Sep 25, 2021

खेलशक्ति का डबल इंजन

खेलशक्ति का डबल इंजन


इस दुनिया को विचारकों ने तरह-तरह से परिभाषित किया है, विभिन्न रूपकों और प्रतीकों में बाँधा है. कोई इसे बाज़ार कहता है, कोई सराय, कोई मंडी. सब अपने-अपने हिसाब से आते-जाते हैं, छल-छंद करते हैं, सौदा करते हैं. इनमें बिकने वाली जिन्सें भी अलग-अलग होती हैं. कुछ चलती-फिरती मंडियाँ होती हैं जो होटलों और रिसोर्टों कहीं भी सज जाती हैं जिनमें घोड़ों की खरीद-फरोख्त होती है. जिनमें चतुर लोग महंगे दामों में गधे और खच्चर भी पेल जाते हैं. लोकतंत्र में विश्वास न करने वाले या सेवकों से जलने वाले इन जानवरों को विधायक और सांसद भी कहते हैं.

हमारे घर के पास भी एक मंडी है, कृषि उपज मंडी. इसलिए यहाँ घर-गृहस्थी की ज़रूरतों के सेवा सप्लायरों के साथ-साथ कृषि उत्पादों से संबंधित लोगों की गहमा-गहमी भी रहती है. छाते-कुकर ठीक करने वालों से लेकर बाल खरीदने वाले भी पहुँच जाते हैं. पता नहीं इससे किस के कानों पर रेंगती जुओं का अध्ययन करने का कोई षड्यंत्र है या किसी गंजे को रवीन्द्रनाथ ठाकुर बनाने का. अखबार डालने वालों के साथ-साथ ही उन्हें खरीदने वाले कबाड़ी भी घूमने लगते हैं. शायद उन्हें पता है कि आजकाल के ताली-थाली वाले लोकतंत्र में अखबारों की औकात रह ही कितनी गई है !

सुबह-सुबह कबाड़ियों के साथ-साथ सब्जी के ठेले लगाने वाले भी मंडी से सब्जी खरीदने के लिए अपने खाली ठेले, कट्टे, बाट, तराजू रखे इधर से गुजरते हैं. दोनों के ठेले ही खाली होते हैं इसलिए दोनों में जल्दी से अंतर करना कठिन हो जाता है. ऐसे में, ऐसे ही एक ठेले पर पुराना टीवी रखे ठेले वाले के साथ एक दुबली-पतली आकृति भी जाती दिखाई दी. हमने ध्यान से देखा तो तोताराम.

हमने पूछा- सुबह-सुबह, गुपचुप किधर, तोताराम ? अरे, नहीं दिया मोदी जी ने १८ महिने का ३०-४० हजार का एरियर लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि कबाड़ी का काम करके विकास पर आमादा, अर्थव्यवस्था को ५ ट्रिलियन की बनाने पर अड़ी सरकार को बदनाम करे. वैसे ही ओलम्पिक पदक विजेता खिलाड़ियों का स्वागत-सत्कार करने वाले उत्साही नेताओं को लोग बदनाम करने में लगे हुए हैं. कहते हैं खिलाड़ियों के लिए करते कुछ नहीं. बस, मुफ्त का श्रेय लेने के लिए नाटक कर रहे हैं. 

बोला- मैं कोई नाटक नहीं कर रहा हूँ. मैं कटिहार ( बिहार ) के उस मास्टर की तरह नहीं हूँ जो सड़क पर 'मिड डे मील' के अनाज के फटे बोर दस-दस रुपए में बेचकर सुशासन बाबू को बदनाम कर रहा था. अच्छा हुआ जो उसे नौकरी से हटा दिया. अब वास्तव में ही भीख मांगेगा. मैं तो भारत को कम्प्यूटर पॉवर, आध्यात्मिक पॉवर, योग पॉवर बनाने के बाद अब खेल पॉवर बनाने के लिए काम करना चाहता हूँ. 

हमने कहा- ठेले पर पुराना टीवी रखने से भारत खेल पॉवर कैसे बनेगा ?

