Feb 1, 2023

भारत पर हमला

भारत पर हमला  


आज तोताराम बड़ी अजीब धज में था । सिर पर सफेद पट्टी बांधे। एक हाथ में प्लास्टिक की कोई ३००-४०० मिलीलीटर की एक बोतल और दूसरे हाथ में एक छोटा-सा चाकू । आते ही उसने हमारे सिर पर लपेटा  हुआ काले रंग का मफ़लर उतार फेंका और बोला- यह सर्दी से डरकर कान ढंकने का समय नहीं है । सिर पर कफन बांध ले। देश पर मर मिटने की घड़ी आ  गई है ।  और तेरा सब्जी काटने का चाकू कहाँ है ? तू तैयार हो, तब तक मैं उस पर धार लगा देता हूँ । 

हमने कहा- कुछ दिनों पहले एक गोडसेवादी वीर साध्वी ने देशप्रेम का ऐसा ही आह्वान किया था । कहा था कि और कुछ नहीं तो सब्जी काटने का चाकू ही धार तेज करके रखो। पता नहीं, कब जरूरत पड़ जाए ।लेकिन इतना अंदाज नहीं था कि इतनी जल्दी कि वह मौका आ  जाएगा । बता, किस हिन्दुत्व विरोधी मोहल्ले की तरफ कूच करना है ?

बोला- अभी तो अंदर से नहीं, बाहर से खतरा पैदा हुआ है । 

हमने कहा- किससे ? चीन से ? उसको तो कुछ दिनों पहले ही लाल आँखें और ५६ इंच का सीना दिखाया था । अभी तक झूला झूलने नहीं आया । सुना है, उसे तभी से डायरिया हो गया है। शौचालय के चक्कर लगाने से ही फुरसत नहीं मिल रही है । 

बोला- चीन से नहीं ?

हमने पूछा- तो क्या फिर पाकिस्तान से ?

बोला- वह क्या खाकर हमला करेगा ? उसके लोग तो अपने राजस्थान की सीमा पर आटा मांगते घूम रहे हैं । अबकी बार तो खतरा सात समंदर पार से है । 

हमने पूछा- कौन है यह ?  अमरीका ? लेकिन अमरीका तो नहीं हो सकता । वह तो अपना दोस्त है। अपन  तो 'अबकी बार ट्रम्प सरकार' का नारा देकर उसे जिताने भी गए थे । 

बोला- अमरीका तो नहीं है लेकिन खबर का अमरीका से कुछ न कुछ लिंक तो जरूर लगता है । कोई हिडन बर्ग जैसा ही नाम है । 

हमने कहा- जब 'हिडन' ही है तो कहाँ ढूंढें ? क्या ऐसे ही कपड़ों से पहचानकर किसी को चाकू घोंप दें ?

बोला- शायद 'हिंडन' हो सकता है । 

हमने कहा- हिंडन है तो अपने दिल्ली, हरियाणा, यूपी के ही आसपास तो है । हिंडन नदी के इस या उस किनारे पर टहलता मिल जाएगा । 

बोला- इसने कोई रिपोर्ट दी है जिससे किसी घोटाले की संभावना लग रही है ।  

हमने कहा- तो फिर यह काम ई डी वगैरह का है । वैसे भी आजतक हजारों करोड़ के घपले करके लोग भाग गए और अब विदेशों में ऐश कर रहे हैं ।  

बोला- लेकिन यह केवल रुपए-पैसे का मामला ही नहीं है । बताया जा रहा है कि यह रिपोर्ट भारत, भारत की संस्थाओं और भारत की अखंडता पर हमला है । 

हमने कहा- किसी शेयर का घपला देश पर हमला नहीं हो सकता । यह हमला वैसा ही है जैसे बागेश्वर वाले बाबा अपने ढोंग की पोल खुलने पर अपने बचाव के लिए इसे 'सनातन धर्म' पर हमला बता रहा है । न ऐसे बाबा सनातन धर्म हैं और न ही घपले वाले लाला 'भारत' . 

