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Mar 1, 2012

जयराम रमेश - मोबाइल और लैंडलाइन

जयराम रमेश जी,
आपने १७ फरवरी २०१२ को संयुक्त राष्ट्र संघ के 'एशिया पेसिफिक आर्थिक एवं सामाजिक आयोग' के भारत की मेज़बानी में आयोजित सम्मलेन में सब को यह कहकर चौंका दिया कि भारत में महिलाओं का एक वर्ग शौचालय नहीं, मोबाइल फोन की माँग करता है । कुछ लोग हैं भारतीय राजनीति में जो अपने कामों की बजाय बयानों के लिए चर्चित रहते हैं, आप भी उनमें से एक हैं । आप झूठ थोड़े ही कह रहे होंगे । ज़रूर आप कारीगरों को लेकर भारत के गाँवों में गए होंगे शौचालय बनवाने के लिए, तभी न आपके पास इतनी पक्की और फस्ट हैंड जानकारी है ।

हमारे साथ भी एक बार ऐसा ही हुआ । हम खैर किसी को क्या देने लायक हैं फिर भी एक बार किसी भिखारी ने पता नहीं क्या देखकर एक रुपया माँगा, बोला साहब एक रुपया दे दो खाना खाना है । हमने कहा- भैया एक रुपए में तो एक इडली, एक फुल्का, एक गोलगप्पा या एक टॉफी भी नहीं आती, तुम एक रुपए में क्या खाना खाओगे ? दस-बीस रुपए माँगते तो भी कोई बात थी । वह थोड़ा मुस्कराया और बोला- साहब, बात तो आपकी ठीक ही है मगर माँगा भी तो सामने वाले की औकात देखकर ही जाता है, ना । तो साहब उसने हमें अपनी औकात बता दी । आपसे जिस भी ग्रामीण महिला ने फोन माँगा तो इसका भी कोई न कोई कारण रहा होगा ।

इसके कई कारण हो सकते हैं । इस पत्र में हम उन्हीं पर कुछ लिखेंगे जिससे हो सकता है आपकी दृष्टि इस बारे में कुछ साफ़ हो सके । वैसे सेवकों की दृष्टि तो साफ ही होती है । उन्हें तो अपना लक्ष्य हमेशा साफ दिखाई देता है । यह तो जनता ही है जिसे अँधेरे के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता । हो सकता है कि सरकार ठेकेदारों के थ्रू जो शौचालय बनवाती हो उनमें, जिसके यहाँ शौचालय बनवाया जाता हो, उससे भी हज़ार दो हज़ार रुपए लिए जाते हों । और यह तो सब जानते हैं कि उनमें सरकार के सब्सीडी देने के बाद कागज पर लगने वाले पाँच-चार हज़ार रुपए खर्च होने पर भी माल एक हज़ार रुपए का भी नहीं लगाया जाता होगा और वे इतने कच्चे बनते होंगे कि कभी भी धँस सकते हों । ऐसे में बताइए कौन पैसा खर्च करके खतरा मोल ले ।

एक बार राजीव गाँधी प्रधान मंत्री बनने के बाद भारत की खोज करने के लिए भारत के सभी आदिवासी इलाकों में गए । राजस्थान के एक सुदूर पश्चिमी जिले के लोगों से उन्होंने पूछा- आपको क्या परेशानी है । तो लोगों ने कहा- जी, आप तो ऐसा इंतजाम कर दीजिए कि यहाँ टी.वी. साफ़ दिखाई देने लग जाए । ऐसा तो हो नहीं सकता कि वहाँ टी.वी. के अलावा कोई समस्या हो ही नहीं । फिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा ? हमें लगता है कि जनता तब भी और अब तो और भी अधिक निराश है और उसे विश्वास नहीं है कि सरकार उनके लिए कुछ सार्थक कर सकती है । सो उसने उनसे दूरदर्शन और आपसे मोबाइल माँगा । अब देखिए ना कि खेतों में पानी नहीं पहुँचा मगर टी.वी. और मोबाइल पहुँच गए जो बाज़ार और सरकार दोनों के हथियार हैं ।

गाँव के लोग कुछ भी हो, होते बड़े स्वाभिमानी हैं । हो सकता है उसने आप से कुछ भी नहीं माँगा हो और अपनी बात व्यंजना या लक्षणा में कही हो । मोबाइल का मतलब चलता फिरता और लैंड लाइन का मतलब स्थाई-एक ही जगह पर पड़ा रहने वाला । घर में किसी बंद शौचालय में जाने का मतलब लैंड लाइन और खुले में कहीं भी जाने का मतलब मोबाइल हो । और फिर जब सारी दुनिया पी.सी. की जगह लेपटोप और लैंड लाइन की जगह मोबाइल ले रही है तो एक ग्रामीण महिला का अपने हिसाब से मोबाइल होने में क्या ऐतराज़ है ?

आपने भी कहा कि हम शौचालय बनवाते हैं पर उनका उपयोग नहीं किया जाता । सरकार के बनवाए शौचालय के बारे में हम आपको अपना एक अनुभव बताना चाहते हैं । बात किसी सुदूर या पिछड़े इलाके की नहीं है बल्कि राजधानी दिल्ली की है । कोई २५ वर्ष पुरानी बात है । एक बार रात भर यात्रा करके हम बस से पंतनगर से दिल्ली पहुँचे थे । सुबह का समय और बहुत जोर से हाज़त । आप जैसे बड़े लोगों के तो बुश साहब की तरह हर जगह मोबाइल शौचालय साथ चलता है मगर ऐसी स्थिति में एक साधारण आदमी की क्या हालत हो जाती होगी इसकी कल्पना भी आप नहीं कर सकते ।

उन दिनों सुलभ शौचालय का आविष्कार नहीं हुआ था । वैसे जिसके पास पाँच रुपए न हों तो उसके लिए तो आज भी हर शौचालय दुर्लभ है । सो साहब, किसी तरह जल्दी-जल्दी आई.एस.बी.टी. के सरकारी शौचालय तक पहुँचे । खुशी हुई कि कोई लंबी लाइन नहीं थी । मगर जैसे ही अंदर कदम रखा तो देखा कोई चार-पाँच इंच पानी भरा हुआ है । ऐसे में बैठना तो मुश्किल, सो किसी तरह कुर्सी बन कर बैठे । आपको पता होगा कि पहले स्कूलों में मास्टर मुर्गा बनाते थे और कुख्यात बालक को कुर्सी भी बना देते थे । यह कोई मंत्रियों की मज़े करने वाली कुसी नहीं होती थी । यह एक काल्पनिक कुर्सी होती थी । ऐसे झुको कि न तो बैठे और न खड़े । दस सेकंड में ही टाँगें काँपने लगती थी । पेंट खराब होने से तो यही बेहतर लगा कि कुछ भी हो, कुर्सी बनकर ही सही, इस भयंकर समस्या से तो निबटना ही है ।

अब आप लैंड लाइन और मोबाईल की तुलना कीजिए । लैंड लाइन आप जानते ही हैं कि अक्सर खराब रहता है । ठीक करने वाला भले ही बीस दिन बाद आए मगर किराया पूरे ३० दिन का लगता है । तो क्या फायदा ऐसे लैंड लाइन से । और मोबाइल तो मोबाइल है । जहाँ चाहे, जब चाहे निबटो । मोबाइल स्वतंत्रता का प्रतीक है और लैंड लाइन गुलामी का । किसी तरह स्वतंत्र हुई इस देश की जनता और विशेष रूप से ग्रामीण जनता और उसमें भी महिलाओं को, आप गुलाम बनाना चाहते हैं लैंड लाइन के चक्कर में ।

गुरुदेव ने कहा था- 'ज्ञान मुक्त हो जहाँ, प्राण मुक्त हो जहाँ । भारत को उसी स्वर्ग से तुम जागृत करो' और आप हैं कि मुक्त शौच तक पर प्रतिबन्ध लगा रहे हैं । आपने इसी प्रसंग में यह भी कहा था कि इसके पीछे कल्चरल कारण हो सकते हैं । कल्चर केवल ऊपरी दिखावा है । पश्चिमी कल्चर में कुछ तो ठण्ड के कारण और कुछ अपनी व्यक्तिवादी विचारधारा के कारण सब कुछ घर में ही निबटाने का चलन है । वैसे आपको पता है या नहीं मगर जब इंग्लैण्ड में प्लेग फैला था उसमें बहुत से लोग मर गए थे । उसका कारण यह था कि वहाँ घरों में खुले शौचालय थे जिनमें नालियों मे मल पड़ा रहता था । उनकी ढंग से सफाई नहीं होती थी । उसी गंदगी के कारण वहाँ प्लेग फैला था । वे हमें खुले में शौच करने के कारण जमीन पर हगने वाला काला आदमी कहते थे । यदि घर में शौचालय बनाते हैं तो उनकी सफाई की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए और आप जानते हैं पानी की भारत में, विशेष रूप से गाँवों में क्या हालत है ? और तो और संसद के 'वेल' तक में पानी की एक बूँद नहीं है ।

ग्रामीण महिलाओं के शौचालय की (लैंड लाइन) की बजाय खुले में (मोबाइल ) जाने को प्राथमिकता देने के और भी कई सांस्कृतिक कारण हैं । महिलाओं को शौच के बहाने ही बाहर जाने का मौका मिलता है अन्यथा घर के काम से ही फुर्सत नहीं मिलती है । यही उनका कोफ़ी हाउस है और यही उनका हेरिटेज सेंटर है । यही उनका कनाट प्लेस है । इसी समय वे स्वच्छ हवा में साँस ले सकती हैं । यहीं उन्हें अपने लोकतांत्रिक अधिकार मिलते हैं अन्यथा घरों में तो उनकी वही हालत रहती है जो कश्मीर में पंडितों की है ( यदि कोई अभी तक वहाँ बचा हो तो ) । यह मोबाइल ही तो उनका सशक्तीकरण है ।

जहाँ तक पुरुषों की बात है तो वे इसी लैंड लाइन के चक्कर में देर तक सोते रहते हैं । नहीं तो पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर एक दो किलोमीटर घूमते हुए शौच करके आते थे और रास्ते में कहीं कुँए पर हाथ मुँह धोकर, दातुन करते हुए घर पहुँचते थे । इसी बहाने आसपास के छोटे बड़ों से दर्शन मेला हो जाता था । आज हालत यह है कि सब कुछ घर में ही हो जाने के कारण लोगों का आपस में मिलना जुलना ही बंद हो गया है और यही मनुष्य की सामाजिकता कम होने का कारण है और इसी कारण, यदि किसी में मनमुटाव हो जाए तो फिर उसे मिटाने का मौका ही नहीं मिलता । पड़ोस में रह कर भी लोग अनजाने रहे आते हैं । और आप जानते ही हैं कि आजकल बूढ़े लोगों की कूल्हे की हड्डी इन्हीं लैंड लाइन शौचालयों में गिर कर टूटती है । मोबाइल शौचालय में ऐसी कोई समस्या कभी नहीं सुनी ।

और एक बात- हमने सुना है कि पश्चिम वाले लोग शौचालय में बैठकर पढ़ते हैं । अब इससे अधिक सरस्वती का अपमान और क्या होगा ? हमने तो अपने बचपन में बिना हाथ धोए कभी किताब को छुआ तक नहीं और यदि कभी ऐसे-वैसे हाथ या पैर लग गया तो सरस्वती से माफ़ी माँगते हुए किताब को माथे से छुआते थे । कम से कम खुले में जाने वाला किताब तो साथ नहीं ही ले जाएगा ।

वैसे आजकल गाँवों तक में ज़मीन नहीं बची है । वहाँ भी खेतों में प्लाट कट रहे हैं । कहीं ‘सेज़’ (SEZ) बिछ रही है । कहीं कोई देशी-विदेशी कंपनी कारखानों के लिए सरकार से मिलकर गावों में किसानों की ज़मीन कबाड़ रही है । तो अब अपने आप ही जो आप चाहते हैं वह होने वाला है । लोगों को चाहकर भी कहीं बाहर निकलने की जगह नहीं मिलेगी । जैसे कूरियर वालों ने पोस्ट ऑफिस और फोन ने पत्रों को आउट कर दिया वैसे ही महिलाओं की यह स्वतंत्रता ज्यादा नहीं चलने वाली है ।

खैर, ये तो हम अपनी आदतवश बातें बना रहे थे मगर आपको पता ही है कि कितने लोगों के पास घर हैं जहाँ वे शौचालय बनवाएँगे । और फिर जब खाने के ही लाले पड़े हुए हैं तो शौचालय में जाकर क्या चिंतन बैठक करेंगे ?

एक किस्सा सुनिए- एक व्यक्ति हकीम साहब के पास गया और कब्ज की शिकायत की । हकीम साहब ने उसे दवा दे दी मगर कुछ नहीं हुआ । दवा की मात्रा बढ़ती गई और हकीम साहब का अपने ज्ञान पर से विश्वास घटने लगा । अंत में उन्होंने उसे अपनी सबसे तेज दवा दे दी मगर फिर भी कुछ नहीं हुआ । इतने दिनों में मरीज और हकीम साहब की कुछ निकटता सी भी हो गई थी । हकीम साहब ने पूछा- मियाँ, तुम करते क्या हो ? मरीज ने कहा- हुज़ूर, मैं शायर हूँ । हकीम साहब चिल्लाए- लाहौल विला कुव्वत । पहले क्यों नहीं बताया कि तुम शायर हो । ये लो दस रुपए और कुछ खाओ । बिना खाए दस्त क्या ख़ाक लगेगा ।

सो हमें लगता है आप भी ऐसे लोगों के लिए शौचालय बनवाने के चक्कर में पड़े हैं जिनके पेट में कुछ है ही नहीं । मियाँ, ये सम्मलेन-वम्मेलन छोड़ो और यदि आपके हाथ में कुछ हो तो देश को कुपोषण और भुखमरी से बचाने का जुगाड़ करो ।

२०-२-२०१२

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Feb 29, 2012

खुराफात की जड़

मनमोहन पा’ जी,
सत् श्री अकाल । मार दिया पापड़ वाले को उस्ताद । हम तो समझे थे कि आप में दम ही नहीं है । आप कुछ भी कहते हैं तो उसी एक स्वर में कहते हैं जैसे कि डिक्टेशन लिखवा रहे हों । पता नहीं यह बात जिसके लिए हम आप पर कुर्बान हुए जा रहे हैं वह आपने किस लहज़े में कही है मगर बात है दमदार । मज़ा आ गया । अब आप जड़ की तरफ जा रहे हैं तो समस्या के हल की भी उम्मीद की जानी चाहिए । अपने तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के विरोध के पीछे अमरीका स्थित तीन एन.जी.ओ. का हाथ बताया है । अच्छा हुआ जो दिग्विजय सिंह जी इस समय यू.पी. में व्यस्त हैं । यदि थोड़ा सा भी ठाले हुए होते तो वे इसमें भी आर.एस.एस. का हाथ ढूँढ़ लेते । खैर ।

वैसे यह भी बताया गया है कि ये एन.जी.ओ. भोजन का लालच देकर लोगों को आन्दोलन में लाते हैं । तो यह तो देखिए भाईजान, लोकतंत्र में यह तो स्वाभाविक है । अपन भी तो चुनाव सभा में, जुलूस में पैसे देकर ही तो तथाकथित समर्थकों को लाते हैं । हमने आपको दक्षिण दिल्ली के लोकसभा के चुनावों में एक ट्रक में दिल्ली कैंट से पालम की तरफ जाते देखा था । गिनकर पाँच आदमी थे । आपने पैसा भी तो नहीं खर्चा । आजकल फ्री में क्या मिलता है ? ये कुडनकलम वाले तो केवल खाने के लालच में ही आते हैं । कश्मीर में भी तो पत्थर फेंकने के ही दो सौ रुपए रोज के लेते हैं । इसमें वैसे अपनी भी गलती तो है ही कि हमने जनता को इतना सस्ता बना दिया कि बिना सोचे समझे, केवल खाने के लिए ही किसी के भी साथ चल पड़ती है ।

आपके बयान के एक दिन बाद ही नारायणसामी जी ने उन सेवाभावी संस्थानों के चोगे को भी फाड़ दिया और बताया कि इन तीन संस्थानों को अमरीका और स्केंडिनेवियन देशों से पैसा मिलता है । इन संस्थानों की, बाहरी रूप से दिखावे के लिए, विकलांगों की मदद करना और कोढ़ उन्मूलन जैसी गतिविधियाँ हैं मगर ये इस देश और समाज के लिए खुद ही कोढ़ बनी हुई हैं । अंदरखाने परमाणु संयंत्र विरोध ही नहीं पता नहीं जाने क्या-क्या गतिविधियाँ चलाती हैं । ध्यान रहे, यह संयंत्र अमरीका के पुराने विरोधी रूस द्वारा लगाया जा रहा है ।

आप तो अमरीका में अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भी रहे हैं तो फिर अमरीका की कौन सी ‘मुद्रा’ आपसे छिपी होगी ? आपने तो उसे हर मुद्रा में देखा होगा । हम तो जो थोड़ा बहुत जानते हैं वह बस अखबारों में पढ़े तक ही सीमित है । उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि अमरीका किसी का दोस्त नहीं है । वह अपने मतलब का यार है । संयुक्त राष्ट्र संघ के थ्रू कश्मीर पाकिस्तान को नहीं सौंपा जा सका तो यह रूस की कृपा थी वरना तो अमरीका ने कोई कसर थोड़े ही छोड़ी थी । हालाँकि हम यह नहीं कहते कि रूस कोई परमार्थ कर रहा था । फिर भी यह तो विचारणीय है कि हमें किससे क्या फायदा या नुकसान हुआ ?

