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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
जूते में कंकड़ - सामयिक विडंबनाओं पर करारा व्यंग्य |
07-06-2026
सर फोड़ना
आज तोताराम कुछ उदास था । कई देर चुपचाप बैठे रहने के बाद बोला- मास्टर, तू अगर मज़ाक न उड़ाये तो एक बात कहूँ ? आज मेरा रोने को जी कर रहा है । क्या तेरे कंधे पर सिर रखकर रो लूँ । हमारे प्रभु को तो अपने सात समुद्र पार के प्रभु की स्नेहिल डांट झेलने से ही फुरसत नहीं है । ऊपर से अपना रोना ही पूरा नहीं होता तो हमारा रोना क्या सुनेंगे ?
हमने कहा- तोताराम, हम सब मनुष्य हैं । सबकी अपनी अपनी समस्याएं हैं, सुख -दुख हैं । आते जाते रहते हैं । एक दूसरे के साथ मिल बाँटकर, रो-धोकर कर जीवन काट लेते हैं । कुछ नहीं तो अपना कंधा तो तुझे दे ही सकते हैं । रो ले, जी हल्का हो जाएगा । वैसे कल कोक्रोचों के दिल्ली में प्रदर्शन में शामिल हुए वांगचुक ने कहा है कि घर पर रोने से अच्छा है सड़क पर उतरें । तो चल, हम दोनों जयपुर रोड़ पर या कलेक्ट्रेट के सामने चल कर रोयें । क्या पता, किसी का दिल ही पसीज जाए ।
बोला- इस जमाने में किसी का दिल पसीजने वाला नहीं है। इसीलिए पाँच सौ साल पहले ही रहीम जी कह गए हैं-
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो गोय ।
सुन अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लैहैं कोय ।। अपना दुख मन में छुपा कर रखो। कोई मदद नहीं करेगा, सब मज़ाक उड़ाएंगे ।
तभी तो सोनिया गाँधी ने अपने जीवन के अनेक हृदयविदारक कष्ट दिल पर पत्थर रखकर चुपचाप सह लिए । क्या मिला इस देश से उसे । पहले देवर का निधन, फिर सास और पति की हत्या और स्वयंसेवी निंदकों से निरंतर निंदा- कभी बार बाला, कभी जर्सी गाय, कभी काग्रेस की विधवा । उसने अपनी जीवनी में एक पत्र में लिखा हैं- मैंने जितना जीवन राजीव के साथ बिताया है उससे अधिक जीवन इस देश में उनके बिना बिता दिया है । अगर आपको मुझसे शिकायत है तो मुझे मेरा राजीव लौटा दो, मैं इटली लौट जाऊँगी । और अगर नहीं लौटा सकते तो मुझे शांति से यहाँ की मिट्टी में मिल जाने दो ।
हमने कहा- लेकिन दुख को चुपचाप सह लेने और घर में बैठकर रो लेने से क्या फायदा हुआ ? मोदी जी को देख, अपनी गरीबी, चाय विक्रय और चतुराई से हथियाये गए ओ बी सीत्व का कार्ड खेलकर प्रधानमंत्री बन गए और अब अपनी माँ का अपमान और गालियों का कार्ड खेलकर चुनाव जीत रहे हैं । इसलिए रोओ, नकली आँसू निकालकर रोओ, दिखा दिखाकर रोओ ।घड़ियाली आँसू रोओ ऐसे आँसू नहीं निकलें तो ग्लिसरिन लगाकर रोओ ।
बोला- लेकिन मोदी जी के पास तो गोदी मीडिया है, जनता के टेक्स का फ्री का पैसा है । मैं कैसे रोने के लिए अखबार में फुल पेज का विज्ञापन छपाऊँ । वे तो मन की बात की आड़ में भी कोई न कोई मतलब का एंगल निकाल लेते हैं ।
हमने कहा- देखो गालिब ने भी यही कहा है कि अपने दुख का हल्ला मचाने में शर्म मत करो । जहाँ भी मौका मिले दुख को भुनाओ । जिस तिस की चौखट पर सिर फोड़ो । वह कहता है-
वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संग-ए-दिल ! तेरा ही संग-ए-आस्तां क्यों हो
