Mar 31, 2026

31-03-2026 भाँति भाँति के कॉपीराइट





31-03-2026 

भाँति भाँति के कॉपीराइट 

2002 में सेवानिवृत्त होकर जयपुर से सीकर बच्चों के पास आ गए । 
उन दिनों दिल्ली में अटल जी जमे हुए थे लेकिन वैचारिक भिन्नता के बावजूद कुछ भी असामान्य नहीं लगता था । मजे से आलोचना-व्यंग्य चलते थे । फिर चुनाव जीतने के लिए उनके थिंक टैंक ने गहराई में जाकर एक नारा निकाला 'फ़ील गुड' और उसके बाद 'शाइनिंग इंडिया' । उस समय के उनके चाणक्य प्रमोद महाजन ने कहा- ये बच्चे क्या चुनाव लड़ेंगे ? और मजे की बात कि लोगों को गुड़ फ़ील नहीं हुआ और अटल जी धुंधलके में चले गए और बच्चों ने अश्वमेध का घोड़ा रोक लिया और उसके बाद एक बहुत कम बोलने वाले मनमोहन जी आये । बाद का इतिहास लगभग एक जैसा ही है और सभी के ज्ञान-ध्यान-संज्ञान में है । 

इन बारह वर्षों में राज्य सरकारों के परिवर्तन के अतिरिक्त सीकर का परिवेश लगभग एक जैसा ही रहा । सब कुछ सामान्य । सभी विचारों के लोग आपस में सामान्य रूप से मिलना जुलना, हँसी मजाक सब करते रहते थे । और एक सबसे अच्छी बात यह थी कि उन दिनों लिखने पढ़ने वाले महिने दो महिने में एक बार कहीं न कहीं मिलजुल लेते थे । इन कार्यक्रमों में युवा भी आया करते थे लेकिन अब सब कुछ लगभग बंद है । सब कुछ प्रदर्शन की राजनीति से आक्रांत हो गया है ।नौकरियां कम हो गई हैं। जो कुछ निकलती हैं वे पेपर लीक, नकली परीक्षार्थी आदि घपलों में उलझी हुई हैं । विकास कहाँ हो रहा है पता नहीं लेकिन विकास के विज्ञापन हर राज्य के दिखाई दे जाते हैं । युवा भगवा रैली, विराट हिन्दू सम्मेलन और काँवड़-कलश यात्रा में अपना और देश का विकास और भविष्य तलाशने लगे हैं ।

कुल मिलाकर सारी सांस्कृतिक गतिविधियां हमारी और तोताराम की 'चाय-चर्चा' पर परनिंदा तक सीमित रह गई है और साहित्य ? ओडिशा में विश्वनाथ मिश्र के 'नरेंद्र आरोहणम्' और मधु किश्वर के 'मोदीनामा'  तक रह गया है ।और मज़े की बात यह कि समाचारों में न तो ओडिशा के इस कवि का नाम मिला और न ही फ़ोटो । मोदी का नाम और मोदी का ही फ़ोटो । मानो महत्वपूर्ण कवि और काव्य नहीं 'मोदी' हैं । शायद इसीलिए गुप्त जी ने कहा था-
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है 
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है । 
इसी तरह मधु किश्वर और उनकी पुस्तक 'मोदीनामा' का नाम भी तभी पता चला  जब उन्होंने अपने यूज किये जाने का 'मी टू' टाइप खुलासा किया ।   
 
इन सब अनुलोमों-विलोमों-और प्रतिलोमों के बीच कल एक कनिष्ठ मित्र ने बताया कि एक छोटे-मोटे कार्यक्रम से यह साहित्यिक सन्नाटा तोड़ा जा सकता है और इसके लिए उन्होंने किसी संस्था का नाम भी बताया । भारत और उसके विकास से संबंधित कुछ नाम था ।  

