमने कहा- और कुछ ? 

बोला- और १५७ वे एंटीक कलाकृतियाँ ले आये जो चोरी-चकारी से अमरीका पहुँच गई थीं. खुद बाकायदा जाँच-परख कर लाये हैं. एक्स्ट्रा खर्च भी नहीं हुआ. प्लेन में पत्रकारों, रसोइयों, केश-दाढ़ी और वस्त्र सज्जा वालों के बाद भी प्लेन बहुत जगह थी सो धर लाये मूर्तियाँ आदि भी.

हमने पूछा- और क्या लाये ?

बोला- और कुछ तो राखी सावंत जाने. वह जब जिम से निकली तो खोजी पत्रकारों ने मोदी जी की अमरीका यात्रा पर उसके एक्सपर्ट कमेंट्स मांगे तो राखी ने कहा- नमस्कार मोदी जी, मैं बहुत खुश हूं कि आप अमेरिका गए हैं, वहां के सारे इंडियंस को प्यार देना और उनको मेरा मैसेज दीजिएगा. उनसे कहिएगा कि मैं आप सबको बहुत प्यार करती हूं. वापस लौटते समय मेरे लिए थोड़ा शॉपिंग कर लीजिएगा. मेरे लिए डॉलर लेते आना.

 



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Sep 25, 2021

खेलशक्ति का डबल इंजन

खेलशक्ति का डबल इंजन


इस दुनिया को विचारकों ने तरह-तरह से परिभाषित किया है, विभिन्न रूपकों और प्रतीकों में बाँधा है. कोई इसे बाज़ार कहता है, कोई सराय, कोई मंडी. सब अपने-अपने हिसाब से आते-जाते हैं, छल-छंद करते हैं, सौदा करते हैं. इनमें बिकने वाली जिन्सें भी अलग-अलग होती हैं. कुछ चलती-फिरती मंडियाँ होती हैं जो होटलों और रिसोर्टों कहीं भी सज जाती हैं जिनमें घोड़ों की खरीद-फरोख्त होती है. जिनमें चतुर लोग महंगे दामों में गधे और खच्चर भी पेल जाते हैं. लोकतंत्र में विश्वास न करने वाले या सेवकों से जलने वाले इन जानवरों को विधायक और सांसद भी कहते हैं.

हमारे घर के पास भी एक मंडी है, कृषि उपज मंडी. इसलिए यहाँ घर-गृहस्थी की ज़रूरतों के सेवा सप्लायरों के साथ-साथ कृषि उत्पादों से संबंधित लोगों की गहमा-गहमी भी रहती है. छाते-कुकर ठीक करने वालों से लेकर बाल खरीदने वाले भी पहुँच जाते हैं. पता नहीं इससे किस के कानों पर रेंगती जुओं का अध्ययन करने का कोई षड्यंत्र है या किसी गंजे को रवीन्द्रनाथ ठाकुर बनाने का. अखबार डालने वालों के साथ-साथ ही उन्हें खरीदने वाले कबाड़ी भी घूमने लगते हैं. शायद उन्हें पता है कि आजकाल के ताली-थाली वाले लोकतंत्र में अखबारों की औकात रह ही कितनी गई है !

सुबह-सुबह कबाड़ियों के साथ-साथ सब्जी के ठेले लगाने वाले भी मंडी से सब्जी खरीदने के लिए अपने खाली ठेले, कट्टे, बाट, तराजू रखे इधर से गुजरते हैं. दोनों के ठेले ही खाली होते हैं इसलिए दोनों में जल्दी से अंतर करना कठिन हो जाता है. ऐसे में, ऐसे ही एक ठेले पर पुराना टीवी रखे ठेले वाले के साथ एक दुबली-पतली आकृति भी जाती दिखाई दी. हमने ध्यान से देखा तो तोताराम.

हमने पूछा- सुबह-सुबह, गुपचुप किधर, तोताराम ? अरे, नहीं दिया मोदी जी ने १८ महिने का ३०-४० हजार का एरियर लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि कबाड़ी का काम करके विकास पर आमादा, अर्थव्यवस्था को ५ ट्रिलियन की बनाने पर अड़ी सरकार को बदनाम करे. वैसे ही ओलम्पिक पदक विजेता खिलाड़ियों का स्वागत-सत्कार करने वाले उत्साही नेताओं को लोग बदनाम करने में लगे हुए हैं. कहते हैं खिलाड़ियों के लिए करते कुछ नहीं. बस, मुफ्त का श्रेय लेने के लिए नाटक कर रहे हैं. 

बोला- मैं कोई नाटक नहीं कर रहा हूँ. मैं कटिहार ( बिहार ) के उस मास्टर की तरह नहीं हूँ जो सड़क पर 'मिड डे मील' के अनाज के फटे बोर दस-दस रुपए में बेचकर सुशासन बाबू को बदनाम कर रहा था. अच्छा हुआ जो उसे नौकरी से हटा दिया. अब वास्तव में ही भीख मांगेगा. मैं तो भारत को कम्प्यूटर पॉवर, आध्यात्मिक पॉवर, योग पॉवर बनाने के बाद अब खेल पॉवर बनाने के लिए काम करना चाहता हूँ. 

हमने कहा- ठेले पर पुराना टीवी रखने से भारत खेल पॉवर कैसे बनेगा ?

बोला- प्रक्रिया बहुत लम्बी है. पता नहीं, तुझे समझ आएगी या नहीं फिर भी बता देता हूँ. यह २५ साल पुराना टीवी है जिसे गोदी मीडिया की तालीवादक भूमिका के कारण देखने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है. वैसे भी सभी प्रकार का कूड़ा-कचरा स्मार्ट फ़ोनों पर उपलब्ध हो ही जाता है. लेकिन जब से सुना है कि नेताओं द्वारा मोदी जी की देखादेखी ओलम्पिक खेल देखकर देश में खेलों का विकास किया जा रहा है, खिलाड़ियों को पदक जीतने में मदद की जा रही है तब से सोच रहा हूँ इसमें तो मैं भी योगदान दे ही सकता हूँ. जैसे हरियाणा के एक मंत्री ने सम्पूर्ण साज-सज्जा के साथ राजनीति के कई अन्य खिलाडियों के साथ, बिना मास्क लगाए, समूह में टीवी पर खेल देखकर 'हो-हो' करते हुए वीडियो बनवाकर नेट पर डाला है  वैसे ही मैं भी टीवी देखूँगा, 'हो-हो' करूंगा और देश को खेलशक्ति बनाऊँगा. 

हमने कहा- तेरी इस देशभक्ति या खेलभक्ति से हमारी जो दुर्दशा हो रही उसकी बराबरी तो आन्दोलन कर रहे किसानों के असमंजस और संसद में जासूसी सोफ्टवेयर 'पेगासस'  पीड़ित विपक्ष के टेंशन से भी नहीं की जा सकती. अरे, खेल और खिलाड़ियों से इतना ही प्रेम है तो नवीन पटनायक की तरह वास्तव में कुछ करो. खिलाड़ियों को भरपेट खाना तो दो, किसी रानी रामपाल को अश्वत्थामा की तरह आटा घोलकर या दूध में पानी की कुंठा का  घालमेल तो न करना पड़े. न दो क्षत्रिय कंगना रानावत की तरह सुरक्षा लेकिन स्टार स्कोरर, दलित, वंदना कटारिया को जातीय गर्व से भरे हुए लफंगे स्वयंसेवकों की गालियों से तो बचाओ. सलीमा टेटे की झोंपड़ी की धज तो देख लो. अप्रैल २०१८ में कहा गया था कि देश के आखिरी गाँव में बिजली पहुँच गई है. सलीमा के घर ही नहीं, गाँव में भी बिजली नहीं है.

बोला- लेकिन वह तो ऑक्सीजन, टीके, कानून-व्यवस्था, सामान्य सुविधाएं आदि की तरह राज्यों का विषय है. 

हमने कहा- बहाना नहीं चलेगा. केंद्र में भी तुम और वंदना के उत्तराखंड में भी तुम. जब डबल इंजन में भी गाड़ी नहीं चल रही तो कब चलेगी ?




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Sep 19, 2021

डेविल्स बाइबिल

डेविल्स बाइबिल  


तोताराम नियमानुसार सुबह तो आया ही था लेकिन आज शाम को भी हाज़िर. 

हमने कहा- क्यों बिना बात पीछे पड़ा है ? हम कोई बड़े नेता थोड़े ही हैं जो तुझे किसी राज्य का पार्टी का अध्यक्ष बना देंगे या कहीं का राज्यपाल या विश्वविद्यालय का कुलपति बना देंगे. आज तो ऐसे आ गया जैसे डबल इंजन लग गया हो. यहाँ कौनसा चुनाव हो रहा है जो दिन में दो-दो बार दर्शन-दान.

बोला- क्या मुझे इतना सस्ता समझ रहा है कि कुलपति बनकर दूसरों के यशगान का 'निमित्त मात्र' बनकर उपकुलपतियों को किताबें बेचता रहूं. मुझे कुछ नहीं चाहिए. जिनको कछू न चाहिए सो ही साहंसाह. मैं तो सोच रहा था कि तुझे दो पैसे की आमदनी की करवा दी जाए. भले ही तू रोज सूखी चाय ही पिलाता है.

हमने कहा- जब जवानी में ही ट्यूशन नहीं पढ़ाया तो अब आखिरी वक़्त में क्या ख़ास मुसलमां होंगे. और किसी प्राइवेट स्कूल की प्रिंसिपली भी हमें नहीं करनी. अधिकतर नेता साइड बिजनेस के रूप में स्कूल के धंधे में भी फंसे हुए हैं. काम लेते हैं डबल और पैसा देते हैं आधा. परीक्षा के समय मेरिट लाने के चक्कर में नक़ल करवाने को कहते हैं. हम भी मोदी जी की तरह फकीर हैं. कोई ऐसा-वैसा कहेगा तो हम झोला उठाकर चल देंगे. 

बोला- बिना बात के भाव मत खा. तेरे खूंसटपने से सीकर के सभी स्कूल वाले वाकिफ हैं. तू कवि बना फिरता है. मैं तो तेरे लिए एक 'चालीसा' लिखने का काम लाया था. मेरे एक परिचित के परिचित एम एल ए को एक बड़ी पार्टी ने खरीदने का ऑफर दिया है. वह अपना चालीसा लिखवाना चाहता है. दस हजार नक़द. कल सुबह चाहिए. 

हमने कहा- तुलसीदास जी की कोई पेंशन नहीं थी फिर भी उन्होंने किसी नश्वर मनुष्य का गुणगान नहीं किया. एक बार शायद एक-दो लाइनें लिख दी होंगी तो पश्चाताप करते रहे-

कीन्हें प्राकृत जन गुणगाना

सिर धुनि गिरा लागि पछिताना 

हमसे न होगा. हमें तो भगवान ने पेंशन दे रखी है. मोदी जी की कृपा से अब तो ११% डी. ए. भी रिलीज हो गया.

बोला- और ६०-७० हजार रुपए का एरियर खा गए उसका कोई ज़िक्र नहीं.

हमने कहा- खैर मना जो जुलाई से ही सही डी. ए. दे तो दिया. डी. ए. भी नहीं देते और किसानों की तरह खालिस्तानी कहकर फँसा देते तो तो क्या कर लेता ? फादर स्टेन की तरह देशद्रोह का केस लगवा देते तो अब तक निबट गया होता.

बोला- भाषण मत झाड़.  मुद्दे की बात पर आ. दो सौ आलेख लिखेगा तब कहीं दस हजार रुपए बनेंगे सो भी दो साल में. इसमें क्या है. घंटे दो घंटे का काम है. तुलसीदास जी परफोर्मा बनाकर दे गए हैं बस, कहीं-कहीं नेताजी के माता-पिता का नाम जैसा कुछ भरना है. नहीं करना है तो बता दे. लालू, राबड़ी, अटल, मोदी चालीसा लिखने वाले कई तैयार बैठे हैं . कुछ तो टाइम कम. और फिर सोचा जब सभी अपने वालों को साथ में विदेश ले जाकर तीन गुना महंगा ठेका दिलवाकर लाते हैं तो मैं भी कण भर ही सही, नेपोटिज्म कर लूँ. 

हम भी लालच में आ गए, कहा- नेता का नाम-पता.

बोला- यह अभी गुप्त रखा जाएगा और बाद में भी तू कभी नहीं कहेगा कि यह चालीसा तेरी रचना है. नेताजी इसे दैवीय कहकर प्रचारित करेंगे. नाम की जगह खाली छोड़ देना. चार मात्राओं का नाम है जैसे जोशी या तोता. आ आ,ई, ई 

हमने.कहा- इतनी भी क्या जल्दी है ? जब तेरे नेताजी बड़े नेता बन जायेंगे तभी तो यह चालीसा और उनके मंदिर के नाटक दरकार होंगे. हमारे नीतिकारों ने भी कहा है- जल्दी का काम शैतान का.  सच है हर गलत काम ऐसे ही होता है.

बोला- और ये लोग कौन से संत हैं. ये सब संतों के वेश में शैतान ही हैं. इसलिए इनके सब काम शैतानी ही होते हैं. तूने 'डेविल्स बाइबिल' के बारे में पढ़ा या नहीं ? 