बोला- प्रक्रिया बहुत लम्बी है. पता नहीं, तुझे समझ आएगी या नहीं फिर भी बता देता हूँ. यह २५ साल पुराना टीवी है जिसे गोदी मीडिया की तालीवादक भूमिका के कारण देखने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है. वैसे भी सभी प्रकार का कूड़ा-कचरा स्मार्ट फ़ोनों पर उपलब्ध हो ही जाता है. लेकिन जब से सुना है कि नेताओं द्वारा मोदी जी की देखादेखी ओलम्पिक खेल देखकर देश में खेलों का विकास किया जा रहा है, खिलाड़ियों को पदक जीतने में मदद की जा रही है तब से सोच रहा हूँ इसमें तो मैं भी योगदान दे ही सकता हूँ. जैसे हरियाणा के एक मंत्री ने सम्पूर्ण साज-सज्जा के साथ राजनीति के कई अन्य खिलाडियों के साथ, बिना मास्क लगाए, समूह में टीवी पर खेल देखकर 'हो-हो' करते हुए वीडियो बनवाकर नेट पर डाला है  वैसे ही मैं भी टीवी देखूँगा, 'हो-हो' करूंगा और देश को खेलशक्ति बनाऊँगा. 

हमने कहा- तेरी इस देशभक्ति या खेलभक्ति से हमारी जो दुर्दशा हो रही उसकी बराबरी तो आन्दोलन कर रहे किसानों के असमंजस और संसद में जासूसी सोफ्टवेयर 'पेगासस'  पीड़ित विपक्ष के टेंशन से भी नहीं की जा सकती. अरे, खेल और खिलाड़ियों से इतना ही प्रेम है तो नवीन पटनायक की तरह वास्तव में कुछ करो. खिलाड़ियों को भरपेट खाना तो दो, किसी रानी रामपाल को अश्वत्थामा की तरह आटा घोलकर या दूध में पानी की कुंठा का  घालमेल तो न करना पड़े. न दो क्षत्रिय कंगना रानावत की तरह सुरक्षा लेकिन स्टार स्कोरर, दलित, वंदना कटारिया को जातीय गर्व से भरे हुए लफंगे स्वयंसेवकों की गालियों से तो बचाओ. सलीमा टेटे की झोंपड़ी की धज तो देख लो. अप्रैल २०१८ में कहा गया था कि देश के आखिरी गाँव में बिजली पहुँच गई है. सलीमा के घर ही नहीं, गाँव में भी बिजली नहीं है.

बोला- लेकिन वह तो ऑक्सीजन, टीके, कानून-व्यवस्था, सामान्य सुविधाएं आदि की तरह राज्यों का विषय है. 

हमने कहा- बहाना नहीं चलेगा. केंद्र में भी तुम और वंदना के उत्तराखंड में भी तुम. जब डबल इंजन में भी गाड़ी नहीं चल रही तो कब चलेगी ?




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Sep 19, 2021

डेविल्स बाइबिल

डेविल्स बाइबिल  


तोताराम नियमानुसार सुबह तो आया ही था लेकिन आज शाम को भी हाज़िर. 

हमने कहा- क्यों बिना बात पीछे पड़ा है ? हम कोई बड़े नेता थोड़े ही हैं जो तुझे किसी राज्य का पार्टी का अध्यक्ष बना देंगे या कहीं का राज्यपाल या विश्वविद्यालय का कुलपति बना देंगे. आज तो ऐसे आ गया जैसे डबल इंजन लग गया हो. यहाँ कौनसा चुनाव हो रहा है जो दिन में दो-दो बार दर्शन-दान.

बोला- क्या मुझे इतना सस्ता समझ रहा है कि कुलपति बनकर दूसरों के यशगान का 'निमित्त मात्र' बनकर उपकुलपतियों को किताबें बेचता रहूं. मुझे कुछ नहीं चाहिए. जिनको कछू न चाहिए सो ही साहंसाह. मैं तो सोच रहा था कि तुझे दो पैसे की आमदनी की करवा दी जाए. भले ही तू रोज सूखी चाय ही पिलाता है.