हालाँकि हम जानते हैं कि तोताराम एकदम निठल्ला है, उसके पास कोई काम नहीं है जिस प्रकार भारत के रेल मंत्री और गार्डों तक के पास कोई काम नहीं है । ट्रेनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना करने का काम तक मोदी जी कर लेते हैं । या फिर मास्टरों द्वारा बच्चों को परीक्षा से पूर्व गुरु मंत्र देने का काम भी मोदी जी सम्पन्न कर देते हैं । फिर भी तोताराम की ग्रन्थि को सहलाते हुए आज हमने उसके सामने यही शुभ समाचार रखते हुए कहा- तोताराम, अपने व्यस्त समय में से कुछ समय निकालकर इस रविवार को शाम फ्री रखना । 

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बोला- मास्टर, कोई बहुत बड़ा लालच या भय न हो तो अब बाहर निकलने में ही भला है । वैसे ही साहसी युवा मोबाइल पर बतियाते, मोटर साइकल दौड़ाते, राह चलते लोगों को डराते, सबको पीछे छोड़कर जाने कहाँ पहुंचना चाहते हैं । या फिर घर से बाहर कोई कलश-यात्रा, काँवड़-यात्रा, देश भक्ति के रंग वाले झंडे फहराते वाहन । अच्छा है ऐसे में घर में ही रहना । कहीं मर मरा गए तो संभालने वाला भी नहीं मिलेगा । उत्साही भीड़ और त्योहारों का सांस्कृतिक जुनून ऐसा ही होता है । कोई जय श्रीराम का घोष करता है तो लगता है कि अब आया कोई पत्थर । 

हमने कहा- नहीं, ऐसा कुछ नहीं है । बहुत दिनों बाद किसी विकास-विकूस जैसी किसी संस्था का कवि गोष्ठी का कोई कार्यक्रम है । 

बोला- क्या अपने यहाँ के किसी कवि ने 'मोदी चालीसा' या 'मोदी माहात्म्य' लिखा है क्योंकि जहाँ भी विकास होगा वहाँ मोदी जी के अतिरिक्त और कौन हो सकता है ? जहाँ कोई विकास दुबे हो या बुलडोज़र हो  वहाँ योगी जी के अतिरिक्त कोई और हो ही नहीं सकता । 

हमने कहा- ऐसा कुछ नहीं । कविता-शविता होगी । सुन सुना लेंगे, कुछ चेंज हो जाएगा । 

बोला- मैं तो कुछ व्यस्त हूँ लेकिन तू हो आ लेकिन सुनने-सुनाने में जरा सावधानी रखना । 

हमने कहा- कविता सुनने सुनाने में कैसी सावधानी । अपनी अपनी अभिव्यक्ति, अपनी स्वतंत्रता । 

बोला- अब वह बात नहीं रही । बहुत सोचना-विचारना पड़ता है । देखा नहीं, मध्यप्रदेश में 'भाइयो, बहनो' कहकर कुछ मिमिक्री करने वाला निलंबित कर दिया गया । कई लोगों के लिपटने-चिपटने और ही ही, खे खे करने वाले वीडियो हटवा दिए गए हैं । 

हमने कहा- भाइयो, बहनो, कहकर तो आज से कोई 132 वर्ष पहले विवेकानंद ने शिकागो में अमेरिकावासियों का दिल जीत लिया था । लेकिन उन्होंने या विवेकानंद मिशन वालों ने तो इस पर कोई कॉपीराइट नहीं जताया । 

बोला- जताते भी कैसे ? उनका नाम भी नरेंद्र था । वे ही फिर 1950 में जन्म लेकर आये हैं । 

हमने कहा- लेकिन उन्होंने 'लेडीज़ ऐंड जेन्टलमेन' कहा था । यह पश्चिम की संस्कृति है जबकि हमारे यहाँ पुरुष का नाम पहले आता है । इसीलिए मोदी जी 'भाइयो और बहनो'  बोलते हैं । 