हमने कहा-  बचपन में किसी 'गड़बड़ रामायण' के बारे में तो सुना करते थे. कहते हैं उसके रचनाकार को कोढ़ हो गया था. वैसे आजकल राजनीति में गाँधी-नेहरू के समस्त काल के बारे में गड़बड़ रामायण जैसा ही लेखन तो चल रहा है. सभी धर्म ईश्वर को मानते हैं और सभी मनुष्यों को उसकी संतान मानते हैं फिर भी एक दूसरे के प्रति शैतान की तरह घृणा फैलाने में ही लगे हुए हैं. अब सर्वधर्म समभाव की तरह से नया नारा गढ़ा जा रहा है- 'चादर -फादर मुक्त भारत'.  लेकिन यह 'डेविल्स बाइबिल' अर्थात 'शैतानी बाइबिल' कहाँ से आगई ? 

बोला- स्वीडन के एक पुस्तकालय में चमड़े के १६० पन्नों पर लिखी ८५ किलो वज़नी एक बाइबिल है जिसका नाम है-डेविल्स बाइबिल. कहते हैं १३ वीं शताब्दी में एक ईसाई मठवासी सन्यासी को वहाँ के नियमों को भंग करने के फलस्वरूप दीवार में चुनवाने की सजा दी है. 

संन्यासी ने सजा से बचने के लिए कहा कि यदि उसे एक रात का समय दिया जाए तो वह मानव ज्ञान की एक ऐसी किताब लिख सकता है जो भविष्य में मठ को भी गौरवान्वित करेगी.   

हमने पूछा- तो क्या एक रात में १६० पेजों की मौलिक रचना करके उसे चमड़े पर लिखा भी जा सकता है ?

बोला- नहीं. तभी तो जब उस संन्यासी ने देखा कि वह अकेले पूरी किताब नहीं लिख सकता है तो उसने एक विशेष प्रार्थना की और शैतान को बुलाया. उस शैतान से उसने अपनी आत्मा के बदले किताब को पूरा करवाने के लिए मदद मांगी। शैतान इसके लिए तैयार हो गया और उसने एक रात में ही पूरी किताब लिख दी। 

हमने कहा- अब इसमें एक बात पर ध्यान दे कि शैतान से उस तथाकथित संन्यासी से उसकी आत्मा के बदले किताब लिखने का सौदा किया. मतलब जब कोई अपनी आत्मा बेच देता है तो उसका विवेक भी समाप्त हो जाता है. बिना विवेक के ही ऐसे खुराफाती काम हो सकते हैं.  मज़े की बात देख, भले काम में भले ही कोई साथ दे या न दे लेकिन खुराफात में ज़रूर सबका साथ, सबका विकास हो जाता है. लगता है लोग एक दिन में लाखों शौचालय बनवाने और करोड़ों टीके लगवाने का रिकार्ड इसी तरह बनवाते हों.

हम किसी शैतान से अपनी आत्मा का सौदा नहीं कर सकते. बिना साफ़-सुथरी आत्मा के ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाएँगे. 

कोरी चुनरिया आतमा मोरी मैल है माया जाल.  



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Sep 14, 2021

उछाल की रेजगारी लूटने वाली रुदालियाँ

उछाल की रेजगारी लूटने वाली रुदालियाँ  


आज सुबह तोताराम नहीं आया.

किसी के आने न आने से क्या फर्क पड़ता है ? किसके बिना दुनिया रुकती है ? लोग कहते हैं- फलाँ साहब का कोई विकल्प नहीं है. या जैसे कभी कहा जाता था- आफ्टर नेहरू हू ? और अब देखिये कि नेहरू की कमी किसी को  नहीं खल रही है बल्कि अब तो यह सिद्ध किया जा रहा है कि इस देश का सत्यानाश करने वाले नेहरू न हुए होते तो भारत अब तक विश्वगुरु, नंबर वन, सबसे ताकतवर देश और यहाँ तक कि दुनिया का बाप बन चुका होता.  

वैसे अगर तोताराम आ भी जाता तो क्या करते ? वही फेंकुओं की फालतू लफ्फाजियों का कीचड़ उलटते-पलटते. हाँ, कल जो बैरंग लिफाफे का हादसा हमारे साथ हुआ उसके बारे में ज़रूर एक खीज थी. खैर, जब तोताराम आएगा तब सही.

कोई दस बजे तोताराम हाज़िर हुआ. धुला हुआ कुरता-पायजामा गले में राष्ट्रवादियों जैसा देशभक्तीय गमछा जिसमें हरा और भगवा रंग शांति के सफ़ेद रंग को दोनों तरफ से इस प्रकार दबा रहे थे जैसे हमारे स्वतंत्रता दिवस की ख़ुशी को अटल-निधन-दिवस और विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस ने घेर लिया है.  दोनों तरफ रोना. ऐसे में स्वाधीनता दिवस का क्या मज़ा.

तोताराम चलता हुआ ही बोला- चल, हिंदी पखवाड़े का निमंत्रण है. एक गमछा, मोमेंटो और चाय-नाश्ता पक्का.

हमने कहा- तीन साल पहले हमें चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी में बुलाया गया था. लौटते समय एक फॉर्म भरवा लिया, बैंक खाते का नंबर ले लिया. मानदेय और यात्रा भत्ता मिलाकर पाँच हजार रुपए भिजवाने की बात थी. वे पाँच हजार आज तक नहीं आये हैं. इसलिए हम कहीं नहीं जाते.

बोला- वैसे तो आजकल लोग फ्री में वेबीनार पर पिले पड़े हैं. एक सज्जन तो ३१ अगस्त से १४ सितम्बर तक का अखंड कविता पाठ का पखवाड़ा आयोजित करके वर्ल्ड रिकार्ड बनाने पर तुले हुए हैं. हो सकता वे कल को कवियों को 'आमरण काव्य पाठ' के लिए आमंत्रित करने लग जाएँ. सुनाने के लालच में कोई कवी तो फँस सकता है लेकिन  कोई श्रोता कभी ऐसा जोखिम नहीं उठाएगा.

एक हिंदी सेवी सज्जन ने अपने फेसबुक सर्कल में सरकार की शर्मिंदगी की समस्या फ्लोट कर रखी है. उनका मानना है कि सरकारी कार्यालयों में आयोजित हिंदी पखवाड़े में एक कार्यक्रम में भाषण झाड़ने के मात्र दो हजार रुपए दिए जाते हैं. वैसे उन्हें व्यक्तिगत रूप से तो कोई ऐतराज़ नहीं है.शायद मोदी जी की तरह मन से फकीर हैं. बस, वे तो इस कम मानदेय देने के कारण भारत सरकार की होने वाली बेइज्ज़ती से दुखी हैं.

वैसे तेरा क्या रेट है ?

हमने कहा- रेट तो भांडों और रंडियों के होते हैं. फिर चाहे वह दो हजार का हो या दो लाख का. महान चीजें तो हवा, धूप, बारिश की तरह अमूल्य होती हैं. वैसे पैसा लेकर भाषण झाड़ने वाले इन वक्ताओं के पास काम की कोई चीज नहीं है. अरे, यदि हिंदी और राष्ट्रभाषा आदि की समस्या का तुम्हारे पास कोई हल है तो एक मुश्त जितने रुपए लेने हैं वे ले लिवाकर झंझट ख़त्म करो. दे दो अपना रामबाण नुस्खा लिखकर भारत सरकार को. हर साल श्राद्ध पक्ष से पहले १४ सितम्बर को आने वाले हिंदी के इस पितर-पूजन पर हिंदी की श्रेष्ठता के गुणगान और साथ ही उसकी दुर्दशा का रोना रोने यह सालाना कार्यक्रम तो ख़त्म हो. 

भारत के अतिरिक्त किसी देश में राष्ट्रभाषा के लिए ऐसी किराए की रुदालियाँ नहीं देखी-सुनी होंगी. वैसे भी पार्टियों को भाषा, संवाद और संवेदना से क्या मतलब. उन्हें तो जैसे भी हो सिंहासन चाहिए. 'समरयात्रा' कहानी में उस समय के अंग्रेजों की गुलामी की जूठन खाने वालों के लिए प्रेमचंद की नोहरी कहती है- रांड तो मांड में ही खुश. सो ये सांस्कृतिक रुदालियाँ शव यात्रा में उछाली गई रेजगारी लूटने में ही धन्य हो रही है. सरकारों के लिए भाषा और संस्कृति की सेवा का इससे सस्ता सौदा और क्या होगा ?  


  



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धन्यवाद जोशी जी


धन्यवाद जोशी जी


जिन्हें देश को विश्व गुरु और अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर का बनाना है उनकी बात और है. वे तो यदि रात में चार घंटे भी सो लेते हैं तो देश के लिए बड़ी राहत की बात है. हमारे भरोसे अब कोई महान काम नहीं बचा है इसलिए हम तो रात में भी छह-सात घंटे सोते हैं और दोपहर में भी खाना खाने के बाद घंटे-आध घंटे 'आराम फरमा' लेते हैं. होता तो यह भी सोना ही है. बस, ज़रा बड़े लोगों की शब्दावली का छोंक लगा दिया है. 

तो जैसे ही आराम फरमाकर उठे तो हमारी पालतू 'मीठी' ने लघु शंकार्थ बाहर जाने के लिए हमारे कमरे के दरवाजे पर आकर भौंकना शुरू कर दिया. हमारा भारत तो इधर-उधर शंका समाधान के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध न होने के कारण शौचालय तक सीमित हो गया है लेकिन 'मीठी' के लिए न तो कोई विशिष्ट शौचालय है, न उसका ऐसा कोई प्रशिक्षण हुआ है और न ही हमारे यहाँ 'स्वच्छता सैनिक' इतने सजग हैं कि खुले में शौच करने पर बिहार की तरह किसी की लुंगी उतरवा लें. वे तो खुद इधर-उधर निबट लेते हैं. और तो और पी लेने के बाद तो उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि उनका मुँह दीवार की तरफ है या सड़क की तरफ.

जैसे ही 'मीठी' को लेकर निकले तो देखा, तोताराम गले में भगवा दुपट्टे और माथे पर बड़े से तिलक से सुशोभित साक्षात् राष्ट्र हुआ चला आ रहा है. 

हमने कहा- तोताराम, तेरी सुबह की चाय बकाया है. चाहे तो बनवा देंगे. नहीं तो दो मिनट बैठेंगे. कल हमारे साथ एक हादसा हो गया. सुबह तू जल्दी में था इसलिए बता नहीं सके. अब उस बारे में बात करना चाहते हैं. 

बोला- अभी बता दे. घर पर चल कर ही क्या होगा.

हमने कहा- नहीं. बात ही ऐसी है.

घर लौटने पर बोला- अब बता. 

हमने कहा- कल हमें एक लिफाफा मिला. भेजने वाले का कहीं नाम नहीं था. लिफाफा रोळी से चिरचा हुआ था लेकिन टिकट नहीं लगा हुआ था, बैरंग था. हमने सोचा, हो सकता है भेजने वाला टिकट लगाना भूल गया होगा. दस रुपए देकर छुड़ाया. खोलकर देखा तो अन्दर कागज का एक छोटा-सा  टुकड़ा जिस पर लिखा था 'जोशीजी धन्यवाद'. लोग कितने बदमाश हो गए हैं. क्या चाटें इस धन्यवाद का. 

बोला- ठीक है, दस रुपए लगे लेकिन लिफाफा भेजने वाले को तुझसे मिला क्या ? और कुछ नहीं तो उसका लिफाफे का ही एक रुपया तो खर्चा हुआ. तेरे दस रुपए तो पोस्टल डिपार्टमेंट के पास गए. पर इससे तेरी इमेज तो बनी. यदि इसी तरह रोज तेरे यहाँ सौ-दो सौ लिफाफे आने लगें तो जल्दी ही तेरा नाम अखबारों में आने लगेगा. तेरा वीडियो वाइरल होते देर नहीं लगेगी. फिर तू सेलेब्रिटी हो जाएगा.  

हमने कहा- यदि इसी तरह हजारों लिफाफे आने लगे तो मेरी पेंशन ही नहीं, मासिक आय योजना वाला ऍफ़ डी. भी निबट जाएगा.

बोला- भविष्य में ऐसा कोई लिफाफा मत छुड़वाना. तुझे पता है, मोदी जी के सत्तर वर्ष पूरे होने पर तीन सप्ताह तक विविध कार्यक्रम किये जायेंगे. उनमें से एक है मोदी जी के नाम से 'धन्यवाद मोदी जी' के पाँच करोड़ पोस्ट कार्ड लिखना. इससे उनकी छवि में सुधार होगा. 

हमने कहा- उनकी छवि को क्या हुआ है ? पोस्ट ऑफिस, पेट्रोल पम्प, रेलवे स्टेशन, कोरोना के सर्टिफिकेट, अनाज के थैलों सभी जगह वे ही तो हैं. ह सकता है 'मुफ्त अन्न वितरण महोत्सव'  के के अन्न के दानों को सूक्ष्म दर्शक यंत्र से देखने पर उन पर भी मोदी जी का फोटो दिखाई दे. उनकी छवि तो ऐसी वैश्विक हो गई है कि आज अमरीका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ लें तो भी जीत जाएंगे. लेकिन इतनी व्यस्तता में पाँच करोड़ पोस्टकार्ड पढ़ना, उनके उत्तर देना, यदि बैरंग हुए तो डबल चार्ज देना. बहुत मुश्किल काम है. पहले दिन में जो चार घंटे सो लेते हैं पर अब तो वह भी संभव नहीं पाएगा.