हमने कहा- जब जवानी में ही ट्यूशन नहीं पढ़ाया तो अब आखिरी वक़्त में क्या ख़ास मुसलमां होंगे. और किसी प्राइवेट स्कूल की प्रिंसिपली भी हमें नहीं करनी. अधिकतर नेता साइड बिजनेस के रूप में स्कूल के धंधे में भी फंसे हुए हैं. काम लेते हैं डबल और पैसा देते हैं आधा. परीक्षा के समय मेरिट लाने के चक्कर में नक़ल करवाने को कहते हैं. हम भी मोदी जी की तरह फकीर हैं. कोई ऐसा-वैसा कहेगा तो हम झोला उठाकर चल देंगे. 

बोला- बिना बात के भाव मत खा. तेरे खूंसटपने से सीकर के सभी स्कूल वाले वाकिफ हैं. तू कवि बना फिरता है. मैं तो तेरे लिए एक 'चालीसा' लिखने का काम लाया था. मेरे एक परिचित के परिचित एम एल ए को एक बड़ी पार्टी ने खरीदने का ऑफर दिया है. वह अपना चालीसा लिखवाना चाहता है. दस हजार नक़द. कल सुबह चाहिए. 

हमने कहा- तुलसीदास जी की कोई पेंशन नहीं थी फिर भी उन्होंने किसी नश्वर मनुष्य का गुणगान नहीं किया. एक बार शायद एक-दो लाइनें लिख दी होंगी तो पश्चाताप करते रहे-

कीन्हें प्राकृत जन गुणगाना

सिर धुनि गिरा लागि पछिताना 

हमसे न होगा. हमें तो भगवान ने पेंशन दे रखी है. मोदी जी की कृपा से अब तो ११% डी. ए. भी रिलीज हो गया.

बोला- और ६०-७० हजार रुपए का एरियर खा गए उसका कोई ज़िक्र नहीं.

हमने कहा- खैर मना जो जुलाई से ही सही डी. ए. दे तो दिया. डी. ए. भी नहीं देते और किसानों की तरह खालिस्तानी कहकर फँसा देते तो तो क्या कर लेता ? फादर स्टेन की तरह देशद्रोह का केस लगवा देते तो अब तक निबट गया होता.

बोला- भाषण मत झाड़.  मुद्दे की बात पर आ. दो सौ आलेख लिखेगा तब कहीं दस हजार रुपए बनेंगे सो भी दो साल में. इसमें क्या है. घंटे दो घंटे का काम है. तुलसीदास जी परफोर्मा बनाकर दे गए हैं बस, कहीं-कहीं नेताजी के माता-पिता का नाम जैसा कुछ भरना है. नहीं करना है तो बता दे. लालू, राबड़ी, अटल, मोदी चालीसा लिखने वाले कई तैयार बैठे हैं . कुछ तो टाइम कम. और फिर सोचा जब सभी अपने वालों को साथ में विदेश ले जाकर तीन गुना महंगा ठेका दिलवाकर लाते हैं तो मैं भी कण भर ही सही, नेपोटिज्म कर लूँ. 

हम भी लालच में आ गए, कहा- नेता का नाम-पता.

बोला- यह अभी गुप्त रखा जाएगा और बाद में भी तू कभी नहीं कहेगा कि यह चालीसा तेरी रचना है. नेताजी इसे दैवीय कहकर प्रचारित करेंगे. नाम की जगह खाली छोड़ देना. चार मात्राओं का नाम है जैसे जोशी या तोता. आ आ,ई, ई 

हमने.कहा- इतनी भी क्या जल्दी है ? जब तेरे नेताजी बड़े नेता बन जायेंगे तभी तो यह चालीसा और उनके मंदिर के नाटक दरकार होंगे. हमारे नीतिकारों ने भी कहा है- जल्दी का काम शैतान का.  सच है हर गलत काम ऐसे ही होता है.

बोला- और ये लोग कौन से संत हैं. ये सब संतों के वेश में शैतान ही हैं. इसलिए इनके सब काम शैतानी ही होते हैं. तूने 'डेविल्स बाइबिल' के बारे में पढ़ा या नहीं ? 

हमने कहा-  बचपन में किसी 'गड़बड़ रामायण' के बारे में तो सुना करते थे. कहते हैं उसके रचनाकार को कोढ़ हो गया था. वैसे आजकल राजनीति में गाँधी-नेहरू के समस्त काल के बारे में गड़बड़ रामायण जैसा ही लेखन तो चल रहा है. सभी धर्म ईश्वर को मानते हैं और सभी मनुष्यों को उसकी संतान मानते हैं फिर भी एक दूसरे के प्रति शैतान की तरह घृणा फैलाने में ही लगे हुए हैं. अब सर्वधर्म समभाव की तरह से नया नारा गढ़ा जा रहा है- 'चादर -फादर मुक्त भारत'.  लेकिन यह 'डेविल्स बाइबिल' अर्थात 'शैतानी बाइबिल' कहाँ से आगई ? 