जहाँ तक विकास में सहयोग देने की बात है तो याद कीजिए कि मिस्र को आस्वान बाँध बना कर देने का समझौता करके भी अमरीका उसे टरकाता रहा और अंत में रूस से उसे बनाने का समझौता हुआ तो ऐसे ही कुछ संगठनों से विरोध करवाया गया कि इस बाँध की डूब में एक पुराना धार्मिक स्थान आ रहा है इसलिए यह बाँध नहीं बनाया जाना चाहिए । तब रूस ने अपनी उन्नत तकनीक से उस ढाँचे को बड़ी सावधानी से वैसे का वैसा उठा कर अन्यत्र स्थापित किया तो बाँध बना । स्वतंत्रता-प्राप्ति के तत्काल बाद नेहरू जी ने भारत में बड़े-बड़े आधारभूत उद्योग लगवाने की योजना बनाई जिसके तहत इस्पात के कई बड़े-बड़े कारखाने जैसे भिलाई, दुर्गापुर आदि कई विकसित देशों ने बनाए । अमरीका को भी इनमें से एक कारखाना बोकारो में लगाना था मगर इसमें भी इसने वही मिस्र वाला हथकंडा अपनाया और कई वर्षों तक अटकाए रखा । अंत में इसे भी रूस की सहायता से ही बनाया गया । तो ये दो उदहारण हैं अमरीका के दूसरे देशों के विकास में रुचि लेने के ।

वैसे यदि परमाणु ऊर्जा की बात करें तो हमें परमाणु ऊर्जा बेचकर धंधा करने वाले देशों के, अपने ही देश में, नए संयंत्र लगाने की योजनाएँ निरस्त कर दी गई हैं और पुरानी योजनाओं का कार्यकाल नहीं बढ़ाया जाएगा । जापान के परमाणु संयंत्र में रिसाव की घटना पुरानी नहीं है । रूस में भी ऐसी घटना चेरनोबिल में हो चुकी है ।

जहाँ तक सुरक्षा की बात है तो जापान से ज्यादा हम क्या कर सकेंगे । और फिर इन संयंत्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी तो लगाने वाले देशों की होगी फिर चाहे वह रूस हो या अमरीका हो । अमरीका की जेम्मेदारी का उदहारण है भोपाल की गैस दुखान्तिका । अमरीका में सबसे बड़ी रासायनिक दुर्घटना जब हुई थी उसमें ३०० लोग मरे गए थे । उसके बाद वहाँ ऐसे कारखाने लगाने बंद कर दिए गए । फिर विदेशी निवेश से उपकृत करने के नाम पर ऐसे कारखाने विकासशील देशों में लगाए जाने लगे जैसे भारत में यूनियन कार्बाइड । यूनियन कार्बाइड ने अपनी सुरक्षा जिम्मेदारी कैसे निभाई और उसमें हमारे जनसेवकों ने कैसी संवेदनशीलता दिखाई यह सब जानते हैं । एक मुख्य मंत्री के एंडरसन से व्यक्तिगत संबंध थे जिसके चलते ही एक एस.पी. और जिला कलेक्टर ने विशेष कार और फिर विशेष विमान द्वारा उसे दिल्ली पहुँचाया । जहाँ वह राष्ट्रपति से मिला और विधिवत विदा हुआ ।

अमरीका और उसके अन्य मित्र देशों के सहायता प्राप्त ऐसे संस्थान ऐसे आंदोलनों को ही मदद नहीं देते बल्कि वे संतों के वेश में विदेशी सहायता से और भी खतरनाक गतिविधियों में संलग्न हैं । क्या इस दृष्टि से भी इन संस्थानों पर नज़र रखी जाएगी ? इन पश्चिमी गोरे देशों से ही नहीं बल्कि इस्लामिक देशो से भी यहाँ ऐसे ही परोपकारी कार्यों के लिए सहायता आती है । इसलिए यह आवश्यक है कि विदेशों से आने वाले एक-एक डालर का हिसाब रखा जाना चाहिए । इनका भी बकायदा ऑडिट होना चाहिए और यदि इनके कोई धार्मिक संस्थान हैं तो वहाँ भी तिरुपति और वैष्णो देवी की तरह सरकारी ट्रस्ट क्यों नहीं बना दिए जाते जिनमें दूसरे धर्मों के या नास्तिक लोग भी बोर्ड में बैठें हो ? किसी खास तरह की धार्मिक शिक्षा यदि दी जानी ज़रूरी है तो उसे केवल धर्म तक ही रखा जाना चाहिए । ऐसे धार्मिक स्कूलों को किसी भी नौकरी के लिए मान्यता नहीं दी जानी चाहिए ।

और फिर यह भी तो सोचा जाना चाहिए कि क्या इनके देशों में विकलांग या कोढ़ी या अशिक्षित नहीं है जो ये दयालु, दानवीर इस देश में आते हैं या यहाँ के संगठनों को पैसा देते हैं । विदेशी पैसा ऐसी ही खुराफातें फ़ैलाने के लिए और भी बहुत सी संस्थाओं के पास आ रहा है । ऐसे विदेशी पैसे से कोई भी देश-हित का काम नहीं हो रहा है । या तो यह पैसा धर्मान्तरण के काम आता है या फिर आतंकवादी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने में काम आता है । सेवा और धर्म के नाम पर विदेशी पैसे से चलने वाली गतिविधियों के स्टाइल में फर्क हो सकता है । कोई दादागिरी से तो चुप्पम-चुप्पा मगर देश का कोई भला इनसे नहीं हो रहा है । क्या महाशक्ति बनने के दंभ भरने वाला देश के लिए, अपने लोगों को छोटी-मोटी सुविधा देना भी विदेशी कुधन के बिना संभव नहीं है ?

तुलसीदास जी ने कहा है- तुलसी देखि सुवेष भूलहिं मूढ़, न चतुर नर ।

सो प्राजी, इन विदेशी सहायता प्राप्त लंबे चोगे वाले संतों के वेश से चक्कर में मत आइए । रावण भी सीता के हरण के लिए साधु के वेश में ही आया था ।

अपनी चिरपरिचत शांत शैली में ही सही मगर हिम्मत करो भाई जान ! जो बोले सो निहाल, सतश्री अकाल । सो सतश्री अकाल बोल कर इस खुराफात की जड़ पर चला ही दीजिए कुल्हाड़ी । फिर देखिए कैसे तस्वीर बदलती है । हम जैसे भी हैं , आपके साथ हैं । बस, एक ही लफड़ा है कि क्या वोट बैंक की राजनीति, कुर्सी को खतरे में डाल कर, राष्ट्रहित के मंगलकारी मार्ग पर चलने देगी या नहीं ?

२५-२-२०१२
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नकद नारायण

प्रणव दादा,
नमस्कार । हालाँकि कुछ पत्रकारों ने आपके अगले राष्ट्रपति बनने के कयास उछाल दिए हैं पर हम उसके बारे में आपको यह पत्र नहीं लिख रहे हैं क्योंकि अब आपके लिए यह पद भी कोई बड़ा नहीं रहा गया है । आप वित्तमंत्री रहते हुए भी देश की अमूल्य सेवा कर रहे हैं ।

अभी आपने २० फरवरी २०१२ को ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स के ७० वें स्थापना दिवस पर गुडगाँव में कहा कि देश की जन कल्याणकारी योजनाओं में गरीबों को सब्सीडी देकर जो वस्तुएँ सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत वितरित की जाती है उसमें एक लाख करोड़ की वस्तुएँ वितरित करने में ६०-७० हज़ार करोड़ रुपए खर्च हो जाते हैं । सब्सीडी की यह राशि सीधे ही उन लोगों के बैंक खातों में भेज दी जाए तो फिर हर साल यह खर्चा नहीं लगेगा । हाँ, एक बार ज़रूर ऐसे इन्फ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने में ६०-७० हज़ार करोड़ रुपए लगेंगे मगर इस राशि की भरपाई एक साल में ही हो जाएगी । फिर तो हर साल या तो ६०-७० हज़ार करोड़ की बचत होगी या गरीबों को और ६०-७० हज़ार करोड़ सहायता के रूप में दिए जा सकेंगे ।

क्या गज़ब का आइडिया है उस्ताद ! एक पंथ दो काज नहीं, एक पंथ नौ काज समझो । बस, हमें तो यही चिंता है कि फिर बँटवारे के इस धंधे में लगे नेताओं और दलालों का क्या होगा ? हालाँकि ये चतुर लोग 'आप डाल-डाल हैं तो वे पात-पात' हैं फिर भी उनको अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में कुछ समय तो लगेगा ही ।

हमारा मानना है कि जब से दुनिया में राज-काज का विकास हुआ है तब से सारा झगड़ा बाँटने या वितरण का ही रहा है । लोग उत्पादन से ज्यादा वितरण या बाँटने में ही रुचि लेते हैं क्योंकि ' बाँटन वारे को लगे ज्यों मेहँदी को रंग' और सेवक कहलाते हैं मुफ्त में । बाँटने के इतिहास में सबसे प्रसिद्ध कहानी एक बंदर की है जिसे पहली-दूसरी के हर बच्चे को पढ़ाया जाता है मगर मज़े की बात है कि कोई इससे शिक्षा नहीं लेता और बार-बार उसी बंदर के पास जाता हैं बँटवारे के लिए और बंदर मज़े से आज तक सारी रोटी खाता आ रहा है । गोरे उपनिवेशवादियों ने तो सभी जगह जहाँ भी वे गए इसी 'बाँटो और राज करो' की नीति को अपनाया और मज़े किए । जब उपनिवेश खत्म होने लगे तो उन देशों को बाँट दिया, एक के चार देश बना दिए । अब उन्हें आपस में लड़ा कर हथियारों का धंधा करके खरबों कमा रहे हैं । उनसे स्वतंत्र हुए देशों के नेता भी अब उनकी ही तरह अपनी जनता को जाति-धर्म के नाम पर बाँट कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं ।

इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा है-

मुखिया मुख सो चाहिए खान पान को एक ।
पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक ॥
मगर कहाँ मिलते हैं ऐसे मुखिया ? लोग तो जब भी कुछ बाँटने का मौका मिलता है तो अंधे की तरह सारी रेवड़ी अपनों को ही बाँट देते हैं । और इन अपनों में कौन होते हैं- अपने ही परिवार के लोग । उनका पेट भरे तो किसी और का नंबर आए ना । अपनी जाति वाले तक टापते रह जाते हैं ।

खैर, अब आपकी यह योजना बहुत बढ़िया है । इससे हमें एक किस्सा याद आगया । हुआ यूँ कि मुर्गीखानों का निरीक्षण करने के लिए एक अधिकारी गया । उसने एक से पूछा- मुर्गियों को क्या खिलाते हो ? एक ने ज़वाब दिया- बाजरा । अधिकारी ने कहा- यह ठीक नहीं है । इससे मुर्गी को दस्त लग सकते हैं । फिर दूसरे से पूछा- तुम क्या खिलाते हो ? उसने कहा- ज्वार । अधिकारी ने उसको लताड़ा- इससे मुर्गी को कब्ज हो सकती है । तीसरा व्यक्ति सब देख सुन अनुभवी हो गया था । उसने कहा- साहब, मैं तो मुर्गी को कुछ नहीं खिलाता । सबको पाँच-पाँच रुपए दे देता हूँ । इनका जो मन होता है बाजार में जाकर खा आती हैं ।

तो आप भी अनुभवी हो गए हैं सो गरीबों को सब्सिडी देकर फ्री हो जाइए । उनकी मर्जी जो चाहें, जहाँ से चाहें लें और मौज करें । बाज़ार की जैसी मर्जी वैसा वह करे । आपकी तरफ से तो हो गया कल्याण । न कोई जाँच और न कोई घपला । और फिर नकद का मज़ा ही कुछ और है । तभी नकद को 'नारायण' कहा गया है । नारद शायद इसीको हर समय अपनी वीणा पर भजते रहते हैं । और भी कहा गया है- 'नौ नकद, न तेरह उधार' ।

अब सोचिए कि जब पहले सब्सीडी की चीजें दुकान पर खरीदने जाते थे तब कभी तो दुकान खुली नहीं मिलती थी, खुली होती थी तो सामान नहीं होता था, यदि सामान हुआ तो सड़ा गला होता था और तोल में भी कम । अब सीधा बैंक में पैसा पहुँच जाएगा । जब मर्जी हुई निकाल लिया । वरना पहले गेहूँ खरीदो, सिर पर उठा कर ले जाओ फिर किसी को कम भाव में बेचो और तब कहीं शाम को दारू की थैली का इंतज़ाम होता था । अब आप ही सोचिए इतने झंझटों के बाद क्या मज़ा रह जाता होगा पीने का ।

अब सीधे बैंक जाओ, पैसा निकालो, ठेके वाले के आगे फेंकों, थैली लो और मज़े करो ।

आप तो सब्सीडी की सारी वस्तुओं का ही नहीं बल्कि जननी सुरक्षा योजना, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या के हिसाब से मध्याह्न भोजन का पैसा, वृद्धावस्था पेंशन का पैसा, मुफ्त दवाओं की राशि और भी कुछ बनता हो तो उसका भी नकद पैसा सीधे बैंक में भिजवा दीजिए ।

जय नकद नारायण ।

और फिर उसके बाद तो दारू के ठेकेवाले बैंक के पास ही अपने आप ही दुकान लगा लेंगे और फिर सारा नहीं तो आधा पैसा तो आबकारी टेक्स के रूप में फिर सरकार के पहुँच ही जाएगा । वैसे जनता को इसी तरह भिखमंगा और बेवड़ा बनाए रखना ज़रूरी है । यदि इसे आत्मनिर्भर बना दिया गया तो फिर ये न तो किसी की सुनेंगे और न किसी का वोट बैंक बनेंगे । फिर नेता-राजा , युवराजों को कौन पूछेगा ।

नारायण, नारायण । बोल सच्ची सरकार की जय । सच्चे दरबार की जय ।

२४-२-२०१२

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Jan 14, 2012

सौदेबाजी की समझ


आदरणीय कलाम साहब,
आदाब । अखबार में आपका इंटरव्यू पढ़ा । आपने कहा कि यदि किसान समझदारी से सौदा कर सकें तो एफ. डी. आई. फायदेमंद हो सकती है मगर सौदा करने की समझ सभी में नहीं होती । सौदेबाजी के बारे में हमें अपनी माँ की एक बात याद आती है । उस समय के हमारे राजस्थान में लोग लकड़ियों में खाना पकाते थे । आजकल तो खैर पर्यावरण की रक्षा करने के चक्कर में सारे जंगल काट डाले गए । लकड़ी अनाज के भाव हो गई है । सर्दी में तापने के लिए सिगड़ी जलाने के लाले पड़ गए हैं । लकड़ी के कोयले तीस रुपए किलो हो गए हैं और बिजली का तो यह हाल है कि वह नेताओं के दर्शन की तरह दुर्लभ हो गई । और फिर हमारी हैसियत मुकेश अम्बानी की तरह तो है नहीं कि एक महिने में सत्तर लाख की बिजली फूँक सकें । सुना है सरकार ने जनता की सुरक्षा को दरकिनार करके परमाणु बिजली घर बनाने की ठान ली जब कि दुनिया के बहुत से उन्नतिशील देश परमाणु घरों को बंद करने की सोच रहे हैं । बिजली तो जिनको मिलनी हैं उन्हें ही मिलेगी । हाँ, कभी रेडियेशन हुआ तो ज़रूर ग़रीबों के हिस्से में भोपाल की गैस की तरह केवल मौत ही आ जाएगी ।

तो बात सौदेबजी की चल रही थी । उन दिनों किसान ऊँटों पर लकड़ी लाद कर बेचने के लिए आते थे । माँ ने एक लकड़ी वाले से मोल पूछा । वह उन लकड़ियों के पौने दो रुपए माँग रहा था । माँ को पौने दो रुपए ज्यादा लगे । उसने कहा- पौने दो रुपए तो नहीं देंगे यदि लेने हों तो दो रुपए दे सकते हैं । उसे क्या ऐतराज हो सकता था ? जैसे ही वह लकड़ी उतारने लगा, पिताजी आ गए । उन्होंने लकड़ी वाले को डाँटा और लकड़ी वापिस लदवा दीं । तो साहब भारतीय किसान की मोल भाव करने की क्षमता तो हमारी माँ की तरह है । वह बेचारे वालमार्ट और टारगेट से क्या खाकर मोल-भाव और सौदेबाजी करेगा ।

वह बेचारा पहले ही महँगी बिजली, महँगी खाद, बीज और कीटनाशक के चक्के में इतना खर्च कर चुका होता है कि उसे तो जल्दी से जल्दी अपनी फसल बेचने की फ़िक्र रहती है और इसी का फायदा बनिए, जमाखोर उठाते हैं । वही चीज यदि किसान दो महिने बाद लेने जाता है तो ड्योढे दामों में मिलती है । न किसान को फायदा और न ही उपभोक्ता को । बीच वाले मज़े करते हैं ।

आप सोच रहे होंगे कि बड़ी विदेशी दुकानें आने से उपभोक्ता को फायदा होगा । तो हो सकता है कि दो-चार प्रतिशत का फायदा शुरु-शुरु में हो जाए मगर अंत में ग्राहक जैसे अपने यहाँ के दुकानदारों की चालाकियों का शिकार होता है वैसे ही विदेशी दुकानदारों की चालाकी का शिकार होगा । अमरीका में इन्हीं बड़े-बड़े दुकानदारों का राज है । वहाँ भी हमने देखा है कि एक बार सेव की फसल बहुत अच्छी हुई । किसान पचास सेंट में सेव बेचने पर मज़बूर हो गया मगर दुकानों पर वही सेव दो डालर में बिक रहा था



एक बार इन्हीं बड़ी कंपनियों में से एक ने पंजाब में टमेटो कैचअप बनाने का कारखाना लगाने का प्रचार किया और कहा कि किसान टमाटर लगाएँ, उन्हें बहुत फायदा होगा । किसानों ने जम कर टमाटर लगाया और फिर कंपनी ने किसी बहाने से टमाटर खरीदने से मना कर दिया या कम ख़रीदा । गुस्साए किसानों ने टमाटर सड़कों पर फेंक दिया । इसी तरह से किसानों के मसीहा चरण सिंह के समय में भी ठीक भाव न मिलने पर किसानों ने गन्ना खेतों में ही जला दिया । कभी आपने किसानों के इस दर्द के बारे में सोचा है ?