बोला- मेरा काम बताना था सो बता दिया । अब आगे तू है और तेरे कर्म । जैसा कर्म करेगा वैसा फल देंगे अंधभक्त । ये तो मोदी जी हैं ।इनका तो 'ही ही खी खी' का भी पेटेंट है । देखा नहीं, ही ही खी खी करने पर राजीव निगम, भगत राम आदि के फेस बुक बंद हो गए कि नहीं ? 
उनकी तुलना में अत्यंत सामान्य लोगों तक ने अपने अपने छोटे छोटे कामों के पेटेंट करवा रखे हैं । 

हमने पूछा- जैसे ?

बोला- जैसे अनिल कपूर ने अपने एक शब्द 'झक्कास' का, जैकी श्रॉफ ने 'भीड़ू' और अमिताभ बच्चन ने 'देवियो और सज्जनो' का पेटेंट करवा रखा है । 

हमने कहा- तो फिर हम भी 'मास्टर' और 'तोताराम'  का पेटेंट करवा लेते हैं । फिर देखते हैं हमारी स्वीकृति के बिना मोदी जी कैसे कोई 'मास्टर स्ट्रोक' लगाते हैं । और कैसे कोई  'अपने मुँह मियां मिट्ठू' बनता है । 



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Mar 23, 2026

2026-03-01 वेद-विज्ञान

2026-03-01


वेद-विज्ञान

आज तोताराम बहुत खुश था । ​





हमने पूछा- क्या बात है तोताराम, तू तो ऐसे खुश हो रहा है जैसे बुकिंग करवाते ही एक साथ दो सिलेंडर पुराने रेट में मिल गए हों या ट्रम्प ने मोदी जी को रूस से तेल खरीदने के लिए एक और महिने की स्वीकृति दे दी हो या फिर मोदी जी ने कोरोना काल में हजम किया 18 महिने का डीए रिलीज़् कर दिया हो ।

बोला- छोटी औकात, छोटी कल्पना । गरीब आदमी कल्पना भी करेगा तो दो की जगह तीन रोटी और रूखी की जगह चुपड़ी की । उसे पुंगनूर गाय के घी में मशरूम फ्राई की कल्पना करते हुए भी बैंक का वसूली का नोटिस आने का डर लगता है ।

मैं ऐसी छोटी कल्पना नहीं करता । आज तो सत्य साकार हो गया । हमारे सनातन और वैदिक ज्ञान को राष्ट्रीय मान्यता मिल गई है ।

हमने कहा- मोदी है तो मुमकिन है । आज तो उनका सितारा बुलंद है । दुनिया में कौन है जो उनकी बात टाल दे । फिर यह तो देश का एक छोटा सा बोर्ड या प्रवेश परीक्षा है । वे तो बिना डिग्री और प्रवेश परीक्षा के किसी को भी कुलपति बना दें, बिना किसी यूपीएससी परीक्षा के लेटरल एंट्री से सरकार में संयुक्त सचिव बना दें । फिर भी ज़रा बात को स्पष्ट तो कर जिससे हमें प्रतिक्रिया देने में सुविधा हो । वैसे ऐसे छोटे-मोटे शैक्षणिक मामलों में तो स्मृति ईरानी और सम्राट चौधरी भी प्रतिक्रिया दे सकते हैं ।

बोला-  महर्षि संदीपनी राष्ट्रीय वेद संस्कृत शिक्षा बोर्ड (MSRVVY) से वेद-विभूषण (12वीं समकक्ष) उत्तीर्ण छात्र अब एआईसीटीई के मानदंडों के अनुसार इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं जैसे जेईई मेन (JEE Main)आदि में बैठ सकते हैं और तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।  