बोला- ऐसी बात नहीं है. न तो कुछ पढ़ना है, न कोई उत्तर देना है. पोस्टमैन भी क्या डबल चार्ज मांगेगा. पी.एम. हाउस का पता देखकर जो कुछ भी होगा पटक आएगा वहाँ. और उनका मीडिया सेल उस गिनती को बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित करेगा जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ेगी. तब वे आसानी से उत्तर प्रदेश का चुनाव जीत जायेंगे.  बंगाल वाला 'खेला' और किसानों का धरना अब तक होश फाख्ता किये हुए है.

हमने कहा- चलो कोई बात नहीं. ये सब राजनीति के नाटक हैं. पर हमें तो उस दुष्ट पर गुस्सा आ रहा है जिसने बिना बात हमें बैरंग लिफाफा भेज कर उल्लू बना दिया. 

तोताराम ने जेब से दस रुपए का नोट निकालते हुआ कहा- माफ़ करना मास्टर, यह शैतानी तो मैंने ही की है.

हमने कहा- लेकिन यह 'धन्यवाद जोशी जी' का नाटक करने की क्या ज़रूरत थी.  मोदी जी ने तो सबको फ्री में  टीका लगवाया, किसी को ऑक्सीजन की कमी से मरने नहीं दिया,अब अस्सी करोड़ लोगों को अपना फोटो छपे थैले में अनाज बंटवा रहे हैं. खिलाडियों का हौसला बढ़ाकर देश को मैडल दिला रहे हैं.  हमने तो कुछ किया नहीं,फिर कैसा धन्यवाद.

बोला- रोज चाय पिलवाता है वह क्या किसी टीके और ऑक्सीजन से कम है ?  

हमने कहा- क्या बताया जाए, आजकल लोगों को अपने कर्मों और नीयत पर विश्वास नहीं रह गया है इसलिए ऐसे नाटक किये जा रहे. 'धन्यवाद' कृतज्ञता का एक सहज भाव है जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं होती. क्या किसी प्याऊ पर पानी पीकर, क्या गरमी में किसी पेड़ के नीचे बैठकर प्रकृति या उस पेड़ को लगाने वाले के बारे में विचार करके या प्याऊ लगवाने वाले के प्रति स्वतः ही धन्यवाद या कृतज्ञता की कोई अनुभूति नहीं होती ? मूक, मौन, जड़-जंगम भी अपनी तृप्ति के लिए स्रष्टा का धन्यवाद सा देते लगते हैं. क्या भोजन से पहले सभी लोग ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए पोस्टकार्ड लिखते हैं ? 

लगता है किसी दिन सूरज को उगाने के लिए पार्टी के अनुशासित सिपाही नेता को धन्यवाद के पोस्ट कार्ड लिखने लगें. हो सकता कभी कोई भक्त भगवान को नमस्ते करने पर बाद उससे प्रमाण स्वरूप 'नमस्ते-प्राप्ति' की रसीद माँगने लगे.

ज़माना बहुत बदमाश और आडम्बरी होता जा रहा है.

बोला- कोई बात नहीं, हरियाणा का किसानों का सिर फोड़ने की गर्वपूर्ण घोषणा करने वाला अधिकारी आयुष सिन्हा और उसके आका स्पष्ट रूप से, मन से क्षमा न  मांगें लेकिन मैं तुझे 'धन्यवाद' का लिफाफा भेजने और तुझ पर दस रुपए का जुर्माना लगवाने के लिए 'सॉरी' बोलता हूँ.

हमने- इट्स ओके.



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Sep 6, 2021

तू कैसा राष्ट्र निर्माता है ?


तू कैसा राष्ट्र निर्माता है ?


इधर हमारी सुबह पाँच बजे की अलार्म बजी और उधर दरवाजा खटखटाने की ध्वनि सुनाई दी. हम दुविधा में थे कि पहले अलार्म को बंद करें या दरवाजा खोलें जैसे भारत सरकार अफगानिस्तान पर नीति-निर्धारण के लिए  मंथन कर रही है कि वहाँ के तालिबान अच्छे तालिबान हैं या बुरे, देशद्रोही है या देशभक्त. उनसे सीधे बात करें या किसी दूसरे देश में गुप्त वार्ता की जाए. वैसे इस समय अफगानिस्तान में वहाँ के देशभक्त और सच्चे धर्म सेवक सुरक्षा की दृष्टि से महिलाओं को फिलहाल घरों में ही बने रहने की सलाह दे रहे हैं तो उसी तर्ज़ पर हमारे यहाँ भी जींस तथा विधर्मियों से संपर्क बढ़ाने, उनसे चूड़ियाँ खरीदने, उनकी दूकान या ठेले, विशेष रूप से 'श्रीनाथ डोसा भण्डार' जैसे नाम वालों से सामान खरीदने से देश-धर्म को खतरा हो सकता है.प्लेन में एक सांस्कृतिक दृष्टि संपन्न मुख्यमंत्री ने फटी जींस पहने महिला पर संस्कारहीन होने को मोहर लगा दी तो बिहार में एक माता-पिता ने जींस पहनने की जिद करने वाली बेटी के चरित्र की पवित्रता की रक्षा के लिए उसकी हत्या ही कर दी. चरित्र की पवित्रता के सामने प्राणों का क्या मोल !

जैसे विकास-व्यस्त और विकास-व्यग्र सरकार नौ-दस महिने से धरना प्रदर्शन के बावजूद किसान-हित (!) में बनाए गए तीनों कानूनों को वापिस नहीं ले रही है, अर्थव्यवस्था को पाँच-दस ट्रिलियन की बनाने के चक्कर में नेहरू युग के 'कलंक चिह्न' सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को किसी को भी औने-पौने दामों में बेचने के लिए कृतसंकल्प है वैसे ही हम पहले तसल्ली से अलार्म बंद करेंगे उसके बाद दरवाजा खोलेंगे, भले ही दरवाजा खटखटाने वाला उसे तोड़ ही क्यों न दे या जनता की चुनी हुई लोकप्रिय सरकार का मुख्यमंत्री-प्रिय अधिकारी किसानों के सिर फोड़ने का जन-हितकारी आदेश को क्यों न दे दे.

हम अलार्म बंद करके दरवाजे पर पहुंचे भी नहीं थे कि एक उसी तरह की कड़क आवाज़ आई जैसी ज़बरदस्ती  प्रभु नाम उच्चारण करवाने वाले भक्तों की होती है- अरे आलसी मास्टर, क्या ऐसे ही राष्ट्र का निर्माण करेगा ? लानत है तेरे 'राष्ट्र-निर्माता' होने पर .

हमने आवाज़ पहचान ली. आखिर ऐसी दबंग, गरजती और दुनिया-दुश्मनों और पड़ोसी आतंकवादियों व बुरे  तालिबानों के दिल दहला देने वाली आवाज़ ३० इंची सीने वाले तोताराम के अतिरिक्त और किसकी हो सकती है !

तोताराम को अन्दर लिया, आँख-मुंह धोकर बरामदे में बैठते हुए तोताराम ने हमारी लानत-मलामत करते हुए कहा- राष्ट्र निर्माण करने के लिए छह घंटे से अधिक सोना वर्जित है. राष्ट्र-निर्माण करने वाले अठारह-अठारह घंटे काम करते हैं. 

हमने कहा- हमारे हिन्दू धर्म में साल में चार महिने देवताओं के सोने का भी विधान है जिससे विकास और निर्माण पीड़ित जनता को कुछ साँस लेने का मौका मिल सके. अति किसी भी बात की बुरी होती है फिर चाहे वह विकास की हो, आत्ममुग्धता की हो, दूसरों का मज़ाक उड़ाने की हो, नाम-परिवर्तन में ही धर्म-रक्षा और गौरव-वृद्धि की हो. फिर हमने राष्ट्र-निर्माण का काम पिछले बीस साल से कम कर दिया है और पिछले सात साल से तो एकदम बंद ही कर दिया है. जब देश में राष्ट्र-निर्माण, विकास और गर्व-वृद्धि करने वाली एक अभूतपूर्व और समर्पित टीम सत्ता में आ गई तो वह सब संभाल लेगी.

बोला- क्यों, क्या देश-हित और निर्माण का ठेका मोदी जी और योगी जी ने ही ले रखा है ?

हमने कहा- हाँ, ले रखा है. वे इतने सक्षम हैं कि उन्हें किसी और की मदद और सलाह की ज़रूरत ही नहीं है.  इतने परफेक्शनिस्ट हैं कि उन्हें किसी और का किया हुआ विकास पसंद भी तो नहीं आता. नेहरू, इंदिरा और राजीव द्वारा किये गए गलत विकास को सुधारने में ही उन्हें कितनी इनर्जी व्यर्थ करनी पड़ रही है. प्लेन ज़मीन पर मकान बनाना अधिक सरल है. पुराने मकान की गिरवाना, सफाई करवाना, मलबा फिंकवाना क्या कोई आसान काम है ? खर्चा और समय दोनों की बर्बादी. ऐसे ही पुराने वस्त्र को उधेड़कर दुबारा किसी के नाप का वस्त्र बनाना बहुत सिर दर्दी का काम है. उधेड़ो, चुन-चुनकर धागे निकालो, धोओ, प्रेस करो. फिर भी लगता है जैसे किसी का जूठा बरतन साफ़ कर रहे हैं.  बस, समझ ले दोनों उत्साही सेवकों की यही सबसे बड़ी समस्या है. वरना अब तक सिलावानिया के बल्ब के विज्ञापन वाले,अंग्रेजों के ज़माने के जेलर असरानी की तरह ये सारे घर के बदल डालते.

बोला- मास्टर, इतना भी कठोर मत बन. जैसा भी बन पड़े मोदी जी का सहयोग कर. आखिर हम अब भी बरामदे में बैठे पेंशन पेल रहे हैं. 

हमने कहा- हमने तो चालीस साल नौकरी की है. उन नेताओं के बारे में सोच जो जितनी बार जनसेवा के लिए चुने गए उतनी ही संख्या में पेंशनें ले रहे हैं, मुफ्त रेल यात्रा, परिवार और खुद के लिए जीवन भर मुफ्त चिकित्सा सुविधा. और भी जाने क्या-क्या. अब हमारे पास तो प्राण बचे हैं सो भी चलने को तैयार बैठे हैं. हम कौन भारत रत्न और राष्ट्रपति पद की प्रतीक्षा में नब्बे पार करके भी भीष्म की तरह शर-शैय्या पर लेटे हैं. 

गैस की सबसीडी अपने आप ही बंद कर दी, पोस्ट ऑफिस की मासिक आय योजना का ब्याज घटा दिया, १८ महिने का डीए का एरियर हजम, भविष्य में कोई पे कमीशन नहीं. अब तो हम जैसे बरामदा-चाय-विमर्श वालों पर यूएपीए लगाना शेष रह गया है.

बोला- तेरी बातों को देखते हुए वह भी असंभव नहीं है. फिर वहां चाय तो दूर फादर स्टेंस की तरह स्ट्रा भी नहीं मिलेगी.




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Sep 3, 2021

लोक-परलोक-कल्याण-मार्ग

लोक-परलोक-कल्याण-मार्ग  


आज तोताराम कुछ परिवर्तनकारी-सृजनात्मक मूड में था, बोला- मास्टर, क्यों न अपनी इस गली का नामकरण कर दें, पहचान, परिवर्तन और गौरवानुभूति तीनों एक साथ हो जायेंगे. 

हमने कहा- तेरा नाम शुकदेव रख दिया जाए तो क्या तू शुकदेव जी की तरह संसार-विरक्त हो जाएगा ? क्या तुझे वेदव्यास का अयोनिज पुत्र मान लिया जायेगा ? अपनी गली को किसी नाम की ज़रूरत नहीं है. भले ही अपनी नगर  परिषद् सीकर को सफाई में मेरिट में मानती हो या शिक्षा का धंधा करने वाले सीकर को  'एज्यूकेशन हब' कहते हों लेकिन जो यहाँ के लोग बतियाते हैं वही सच है. और वह सच कटु है.  राजनीति की बात और है. उसमें सत्ताधारी दल का हर चुनावोपयोगी व्यक्ति अमर, स्वर्गीय और यशस्वी होता है. जब तक सूरज चाँद रहता है तब तक उसका नाम रहता है. वह स्वर्गीय कहलाता है. भले ही उसके डर से भले लोग स्वर्ग जाने से भी कतराने लगते हैं. 

तू कुछ भी नाम रख ले लेकिन इस गली की पहचान रहेगी 'कूड़े वाली गली' या 'कीचड़ वाली गली'. जब भी नगर परिषद् वालों को फोन करो तो 'मंडी के पास' बोलते ही कम्प्लेंट वाला पूछता है- क्या, वही कीचड़-कूड़े वाली गली ? वैसे यह बात सदैव याद रखना कि नाम रखने और बदलने का अधिकार इस समय केवल दो ही महापुरुषों के पास है. खैर, फिर भी बता, तू क्या नाम रखना चाहता है ?

बोला- लोक-कल्याण-मार्ग.

