Apr 9, 2026

02-04-2026 गुजरात, तंत्र और उल्लू



02-04-2026 

गुजरात, तंत्र और उल्लू 

  

 


(इसका साइज़ इतना रखेंगे कि पढ़ा जा सके 

आज तोताराम बहुत खुश था । बोला- मास्टर, विकल्प मिल गया । 

हमने पूछा- क्या ? मोदी जी का विकल्प मिल गया ?

बोला- कैसी बातें करता है । मोदी जी का कोई विकल्प हो ही नहीं सकता तो मिलेगा कहाँ से ? अगर ऐसा होता तो लोग क्यों कहते 'मोदी नहीं तो कौन ? वे तो एक ही हैं, निर्विकल्प । तभी तो न कोई आगे और न कोई पीछे फिर भी मजबूरी में देश हित में रोज 20-20 घंटे इस संन्यास की उम्र में भी काम किये जा रहे हैं । 

मोदी जी नहीं, हाँ,कामधेनु का विकल्प मिल गया । सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला, तंत्र में काम आने वाला चमत्कारी उल्लू । 

हमने कहा- तेरे होते हुए इस बरामदा विष्ठा को किसी और की जरूरत ही क्या है ? वैसे सारे तंत्र उल्लुओं के बल पर ही चलते हैं । समझदारों से तो तंत्र को खतरा हो जाता है तभी वह किसी न किसी बहाने उनका मुँह बंद करवा देता है । फिर चाहे वे 'ही-ही,खी-खी' पर वीडियो बनाने वाले व्यंग्यकार हों या पोल खोलने वाले पत्रकार । सबके चेनल इसीलिए तो बंद करवाए जा रहे हैं । ​



बोला- मैं समझता हूँ तेरा व्यंग्य । लेकिन चुल्लू भर चाय में उल्लू बनने वाला तोताराम ही हो सकता है वरना लोग भले ही उल्लू को मूर्ख समझते हों लेकिन उल्लू वास्तव में होता बहुत चालाक है ।  

हमने कहा- वैसे धेनु भी चाहे कामधेनु न हो लेकिन होती बड़े काम की चीज है ।सरकार को वोट दिलवाती है, गौशाला वालों को कागजों में दर्ज होकर अनुदान दिलवाती है, किसी काम की न हो तो बूचड़खाने में जाकर तो हिन्दू बीफ निर्यातकों को कमाई करवाती है और अगर कोई मुसलमान उसे कहीं ले जा रहा हो तो गौ रक्षकों को हफ्ता वसूली करवाती है । 

बोला- बात को घुमाया मत । मैं उल्लू की बात कर रहा हूँ । गुजरात में  तांत्रिक क्रियाओं में काम आने वाला उल्लू 10-10 लाख तक में बेचा जा रहा है । दावा है कि इससे सिद्धि प्राप्त होती है जिसके फलस्वरूप सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं । 

हमने कहा- उल्लू भी कई तरह तरह के होते हैं । यह उल्लू कैसा उल्लू है ? उल्लू के प्रकार के अनुसार दाम होने चाहियें । 

बोला- उल्लू तो उल्लू होता है जैसे गधा, अंधभक्त । 

हमने कहा- नहीं । एक होता है सामान्य उल्लू, एक काठ का उल्लू, एक उल्लू का पट्ठा । और एक होता है सुपर उल्लू । सुपर उल्लू ही लक्ष्मी का वाहन होता है । ये सब जगह न तो दिखाई देते हैं और न ही सरलता से पकड़ में आते हैं । ये बड़े बड़े नेताओं के आसपास ही पाए जाते हैं । ये उल्लू नहीं किसी और ही वेश में मिलते हैं । ये रात में शिकार करते नहीं बल्कि धर्म, संस्कृति, परोपकार के प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं । लक्ष्मी के साथ फ़ोटो में तो कभी नहीं । ये वास्तव में मूर्ख नहीं होते जैसा कि उल्लुओं के बारे में फैलाया गया है । 

बोला- और ?