हमारे शेखावाटी में प्याज बहुत होता है । हमें याद है कि एक किसान मंडी में प्याज बेचने गया । वहाँ भाव पूछने पर पता लगा कि उस प्याज से तो ट्रेक्टर का भाड़ा भी नहीं निकलेगा । वह वहाँ से खिसक लिया । ट्रेक्टर वाला वापिस उसके घर पहुँचा और भाड़ा वसूल लिया । ऐसी ही समझदारी की सौदेबाजी हमारे नेता भी करते हैं । जब कभी फसल अच्छी हो जाती है तो सस्ते भावों में निर्यात कर देते हैं और फिर वही गेहूँ महँगे भाव से आयात कर लेते हैं । यह तो आप ही जानें कि यह मूर्खता है या घोटाला मगर ऐसा एक नहीं, कई बार हुआ । चाहें तो शरद पवार जी से पूछ लें । साधारण किसान का तो यही हाल है । बड़े किसान-नेताओं के फार्म हाउसों में ज़रूर इतना अनाज होता है कि वे उससे सैंकडों करोड़ का काला धन सफ़ेद कर लेते हैं ।

और फिर साहब, किसान का काम तो कच्चा काम होता है । यदि सब्जी को औने-पौने भाव में न बेचे तो शाम तक वह फेंकने लायक हो जाती है । दूध भी वह कौनसा दस पाँच दिन रख सकता है । यह कोई टेलीविजन, मोबाइल, कम्प्यूटर या कार तो है नहीं कि आज नहीं तो छः महिने बाद बेच दी । कौन से चूहे खा जाएँगे या सड़ गल जाएँगे । और यदि किसान फसल का स्टोक भी करे तो कितने दिन । यह तो सरकार की ही क्षमता है कि वह करोड़ों रुपए का अनाज सड़ा दे । किसान को तो रोज कुँवा खोदना और रोज पानी पीना है ।

आप सोचते होंगे कि बड़े विदेशी दुकानदारों को बुलाने से बिचौलिए खत्म हो जाएँगे । हो सकता है कि कुछ कम हो जाएँ मगर उपभोक्ताओं को कोई खास फायदा नहीं होने वाला है । यदि ऐसा होता तो अमरीका के किसान की हालत अब तक सुधर गई होती । मगर ऐसा नहीं है । किसान तो किसान है चाहे भारत का हो या अमरीका का । गरीब को तो स्वर्ग में भी बेगार ही मिलती है । एक बेगारी दलित के परेशान होकर कुँए में कूदने का किस्सा तो आपको मालूम ही होगा । वहाँ कुँए में मेंढक उसके सिर पर सवार हो गया और कहने लगा- मुझे मुफ्त में कुँए की सैर करा ।

यदि आप किसानों का दर्द दूर करना चाहते हैं तो एफ. डी.आई. का समर्थन करने की बजाय किसान को समय पर अच्छा बीज, खाद और कीटनाशक दिलवाने का प्रबंध करवाएँ । मंडी से बिचौलियों को दूर करें, भण्डारण की सुविधा दिलवाएँ और राजनीति को किसानों के हितों से खेलने से रोकें । किसान की सौदेबाजी के चक्कर में मत डालिए । उसकी जान तो खेती करने में ही निकल जाती है । सौदेबाजी तो नेताओं और व्यापारियों के बस का काम है जो जब चाहें लोकतंत्र को बचाने के नाम पर मंत्री पद का सौदा करते हैं या सरकारी कारखानों को सस्ते में खरीद लेते हैं ।

हमें आपकी ईमानदारी और योग्यता पर पूरा विश्वास है । आप भारत को २०२० तक विकसित करने का सपना देखने वाले हैं । विदेशी कंपनियों को देश के सिर पर बैठाने से कुछ नहीं होने वाला । विदेशी कंपनियों के यहाँ आने का परिणाम इतिहास का साधारण विद्यार्थी भी जानता है । अमरीका की हालत किसी और ने नहीं बल्कि उसी की बड़ी कंम्पनियों ने खराब की है । जो अपने देश के नहीं हुए वे आपके कैसे हो जाएँगे ?

३०-१२-२०११

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May 4, 2011

बधाई हो, बुश साहब

( १ मई २०११ को आधी रात के बाद पाकिस्तान में अमरीकी कमांडो द्वारा ओसामा मारा गया )

बुश साहब,
बधाई हो । ओसामा मारा गया । अगर आप वाली स्पीड से काम किया जाता तो हो सकता है कि चालीस-पचास वर्ष और लग जाते । फिर तो किसी को कुछ करना ही नहीं पड़ता । दुष्ट अपने-आप ही अपनी स्वाभाविक मौत ही मर जाता । जैसे कि हम कसाब और अफज़ल गुरु के स्वाभाविक मौत मरने का इंतज़ार कर रहे हैं ।

अब यह समाचार हम आपको अपने ब्लॉग के द्वारा दे रहे हैं । पहले वाली बात तो रही नहीं जब हम आपको ओसामा के बारे में ताज़ा जानकारियाँ तत्काल हॉट लाइन से दिया करते थे । खैर, आपने तो ओसामा वाली नमाज़, रोज़े समेत, ओबामा के गले डाल दी थी । अब वह जाने और उसका काम । समझदार पूर्ववर्तियों का काम तो अपने उत्तराधिकारियों के लिए कुछ न कुछ ऐसी आफ़त छोड़कर जाना होता है कि बच्चू जब तक कुर्सी पर रहे सादर स्मरण करता रहे । एक चोर मरने लगा तो उसने अपने बेटे को बुलाकर कहा- बेटे, मैनें जीवन भर चोरी की है और लोगों की बद्दुआ ही पाई है । तू कोई ऐसा काम करना जिससे लोग श्रद्धा से याद करें । बेटा समझदार था सो उसने अपने पिता के नाम पर कोई अच्छा काम करने की बजाय लोगों के जूते, चप्पल और चड्डी, बनियान चुराने शुरु कर दिए । पहले तो चोरी से बड़े लोग ही दुःखी थे पर अब तो गरीब लोग भी परेशान हो गए और कहने लगे- इस साले से तो इसका बाप ही अच्छा था जो कम से कम हम ग़रीबों को तो परेशान नहीं करता था । सो भला आदमी कोई भी हो- क्या पूर्ववर्ती या उत्तरवर्ती, सब को अपने सत्कार्यों से धन्य करता है । वैसे हम यह व्यंग्य में कह रहे हैं कि आपने ओबामा को उलझा दिया । आप तो उसे एक ऐसा मुद्दा सौंप गए जिससे वह अपना दूसरा टर्म भी जीत जाए । भले ही ओबामा जी आपको ओसामा वाली समस्या छोड़ जाने के लिए धन्यवाद न दें पर हम आपके इस परोपकार को समझते हैं ।

वैसे आप सोच रहे होंगे कि हम आपको बधाई क्यों दे रहे हैं । आपने तो कुछ किया भी नहीं ओसामा को पकड़ने के लिए । यदि २००४ से २००८ के बीच पकड़ भी लेते तो क्या फायदा होने वाला था । दो टर्म से ज्यादा तो आपके यहाँ एक ही आदमी राष्ट्रपति बन नहीं सकता और आप दूसरी टर्म के लिए चुन ही लिए गए थे । क्यों बेकार सिर खपाना । फिर भी ओसामा दूसरी टर्म में चुने जाने के लिए आपके काम तो आया ही । इसी तरह ओसामा दूसरी टर्म के लिए ओबामा जी के भी काम आएगा । सो जितना ओसामा का उदय काम का था उसी तरह से उसका मरण भी काम का है – घटोत्कच की तरह । सो बधाई । जब भी २००० से २०१६ तक का अमरीकी राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा तो आपके और ओबामा के साथ ओसामा का भी नाम आएगा ही ।

आपको याद होगा कि जब आप ओसामा को पकड़ने की बात किया करते थे तब हम भी तरह-तरह के सात्त्विक और अहिंसात्मक उपाय बताकर आपको इस मामले में सहयोग दिया करते थे । भले ही अब ओसामा को मारने के लिए घोषित इनाम में से हमें कुछ भी दिलवाने के लिए आप ओबामा जी से हमारी सिफारिश न करें या ओबामा जी भी हमारी सेवाओं को मान्यता न दें पर जैसे हम आपको बधाई दे रहे हैं वैसे ही आप भी हमें ओसामा के मारे जाने पर बधाई तो दे ही सकते हैं यदि आप बधाई न देंगे तो भी हम बुरा नहीं मानेंगे क्योंकि- परोपकाराय सतां विभूतयः । दुनिया खुशी मना रही है, हमें भी इस पर बधाई देनी पड़ रही है जब कि हमारे अपने दो-दो ‘ओसामा’ तो हमारे घर में ही बैठे हैं और दो-चार पाकिस्तान में बैठे हैं । जब आप उन्हें पकड़ने में या मारने में हमारी मदद करेंगे तब हम मानेंगे कि आप और आपका देश वास्तव में आतंकवाद को बुरा समझता है । अपनी भूख, प्यास मिटाना और अपनी खुजली खुजाना तो पशु भी जानता है । भले ही चिदबरम जी या मनमोहन जी आपसे हमारे आतंकवाद को मिटाने में मदद की उम्मीद कर रहे हों पर हमें तो नहीं है । हम तो मानते हैं कि 'खुद मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता' ।

आपके पास अब तो समय ही समय है । इसलिए थोड़ा चिंतन कीजिए और सोचिए कि आतंकवाद पैदा ही क्यों होता है ? एक ओसामा को मारने में एक महाशक्ति को दस वर्ष लग गए तो अभी भी जाने कितनी ओसामा इस दुनिया में पड़े हैं । कब तक इन्हें इस तरह से शारीरिक रूप से मारने के लिए समय और पैसा बर्बाद करते रहेंगे ? कोई ऐसा उपाय नहीं है क्या कि ऐसे आतंकवादियों और कट्टरपंथियों को पैदा होने लायक हवा-पानी और खाद न मिले । सोचिए, फुर्सत से सोचिए, सोचने से ही मार्ग निकलेगा । और फिर आपके पीछे कौनसा अन्ना हजारे, रामदेव या २-जी स्पेक्ट्रम पड़ा है जो टेंशन के मारे सोच ही न पाएँ ।

२-५-२०११
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Feb 24, 2011

दोस्ती और उम्र


पवार साहब,
नमस्ते । आजकल तो आप वर्ल्ड कप के चक्कर में व्यस्त होंगे और अब लोग हैं कि उलटी-सीधी बातों से आपको परेशान किए हुए हैं- कभी दालें, कभी अनाज, कभी महँगाई और कुछ नहीं तो मिले तो प्याज को लेकर चिक-चिक । अब क्रिकेट सँभालें कि ये परचून । अब लोगों ने आपकी और शहीद उस्मान बलवा की दोस्ती को ही मुद्दा बना लिया । कल ११-२-२०११ को आपने ठीक ही कहा कि आप ७० के हैं और बलवा ३२ का । उम्र के इतने अंतर में दोस्ती कैसे हो सकती है ? यदि कोई बूढ़ा चाहे तो भी जवान लोग उस से दोस्ती नहीं करना चाहते । जवान एक सौ से ऊपर की स्पीड से मोटर साइकल या कार चलाते हैं और इस उम्र में अपना यह हाल है कि गर्दन गुगली की तरह हिलने लग रही है । पर लोग हैं कि कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं । शास्त्रों में कहा गया है कि - 'लायक ही सों कीजिए ब्याह, बैर और प्रीत' ।
आप शास्त्र के ज्ञाता है फिर हम तो यह नहीं मानते कि आप ऐसा बेमेल जोड़ मिलाएँगे ।

वैसे पशु, लम्पट, स्वार्थी लोग उम्र, योग्यता, विचार कुछ नहीं देखते । बहुत से खल-कामी अपने से आधी क्या चौथाई उम्र की लड़की फँसाने में भी शर्म नहीं करते । इटली के प्रधान मंत्री के किस्से तो आपने पढ़े ही होंगे । सत्रह साल की लड़की के साथ उनके चर्चे चल रहे हैं । कुख्यात उपन्यास 'लोलिता' में तो एक बूढ़े सज्जन एक किशोरी को फँसा कर भागे-भागे फिरते हैं । पशु को तो इतना भी भान नहीं रहता कि अमुक मादा उसकी खुद की ही बेटी है । स्वार्थ आदमी को अंधा कर देता है । अपने देश के ही एक नेता ने आपातकाल में अपने से अढ़ाई गुना कम उम्र के संजय गाँधी की चप्पल उठा कर उन्हें पहनाई थी । अभी माया बहन की सेंडिलें साफ करते हुए एक पुलिस अधिकारी का फोटो छपा ही है ।

हमारे एक बुजुर्ग मित्र हैं । कविता करते हैं । कवि सम्मेलनों में जाते हैं । अब उम्र के कारण लोग उन्हें कम बुलाने लगें हैं मगर ये अपने बेटे से भी कम उम्र के संयोजक/कवियों के घुटने छूकर कहते हैं- आदरणीय, ध्यान रखिएगा । वास्तव में रंडी, अभिनेता, मंचीय कवि और नेता कभी रिटायर नहीं होते । ये फ्री में भी सेवा करने के लिए तैयार रहते हैं । सेवा की लत जो लगी हुई होती है । सेवा से बड़ी खुजली और कोई नहीं होती । लम्पटता, रिश्वतखोरी और खुशामद कभी उम्र का बंधन नहीं मानती । अस्सी नब्बे का नेता भी चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहता है । सलमान रश्दी अब भी लड़कियाँ पटाने में लगे हैं । नारायण दत्त जी पता नहीं पितृत्त्व परीक्षण से डरकर या किसी पद की आस में भाजपा से नजदीकी बढ़ा रहे हैं । चौरासी साल की उम्र में हैदराबाद में राजभवन को ऐसा आबाद किया कि बर्बाद होकर देहरादून जाना पड़ा । करुणानिधि अगला चुनाव लड़ने के मूड में नज़र आ रहे हैं । फिल्म वाले सारे बाल उड़ जाने पर भी विग लगाकर जमें हुए हैं परदे पर ।

वैसे उम्र कम होने से कोई फर्क नहीं पड़ता । राम को कम उम्र और नाज़ुक देखकर जब जनक जी की पत्नी शंका करती हैं कि यह सुकुमार किशोर धनुष कैसे तोड़ सकेगा तो उनकी सहेली कहती कि देवी, तेजवंत को कभी छोटा मत समझो । मन्त्र, अंकुश छोटे होते हैं मगर बड़े-बड़ों को वश में कर लेते हैं । व्यक्ति तेजवंत मतलब कि काम का होना चाहिए । बलवा भले ही कम उम्र का है मगर है तो कोई ऊँची चीज ही वरना २जी स्पेक्ट्रम वाली टीम में कैसे शामिल होता ? राजा कौन से बुजुर्ग हैं ? व्यक्ति कर्मों से बड़ा होता है । कुछ लोग मरने को आ जाते हैं मगर बचपना नहीं छूटता ।

आप तो खैर उम्रदराज़ हैं, जिम्मेदार व्यक्ति हैं और फिर क्रिकेट जैसे राष्ट्रहित और लोक-कल्याणकारी कर्म से जुड़े हैं ।
आपको कहाँ फुर्सत ? और फिर क्रिकेट में क्या नहीं है ? जैसे क्रिकेटर हजारों लोगों के हल्ले की परवाह नहीं करते हुए खेलता रहता है उसी प्रकार आप तो लगे रहिए, मुन्ना भाई की तरह ।

१२-२-२०११
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महँगाई कम करने के लिए सुझाव


आदरणीय प्रणव दा,
नोमोस्कार । आपने बजट पूर्व बैठक में ‘सेबी’ और ‘इरडा’ के अध्यक्षों और रिज़र्व बैंक के गवर्नर से महँगाई कम करने के उपाय पूछे । पता नहीं, उन्होंने कुछ बताया या नहीं । इतनी छोटी सी बात के लिए क्या आप वास्तव में चिन्तित हैं ? या फिर जैसे बजट से पहले कुछ आर्थिक लोगों की बैठक करना एक रस्म अदायगी होती है और जब बैठक की है, इतना टी.ए., डी.ए. खर्च हुआ है तो कुछ पूछना भी चाहिए इसलिए पूछ लिया । हमें तो कहीं महँगाई दिखाई नहीं दी । फोन, दारू, फ़िल्में खूब चल रहे हैं । सेंसेक्स भी ठीक ही चल रहा है । जी.डी.पी. भी दहाई को छूने के लिए मचल रही है । स्विस बैंक में हमारा सबसे ज्यादा पैसा जमा है ! फिर चिंता किस बात की ? कहीं आप विपक्ष वालों के हल्ले से तो परेशान नहीं हैं ? इनका काम तो हल्ला मचाना है ही । इनके ज़माने में कौन सा सतयुग था । और जब आएँगे तब कौन सी फाड़ कर एक की दो कर देंगे । हमें याद है दिल्ली में साहिब सिंह के ज़माने में प्याज साठ रुपए बिका था आज से ग्यारह साल पहले । मतलब कि आज के सवा सौ रुपए । क्या उसके बाद भाजपा सत्ता में नहीं आई ? यह भारत की जनता है - पूरी पतिव्रता । इसके बस कोई विकल्प नहीं है । ज्यादा से ज्यादा एक बार किसी और को जिता कर फिर आपके पास झख मार कर आएगी । हमने तो कई मनोवैज्ञानिकों से सुना है कि जनता एक आदर्श पत्नी की तरह होती है जो पीटने वाले पति से ज्यादा प्यार करती है ।

खैर, हमें तो आपसे यही शिकायत है कि आप इस छोटी सी बात के लिए जाने किस-किस से पूछते रहे । हमें याद नहीं किया । आखिर हम किस दिन के लिए हैं ? वैसे आपने बजट की दिशा तय करने के लिए उद्योगपतियों से कंसल्ट कर ही लिया है और अमरीका से भी कुछ दिशा-निर्देश आ ही गए होंगे । अब भारत के इतने शुभ चिंतकों के होते हुए आपको चिंता होनी तो नहीं चाहिए । आपने हमसे कंसल्ट नहीं किया, हो सकता है कि आपने पत्र लिखा हो और हमारे पास नहीं पहुँचा हो क्योंकि आज कल डाक वाला मामला ऐसे ही चल रहा है । हमने एक पत्रिका का वार्षिक चंदा भेज रखा है मगर सात महिने से नहीं मिल रही है । संपादक को पूछते है तो वे कहते हैं कि उन्होंने तो भेज दी । पोस्टमैन से पूछते है तो कहता है कि आएगी तो हमें उसे क्या अपने घर पर रखना है ? पत्रिकाओं की तो रद्दी भी कोई नहीं खरीदता । पत्र नहीं पहुँचने की बात करते हैं तो लोग कहते है कि आजकल पत्र कौन लिखता है मोबाइल पर बात कर लो, लिफाफे से सस्ता पड़ेगा । अब क्या बताएँ ? जहाँ तक एस.एम.एस. करने की बात है तो न तो आपको एस.एम.एस. करना आता और न ही हमें, इसलिए हम अपने सुझाव ब्लॉग पर डाल रहे हैं । यदि आपको समय मिले तो पढ़ लीजिएगा । वैसे हम अपने पाठकों से भी आग्रह कर रहे हैं कि यदि वे पढ़ें तो सुझाव आप तक पहुँचा दें ।

वैसे यह खाने-पीने का विभाग है तो शरद पावर का मगर उन्हें तो वर्ल्ड कप की तैयारियों से फुर्सत नहीं होगी । होगी तो भी जब से क्रिकेट की सेवा करने लगे हैं तब से उनके मुखारविंद से गुगली के अलावा और कुछ निकलता ही नहीं । वैसे भी क्रिकेट में कहीं आम आदमी वाली महँगाई की समस्या आती नहीं । वहाँ तो कोकाकोला, दारू और चीयर लीडर्स ही साँस नहीं लेने
देते फिर प्याज, दाल और सब्जियों का नंबर कहाँ लगेगा ?