हमने कहा- इसके लिए किसी इंजीनीयरिंग कॉलेज में प्रवेश लेने और डिग्री लेने की क्या जरूरत है ।देश में बहुत पहले से झाड़-फूँक,मंत्र-तंत्र, गोबर गोमूत्र से सब बीमारियों का इलाज लोग कर ही रहे हैं ।देखा नहीं कोरोना काल में एक संदिग्ध ज्ञान और डिग्री वाले वैदिक ज्ञानी बाबा के काढ़े का देश के स्वास्थ्य मंत्री लोकार्पण कर रहे थे । और तो और खुद मोदी जी ने ऐसे बहुत से प्राचीन भारतीय तथाकथित वेद ज्ञान-विज्ञान के नुस्खों का विज्ञान-भवन से उद्घोष किया है ।

बोला- तुझे पता होना चाहिए कि जब ये यूरोप के लोग भारत में आये थे तो इन्होंने हमारे देश का आर्थिक शोषण ही नहीं किया बल्कि हमारे वेदों का सारा ज्ञान भी निकालकर ले गए और फिर अपने वहाँ उसके आधार पर नए नए आविष्कार किये ।

हमने कहा- मदरसों और संस्कृत पाठशालाओं में केवल रटाया जाता है । प्रश्न, जिज्ञासा, तर्क और प्रयोग का वहाँ कोई विधान नहीं है । और इस प्रकार की शिक्षा से भक्त बनाए जा सकते हैं वैज्ञानिक नहीं । वैसे तो आजकल इंजीनीयरिंग मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं के लिए कोचिंग सेंटरों में बच्चों को केवल रटाया ही जाता है । तभी तो हमारे यहाँ सी वी रामन के बाद कोई नोबल नहीं प्राप्त कर सका ।

हमारे चाचाजी संस्कृत पाठशाला में ही पढ़े थे । एक बार आजादी से पहले संस्कृत पाठशालाओं में विज्ञान का प्रवेश करवाने के लिए सामान्य विज्ञान की एक छोटी सी पुस्तक शामिल की गई ।जिसे बच्चों ने रट लिया और परीक्षा में प्रश्नों को देखे बिना ही 'बच्चो तुमने रेल का इंजन तो देखा ही होगा । हमारा शरीर भी एक इंजन के समान ही होता है......।' से शुरु करके जितना लिख सकते थे लिख आये । ऐसे में विज्ञान के क्षेत्र में क्या करेंगे ।

बोला- तो बता हमारे यहाँ आकाशवाणी होती थी कि नहीं ? क्या था वह ? आज का रेडियो । संजय दूर से ही धृतराष्ट्र को महाभारत युद्ध का आँखों देखा हाल सुना रहा था । क्या था वह । टेलीविजन का लाइव टेलेकास्ट । राम का बाण लक्ष्य बेधकर वापिस उनके तरकश में आ जाता था वह गाइडेड मिसाइल ही तो था । हनुमान जी जब चाहे लघु और विराट रूप धरण कर लेते थे । है किसी देश के पास यह टेकनॉलॉजी ? ऋषि मुनि किसी को भी श्राप से भस्म कर देते थे । होलिका के पास फायर प्रूफ चुनरी थी ।शिव बहुत बड़े पशु चिकित्सक और सर्जन थे । उनके लिए गणेश वाली प्लास्टिक सर्जरी और अपने ससुर को बकरे का सिर लगा देना तो मामूली बात थी ।

हमने कहा- लेकिन आज की आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस ?

बोला- विष्णु द्वारा सुंदरी का वेश धारण करके एक ही बर्तन से सुरों और असुरों को शराब और अमृत पिलाने का धोखा करना आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस नहीं तो क्या था ? और तो और आजकल जिस ड्रोन का हल्ला मचा हुआ है उसका आविष्कार तो हमारे द्रोणाचार्य ने किया था । अंग्रेजी में ड्रोन और द्रोण एक ही तरह इसीलिए तो लिखा जाता है ।