बोल- तो कोई बात नहीं ।घोटालों घपलों के ऐसे संकट सहने की तो इस देश को आदत हो चुकी है । पहले भी तो  कोई नीरव नीरवतापूर्वक खिसक लिए थे और कोई चौकसे समस्त चौकसियों के बावजूद चंपत हो गए थे । कोई बात नहीं, यह एक और सही । 

हमने कहा- लेकिन इसने तो स्टेट बैंक से बहुत सा कर्जा ले रखा है । और अपना तो जो कुछ है वह स्टेट बैंक में ही है । सरकार इसका भी एन पी ए कर देगी तो हम भी 'महाराष्ट्र पंजाब बैंक' के बुजुर्ग ग्राहकों की तरह लाइन में आ जाएंगे । 

बोला- एन पी ए क्या होता है ?

हमने कहा- भूल गया ? हाई स्कूल में नहीं पढ़ा था ? डूबत खाते । बंदर बाँट नीतिनिर्धारकों और लाभार्थियों के बीच और भुगतें हम जैसे गरीब । 

बोला- कमाल है, हम तो अगर फोन, बिजली, बीमा या पानी का बिल एक दिन भी लेट जमा कराएं तो दस-बीस रुपए का जुर्माना और इनका लाखों करोड़ डूबत खाते ! मास्टर, क्यों न हम भी कोई ऐसा ही एन पी ए वाला कर्जा ले लें और हो जाएँ चंपत । 

हमने कहा- यह सुविधा केवल कुछ सच्चे देशभक्त मित्रों के लिए उपलब्ध है, सबके लिए नहीं । 




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Jan 31, 2023

'मुमकिनामि' युगे-युगे


 'मुमकिनामि' युगे-युगे 


रात को बारिश हुई. फसलों को कितना लाभ हुआ, 'सोना बरसा' या कीचड़- यह तो अखबार देखकर ही तय होगा . 

अखबारों को न तो समाचारों  से मतलब है और न ही उनकी प्रामाणिकता से और न ही उनकी पाठकों के लिए उपादेयता से . वे तो  एक दूसरे की देखा-देखी अखबार को चटपटा, रोमांचक, साहित्यिक, स्मार्ट बनाने पर तुले रहते हैं. 

हमारे एक मित्र हैं, एक छोटा, लोकल लेवल का खबर निकालते हैं . एक दिन हमने कहा- इसमें कुछ ठीकठाक सामग्री दिया करो. बोले-- मास्टर जी, हम तो घर घर के लोग ही मिलकर इधर-उधर से कुछ भी जुटाकर डाल देते . किसी तरह हमारी औकात के अनुसार विज्ञापन मिल जाते हैं. क्यों बिना बात की माथा कूट करना .     

जैसे मोदी जी ने विकलांगों को दिव्यांग का दर्ज़ा देकर उनकी विकलता कम कर दी है वैसे ही आवारा सांडों को नंदी और गली के कुत्तों ओ श्वान का तत्सम नाम देकर अखबारों ने भी अपना धर्म निभाया है . किसी भी देवी-देवता के विशेष रंग की पोशाक पहनने और हर ग्रह-नक्षत्र की स्थिति को पुण्य और किसी न किसी खरीददारी का योग बताकर अध्यात्म और समाज के चरित्र निर्माण का काम निबटा दिया जाता है . 

यही हाल विज्ञापन का है . लगता है पहला पेज तो विज्ञापनों के लिए ही सुरक्षित हो गया है . जूते से लेकर, जुआ खेलने के 'ऐप' तक कुछ भी . पैसा मिले तो घोषित अपराधी और बलात्कारी को राष्ट्र संत और जन-मन-हृदय-सम्राट बताते हुए विज्ञापन छाप सकते हैं . कभी पेज बीच में से कटा हुआ, तो कभी किसी विज्ञापन की  अलग से बाहर निकली हुई एक पट्टी जैसे किसी का नाड़ा पेंट की ज़िप से बाहर लटका हुआ हो. कभी समाचारों के बीच में सांप की तरह लहराता कोई विज्ञापन घुसेड़ देंगे . 

उनके होने की सार्थकता अधिक से अधिक विज्ञापन मिलने तक ही है. 

इन अख़बारों से कोई बचे भी तो कैसे ?  सभी अखबार एक से बढ़कर एक कूड़ा. ढेरी के सभी बैंगन काने. लगा दो सारी उम्र छांटने में . वही ढाक के तीन पात जैसे हर महिने किसी ढंग के काम की सूचना की उम्मीद के बीच ज़बरदस्ती चली आती वही 'मन की बात' . 