इसी ट्रिक को ही सभी धर्म भी अपनाते हैं क्योंकि धर्मों के पास आपकी दुनियावी समस्याओं का कोई हल नहीं है बल्कि कहीं न कहीं धर्म ही आपकी समस्या है । सभी धर्म सभी समस्याओं का एक काल्पनिक हल बताने का धंधा हैं इसीलिए वे भी आपको सिर फोड़ने के लिए तरह तरह की सुविधाएं उपलब्ध करवाते हैं जैसे हिंदुओं को सिर फोड़ने के लिए मूर्तियाँ और शिवलिंग, मुसलमानों के लिए काबे का काला प्रस्तर का ढांचा, यहूदियों के लिए रोने के लिए ‘विलाप की दीवार’, ईसाइयों के लिए तरह तरह के क्रॉस ।इंग्लैंड में भी एक स्थान है हाइड पार्क जहाँ जाकर कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी के भी विरुद्ध अपनी भड़ास निकाल सकता है । भी तो किसी जाति के वोट लेने के लिए, उनके लिए शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार की सुविधा मुहय्या करवाने की बजाय अलग अलग जातियों के लोगों के लिए उनके महापुरुषों की मूर्तियाँ स्थापित करवा देती हैं । रोओ और फोड़ो सिर और हमें जिताते रहो चुनाव । ज्यादा ही कष्ट है तो चलो तुम्हारे नेता के जन्म दिन को राजकीय अवकाश घोषित कर देते हैं । अगर झारखंड के आदिवासियों को अपनी जमीन व्यापारियों को दिए जाने से परेशानी है तो कोई बात नहीं, रख देते हैं किसी हवाई अड्डे का नाम बिरसामुण्डा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा ।
बोला- लेकिन मास्टर, अपने इधर तो पानी की भी बड़ी किल्लत है ।
हमने कहा- उसके लिए भजन मंडली ‘वंदे गंगा’ नृत्य नाटिका लेकर घूम तो रही है । और फिर भी तू संतुष्ट नहीं है तो
अपने झुंझुनू जिले के इस्लामपुर का नाम श्रीरामपुर करने प्रस्ताव रख तो दिया है । बोला- हाँ, यह ठीक है । पहले वहाँ
पीने के लिए पर्याप्त मात्रा में ‘आब-ए-ज़मज़म’ आया करता था अब पवित्र गंगा जल आया करेगा ।
05-06-2026
ध्यान रखना मास्टर !
हमारे घर का गेट सामान्य गेट है । न बहुत वज़नी और न ही सजावटी । न कहीं कोई नेमप्लेट और न ही वर्तमान या भूतपूर्व पद का उल्लेख । हालाँकि घर में कई अधिकारी, डॉक्टर, प्रिंसिपल आदि हैं फिर भी पता नहीं क्यों हमें यह भोंडा प्रदर्शन लगता है ।मोहल्ले वाले जानते हैं कि यहाँ मास्टर जी रहते हैं और कोई रजिस्ट्री या डिलीवरी वाला आता है तो उसके पास मोबाइल नंबर होता ही है । फोन कर लेता है । कौन तीन मिनट के लोकल कॉल का एक रुपया लगता है । हाँ, एक तरफ पानी का बिल देने वाले ने एक नंबर अटका रखा है और अब जनगणना वाले ने उसी के पास एक मकान नंबर जैसा कुछ लिख रखा है ।
डिग्री और पद मनुष्य की बहुत बड़ी कुंठा होती है ।वह उसे प्रदर्शित किया बिना रह नहीं पाता । वर्तमान नहीं तो भूतपूर्व ही सही पद तो है । शुरू में भूतपूर्व पूरा लिखवाते हैं । फिर केवल भू. पू. किया और उसके बाद केवल पू. और बाद में तो वह संकोच भी गायब । पू. को भी थोड़ा घिसवा देते हैं । अपना परिचय ऐसे देते हैं जैसे कि अब भी उसी पद पर हैं । वैसे आज से कोई पचास साल पहले पोरबंदर में हमारे साथ अंग्रेजी के एक एंग्लो अमेरिकन अध्यापक हुआ करते थे चार्ल्स मैसी । मेरठ विश्वविद्यालय से पीएचडी भी थे । एक दिन हमने वैसे ही सहज भाव से कह दिया और मैसी भाई क्या हाल हैं ?
