Sep 14, 2021

उछाल की रेजगारी लूटने वाली रुदालियाँ

उछाल की रेजगारी लूटने वाली रुदालियाँ  


आज सुबह तोताराम नहीं आया.

किसी के आने न आने से क्या फर्क पड़ता है ? किसके बिना दुनिया रुकती है ? लोग कहते हैं- फलाँ साहब का कोई विकल्प नहीं है. या जैसे कभी कहा जाता था- आफ्टर नेहरू हू ? और अब देखिये कि नेहरू की कमी किसी को  नहीं खल रही है बल्कि अब तो यह सिद्ध किया जा रहा है कि इस देश का सत्यानाश करने वाले नेहरू न हुए होते तो भारत अब तक विश्वगुरु, नंबर वन, सबसे ताकतवर देश और यहाँ तक कि दुनिया का बाप बन चुका होता.  

वैसे अगर तोताराम आ भी जाता तो क्या करते ? वही फेंकुओं की फालतू लफ्फाजियों का कीचड़ उलटते-पलटते. हाँ, कल जो बैरंग लिफाफे का हादसा हमारे साथ हुआ उसके बारे में ज़रूर एक खीज थी. खैर, जब तोताराम आएगा तब सही.

कोई दस बजे तोताराम हाज़िर हुआ. धुला हुआ कुरता-पायजामा गले में राष्ट्रवादियों जैसा देशभक्तीय गमछा जिसमें हरा और भगवा रंग शांति के सफ़ेद रंग को दोनों तरफ से इस प्रकार दबा रहे थे जैसे हमारे स्वतंत्रता दिवस की ख़ुशी को अटल-निधन-दिवस और विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस ने घेर लिया है.  दोनों तरफ रोना. ऐसे में स्वाधीनता दिवस का क्या मज़ा.

तोताराम चलता हुआ ही बोला- चल, हिंदी पखवाड़े का निमंत्रण है. एक गमछा, मोमेंटो और चाय-नाश्ता पक्का.

हमने कहा- तीन साल पहले हमें चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी में बुलाया गया था. लौटते समय एक फॉर्म भरवा लिया, बैंक खाते का नंबर ले लिया. मानदेय और यात्रा भत्ता मिलाकर पाँच हजार रुपए भिजवाने की बात थी. वे पाँच हजार आज तक नहीं आये हैं. इसलिए हम कहीं नहीं जाते.

बोला- वैसे तो आजकल लोग फ्री में वेबीनार पर पिले पड़े हैं. एक सज्जन तो ३१ अगस्त से १४ सितम्बर तक का अखंड कविता पाठ का पखवाड़ा आयोजित करके वर्ल्ड रिकार्ड बनाने पर तुले हुए हैं. हो सकता वे कल को कवियों को 'आमरण काव्य पाठ' के लिए आमंत्रित करने लग जाएँ. सुनाने के लालच में कोई कवी तो फँस सकता है लेकिन  कोई श्रोता कभी ऐसा जोखिम नहीं उठाएगा.

एक हिंदी सेवी सज्जन ने अपने फेसबुक सर्कल में सरकार की शर्मिंदगी की समस्या फ्लोट कर रखी है. उनका मानना है कि सरकारी कार्यालयों में आयोजित हिंदी पखवाड़े में एक कार्यक्रम में भाषण झाड़ने के मात्र दो हजार रुपए दिए जाते हैं. वैसे उन्हें व्यक्तिगत रूप से तो कोई ऐतराज़ नहीं है.शायद मोदी जी की तरह मन से फकीर हैं. बस, वे तो इस कम मानदेय देने के कारण भारत सरकार की होने वाली बेइज्ज़ती से दुखी हैं.

वैसे तेरा क्या रेट है ?