हमने कहा- तो फिर मोदी जी को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में इस बात का मुकदमा कर देना चाहिए जो जो देश ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं वे बैक डेट से भारत को उसकी रॉयल्टी दें । ट्रम्प, नेतन याहू, चीन, रूस सबकी हवा खिसक जाएगी । भूल जाएंगे टेरिफ़ वार ।

बोला- मास्टर, तेरी ऊपर की मंजिल अभी पूरी तरह खाली नहीं हुई है । तेरा ज्ञान भी राम भद्राचार्य और सुधांशु त्रिवेदी की तरह अपार है । अब चुपचाप दिल्ली जाकर राष्ट्रहित में मोदी जी को यह महत्वपूर्ण जानकारी दे ही दे । अगर तेरे जैसा कोई ज्ञानी दिल्ली वाली अंतर्राष्ट्रीय ए आई सम्मिट के समय मोदी जी को यह ज्ञान दे देता तो गलघोंटिया वाले ड्रोन कुत्ते को लेकर चीन के आगे शर्मिंदा नहीं होना पड़ता । खैर दिल्ली जा तो सही । क्या पता तुझे किसी इंजीनीयरिंग विश्व विद्यालय का उपकुलपति ही बना दें । ऐसे ज्ञानियों की इस समय देश के शिक्षा संस्थानों में बहुत जरूरत है ।

-रमेश जोशी


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Mar 21, 2026

2026-03-20 चाय और गंगाजल

2026-03-20 
चाय और गंगाजल  

आज तोताराम ने आते ही पूछा- मास्टर, तेरे पास थोड़ा गंगाजल पड़ा हुआ है क्या ?

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हमने कहा- गंगाजल की अभी क्या जरूरत आ पड़ी । अभी तो शतक लगाएंगे और मोदी जी के सपनों का 2047 वाला विकसित भारत भी देखेंगे । वैसे गंगाजल का क्या है ? पीकर मरने के लिए और भी बहुत कुछ उपलब्ध है । कफ सीरप पीकर मर सकता है, देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर का पानी पीकर मर सकता है, किसी जुलूस-जलसे के हुड़दंग में जाकर मर सकता है, किसी धनबली या बाहुबली के सुपुत्र की कीमती तेज रफ्तार कार के नीचे आकर मर सकता है, स्वदेसी दारू पीकर मर सकता है, धार्मिक उत्साह और उन्माद में मर सकता है । वैसे भी अमर कौन है ? कुछ नहीं करेगा तो भी एक दिन मरना तय है । इसीलिए गालिब ने ठीक ही कहा है-

मौत का एक दिन मुअय्यन हैं 
नींद क्यों रात भर नहीं आती 

बोला- मुझ पर कौन देश के एक सौ चालीस करोड़ की जिम्मेदारी है और कौनसा पितृभूमि इजराइल के साथ खड़ा होना है जो रात भर नींद नहीं आएगी । मैं तो इसलिए पूछ रहा था कि अब किसी पोस्ट ऑफिस से या कहीं और से कोई गंगाजल मँगवाने का धरम नहीं रहा ।सुना है बनारस में कुछ मुसलमानों ने गंगा में रोजा इफ्तारी करके गंगाजल को अपवित्र कर दिया है । अब उसे पीकर तो जैसा थोड़ा बहुत धर्म बचा होगा वह भी भ्रष्ट हो जाएगा । 

 हमने कहा- तोताराम, धर्म न तो किसी पुस्तक में है और न ही किसी कर्मकांड में । धर्म तो हमारे सत्कर्मों में है, प्रेम और भाईचारे में हैं, शांति और करुणा में है । मिलकर रहेंगे तो शांति से जियेंगे, लड़ेंगे तो दुखी होकर तनाव में मरेंगे । और जहाँ तक पवित्रता की बात है तो वह आस्था की एक अवधारणा है । वैसे जो  हम खाएं पीएं वह वस्तु साफ-सुथरी और स्वच्छ हो । मंदिर के प्रसाद को भक्त पवित्र और पूज्य मान सकता है लेकिन अगर उसमें किसी अखाद्य पदार्थ की मिलावट होगी या वह बासी होगा तो उससे फूड पॉइजनिंग हो जाएगी और फिर मरने से कोई ईश्वर या खुदा नहीं बचा सकेगा । बहुत बार सुनते हैं कि नहीं कि प्रसाद खाने से लोगों को उलटी-दस्त हो गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा । 