हमने कहा- यह नाम वैसे ही निरर्थक है जैसे किसी भिखमंगे का नाम 'किरोड़ीमल' या गली के लेंडी कुत्ते का नाम 'शेरू' रखा दिया जाए. 

बोला- हम में क्या कमी है. हम महान भारत के ब्रह्मज्ञानी, ब्राह्मण कुलोत्पन्न, वयोवृद्ध गुरुजन हैं. दशकों से यहाँ चाय पर ब्रह्मचर्चा करके लोक का कल्याण करते हैं. मेरा 'इस लोक का कल्याण' भी तेरे यहाँ सुबह-सुबह  फ्री की चाय पीकर ही होता है. 

हमने कहा- तू लाख अपने ब्राह्मणत्त्व पर मुग्ध हो ले लेकिन 'लोक कल्याण मार्ग' वही हो सकता है जहां देश-दुनिया का कल्याण करने वाले महान पुरुष रहते हों. और वह इस समय दिल्ली में है जहाँ जन-कल्याण के लिए प्रतिबद्ध विकास-पुरुष रहते हैं. जिसे पहले 'रेस कोर्स रोड़' कहा जाता था. 

बोला-  तो फिर इसका नाम 'परलोक-कल्याण-मार्ग' रख देते हैं. मुझे चाय पिलाने से तेरा कुछ तो परलोक सुधरता होगा. 

हमने कहा- वह भी संभव नहीं क्योंकि वह कल्याण सिंह जी के नाम पर रख दिया गया है- कल्याण सिंह मार्ग.

बोला- लेकिन इस नाम का वह अर्थ तो नहीं निकलता जो तू बता रहा है. जैसे 'स्टेशन मार्ग' का अर्थ क्या होगा ? यही कि इस मार्ग पर चलते जाओ तो स्टेशन पहुँच जाओगे.  'श्मशान मार्ग' पर चलते-चलते कोई कहाँ पहुंचेगा ? इस तरह 'कल्याण सिंह मार्ग' का मतलब यह होगा कि इस मार्ग पर चलते-चलते आप कल्याण सिंह जी के पास पहुँच जाओगे जो इस समय संविधान से ऊपर अपना 'पार्टी-हित' साधन करने के कारण 'रामजी' की बगल में बैठे होंगे. जब यह मार्ग परलोक सुधारने वाले राम के मंदिर अर्थात आवास को जाता है तो इसका नाम होना चाहिए- 'परलोक-कल्याण-मार्ग'. 

हमने कहा- पहुँच गया ना वहीं जहाँ हम बता रहे थे. इसलिए छोड़ लोक-परलोक का चक्कर. लोक और परलोक दोनों सत्ताधीशों के लिए रिज़र्व होते हैं. उन्हीं का इस और उस लोक में कल्याण होता है. हम तो यही कामना करें कि इसी तरह चाय पर महापुरुषों की चर्चा करते हुए, मोह-माया मुक्त होकर शांति और शालीनता से निर्वाण को प्राप्त हो जाएँ और इस नश्वर देह का इज्जत से निबटान हो जाए. 

सुना है कोरोना की तीसरी लहर आने वाली है जिसमें रोज ४-५ लाख लोग संक्रमित होंगे. हालाँकि देश में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है फिर भी किसे पता, कहीं गंगा में तैरते न मिलें. कुत्ते-कव्वे नोचेंगे तो बहुत बुरा लगेगा.  




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Sep 2, 2021

यह भी कोई मुद्दा है ?


यह भी कोई मुद्दा है ? 


तोताराम ने प्रश्न किया- तुझे पता है संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर कितना रुपया खर्च होता है ?

हमने कहा- हमने तो चालीस साल नौकरी की और अब बीस साल से पेंशन ले रहे हैं लेकिन आज तक यह पता नहीं चला कि सब कहाँ चला गया. संसद, सांसदों और महाप्रभुओं की मर्ज़ी. बजट उनका, प्रस्ताव उनके, वे ही बिल  पास करने वाले. स्पष्ट बहुमत मिला है जहां चाहें, जितना चाहें खर्च करें. चाहे मूर्ति बनाएं, चाहे सेन्ट्रल विष्ठा. हमें इस बारे में कुछ पता नहीं, तुझे अगर सीतारामन मैडम या वेंकैया जी ने बताया हो तो बात और है क्योंकि एक वित्तमंत्री और दूसरे जी ने संसद की पवित्रता को नष्ट होते देखा है. 

बोला- इसमें किसी के बताने की क्या बात है. सरकार कुछ छुपाती थोड़े ही है. सब कुछ पारदर्शी मामला है. अखबारों में छपता रहता है.  एक मिनट का अढाई लाख रुपया खर्च होता है. लेकिन अबकी बार विपक्ष ने कार्यवाही में बहुत बाधा डाली और जनता का करोड़ों रुपया व्यर्थ हो गया. 

हमने कहा- हमारे हिसाब से तो यह चुनाव और अधिवेशन सब बेकार हैं. जब एक बार बहुमत से सरकार बन गई तो फिर किस बात की बहस. पांच साल जो चाहे करेगी. जनता का भला और विकास किये बिना मानने वाली तो हैं नहीं सरकार. ज्यादा ही मन हो तो ज़ूम पर कर लो संसद का अधिवेशन. बड़े सेवक जी बोल देंगे, शेष सब अपने- अपने घरों में बैठे अपनी अपनी मेज थपथपा लेंगे. इस मामले में हमें तो मोदी जी की पिछली लाइन में बैठने वाले अपने भाभीजी पापड़ वाले अर्जुनराम जी मेघवाल बढ़िया लगते हैं जो नियमित रूप से सही समय पर मेज थपथपा देते हैं.  संसद में बैठकर भी तो देशभक्त सेवक यही करते हैं. न किसी को बोलना और बोलेंगे तो भी सुनेगा कौन ? बिना बात जो छोटा-मोटा मंत्रालय मिला हुआ है वह और छिन सकता है. लाखों किसानों को कहते हैं बात कर लो लेकिन तीन कानून बदलेंगे नहीं. फिर बात करके क्या करना है ? 

बोला- हम देश का विकास करने आये हैं कि ऐरे-गैरे नत्थू खैरुओं की सुनने ?

हमने पूछा- वैसे विपक्ष संसद चलने क्यों नहीं दे रहा ?आखिर वह चाहता क्या है ?

बोला- कहता है, पेगासस ख़रीदा या नहीं ? 

हमने कहा- यह तो बहुत आसान बात है. एक शब्द का मामला है. हाँ या ना. बता दो. 

बोला- सब प्रश्नों के उत्तर हाँ या ना में नहीं हो सकते. 

हमने कहा- फिर भी यदि दाल में काला या दाढ़ी में तिनका या नीयत में खोट नहीं है तो घबराने, बात को टालने और बगलें झांकने की क्या ज़रूरत है? 

बोला- बगलें कौन झांकता है ? हमने तो विपक्ष के कहने पर रक्षा मंत्रालय से पूछा है. उसने एस एस ओ समूह से कोई लेनदेन करने से इनकार किया है.अब औरों से भी पूछ लेंगे. देश में १३५ करोड़ लोग हैं सबसे पूछेंगे, कई कई बार पूछेंगे.  किसी भी तरह इसकी सचाई का पता लगाकर रहेंगे. यदि मनुष्यों से सच का पता नहीं लगेगा तो पशु-पक्षियों, मक्खी-मच्छरों और यहाँ तक कि पेड़-पौधों से भी पूछेंगे. लेकिन सच का पता लगाकर रहेंगे. हम सबकी निजता का सम्मान करते हैं.हम घर में घुसकर मारने वाले हैं. छोड़ेंगे नहीं.

हमने कहा- एक एक से कब तक पूछते रहोगे ? इस प्रकार तो शताब्दियाँ लग जायेंगी. 

बोला- शताब्दियाँ ही क्या सहस्राब्दियाँ लग जाएँ लेकिन हम जल्दबाजी में कोई काम नहीं करेंगे. जल्दी का काम शैतान का होता है. 

हमने कहा- लेकिन जब लोगों के कम्प्यूटर में वाइरस घुसा है, सूचनाएं प्लांट की गई हैं, डाटा की चोरी हुई हैं तो एकदम झूठ तो नहीं है. यह वाइरस झूठ होता तो फ़्रांस और खुद इज़राइल तक क्यों जांच करवा रहे हैं ?

बोला- सच का अभी पता नहीं लगा है और झूठ हम बोल नहीं सकते. ऐसे में क्या ज़वाब दें. अब भारत विश्व गुरु है. तरह-तरह के छोटे-बड़े लोग आते हैं. तरह-तरह की भेंट भी लाते हैं. हो सकता है कोई यह पेगासस भी भेंट देने के लिए लाया हो और किसी के पी ए या दरबान को दे गया हो. या वह पेगासस उसका खुद का ही हो और भूल से यहाँ कहीं छूट गया हो. हम देश के सभी खोया-पाया दफ्तरों से बी पता करवाएंगे. अब वाइरस है, जीव है. निकल कर पता नहीं इधर-उधर कहीं चला गया हो, कहीं घुस गया हो तो सरकार क्या करे. अब कोई आतंकवादी या देशद्रोही तो है नहीं कि कपड़ों से पहचान लें. क्या आजतक कोई बता पाया कि कौन सुखराम जी के घर बोरी में भरकर चार करोड़ के नोट रख गया. क्या कोई बता पाया कि गोधरा में रेल के डिब्बे कैसे जले, हजारों लोग कैसे मारे गए, चूहों ने कैसे बाँध को खोद डाला, कैसे एक मुर्गी एक दिन में आठ सौ रुपए का दाना खा गई, कैसे दो भैंसें स्कूटर पर बैठकर हरियाणा से पटना चली गईं ? हम तो बिना किसी के लिखित प्रार्थना-पत्र के ही जान लेते हैं कि कौन किस पुरस्कार या शहर का नाम बदलवाना चाहता है ? हमें तो यह भी पता चल जाता है कि कहीं किसी चबूतरे पर बैठे कौन चार लोग चोरी या कोई षड्यंत्र रच रहे हैं.

हमने कहा- फिर भी एक मंत्री ने तो कहा है कि जासूसी ज़रूरी होती है और जासूसी करवाने वाला यह क्यों बताएगा कि वह जासूसी करवा रहा है. सब बता दिया तो वह जासूसी ही क्या हुई. 

बोला- ये उनके अपने विचार हो सकते हैं, सरकार और पार्टी इससे सहमत नहीं है. वैसे हम विश्वगुरु हैं.हमारे वेदों में सब प्रकार का ज्ञात-अज्ञात, गुप्त-प्रकट ज्ञान मौजूद है तो हमें किसी छोटे से देश इज़राइल से ये पेगासस-फेगासस खरीदने की क्या ज़रूरत है. हमारे पास पहले से दिव्य दृष्टि है. हम खुद सभी पेगाससों के बाप हैं. हम तो घर बैठे ही देख लेते हैं कि कौन अपने बाथरूम में बरसाती पहनकर नहाता है. किसके फ्रिज में किस जानवर का मांस रखा है. बिना पायजामा उतरवाए ही बता देते हैं कि हिन्दू है या मुसलमान.


 


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Aug 18, 2021

'भारत जोड़ो' का ट्रेलर

 'भारत जोड़ो' का  ट्रेलर  


आते ही तोताराम ने हमसे उसी स्वर में दरयाफ्त किया जिस स्वर में पुलिस किसी भी जबरदस्ती  'जय श्रीराम' बुलवाने वाले और ऍफ़ आई आर में सदैव 'अज्ञात' पाए जाने वाले  'लोगों' के नाम से दर्ज  'धर्म-सेवकों' के बारे में सामान्य लोगों से पूछती है. 

बोला- कल का 'ट्रेलर' देखा ?

हमने कहा- जिस देश के सूचना के आकाश में फैक न्यूज और ट्रोलिंग के टिड्डी दल इस तरह छाये हों कि सच का सूरज तक दिखना मुहाल हो गया है वहाँ किसका 'ट्रेलर' देखें. और फिर किसी फिल्म का ट्रेलर तो सिनेमा हाल में अगले आकर्षण के रूप में इंटरवल में दिखाया जाता है. हमें तो किसी सिनेमा हॉल में फिल्म देखे ही ४० साल होने को आ गए. १९८२ में पोर्ट ब्लेयर के 'लाइट हाउस सिनेमा हॉल' में गाँधी फिल्म देखी थी. 

बोला- किस कांग्रेस के ज़माने की बात कर रहा है. अब तो हमारा लोकतंत्र डिजिटल हो गया है कि एडिटिंग और फोटो शॉप के बल पर कभी भी, कुछ भी दिखाया जा सकता है. स्मार्ट फोन किस दिन के लिए है ? डाटा डलवाले जिससे महत्त्वपूर्ण बातें यथाशीघ्र तेरे मेसेज बोक्स में आ जाएँ. और फिर ट्रेलर फिल्म का ही नहीं होता, किसी भी बात का हो सकता है.

हमने कहा- तो फिर तू ही अपने ट्रेलर के बारे में बताकर हमें अज्ञानता और अज्ञातता के अन्धकार से निकाल.

बोला- कल पूर्व संध्या पर जंतर-मंतर पर एक भव्य आयोजन हुआ था. 