हमने कहा- रेट तो भांडों और रंडियों के होते हैं. फिर चाहे वह दो हजार का हो या दो लाख का. महान चीजें तो हवा, धूप, बारिश की तरह अमूल्य होती हैं. वैसे पैसा लेकर भाषण झाड़ने वाले इन वक्ताओं के पास काम की कोई चीज नहीं है. अरे, यदि हिंदी और राष्ट्रभाषा आदि की समस्या का तुम्हारे पास कोई हल है तो एक मुश्त जितने रुपए लेने हैं वे ले लिवाकर झंझट ख़त्म करो. दे दो अपना रामबाण नुस्खा लिखकर भारत सरकार को. हर साल श्राद्ध पक्ष से पहले १४ सितम्बर को आने वाले हिंदी के इस पितर-पूजन पर हिंदी की श्रेष्ठता के गुणगान और साथ ही उसकी दुर्दशा का रोना रोने यह सालाना कार्यक्रम तो ख़त्म हो. 

भारत के अतिरिक्त किसी देश में राष्ट्रभाषा के लिए ऐसी किराए की रुदालियाँ नहीं देखी-सुनी होंगी. वैसे भी पार्टियों को भाषा, संवाद और संवेदना से क्या मतलब. उन्हें तो जैसे भी हो सिंहासन चाहिए. 'समरयात्रा' कहानी में उस समय के अंग्रेजों की गुलामी की जूठन खाने वालों के लिए प्रेमचंद की नोहरी कहती है- रांड तो मांड में ही खुश. सो ये सांस्कृतिक रुदालियाँ शव यात्रा में उछाली गई रेजगारी लूटने में ही धन्य हो रही है. सरकारों के लिए भाषा और संस्कृति की सेवा का इससे सस्ता सौदा और क्या होगा ?  


  



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धन्यवाद जोशी जी


धन्यवाद जोशी जी


जिन्हें देश को विश्व गुरु और अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर का बनाना है उनकी बात और है. वे तो यदि रात में चार घंटे भी सो लेते हैं तो देश के लिए बड़ी राहत की बात है. हमारे भरोसे अब कोई महान काम नहीं बचा है इसलिए हम तो रात में भी छह-सात घंटे सोते हैं और दोपहर में भी खाना खाने के बाद घंटे-आध घंटे 'आराम फरमा' लेते हैं. होता तो यह भी सोना ही है. बस, ज़रा बड़े लोगों की शब्दावली का छोंक लगा दिया है. 

तो जैसे ही आराम फरमाकर उठे तो हमारी पालतू 'मीठी' ने लघु शंकार्थ बाहर जाने के लिए हमारे कमरे के दरवाजे पर आकर भौंकना शुरू कर दिया. हमारा भारत तो इधर-उधर शंका समाधान के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध न होने के कारण शौचालय तक सीमित हो गया है लेकिन 'मीठी' के लिए न तो कोई विशिष्ट शौचालय है, न उसका ऐसा कोई प्रशिक्षण हुआ है और न ही हमारे यहाँ 'स्वच्छता सैनिक' इतने सजग हैं कि खुले में शौच करने पर बिहार की तरह किसी की लुंगी उतरवा लें. वे तो खुद इधर-उधर निबट लेते हैं. और तो और पी लेने के बाद तो उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि उनका मुँह दीवार की तरफ है या सड़क की तरफ.

जैसे ही 'मीठी' को लेकर निकले तो देखा, तोताराम गले में भगवा दुपट्टे और माथे पर बड़े से तिलक से सुशोभित साक्षात् राष्ट्र हुआ चला आ रहा है. 

हमने कहा- तोताराम, तेरी सुबह की चाय बकाया है. चाहे तो बनवा देंगे. नहीं तो दो मिनट बैठेंगे. कल हमारे साथ एक हादसा हो गया. सुबह तू जल्दी में था इसलिए बता नहीं सके. अब उस बारे में बात करना चाहते हैं. 

बोला- अभी बता दे. घर पर चल कर ही क्या होगा.

हमने कहा- नहीं. बात ही ऐसी है.

घर लौटने पर बोला- अब बता. 