दुनिया में न धर्म बचा है और न कर्म बचा है । अब तो लालच बचा है पब्लिसिटी का, धन का, पद का । इसलिए पवित्रता का चक्कर छोड़ो स्वच्छता का ध्यान रखो । और नदियों को  पूजने का नाटक करने की बजाय उनकी सफाई पर ध्यान देना चाहिए भक्तों को भी और सरकार को भी ।गंगा दुनिया की सबसे प्रदूषित नदी है इस पर शर्म आनी चाहिए । रिश्ता जोड़ना एक काव्यात्मक और मिथकीय भावना हो सकती है लेकिन उस भावना मात्र से कुछ नहीं होता । उसे व्यवहार में भी उतरना चाहिए ।  वास्तव में  योरप में न तो नदियों को माँ माना जाता है और न ही उनकी आरती उतारी जाती है लेकिन उनकी सफाई का ध्यान रखा जाता है । 

बोला- लेकिन क्या गंगा में इफ्तार पार्टी करना और वीडियो बनाकर डालना क्या उचित है । 

हमने कहा- बिल्कुल नहीं। धर्म और उसके कर्मकांड सबका निजी मामला है । उसे अपने घर या धार्मिक स्थान पर शालीनता और शांति से मनाना चाहिए । किसी प्रकार का अनावश्यक प्रदर्शन, धूम-धड़ाका, डी जे, यात्रा, जुलूस, रँग-बिरंगी रैलियाँ और लफंगई सर्वथा गलत है फिर चाहे वह बहुसंख्यकों द्वारा हो या फिर अल्पसंख्यकों द्वारा । धर्म आतंक, राजनीति और चुनाव का हथियार नहीं होना चाहिए ।

बच्चों को क्या दोष दें । आजकल तो बड़े-बूढ़े भी अपने गू मूत करने तक में अनेक फोटोग्राफरों को बुलाते हैं और अपने फ़ोटो, वीडियो तरह तरह से वाइराल करवाते हैं और फिर उसका चुनाव में फायदा उठाते हैं । अन्यथा क्या नेताओं को हम सरकारी खर्चे पर वी आई पी  तीर्थयात्रा करने के लिए चुनते हैं ?  अरे, तीर्थ यात्रा करनी है तो राजनीति को छोड़ो और जाओ चुपचाप पदयात्रा करते हुए चारों धाम । यह क्या कि अपनी ड्यूटी छोड़कर कभी किसी नदी में स्नान, कभी किसी धार्मिक कॉरीडोर का उद्घाटन, कभी किसी गुफा में ध्यान और साथ में सौ सौ फ़ोटो ग्राफर ।
 
मौज मज़ा, पर्यटन, खेल तमाशा और आध्यात्मिकता में कुछ तो अंतर होना चाहिए कि नहीं ? क्या गरबा पहले नहीं होता था लेकिन अब वह बाजार द्वारा संचालित एक प्रदर्शन पूर्ण व्यवसाय हो गया है ।  वही हाल अन्य त्योहारों का हो गया है । इसके लिए जरूरी है कि आध्यात्मिक और सच्चे धार्मिक नेता इस अश्लील प्रदर्शन से अपने अपने धर्मों और समाजों को बचाएं । लेकिन वे क्या बचाएंगे वे तो खुद अपराधों,अय्याशी, प्रदर्शन और राजनीति के कीचड़ में लिथड़े हुए हैं । वैसे सच में तो सभी उत्सव हमें जोश में भी होश कायम रखना सिखाने के लिए होते हैं ।  