बोला- स्वीडन के एक पुस्तकालय में चमड़े के १६० पन्नों पर लिखी ८५ किलो वज़नी एक बाइबिल है जिसका नाम है-डेविल्स बाइबिल. कहते हैं १३ वीं शताब्दी में एक ईसाई मठवासी सन्यासी को वहाँ के नियमों को भंग करने के फलस्वरूप दीवार में चुनवाने की सजा दी है. 

संन्यासी ने सजा से बचने के लिए कहा कि यदि उसे एक रात का समय दिया जाए तो वह मानव ज्ञान की एक ऐसी किताब लिख सकता है जो भविष्य में मठ को भी गौरवान्वित करेगी.   

हमने पूछा- तो क्या एक रात में १६० पेजों की मौलिक रचना करके उसे चमड़े पर लिखा भी जा सकता है ?

बोला- नहीं. तभी तो जब उस संन्यासी ने देखा कि वह अकेले पूरी किताब नहीं लिख सकता है तो उसने एक विशेष प्रार्थना की और शैतान को बुलाया. उस शैतान से उसने अपनी आत्मा के बदले किताब को पूरा करवाने के लिए मदद मांगी। शैतान इसके लिए तैयार हो गया और उसने एक रात में ही पूरी किताब लिख दी। 

हमने कहा- अब इसमें एक बात पर ध्यान दे कि शैतान से उस तथाकथित संन्यासी से उसकी आत्मा के बदले किताब लिखने का सौदा किया. मतलब जब कोई अपनी आत्मा बेच देता है तो उसका विवेक भी समाप्त हो जाता है. बिना विवेक के ही ऐसे खुराफाती काम हो सकते हैं.  मज़े की बात देख, भले काम में भले ही कोई साथ दे या न दे लेकिन खुराफात में ज़रूर सबका साथ, सबका विकास हो जाता है. लगता है लोग एक दिन में लाखों शौचालय बनवाने और करोड़ों टीके लगवाने का रिकार्ड इसी तरह बनवाते हों.

हम किसी शैतान से अपनी आत्मा का सौदा नहीं कर सकते. बिना साफ़-सुथरी आत्मा के ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाएँगे. 

कोरी चुनरिया आतमा मोरी मैल है माया जाल.  



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Sep 14, 2021

उछाल की रेजगारी लूटने वाली रुदालियाँ

उछाल की रेजगारी लूटने वाली रुदालियाँ  


आज सुबह तोताराम नहीं आया.

किसी के आने न आने से क्या फर्क पड़ता है ? किसके बिना दुनिया रुकती है ? लोग कहते हैं- फलाँ साहब का कोई विकल्प नहीं है. या जैसे कभी कहा जाता था- आफ्टर नेहरू हू ? और अब देखिये कि नेहरू की कमी किसी को  नहीं खल रही है बल्कि अब तो यह सिद्ध किया जा रहा है कि इस देश का सत्यानाश करने वाले नेहरू न हुए होते तो भारत अब तक विश्वगुरु, नंबर वन, सबसे ताकतवर देश और यहाँ तक कि दुनिया का बाप बन चुका होता.  

वैसे अगर तोताराम आ भी जाता तो क्या करते ? वही फेंकुओं की फालतू लफ्फाजियों का कीचड़ उलटते-पलटते. हाँ, कल जो बैरंग लिफाफे का हादसा हमारे साथ हुआ उसके बारे में ज़रूर एक खीज थी. खैर, जब तोताराम आएगा तब सही.

कोई दस बजे तोताराम हाज़िर हुआ. धुला हुआ कुरता-पायजामा गले में राष्ट्रवादियों जैसा देशभक्तीय गमछा जिसमें हरा और भगवा रंग शांति के सफ़ेद रंग को दोनों तरफ से इस प्रकार दबा रहे थे जैसे हमारे स्वतंत्रता दिवस की ख़ुशी को अटल-निधन-दिवस और विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस ने घेर लिया है.  दोनों तरफ रोना. ऐसे में स्वाधीनता दिवस का क्या मज़ा.