हमने कहा- पहले तो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्याओं पर राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री जैसे बड़े-बड़े नेता भाषण दिया करते थे. जंतर मंतर पर तो धरने-प्रदर्शन होते हैं. वहाँ प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति किस महत्त्वपूर्ण दिवस की पूर्वसंध्या पर भाषण देने पहुँच गए ?

बोला- बस, इतिहास के इतने से ज्ञान के बल पर मास्टर बना था ! यह भी पता नहीं कि ८ अगस्त को किस दिन की पूर्व संध्या होती है ?

हमने कहा- इस दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने मुम्बई अधिवेशन में ८ अगस्त १९४२ को ९ अगस्त १९४२ से 'अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन'  शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया था. लेकिन 'भारत छोड़ो आन्दोलन' की पूर्वसंध्या या उस दिन किसी प्रकार के किसी राष्ट्रीय  कार्यक्रम में अब तक तो नहीं सुना था ? 



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बोला- जो नकली देशभक्त हैं वे क्यों ऐसा आयोजन करेंगे. अब सच्चे देश भक्तों का समय आया है सो सभी क्षेत्रों में आमूलचूल सुधार करने के लिए यह बहुत ज़रूरी है. 

हमने कहा- असली बात बता कि कल क्या हुआ ?

बोला- कल दिल्ली भाजपा के पूर्व प्रवक्ता और कानून के अलमबरदार श्री अश्विनी उपाध्याय ने 'भारत जोड़ो' आन्दोलन का शुभारम्भ किया.

हमने कहा- भारत तो जुड़ा हुआ ही है. देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार देकर जोड़ने वाला भारत का संविधान है तो सही. उसी को लागू करो, मन से मानो तो भारत जुड़ा हुआ ही है. इसके जुड़ाव और एकता को क्या खतरा है ? सुना है इस कार्यक्रम में- 'जब मुल्ले काटे जायेंगे, तब राम-राम चिल्लायेंगे' जैसे  कुछ बहुत ही आपत्तिजनक नारे लगाए गए. क्या इस प्रकार भारत को जोड़ा जाएगा ? 

बोला- जोड़ने की यह तकनीक  'हड्डीरोग सिद्धांत' पर आधारित है.  जब कोई हड्डी गलत जुड़ जाती है तो उसे ठीक करने के लिए दुबारा तोड़ा जाता है. गाँधी जी ने जो 'अंग्रेजो भारत छोड़ो' आन्दोलन शुरू किया था उसमें एक बड़ी आधारभूत खामी थी. ऐसे कहने से क्या कोई छोड़ता है ? क्या पता, जो आज छोड़कर गया है वह कल फिर आ जाए. इसलिए 'छोड़ने के आग्रह' से अधिक मज़बूत होता है 'ज़बरदस्ती छुड़वाना'.  सो इस 'भारत जोड़ो' कार्यक्रम के तहत भारत को जोड़ने के लिए 'कुछ' को एक विशेष तरीके से' भारत छुड़वाया' जाएगा जिससे वे फिर वापिस न आ सकें. 

हमने कहा- तो सुन, तुझे पता होना चाहिए कि ८ अगस्त १८९९ को ए टी मार्शल ने फ्रिज का पेटेंट भी करवाया था. समझ ले तेरा यह 'भारत जोड़ो अभियान'  गाँधी के 'अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन' को अपवित्र करने की पूर्व संध्या ही नहीं है, बल्कि सर्व समरसता और सामूहिकता की हर भारतीय उपलब्धि को फ्रिज (ठन्डे बस्ते) में डालने की एक बड़ी योजना का हिस्सा है. 


 

 

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Aug 6, 2021

गंगाजल की शक्ति



 गंगाजल की शक्ति 


रात हमारे सीकर में तापमान ४२ डिग्री था. बिजली बचाने के लिए कूलर आधी रात के बाद बंद कर दिया करते हैं लेकिन रात तो बंद करने का मन ही नहीं हुआ. फिर भी नींद बहुत देर से आई. इसलिए पांच बजे की अलार्म भी नहीं सुनी. सुबह-सुबह दरवाजे पर 'हर हर गंगे' का उद्घोष हुआ तो आँख खुली. 

टिहरी गढ़वाल से हमारा खानदानी पंडा तो दिसंबर-जनवरी में आता है. तब वहाँ काफी ठण्ड पड़ने लग जाती है. कुछ ठण्ड से बचाव तो कुछ यजमानों से थोड़ी बहुत आमदनी. अब तो उसके आने का मौसम भी नहीं है. यह सच है कि सच्ची भक्ति और सच्चे प्यार में बहुत शक्ति होती है. जैसे मोदी जी को गंगा मैय्या ने बुलाया तो उन्हें अपनी जन्मभूमि गुजरात को छोड़कर वाराणसी जाना पड़ा. वैसे ही यदि हम सच्चे मन से गंगा मैय्या को पुकारते तो तय है कि माँ ज़रूर चली आती. लेकिन आज तो हमने माँ को पुकारा भी नहीं. फिर गंगा मैय्या द्वार पर कैसे चली आई ? 

हमने पत्नी से कहा- ज़रा दरवाजे पर जाकर देखो तो कौन है ?

कुछ देर बाद पत्नी दरवाजा बंद करके अन्दर आई और बोली- शरीर पर भस्म  लपेटे, लंगोटी लगाए एक दुबला पतला आदमी था. कह रहा था- माता, तुम्हारे पति ने कोरोना की एक डोज़ ले ली है लेकिन दूसरी का कोई हिसाब-किताब नहीं बैठ रहा है. उसे यह गंगाजल पिला देना. सब ठीक हो जाएगा. 

हमने पूछा- वह आदमी कहाँ है ?

बोली- वह तो उसी समय चला गया. उसे क्या पता कि तुम्हें ९० दिन बाद भी दूसरा टीका नहीं लगा है. फ्री में गंगाजल भी दे गया. ज़रूर कोई संत ही था.  

हमने कहा- यह जो गंगाजल या आबे ज़मज़म या गौमूत्र या अमृत जो कुछ भो है, हमें नहीं पीना. जिस देश में रेल में लोग नशीली चाय पिलाकर लूट लेते हैं, नकली टीके लगा जाते हैं, टीकों के झूठे आंकड़े बना देते हैं, वहाँ कुछ भी विश्वसनीय नहीं है. जब भी मरेंगे स्वाभाविक मौत मरेंगे, किसी के षड्यंत्र का शिकार होकर नहीं.  

हमारी बात चल ही रही थी कि तोताराम आ गया. बोला- कौन रच रहा है तुम्हारे विरुद्ध षड्यंत्र ?

हमने कहा- कोई कोरोना के दूसरे डोज़ के विकल्प के रूप में गंगाजल बताकर यह पानी दे गया है. अब बिना जानकरी के कैसे पी लें.

बोला- शंका मत कर. मीरा तो ज़हर को भी श्रीनाथ जी का प्रसाद मनाकर पी गई और अमर हो गई. ये विपक्षी लोग गंगाजल, गोमूत्र और गोबर से सभी बीमारियों की चिकित्सा की निंदा के बहाने मोदी जी के विरुद्ध हवा बना रहे हैं. ये सब नास्तिक, मुस्लिमपरस्त और कम्यूनिस्ट हैं.

बी एच यू के डाक्टरों ने भी कोरोना के इलाज में गंगाजल की भूमिका पर शोध करवाने को लिखा है.न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रो. विजय नाथ मिश्र का कहना है कि साल 1896 में कोलेरा महामारी के दौरान डॉ हैकिंग ने एक स्टडी की थी. जिसमें यह पता चला था कि जो लोग गंगा जल का सेवन करते हैं वे कोलेरा से ग्रसित नहीं हो रहे हैं. बीएचयू के मुताबिक लंबे समय तक इस स्टडी पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था. उन्होंने कहा कि साल 1980 में यह बात पता चली कि सभी नदियों में बैक्टीरियोफेज होते हैं. गंगाजल में ऐसे 1300 तरह के बैक्टीरियोफेज पाए जाते हैं.

प्रो. गोपालनाथ ने साल 1980 से 1990 के बीच बीएचयू में मरीजों का इलाज बैक्टिरियोफेज के जरिए किया था.

प्रोफेसर मिश्रा ने बताया कि गंगा मामलों के एक्सपर्ट अरुण गुप्ता ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर गंगा जल के औषधीय गुणों और बैक्टीरियोफेज का पता लगाने की अपील की थी. गंगा किनारे रहने वाले 491 लोगों पर सर्वे किया गया था. जिसमें यह खुलासा हुआ कि 274 ऐसे लोग जो रोज गंगा में नहाते हैं और गंगाजल पीते हैं उनको कोरोना नहीं हुआ था. वहीं 217 लोग जो गंगा जल का इस्तेमाल नहीं करते थे, उनमें से 20 को कोरोना हुआ और 2 की मौत भी हो गई. उन्होंने कहा कि गंगाजल पर और भी रिसर्च की जरूरत है.

हमने कहा- यदि तेरा शोध-पत्र वाचन समाप्त हो गया हो तो हम भी कुछ बकें.

बोला- फरमाइए.

हमने कहा- तुमने बताया कि २१७ लोगों ने गंगाजल का इस्तेमाल नहीं किया. उनमें से २० को कोरोना हुआ और २ मर गए. हमने भी शोध किया है कि दो लोगों ने गंगाजल का सेवन कभी नहीं किया और उन्हें आज तक कोरोना नहीं हुआ. इससे सिद्ध होता है कि गंगाजल सेवन न करने वाले कोरोना से अधिक सुरक्षित रहते हैं. उन के नाम भी सुन ले- रमेश जोशी और तोताराम. 

बोला- इस तरह से तो मैं भी एक उदाहरण दे सकता हूँ कि जिसे गंगा बुलाती है वह प्रधानमंत्री बन जाता है, वह सदैव गंगाजल का सेवन करता है और उसे लाखों की भीड़ में जाकर भाषण देने पर भी कभी कोरोना नहीं होता.

हमने कहा- तोताराम, हम ज्यादा विज्ञान तो नहीं जानते लेकिन इतना दावे से कह सकते हैं कि जो गंगा के भक्त बने फिरते हैं वे एक महीने तक बनारस की गंगा का जल पीकर जिंदा रह कर दिखा दें तो हम मोदी जी के ८ नवम्बर २०१६ के भाषण की तरह संकल्प लेते हैं- "आप जिस चौराहे पर मुझे खड़ा करेंगे, मैं खड़ा होकर..देश जो सज़ा करेगा वो सज़ा भुगतने को तैयार हूं." 

यदि गंगाजल से ही कोरोना का इलाज़ होता तो क्या उसमें तिरते सैंकड़ों शवों का कल्याण नहीं हो जाता. 

बोला- लेकिन इतना तो मानेगा कि गंगाजल के प्रभाव से वे शव भी रेत को हटाकर ऊपर आ गए, तैर कर उत्तरप्रदेश से बिहार तक पहुँच गए. जीते जी भले ही उनकी किसी ने नहीं सुनी लेकिन अब वे पर्याप्त गंगाजल पीकर इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि 'रामराज' वाले 'साहब' भी उनसे डरने लगे हैं. 

खैर, न सही गंगाजल से कोरोना का इलाज़ लेकिन गंगाजल पीने में क्या समस्या है ? साफ़ और शुद्ध है. घर बैठे गंगा मैय्या आई है.पी ले, मोक्ष हो जाएगी.

हमने कहा- तू यह कैसे कह सकता है कि यह साफ़ है ?

बोला- मुझे ही पता नहीं होगा तो किसे होगा !  कुछ देर पहले घड़े के पानी से भरकर यह बोतल मैं ही तो दे गया था.


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Aug 3, 2021

नेहरू और मोदी जी के बीच

नेहरू और मोदी जी के बीच


जैसे ही तोताराम आया, हमने उसके सामने पहेलीनुमा एक प्रश्न फेंकते हुए पूछा-  नेहरू और मोदी के बीच ? 

बोला- यह भी कोई प्रश्न है ?

हमने कहा- जिसे उत्तर मालूम नहीं होता या जो कुछ छुपाना चाहता है वह उत्तर देने की बजाय प्रश्न को ही चेलेंज करता है जैसे संसद में सरकार. कृषि कानूनों को अच्छा बताती है लेकिन किसानों की बात नहीं सुनना चाहती. यह नहीं बताना चाहती कि पेगासस ख़रीदा या नहीं. बस, यही रट लगाए है कि यह कोई मुद्दा ही नहीं है. 

बोला- लेकिन तेरे प्रश्न का तो कोई सिर पैर ही नहीं है. अब क्या बताऊँ ? नेहरू और मोदी जी के बीच समानता या असमानता बताऊँ. १९६४ से २०१४ के बीच क्या-क्या हुआ यह बताऊँ. 


तुझे पता है, पहेली साहित्य और मनोरंजन की एक विधा है जो अधूरी बात कहकर धोखे और सन्देश का जाल रचती है. बहुत से लेखक, नेता और दार्शनिक इसी चक्कर में लोगों को को फँसाकर अपना काम कर जाते हैं. 