हमारे यहाँ महाराणा प्रताप नाम के व्यक्ति हुए हैं जिन्हें भाजपा वालों ने पकड़ रखा है इसलिए कांग्रेस ने विशेष ध्यान नहीं दिया मगर उन्होंने महँगाई से बचने का एक तरीका खोजा था । वे घास की रोटी खाकर अकबर से लड़े थे । १८९६-७ में एक भयंकर अकाल पड़ा था जिसमें ५० लाख से अधिक लोग मरे थे । तब कहते हैं, लोगों ने पेड़ों के छिलके तक खाए थे । घास तो उस अकाल में रही नहीं थी । आज भी कुछ लोग घास खाने को तैयार हैं मगर उसमें तो सारा रा.ज.द. घुसा पड़ा है । वैसे भी आम आदमी को किसी ने भी घास डालना बंद कर दिया है । कुछ लोग अन्य चीजें भी खाने की हिम्मत कर सकते हैं जैसे- यूरिया, अलकतरा, पेट्रोलियम आदि मगर उनमें भी नेता लोग घुसे पड़े हैं । कुछ गरीब लोगों ने कम्प्यूटर और मोबाइल को भी अच्छी तरह से खड़खड़ा कर देखा लिया, कोई भी खाद्य वस्तु नहीं निकली । अब हमें तो एक ही उपाय नज़र आता है मगर आप से उसकी चर्चा करते हुए डर लगता है कि कहीं आप हमें सिरफिरा न मान लें । एक पुराने कांग्रेसी और बाद में जनता पार्टी के शासन में प्रधान मंत्री हुए हैं भारत रत्न मोरार जी देसाई । उन्होंने एक सस्ता उपचार और जल समस्या का हल बताया था- शिवाम्बु-पान । जब वे प्रधान मंत्री थे तो कई लोगों ने उन्हें खुश करने के लिए घोषित कर दिया था कि वे भी इसका सेवन करते हैं और उन्हें इससे बहुत फायदा हुआ है । कुछ ने नाक भौं भी सिकोड़ी । मगर एक सिद्धांत तो था ही । और यदि इसी दर्शन को और आगे बढ़ाया जाए तो भोजन की समस्या भी सुलझ सकती है ।

इसके अलावा और कोई सस्ता और सुलभ उपाय नज़र आता नहीं है इस वैश्विक और उदारीकृत व्यवस्था में । यदि होता तो महान अर्थशास्त्री मनमोहन जी और मोंटेक सिंह जी हाथ खड़े नहीं करते ।

वैसे तो भारतीयों की रोटियाँ गिनने का काम कमलनाथ और कोंडालिजा राइस करती रही हैं फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपनी मर्जी से ही रोटियाँ गिन कर खाते हैं । ऐसे लोगों के लिए सुझाव दिया जा सकता है कि रोटियाँ इतनी पतली बनाई जाएँ जितनी कि सड़कों पर मसाले की परत डाली जाती है । गिनती तो पूरी हो जाएगी मगर आटा कम लगेगा और जहाँ तक पेट भरने की बात है तो पेट तो पापी होता है । आज तक भरा है क्या किसीका ?

हमें अपने बचपन के कई लोग याद हैं जो मितव्ययी थे जैसे हमारे एक प्रिंसिपल थे जो तारीख़ के कलेंडर के पुराने पन्ने रख लिया करते थे और उन्हें भी रफ काम में लिया करते थे । एक सज्जन थे जो बिजली बचाने के लिए घंटी न बजा कर मुँह से बजने वाली सीटी बजाया करते थे । हमारी नानी पानी का खर्चा बहुत कम करती थी । वे तसले में बैठ कर नहाती थीं और बचे हुए पानी से कपड़े धो लेती थीं और फिर भी बचे हुए उस पानी से गोबर थाप लेती थीं । हम भी अपने बचपन में जब लोटा लेकर दूर जंगल में दिशा-मैदान फिरने जाया करते थे तो एक ही लोटे में तीन-चार साथी निबट लिया करते थे । पर क्या बताएँ ऐसी मितव्ययिता करने वाले को पिछड़ा हुआ माना जाता है । और पिछड़ा हुआ कोई नहीं रहना चाहता । नौकरियों में आरक्षण के लिए पिछड़े वर्ग में शामिल किए जाने के लिए आन्दोलन करने की बात और है ।

बचपन में जब कपड़ा खरीदने जाते थे तो पिताजी दुकानदार को कहा करते थे कोई मैल-खोरा रंग दिखाओ जो ज्यादा गन्दा न हो । बच्चे धूल-मिट्टी में खेलते हैं । कितना धोएँगे । मगर वह बात साधारण आदमी की थी । उन्हें क्या पता था कि एक समय ऐसा आएगा जब नेताओं को ऐसे -ऐसे काम करने पड़ेंगे कि उन्हीं के कपड़े सबसे ज्यादा गंदे होंगे । साधारण आदमी का क्या है उसके कपड़े कैसे भी रहें कोई फर्क नहीं पड़ता मगर नेता को तो अंदर की गंदगी छुपाने के लिए सफ़ेद कपड़े चाहिए ही । यदि नेता लोग कपड़े गंदे होने वाले काम न करें तो भी साबुन की महँगाई कम हो सकती है । मगर उन्हें पैसे की क्या कमी है, सो कैसे भी काम करें, कपड़े तो हमेशा झकाझक ही मिलेंगे । 'दाग ढूँढते रह जाओगे' वाला साबुन उनके लिए ही तो बनाया जाता है ।

वैसे चलते-चलते पुराने लोगों की एक सीख बताते चलें कि जब भोजन कम पड़ता दिखाई दे तो सब्जी में मिर्च और पानी में बर्फ डलवा देनी चाहिए जिससे जब मुँह जलेगा तो खाने वाला खूब ठंडा पानी पिएगा और तात्कालिक रूप से भोजन की समस्या हल हो जाएगी । बाद की बाद में देखी जाएगी ।

२२-१-२०११
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Jan 24, 2011

'भारत-खोज' का निष्कर्ष

(सन्दर्भ- विकीलीक्स द्वारा दिसंबर २०१० के मध्य में उद्घाटित, राहुल गाँधी द्वारा अमरीकी राजदूत टिमथी को ९-१०-२००९ को लिखे विचार कि 'हिंदू आतंकवाद लश्कर-ए-तैयबा से भी बड़ा खतरा है' । )


प्रिय राहुल बाबा,
पहले हम आपको कभी अपने स्तर पर, और कभी मित्रों के आग्रह पर, शादी के बारे में जानने के लिए पत्र लिखा करते थे । मगर जब से आप 'भारत की खोज' के लिए निकले तब से हमने आपको पत्र लिखना बंद सा कर दिया था क्योंकि भारत की खोज ऐसा अनंत काम है जो कभी खत्म होने वाला नहीं है । उन दिनों तो आपको दाढ़ी बनाने का समय भी नहीं मिलता था । इतिहास में बहुत से लोग हुए जिन्होंने भारत को खोजने में सारी ज़िंदगी लगा दी । कुछ दिनों तो लगा कि अमुक ने भारत खोज लिया है मगर बाद में लोगों ने अपनी-अपनी शोध से यह सिद्ध कर दिया कि जिसे खोजा गया है, वह असली भारत नहीं है । । भारत तो यह है जो हमने खोजा है । कुछ दिनों बाद कोई और महापुरुष अपनी खोज से उसे गलत सिद्ध कर देता है । इस प्रकार भारत की खोज निरंतर चलती रहती है ।

कोलंबस भारत खोजने चला और पहुँच गया वर्तमान अमरीका के पूर्व में हैती द्वीपों में और उसी को भारत मान लिया गया । वह अपने साथ वहाँ के ताँबई रँग के कुछ लोगों को भी ले गया जिन्हें उसने रेड-इंडियन नाम दिया । कुछ लोगों ने विश्वास भी कर लिया मगर कुछ लोगों ने शंका भी की कि सिकंदर का मुकाबला करने वाले, उस समय भी बढ़िया इस्पात बनाने वाले, चीनी बनाने वाले, अष्टाध्यायी लिखने वाले पाणिनी के देश के निवासी ऐसे अधनंगे जंगली जैसे तो नहीं हो सकते । और इसकी पुष्टि तब हुई जब वास्को-डि-गामा वास्तव में भारत से लौट कर गया ।

आज भी इस भारत के बारे में कई विशेषण मिलते हैं- गाँधी का भारत, नेहरू का भारत, इंदिरा का भारत, शास्त्री जी का भारत आदि-आदि । उससे पहले के भी भारत हुए हैं- राम का भारत, कृष्ण का भारत, बुद्ध का भारत, चाणक्य का भारत आदि । जब हम कुछ खोजने जाते हैं तो यह तय है कि हमारे दिमाग में उस वस्तु का कोई स्वरूप होता है । उसी के आधार पर हम उसे ढूँढते हैं । यदि पहले से कोई पृष्ठभूमि नहीं हो तो आदमी खोजने जाए संतरा और उठा लाए गड़तुम्बा ( राजस्थान के रेतीले इलाकों में पाया जानेवाला एक कड़ुआ औषधीय फल ) । इसी तरह यह भी सच है कि इस बड़े काम में कोई दुराग्रह और लालच भी नहीं होना चाहिए । नहीं तो आदमी गुलाबजामुन के भरोसे मींगणे (ऊँट की विष्ठा, जो गुलाबजामुन की शक्ल की होती है ) खा जाता है । तो आपके दिमाग में भी भारत की खोज करते समय कुछ कल्पना तो रही ही होगी ही । अब वह कल्पना क्या थी, किसी को पता नहीं ।

भारत खोजने की योजना में आप सबसे पहले दलितों के घर जाकर खाना खाया करते थे । वैसे तो आप अपने कार्यक्रम को गुप्त ही रखते थे मगर फोटोग्राफरों को पता नहीं कैसे खबर लग जाती थी कि दूसरे दिन ही अखबारों में फोटो और समाचार आ जाते थे । और मजे की बात यह भी कि उस दलित के घर में आपको खिलाने के लिए सब्जी, परोसने के लिए थाली, और बैठने के लिए चारपाई और उस पर बिछाने के लिए चद्दर भी मिल जाती थी । हमारे यहाँ तो यदि कोई बिना बताए आ जाता है तो चाय पिलाने के लिए पत्ती मिल जाती है तो दूध नहीं मिलता और यदि ये दोनों मिल जाएँ तो चीनी नहीं । और यदि ये तीनों मिल जाएँ तो डालने के लिए ढंग का कोई कप नहीं मिलता । इसलिए हमने तो सब से कह रखा है कि यदि ढंग से चाय पीनी हो तो दो दिन का नोटिस देकर आया करो ।

इसके बाद आपने ब्रिटेन के विदेश मंत्री के साथ मिलकर भारत की खोज शुरु की । ठीक भी है, इस देश में बाहर से बहुत से लोग आए- शक, हूण, मुग़ल, तुर्क आदि मगर वे सब इस देश के हवा-पानी में घुल-मिल गए । लेकिन अंग्रेज आए, तीन सौ बरस इस देश में राज किया मगर उन्होंने कभी अपने को इस देश के हवा-पानी में अपने को घुलने-मिलने नहीं दिया । यहाँ का धन-संपत्ति, संसाधन सूँत कर अपने देश ले गए मगर वे कभी भी अपने को यहाँ का नहीं समझ पाए और स्वतंत्रता के बाद अपने देश चले गए । यूँ तो और भी राजाओं के राज्य बड़े थे मगर इस देश का सबसे बड़ा भूभाग जिस एक शासन के नीचे रहा वह अंग्रेजों का था । उन्होंने यहाँ अपनी शिक्षा पद्धति शुरु की । और इसी मायने में वे दूसरे शासकों से अलग थे । अपनी शिक्षा पद्धति और पाठ्यसामग्री में उन्होंने हमें जो पढ़ाया, वह किसी भी प्रकार से इस देश की आवश्यकताओं के अनुकूल नहीं था । इनसे पहले राजा कोई भी रहा मगर उसके राज्य की सारी प्रजा एक ही थी- धर्म, जाति के भेदों के बावज़ूद । इन अंग्रेजों ने अपना शासन सुदृढ़ करने के लिए प्रजा को धर्मों और जातियों में बाँटा, योजनाबद्ध तरीके से यहाँ के उद्योग-धंधों को नष्ट किया और एक धनवान देश को दरिद्र बना दिया । यहाँ की ग्रामस्वराज की आत्मनिर्भर व्यवस्था को नष्ट किया । और ‘फूट डालो, राज करो’ का खतरनाक सिद्धांत दिया ।

दुनिया में जहाँ-जहाँ भी गोरे लोगों के उपनिवेश रहे हैं वहाँ उन्होंने एक जैसी ही नीति अपनाई । जब भी उन्हें मज़बूरी में किसी देश को छोड़ना पड़ा तो उन्होंने उसके टुकड़े कर दिए । ऐसा भारत ही नहीं एशिया, अफ्रीका के सभी देशों में भी किया । मगर जर्मनी के दो टुकड़े वे अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं कर सके । आज भी यदि ध्यान से देखा जाए तो पता चलेगा कि दुनिया के सारे गोरे एक हैं । वे अब आपस में नहीं लड़ते बल्कि अन्य देशों को लड़ाकर अपने आर्थिक और सामरिक हित साधते हैं । पता नहीं, आपने भारत और अंग्रेजों के इस इतिहास के बारे में कुछ अध्ययन किया या नहीं । हमें लगता है, शायद नहीं, अन्यथा आप भारत की खोज में मिलिबैंड को नहीं हमारे जैसे किसी मास्टर को मार्गदर्शक बनाते । अब ऐसे मार्गदर्शन में आपने कौन सा भारत खोज निकाला पता नहीं, पर आजकल आप दीन-दुखियों के घरों में नहीं जा रहे हैं । हो सकता है कि भारत मिल गया । मगर इसके बाद आपने इन दिनों में जो बयान दिए हैं उनके आधार पर हमें लगता है कि आपने कोई और ही भारत खोज लिया है । यह वह भारत तो नहीं है जिसे हम जानते हैं और इतिहास मानता है ।

आपकी भारत की खोज का निष्कर्ष है कि 'हिंदू आतंकवाद लश्कर-ए-तैयबा से भी बड़ा खतरा है' । लगता है कि या तो हमें भारत का गलत इतिहास पढ़ाया गया है या फिर आपको । हमने जो इतिहास पढ़ा उसमें यह कहीं नहीं पढ़ा कि इस देश के राजा इस देश से बाहर गए हों और वहाँ जाकर कत्ले-आम मचाया हो और उस देश के लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन करवा दिया हो और उस देश की संपत्ति लूटकर यहाँ ले आए हों । जब कि आज के योरप की सारी समृद्धि का मूल आधार एशिया और अफ्रीका के देशों के धन और संसाधनों की सैंकडों वर्षों की निरंतर और निर्दय लूट है । यहाँ का तख्ते ताउस और कोहीनूर हीरा पता है आजकल कहाँ है ? ब्रिटेन के म्यूजियम में रखी प्राचीन मूर्तियाँ और अन्य दुर्लभ कलाकृतियाँ कहाँ की हैं ?