तोताराम चलता हुआ ही बोला- चल, हिंदी पखवाड़े का निमंत्रण है. एक गमछा, मोमेंटो और चाय-नाश्ता पक्का.

हमने कहा- तीन साल पहले हमें चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी में बुलाया गया था. लौटते समय एक फॉर्म भरवा लिया, बैंक खाते का नंबर ले लिया. मानदेय और यात्रा भत्ता मिलाकर पाँच हजार रुपए भिजवाने की बात थी. वे पाँच हजार आज तक नहीं आये हैं. इसलिए हम कहीं नहीं जाते.

बोला- वैसे तो आजकल लोग फ्री में वेबीनार पर पिले पड़े हैं. एक सज्जन तो ३१ अगस्त से १४ सितम्बर तक का अखंड कविता पाठ का पखवाड़ा आयोजित करके वर्ल्ड रिकार्ड बनाने पर तुले हुए हैं. हो सकता वे कल को कवियों को 'आमरण काव्य पाठ' के लिए आमंत्रित करने लग जाएँ. सुनाने के लालच में कोई कवी तो फँस सकता है लेकिन  कोई श्रोता कभी ऐसा जोखिम नहीं उठाएगा.

एक हिंदी सेवी सज्जन ने अपने फेसबुक सर्कल में सरकार की शर्मिंदगी की समस्या फ्लोट कर रखी है. उनका मानना है कि सरकारी कार्यालयों में आयोजित हिंदी पखवाड़े में एक कार्यक्रम में भाषण झाड़ने के मात्र दो हजार रुपए दिए जाते हैं. वैसे उन्हें व्यक्तिगत रूप से तो कोई ऐतराज़ नहीं है.शायद मोदी जी की तरह मन से फकीर हैं. बस, वे तो इस कम मानदेय देने के कारण भारत सरकार की होने वाली बेइज्ज़ती से दुखी हैं.

वैसे तेरा क्या रेट है ?

हमने कहा- रेट तो भांडों और रंडियों के होते हैं. फिर चाहे वह दो हजार का हो या दो लाख का. महान चीजें तो हवा, धूप, बारिश की तरह अमूल्य होती हैं. वैसे पैसा लेकर भाषण झाड़ने वाले इन वक्ताओं के पास काम की कोई चीज नहीं है. अरे, यदि हिंदी और राष्ट्रभाषा आदि की समस्या का तुम्हारे पास कोई हल है तो एक मुश्त जितने रुपए लेने हैं वे ले लिवाकर झंझट ख़त्म करो. दे दो अपना रामबाण नुस्खा लिखकर भारत सरकार को. हर साल श्राद्ध पक्ष से पहले १४ सितम्बर को आने वाले हिंदी के इस पितर-पूजन पर हिंदी की श्रेष्ठता के गुणगान और साथ ही उसकी दुर्दशा का रोना रोने यह सालाना कार्यक्रम तो ख़त्म हो. 

भारत के अतिरिक्त किसी देश में राष्ट्रभाषा के लिए ऐसी किराए की रुदालियाँ नहीं देखी-सुनी होंगी. वैसे भी पार्टियों को भाषा, संवाद और संवेदना से क्या मतलब. उन्हें तो जैसे भी हो सिंहासन चाहिए. 'समरयात्रा' कहानी में उस समय के अंग्रेजों की गुलामी की जूठन खाने वालों के लिए प्रेमचंद की नोहरी कहती है- रांड तो मांड में ही खुश. सो ये सांस्कृतिक रुदालियाँ शव यात्रा में उछाली गई रेजगारी लूटने में ही धन्य हो रही है. सरकारों के लिए भाषा और संस्कृति की सेवा का इससे सस्ता सौदा और क्या होगा ?  