ठीक एक हफ्ते पहले हमने तोताराम को उसके हर बात में 'मोदी है तो मुमकिन है' के मन्त्र का ऐसा ज़वाब दिया कि अभी तक वह नार्मल नहीं हुआ है. फंस गया . 'मोदी और मुमकिन' का अनुप्रास मिलाये तो 'हिंदुत्व' को 'भाषा ज़िहाद' का खतरा और यदि 'संभव' के साथ 'शाह' की अनुप्रास भिड़ाये तो एकाधिकार को खतरा . इधर पड़े तो कुआं, उधर पड़े तो खाई. 

रात को हलकी मावठ के कारण हुए कीचड़ और कुछ ठंडी हवा के कारण हमें तोताराम के जल्दी आने की उम्मीद नहीं थी . जैसे ही चाय की तरफ हाथ बढ़ाया तो एक तीखा स्वर सुनाई दिया- मिल गया . 

स्वर में गज़ब का आत्मविश्वस था . वैसा ही जैसा एक बार अच्छी तरह बालि से पिटकर, फिर राम की दी हुई माला पहनकर और राम से अभयदान पाकर उत्साह से भरे सुग्रीव के स्वर में था- बाहर निकल बालि ! जैसा ललकारता हुआ गर्जन था .   

हमने चौंक कर पूछा- क्या मिल गया ? राहुल को एक हाफ टी शर्ट में भी ठण्ड न लगने का रहस्य ?

बोला- नहीं, ऐसी छोटी-मोटी बात नहीं है . एक बड़ा धांसू तथ्य, एक ईश्वरीय रहस्य . 'संभव' और 'मुमकिन' के बीच की दुविधा पर तेरे द्वरा फैलाए गए व्यर्थ के विमर्श का उचित उत्तर, माकूल ज़वाब .

हमने पूछा- क्या ? 

बोला-  सभी किन्तु-परन्तु, मुमकिन-संभव के बीच मोदी जी के ईश्वरतत्व की स्थापना का रहस्य. 'मुमकिनामि युगे-युगे' . 

हमने कहा- तोताराम आज तो तूने देश की गंगा-जमनी तकज़ीब के मेल को एक कालजयी, हिन्दुस्तानी नाम दे दिया और मेल भी ऐसा मेलदार कि कहीं से भी बेमेल नहीं लगता . काश, योगी जी भी अपने नाम-परिवर्तन-यज्ञ में इसी 'हिंदुस्तानियत' को अपनाएं . लगता है जैसे गीता में कृष्ण उद्घोष कर रहे हों- 

'मुमकिनामि युगे-युगे' . 

बोला- ज़र्रा नवाजी का शुक्रिया . वैसे बिना कारण जाने हर बात पर प्रशंसा करना बहुत ही घटिया चमचागीरी का लक्षण है . 

कारण साफ़ है कि तूने 'मोदी है तो कुछ भी मुमकिन नहीं' का बहुत ही सटीक उत्तर दे दिया .  

बोला- यह आजकल कोई काम न करने की बजाय हर बात पर, केवल हिंदुत्व के एजेंडे की गोदी मीडिया की मुर्गा लड़ाऊ और कपड़ा फाडू  'हिंदू-मुसलमान' बहस वाला सामान्य उत्तर नहीं है . यह बहुत तार्किक, सप्रमाण और ऐतिहासिक तथ्यों से युक्त उत्तर है .  

हमने कहा- तो फिर स्पष्ट किया जाए . 

बोला- कृष्ण ने बचपन में अपनी छोटी अंगुली पर कुछ दिनों के लिए गोवर्धन पहाड़ उठा लिया, हनुमान जी एक बार पहाड़ उठाके ले आये तो अब तक दुनिया उन्हें गीतों में गा रही है . लेकिन आज मोदी जी ने समस्त ब्रह्माण्ड को अपने बुजाओं में बांध और तौल रखा है . 

तुझे पता है आज तक २६ जनवरी (गणतंत्र दिवस ) पर कब-कब बसंत पंचमी आई ?

हमने कहा- पता नहीं .

बोला- १९४७ से अब तक इन ७५ वर्षों में १९८५ और २००४ में बसंत पंचमी गणतंत्र-दिवस (२६ जनवरी) को आई. 

हमने कहा- इसमें क्या है ? संयोग है . क्या किसी के प्रयत्नों से ऐसा होता है  ? 