इस देश पर एक हज़ार वर्षों तक विदेशियों का शासन रहा है । क्या कोई देश इस दुनिया में हैं जिस पर इतने लंबे समय तक विदेशी शासन रहा हो और वहाँ के लोगों ने विद्रोह नहीं किया हो ? आज किस देश में बहुसंख्यकों के अलावा कितने राष्ट्रपति, शासक पार्टी के अध्यक्ष और मंत्री अल्पसंख्यक समुदाय के हैं ? किस मुस्लिम देश में हिंदुओं को इतने अधिकार हैं जितने यहाँ मुसलमानों को प्राप्त हैं ? किस देश में अल्पसंख्यकों की ( विशेषकर हिंदुओं की ) संख्या बढ़ी है ? बल्कि समाप्ति के कगार पर है । किस देश में अल्पसंख्यकों को तीर्थ यात्रा करने के लिए सरकारी सहायता और विशेष पैकेज दिया जाता है ? किस देश में बहुसंखय्क अपने ही देश में अल्पसंख्यकों द्वारा भगा दिए गए हों और उस पर न तो सरकार बोली हो और न ही बहुसंख्यकों ने कोई आन्दोलन किया हो ?

आपको एक उदाहारण बताते हैं, आपको शायद महत्त्वपूर्ण कामों में पढ़ने-सुनने का समय न मिला हो । पाकिस्तान का एक यूसुफ नामक व्यक्ति जर्मनी चला गया और वहाँ जाकर ईसाई बन गया । इसके बाद वह पाकिस्तान लौट आया तो उसे फिर से मुसलमान बनने के लिए बाध्य किया गया और न बनने की स्थिति में जान से मारने की धमकी दी गई क्योंकि इस्लाम में धर्म परिवर्तन की छूट नहीं है । उसे वापिस सुरक्षित जर्मनी ले जाने के लिए योरप के देशों ने मदद की नहीं तो क्या होता, कल्पना करना कठिन नहीं है ? यहाँ से कब कौन गया किसी दूसरे देश का धर्म परिवर्तन करवाने के लिए ? चीन, जापान, कम्बोडिया, लाओस, लंका, म्यांमार आदि में जो बौद्ध धर्म फैला है वह उन्होंने अपनी मर्जी से स्वीकार किया है । वैसे नहीं जैसे योरप, अफ्रीका, भारत में ईसाइयत और इस्लाम फैले हैं । क्या किसी भारतीय राजा ने 'जजिया' जैसा कर लगाया विधर्मियों पर ? आज भी जजिया कर हटाने वाले अकबर को कट्टर मुसलमान काफ़िर मानते हैं । उनके हिसाब से तो जजिया लगाने वाला, बाप को कैद करके और भाइयों को मारकर गद्दी पर बैठने वाला कट्टर औरंगजेब ही सच्चा मुसलमान है । राम ने तो जीतने के बाद किष्किन्धा का राज सुग्रीव को और लंका का राज विभीषण को दे दिया । कृष्ण ने भी कभी कंस, जरासंघ और शिशुपाल के राज पर कुदृष्टि नहीं डाली । पाकिस्तान में आज भी सुन्नी आतंकवादी शियाओं की हत्या कर रहे हैं । भारत के ही एक अभिन्न अंग में देश का झंडा फहराने और सुप्रीम कोर्ट से फाँसी की सज़ा पाए व्यक्ति को फाँसी दिए जाने पर जम्मू कश्मीर के नेता आग लग जाने की धमकी दे रहे हैं । क्या यही है इस देश के धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की उपलब्धि ? और क्यों ? क्या कभी अपने विचार किया ? आप को लोग भारत का भावी प्रधान मंत्री मानते हैं । क्या इसी भाव से आप इस देश का शासन चलाएँगे कि हिंदू आतंकवाद लश्कर-ए-तैयबा से बड़ा खतरा है । अब तक कितने हिंदू आतंकवादी घटनाओं में पकड़े गए हैं ? जब कि मुसलमान आतंकवादी यहाँ से लेकर ग्वांटेनामो तक की जेलों में बंद हैं ।

आज भी अधिकतर हिंदू शांत और ‘सर्व धर्म समभाव’ में विश्वास करने वाले हैं । यदि नहीं होते तो इस देश में इतनी शांति नहीं होती और न ही इतने वर्षों तक इस देश में मुस्लिमों और अंग्रेजों का शासन रह पाता । यदि कुछ हिंदुओं ने सरकार की छद्म धर्मनिरपेक्षता की नीति से कुढ़ कर कोई तथाकथित अतिवादी कदम उठाया है तो अभी तो उन्हें कोर्ट से सजा भी नहीं हुई है और फिर क्या इतने से हिंदू लश्कर-ए-तैयबा के तुल्य हो गए ? आप जैसे भावी प्रधानमंत्री और इतने उच्च राजनीतिक परिवार के सदस्य को तात्कालिक लाभ के लिए इतना अपरिपक्व बयान नहीं देना चाहिए । इतना बड़ा बयान उगलने के बाद निगला भी नहीं जा सकता । आप जिस भारतीय जनता पार्टी को काटने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं उस भारतीय जनता पार्टी को इस देश के बहुसंख्यक समाज ने विवादित ढाँचे को गिराने के कारण ही नकारा है । इससे बड़ा और क्या प्रमाण हो सकता है हिंदुओं के सहनशील, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील होने का ? विवादित ढांचे को ढहाने की जितनी निंदा यहाँ के हिंदुओं ने की है उसकी हजारवें हिस्से जितनी भी निंदा किसी भी देश के मुसलमान ने बामियान में बुद्ध की मूर्तियों को तोड़ने और पाकिस्तान में शियाओं पर हमले और तालिबानों द्वारा स्कूलों पर बम डालने और बुरका न पहनने पर किसी महिला नाक-काटने पर की है ?

इस देश की आत्मा को समझिए । दुनिया में यही एक संस्कृति है जो दिल से शांति में विश्वास करती है और कट्टर नहीं है । यदि यह समाप्त हो गई तो यह दुनिया और अधिक बर्बर और खतरनाक हो जाएगी, अनुकरण करने के लिए कोई आदर्श ही नहीं बचेगा । मिली बैंड के मार्गदर्शन में भारत को जानने की बजाय खुले दिमाग से इस देश के प्राचीन साहित्य, दर्शन और अध्यात्म का अध्ययन कीजिए तो आपको एक सम्यक दृष्टि मिलेगी । और यदि आपको किसी अर्जुन सिंह की दृष्टि से या पाकिस्तान की किसी टेक्स्ट बुक से भारत को जानना है तो बात और है । हम अब सत्तर के पेटे में चल रहे हैं, इसलिए कुछ नहीं कहा जा सकता है । कुछ समय निकाल कर हमारे साथ बिताइए । हम विश्वास दिलाते है कि आपको नुकसान नहीं होगा ।

और विकिलीक्स द्वारा उद्घाटित उक्त विचार आपने ९ अक्टूबर २००९ अमरीकी राजदूत टिमथी को ही क्यों लिखे ? उनसे बड़ा ज्ञानी और भारत का हितचिन्तक आपको और नहीं मिला ? क्या अमरीका के विश्व शांति, इस्लामी आतंकवाद और कश्मीर में उसकी भूमिका के बारे में आपको किसी भले आदमी ने कुछ नहीं बताया ?

१८-१२-२०१०

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Dec 20, 2010

हिंदू आतंकवाद


दिग्विजय सिंह जी,
चमचे और मीडिया वाले आपको प्यार से या पता नहीं, उल्लू बनाने के लिए 'दिग्गी-राजा' कहते हैं और आप भी अपने को राजा मानकर खुश हो लेते हैं, वैसे असलियत तो जो है वह है ही । हमें भी कुछ लोग बनाने के लिए प्रिंसिपल साहब कहते हैं जब कि हम भूतपूर्व वाइस प्रिंसिपल हैं । और वाइस प्रिंसिपल भी कैसे ? सारी ज़िंदगी पूरे दिन क्लासें पढ़ाते रहे, कापियाँ जाँचते रहे, हाज़री लेते रहे, फीस जमा करते रहे । केवल रिटायरमेंट से पहले एक साल के लिए इस पद पर स्थापित हुए । तब भी हमने तो प्रिंसिपल से कह दिया- बंधु, न तो हमें पैसे का हिसाब-किताब आता है और न ही प्रशासन । आप कहेंगे तो दो क्लास फालतू पढ़ा देंगे और फिर भी आप नहीं निभा सको तो वापिस लौट जाएँगे । बेचारे भले आदमी थे सो निभ गई । अब जब हमें कोई प्रिंसिपल कहता है तो हम यह सोच कर सावधान हो जाते हैं कि अब यह उल्लू बनाने वाला है सो तत्काल सुधार कर देते हैं कि हम प्रिंसिपल नहीं रहे ।

अब न आपके पास कोई जागीर है और न हमारे पास कोई अधिकार । हमारे पास तो खैर, कभी भी नहीं रहे । आपके पास तो दस साल तक मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्रित्व रहा हुआ है । अब दिल्ली में रह कर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए हिंदू आतंकवाद पर वक्तव्यों से दिग्विजय कर रहे हैं । गृहमंत्री के रूप में चिदंबरम ने सारे देश-दुनिया को देखकर भगवा आतंकवाद का आविष्कार किया और राहुल बाबा ने भी 'भारत की खोज' करने के बाद अमरीकी राजदूत को एक मन्त्र दिया कि इस देश को इस्लामिक आतंकवादी संगठनों की बजाय हिंदू कट्टरपंथी संगठनों से अधिक खतरा है जैसे कि इस्लामिक अतिवादी संगठन तो उनका हुक्म मानते हैं और इनके कहते ही अपनी गतिविधियां बंद कर देंगे ।

हम न तो कहीं के मुख्यमंत्री रहे, न गृहमंत्री हैं और न ही कभी भारत की खोज करने के लिए किसी प्लेन या हेलिकोप्टर का जुगाड़ हुआ, फिर भी नौकरी के दौरान कोई, गोडफादर न होने के कारण बहुत धक्के खाने पड़े हैं । इस चक्कर में हमने भी इस देश को थोड़ा बहुत देखा है । थोड़ा बहुत इतिहास भी पढ़ा है और इतिहास पढ़ने से अधिक उसके शोध में टाँग अड़ाई है और उसी के आधार पर कुछ चामत्कारिक मान्यताएँ स्थापित की हैं । उन्हीं मान्यताओं के आधार पर हम इस हिंदू आतंकवाद के बारे में कुछ कहना चाहते हैं ।

हमारा ख्याल है कि महमूद गज़नवी एक श्रद्धालु तीर्थयात्री था और वह मथुरा और सोमनाथ की यात्रा करने आया था और तीर्थयात्रा करके अपने देश चला गया था । इन मंदिरों के पुजारियों ने खुद ही मंदिर का खजाना चोरी कर लिया और उस बेचारे भले आदमी का नाम लगा दिया । वह तो अपने देश में बैठा था । अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए आ भी नहीं सका और अब तक इतिहास में यही पढ़ाया जा रहा है कि महमूद गज़नवी ने भारत पर आक्रमण किया और सोमनाथ और मथुरा के मंदिरों को लूट ले गया । पता नहीं, अर्जुन सिंह जी से इतिहास की किताबों में यह संशोधन करवाने से कैसे छूट गया । अब तो उनके दुबारा आने की संभावना नहीं है सो अब तो नए मंत्री की जिम्मेदारी है इस झूठ को ठीक करवाने की ।

शाहजहाँ के काल में आने वाले विदेशी पर्यटकों ने बीस करोड़ रुपए खर्च करके बीस साल में ताजमहल बनवाने जैसी छोटी-मोटी घटना का उल्लेख नहीं किया तो यहाँ के कुछ इतिहासकार कहने लगे कि शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया ही नहीं । उसने तो तेजोमहालय नामक एक शिव मंदिर को नया रूप देकर उसे ताजमहल नाम दे दिया । जब शिवाजी ने बघनखे से बेचारे अफज़ल खान को मारना चाहा तो उसने भी तलवार निकाल ली और लोगों ने इतिहास में लिख दिया कि अफज़ल खान शिवाजी को धोखे से मारना चाहता था ।

हमारा ख्याल है कि यह ओसामा भी कोई छद्म हिंदू ही है जो मुसलमान नाम से दुनिया में आतंक फैला कर इस्लाम को बदनाम कर रहा है वरना तो इस्लाम तो शांति और प्रेम का धर्म है । जो भी यहाँ आया प्रेम और शांति का सन्देश लेकर आया जैसे महमूद गज़नवी, मोहम्मद गौरी, बाबर, अहमद शाह अब्दाली, नादिर शाह आदि । और उसी प्रेम से प्रभावित होकर बहुत से हिंदू अपने क्रूर धर्म को छोड़कर मुसलमान बन गए तो इसमें किसका दोष ?

यदि अफगनिस्तान के मुसलमान मूर्ति-भंजक होते तो वे सैंकडों वर्ष पहले ही बामियान में बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ चुके होते । मगर ऐसा नहीं हुआ । दो हजार साल तक ये मूर्तियाँ सुरक्षित खड़ी रहीं । और अब २००० में ही ऐसा क्या हो गया कि ये मूर्तियाँ टूट गईं । इन्हें भी यहाँ के किसी हिंदू ने ही तोड़ा है । ज़रा सख्ती से जाँच करवाएँगे तो सच निकल आएगा । वैसे इसे मान लेने के लिए हमारी यह तर्कपूर्ण मान्यता ही काफी है ।

हमें तो लगता है कि गवांतेनामो की जेल में भी सारे हिंदू ही तो हैं जो मुसलमान नाम और रूप धर कर अमरीका में आतंकवाद फैला रहे थे । इनकी इस चालाकी से बिना बात ही इस्लाम बदनाम हो रहा है ।

कश्मीर के पंडित कश्मीर की सर्दी से बचने के लिए जलवायु परिवर्तन के लिए जम्मू और दिल्ली में आकर बस गए और मजे से सरकारी सहायता के पैसे से मौज कर रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्हें कश्मीर से निकाल दिया । जब कि कश्मीर में युवा बेचारे पत्थर फेंक कर दो सौ रुपए में किसी तरह से गुजर कर रहे हैं । आपने अफज़ल गुरु का फोटो देखा ? बेचारा कितना निरीह और डरा हुआ लगता है ? क्या ऐसा सीधा-सादा व्यक्ति कुछ ऐसा-वैसा कर सकता है ? हमें तो लगता है कि बेचारे को बिना बात फँसा दिया गया है । और फिर वह 'उस्ताद' नहीं 'गुरु' है और गुरु तो हिंदू होता है । हमारी संस्कृति में तो गुरु को भगवान का दर्जा दिया गया है और इस गुरु से ऐसा बर्ताव ?

और सारी बातों को छोड़ भी दें तो यह तो सत्य है कि इस्लाम तो केवल १५०० वर्ष पहले आया है इससे पहले तो इस देश में और इसके आसपास सारे हिंदू ही तो थे । इन सब के पूर्वज भी हिंदू ही थे । तो इस बात को मानने में क्या ऐतराज हो सकता है कि यह सारी खुराफात हिंदू ही कर रहे हैं ।

कुछ कट्टर हिंदुओं ने एक यह भी गलत मान्यता फैला रखी है कि फारस में इस्लाम के उदय के बाद अपने धर्म को बचाने के लिए अग्निपूजक पारसियों (राहुल बाबा के दादाजी के पूर्वज भी पारसी ही थे ) को भाग कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी । इसी तरह से अजमेर वाले ख्वाजा साहिब भी अपने आप को मध्य एशिया में एडजस्ट नहीं कर पाने के कारण अजमेर आ गए थे । राहुल बाबा को कह दीजिएगा कि ऐसी अफवाहों पर विश्वास नहीं करें ।

हमारे पास और भी ऐसी राष्ट्रीय एकता बढ़ाने वाली खोजें हैं । जब भी आप कहेंगे तभी उपलब्ध करवा देंगे । बस, आप तो हमारा नाम किसी राज्यपाल , किसी विश्विद्यालय के वाइस चांसलर, पी.एच.डी., राज्य सभा की सदस्यता या शांति पुरस्कार के लिए आगे बढ़वा दीजिए ।

धन्यवाद ।

१-१२-२०१०
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Nov 25, 2010

बुढ़ापे में परीक्षा

मनमोहन जी भाई साहब,
सत् श्री अकाल । यह ‘भाई साहब’ संबोधन आर.एस.एस. वाला नहीं है यह तो अपने डिपार्टमेंट वाला है क्योंकि आप भी मास्टर रहे और हमने भी जीवन भर राष्ट्र निर्माण ही किया । हुआ या नहीं या कितना हुआ यह तो भगवान जाने पर हमने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी । साठ के होते ही छुट्टी हो गई मगर तभी ऊपर स्वर्ग में सीट का निर्माण करने में जुट गए । कितना क्या हो पाएगा यह तो वहाँ जाकर पता चलेगा । आपको तो नौकरी से छुट्टी मिलते ही नरसिंह राव साहब ने पकड़ लिया और जोत दिया राष्ट्र निर्माण में । अच्छा भला अमरीका की तरह भारत का निर्माण करने में लगे हुए थे कि अब ये बी.जे.पी. वाले आपकी परीक्षा लेने पर उतर आए लेकिन अपने वाले बच्चे को नहीं देखते जो नक़ल करते पकड़ा गया । और परीक्षा भी ऐसी वैसी नहीं, हाईस्कूल वाली । आजकल इसे सेकेंडरी स्कूल परीक्षा कहते हैं । अपने जमाने में इसी को मेट्रिक भी कहा जाता था । तब यह बहुत बड़ी चीज हुआ करती थी । उस ज़माने में कहते हैं कि आठवीं पास भी मास्टर और यहाँ तक कि तहसीलदार बन जाया करता था । आजकल तो चपरासी बनने के लिए भी कम से कम दसवीं पास चाहिए । तभी दसवीं पास की कद्र भी चपरासी जितनी ही रह गई है ।