हमने कहा- सामान्य उल्लू दिन में सोते हैं और रात में पेट भरने का जुगाड़ करते हैं । इन्हें खेती के लिए भी उपयोगी माना जाता है क्योंकि ये चूहों को खाते हैं । काठ का उल्लू किसी से कुछ नहीं माँगता-चाहता । वह तो परंपरा से किसी के भी द्वारा यूज किया जाता है । उल्लू का पट्ठा स्वयं की प्रेरणा से कुछ नहीं करता । उसे अपने उस्ताद से जैसा आदेश मिलता है वैसा करता है जैसे कहीं वाहन रैली निकालना, कहीं विराट सम्मेलन करना, कभी किसी अन्य धर्म-स्थान के आगे डी जे बजाना आदि आदि ।  

बोला- साफ-साफ बता तुझे किसी मनोकामना की सिद्धि के लिए कोई उल्लू खरीदना है ?

हमने कहा- पहली बात तो हमें इनमें बातों में विश्वास नहीं है, दूसरे आठवें पे कमीशन या 18 महिने के बकाया डीए के लिए लाखों का खर्च क्यों किया जाए तीसरे गुजरात का कोई भरोसा नहीं । वहाँ नकली माल बहुत बनता है । जैसे नकली डॉक्टर, नकली जज/कोट, नकली डिग्री, नकली, पठान का नकली बच्चा और कभी न नापी गई असंभव 56 इंच की छाती । 

बोला- फिर भी देश को उल्लू बनाने में कोई कमी हो तो बता ?  

 

 


 


पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Apr 8, 2026

2026-04-08 ढोल की पोल


2026-04-08     


ढोल की पोल 


पिट पिट करके फट लिया विश्व गुरू का ढोल 

फटे ढोल से देखती दुनिया इसकी पोल 

दुनिया इसकी पोल जीभ तालू से चिपकी 

ट्रम्प दिखाता इसे हैसियत जब तब इसकी 

जोशी किससे क्या लेकर बैठा है खाकर 

इज़राइल को बाप बनाए खुद ही जाकर 


पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Apr 2, 2026

2026-04-02 कुण्डलिया चोरों के अड्डे


2026-04-02   कुण्डलिया 

चोरों के अड्डे 


शिक्षा सेहत धर्म का मचा हुआ है शोर 

इन तीनों में ही घुसे सबसे ज्यादा चोर 

सबसे ज्यादा चोर, नया कुछ नहीं सिखाएँ 

प्रश्न और उत्तर देकर रट्टे लगवाएँ 

जोशी जाँच दवा में जमकर हिस्सा पाएँ 

चर्बी मिला प्रसाद बाँटकर नोट कमाएँ 


पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Mar 31, 2026

31-03-2026 भाँति भाँति के कॉपीराइट





31-03-2026 

भाँति भाँति के कॉपीराइट 

2002 में सेवानिवृत्त होकर जयपुर से सीकर बच्चों के पास आ गए । 
उन दिनों दिल्ली में अटल जी जमे हुए थे लेकिन वैचारिक भिन्नता के बावजूद कुछ भी असामान्य नहीं लगता था । मजे से आलोचना-व्यंग्य चलते थे । फिर चुनाव जीतने के लिए उनके थिंक टैंक ने गहराई में जाकर एक नारा निकाला 'फ़ील गुड' और उसके बाद 'शाइनिंग इंडिया' । उस समय के उनके चाणक्य प्रमोद महाजन ने कहा- ये बच्चे क्या चुनाव लड़ेंगे ? और मजे की बात कि लोगों को गुड़ फ़ील नहीं हुआ और अटल जी धुंधलके में चले गए और बच्चों ने अश्वमेध का घोड़ा रोक लिया और उसके बाद एक बहुत कम बोलने वाले मनमोहन जी आये । बाद का इतिहास लगभग एक जैसा ही है और सभी के ज्ञान-ध्यान-संज्ञान में है । 