  



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धन्यवाद जोशी जी


धन्यवाद जोशी जी


जिन्हें देश को विश्व गुरु और अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर का बनाना है उनकी बात और है. वे तो यदि रात में चार घंटे भी सो लेते हैं तो देश के लिए बड़ी राहत की बात है. हमारे भरोसे अब कोई महान काम नहीं बचा है इसलिए हम तो रात में भी छह-सात घंटे सोते हैं और दोपहर में भी खाना खाने के बाद घंटे-आध घंटे 'आराम फरमा' लेते हैं. होता तो यह भी सोना ही है. बस, ज़रा बड़े लोगों की शब्दावली का छोंक लगा दिया है. 

तो जैसे ही आराम फरमाकर उठे तो हमारी पालतू 'मीठी' ने लघु शंकार्थ बाहर जाने के लिए हमारे कमरे के दरवाजे पर आकर भौंकना शुरू कर दिया. हमारा भारत तो इधर-उधर शंका समाधान के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध न होने के कारण शौचालय तक सीमित हो गया है लेकिन 'मीठी' के लिए न तो कोई विशिष्ट शौचालय है, न उसका ऐसा कोई प्रशिक्षण हुआ है और न ही हमारे यहाँ 'स्वच्छता सैनिक' इतने सजग हैं कि खुले में शौच करने पर बिहार की तरह किसी की लुंगी उतरवा लें. वे तो खुद इधर-उधर निबट लेते हैं. और तो और पी लेने के बाद तो उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि उनका मुँह दीवार की तरफ है या सड़क की तरफ.

जैसे ही 'मीठी' को लेकर निकले तो देखा, तोताराम गले में भगवा दुपट्टे और माथे पर बड़े से तिलक से सुशोभित साक्षात् राष्ट्र हुआ चला आ रहा है. 

हमने कहा- तोताराम, तेरी सुबह की चाय बकाया है. चाहे तो बनवा देंगे. नहीं तो दो मिनट बैठेंगे. कल हमारे साथ एक हादसा हो गया. सुबह तू जल्दी में था इसलिए बता नहीं सके. अब उस बारे में बात करना चाहते हैं. 

बोला- अभी बता दे. घर पर चल कर ही क्या होगा.

हमने कहा- नहीं. बात ही ऐसी है.

घर लौटने पर बोला- अब बता. 

हमने कहा- कल हमें एक लिफाफा मिला. भेजने वाले का कहीं नाम नहीं था. लिफाफा रोळी से चिरचा हुआ था लेकिन टिकट नहीं लगा हुआ था, बैरंग था. हमने सोचा, हो सकता है भेजने वाला टिकट लगाना भूल गया होगा. दस रुपए देकर छुड़ाया. खोलकर देखा तो अन्दर कागज का एक छोटा-सा  टुकड़ा जिस पर लिखा था 'जोशीजी धन्यवाद'. लोग कितने बदमाश हो गए हैं. क्या चाटें इस धन्यवाद का. 

बोला- ठीक है, दस रुपए लगे लेकिन लिफाफा भेजने वाले को तुझसे मिला क्या ? और कुछ नहीं तो उसका लिफाफे का ही एक रुपया तो खर्चा हुआ. तेरे दस रुपए तो पोस्टल डिपार्टमेंट के पास गए. पर इससे तेरी इमेज तो बनी. यदि इसी तरह रोज तेरे यहाँ सौ-दो सौ लिफाफे आने लगें तो जल्दी ही तेरा नाम अखबारों में आने लगेगा. तेरा वीडियो वाइरल होते देर नहीं लगेगी. फिर तू सेलेब्रिटी हो जाएगा.  

हमने कहा- यदि इसी तरह हजारों लिफाफे आने लगे तो मेरी पेंशन ही नहीं, मासिक आय योजना वाला ऍफ़ डी. भी निबट जाएगा.

बोला- भविष्य में ऐसा कोई लिफाफा मत छुड़वाना. तुझे पता है, मोदी जी के सत्तर वर्ष पूरे होने पर तीन सप्ताह तक विविध कार्यक्रम किये जायेंगे. उनमें से एक है मोदी जी के नाम से 'धन्यवाद मोदी जी' के पाँच करोड़ पोस्ट कार्ड लिखना. इससे उनकी छवि में सुधार होगा. 