वैसे तो अध्यापन आपने भी किया है इसलिए परीक्षा पास करने के गुर जानते ही होंगे । पर बात यह है कि आपने कालेजों में पढ़ाया है और हमने स्कूल मास्टरी में ही जिंदगी गुजारी है सो जब २१ नवंबर के अखबार में पढ़ा कि आपको लग रहा है कि आप दसवीं की तरह एक के बाद एक टेस्ट दे रहे हैं तो सोचा कि क्यों न आपकी कुछ मदद की जाए । लोग तो तमाशा देख रहे हैं पर जो संकट के समय मदद करे वही सच्चा मित्र होता है-
धीरज, धरम, मित्र अरु नारी । आपत काल परखिए चारी । ।

तो एक सच्चे मित्र और शुभचिंतक की तरह से आपको सलाह दे रहे हैं । आशा है कुछ काम आएँगी ।

वैसे कई चीजें जो जवानी में इतना तकलीफ नहीं देतीं जितनी बुढ़ापे में, जैसे कि शादी, संतान, इश्क, परीक्षा आदि । अब सलमान रुश्दी को ही देख लीजिए, उमर साठ से ऊपर है मगर इश्क फरमाने से बाज़ नहीं आते । जवान और चालू औरतें आती हैं और उल्लू बनाकर खिसक लेती हैं । बुढ़ापे की औलाद ज्यादा लाड़-प्यार के कारण बिगड़ जाती है और बड़ी होकर बहुत दुःख देती है । वैसे आजकल तो छोटे बच्चों को भी कूट-पीट कर सुधारने का अधिकार नहीं रहा फिर जवान बेटा आप पर ही हाथ छोड़ दे तो क्या कर लेंगे । बुढ़ापे में शादी करने पर जवान पड़ोसियों का आना-जाना बढ़ जाता है और कहीं जाओ तो पीछे से चिंता लगी रहती है कि पता नहीं नई बीवी क्या गुल खिला रही होगी । बुढ़ापे की बीवी की फरमाइशें भी ज्यादा होती हैं । खुद को जवान दिखाने के लिए रोज़ बाल रँगने पड़ते हैं और अकड़ कर भी चलना पड़ता है जिससे कमर में दर्द होने लग जाता है । और बुढ़ापे में परीक्षा देना भी कम कष्ट का काम नहीं है ।

आपने तो लगातार ही सारी पढ़ाई और परीक्षाएँ निबटा दीं । हम तो बारहवीं पास करते ही मास्टर बन गए थे और फिर बी.ए., एम.ए. और बी.एड. सभी नौकरी करते हुए पास कीं । बी.ए. और एम.ए. तो खैर सत्ताईस बरस की उम्र तक निबटा दीं मगर बी.एड. काफी देर से की । हम जानते हैं कि कैसे, क्या नैया पार लगी । वैसे याद तो सब कर लेते थे मगर चूँकि लिखने का अभ्यास छूट गया था सो लगता था कि पेपर पूरा ही नहीं कर पाएँगे तीन घंटे में । अब आपको सतत्तर साल की उम्र में हाई स्कूल की परीक्षा देनी पड़ रही है । बात तो चिंता की है । एम.ए. में तो एक ही सब्जेक्ट होता है पर हाई स्कूल अर्थात मेट्रिक में तो पाँच-सात सब्जेक्ट होते हैं । इसीलिए पुराने लोग मेट्रिक को बहुत बड़ी चीज मानते थे । हमसे मास्टर बनने के बाद एक बार एक बुजुर्ग ने पूछा- कहाँ तक पढाई की रे छोरे ? हमने कहा- ताऊ. एम.ए. कर ली है । तो कहने लगे- ठीक है बेटा, अब हिम्मत करके मेट्रिक भी कर ले तो और भी अच्छी नौकरी मिल जाएगी । एक ही वाक्य में उन्होंने हमारी मेरिट से पास की एम.ए. की ऐसी-तैसी कर दी । अब कहाँ तो आपकी हार्वड या ओक्सफोर्ड की एम.ए. और डी.लिट. और कहाँ अब विपक्ष के चक्कर में मेट्रिक की परीक्षा ।

वैसे अब भी आपको कोई न कोई यूनिवर्सिटी पी.एच.डी. दे सकती है मगर ये उससे संतुष्ट होने वाले नहीं हैं । लाने को तो नकली सर्टिफिकेट भी लाया जा सकता है मगर ये स्विस बैंक की सूचना कबाड़ने वाले 'स्वामी' उस नकली सर्टिफिकेट का भी भंडा-फोड़ कर सकते हैं । एक ओपन स्कूल जैसी भी चीज आजकल चल निकली है जिसमें सुनते हैं बहुत नक़ल चलती है और परीक्षा में सारे सब्जेक्ट एक साथ पास होने का झंझट भी नहीं है । एक साल में एक सब्जेक्ट पास कर लो, वह आपका जमा हो जाएगा । इस तरह आप पाँच साल में भी मेट्रिक कर सकते हैं मगर विपक्ष वालों को तो इतना धैर्य नहीं है । वे तो अभी सर्टिफिकेट देखना चाहते हैं । इससे पहले भी हर साल रिपोर्ट कार्ड देखा करते थे ।

अपने जमाने में तो मास्टर लोग कुंजी लाने से मना करते थे मगर आजकल कई तरह की कुंजियाँ बाज़ार में आ गई हैं । मास्टर लोग खुद ही कुंजी से पढ़ाते हैं और कमीशन देने वाले प्रकाशक की कुंजी खुद बच्चों को रेफर करते हैं । कई तरह की पास बुक्स भी आजकल बाजार में आती हैं- ट्वंटी फोर आवर सीरीज, वन वीक सीरीज, स्योर शोट आदि । कई तरह के गेस पेपर भी आते हैं जिन्हें पेपर सेट करने वालों द्वारा छद्म नामों से छापा जाता है । कई स्कूल तो पास करवाने की गारंटी भी देते हैं । हम यह सब आप की काबिलियत पर शंका के कारण नहीं बल्कि शक्ति और समय बचाने की दृष्टि से कह रहे हैं । अब आपके पास इतना समय कहाँ ? देश का विकास करें कि पढाई करें या बुढ़ापे में इन बदमाश बच्चों को सँभालें । अब बच्चे तो बच्चे ही हैं ना ? सब्जी लाने के लिए पैसे दो और ये उसी पैसे में से चाकलेट खा जाएँ । ज्यादा बड़े हों तो सिनेमा देखने चले जाएँ या बीयर में ही सब्जी के पैसे लुटा आएँ । अब बाप घर सँभाले या बच्चों के पीछे घूमता रहे । एक बार जब हम बच्चे थे तो एक खेत में घुस कर चार काचर (ककड़ी) तोड़ लिए । चार थे हम लोग सो हमें तो उन चार काचरों में से एक ही हाथ लगा पर जब शिकायत पिताजी के पास पहुँची तो हमारी पिटाई पूरे चार काचरों जितनी हुई । अब एक नादान बच्चे ने १ लाख ७६ हजार करोड़ के दस काचर तोड़ लिए । शिकायत आपके पास है । अब आप भी क्या करें ? बच्चे ने दस काचर तोड़े मगर उसके हाथ तो केवल दस परसेंट ही लगे बाकी नब्बे परसेंट तो औरों ने ही खा लिए । अब आप बच्चे को उलटा भी लटका दें तो एक काचर से ज्यादा निकलने वाला नहीं । और वह भी पेट में से निकला काचर किस काम का बचा होगा ?


वैसे जहाँ तक परीक्षा की बात है तो उसमें अध्यापकों की कृपा भी बहुत काम आती है । विद्यार्थी को, कुछ भी न जानते हुए भी वे प्रेक्टिकल में पूरे नंबर दिलवा सकते हैं । और परीक्षा में भी नक़ल में मदद कर सकते हैं । आजकल मास्टर इस कृपा के बदले में ट्यूशन पढ़ने वालों को विशेष महत्व देते हैं । यदि सारे साल ट्यूशन न पढ़ सको तो मय ब्याज के पूरे साल की ट्यूशन फीस एक साथ दे दो तो भी मान जाते हैं । गुरु जी फीस न दे सकने वाले कुछ गरीब किन्तु घनघोर सेवाभावी शिष्यों पर भी अपनी कृपा दृष्टि रखते हैं ।

कुछ भी हो, आप पर तो टीचर मेडम की कृपा दृष्टि है ही सो नैया पार लग ही जाएगी । जल्दी से मेट्रिक पास करके इन विपक्षियों का मुँह बंद कर ही दीजिए ।

२३-११-२०१०

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Nov 1, 2010

मुशर्रफ पर फ़तवा


तलाल अकबर बुगती साहब,
आदाब । आपने १०-१०-१० को अपने वालिद के हत्या करवाने वाले और लाला मस्जिद पर हमला करवाने वाले मुशर्रफ की हत्या करवाने के लिए सुपारी की घोषणा की है । अच्छा दिन चुना है । इस दिन को लेकर लोगों में बड़ा क्रेज था । १०-१०-१० । तीनों दस । कई लोगों ने तो इसे शुभ दिन मानकर समय पूर्व ही बच्चों को ज़बरदस्ती जन्म दिलवा दिया । आपने भी इस 'वाजिब-उल-क़त्ल' के लिए यही शुभ दिन चुना । हमारे भविष्य में भी इस दिन के लिए आया था कि कहीं से धन की प्राप्ति होगी । सो हमें लगा कि आपके इस ऑफर में ही शायद हमारा धन-प्राप्ति का भविष्य छुपा हो । सो सोच रहे हैं कि हम आपकी यह सुपारी स्वीकार कर ही लें ।

हमें इस प्रकार की सुपारियाँ स्वीकार करने का पुराना अनुभव है । इससे पहले भी जब बुश साहब ने ओसामा के लिए सुपारी की घोषणा की थी तो हमने बुश साहब से इस बारे में पत्र व्यवहार किया था मगर उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया था । इसी प्रकार हमारे उत्तर प्रदेश के हज़ मंत्री जी ने भी मुहम्मद साहब का कार्टून बनाने वाले स्वीडिश चित्रकार का सर लाने वाले को एक बड़ी राशि और उसके वज़न के बराबर सोना देने की घोषणा की थी । हमने वह सुपारी भी स्वीकार कर ली थी मगर फिर वही किस्सा । उनका कोई उत्तर नहीं आया । अब आपका ऑफर प्रकाशित हुआ है । सो हम इसे भी स्वीकार कर रहे हैं ।


अब इतनी बड़ी डील है तो ऐसे ही तो स्वीकार नहीं की जा सकती । कुछ न कुछ तो तय करना ही पड़ेगा । वैसे हम तो भगवान में विश्वास करते हैं सो ऐसे लोगों का फैसला भगवान पर ही छोड़ देते हैं । जो जैसा करेगा वैसा भरेगा । मगर आप को न तो कानून पर भरोसा करते हैं और न ही भगवान पर । सो खुद ही फैसला करना चाह रहे हैं । ठीक भी है, जब आदमी को न्याय पर भरोसा नहीं रह जाता तो फिर वह खुद ही फैसला करता है । हमारे यहाँ भी नागपुर की एक अदालत में कुछ महिलाओं ने मिल कर बलात्कार के एक अपराधी हो कोर्ट परिसर में ही मार डाला क्योंकि वे जानती थीं कि कोर्ट कुछ नहीं कर पाएगा और अपराधी अपने धन बल पर छूट जाएगा । आप भी अपने देश के कानून के बारे में ऐसी ही राय रखते हैं ।

आप नेता हैं सो पैसे की तो कोई कमी नहीं है । मुहम्मद साहब का कार्टून बनाने वाले के लिए सुपारी देने वाले हमारे यहाँ के मंत्री ने कहा था कि वह यह राशि चंदे से जुटाएगा । और यह भी तय है कि चंदा करेगा तो खाएगा भी । ऐसे लोगों पर हमें तो भरोसा नहीं है । सो अच्छा ही हुआ कि उन्होंने हमें जवाब नहीं दिया वरना तो हम काम कर भी देते और फिर पैसों के लिए उनके पीछे-पीछे चक्कर काटते रहते । आप तो यह रकम अपने पास से ही देंगे । नकद देंगे या चेक से ? भारत के अलावा रुपया पाकिस्तान और नेपाल में भी चलता है और उनके रेट में भी फर्क है । आप जो एक अरब रुपया देंगे वह भारतीय रुपया होगा या पाकिस्तानी रुपया होगा ? अगर आप चेक से देंगे तो उसमें से हमारा तो तीस प्रतिशत तो टेक्स की कट जाएगा और आपको भी कोई फायदा नहीं होगा । यह रुपया यदि स्विस बैंक में जमा करा दिया जाए तो कैसा रहे ? वहाँ हमारा खाता खुलवाने का काम भी आप ही करेंगे क्योंकि हमें उस प्रक्रिया का कुछ भी पता नहीं है ।


इसके साथ ही आपने एक हज़ार एकड़ ज़मीन भी देने की बात कही है । सो आपके यहाँ उस इलाके में ज़मीन का क्या भाव चल रहा है ? यहाँ तो ज़मीन के भावों में आग लगी हुई है । यहाँ तो बहादुर शाह ज़फर जैसी हालत हो रही है । ‘कूए यार में दो गज ज़मीन खरीदने’ की भी हैसियत नहीं रह गई ही साधारण आदमी की । तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप ज़मीन की रकम भी केलकुलेट करके इस इनाम में नकद ही जोड़ दें क्योंकि जब ज़मीन होगी तो हमें उसे सँभालने के लिए पाकिस्तान आना पड़ेगा और पाकिस्तान की हालत तो आप जानते ही हैं । जब वहाँ सुन्नी लोग अपने शिया भाइयों को ही बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं, यहाँ से १९४७ में पाकिस्तान गए लोगों को आज तक भी मुहाजिर ही मान रहे हैं और उन पर हमले कर रहे हैं तो हमें वहाँ कौन जिंदा छोड़ेगा । यह कोई भारत तो है नहीं, जहाँ वोट बैंक के चक्कर में करोड़ों बंगलादेशियों को बसा लिया, उनके राशन कार्ड बनवा दिए गए । अब उनमें से कई तो एम.एल.ए.और एम.पी. तक बन गए हैं । यदि हम किसी तरह वहाँ रह भी गए तो साल छः महिने में मुसलमान बनने के लिए बाध्य किया जाएगा । जब हिंदू कश्मीर में ही नहीं रहने दिए गए तो पाकिस्तान में कौन रहने देगा ? और फिर साहब, बचपन की बात और है । अब इस उम्र में खतना करवाने से बड़ा डर लगता है । सो यह ज़मीन का चक्कर छोड़िये । नकद ही रखिए ।

वैसे मुशर्रफ के सर का आप करेंगे क्या ? इसकी खोपड़ी में तो खुराफात ही भरी हुई है । बुरे आदमी का तो नाम ही बुरा होता है । हमारे मोहल्ले में ब्राह्मणों की एक उपजाति है । कहते हैं कि वे जहाँ होते हैं वहाँ लड़ाई झगड़े ज़रूर होते हैं । इस लिए लोग उन्हें अपनी बारात में भी ले जाने से कतराते हैं । एक बार एक बारात में उस उपजाति का एक भी व्यक्ति बारात में नहीं था फिर भी बस रेत में फँस गई । दूल्हे के बाप ने पूछा- अरे, कोई उस जाति का तो नहीं है बरात में । एक आदमी ने कहा- जी, आदमी तो कोई नहीं है मगर मेरे पास उस जाति के एक आदमी का गमछा ज़रूर है । दूल्हे के बाप ने कहा- गमछा फेंक । हम तुझे दूसरा दिला देंगे । उसने गमछा फेंका तब कहीं जाकर बस चली । सो जनाब, यह महान आत्माओं का प्रभाव । जब एक गमछा ही इतना प्रभाव दिखा सकता है तो फिर आप तो मुशर्रफ का सर पाकिस्तान में मँगवा रहे हैं । आपके देश में पहले से ही बहुत सी पुण्यात्माएँ कल्याण करने में लगी हुईं हैं फिर यह नई आफत क्यों पाल रहे हैं । वैसे आप निश्चिन्त रहिए । वे अब पकिस्तान में नहीं आ पाएँगे क्योंकि उनको बाहर रखने में, आपसे ज्यादा रुचि, ज़रदारी को है ।

फिर भी आपको उसके सर से ही ज्यादा प्रेम है तो हमें क्या । शर्तों पर विचार करके शीघ्र लिखिएगा ।

१५-१०-२०१०
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हैप्पी दिवाली, ओबामा जी


ओबामा जी,
नमस्ते । इस बार आप दिवाली पर भारत में होंगे । धन्न भाग । आपसे पहले बुश साहब ने भी दिवाली की शुरुआत की थी मगर मेन व्हाईट हाउस में नहीं बल्कि उससे जुड़ी इमारत 'इंडियन ट्रीटी रूम' में । यह वैसे ही था जैसे हमारी भाभी लहुसन नहीं खातीं तो भाई साहब को लहसुन की चटनी स्टोव पर और अलग से रखे बर्तनों में बनानी पड़ती है, फिर भी हम तो इसी में धन्य हो गए थे । इसके बाद आपने १४ अक्टूबर २००९ को धन तेरस को व्हाईट हाउस के ईस्ट रूम में दीया जलाकर दिवाली मनाई और अब आप ७ नवंबर को मुम्बई में दिवाली मनाएँगे । वैसे बताते चलें कि वास्तव में दिवाली ५ नवंबर को है लेकिन अमरीका में त्यौहार अपने आसपास के संडे के हिसाब से मनाया जाता है । बिना बात एक कार्य दिवस का व्यापारी को नुकसान क्यों हो ? आपके यहाँ भारत मूल के कोई तीस लाख लोग हैं मगर एक दिन के लिए भी दिवाली की छुट्टी नहीं होती । हमारे यहाँ की बात और है । यहाँ तो क्रिसमस की छुट्टी २५ दिसंबर को ही होती है । किसी आसपास के संडे पर नहीं टरकाया जाता । स्कूलों में तो कम से कम एक हफ्ते की छुट्टियाँ होती हैं । कुछ भी हो, आपका आना खुशी की बात तो है ही । और कहें तो खुशी से मर जाने का दिन है ।