हमने कहा- कल हमें एक लिफाफा मिला. भेजने वाले का कहीं नाम नहीं था. लिफाफा रोळी से चिरचा हुआ था लेकिन टिकट नहीं लगा हुआ था, बैरंग था. हमने सोचा, हो सकता है भेजने वाला टिकट लगाना भूल गया होगा. दस रुपए देकर छुड़ाया. खोलकर देखा तो अन्दर कागज का एक छोटा-सा  टुकड़ा जिस पर लिखा था 'जोशीजी धन्यवाद'. लोग कितने बदमाश हो गए हैं. क्या चाटें इस धन्यवाद का. 

बोला- ठीक है, दस रुपए लगे लेकिन लिफाफा भेजने वाले को तुझसे मिला क्या ? और कुछ नहीं तो उसका लिफाफे का ही एक रुपया तो खर्चा हुआ. तेरे दस रुपए तो पोस्टल डिपार्टमेंट के पास गए. पर इससे तेरी इमेज तो बनी. यदि इसी तरह रोज तेरे यहाँ सौ-दो सौ लिफाफे आने लगें तो जल्दी ही तेरा नाम अखबारों में आने लगेगा. तेरा वीडियो वाइरल होते देर नहीं लगेगी. फिर तू सेलेब्रिटी हो जाएगा.  

हमने कहा- यदि इसी तरह हजारों लिफाफे आने लगे तो मेरी पेंशन ही नहीं, मासिक आय योजना वाला ऍफ़ डी. भी निबट जाएगा.

बोला- भविष्य में ऐसा कोई लिफाफा मत छुड़वाना. तुझे पता है, मोदी जी के सत्तर वर्ष पूरे होने पर तीन सप्ताह तक विविध कार्यक्रम किये जायेंगे. उनमें से एक है मोदी जी के नाम से 'धन्यवाद मोदी जी' के पाँच करोड़ पोस्ट कार्ड लिखना. इससे उनकी छवि में सुधार होगा. 

हमने कहा- उनकी छवि को क्या हुआ है ? पोस्ट ऑफिस, पेट्रोल पम्प, रेलवे स्टेशन, कोरोना के सर्टिफिकेट, अनाज के थैलों सभी जगह वे ही तो हैं. ह सकता है 'मुफ्त अन्न वितरण महोत्सव'  के के अन्न के दानों को सूक्ष्म दर्शक यंत्र से देखने पर उन पर भी मोदी जी का फोटो दिखाई दे. उनकी छवि तो ऐसी वैश्विक हो गई है कि आज अमरीका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ लें तो भी जीत जाएंगे. लेकिन इतनी व्यस्तता में पाँच करोड़ पोस्टकार्ड पढ़ना, उनके उत्तर देना, यदि बैरंग हुए तो डबल चार्ज देना. बहुत मुश्किल काम है. पहले दिन में जो चार घंटे सो लेते हैं पर अब तो वह भी संभव नहीं पाएगा.

बोला- ऐसी बात नहीं है. न तो कुछ पढ़ना है, न कोई उत्तर देना है. पोस्टमैन भी क्या डबल चार्ज मांगेगा. पी.एम. हाउस का पता देखकर जो कुछ भी होगा पटक आएगा वहाँ. और उनका मीडिया सेल उस गिनती को बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित करेगा जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ेगी. तब वे आसानी से उत्तर प्रदेश का चुनाव जीत जायेंगे.  बंगाल वाला 'खेला' और किसानों का धरना अब तक होश फाख्ता किये हुए है.

हमने कहा- चलो कोई बात नहीं. ये सब राजनीति के नाटक हैं. पर हमें तो उस दुष्ट पर गुस्सा आ रहा है जिसने बिना बात हमें बैरंग लिफाफा भेज कर उल्लू बना दिया. 

तोताराम ने जेब से दस रुपए का नोट निकालते हुआ कहा- माफ़ करना मास्टर, यह शैतानी तो मैंने ही की है.