बोला-  संयोग नहीं होता है तो महापुरुष बना लेते हैं . नेहरू महान थे .  इंदिरा गाँधी बहुत शक्तिशाली थीं लेकिन बहुत बार कोशिश करने पर भी अपने जीते जी ऐसा नहीं कर सकीं .  राजीव के समय में यह शुभ संयोग २६ जनवरी १९८५ को बना . अटल जी के समय में २००४ में यह संयोग बना तो सही लेकिन उसके बाद उनकी सरकार चली गई . और मज़े की बात यह भी कि राजीव को भी दूसरी टर्म नहीं मिली . 

अब उनके बाद, देश को ठण्ड में ठिठुरता देखकर किसी तरह मोदी जी २६ जनवरी को यह संयोग बनाने में सफल हो सके हैं . बहुत मुश्किल होता है . जाने कैसे-कैसे अंतरिक्ष में इतनी तेजी से घूमते ग्रह-नक्षत्रों को कभी रोकना तो कभी किसी को सामान्य से तेज गति से चलाना पड़ता है . कृष्ण को तो केवल एक बार बड़ी मुश्किल से जयद्रथ को मरवाने के लिए सूर्य को थोड़ी देर के लिए बादलों में छिपाना पड़ा था . 

क्या मोदी जी की इस अद्भुत क्षमता का कोई समतुल्य इस दुनिया के इतिहास में है जो गृह-नक्षत्रों की चाल को नियंत्रित कर सके ? 

हमने कहा- नहीं . 

बोला- तभी तो कृष्ण ने महाभारत में अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए कहा था- 

यदा यदा हि जिज्ञासा जाग्रत भवति हे तोता 

अन्धास्था स्थापनार्थाय 'मुमकिनामि युगे-युगे 

हमने कहा- तोताराम, इस बार भी बसंत पंचमी २६ जनवरी को है और अगले साल चुनाव .हमारी तो बाईं आँख भी  फड़क रही है .  कहीं...... 


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Jan 23, 2023

तोताराम की तपस्या


तोताराम की तपस्या 


घर के ठीक सामने एक बिजली का खम्भा है . खम्भा तो तब भी था जब यहाँ खेत था लेकिन तब इस पर कोई लाइट नहीं जलती थी . अब जब विकास हुआ तो बल्ब लगा और फिर एल ई डी भी लेकिन नीयत और नियति अब भी वही है . महंगाई भत्ते के एरियर और आयकर में छूट की सीमा की तरह विशेषज्ञ अनुमान लगते रहते हैं लेकिन स्थिति कुल मिलाकर 'अच्छे दिन' की तरह ही बनी हुई है .

दस दिन से हमारे सामने वाले इस खम्भे नंबर  ४८/३७० पर की लाइट नहीं जल रही है . सोचा शिकायत करें तभी एक दिन हमें लगा कि लाइट ने झपका-सा मारा . आस बंधी. सोचा क्या पता अच्छे दिनों की तरह यह एक असंभव संभावना सच ही हो जाय . लेकिन नहीं . चुनावी वादों की तरह फुस्स. आज तो पक्का शिकायत करेंगे ही . 

लाइट न होने के कारण सुबह-सुबह बरामदे में सावधानी से जाते हैं . आज गए तो लगा जैसे कोई धुंधली-सी आकृति सफ़ेद कमीज पहने हुए बैठी थी . हम तो बनियान, इनर, कमीज, स्वेटर और ऊपर टोपा, मफलर और खादी भण्डार वाला शुद्ध ऊनी गाउन . और यह एक कमीज में . लगता है या तो इतना गरीब है कि पूरे कपड़े नहीं या फिर कोई हठयोगी या आत्महत्या का सस्ता नुस्खा आजमा रहा है .

हमने कहा- क्या बात है भाई, यह ठीक है कि इस बार की भयंकर सर्दी को देखते हुए, जनहित के लिए मोदी जी बसंत पंचमी २६ जनवरी को ही ले आये हैं . मोदी है तो मुमकिन है . फिर भी बसंत पंचमी होने मात्र से तो जीवन में बसंत नहीं आ जाता . ठण्ड खा जाओगे तो मुश्किल हो जायेगी . 

बोला- यह तपस्वियों का देश है .

-अरे, यह तो तोताराम है . 