दरअसल बात यह है कि इस देश को एक हज़ार साल से विभिन्न आक्रमणकारियों के जूते खाने का दारुण अनुभव है सो यह ज़रा सी सहानुभूति और आदर से ही गदगदायमान हो जाता है । भले ही भारत में हिंदी की दुर्गति हो रही हो मगर जब एक अंतरिक्ष यान में कई देशों के साथ भारत का भी झंडा और हिदी में लिखे दो शब्द चन्द्रमा पर भेजे गए तो हम बल्लियों उछले थे । जब आप चुनाव लड़ रहे थे तो लोग खबर उड़ा लाए कि आप हनुमान जी के भक्त हैं क्योंकि आपके हाथ में जो ब्रेसलेट है उसमें एक बंदर की शक्ल जैसी कोई चीज है । इससे उत्साहित होकर एक हनुमान-भक्त ने आपको हनुमान जी की सोने का पानी चढ़ी एक मूर्ति भी भिजवा दी थी । अब यह पता नहीं कि वह आप तक पहुँची या नहीं ।

तो आप ऐन दिवाली के दिन नहीं भी तो उसके आसपास आ रहे हैं, यही बहुत है । दिवाली के बाद महाजन नई बही शुरु करते हैं । अच्छा है - नई बही और दस बीस हज़ार करोड़ के सौदे से शुरुआत । आपसे पहले हमारे पुराने राजा ब्रिटेन के प्रधान मंत्री कैमरून साहब भी आए थे और तीन हज़ार करोड़ का सौदा कर गए । और इस सौदे से पहले दो चार अच्छी-अच्छी बातें करनी थीं सो वे भी कीं । अच्छी बातें मतलब कि भारत से 'पाकिस्तान नामक बीमारी' के बारे में सहानुभूति दिखाना । वैसे सौदा करके यहाँ से ब्रिटेन पहुँचते ही ज़रदारी का स्वागत बड़े जोश-ओ-खरोश से किया और थूक कर चाटने जैसा एक बयान दे दिया क्योंकि धंधा तो उसके साथ भी करना है । सुनार को ग्राहक और चोर दोनों का ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि चोर से चोरी का सोना सस्ते में खरीदना है और ग्राहक को खोट मिलाकर मार्केट रेट पर बेचना है । उसके लिए तो दोनों ही महत्वपूर्ण हैं । कैमरून से पहले, जब ब्लेयर प्रधान मंत्री थे तब वे भी आए थे और चार हजार करोड़ का सौदा कर गए थे ।

आपके बाद छः दिसंबर को फ़्रांस के राष्ट्रपति आ रहे हैं । उन्हें भी कोई न कोई सौदा पटाना है । फिर आएँगे दिसंबर मध्य में रूस के राष्ट्रपति । वे भी कोई न कोई सौदा करके ही जाएँगे । दिसंबर में ही चीन के प्रधान मंत्री को भी बुलाने की कोशिश हो रही है क्योंकि वह भी जब-तब छेड़-छाड़ करता रहता है सो उसे भी कहना है कि भाई, क्यों ज्यादा परेशान कर रहा है ? तू भी दो-पाँच हजार करोड़ का माल हमें टिका दे । वैसे भी चीन का घटिया माल इस देश में चोरी छुपे और खुले भी आ ही रहा है । अब कोई विदेशी माल का बहिष्कार करके स्वदेशी आन्दोलन तो गाँधी की तरह चलाना नहीं है । सस्ते माल में मुनाफा ज्यादा होता है । और व्यापारी को मुनाफे से मतलब है फिर चाहे वह अमरीका का हो या भारत का । देश का क्या है ?

सो आप भी सौदा करने आ रहे है । पहले जब शीत युद्ध का ज़माना था तब अमरीका का कोई भी राष्ट्रपति न तो भारत की इतनी मुँहदेखी बड़ाई करता था और न ही इतनी जल्दी-जल्दी भारत आता था क्योंकि तब भारत रूस से हथियार खरीदता था । तब भी हमें इसलिए हथियार खरीदने पड़ते थे क्योंकि आप पकिस्तान को मुफ्त में या सस्ते में हथियार दिया करते थे । वैसे अब भी आपने कौनसा उसे हथियार देना बंद कर दिया । उसे देंगे तो हमें भी शक्ति संतुलन के नाम पर हथियार खरीदने ही पड़ेंगे । अब यही तो तरीका बच गया है, दुनिया में अपने उपनिवेश बनाकर शोषण करने वाले गोरों के लिए, अपनी आमदनी बनाए रखने का । वैसे सभी जानते हैं कि इन देशों को हथियारों से ज्यादा औजारों और मितव्ययी होने की ज़रूरत है ।

राजस्थानी में एक कहावत है- ‘गाँव बावळी नै बदै ना और बावळी गाँव नै बदै ना' मतलब कि पगली की गाँव नहीं सुनता और पगली गाँव की नहीं सुनती । सो हमारी भी कोई नहीं सुनेगा क्योंकि सबको अपने-अपने धंधे से मतलब है मगर क्या बताएँ, हम भी आदत से मजबूर हैं । तो आप आ रहे हैं और अखबार आपकी भव्यता का आतंक फैलाने वाली खबरें छाप कर गौरवान्वित हो रहे हैं । अखबारों का क्या है ? वे तो मोनिका लेवेंस्की, ब्रिटनी और लेडी गागा सभी की चड्डी-चोलियों को उसी भक्ति भाव से छापते हैं जिस तत्परता से होली-दिवाली के विज्ञापनी परिशिष्ट । जब मंदिर ही प्रसाद और दर्शन कराने का धंधा करते हैं, तथाकथित संत टिकट लगाकर योग सिखाते हैं या च्यवनप्राश बेचते हैं तो फिर मीडिया में तो सेठों का अरबों रुपया लगा है । वह समाज सुधार के लिए है क्या ? दो पैसे कमाने के लिए है । और सेक्स, सनसनी और अजूबे बेचने से अच्छा और सुरक्षित कुछ नहीं हो सकता ।

मिडिया छाप रहा है कि आप जिस कमरे में ठहरेंगे, उस कमरे में मैडम के लिए विदेशों से मँगवा कर सौंदर्य प्रसाधन रखे गए हैं और आपके लिए विशेष शराबें रखी गई हैं जिनके एक गिलास की कीमत ३००० हज़ार रुपए है । वैसे हमने कुछ दिन पहले एक समाचार पढ़ा था कि व्हिस्की की एक बोतल दो करोड़ में नीलाम हुई है । हमारे यहाँ भी गाज़ियाबाद में दिवाली पर भ्रष्टों द्वारा भ्रष्टों को उपहार में दिए जाने के लिए चाँदी की बोतल में पेक की गई ७५० मिलीलीटर व्हिस्की ५१ हज़ार में बिक रही है । विजय माल्या ने भी पिछली दिवाली को सभी सांसदों को ब्लेक डॉग की एक-एक बोतल व्हिस्की भेंट दी थी । प्रभात झा नाम के एक सांसद ने बोतल लौटा दी । मगर और किसी ने भी चूँ तक नहीं की । चुपचाप दिवाली सेलेब्रेट करते रहे । मतलब कि झा को छोड़ कर सारे के सारे बेवड़े हैं ।

आपके बारे में और भी छापा गया है कि मुख्य रसोइए हेमंत ओबेराय आपकी मनपसंद डिशें तैयार कर रहे हैं और उनका मार्ग दर्शन करने के लिए आपका विशेष रसोइया आ रहा है । यहाँ आपकी सवारी के लिए जो कार आ रही है उसके बारे में भी बहुत कुछ छापा है जिसका वर्णन करना कुछ ज्यादा ही विस्तार हो जाएगा मगर इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह कार मौत के अलावा सभी खतरों से सुरक्षित है । वैसे जब बुश यहाँ आए थे तो सुना है कि वे अपना पानी भी अपने साथ अमरीका से लाए थे और उनका मल-मूत्र भी एक विशेष टायलेट में विसर्जित हुआ और जिसे वापिस अमरीका ले जाया गया । साँस लेने के लिए हवा का हमें पता नहीं कि वे अमरीका से ही लाए थे या यहीं की हवा में साँस ली । आज से साढ़े दस साल पहले होली के मौके पर क्लिंटन भी आए थे मगर न तो हिलेरी को साथ लाए और न ही मोनिका लेवेंस्की को । सारा मज़ा किरकिरा कर लिया होली का । शायद इसी गम में मौर्या होटल में विशेष रूप से रखी गई शराब को भी हाथ तक नहीं लगाया ।

आप भी उसी मौर्या होटल में ठहरेंगे । जब क्लिंटन आए थे तब हम दिल्ली में ही थे, दिल्ली कैंट में । सो धौला कुआँ की तरफ आना-जाना होता रहता था । एक दिन हमने देखा कि मौर्या होटल के सामने की सड़क पर लोग फूलों के गमले रख जा रहे हैं । कारण पूछने पर पता लगा कि क्लिंटन आने वाले हैं । सो अब भी वह इलाका सज रहा होगा । एक दिन जुलाई की दोपहर को हम अपने मित्र के स्कूटर के पीछे बैठे इसी मौर्या होटल के सामने से गुजर रहे थे । हल्की-हल्की बूँदाबाँदी हुई थी । सड़क का पानी ढलक कर बरसाती नाले में जा रहा था । एक पागल सा लगने वाला गरीब आदमी उस पानी को अपनी अँजुरी में भरकर पी रहा था । उन दिनों पानी का एक गिलास पचास पैसे का मिलता था और निश्चित ही उस आदमी के पास इतने पैसे नहीं थे । और पानी की प्याऊ लगवाना तो पुराने ज़माने की पिछड़ी बात है । उसका इस उपभोक्तावाद और मुक्त बाज़ार में कहाँ स्थान ? इस पानी पीने का कारण उसका पागलपन नहीं, गरीबी थी क्योंकि कोई भी इतना पागल नहीं होता । तब भी यह देश एक उभरती शक्ति और सबसे बड़ा लोकतंत्र और सबसे बड़ा बाज़ार था । अब तो राष्ट्र मंडल खेलों के चक्कर में ऐसे ग़रीबों को दूर ले जाकर पटक दिया था । अब तक तो क्या लौट कर आए होंगे ? आ गए होंगे तो भी मौर्या होटल तक तो उनका पहुँचना असंभव है ।

आप अपने कार्यक्रम में मुम्बई में मणि भवन के उस संग्रहालय को भी देखेंगे जिसमें महात्मा गाँधी कभी रहे थे और स्वदेशी, खिलाफत और असहयोग जैसे आन्दोलनों की रूपरेखा बनाई थी । देख लीजिए । अब इस देश में गाँधी इतना ही बच गया है ? हो सकता है कि किसी दिन इतना भी न बचे क्योंकि हम बड़ी तेजी से प्रगति कर रहे हैं और इस प्रगति में उस बूढ़े के लिए कोई जगह नहीं है । अब हमारे यहाँ भी स्कूल और कालेज के ४० प्रतिशत बच्चे दारू पीने लगे हैं, पढ़ाई की जगह स्कूलों में सौंदर्य प्रतियोगिताएँ और सेक्स एज्यूकेशन शुरु हो गई है, विश्वविद्यालयों में कंडोम बेचने वाली मशीनें लग गई हैं, कुँवारे मातृत्व, समलैंगिकता और लिव-इन-रिलेशनशिप के पक्ष में तथाकथित बुद्धिजीवी अभियान चला रहे हैं ।

आपका स्वर्ण-मंदिर जाने का कार्यक्रम भी था मगर आपके वहाँ के बुद्धिजीवियों ने बताया कि इससे गलत सन्देश जा सकता है । सर पर कपड़ा बाँधने से मुसलमान की सी झलक आ सकती है जो कि अमरीका के मुस्लिम-विरोधी लोगों को पसंद न आए । इससे पहले भी आपके नाइजीरिया में वहाँ की ड्रेस पहने हुए फोटो को लेकर चुनाव प्रचार में बड़ा हल्ला मचाया गया था । यह ठीक है कि आपके स्वर्णमंदिर जाने से सरदार प्रकाश सिंह बादल का कद कुछ और बढ़ जाता पर आप यहाँ न तो चुनाव के लिए कोई सर्व-धर्म-सम-भाव के लिए आ रहे हैं और न ही किसी तीर्थ यात्रा पर और न ही किसी का कद बढ़ाने । आप तो धंधा करने आ रहे हैं । सो उसी पर ध्यान देना है । फालतू के चक्करों में पड़ने से क्या फायदा । हाँ, यदि कोई दस-बीस हज़ार करोड़ का सौदा होता तो बात और थी । तब तो गुरूद्वारे में क्या, गटर में भी जाया जा सकता था ।

हमारे यहाँ की बात और है । हमारे यहाँ के नेताओं को ऐसे सर्व-धर्म-समभाव के नाटक करने में ही अपना भविष्य दिखाई देता है । जिसे देखो इफ्तार की दावत देने लग जाता है, भले ही कोई उन्हें एकादशी पर फलाहार न करवाए । हज़ पर सब्सीडी तो खैर मिलती ही है । वैसे हम आपको अपने बचपन की बातें बताते चलें । ये बातें आजादी के दस-पन्द्रह साल बाद तक की हैं । तब न तो किसी मुसलमान को किसी खास तरह की दाढ़ी रखने की ज़रूरत महसूस होती थी और न ही किसी हिंदू को चोटी और तिलक की । हम बीमार होते थे तो माँ मस्जिद में जाकर मुल्ला जी से डोरा बनवा लाती थी । शीतला माता के मेले में हिंदू मुसलमान सभी गाते हुए जाते थे । हमारे एक शायर मित्र हैं जो पूजा करते हैं । एक और कवि हैं बशीर अहमद मयूख जिन्होंने वेदों का उर्दू में अनुवाद किया है । वे अपने घर में राम, कृष्ण, शिव की मूर्तियाँ रखकर मंदिर बनाए हुए हैं । हमारे एक सहपाठी का नाम लीलाधर था । उसके यहाँ शादी में वे ही गीत गाए जाते थे जो हिंदुओं के यहाँ गाए जाते हैं । अब भी हमारे इलाके में बहुत से मुसलमानों के सरनेम पवार, चौहान, गौड़ आदि हैं । पर जब से अमरीका ने रूस को घेरने के लिए मध्यपूर्व में कट्टर पंथी इस्लाम को बढ़ावा दिया, मुसलमान काम के लिए अरब देशों में जाने लगे और उनके साथ पेट्रो डालर और कट्टरता आने लगी और फिर उसके ज़वाब में हमारे यहाँ के कुछ हिंदुओं ने कट्टरता में अपना राजनीतिक भविष्य देखना शुरु किया और उसकी परिणति मंदिर विवाद में हुई तब से इस देश की एकता को असली झटका लगा । जिसकी धमक आज सारी दुनिया में सुनाई दे रही है । और अमरीका भी अपने पैदा किए हुए इस जिन्न से बुरी तरह से घबराया हुआ है । सच पूछें तो साधारण आदमी आज भी कट्टर नहीं है और मिल कर रहना चाहता है ।


वैसे कोई भी राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री हो, आजकल उसे अपने देश के सेठों के लिए सामान बेचने का काम ही करना पड़ता है । चाहे आप हों या क्लिंटन या फिर किसी और देश का राष्ट्रपति हो । हम आपको कोई हथियार, कारें, कोकाकोला बेचकर तो पैसे कमा नहीं सकते । हमारे पास तो बेचारे पढ़े लिखे लड़के हैं जो सस्ते दामों पर आपके देशों में नौकरी कर रहे हैं और ऊपर से नस्ली घृणा का शिकार हो रहे है सो अलग । तिस पर मुक्त बाज़ार के मसीहा आप अपने ओहायो राज्य में आउट सोर्सिंग पर प्रतिबन्ध लगाते हैं । और अपने बच्चों के यह कहते हैं कि ये भारत वाले तुम्हारी नौकरियाँ छीन रहे हैं जैसे कि ये कोई डाकू हों । आपके देश को तो माल बिकवाने वाला चाहिए । उसे और किसी अच्छी बुरी बात से कोई मतलब नहीं , भले ही कोई राष्ट्रपति क्लिंटन की तरह लम्पट ही क्यों ना हो ।

खैर, जी आप बुरा नहीं मानिएगा । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, भले ही विकिलीक वाले को आपके देश में जान का खतरा हो ।

तो दिवाली की फिर बधाई । जय राम जी की ।

२९-१०-२०१०


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अरुंधती की आड़ में


फारुक अब्दुल्ला जी,
संबोधन तो आपको क्या दें । आप एक जगह टिकें तब ना कुछ तय किया जाए । आज के अखबार में आपका स्टेटमेंट पढ़ा । यह स्टेटमेंट आपने अपनी मर्जी से ही दिया होगा क्योंकि आपसे कोई ज़बरदस्ती स्टेटमेंट तो ले नहीं सकता । स्टेटमेंट तो आप पहले भी देते रहे हैं । जब अफज़ल गुरु को फाँसी की बात उठी थी तब भी आपने कहा था कि अफज़ल को फाँसी देने से इस देश का क्या नुकसान हो सकता है ? गिलानी ने भी अफज़ल को फाँसी नहीं देने की शर्त रखी थी । गुलाम नबी आज़ाद ने भी कहा था कि अफज़ल को फाँसी देने से कश्मीर में आग लग सकती है । एक अफज़ल को, जिसने संसद पर हमले की साजिश रची थी, को फाँसी देने पर कश्मीर में आग लग सकती है मगर लाखों कश्मीरी पंडितों को ज़बरन भगा दिए जाने और उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लेने से कश्मीर में आग नहीं लग सकती क्योंकि इन बेचारे पंडितों को न अमरीका का समर्थन है, न पाकिस्तान का और न ही उनके पास हथियार हैं और न ही पेट्रो-डालर का दम । इन्हें तो अब दिल्ली और जम्मू में दो हज़ार रुपए महिने में टीन की छतों के नीचे दिन गुजारने पड़ रहे हैं जब कि इससे दस गुना तो कश्मीर में रहने वाले, कुछ भी काम न करने वाले, अलगाव की बात करने वालों को वैसे ही मिल जाता है ।

कितनी मज़े की बात है कि अफज़ल के बारे में आपके, गुलाम नबी और गिलानी के बयान कितने समान हैं ? क्या यह मात्र संयोग है ? नहीं, यह आप सबकी मिलीभगत है । केन्द्र से पैकेज आता रहता है और सारे नेता मिल कर खाते रहते हैं । अलगाववादी भी इसी धन पर पल रहे हैं और अपनी गतिविधियाँ चला रहे हैं वरना अस्सी साल के गिलानी के पास कौन सा खजाना गड़ा हुआ है जो दो सौ रुपए रोज में पत्थर फेंकने वाले हजारों स्वयंसेवक रखे हुए हैं । इतने आतंकवाद के बावज़ूद आप लोगों को कभी गरम हवा तक भी क्यों नहीं लगी ?