हमने कहा- लेकिन यह 'धन्यवाद जोशी जी' का नाटक करने की क्या ज़रूरत थी.  मोदी जी ने तो सबको फ्री में  टीका लगवाया, किसी को ऑक्सीजन की कमी से मरने नहीं दिया,अब अस्सी करोड़ लोगों को अपना फोटो छपे थैले में अनाज बंटवा रहे हैं. खिलाडियों का हौसला बढ़ाकर देश को मैडल दिला रहे हैं.  हमने तो कुछ किया नहीं,फिर कैसा धन्यवाद.

बोला- रोज चाय पिलवाता है वह क्या किसी टीके और ऑक्सीजन से कम है ?  

हमने कहा- क्या बताया जाए, आजकल लोगों को अपने कर्मों और नीयत पर विश्वास नहीं रह गया है इसलिए ऐसे नाटक किये जा रहे. 'धन्यवाद' कृतज्ञता का एक सहज भाव है जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं होती. क्या किसी प्याऊ पर पानी पीकर, क्या गरमी में किसी पेड़ के नीचे बैठकर प्रकृति या उस पेड़ को लगाने वाले के बारे में विचार करके या प्याऊ लगवाने वाले के प्रति स्वतः ही धन्यवाद या कृतज्ञता की कोई अनुभूति नहीं होती ? मूक, मौन, जड़-जंगम भी अपनी तृप्ति के लिए स्रष्टा का धन्यवाद सा देते लगते हैं. क्या भोजन से पहले सभी लोग ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए पोस्टकार्ड लिखते हैं ? 

लगता है किसी दिन सूरज को उगाने के लिए पार्टी के अनुशासित सिपाही नेता को धन्यवाद के पोस्ट कार्ड लिखने लगें. हो सकता कभी कोई भक्त भगवान को नमस्ते करने पर बाद उससे प्रमाण स्वरूप 'नमस्ते-प्राप्ति' की रसीद माँगने लगे.

ज़माना बहुत बदमाश और आडम्बरी होता जा रहा है.

बोला- कोई बात नहीं, हरियाणा का किसानों का सिर फोड़ने की गर्वपूर्ण घोषणा करने वाला अधिकारी आयुष सिन्हा और उसके आका स्पष्ट रूप से, मन से क्षमा न  मांगें लेकिन मैं तुझे 'धन्यवाद' का लिफाफा भेजने और तुझ पर दस रुपए का जुर्माना लगवाने के लिए 'सॉरी' बोलता हूँ.

हमने- इट्स ओके.



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Sep 6, 2021

तू कैसा राष्ट्र निर्माता है ?


तू कैसा राष्ट्र निर्माता है ?


इधर हमारी सुबह पाँच बजे की अलार्म बजी और उधर दरवाजा खटखटाने की ध्वनि सुनाई दी. हम दुविधा में थे कि पहले अलार्म को बंद करें या दरवाजा खोलें जैसे भारत सरकार अफगानिस्तान पर नीति-निर्धारण के लिए  मंथन कर रही है कि वहाँ के तालिबान अच्छे तालिबान हैं या बुरे, देशद्रोही है या देशभक्त. उनसे सीधे बात करें या किसी दूसरे देश में गुप्त वार्ता की जाए. वैसे इस समय अफगानिस्तान में वहाँ के देशभक्त और सच्चे धर्म सेवक सुरक्षा की दृष्टि से महिलाओं को फिलहाल घरों में ही बने रहने की सलाह दे रहे हैं तो उसी तर्ज़ पर हमारे यहाँ भी जींस तथा विधर्मियों से संपर्क बढ़ाने, उनसे चूड़ियाँ खरीदने, उनकी दूकान या ठेले, विशेष रूप से 'श्रीनाथ डोसा भण्डार' जैसे नाम वालों से सामान खरीदने से देश-धर्म को खतरा हो सकता है.प्लेन में एक सांस्कृतिक दृष्टि संपन्न मुख्यमंत्री ने फटी जींस पहने महिला पर संस्कारहीन होने को मोहर लगा दी तो बिहार में एक माता-पिता ने जींस पहनने की जिद करने वाली बेटी के चरित्र की पवित्रता की रक्षा के लिए उसकी हत्या ही कर दी. चरित्र की पवित्रता के सामने प्राणों का क्या मोल !