हमने कहा- है तपस्वियों का देश लेकिन तेरे पास कौनसी ४० हजार की कमीज है जो ठण्ड नहीं लगेगी . 

बोला- जब १५ लाख का सोने के तारों से अपना नाम कढ़ा सूट पहनकर कोई व्यक्ति फकीरी का दावा कर सकता है तो मैं भी इस एक सौ रुपए की कमीज में तपस्या क्यों नहीं कर सकता ? बुद्ध भी तो राजपाट त्याग कर और महावीर सभी वस्त्र त्यागकर महान बने थे .  

हमने कहा- किसे पता है हजारों साल पुरानी बात है . आजकल पहले वाले तपस्वी कहाँ हैं ? अब तो लोग गंगा में डुबकी भी कमर में रस्सा बांधकर लगाते है , न अपने कर्मो पर विश्वास और न ही गंगा के पतित पावनत्व पर भरोसा. गुफा में समाधि लगाने जाते हैं तो भी फोटोग्राफर और कमांडो को साथ ले जाते हैं . अब कहाँ हैं एक टांग पर दस-दस हजार वर्ष तक खड़े होकर तपस्या करने वाले ? 

छोड़ इस तपस्या को . पूजा का सस्ता और सुरक्षित रास्ता अपना . रात को जयपुरी रजाइयां ओढ़, दिन में शाहतूस की शाल, गरम पानी से स्नान कर, तेल-फुलेल लगाकर, तिलक छापा करके बैठ गद्दी पर, भक्तों से पाँव छुआ और माल पेल. और मौका मिल जाए और पट जाए तो भक्तिनों को स्वर्ग की सैर करा . नेताओं के साथ मिलकर वोटों की दलाली कर . तपस्या में क्या रखा है ? बुद्ध, सुकरात, ईसा, गाँधी, लिंकन ने क्या पाया तपस्या से ? 

बोला- लेकिन यह दुनिया तपस्या से ही आगे बढ़ती है . तपस्या से ही इसके विकारों को दूर किया जा सकता है जैसे उपवास से शरीर की अशुद्धियों का दहन . 

हमने कहा- ठीक है, कर तपस्या लेकिन एक कमीज में ठण्ड से मरने से क्या फायदा ? कोई कम्बल ही डाल ले . ला दें ? 

बोला- जब राहुल एक टी शर्ट में देश को दक्षिण से उत्तर तक नाप सकता है तो क्या मैं शर्ट में घर से तेरे बरामदे तक नहीं आ सकता ? कम्बल देखकर स्वर्ग में ऐश करने वाले देवता और चढ़ावा खाने देवतुल्य पुजारी भड़क जायेंगे . वे यही मौका देखते रहते हैं. ये ही तो किसी की तपस्या भंग करने के लिए अप्सराएं भेजते हैं . अप्सराएं भी बेचारी क्या करें, नौकरी जो ठहरी . बदनाम खुद होती है और काम देवताओं का होता है . राहुल ने कश्मीर में बूंदाबांदी से बचने के लिए थोड़ी देर के लिए एक रेनकोट जैसा क्या डाल लिया; लगे लोग चिल्लाने - 'हो गई तपस्या भंग . पहन लिया जैकेट' . 

कुछ पहनो तो कहते हैं - ऐश , न पहनो तो नाटक, हो सकता है नीचे कुछ पहन रखा हो . मैं तेरे चक्कर में अपनी तपस्या भंग नहीं करूंगा . 

हमने कहा- राहुल तो यह तपस्या इसलिए कर रहे हैं कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान की गई तपस्या का लाभ कांग्रेस को मिला लेकिन धीरे-धीरे सत्ता सुख भोगने वालों की भीड़ ने उसके तपस्या के सारे पुण्य खर्च कर दिए . अब जब बैंक बेलेंस ख़त्म हो गया तो यह सब आवश्यक ही था .