हमने कहा- उनकी छवि को क्या हुआ है ? पोस्ट ऑफिस, पेट्रोल पम्प, रेलवे स्टेशन, कोरोना के सर्टिफिकेट, अनाज के थैलों सभी जगह वे ही तो हैं. ह सकता है 'मुफ्त अन्न वितरण महोत्सव'  के के अन्न के दानों को सूक्ष्म दर्शक यंत्र से देखने पर उन पर भी मोदी जी का फोटो दिखाई दे. उनकी छवि तो ऐसी वैश्विक हो गई है कि आज अमरीका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ लें तो भी जीत जाएंगे. लेकिन इतनी व्यस्तता में पाँच करोड़ पोस्टकार्ड पढ़ना, उनके उत्तर देना, यदि बैरंग हुए तो डबल चार्ज देना. बहुत मुश्किल काम है. पहले दिन में जो चार घंटे सो लेते हैं पर अब तो वह भी संभव नहीं पाएगा.

बोला- ऐसी बात नहीं है. न तो कुछ पढ़ना है, न कोई उत्तर देना है. पोस्टमैन भी क्या डबल चार्ज मांगेगा. पी.एम. हाउस का पता देखकर जो कुछ भी होगा पटक आएगा वहाँ. और उनका मीडिया सेल उस गिनती को बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित करेगा जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ेगी. तब वे आसानी से उत्तर प्रदेश का चुनाव जीत जायेंगे.  बंगाल वाला 'खेला' और किसानों का धरना अब तक होश फाख्ता किये हुए है.

हमने कहा- चलो कोई बात नहीं. ये सब राजनीति के नाटक हैं. पर हमें तो उस दुष्ट पर गुस्सा आ रहा है जिसने बिना बात हमें बैरंग लिफाफा भेज कर उल्लू बना दिया. 

तोताराम ने जेब से दस रुपए का नोट निकालते हुआ कहा- माफ़ करना मास्टर, यह शैतानी तो मैंने ही की है.

हमने कहा- लेकिन यह 'धन्यवाद जोशी जी' का नाटक करने की क्या ज़रूरत थी.  मोदी जी ने तो सबको फ्री में  टीका लगवाया, किसी को ऑक्सीजन की कमी से मरने नहीं दिया,अब अस्सी करोड़ लोगों को अपना फोटो छपे थैले में अनाज बंटवा रहे हैं. खिलाडियों का हौसला बढ़ाकर देश को मैडल दिला रहे हैं.  हमने तो कुछ किया नहीं,फिर कैसा धन्यवाद.

बोला- रोज चाय पिलवाता है वह क्या किसी टीके और ऑक्सीजन से कम है ?  

हमने कहा- क्या बताया जाए, आजकल लोगों को अपने कर्मों और नीयत पर विश्वास नहीं रह गया है इसलिए ऐसे नाटक किये जा रहे. 'धन्यवाद' कृतज्ञता का एक सहज भाव है जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं होती. क्या किसी प्याऊ पर पानी पीकर, क्या गरमी में किसी पेड़ के नीचे बैठकर प्रकृति या उस पेड़ को लगाने वाले के बारे में विचार करके या प्याऊ लगवाने वाले के प्रति स्वतः ही धन्यवाद या कृतज्ञता की कोई अनुभूति नहीं होती ? मूक, मौन, जड़-जंगम भी अपनी तृप्ति के लिए स्रष्टा का धन्यवाद सा देते लगते हैं. क्या भोजन से पहले सभी लोग ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए पोस्टकार्ड लिखते हैं ? 

लगता है किसी दिन सूरज को उगाने के लिए पार्टी के अनुशासित सिपाही नेता को धन्यवाद के पोस्ट कार्ड लिखने लगें. हो सकता कभी कोई भक्त भगवान को नमस्ते करने पर बाद उससे प्रमाण स्वरूप 'नमस्ते-प्राप्ति' की रसीद माँगने लगे.

ज़माना बहुत बदमाश और आडम्बरी होता जा रहा है.

बोला- कोई बात नहीं, हरियाणा का किसानों का सिर फोड़ने की गर्वपूर्ण घोषणा करने वाला अधिकारी आयुष सिन्हा और उसके आका स्पष्ट रूप से, मन से क्षमा न  मांगें लेकिन मैं तुझे 'धन्यवाद' का लिफाफा भेजने और तुझ पर दस रुपए का जुर्माना लगवाने के लिए 'सॉरी' बोलता हूँ.

हमने- इट्स ओके.



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