जैसे विकास-व्यस्त और विकास-व्यग्र सरकार नौ-दस महिने से धरना प्रदर्शन के बावजूद किसान-हित (!) में बनाए गए तीनों कानूनों को वापिस नहीं ले रही है, अर्थव्यवस्था को पाँच-दस ट्रिलियन की बनाने के चक्कर में नेहरू युग के 'कलंक चिह्न' सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को किसी को भी औने-पौने दामों में बेचने के लिए कृतसंकल्प है वैसे ही हम पहले तसल्ली से अलार्म बंद करेंगे उसके बाद दरवाजा खोलेंगे, भले ही दरवाजा खटखटाने वाला उसे तोड़ ही क्यों न दे या जनता की चुनी हुई लोकप्रिय सरकार का मुख्यमंत्री-प्रिय अधिकारी किसानों के सिर फोड़ने का जन-हितकारी आदेश को क्यों न दे दे.

हम अलार्म बंद करके दरवाजे पर पहुंचे भी नहीं थे कि एक उसी तरह की कड़क आवाज़ आई जैसी ज़बरदस्ती  प्रभु नाम उच्चारण करवाने वाले भक्तों की होती है- अरे आलसी मास्टर, क्या ऐसे ही राष्ट्र का निर्माण करेगा ? लानत है तेरे 'राष्ट्र-निर्माता' होने पर .

हमने आवाज़ पहचान ली. आखिर ऐसी दबंग, गरजती और दुनिया-दुश्मनों और पड़ोसी आतंकवादियों व बुरे  तालिबानों के दिल दहला देने वाली आवाज़ ३० इंची सीने वाले तोताराम के अतिरिक्त और किसकी हो सकती है !

तोताराम को अन्दर लिया, आँख-मुंह धोकर बरामदे में बैठते हुए तोताराम ने हमारी लानत-मलामत करते हुए कहा- राष्ट्र निर्माण करने के लिए छह घंटे से अधिक सोना वर्जित है. राष्ट्र-निर्माण करने वाले अठारह-अठारह घंटे काम करते हैं. 

हमने कहा- हमारे हिन्दू धर्म में साल में चार महिने देवताओं के सोने का भी विधान है जिससे विकास और निर्माण पीड़ित जनता को कुछ साँस लेने का मौका मिल सके. अति किसी भी बात की बुरी होती है फिर चाहे वह विकास की हो, आत्ममुग्धता की हो, दूसरों का मज़ाक उड़ाने की हो, नाम-परिवर्तन में ही धर्म-रक्षा और गौरव-वृद्धि की हो. फिर हमने राष्ट्र-निर्माण का काम पिछले बीस साल से कम कर दिया है और पिछले सात साल से तो एकदम बंद ही कर दिया है. जब देश में राष्ट्र-निर्माण, विकास और गर्व-वृद्धि करने वाली एक अभूतपूर्व और समर्पित टीम सत्ता में आ गई तो वह सब संभाल लेगी.

बोला- क्यों, क्या देश-हित और निर्माण का ठेका मोदी जी और योगी जी ने ही ले रखा है ?