बोला- इसीलिए तो कहता हूँ तपस्या बहुत ज़रूरी है किसी भी दल, देश, समाज के लिए . सिद्धि तपस्या के बिना नहीं मिलती. हाँ, बुद्ध, महाबीर, नानक,गाँधी की तपस्या दुनिया के हित के लिए थी तो भस्मासुर, रावण आदि की तपस्या अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए थी . आज भी जिन्होंने तपस्या की है उसका फल उन्हें मिल रहा है और अपनी सिद्धियों के दुरुपयोग के कारण उनके भी पुण्य क्षीण हो जायेंगे तो वे ज़मीन पर आ जायेंगे . फिर उनकी हालत भी उस तपस्वी जैसी हो जायेगी जिसकी धोती आसमान में सूखती थी . और जिसने एक बगुले को श्राप देकर  अपनी तपस्या गँवा दी . 

हमने तोताराम को अन्दर लेते हुए कहा- तू न तो भस्मासुर की तरह दुष्ट तपस्वी है और न ही किसी महापुरुष के सिद्धांतों की हत्या करके उसका मंदिर बनाकर धंधा करने वाला धूर्त पुजारी .

यह भी सच है कि इस दुनिया में किसी और की तपस्या पर कर्मकांड का धंधा करने वाले आपस में धर्मों के नाम पर झगड़ते हैं. हमने तो कभी दो दार्शनिकों को एक दूसरे का दुश्मन नहीं पाया . वे सब तो एक दूसरे का आदर करते हैं क्योंकि दर्शन धन्धा नहीं है . इसीलिए वे न तो चेले मूंडते हैं और न ही जादू के तमाशे दिखाते हैं और न ही प्रश्नों से घबराते हैं . दर्शन तो विवेक और ज्ञान का विकास है .जब कि तथाकथित आस्था के अड्डे अंधविश्वास के स्रोत और  धोखे की दुकानें हैं . 

खैर, आज तेरी इस तपस्या की सिद्धि स्वरूप चाय के साथ गाजर का हलवा भी है . चल अन्दर . 



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Jan 20, 2023

मोदी है तो कुछ भी मुमकिन नहीं है

मोदी है तो कुछ भी मुमकिन नहीं है 


आज तोताराम बहुत उत्साहित था, बोला- बस, दो चार महिने की बात और है . अहंकारी चीन को पीछे छोड़ देंगे . 

हमने कहा- क्या तो चीन और क्या उसकी औकात ? मोदी जी तो उसे नाम लेने लायक भी नहीं समझते . अब तो हम जी २० के अध्यक्ष हैं. दुनिया के सबसे धनवान और शक्तिशाली देश कोई कदम उठाने से पहले मोदी जी की तरफ देखते है . हम ब्रिटेन से भी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं . हाँ, यह बात और है कि अर्थव्यवस्था के जितने बड़े  आकार में संसाधनों का बंटवारा ७ करोड़ लोगों में होता है उतने में हम १४० करोड़ को निबटाते हैं . मतलब ब्रिटेन का एक व्यक्ति हमारे बीस व्यक्तियों जितने साधनों का उपयोग करता है . फिर भी तुलना करके खुश होने में क्या नुकसान है . दिल के बहलाने को गालिब...

बोला- मैं अर्थव्यवस्था की बात नहीं कर रहा . मैं तो जनसँख्या की बात कर रहा हूँ . २०२३ में हम चीन को पीछे छोड़ देंगे . मोदी है तो मुमकिन है .

हमने कहा- यह हम नहीं मानते . मोदी जी ने देश के विकास और सेवा के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले रखा है . वे संयम, सेवा, निग्रह, अनुशासन के साक्षात् विग्रह हैं . देश जी जनसँख्या वृद्धि में उनका कोई योगदान नहीं है . और न ही मुसलमानों और धर्म निर्पेक्षियों का कोई योगदान है . हाँ, उनके कुछ उत्साही, राष्ट्रवादी और हिंदुत्त्ववादी भक्तों का ज़रूर योगदान है जिन्होंने मुसलमानों के खतरे से देश को बचाने के लिए हिन्दुओं को पांच-पांच, सात-सात बच्चे पैदा करने की प्रेरणा देकर देश को यह गौरवपूर्ण उपलब्धि दिलवाई है . लेकिन हम एक बात ज़रूर दावे से कह सकते हैं मोदी जी के रहते कुछ भी 'मुमकिन' नहीं हो सकता .

बोला- क्या बात कर रहा है ? पिछले ३० वर्षों में दो-दो बार पूर्णबहुमत की सरकार देश को दी. नोटबंदी करके आतंकवादियों और काले धन वालों की कमर तोड़ दी . क्या आज तक कोई ऐसा कर पाया ? जोशीमठ और बद्रीनाथ के इलाके में मकानों में आने वाली दरारें मोदी जी के एक इशारे से बंद हो गई कि नहीं ? हैं कहीं कोई समाचार ?