बोला- मास्टर, आज तो तूने बिना गैस के ही अपने मन की बात से मुझे मरणांतकता तक पका दिया है । अब कम से कम चाय तो पिला दे । 

हमने कहा- चाय भी पिला देंगे लेकिन समझ ले कि चाय भी गंगाजल की पवित्रता की तरह एक अवधारणात्मक मामला है । किसे पता कि चाय पिलाने वाला जो चाय और उसकी पत्ती को ताज़ा बताकर तुम्हें पिला रहा है वह किसी रेलवे स्टेशन की 65 साल पुरानी चाय हो ।  

बोला- अब बकवास मत कर और जैसी भी है पिला पिलू दे और साथ में सिर दर्द की कोई गोली हो तो वह भी ले आना । 

हमने कहा- तोताराम, कौन किसे गोली दे रहा है अगर यही समझ आ जाए तो कहीं भी लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ेगा । लोग इतने मूर्ख है कि गोली और जुमलों को ही मास्टर स्ट्रोक समझ और समझा देते हैं । 

वैसे तोताराम, गंगा में इफ्तार की इस दुर्घटना से हमारा ध्यान एक और बहुत बड़ी समस्या की ओर जा रहा है कि चलो इफ्तार करने वालों को तो जेल में डाल देंगे, इनके घर पर बुलडोज़र चला देंगे लेकिन गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा के किनारे बसे शहरों गांवों में तो सभी धर्मों के लोग रहते हैं और सब कुछ खाते पीते हैं । उन सबका मलमूत्र गंगा-जमुना में जाता है । उसे कैसे हिन्दू गंदगी और मुसलमान गंदगी तथा अपवित्र करने वाली और अपवित्र न करने वाली गंदगी के रूप में अलग अलग करके माता स्वरूप धार्मिक नदियों की पवित्रता को बचाएंगे । 

 

बोला- उसकी चिंता मत कर । उसके लिए तो हमारे पास कपड़ों से पहचानने वाली तकनीक की तरह गंदगी के धर्म को पहचानने की तकनीक भी है ।

-रमेश जोशी 


  
  


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Mar 19, 2026

2026-03-19 आज चाय पी रहा है, कल को.....

2026-03-19 

आज चाय पी रहा है, कल को...... 

  

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राजस्थान में बारिश, आंधी और ओले गिरने का अलर्ट तो तीन चार दिन से था लेकिन वह सच रात को हुआ । ओले तो बहुत कम और छोटे छोटे गिरे लेकिन बारिश अच्छी हो गई । दो दिन पहले रात को खिड़की खोलनी पड़ती थी । रात उसे बंद करना पड़ा । बीच में उठकर बेड में से मोटा कंबल निकालना पड़ा । अच्छी नींद आई कुछ वैसी ही जैसी राहुल की सदस्यता रद्द करके मोदी जी और महुआ मोइत्रा की सदस्यता रद्द होने निशिकांत दुबे की आत्मा को शांति मिली थी । हाँ, खटर-पटर में नींद का जो घाटा हुआ वह सुबह देर से आँख खुलने से पूरा हो गया । 

सुबह उठकर देखा तो महिनों से रुकी हुई नाली बारिश के पानी के बहाव से साफ हो चुकी थी जैसे मोदी जी के आने की तैयारी में सब कुछ फिटफाट हो जाता है । बारिश के कारण दूध वाला भी नहीं आया । लेकिन कुछ ठंड होने से चाय का मूड बना तो नीबू वाली चाय ही बनाकर बरामदे में ले आये । लुंगी बनियान पर एक चद्दर डाले उकड़ू बैठे चाय की एक चुस्की ही ली थी कि तोताराम की आवाज आई- मास्टर कुछ तो लिहाज कर लिया कर । 