मैसी साहब तो बिफर पड़े- नो मैसी भाई मिस्टर जोशी, कॉल मी डॉक्टर मैसी ।
वैसे आज भी कुछ ऐसे संकोची और विनम्र संत होते हैं जो लोगों की लाख कोशिशों के बावजूद न तो डिग्री दिखाते हैं बल्कि ऐसे और कहते हैं कि मैं पढ़-वढा कुछ नहीं हूँ ।
तो प्रिय पाठकगण, चाय का गिलास थामे थामे तोताराम अचानक घर के गेट के पिलर के पास गया और लौट आया । दो घूंट लेने के बाद फिर वही प्रक्रिया ।
हमने पूछा- क्या बात है तू तो गेट के चक्कर ऐसे लगा रहा है जैसे मोदी जी चुनाव के समय बंगाल के । कभी झालमुड़ी खा रहे हैं तो कभी यमुना में छठ स्नान तक का साहस न जुटा पाने वाले, हुगली में नौका विहार कर रहे हैं भले ही लोग उसे नौका विहार, मौका विहार या धोखा विहार जाने क्या क्या कह रहे हैं ।
बोला- मास्टर, समय बहुत खराब है । सावधानी हटी और दुर्घटना घटी । पता नहीं, कब तेरे मकान के इस पिलर पर कोई अपना नाम लिख जाए और चार दिन बाद दावा करने लग जाए कि यह मकान मेरा है । देखा नहीं, पिछले कुछ दिनों में इलाहाबाद का प्रयाग हो गया, कलकत्ता का कोलकाता हो गया हालाँकि इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद हाईकोर्ट और कलकत्ता विश्वविद्यालय नाम अभी तक चल रहे हैं ।एक मिनट में सरदार पटेल स्टेडियम नरेंद्र मोदी हो गया । किंग्स वे राजपथ, रेसकोर्स लोक कल्याण मार्ग और प्रधानमंत्री कार्यालय सेवा तीर्थ । अब बस मोदी धाम,मोदी-मंदिर बाकी रह गए हैं जहाँ लोग अपने अधिकारों के तहत नही बल्कि आरती, जागरण, प्रसाद चढ़ाने के लिए जाया करेंगे ।
हमने कहा- किसी के लिखने से क्या होता है ? झुंझुनू में एक बनिया परिवार था जलेबी चोर । उनके किसी पूर्वज ने लालच में खाने के साथ साथ दो चार जलेबी जेब में भी रख ली होगी और मजाक मजाक में लोगों ने तलाशी भी ले ली होगी तो नाम पड़ गया ‘जलेबीचोर’ । लोग सीधे सरल हुआ करते थे सो नाम चल निकला । अब कहीं उनके वंशजों को खयाल आया तो सरनेम बदल लिया ‘अग्रवाल’ । फिर जब लोग ‘अग्रवाल’ के नाम से पूछने आते तो ‘जलेबीचोर’ सरनेम के अभ्यस्त कन्फ्यूज हो जाते तो घर ढूँढ़ने वाले को स्पष्ट करना पड़ता कि जी उनका घर जिन्हें पहले ‘जलेबीचोर’ कहते थे । मतलब अग्रवाल जी का इतिहास जलेबीचोरी के बिना अपूर्ण रहता ।
बोला- अब वह बात नहीं है । अब तो किसी बंदोपाध्याय ने बनर्जी, बसु ने बासु, घोष ने घोषाल, मुखोपाध्याय ने मुखर्जी बता दिया तो वोटर लिस्ट से नाम कट जाता है । तेरे तीनों बच्चों के हायर सेकेंडरी के सर्टिफिकेट में पोर्टब्लेयर नाम लिखा हुआ है लेकिन अब कहाँ है पोर्टब्लेयर ? जल्दी से अमित शाह जी से मिलकर श्री विजयपुरम करवा ले । अगर उन्हें नकली प्रमाण पत्र के नाम पर परेशान किया गया तो मुश्किल हो जाएगी। और तू भी अपना रीजनल कॉलेज ऑफ एज्यूकेशन, भोपाल से अपनी बीएड की डिग्री में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय की जगह ‘माँ वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय’ करवा ले ।
याद रख तुझे डिग्री दिखाने से कोई हाई कोर्ट छूट देने वाला नहीं है ।
हमने कहा- देखेंगे । अभी क्या कोई कल ही चेंज हुआ जा रहा है ?
बोला- यह राम भक्तों का रामराज्य है और देश ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’। जैसे एक धोबी ने अपने घर में सीता के बारे में कुछ कहा लेकिन पता लगते ही राम ने सीता के वनवास का निर्णय ले लिया वैसे ही अगर किसी काँवड़िए, गौरक्षक और स्वयंसेवक ने उलटे मन से भी सुझाव दे दिया तो ऐसे सुझावों को लागू करने के लिए भले ही विपक्ष को बाहर निकालना पड़े लेकिन काम होगा फटाफट । बचाव में ही सुरक्षा है । जो भी आवश्यक कार्यवाही हो, शुरू कर ही दे ।
हमने कहा- लेकिन बरकतुल्लाह तो बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे । सुभाष से भी पहले राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में काबुल में निर्वासन में बनी पहली भारत सरकार में वे प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए थे ।
बोला- वह सब तो ठीक है लेकिन थे तो मुसलमान । अब बता मुसलमान कैसे भारतभक्त हो सकता है ? भले ही वह जस्टिस सय्यद आगा हुसैन,अशफाकुल्ला या अब्दुल हमीद या सोफिया कुरैशी या दीपक मुहम्मद कोई भी हो । वैसे ही जैसे कोई भी हिन्दू देशद्रोही नहीं हो सकता चाहे वह सर शोभासिंह, सर शादीलाल, हंसराज वोहरा, फणीन्द्र नाथ, जय गोपाल, मनमोहन, ललित कुमार ही क्यों न हो ।
-रमेश जोशी