हमने कहा- दरारें बंद नहीं हुई है . सरकार ने 'राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण' पर मीडिया से बात करने पर रोक लगा दी है .  इस देश के लोगों को शाम को समाचारों में अपने शहर का तापमान सुनकर सर्दी-गरमी लगती है . जैसे कि हिन्दू खतरे में, हिन्दू खतरे' कह कर लोगों को डराया जाता है वरना हजार साल से दोनों शांति से रहते रहे हैं कि नहीं ? यदि इन दोनों का सांप-नेवले, कुत्ते-बिल्ली, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और गाँधी जैसा ३६ का आंकड़ा होता तो कब के सब लड़-लड़ कर मर गए होते . 

बोला- कुछ भी कह मैं तेरी इस बात से कभी भी सहमत नहीं हो सकता कि 'मोदी है तो कुछ भी मुमकिन नहीं' . अरे, सारी दुनिया कह रही है- 'मोदी है तो मुमकिन है'. बिलकिस बानो के संस्कारी बलात्कारियों को समय से पूर्व छोड़ने का काम करके भी गुजरात में दो तिहाई बहुमत आ गया . तब ऐसा कौन सा काम है जो मोदी जी के रहते मुमकिन नहीं हो सकता ? वे लोगों को जूते मारकर भी जीत सकते हैं . उनका क्या कोई विकल्प है ? 

हमने कहा- विकल्प तो किसी का भी नहीं होता . क्या हाथी मक्खी का विकल्प हो सकता है ? हाथी बोझा ढो सकता है . राजा के जुलूस की शान बढ़ा सकता है लेकिन पौधों में परागण के लिए तो कीट-पतंगे चाहियें कि नहीं  ? क्या कोहीनूर हीरा या हजार करोड़ की कोई मूर्ति या मंदिर एक गिलास पानी का विकल्प हो सकता है ? क्या आँख का काम पैर से और पैर का काम आँख से चलाया जा सकता है ? समाज को अपनी-अपनी सीमाओं से आगे निकलना है तो अंधे और लँगड़े की दोस्ती की तरह मिलकर रहना होगा ? किसी के पास आँख है तो किसी के पास पैर . 

बोला- बहुत हो गई तेरी यह 'विकल्प विवेचना' . बस, मुझे तो एक बात का साफ़-साफ़ उत्तर से कि 'मोदी है तो मुमकिन' क्यों नहीं हो सकता ?'

हमने कहा- जैसे फैब इण्डिया 'जश्न-ए-रिवाज़' नहीं मना सकता उसे 'परंपरा का उत्सव' ही मनाना पड़ेगा . 'हिजाब' से हिंदुत्व खतरे में पड़ आता है इसलिए हिन्दू महिलाओं को 'हिजाब' की जगह 'घूँघट' करना पड़ेगा . घूँघट हरियाणा और राजस्थान की शान है . इकबाल की प्रार्थना 'लब पे आती है दुआ ' सुनकर बच्चा तो बच्चा अस्सी साल के बूढ़े का भी मन डोल जाता है और वह मुसलमान हो जाता है . इसलिए मोदी जी कभी भी 'मोदी है तो मुमकिन है'  नारे से सहमत नहीं होंगे . 

हाँ या तो वे तेजस्वी सूर्य से आज्ञा ले लें या फिर नारा बदल दें - 'मोदी है तो संभव है ' . 

बोला- लेकिन इसमें अनुप्रास का फ़ोर्स, लय और प्रवाह नहीं . मोदी जी को बात में फ़ोर्स चाहिए फिर चाहे भाषा कोई भी हो . 

हमने कहा- तो फिर यह नारा किसी और महापुरुष के नाम कर दें . 

बोला- कैसे ?

हमने कहा- 'शाह है तो संभव है' . 

बोला- मोदी जी की छाया में इतनी गुंजाइश नहीं है . वे कैमरे और अपनी छवि के बीच किसी मक्खी तक को बर्दाश्त नहीं करते . 

हमने कहा- तो झेलो उर्दू से हिंदुत्व को खतरा. फिर मत कहना कि बताया नहीं .   







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