इसके लिए हम भारतीय राजनीति से उदाहरण ले सकते हैं जैसे गाँधी जी कहते थे- यदि मैं भारत का डिक्टेटर बन जाऊं तो पहले ही दिन देश में शराब बंद कर दूँ. अब कैसे तय करें कि उनकी बात में दम था या नहीं. आस्था, गर्व और अहंकार की शराब का धंधा करने वालों ने छह महिने के भीतर ही निबटा दिया. हालाँकि गाँधी की जन्मभूमि के अभिमान का मज़ा लेने वाला गुजरात ने कागजों पर शराबबंदी कर तो दी लेकिन उसकी असलियत हमने १९७१ से १९७७ तक भली भांति देखी है. नेहरू जी ने कहा था कि जब तक एक भी आँख में आँसू है तब तक हमारी स्वतंत्रता अधूरी है. आज भी हमने बड़े-बड़े लोगों को रोते देखा है इसलिए इस हिसाब से उनकी स्वतंत्रता अधूरी और असफल ही रही. इसके बाद इंदिरा गाँधी को देखें. 'गरीबी हटाओ' का नारा  दिया लेकिन गरीबी है कि आजतक शान से कायम है.

हमने कहा- लेकिन अब गरीबी कौन सी कम हो गई. बल्कि जीवन का हैप्पीनेस इंडेक्स गिरा है और गरीबों की संख्या बढ़ी है. बढ़ी भी इतनी कि हमारी हैसियत इतनी भी नहीं रही कि मुर्दों को जला भी सकें. गंगा में तिरते शव क्या कहते हैं. लेकिन तूने हमारे मूल प्रश्न का उत्तर नहीं दिया. 

बोला- वैसे तो हम उत्तर देने में विश्वास नहीं करते. हम तो उत्तर देने की बजाय प्रश्न पूछने वाले से ही प्रश्न करते हैं. जैसे कि 'अच्छे दिन', '१५ लाख' की बात करने वले पूछते हैं-  जब देश का विभाजन हुआ तब तू क्या कर रहा था ?  

वैसे तेरे इस प्रश्न के दो प्रकार के उत्तर हो सकते हैं. पहला तो यह कि नेहरू जी और मोदी जी में ५० वर्ष का अंतर है. नेहरू जी को गंगा ने बुलाया नहीं बल्कि वे संयोग से गंगा के किनारे 'इलाहाबाद' में पैदा हुए. वे ऐसे मुस्लिम परस्त थ कि यदि उस समय किसी देशभक्त ने 'इलाहाबाद' का नाम 'प्रयागराज' कर दिया होता तो वे 'जाफराबाद' में पैदा हुए होते. उनके निधन के ५० साल बाद गंगा और उत्तर प्रदेश सहित समस्त देश का उद्धार करने के लिए गंगा के निमत्रण पर मोदी जी बनारस पधारे.

हमने पूछा -और दूसरा उत्तर ?

बोला- दूसरा यह कि नेहरू जी ने १७ साल तक देश की अर्थव्यवस्था और एकता का सत्यानाश  किया. उसके बाद उनकी पार्टी ने इस काम को जारी रखा.

हमने कहा- देश अन्न के मामले में आत्मनिर्भर हुआ, परमाणु शक्ति बना, मंगलयान तैयार किया. 

बोला- मुझे ज्यादा तो नहीं मालूम लेकिन नेहरू जी ने हॉकी टीम को कभी आत्मनिर्भर नहीं बनने दिया. उनके जाने के बाद उनके परिवार वालों ने इस काम को आगे बढ़ाया और हालत यह हो गई कि पिछले ४९ साल में भारतीय हॉकी टीम कोई मैडल नहीं ला सकी. कई बार तो ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई भी नहीं कर सकी. लेकिन अब मोदी जी ने उसे सेमीफाइनल में पहुंचा दिया. 

हमने कहा- शायद आज भारत का मैच बेल्जियम से हैं. देखें क्या हुआ ?

जैसे ही नेट खोला तो पता चला कि भारत बेल्जियम से ५-२ से हार चुका था.

बोला- अभी कांस्य पदक का चांस बाकी है. ४९ साल के खराबे को ७ साल में इतना ठीक कर दिया, यह क्या कम है.

  



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Aug 1, 2021

मीठा-मीठा गप्प


मीठा-मीठा गप्प 


टीका लगवाने गए तो नियम के पक्के कोरोना योद्धाओं ने मना कर दिया कि अभी ८४ दिन में २२ घंटे कम है. हो सकता है इतना पहले दूसरी डोज़ लगा देने से ज़रूरत से ज्यादा इम्यूनिटी आ जाए तो मुश्किल हो जाएगी. ट्रंप ने टीका लगवाकर कहा था कि अब मैं अपने आप को सुपरमैन अनुभव करता हूँ और नीचे जाकर किसी को भी चूम सकता हूँ. वैसे चूमने का काम उसके लिए क्या मुश्किल ही जिसने बिना टीका लगवाये ही, कई प्रेमिकाओं के अतिरिक्त तीन-तीन सुंदरियों से शादी कर ली. हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं है फिर भी कोरोना के डर के मारे टीका लगवाना तो ज़रूरी है. 

टीका केंद्र पर देखा, चार कोरोना योद्धाओं में से एक ने मास्क लगा रखा था, दूसरे ने गले में लटका रखा था, तीसरे ने जेब में रखा हुआ था और चौथा हरिद्वार में कुम्भ स्नानार्थियों की तरह माँ गंगा की कृपा पर विश्वास करके मास्क रहित निर्भय. कुछ डर लगा, फिर मोदी जी के सहअस्तित्त्व सिद्धांत 'कोरोना के साथ रहने की आदत' पर विश्वास करके साहस जुटाया. 

बताया गया कि कल आना. वह कल अभी तक नहीं आया. तभी कहा गया है- काल करे सो आज कर. लेकिन आज तो बस, इंतज़ार करना है. चार दिन हो गए हैं. सोच रहे हैं- यदि अधिक समय निकल गया तो यह पहले वाला ही कहीं प्रभावहीन न हो जाए. 

तोताराम आया तो हमने कहा- तोताराम, अब और कितना इंतज़ार करें. 

बोला- इंतज़ार का क्या ? दो दिन का मामला ही तो है. दो आरजू में कट गए, दो इंतज़ार में. इंतज़ार का फल मीठा होता है. वैसे क्या मेरा इंतज़ार कर रहा था क्या ?

हमने कहा- तेरा इंतज़ार करने की क्या ज़रूरत है. तू क्या 'अच्छे दिन' है जो ज़िन्दगी भर रास्ता ही दिखाता रहेगा. 'मन की बात' की तरह सही समय पर आ ही धमकता है. हम तो टीके की बात कर रहे थे. चार हफ्ते से बढ़ाते-बढ़ाते १२ हफ्ते कर दिया. और अब कहीं कोई सूचना नहीं. कब आएगा, कब लगेगा ? 

बोला- यह वैसे ही है जैसे शादी की गहमागहमी भरी रात भर की हाय-हाय के बाद सभी घर वाले घोड़े बेचकर सो जाते हैं. ऐसे ही समय में चोरियां और खुराफातें होती हैं. २१ जून को रिकार्ड बन गया. जब दस-बीस दिन बाद उसकी खुमारी टूटेगी,  देशद्रोही न्यूज पोर्टल हल्ला माचायेंगे तब कहीं फिर उसी पुरानी रफ़्तार और आधे-अधूरे मन से फिर शुरू होगा. वैसे नयी शोध के अनुसार तो अगले फरवरी तक गई भैंस पानी में.

हमने आश्चर्य से कहा- यह क्या ? २१८ करोड़ टीकों, दिसंबर तक सारे देश को टीका लग जाने की बात का क्या हुआ ? 

बोला- वह तो हैड लाइन मनेजमेंट था सो हो गया. अब तो मोदी जी के सिपहसालार ब्रिटेन के शोध को लागू करने की सोच रहे होंगे.

हमने पूछा- ब्रिटेन की शोध क्या है /

बोला- उन्होंने बताया है कि कोरोना के दो डोज़ में १० महिने का अंतर रखा जाए. तो इम्यून सिस्टम मज़बूत होगा. 

हमने कहा- वैसे तो हम 'लांसेट' जैसे  विदेशी शोधों और अध्ययनों की कोई बात नहीं मानते फिर इसे इतनी जल्दी कैसे मान लेंगे ?

बोला- यह अपने फायदे की बात है ना, जैसे यू पी वाले 'द डेली टेलीग्राफ' की 'मोदी-प्रशंसा' .

हमने कहा- इसी को कहते हैं- खारा-खारा थू, मीठा-मीठा गप्प. 




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Jul 27, 2021

विजय-दिवस या मूर्खता दिवस


विजय-दिवस या मूर्खता दिवस 


आज तोताराम थोड़ा जल्दी और अखबारवाला कुछ देर से आया सो दोनों का मेल हो गया. इधर हम चाय लाये और उधर तोताराम ने अखबार में से 'शेखावाटी भास्कर' निकाला. पहले ही पेज पर किसी पहाड़ी पर कई जवान आकाश में बंदूक लहरा रहे थे तो थोड़ी सी भिन्न वर्दी में कुछ जवान चट्टानों पर पड़े थे. 

हमने पूछा- क्या दुश्मन अपने सीकर तक भी आ पहुंचे हैं. 

बोला- मोदी जी के रहते ऐसा कैसे संभव हो सकता कि कोई दुश्मन इधर आँख भी उठा कर देख ले. साले को घर में घुसकर मारेंगे जैसे कि जब से यूपी में योगी जी आए हैं बदमाशों की हवा टाइट है. न तो कोई अपराध हो रहा है और न ही किसी को ऑक्सीजन कालाबाज़ारी करने की हिम्मत हुई. तभी तो ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा..

हमने पूछा- तो फिर शेखावाटी वाले पेज पर युद्ध का दृश्य कैसे छपा है ?

बोला- अब जब देश में सब ओर अमन-चैन है, सब प्रेम से रह रहे हैं, किसी बात की कोई कमी नहीं है; न रोजगार की, न चिकित्सा और न ही शिक्षा की. तो फिर मनोरंजन और उत्सव मनाने के लिए कुछ तो चाहिए कि नहीं.

हमने कहा- क्या तुझे याद नहीं अटल जी के समय में आज़ादी के पचास साल के उत्सव में दिल्ली में लोगों ने इण्डिया गेट पर 'रन फॉर फ्रीडम' का नाटक किया था. यह बात और है कि आज़ादी की बजाय फ्री में बाँटी जा रही टोर्चों और बरसातियों के लिए स्वयंसेवक झगड़ने लगे. वैसे जब वास्तव में आज़ादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तब तो ये कहीं सुबह-सुबह संस्कृति और संस्कार के नाम पर पता नहीं देश के किस-किस अज्ञात शत्रु के विरुद्ध लाठी और तलवारें भांज रहे थे.  खैर, पढ़ तो यह युद्ध का दृश्य कैसा है ?

बोला- आज कारगिल विजय-दिवस है. इसलिए अपने हर्ष पहाड़ पर एन सी सी के कैडेट ने कारगिल-विजय का यह दृश्य 'री क्रियेट' किया है. जैसे बोट क्लब पर या फिर जयपुर के स्टेच्यू सर्किल से विधान सभा तक के दांडी मार्च का दृश्य.

हमने कहा- जैसे मोदी जी ने सुभाष की ड्रेस में लाल किले में और फिर उसके बाद अंडमान के मरीना पार्क में सलामी ली थी. या फिर अभी चुनावों में बंगाल में रबीन्द्रनाथ के विग्रह में घूमे थे. हो सकता है यह विग्रह अब गुरु नानक का भ्रम पैदा करने के लिए पंजाब चुनावों में काम आए. 

बोला- शर्म नहीं आती, शहीदों के बलिदान और मोदी के फकीरत्त्व का मज़ाक उड़ाते. 

हमने कहा- हमने शहीदों का मज़ाक नहीं उड़ाया है. उनके प्रति हमारे मन में अपार श्रद्धा है. लेकिन हम शहीदों के बलिदान को चुनाव के लिए भुनाने के पक्ष में भी नहीं हैं.

बोला- तो फिर तुझे कारगिल विजय दिवस से क्या परेशानी है ? 

हमने कहा-लेकिन सच बात तो यह है  कारगिल-विजय हमारे जवानों की वीरता का उत्सव है लेकिन साथ ही हम यह भी मानते हैं कि यह उन नेताओं की मूर्खता को याद करने का दिवस भी है जो शांति-बस-यात्रा के चक्कर में कारगिल में निगरानी की अनदेखी कर बैठे या जिनके झूला झूलने के चक्कर में डोकलाम और पेगोंग हो गये. या फिर बहुत पहले 'हिंदी चीनी भाई भाई' के चक्कर में नेफा में नेफा उधड़ गया था.


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Jul 26, 2021

चल, तैयार हो जा


चल, तैयार हो जा


आज तोताराम ने चाय जैसी तुच्छ वस्तु को दरकिनार करते हुए आदेश दिया- चल, तैयार हो जा. 

हमने कहा- कोई फायदा नहीं. २१ जून को रिकार्ड बनाना था सो कागजों में लग गए ८५ लाख टीके. २१ जून को रिकार्ड बनाने के चक्कर में कई दिनों से रोक रखा था कार्यक्रम और अब कई दिनों तक रुका रहेगा.इसलिए अब कहीं चलने का कोई फायदा नहीं. यह भी हो सकता है कि कुम्भ में रोज ५० हजार टीके लगाने का ठेका लेने वाली किसी निजी कंपनी की तरह वैसे ही कागज पर तेरे-मेरे नाम से टीका लगा दिया गया हो. 