हमने कहा- हाँ, ले रखा है. वे इतने सक्षम हैं कि उन्हें किसी और की मदद और सलाह की ज़रूरत ही नहीं है.  इतने परफेक्शनिस्ट हैं कि उन्हें किसी और का किया हुआ विकास पसंद भी तो नहीं आता. नेहरू, इंदिरा और राजीव द्वारा किये गए गलत विकास को सुधारने में ही उन्हें कितनी इनर्जी व्यर्थ करनी पड़ रही है. प्लेन ज़मीन पर मकान बनाना अधिक सरल है. पुराने मकान की गिरवाना, सफाई करवाना, मलबा फिंकवाना क्या कोई आसान काम है ? खर्चा और समय दोनों की बर्बादी. ऐसे ही पुराने वस्त्र को उधेड़कर दुबारा किसी के नाप का वस्त्र बनाना बहुत सिर दर्दी का काम है. उधेड़ो, चुन-चुनकर धागे निकालो, धोओ, प्रेस करो. फिर भी लगता है जैसे किसी का जूठा बरतन साफ़ कर रहे हैं.  बस, समझ ले दोनों उत्साही सेवकों की यही सबसे बड़ी समस्या है. वरना अब तक सिलावानिया के बल्ब के विज्ञापन वाले,अंग्रेजों के ज़माने के जेलर असरानी की तरह ये सारे घर के बदल डालते.

बोला- मास्टर, इतना भी कठोर मत बन. जैसा भी बन पड़े मोदी जी का सहयोग कर. आखिर हम अब भी बरामदे में बैठे पेंशन पेल रहे हैं. 

हमने कहा- हमने तो चालीस साल नौकरी की है. उन नेताओं के बारे में सोच जो जितनी बार जनसेवा के लिए चुने गए उतनी ही संख्या में पेंशनें ले रहे हैं, मुफ्त रेल यात्रा, परिवार और खुद के लिए जीवन भर मुफ्त चिकित्सा सुविधा. और भी जाने क्या-क्या. अब हमारे पास तो प्राण बचे हैं सो भी चलने को तैयार बैठे हैं. हम कौन भारत रत्न और राष्ट्रपति पद की प्रतीक्षा में नब्बे पार करके भी भीष्म की तरह शर-शैय्या पर लेटे हैं. 

गैस की सबसीडी अपने आप ही बंद कर दी, पोस्ट ऑफिस की मासिक आय योजना का ब्याज घटा दिया, १८ महिने का डीए का एरियर हजम, भविष्य में कोई पे कमीशन नहीं. अब तो हम जैसे बरामदा-चाय-विमर्श वालों पर यूएपीए लगाना शेष रह गया है.

बोला- तेरी बातों को देखते हुए वह भी असंभव नहीं है. फिर वहां चाय तो दूर फादर स्टेंस की तरह स्ट्रा भी नहीं मिलेगी.




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Sep 3, 2021

लोक-परलोक-कल्याण-मार्ग

लोक-परलोक-कल्याण-मार्ग  


आज तोताराम कुछ परिवर्तनकारी-सृजनात्मक मूड में था, बोला- मास्टर, क्यों न अपनी इस गली का नामकरण कर दें, पहचान, परिवर्तन और गौरवानुभूति तीनों एक साथ हो जायेंगे. 

हमने कहा- तेरा नाम शुकदेव रख दिया जाए तो क्या तू शुकदेव जी की तरह संसार-विरक्त हो जाएगा ? क्या तुझे वेदव्यास का अयोनिज पुत्र मान लिया जायेगा ? अपनी गली को किसी नाम की ज़रूरत नहीं है. भले ही अपनी नगर  परिषद् सीकर को सफाई में मेरिट में मानती हो या शिक्षा का धंधा करने वाले सीकर को  'एज्यूकेशन हब' कहते हों लेकिन जो यहाँ के लोग बतियाते हैं वही सच है. और वह सच कटु है.  राजनीति की बात और है. उसमें सत्ताधारी दल का हर चुनावोपयोगी व्यक्ति अमर, स्वर्गीय और यशस्वी होता है. जब तक सूरज चाँद रहता है तब तक उसका नाम रहता है. वह स्वर्गीय कहलाता है. भले ही उसके डर से भले लोग स्वर्ग जाने से भी कतराने लगते हैं. 