इन बारह वर्षों में राज्य सरकारों के परिवर्तन के अतिरिक्त सीकर का परिवेश लगभग एक जैसा ही रहा । सब कुछ सामान्य । सभी विचारों के लोग आपस में सामान्य रूप से मिलना जुलना, हँसी मजाक सब करते रहते थे । और एक सबसे अच्छी बात यह थी कि उन दिनों लिखने पढ़ने वाले महिने दो महिने में एक बार कहीं न कहीं मिलजुल लेते थे । इन कार्यक्रमों में युवा भी आया करते थे लेकिन अब सब कुछ लगभग बंद है । सब कुछ प्रदर्शन की राजनीति से आक्रांत हो गया है ।नौकरियां कम हो गई हैं। जो कुछ निकलती हैं वे पेपर लीक, नकली परीक्षार्थी आदि घपलों में उलझी हुई हैं । विकास कहाँ हो रहा है पता नहीं लेकिन विकास के विज्ञापन हर राज्य के दिखाई दे जाते हैं । युवा भगवा रैली, विराट हिन्दू सम्मेलन और काँवड़-कलश यात्रा में अपना और देश का विकास और भविष्य तलाशने लगे हैं ।

कुल मिलाकर सारी सांस्कृतिक गतिविधियां हमारी और तोताराम की 'चाय-चर्चा' पर परनिंदा तक सीमित रह गई है और साहित्य ? ओडिशा में विश्वनाथ मिश्र के 'नरेंद्र आरोहणम्' और मधु किश्वर के 'मोदीनामा'  तक रह गया है ।और मज़े की बात यह कि समाचारों में न तो ओडिशा के इस कवि का नाम मिला और न ही फ़ोटो । मोदी का नाम और मोदी का ही फ़ोटो । मानो महत्वपूर्ण कवि और काव्य नहीं 'मोदी' हैं । शायद इसीलिए गुप्त जी ने कहा था-
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है 
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है । 
इसी तरह मधु किश्वर और उनकी पुस्तक 'मोदीनामा' का नाम भी तभी पता चला  जब उन्होंने अपने यूज किये जाने का 'मी टू' टाइप खुलासा किया ।   
 
इन सब अनुलोमों-विलोमों-और प्रतिलोमों के बीच कल एक कनिष्ठ मित्र ने बताया कि एक छोटे-मोटे कार्यक्रम से यह साहित्यिक सन्नाटा तोड़ा जा सकता है और इसके लिए उन्होंने किसी संस्था का नाम भी बताया । भारत और उसके विकास से संबंधित कुछ नाम था ।  

हालाँकि हम जानते हैं कि तोताराम एकदम निठल्ला है, उसके पास कोई काम नहीं है जिस प्रकार भारत के रेल मंत्री और गार्डों तक के पास कोई काम नहीं है । ट्रेनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना करने का काम तक मोदी जी कर लेते हैं । या फिर मास्टरों द्वारा बच्चों को परीक्षा से पूर्व गुरु मंत्र देने का काम भी मोदी जी सम्पन्न कर देते हैं । फिर भी तोताराम की ग्रन्थि को सहलाते हुए आज हमने उसके सामने यही शुभ समाचार रखते हुए कहा- तोताराम, अपने व्यस्त समय में से कुछ समय निकालकर इस रविवार को शाम फ्री रखना । 

​ 







बोला- मास्टर, कोई बहुत बड़ा लालच या भय न हो तो अब बाहर निकलने में ही भला है । वैसे ही साहसी युवा मोबाइल पर बतियाते, मोटर साइकल दौड़ाते, राह चलते लोगों को डराते, सबको पीछे छोड़कर जाने कहाँ पहुंचना चाहते हैं । या फिर घर से बाहर कोई कलश-यात्रा, काँवड़-यात्रा, देश भक्ति के रंग वाले झंडे फहराते वाहन । अच्छा है ऐसे में घर में ही रहना । कहीं मर मरा गए तो संभालने वाला भी नहीं मिलेगा । उत्साही भीड़ और त्योहारों का सांस्कृतिक जुनून ऐसा ही होता है । कोई जय श्रीराम का घोष करता है तो लगता है कि अब आया कोई पत्थर । 