अखबार में आज कहीं टीकाकरण का कोई समाचार नहीं है.रामकिशन यादव ने कई दिन पहले ही कह दिया था कि जो मर रहे हैं वे डाक्टरों के इलाज और टीके से मर रहे हैं और जो बचे हुए हैं वे उनके काढ़े से बचे हुए हैं.  वैसे  अपने सीकर में हनुमान जी और गणेश के ऑनलाइन दर्शन का समाचार ज़रूर है. अब जब 'विघ्न विनाशक गणेश' और' नासे रोग हरे सब पीरा वाले' हनुमान जी अवेलेबल हैं तो चिंता किस बात की.   

बोला- प्रभु, ब्रेक लगाएं तो निवेदन करूं. तू तो देशभक्तों की तरह 'ग' सुनते ही गाँधी और 'न' सुनते ही नेहरू को गाली निकालने लगता है .मैं किसी टीकाकरण केंद्र में चलने के लिए नहीं कह रहा हूँ. मैं तो दिल्ली चलने की बात कर रहा हूँ.

हमने कहा- दिल्ली क्या करेंगे ? वहाँ देश को संभालने वाले बहुत से सेवक पहले से ही पिले पड़े हैं. न खुद साँस ले रहे हैं और न ही देश को साँस लेने दे रहे हैं. 

बोला- तभी तो. देश को कभी भी हमारी ज़रूरत पड़ सकती है. 

हमने कहा- हमारी तरह निर्देशक मंडल में बैठे अडवानी जी वहीँ दो किलोमीटर की दूरी पर उपलब्ध हैं सेवा के लिए. कोई उन्हें ही उलटे मन से याद नहीं कर रहा है तो हमारी किसे दरकार है. 

बोला- कल तूने सुना नहीं महामहिम का अपने गाँव में भाषण. दिल्ली में किसे बताते अपना दर्द. दिल्ली में लोग अपने मन की बात ज्यादा सुनाते हैं लेकिन दूसरे के दिल की नहीं सुनते. पता नहीं किस तरह चार साल सहन करते रहे बेचारे जी रमानाथ जी. अब जब अपनों के बीच पहुंचे तो दर्द छलक आया.बोले- टेक्स कट कर मुझे जो मिलता है वह तो एक मास्टर से भी कम है.

हमने कहा- वास्तव में है तो बहुत पीड़ाकारक कि कहने को तनख्वाह ५ लाभ और वास्तव में मिलें दो लाख. लोग पांच लाख के हिसाब से अपेक्षाएं करने लगते हैं जबकि आपकी औकात है मात्र २ लाख की. इससे अच्छा तो यह हो कि वेतन दो लाख बताओ और दो लाख ही दो. नाम बेचारे कोविंद जी का और जमा हो जाता है पीएम केयर्स में.

बोला- और दुःख की बात तो यह है कि रमानाथ जी ने मोदी जी पर विश्वास कर लिया और यह नहीं पूछा कि टेक्स कितना कटेगा. कटेगा या नहीं. हाथ में कितना वेतन आएगा. शाखा के पक्के और ईमानदार स्वयंसेवक ठहरे. मोदी जी की बात टाल नहीं सके. इससे तो वकील ही अच्छे थे. रसीद दो दस हजार की और लो दो लाख. 

हमने पूछा- तो अब रामनाथ जी क्या करेंगे ?

बोला- मुझे तो लगता है कहीं ज्यादा दुखी होकर इस्तीफा न दे दें. यदि ऐसा हुआ तो राष्ट्रपति के वेतन का भ्रम खुल जाने के बाद क्या पता कोई भला आदमी इस पद के लिए तैयार भी हो या नहीं. हो सकता है वेंकैया जी भी इसी तनाव से गुजर रहे हों और रमानाथ जी की तरह वे भी इस्तीफा दे दें. ऐसे में एक एक दिन में कृषि कानून जैसे राष्ट्र हित के अनेक बिल फटाफट कौन पास करेगा ? इसीलिए तो तुझे दिल्ली चलने को कह रहा हूँ. हो सकता यह जिम्मेदारी हमें ही संभालनी पड़े. हमारी पेंशन तीस-तीस हजार रूपए है और हम कोई टेक्स भी नहीं देते. और वैसे भी हमें कोई हीनभावना नहीं आएगी क्योंकि हम उस पद से रिटायर हुए हैं जिससे इस गरीब देश का राष्ट्रपति भी ईर्ष्या करता है. 


 
हमने कहा- लेकिन तोताराम, हम तत्काल नहीं चल सकते. घर में तो सारा दिन एक लुंगी में पंखा झलते काट देते हैं. अब पहले वाला ज़माना नहीं है जब हमने १९५५ में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू को पिलानी से एक एम्बेसडर कार में अपने गाँव चिड़ावा के रेलवे स्टेशन आते देखा था और फिर वहाँ से लोहारू-जयपुर वाली ट्रेन में लग कर आये विशेष डिब्बे में बैठकर नवलगढ़ के पोद्दार कॉलेज के स्वर्णजयंती समारोह की अध्यक्षता करने जाते देखा था.  आजकल के हिसाब से हमारे पास दिल्ली चलने के लिए वातानुकूलित स्पेशियल ट्रेन या आठ सौ करोड़ का विशेष प्लेन नहीं है. इस लू में यदि टें बोल गए तो कोई 'शववाहिनी गंगा' की तरह टीलों में फेंक देगा और कोई चौथा स्तम्भ इस खुशामदी समय में रिपोर्टिंग भी नहीं करेगा. या फिर कोई संवेदनशील पारुल खक्कर कविता लिखाकर बिना बात देशभक्तों की गलियों का निशाना बनेगी. 

बोला- तो क्या देश को ऐसे ही राम भरोसे छोड़ दें ?

हमने कहा- तो अब क्या किसी और के भरोसे चल रहा है ? हर मौके पर सरकार और सेवक 'राम कार्ड' ही तो खेल रहे हैं.

बोला- मास्टर, यदि यहाँ से दिल्ली के लिए सीधी कार कर लें और रात को ठण्ड-ठण्ड में चले चलें तो क्या तू तैयार है ?

हमने कहा- तब तो विचार किया जा सकता है. तब भी एक शर्त है कि भले ही हम राष्ट्रपति बन जाएँ लेकिन किसी मंदिर-मस्जिद के लिए कोई चंदा नहीं देंगे. आज राम मंदिर है, कल मथुरा का कृष्ण मंदिर, परसों काशी का विश्वनाथ मंदिर और इसी तरह तेंतीस करोड़ देवी-देवता हैं. किस किस को चन्दा देंगे. हमारी पेंशन तो मुल्ला जी की दाढ़ी की तरह ताबीजों में ही चली जायेगी. 


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Jul 24, 2021

फिक्स स्वयंवर


फिक्स स्वयंवर 



आज तोताराम आया तो उसकी चाल में एक विशेष प्रकार का गाम्भीर्य और राजसीपन था. लग रहा था जैसे वह जानबूझकर इतना संभलकर चल रहा है  मानों ज़रा सा भी कोई क़दम इधर-उधर हुआ तो कहीं धरती का संतुलन न बिगड़ जाए. आते ही बरामदे में बैठने से पहले ही बोला- अर्ज़ किया है.

हमने कहा- जिसको राष्ट्र को संबोधित करने या मन की बात करने की आदत पड़ जाती है वह किसी के दुःख-दर्द को नहीं सुनता. उसे तो बस, अपनी कहनी होती है और कहकर ही रहता है. सो तू हमारे मुकर्रर या इरशाद कहने का इंतज़ार थोड़े ही करेगा. कर डाल जो भी अर्ज़ करना है. 

तोताराम ने अर्ज़ किया-

यूना मिस्र ओ रोमाँ सब मिट गए जहाँ से 

कुछ बात है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी

हमने कहा- जो सिद्धान्तहीन, स्वाभिमानी नहीं होते, प्राण बचाने के लिए किसी के भी आगे समर्पण कर देते हैं वे हमेश बने रहते हैं जैसे तिलचट्टे, केंचुए आदि. खुद्दार लोग टूट जाते हैं लेकिन झुकते नहीं.  आँधी, बाढ़ और टूगान में बड़े पेड़ टूटते हैं, घास का कुछ नहीं बिगड़ता.

बोला- इस बहाने तू हमारे अब की बार दो सौ पार का नारा लगा कर दहाई पर ही अटक जाने का मज़ाक उड़ाना चाहता है और घास के बहाने 'तृण मूल'  को स्थापित करना चाहता है.

हमने कहा- तुम्हारे पास जादुई नेता है अबकी बार महाराष्ट्र में २८८ विधान सभा सीटों में से ३०० पार हो जाना. हम तो तेरे इस गर्वान्वित होने का रहस्य जानना चाहते हैं. 

बोला- दुनिया में आज भी महिलाओं की स्थिति ठीक नहीं है लेकिन हमारे यहाँ अब भी लड़कियों को इतनी स्वतंत्रता है कि वे स्वयंवर रचा सकती हैं.अपनी संस्कृति की महान परम्पराओं का निर्वाह कर सकती है, कल बिहार के सारण शहर में एक लड़की ने स्वयंवर रचाया और लड़के ने बाकायदा धनुष तोड़कर दुल्हन को जीता. 

हमने कहा- आजकल वीडियो वाइरल करवाकर चर्चा में आने और दो पैसे कमाने का चक्कर है. लोग उचित समय पर मरते हुए आदमी मदद करने की बजाय वीडियो बनाते रहते हैं. वैसे ही जैसे हीरोइनें अपने उत्तेजक फोटो इस्ताग्राम पर पोस्ट करके पैसे कमाती हैं. ये सब पूर्वनिर्धारित नाटक होते हैं.जैसे गुजरात के एक जोड़े ने चर्चित होने के लिए मोदी जी को खुश करने वाला शौचालय का नारा छपवाया और मोदी जी को शादी का कार्ड भेजकर बिना बात का कवरेज पा लिया. स्वयाम्वारों का पूर्व निर्धारित होना कोई आज की ही बात थोड़े है !

बोला- मतलब ?

हमने कहा- विश्वामित्र जी का तड़का को राम से मरवाकर राम को अयोध्या ले जाने की बजाय जनकपुरी ले जाना और वहाँ उस वाटिका के पास ठहराना जहां सीता रोज सुबह पुष्प लेने जाती थी. राम को भी वहीं पुष्प लेने के लिए भेजना, सब क्या तुम्हें पूर्वनिर्धारित नहीं लगता. सुभद्रा और अर्जुन के भागने में कृष्ण का हाथ नहीं था. आजकल भी दिल्ली में संसद से राष्ट्रपति भवन तक फोटोग्राफरों को लेकर नेताओं का पदयात्रा करना क्या कोई दांडी मार्च होता है ? जब वास्तविक दांडी मार्च हो रहा था, सामने डंडा, लाठी और बंदूक लिए सिपाही दिख रहे थे तब पता नहीं ये  वीर कहाँ छुपे हुए थे. ऐसे नाटक करने वाले सब 'माफ़ी वीर' हैं फिर चाहे वह अंग्रेजों से मांगनी हो या फिर इमरजेंसी में इंदिरा गाँधी से . ऐसे ही इन वीरों ने १९९७ में इण्डिया गेट पर स्वतंत्रता की स्वर्णजयंती पर बरसातियों और टोर्चों के लिए झगड़ा किया था.

सरयू तट पर दीये जालाने से और हेलिकोप्टर से रामलीला के राम-लक्ष्मण को बुलाकर उन्हें तिलक करने से रामराज नहीं आता . वह त्याग, मर्यादा और सुशासन से आता है. 

किसी देश की संस्कृति ऐसे नाटकों से विकसित नहीं होती. उसके मूल्यों की रक्षा के लिए बलिदान देना होता है.जैसे शरणागति की रक्षा के लिए रणथम्भौर के हम्मीर अलाउद्दीन खिलजी से लड़ते-लड़ते मारे गए थे. कल्पना कर यदि उस धनुष की जगह किसी ने मज़ाक में ही कोई मज़बूत सा धनुष रखवा दिया होता और उसे न तोड़ पाने की स्थिति में वह शादी केंसिल हो जाती ? कभी नहीं. 



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Jul 23, 2021

रामराज उर्फ़ ब्रह्मदत्त तकनीक

रामराज उर्फ़ ब्रह्मदत्त तकनीक 


आज जैसे ही तोताराम आया, हमने उसे सूचना दी- तोताराम, रामराज आ गया. 

बोला- तो क्या छुट्टी गया हुआ था ? 

हमने कहा- रामराज कभी छुट्टी पर नहीं जाता. वह कोई कर्मचारी थोड़े है. वह तो अच्छे शासन-प्रशासन का प्रतीक है. यदि सौभाग्य से कोई काम करने वाला भला जनसेवक आ जाता है तो लोगों को अनुभव होने लगता है. यदि कोई लफ्फाजी वाला ढपोरशंख आ जाए तो न कुछ बोलते बने, न सुनते. बस, झींकते रहो. 

बोला- तो फिर ऐसे क्या बोल रहा है जैसे रामराज कोई अपने एरिया का पोस्टमैन है जो छुट्टी से लौट आया है. शुद्ध तत्सम में बोल- रामराज्य आ गया. यदि रामराज्य आ गया तो गुजरात की कवयित्री पारुल खक्कर को बता जो गंगा में तिरते शवों को देखकर 'साहब' से व्यंग्यपूर्वक  कहती है कि आपके 'रामराज्य' में  गंगा शववाहिनी हो गई है. या फिर योगी जी को बता जो गंगा किनारे लाखों दीये जलाकर राम और उनके राज्य को ढूँढ़ रहे हैं.

हमने कहा- तोताराम, हम तो एक सामान्य सी बात कहना चाहते थे लेकिन तूने उसे बड़े-बड़े संदर्भो से जोड़ दिया.कल हम टीका लगवाने गए थे लेकिन लगा नहीं.

बोला- अकेले-अकेले भकोसने की फ़िराक में रहने वालों के साथ यही होता है. मुझे भी बुला लेता तो साथ-साथ चले चलते. 

हमने कहा- तू चलता तो भी हमारे देश के कर्मचारी नियम कायदे कानून के बहुत पक्के हैं. नियमविरुद्ध कुछ नहीं करते. इसीलिए तो कह रहा हूँ कि रामराज्य आ गया. राम के पूर्वज हरिश्चंद्र हुए हैं जिन्होंने श्मशान का टेक्स चुकाए बिना सगे बेटे का भी अंतिम संस्कार नहीं होने दिया. 

बोला- साफ-साफ बता हुआ क्या ?

हमने कहा- हमने पहला टीका ३ अप्रैल को लगवाया था और उसे ८४ दिन आज होते हैं.सो कर्मचारियों ने साफ़ कह दिया कि टीका किसी भी हालत में आज नहीं लगेगा. कल लगवा लेना. 

बोला- आज कहाँ से लगेगा. आज और कल तो छुट्टी है टीके वालों की. वैसे कानूनन वह भी ठीक ही था. कल मतलब आज के बाद जो वर्किंग डे आये तब.

हमने कहा- हमने तो उससे कहा था कि जब हमने लगवाया था तब तो चार हफ्ते के गैप की बात थी. अब तो ८४ में बीस घंटे ही तो कम हैं. लगा दो लेकिन नहीं माना. नियम की ऐसी पालना तो रामराज्य में ही होती होगी. 

बोला- यह कोई रामराज्य नहीं है. यह भी नाटक है. पहले तो टीका-उत्सव मना रहे थे और जब टीके कम पड़ गए तो चार की जगह १२ हफ्ते का गैप कर दिया. यदि अब भी टीके नहीं आते तो कह देते एक ही काफी है, दूसरे की ज़रूरत ही नहीं है. ये सब ब्रह्मदत्त जी शर्मा जी वाली तकनीक है.

हमने पूछा- टीकाकरण के इस काल में टीकों के अपव्यय और मितव्ययिता की बातें तो सुनने में आईं लेकिन यह ब्रह्मदत्त तकनीक क्या है ?

बोला- भूल गया अपने गाँव में म्युनिसिपैलिटी के नीचे वाली दुकान में बैठने वाले ब्रह्मदत्त जी शर्मा को जिनसे हम बचपन में जब तब पेट दर्द के बहाने चूरन लेने जाते थे.  वे खाने के बारे में पूछे जाने पर गरीब से दिखने वाले बच्चे से कहते थे कि जब, जो मिले खा लेना और ठीक-ठाक से दिखने वाले बच्चों को खाने के बारे दस पथ्य-परहेज बताते थे. तो टीकाकरण में भी सरकार का यही नियम है-

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय

जब टीका आ जाय तब टीका उत्सव होय 

मंथन का निष्कर्ष- पहले टीके की इम्यूनिटी कब तक रहती है ? जब तक दूसरा टीका न लग जाए.



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Jul 22, 2021

धन्यवाद.. थैंक्यू..शुक्रिया...

धन्यवाद.. थैंक्यू..शुक्रिया...


हम बरामदे में बैठे थे. तोताराम जैसे ही पास आया, हमने कहा- आ बैठ. 

बरामदे के कोने पर बैठते हुए बहुत विनम्रता से बोला- धन्यवाद.

हमने कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया. अभी चाय बनने में कुछ देर थी. हमने पूछा- पानी लेगा /

बोला- नहीं, धन्यवाद.

पत्नी चाय ले आई. चाय लेते हुए तोताराम बोला- शुक्रिया, भाभी जी.

हमने कहा- आज तो बड़ा लखनवी अंदाज़ में लग रहा है. कभी शुक्रिया, कभी धन्यवाद. क्या बात ?

बोला- आदरणीय, कृतज्ञता सभ्यता और संस्कृति का बहुत महत्त्वपूर्ण अंग होता है. इससे समाज के विकास का अनुमान लगाया जा सकता है. हमारी प्राचीन सभ्यता में तो हम भोजन से पहले ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के मन्त्र बोलते थे. नहाते थे तो नदियों के नाम लिया करते थे.सुबह-सुबह समस्त सृष्टि के कारणस्वरूप सूर्य को जल चढ़ा कर नमस्कार करते थे. चर्च के स्कूलों के होस्टलों में आज भी बच्चे भोजन से पहले ईश्वर का धन्यवाद करते हैं लेकिन आज आधुनिकता के चक्कर में हम किसी का भी, किसी भी अच्छे काम के लिए धन्यवाद करना तक भूल गए हैं. पानी के लिए पूछने के उत्तर में कम से कम इतनी कृतज्ञता प्रकट करना तो मेरा फ़र्ज़ बनता ही है. वरना कौन किसी को पानी तक के लिए भी पूछता है ?

इतने में संयोग से अखबार वाला भी आ गया. नियमानुसार चौक में फेंकने की बजाय उसने अखबार तोताराम को पकड़ा दिया. तोताराम ने अखबार लेते हुए अखबार वाले लड़के को भी 'थैंक यू' कहा.

हमने कहा- तोताराम, यह क्या चक्कर है. अंधभक्तों की तरह अनुपयुक्त स्थान और अवसर पर भी 'जय श्री राम' या 'मोदी-मोदी' चिल्लाने लगता है.

बोला- जब गंगा में लाशें तिर रही थीं तब तो तेरे जैसे सुधारक शववाहिनी गंगा चिल्लाने लगे लेकिन अब जब मोदी जी ने दुनिया में एक दिन में सबसे ज्यादा टीके लगवाने का रिकार्ड बना दिया तो तुम्हारे मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा है. 

हमने कहा- यह रिकार्ड भी एक नाटक है और वह 'टीका-उत्सव' भी एक बचकाना तमाशा था.अरे, जो काम करना है चुपचाप करते रहो. अमरीका ने फटाफट अपनी ४६% आबादी को दोनों टीके लगवा दिए और अपने यहाँ के ४% आबादी को लगे दोनों टीकों का रोज गाना गाते रहते हो ! एक किलो गेहूँ को दस लाख मिलीग्राम लिखने से वज़न नहीं बढ़ जाता.

बोला- ऐसा करने से जनता की हिम्मत बढ़ती है. यदि केंद्रीय विद्यालयों के बच्चों से परीक्षाएं निरस्त करने के लिए धन्यवाद दिलवाने के बहाने कृतज्ञता के संस्कार दिए गए उससे भी तुम जैसे लोगों को तकलीफ हो रही है ?  

 हमने कहा- तोताराम, शिक्षा-संस्कार और अश्लील तरीके से अपनी प्रशंसा करवाने में फर्क होता है. २१ जून को योग दिवस के साथ टीकों का रिकार्ड बनाना था और उससे पहले ही कोलेजों और विश्वविद्यालयों को आदेश दे दिए गये कि वे सबको मुफ्त टीका लगवाने के नाम पर मोदी जी को धन्यवाद देते हुए बड़े-बड़े बैनर लगवाएं. रिकार्ड बनने और टीके लगना शुरू होने से पहले ही 'धन्यवाद' की व्यवस्था !  धन्यवाद के चापलूसी भरे इस राष्ट्रीय अभियान में हम भी सोचते हैं कि समय पर सूर्योदय करवाने के लिए 'प्रधानमंत्री जी' को धन्यवाद देते हुए  एक बैनर बरामदे में लगवा ही दें. 

बोला- अति उत्तम. इसका तो १९७५ में मुम्बई के मिनर्वा सिनेमा हाल में 'शोले' के सीमेंटेड बैनर की तरह बनवा दे. न सूरज का उगना अनियमित होगा और न ही तेरे बैनर के अप्रासंगिक होने का खतरा. 

 



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Jul 21, 2021

पेगासस की पोल


पोल और पेगासस 


तोताराम कल नहीं आया. कारण पूछा तो बोला- ऐसे ही. 

हमने कहा- कहता है सत्संग के लिए आता हूँ, चाय तो बहाना है. और अब ? हमें सब पता है.जब आम हों और वे भी दसहरी, खाने की पूरी छूट तो फिर चाय का किसे ध्यान रहता है ? नाश्ते में भी आम और फिर लंच में भी आम. 

बोला- बात तो सच है लेकिन तुझे पता कैसे चला ?

हमने कहा- हमने तेरे फोन में पेगासस घुसवा दिया है.

बोला- यह हिबिस्कस जैसा क्या है ?

हमने कहा- इसी का कोई भाईबंद है खुसर-फुसर, फुस-फुस. जैसे किसी की खिड़की या दीवार से कान लगाकर उल्टा-सीधा कुछ भी सुन सुनाकर ले भागो.

बोला- तो अगर हम लोग ऐसा किसी नेता या बड़ी कंपनी के सी ई ओ के फ़ोनों में घुसा दें तो ?   

हमने कहा- यह बहुत महंगा काम है. दस लोगों के लिए साढ़े आठ करोड़ का खर्चा है.

वैसे उससे होगा भी क्या ? इनके फोन टेप किये बिना ही दुनिया जानती है कि ये क्या बात करते होंगे ? आपस में एक दूसरे को लाभान्वित करके रिश्वत का लेन-देन करते होंगे. इनके फोटो में दिखने वाली बॉडी लेंग्वेज से क्या सब पता नहीं चल जाता ? और जहां तक नेताओं की आपसी बात की बात है तो वह हेनरी किसिंगर और निक्सन की इंदिरा गाँधी के बारे में निजी और बाद में प्रकट हो गई राय से समझा जा सकता है. ये सब ऐसे ही टुच्चे और घटिया लोग होते हैं. आज भी बहुत से छुटभैय्यों की बातों से पता चल जाता है कि इनकी किस प्रकार की ट्रेनिंग होती है ? क्या है इनकी 'नैतिक बाइबिल' ?

बोला- सुना है अपनी सरकार ने भी चालीस पत्रकारों और कुछ नेताओं के फोन में ऐसा ही कुछ घुसवा दिया है. भीमा कोरेगाँव वालों के कम्प्यूटरों में भी सुना है इसीके द्वारा घुसपैठ की गई थी. इस प्रकार तो भारत का लोकतंत्र रवांडा और अज़रबैजान जैसे देशों की श्रेणी में आगया है.


हमने कहा- यह सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों का मुंह बंद करने के लिए ज़रूरी है.


बोला- लोकतंत्र में नीतियों का विरोध कोई पाप थोड़े ही है. 


हमने कहा- ज्यादा खिचखिच से त्वरित, निर्विघ्न और पूर्ण विकास में रुकावट आती है. इसलिए ऐसी खिचखिच को बंद करवाने के लिए ऐसा कुछ होना चाहिए.


बोला- लेकिन तूने यह इतना महँगा सिस्टम क्या मेरे आम खाने की जासूसी करने के लिए डलवाया है ?


हमने कहा- इतना महँगा काम हमारे बस का थोड़े है ? यह तो पेट्रोल-डीज़ल के दाम रोज बढ़ा सकने वालों के लिए संभव है. शाम को बंटी इधर से निकला था तो तेरे बारे में पूछा तो पता चला कि उसके ननिहाल से आमों की एक पेटी आई है और तू सुबह से आमों  पर पिला पड़ा है. 


बोला- वैसे हमारे देश को ऐसे किसी 'पोल पकड़ पेगासस' की ज़रूरत भी नहीं है. हम तो सूंघकर ही बता सकते हैं कि किसके यहाँ कल शाम को किसका छोंक लगा था ? कल किसने शाही पनीर खाया था ? किसके फ्रिज में किस जानवर का मांस रखा है ? कौन ऋषि हमारा इन्द्रासन झपटने के लिए तपस्या कर रहा है ?  दाढ़ी, पायजामे, टोपी, चोगे से ही 'चादर फादर' का पता लगा लेते हैं और तय कर लेते हैं ?  किस पर कैसे, कौनसी धारा लगवानी है ?  फोन टेप करने की क्या ज़रूरत है, पुलिस के द्वारा इक्कीसवीं शताब्दी में जन्मे युवक से उन्नीसवीं शताब्दी में मारे गए लिंकन की हत्या कबुलवा सकते हैं.


हमने कहा- और मान ले जिसकी जासूसी करें वह दो दिन बाद अपनी पार्टी में आ जाए तो इतना खर्च बेकार गया ना. ऐसे जीरो परसेंट इंटरेस्ट वाले इन्वेस्टमेंट से क्या फायदा ? यूएपीए, एनएसए और ईडी किस मर्ज़ की दावा हैं ? 


बोला - अपने वाले मंत्रियों के पीछे भी जो पेगासस लगा रखा है उसका क्या मतलब है ?


हमने कहा- राजनीति कहती है कि बाप का भी विश्वास मत करो. 








 



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