तू कुछ भी नाम रख ले लेकिन इस गली की पहचान रहेगी 'कूड़े वाली गली' या 'कीचड़ वाली गली'. जब भी नगर परिषद् वालों को फोन करो तो 'मंडी के पास' बोलते ही कम्प्लेंट वाला पूछता है- क्या, वही कीचड़-कूड़े वाली गली ? वैसे यह बात सदैव याद रखना कि नाम रखने और बदलने का अधिकार इस समय केवल दो ही महापुरुषों के पास है. खैर, फिर भी बता, तू क्या नाम रखना चाहता है ?

बोला- लोक-कल्याण-मार्ग.

हमने कहा- यह नाम वैसे ही निरर्थक है जैसे किसी भिखमंगे का नाम 'किरोड़ीमल' या गली के लेंडी कुत्ते का नाम 'शेरू' रखा दिया जाए. 

बोला- हम में क्या कमी है. हम महान भारत के ब्रह्मज्ञानी, ब्राह्मण कुलोत्पन्न, वयोवृद्ध गुरुजन हैं. दशकों से यहाँ चाय पर ब्रह्मचर्चा करके लोक का कल्याण करते हैं. मेरा 'इस लोक का कल्याण' भी तेरे यहाँ सुबह-सुबह  फ्री की चाय पीकर ही होता है. 

हमने कहा- तू लाख अपने ब्राह्मणत्त्व पर मुग्ध हो ले लेकिन 'लोक कल्याण मार्ग' वही हो सकता है जहां देश-दुनिया का कल्याण करने वाले महान पुरुष रहते हों. और वह इस समय दिल्ली में है जहाँ जन-कल्याण के लिए प्रतिबद्ध विकास-पुरुष रहते हैं. जिसे पहले 'रेस कोर्स रोड़' कहा जाता था. 

बोला-  तो फिर इसका नाम 'परलोक-कल्याण-मार्ग' रख देते हैं. मुझे चाय पिलाने से तेरा कुछ तो परलोक सुधरता होगा. 

हमने कहा- वह भी संभव नहीं क्योंकि वह कल्याण सिंह जी के नाम पर रख दिया गया है- कल्याण सिंह मार्ग.

बोला- लेकिन इस नाम का वह अर्थ तो नहीं निकलता जो तू बता रहा है. जैसे 'स्टेशन मार्ग' का अर्थ क्या होगा ? यही कि इस मार्ग पर चलते जाओ तो स्टेशन पहुँच जाओगे.  'श्मशान मार्ग' पर चलते-चलते कोई कहाँ पहुंचेगा ? इस तरह 'कल्याण सिंह मार्ग' का मतलब यह होगा कि इस मार्ग पर चलते-चलते आप कल्याण सिंह जी के पास पहुँच जाओगे जो इस समय संविधान से ऊपर अपना 'पार्टी-हित' साधन करने के कारण 'रामजी' की बगल में बैठे होंगे. जब यह मार्ग परलोक सुधारने वाले राम के मंदिर अर्थात आवास को जाता है तो इसका नाम होना चाहिए- 'परलोक-कल्याण-मार्ग'. 

हमने कहा- पहुँच गया ना वहीं जहाँ हम बता रहे थे. इसलिए छोड़ लोक-परलोक का चक्कर. लोक और परलोक दोनों सत्ताधीशों के लिए रिज़र्व होते हैं. उन्हीं का इस और उस लोक में कल्याण होता है. हम तो यही कामना करें कि इसी तरह चाय पर महापुरुषों की चर्चा करते हुए, मोह-माया मुक्त होकर शांति और शालीनता से निर्वाण को प्राप्त हो जाएँ और इस नश्वर देह का इज्जत से निबटान हो जाए. 

सुना है कोरोना की तीसरी लहर आने वाली है जिसमें रोज ४-५ लाख लोग संक्रमित होंगे. हालाँकि देश में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है फिर भी किसे पता, कहीं गंगा में तैरते न मिलें. कुत्ते-कव्वे नोचेंगे तो बहुत बुरा लगेगा.  




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