हमने पूछा- किसका ? यहाँ कौन हमारा जेठ या ससुर बैठा है जिससे घूँघट करना है । और फिर हम कौन भाजपा नेता मनोहर लाल धाकड़ की तरह हाई वे पर ही धकड़पना दिखा रहे हैं । चाय ही तो पी रहे हैं ।  

बोला- आज तू बरामदे में ऐसे उकड़ू बैठकर चाय पी रहा है, कल को राहुल गांधी की तरह संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय पकौड़ों का सेवन करेगा । दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की क्या इज्जत रह जाएगी । 

हमने कहा- हाँ,हाँ संसद की सीढ़ियों पर चाय पीने से देश का लोकतंत्र बदनाम होता है  और् संसद में किसी को कटुआ, भड़ुआ, आतंकवादी कहने से दुनिया में भारत के वसुधैव कुटुम्बकं का संदेश जाता है । और अब तो अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता आयोग द्वारा भारत में सांप्रदायिकता और उसमें आर एस एस की भूमिका पर चर्चा होने लगी है । वह क्या देश के लोकतंत्र के लिए शर्म की बात नहीं है ? 

बोला- वह् तो भारत के दुनिया में बजने वाले डंके से जलने वालों का षड्यन्त्र है ।  लेकिन जब संसद की कैंटीन में अच्छी और सस्ती चाय, पकौड़े, बिस्किट सबकी व्यवस्था है, टेबल कुर्सी हैं तो सीढ़ियों पर चाय का क्या अर्थ है ?

हमने कहा- हो सकता है चाय पर चर्चा कर रहे हों क्योंकि अंदर तो ओम बिरला बोलने नहीं देते ।और चाय के बिना चर्चा हो नहीं सकती । मोदी जी भी तो चर्चा करने के लिए ओबामा को चाय बनाकर पिला रहे थे कि नहीं । तो चाय पीने में क्या बुराई है ?

बोला- चाय बना रहे थे थे लेकिन तूने सलीका नहीं देखा । उसके लिए विशेष रूप से सोने के तारों से अपना नाम कढ़ा सूट पहना था । आज भी उसकी दुनिया में चर्चा होती है । और कुछ नहीं तो इन काँग्रेसियों को मोदी जी से कम से कम इतना सलीका तो सीख ही लेना चाहिए । 

हमने कहा- क्या जर्सी गाय , कांग्रेस की विधवा, 50 करोड़ की गर्ल, फ्रेंड, शूर्पनखा  जैसे शब्दों से देश के लोकतंत्र का सम्मान बढ़ता है ?संसद की सीढ़ियों पर चाय पीने में ऐसा क्या हो गया जो तुम लोगों को लोकतंत्र पर खतरा नजर आने लगा है । 

बोला- इसमें एक और बड़ा षड्यन्त्र छुपा हुआ । आज चाय पी रहा है । कल को चाय बनाने लगेगा, परसों बेचने लगेगा और ऐसे करते करते देश का प्रधानमंत्री बन जाएगा । यह सब अनैतिक तरीकों से मोदी जी की कुर्सी हथियाने की चाल है लेकिन शाह साहब ऐसा नहीं होने देंगे । राहुल पर देशद्रोह का का केस लगा देंगे । 

हमने कहा- लेकिन साबित कैसे करेंगे ?

बोला- साबित करने की क्या जरूरत है । और बहुत से लोगों की तरह अनंत काल तक हिरासत में तो रख ही सकते हैं ।

हमने कहा- तोताराम, ये सब तो गाली और भीख की तरह ओ बी सी के नाम से सहानुभूति वोट बटोरने के नाटक हैं अन्यथा चाय से ही कुछ होना होता तो हम लोग 60 साल से चाय से चिपके हुए हैं लेकिन ‘भाजपा जिला वृद्ध मोर्चा के मोहल्ला प्रवक्ता’  तक तो बन नहीं पाए ।  

  



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