आप और भी कई तरह के वक्तव्य देते रहते हैं । जब आप सत्ता में होते हैं तो कुछ और बोलते हैं और जब सत्ता में नहीं होते तो कुछ और । जब सत्ता में नहीं होते तो अपनी ससुराल इंग्लैण्ड चले जाते हैं और चुनाव के समय फिर श्रीनगर आ जाते हैं और कश्मीरियों की अस्मिता की बातें करने लग जाते हैं । अब जब गिलानी ने कुछ ज्यादा ही हल्ला मचाया तो आपके 'सुपुत्र' की गद्दी कुछ हिलने सी लगी तो उसने भी कुछ और ही तरह का वक्तव्य दे दिया वैसे न देते तो भी कुर्सी के साधकों के वक्तव्यों और मंतव्यों को समझना कोई कठिन नहीं है । जब राहुल बाबा ने उनका समर्थन कर दिया तो चिदंबरम भी ढीले पड़ गए । आपने इस पर कुछ कहा तो नहीं । कहते भी क्या ? इधर पड़ें तो कुआँ और उधर पड़ें तो खाई । मगर अब इस अरुंधती ने आपको फिर से देशभक्त बनने का मौका दे दिया । आपने कहा- 'हमारे यहाँ इतनी आजादी है कि हमारे लोग ही हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर देंगे' ।

वैसे जहाँ तक बेड़े की बात है तो मियाँ, उसे गर्क करने में किसी ने कोई कमी नहीं रखी है । ६३ साल से सारे के सारे जनसेवक गर्क करने में ही लगे हुए हैं । जब कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो फिर कैसा तो स्पेशल दर्जा, कैसा स्पेशल पैकेज और कैसी वार्ता । जैसे देश के सारे राज्य हैं वैसे ही कश्मीर । आपके सुपुत्र ने वार्ता में पाकिस्तान को शामिल करने की बात की तो पाकिस्तान का क्या लेना देना है । उसने तो कश्मीर के एक हिस्से पर नाजायज़ कब्ज़ा कर रखा है । होना तो यह चाहिए था कि आप सब लोग उस हिस्से की मुक्ति की बात करते मगर उसके लिए बड़ा दिल और बड़ी हिम्मत चाहिए । जब पाकिस्तान ने उसमें से एक बड़ा हिस्सा पहले अमरीका को अड्डे बनाने के लिए और अब चीन को सड़कें बनाने के लिए दे दिया तब आप कुछ नहीं बोले । जब मुसलमानों के इस देश में आने से भी पहले के निवासी कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से निकल बाहर किया गया तब भी आपकी आत्मा मौन ही रही ।

आपको ही क्या कहें सारी पार्टियाँ ही अपने चुनावी गणित भिड़ाती रहती हैं वरना गिलानी के वक्तव्य पर लालू, मुलायम, मुफ्ती, आप, कांग्रेस कोई नहीं बोला । चुनाव जो चल रहे हैं । भाजपा भी रस्म अदायगी सी ही कर रही है, यह सोच कर कि क्या पता फिर कभी पहले की तरह आपसे समर्थन लेना पड़ जाए । अब इस अरुंधती के कारण गिलानी नेपथ्य में चले गए और यह देशद्रोही हो गई । वैसे इस महिला की बीमारी यह है कि यह अपने कुछ अच्छे और चर्चित वक्तव्यों के कारण लाइट में आ गई सो इसने समझ लिया कि यह बहुत बड़ी ज्ञानी है । मगर इसे भारत के इतिहास का ज्ञान नहीं है और न ही इसकी नसों में यहाँ का उतना हवा पानी, केवल किताबी ज्ञान है वरना वह यह नहीं कहती । फिर भी उसमें एक करुणा और ईमानदारी तो है ही पर आप तो सब कुछ जानते हैं । आपका तो रोम-रोम इस मिट्टी का ऋणी है । जयपुर में रह कर पढ़े हैं । भजन भी गा लेते हैं । आपके पुरखे भी हिंदू ही थे । आप हिंदुत्व की उदारता को अच्छी तरह से जानते हैं । हिंदू धर्म ही संसार में ऐसा है जो सबको गले से लगा लेता है । वरना साठ साल पहले भारत छोड़ कर पाकिस्तान गए मुसलमानों को आज तक भी पाकिस्तान के कट्टरपंथियों ने अपना नहीं माना है । और तो और, शियाओं पर आज भी कहर क्यों बरसाया जा रहा है पाकिस्तान में ।

आप सोच रहे होंगे कि हमने आपके सुपुत्र को जम्मू-कश्मीर का प्रधान मंत्री कहने की बजाय सुपुत्र क्यों कहा । सो मियाँ, यहाँ कोई जनता का नेता नहीं है । सब किसी न किसी के पुत्र/पुत्री हैं चाहे उमर हों या अजय चौटाला, अभिषेक यादव हों या तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे हों या महबूबा, प्रिय सुले हों या स्टालिन । सबके अपने-अपने देश हैं, अपने-अपने दल, अपने-अपने बैंक बेलेंस, अपनी-अपनी कुर्सी । हमें तो लगता है कि अब इस देश के खंडित होने के दिन आ गए हैं । और इसमें आपका भी योगदान कम नहीं है ।

भगवान इस देश की आप सेवकों से हिफाज़त करे ।

२७-१०-२०१०


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Oct 31, 2010

अनाज भले सड़े, पर तुम तो अड़े रहो मुन्ना भाइयो


मोंटेक सिंह जी,
सत् श्री अकाल । हम तो समझ रहे थे कि देश की इस प्रगति के पीछे केवल नरसिंह राव और मनमोहन सिंह जी का ही प्रताप और प्रयत्न है मगर अब जब आप बोले तो पता चला कि इस प्रगति में आपका भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है । इतना बड़ा काम एक दो आदमियों के बस का हो भी नहीं सकता । ठीक भी है, सब को अपने कर्मों के अनुसार मान्यता और यश मिलना ही चाहिए । अब जब भी इस देश की प्रगति का इतिहास लिखा जाएगा तब आपका नाम भी बड़े आदर के साथ लिया जाएगा ।

वैसे तो हम आपसे उम्र में कुछ बड़े ही हैं और बी.ए. में अर्थशास्त्र भी पढ़ा है पर हमें लगा कि यह महान विषय कमज़ोर दिल वालों के लिए नहीं है । इसमें तो आदमी को शांत भाव से कठोर निर्णय लेने वाला होना चाहिए । सो हमने इसे छोड़ ही दिया और एम.ए. में हिंदी साहित्य ले लिया । हम छोटी कक्षाओं में पढ़ा करते थे तो अमरीका की समृद्धि के बारे में भी पढ़ते थे कि अमरीका एक समृद्ध देश है, वहाँ अन्न बहुत पैदा होता है । वहाँ जब बहुत ज्यादा अन्न पैदा हो जाता है तो अन्न के भाव नहीं गिर जाएँ इसलिए अन्न को समुद्र में फेंक दिया जाता है । वाह, क्या समृद्धि है और उसका क्या सदुपयोग है ! हमारे यहाँ तो अन्न को ब्रह्म माना जाता है और उसका सदुपयोग किया जाता है । यदि घर में खाने के बाद कुछ बच भी जाता है तो उसे किसी भूखे को देने की कोशिश की जाती है क्योंकि अन्न व्यर्थ नहीं जाना चाहिए । अन्न की सार्थकता इसी में है कि वह किसी भूखे के पेट में जाए । आपको जो किताबें पढ़ाई जाती थीं उनमें पता नहीं कुछ और होता होगा क्योंकि वे साधारण आदमी नहीं बल्कि बड़े अर्थशास्त्री बनाने वाली होती हैं ।

पहले भूखे को भोजन करना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता था । आजकल की बात और है जब बहुत से सिख दाढ़ी रँगने और उसे ट्रिम कराने लग गए हैं, शराब और मांस का भयंकर रूप से सेवन करने लग गए हैं और गालियों का भी जम कर प्रयोग करने लग गए हैं । गुरुद्वारों के चुनावों में सब तरह के हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं । हम तो उस समय को याद करते हैं जब भले ही सिख फैशनेबल नहीं थे, बातचीत में अक्खड़ थे मगर दिल से बड़े प्यारे इंसान थे । गुरुद्वारों में जम कर सेवा करते थे और बड़े प्यार से लंगर में लोगों को खाना खिलाते थे । अब समय यह आ गया है कि प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी कहते हैं कि भले ही अनाज गोदामों में या खुले में पड़े-पड़े खराब हो जाए मगर उसे गरीब और भूखे लोगों को मुफ्त नहीं बाँटा जा सकता । सर्वोच्च न्यायालय को राजनीति में टाँग नहीं अड़ानी चाहिए । पता नहीं, भूखों के रहते अनाज को सड़ाना कौन सी 'नीति' है और कौनसा 'राज' है । वैसे ठीक भी है, ये सब बातें धर्म का विषय हो सकती हैं मगर अर्थशास्त्र का नहीं । अर्थशास्त्र में तो दो पैसे कमाने की बात होती है भले ही लोग मर जाएँ । आप भी कहते हैं कि महँगाई इसलिए बढ़ रही है कि गाँवों में लोगों की क्रय शक्ति बढ़ गई है ।

ठीक भी है, गाँव के लोग क्या खाने-खर्चने और मौज-मजा करने के लिए हैं ? उनका काम तो अनाज, दूध, फल उगा कर शहर के व्यापारियों को सस्ते में बेचना है जिससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और शहरों में संस्कृति का विकास हो । नाच-गानों के प्रोग्राम हों, सौंदर्य प्रतियोगिताएँ हों, हजारों करोड़ के तरह-तरह के खेल-कूद हों, पार्टियाँ हों, पेज-थ्री जगमगाता रहे । पहले गाँव के लोग अधनंगे रहते थे, रूखा-सूखा खा कर रह लेते थे तो देश सोने की चिड़िया था । वैसे जो बहुत गरीब होते थे उनके लिए भी पेट भरने के लिए तरह-तरह की व्यवस्थाएँ हुआ करती थीं । जैसे पहले गाँवों में एक जाति हुआ करती थी 'मुसहर' । यह जाति चूहे मार कर खाया करती थी, इससे इनका पेट भी मुफ्त में भर जाता था और सेठ जी के गोदाम में चूहों से नुकसान भी कम होता था । इस व्यवसाय में इन लोगों को शतप्रतिशत आरक्षण भी मिला हुआ था । कभी किसी ने इनके चूहे पकड़ने पर कोई ऐतराज नहीं किया । और ये मजे से अपना पेट फ्री में भरते रहे । एक और जाति हुआ करती थी 'गुबरहा' । यह जाति भी हमेशा मुफ्त का खाती रही । जब खेत में बैलों से गहाकर अनाज निकला जाता था तो इस दौरान बैल मालिक के न चाहने पर भी बहुत सा अनाज खा ही जाया करते थे । इतना अनाज बैलों को पचता नहीं था सो अधिकतर उनके गोबर में साबुत का साबुत आ जाता था । ये 'गुबरहे' कहलाने वाले लोग उस गोबर में से यह अनाज बीन कर उसे धोकर खा लिया करते थे । मालिक इन लोगों से कुछ नहीं लिया करता था और इस प्रकार इनका पेट मुफ्त में भर जाया करता था । कितनी अच्छी व्यवस्था थी ?

हमें लगता है आपमें और मनमोहन सिंह जी में इतनी भी उदारता नहीं है कि इस सड़ रहे अनाज को ही इन लोगों को दे दिया जाए । ऐसे लुटाने के लिए आपको योजना आयोग का उपाध्यक्ष थोड़े ही बनाया गया है । वैसे ये गरीब लोग होते बड़े लीचड़ हैं । नए ज़माने और नए रहन-सहन का इन पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता । ये हजारों साल से वही अनाज खा रहे हैं । रोटी के साथ दाल मतलब कि अनाज के साथ अनाज खाना । यदि सब मनमोहन सिंह जी की तरह से वैकल्पिक भोजन करने लग जाएँ तो कुछ तो महँगाई कम हो । मनमोहन सिंह जी चाहें तो रोजाना बादाम-पिश्ते खा सकते हैं, मगर खाते क्या हैं - खरबूजे के बीज । और वे भी फंगस लगे हुए । यह भी कोई खाना है । खरबूजा खाने वाला गरीब आदमी भी खरबूजे के बीज और छिलके नहीं खाता । वह भी उन्हें फेंक देता है । कोई गाय बकरी खा लेती है । इससे ज्यादा सादगी और क्या हो सकती है ? आप भी ऐसी ही कोई सादगी अपनाते होंगे । वैसे बड़े लोग खाते क्या हैं, सूँघते हैं । खाते तो ये गाँव के गरीब लोग हैं । पता नहीं, पिंडली तक पोले हैं क्या ? और मजे की बात यह है कि इस तरह अधभूखे रह कर भी इनकी जनसंख्या कम नहीं होती । जब कि आप और मनमोहन जी द्वारा लाई गई इस नई अर्थव्यवस्था ने कितने विकल्प दे दिए हैं । उनकी तरफ भी तो ध्यान दिया जा सकता है । कितनी मदिरा की दुकानें हैं, जगह-जगह कोल्ड ड्रिंक की दुकानें है । और फिर सारे दिन अखबारों, टी.वी. विज्ञापनों और सिनेमा में ऐसे-ऐसे चेहरे सारे दिन दिखाई देते रहते हैं जिन्हें देखते ही भूख भागती है । इंटरनेट पर वर्चुअल रीयल्टी में एक गुडिया-बच्ची को दूध पिलाने और उससे खेलने के खेल में एक कोरियाई दंपत्ति इतने मशगूल रहने लगे कि अपनी असली बच्ची को सँभालना ही भूल गए कि बेचारी कुपोषण का शिकार होकर मर ही गई मगर भारत के ये गरीब लोग हैं कि किसी भी बहकावे में नहीं आते और किसी भी तमाशे को देखकर रोटी-रोटी चिल्लाना नहीं छोड़ते ।

इन लोगों का कोई इलाज भी तो नहीं है । अब तो सरकार वोट बैंक के लिए, और अधिक लोगों को सस्ता अनाज देने वाली है । क्या बताया जाए आपकी और मनमोहन जी की कोई सुन भी तो नहीं रहा । आपको और मनमोहन जी को कौनसा चुनाव लड़ना है पर जिन्हें चुनाव लड़ना है उन्हें ये सब नाटक करने ही पड़ते हैं । पर आप चिंता मत कीजिए । बाजार भी उनके ‘मनरेगा’ वाले पैसे झटकने के लिए कोई न कोई योजना बना ही रहा होगा ।

हमारे एक मित्र भी आप जितने पढ़े लिखे तो नहीं पर अपने को अर्थशास्त्री की पूँछ मानते हैं । जब हमने उनसे कहा- बंधु, जब अनाज खुले में सड़ रहा है तो ग़रीबों को क्यों नहीं दे दिया जाता । कम से कम उसे फिंकवाने का खर्चा तो नहीं लगेगा । हमारे मित्र भी आपकी तरह ज्ञानी और हिसाबी आदमी हैं सो कहने लगे- देखो, मुफ्त देने से जनता आलसी हो जाएगी और आलसी जनता इक्कीसवीं सदी में चल नहीं सकती तो बाईसवीं सदी में क्या जाएगी । सो मुफ्त देना ठीक नहीं है । इस अनाज को फिंकवाने के लिए टेंडर छूटेगा उसमें कमाई होगी । फिर उस अनाज को थोड़ा साफ़-सूफ करके और कुछ खुशबू मिलाकर कोई व्यापारी ग़रीबों को कुछ सस्ते दामों में बेच देगा तो अर्थव्यवस्था में गति आएगी और उसमें से पार्टी को चंदा देगा तो लोकतंत्र भी मजबूत होगा ।

आप और मनमोहन सिंह जी इस देश कि जड़ों से चिपके रह कर कुतरते रहिए । पेड़ बहुत बड़ा है मगर 'नित बड़ी होती है', बूँद-बूँद रिसने से घड़ा खाली हो जाता है सो आप लोग तो लगे रहिए 'मुन्ना भाई' । बड़ी मुश्किल से तो यह देश अमरीका की तरह अनाज सड़ाने लायक हुआ है अब किसी भी कीमत पर इसे उस युग में नहीं ले जाया जाने देना चाहिए जहाँ लोग अनाज को किसी भूखे के मुँह में पड़ने की चीज मानते थे ।

२३-१०-२०१०
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