हमने कहा- नहीं, ऐसा कुछ नहीं है । बहुत दिनों बाद किसी विकास-विकूस जैसी किसी संस्था का कवि गोष्ठी का कोई कार्यक्रम है । 

बोला- क्या अपने यहाँ के किसी कवि ने 'मोदी चालीसा' या 'मोदी माहात्म्य' लिखा है क्योंकि जहाँ भी विकास होगा वहाँ मोदी जी के अतिरिक्त और कौन हो सकता है ? जहाँ कोई विकास दुबे हो या बुलडोज़र हो  वहाँ योगी जी के अतिरिक्त कोई और हो ही नहीं सकता । 

हमने कहा- ऐसा कुछ नहीं । कविता-शविता होगी । सुन सुना लेंगे, कुछ चेंज हो जाएगा । 

बोला- मैं तो कुछ व्यस्त हूँ लेकिन तू हो आ लेकिन सुनने-सुनाने में जरा सावधानी रखना । 

हमने कहा- कविता सुनने सुनाने में कैसी सावधानी । अपनी अपनी अभिव्यक्ति, अपनी स्वतंत्रता । 

बोला- अब वह बात नहीं रही । बहुत सोचना-विचारना पड़ता है । देखा नहीं, मध्यप्रदेश में 'भाइयो, बहनो' कहकर कुछ मिमिक्री करने वाला निलंबित कर दिया गया । कई लोगों के लिपटने-चिपटने और ही ही, खे खे करने वाले वीडियो हटवा दिए गए हैं । 

हमने कहा- भाइयो, बहनो, कहकर तो आज से कोई 132 वर्ष पहले विवेकानंद ने शिकागो में अमेरिकावासियों का दिल जीत लिया था । लेकिन उन्होंने या विवेकानंद मिशन वालों ने तो इस पर कोई कॉपीराइट नहीं जताया । 

बोला- जताते भी कैसे ? उनका नाम भी नरेंद्र था । वे ही फिर 1950 में जन्म लेकर आये हैं । 

हमने कहा- लेकिन उन्होंने 'लेडीज़ ऐंड जेन्टलमेन' कहा था । यह पश्चिम की संस्कृति है जबकि हमारे यहाँ पुरुष का नाम पहले आता है । इसीलिए मोदी जी 'भाइयो और बहनो'  बोलते हैं । 

बोला- मेरा काम बताना था सो बता दिया । अब आगे तू है और तेरे कर्म । जैसा कर्म करेगा वैसा फल देंगे अंधभक्त । ये तो मोदी जी हैं ।इनका तो 'ही ही खी खी' का भी पेटेंट है । देखा नहीं, ही ही खी खी करने पर राजीव निगम, भगत राम आदि के फेस बुक बंद हो गए कि नहीं ? 
उनकी तुलना में अत्यंत सामान्य लोगों तक ने अपने अपने छोटे छोटे कामों के पेटेंट करवा रखे हैं । 

हमने पूछा- जैसे ?

बोला- जैसे अनिल कपूर ने अपने एक शब्द 'झक्कास' का, जैकी श्रॉफ ने 'भीड़ू' और अमिताभ बच्चन ने 'देवियो और सज्जनो' का पेटेंट करवा रखा है । 

हमने कहा- तो फिर हम भी 'मास्टर' और 'तोताराम'  का पेटेंट करवा लेते हैं । फिर देखते हैं हमारी स्वीकृति के बिना मोदी जी कैसे कोई 'मास्टर स्ट्रोक' लगाते हैं । और कैसे कोई  'अपने मुँह मियां मिट्ठू' बनता है । 



पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach