May 6, 2026

06-05-2026 लोक, परलोक और स्वप्न


06-05-2026 


 लोक, परलोक और स्वप्न 



अगर ब्रह्म है तो वह और उससे जुड़ा सब कुछ सर्वत्र व्याप्त है । ऐसे ही हर मुहूर्त ब्रह्म का ही मुहूर्त होता है फिर भी ब्राह्मणों ने उस  संशयात्मक और दुविधापूर्ण समय को ब्रह्म मुहूर्त कहा है जब यही पता नहीं चलता की दिन है कि रात ? सूरज छुपा या उगने वाला है । पक्षी भी सुबह और शाम चहचहाते ही हैं । फिर भी ब्राह्मणों के अनुसार ब्रह्ममुहूर्त अर्थात सुबह कोई चार-साढ़े चार बजे हमारी नींद खुल गई । और नींद का भी क्या है ? खुले, न खुले । अब तो उस मधुमती भूमिका में हैं जब जन्म और मृत्यु का, सुषुप्ति और जागृति का भेद ही समाप्त हो जाता है । जैसे कि इस कलयुग में बैक डेट में जाकर फिर से राम का युग अर्थात त्रेता युग लाने वाले आडवाणी जी को अब यह भी पता नहीं होगा कि वे ‘रामरथ’ पर सवार हैं, या बिहार बेऊर जेल में हिरासत में, प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं या हमारी तरह बरामदे में बैठे ऊंघ रहे हैं । 



वैसे तोताराम के अनुसार हमारी नींद अभी तक नहीं खुली है । हम अब भी गाँधी-नेहरू युग के स्वप्न में जी रहे हैं जब अपने सिद्धांतों के विपरीत चौरी-चौरा कांड होने पर गाँधी अपने प्रचंड आंदोलन को समाप्त कर देते हैं, नेहरू चीन से भौतिक पराजय को संसद में स्वीकार करते हैं और अपनी भूल मानते हैं या शास्त्री जी रेल दुर्घटना के बाद त्यागपत्र दे देते हैं । 


जैसे ही तोताराम आया, हमने कहा- तोताराम, आज ब्रह्ममुहूर्त में एक बड़ा विचित्र स्वप्न आया । 



बोला- बताने की जरूरत ही नहीं है । आया होगा स्वप्न कि मोदी जी ने कोरोना के बहाने हजम किया हुआ 18 महिने के डी ए का एरियर 2029 के आम चुनाव में उलट दिया । जैसी औकात वैसे स्वप्न । तुझे कहाँ से 2047 तक विकसित भारत का स्वप्न आने वाला है । वह तो परम राष्ट्रभक्त, प्रतिबद्ध और अहर्निश सेवामहे के जज्बे वाले मोदी जी को ही आ सकता है । 


हमने कहा- नहीं, ऐसा कोई छोटा-मोटा या चुनावी स्वप्न नहीं था । वास्तव में बड़ा अधिनायकवादी और अलोकतांत्रिक स्वप्न था । 


बोला- अब ऐसा कुछ नहीं हो सकता । मोदी जी के होते हिन्दू असुरक्षित हो सकता है लेकिन लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं । देखा नहीं, कैसे गंगोत्री से गंगासागर तक, कश्मीर से कच्छ और कोंकण तक लोकतंत्र की पताका फहरा रही है । किस तरह बंगाल में स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव हुए और मदर ऑफ डेमोक्रेसी गौरवान्वित हो गई । फिर भी तेरा स्वप्न क्या था ? वैसे इस उम्र में मरने, यमदूत आदि के स्वप्न स्वाभाविक होते हैं । और जिन्होंने घपले किए हुए हैं उनको ईडी की क्लीन चिट के बावजूद यमराज की असली एप्सटीन फ़ाइल खुलने का डर सताता रहता है जो इसी तरह स्वप्न में प्रकट होता है ।



हमने कहा- नहीं ऐसा कुछ नहीं । हाँ, स्वप्न में हमें ऐसा आभास हुआ कि हम वोट डालने गए तो वहाँ मतदान अधिकारी ने बताया कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है ही नहीं । 


बोला- तो क्या हो गया ? सर्वोच्च न्यायालय ने भी तो पिछले दिनों बंगाल में सूची से छूट गए या जानबूझकर छोड़ दिए गए मतदाताओं की अपील पर कहा नहीं था कि अगर एक बार वोट नहीं डालोगे तो क्या हो जाएगा ? 


हमने कहा- तो फिर मोदी जी भी तो 75 के हो रहे हैं ।जा बैठें अपने गुरु आडवाणी के साथ बरामदे में या चल दें झोला उठाकर हिमालय की किसी गुफा में और सुधारें परलोक । लेकिन नहीं, खुद को तो एक बार क्या, तीन तीन बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भी तसल्ली नहीँ है । पिले पड़े हैं चुनावी रैली, रोड़ शो, केदारनाथ की गुफा में फोटोग्राफरों की उपस्थिति में ध्यान लगाने या रामेश्वरम में मौनव्रत साधने, या काशी विश्वनाथ मंदिर के सामने त्रिशूल लहराकर और डमरू बजाकर फ़ोटो खिंचवाने में । अभी से 2047 के एजेंडा चला रहे हैं ।लगता है काल पर विजय प्राप्त कर ली है ।  


बोला- अगर तूने वोट डाल भी दिया तो तेरे एक वोट से क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा । 


हमने कहा- तोताराम, बात चुनाव में जीत हार के फ़र्क़ की नहीं है । यह लाखों शहीदों के बलिदान और प्रयत्नों से प्राप्त स्वतंत्रता और लोकतंत्र के अधिकार और सम्मान की बात है । हमारे भारतीय होने के प्रमाण का प्रश्न है । यह हमारा अपमान है । बात हमारे 84 वर्षों से इस धरती के साथ खून पसीने के रिश्ते की है । हम अमित शाह के जन्म के पहले 1961 में राजस्थान में पंचायत के चुनाव करवा चुके हैं । असली डिग्री है । 40 साल देश भर में जगह जगह हजारों बच्चों को पढ़ाया है जो देश विदेश में जाने कहाँ कहाँ फैले हुए हैं और ये हमारा मताधिकार छीन लेंगे । यह वैसे ही है  जैसे कोई आदेश निकालकर किसी गुलाम का नाम, धर्म, भाषा बदल दे ।  हमें नहीं चाहिए किसी पार्टी की मुफ़्त की मछली या झालमुड़ी या हजार दो हजार रुपए । 


अगर किसी देश में कोई भी वैध मतदाता कहता है कि मैंने पिछले चुनाव में वोट दिया था और अब मेरा नाम काट दिया गया तो ऐसे में जब तक उसका फैसला नहीं हो चुनाव ही नहीं होने चाहियें । बात चुनाव होने मात्र की और जीत-हार की नहीं, चुनाव की विश्वसनीयता की है । 


ऐसे चुनाव को समय अवैध मानेगा । काल सबका मूल्यांकन करेगा । वह कोई यशगान करने वाला भाट मीडिया या संसद में ‘ हो ही, हो ही चिल्लाने वाले व्यक्तित्वहीन सांसद नहीं हैं । 


 



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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

May 5, 2026

05-05-2026 सम्पूर्ण सेवा


05-05-2026 


सम्पूर्ण सेवा 





आज जैसे ही तोताराम आया, हमने कहा- तोताराम, तू अपनी भाभी से चाय लेकर पी लेना । हम तो जरा पैकिंग में व्यस्त हैं । कपड़े तो दो चार रख लिए लेकिन वह भगवा वाला पटका नहीं मिल रहा है ।

 

बोला- क्यों, लगता है  बंगाल का रिजल्ट आते ही राघव चड्ढा की तरह हृदय परिवर्तन हो गया ?


हमने कहा- राघव चड्ढा की तो सुनते हैं ई डी के छापे से चड्डी ढीली हो गई थी लेकिन हमारे यहाँ तो न ई डी आई और न ही कोई एप्सटीन फ़ाइल खुली । और न ही हमें करोड़ों की कोई डील चाहिए । हम तो देश के भविष्य को लेकर संवेदनशील हो गए हैं । 


बोला- वैसे अब जब से गंगोत्री से गंगासागर तक और कश्मीर से कच्छ तक जब कमल खिल गया तो फिर किसी को कुछ नहीं मिलने  वाला । हो सकता है अब बीजेपी में शामिल होने वालों को कुछ देने की बजाय दस-बीस हजार रुपए ऊपर से  लिए और जा रहे हों । अब तक तो फ्री में मिलने वाली झालमुड़ी भी खत्म हो गई होगी । इस समय तो जीत के नशे में लोग इतने बावले हो रहे हैं कि महिला रिजर्वेशन बिल के नाम पर सत्ता में आये लोग एक पुरुष को ममता जैसी साड़ी पहनाकर उसका जुलूस निकालकर मज़ाक और बना रहे हैं । ऐसे में तेरे भाजपा में शामिल होने से क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा ? अगर तेरे संस्कार, हिंदुत्त्व  और राष्ट्रीयता ज्यादा ही जाग्रत हो गए हों तो चल अपने मोहल्ले का एक लड़का कई दिनों से विराट हिन्दू सम्मेलन के चक्कर में होर्डिंग लगवा रहा था उसी के हाथों तुझे पटका पहनवा भाजपा में दीक्षित करवा देते हैं । 

फिर भी इस हृदय परिवर्तन का कारण क्या है ?


हमने कहा- हम चाहते हैं कि मोदी जी को सेवा का सम्पूर्ण अवसर दिया जाए । बेचारे सब कुछ छोड़छाड़कर सेवा करने आए हैं और लोग हैं कि उसमें तरह तरह से बाधा डाल रहे हैं । और कुछ नहीं तो साठ साल पहले मरे हुए नेहरू जी दो करोड़ नौकरियां देने में टांग अड़ा देते हैं । आखिर किस किस बाधा से लड़ें ।


बोला- सेवा तो कोई भी किसी भी रूप में करे वह सदैव सम्पूर्ण होती है । 


इसी के लिए ईशोपनिषद (और बृहदारण्यक उपनिषद) का प्रसिद्ध शांति मंत्र है:

"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"


एक छोटे से स्वयंसेवक से लेकर ज्ञानेश कुमार तक सबकी सेवा सदैव सम्पूर्ण होती है । वह हर स्थिति में पूर्णता की ओर ही जाती है । 


हमने कहा- फिर भी हम देखते हैं कि मोदी जी ने देश सेवा के लिए अच्छा भला पारिवारिक जीवन छोड़ा, भीख माँगने जैसा मस्ती का असीमित पैकेज वाला कैरियर छोड़ा और अब लोग हैं कि सेवा ही नहीं करने दे रहे हैं । सेवा करने के लिए उन्हें कभी केदारनाथ की गुफा में ध्यान लगाना पड़ता है, तो कभी रोड़ शो करना पड़ता है, कभी प्रधानमंत्री का काम छोड़कर हर रेल को हरी  झंडी दिखानी पड़ती है तो कभी डमरू बजाना पड़ता है तो कहीं त्रिशूल लहराना पड़ता है तो कभी कहीं भी किसी ऐसी वैसी दुकान पर झालमुड़ी खानी पड़ती है, कभी हुगली में अकेले कैमरा लेकर बैठना पड़ता है ।अब देश सेवा का काम कब करें । ऊपर से ये विपक्ष वाले ‘नरेंदर सरेंडर’ करने लग जाते हैं । 


अब तो सभी पार्टियों को चाहिए कि जब तक मोदी जी देश का अपने मन और योजना के अनुसार विकास न कर लें तब तक पंचायत से पार्लियामेंट तक की सारी सीटें हमेशा के लिए मोदी जी के नाम कर दें जिससे वे संविधान, इतिहास जो कुछ चाहें सुविधानुसार बदलकर देश का विकास कर ही डालें । यह रोज रोज का रोना तो बंद हो । गाँधी नेहरू द्वारा बिगाड़ा हुआ देश एक बार ढंग से शून्य से शिखर तक सेट कर दें । 


अगर ऐसा हो जाए तो कम से कम 2047 तक सब कुछ करकरा के झोला उठाकर हिमालय में अनंत शांति और विश्राम के लिए चले तो जाएँ । 


बिना बात इतने वर्षों से देश और दुनिया को  जो टेंशन बना हुआ है कम से कम उससे तो पीछा छूटे । 


-रमेश जोशी 


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May 4, 2026

04-05-2026 शोभा अपरंपार


04-05-2026    
शोभा अपरंपार 



काशी में त्रिशूल सँग शोभा अपरंपार 
मगर कभी तो दीखिए जनता के दरबार 
जनता के दरबार, दर्द दुखियों का जानें 
समझें अपना धर्म मदद करने की ठानें 
'जोशी' प्रभु ! मणिपुर भी है भारत का हिस्सा 
नहीं चुनावी मुद्दा ना अखबारी किस्सा 








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May 3, 2026

03-05-2026 अधम शरीर




03-05-2026 


अधम शरीर 






हजामत बनवाए दो महिने हो गए । आजकल दिन बहुत जल्दी निकल आता है ।जब दुकान पर जाते हैं तो भीड़ लगी मिलती है । पहले वाला ज़माना तो रहा नहीं । अब तो कोई दाढ़ी बनवाता है तो भी उसमें सोलह शृंगार निकल आते हैं । और उसे किसी विशेष तरीके, नक्शे और डिजाइन में ऐसे सजाया जाता जैसे किसी मंगल यान का ड्रॉइंग बनाया जा रहा हो । कटिंग बनवाने वाला बाल भी रँगवाता है, भौहें भी सँवरवाता है जैसे कि किसी दुल्हिन या दूल्हे का मेकअप हो रहा हो । कई बार तो हम बाट देखते देखते दुखी होकर लौट आते हैं । लेकिन अब चूंकि एक तो गरमी बढ़ गई दूसरे हमें मोदी जी की तरह लंबे बाल रखने की आदत नहीं । सो सबसे पहला नंबर लगाने के लिए साढ़े छह बजे ही चाय पीकर दुकान पर पहुँच गए । दुकानदार झाड़ू लगा रहा था । हमारा पहला नंबर । 


अब आराम से नहायेंगे, नाश्ता करेंगे । आये तो देखा तोताराम बैठा हुआ । हम कुछ कहें उससे पहले वही चालू हो गया, बोला- हो गया सोलह शृंगार, अब उबटन और लगा ले । लगता है तुझे ही अब ममता दीदी की जगह भाजपा के मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई जाएगी । या फिर मोदी जी या अमित शाह की जगह तुझे ही कोलकाता में रोड़ शो करना है । इस बुढ़ापे में भी इस नश्वर देह के प्रति इतना मोह । 


हमने कहा- आज तेरा व्यंग्य कुछ ज्यादा नहीं हो गया ? हम तो छह महिने लुंगी में रहने वाले, हफ्ते दस दिन में एक बार ट्रिमर से दाढ़ी खुरचने वाले हैं और तू हमें लज्जित इस तरह कर रहा है जैसे हम कोई 15 लाख का सूट पहने हुए हैं या दिन में दस बार नए नए महँगे परिधान बदलते हैं । जहाँ तक देह की बात है तो कौन कहता है कि देश नश्वर नहीं है । यह तो राम ने खुद कहा है । बालि के वध के बाद विलाप करती तारा से वे कहते हैं-


"छिति जल पावक गगन समीरा

पंच रचित अति अधम शरीरा"

बोला- और क्या ? सभी शरीर इन्हीं पाँच तत्वों से बने हैं इसलिए सब नश्वर हैं और अधम भी । जब तक इनमें कोई और विशिष्ट तत्त्व शामिल नहीं होता यह शरीर अधम और नश्वर ही रहेगा । 

हमने पूछा- क्या सभी मानव देहधारी अधम ही होते हैं ?  इस अधमता से मुक्त होकर उत्तमता का कोई मार्ग उनके लिए नहीं है ? 

बोला- है । एक और श्रेष्ठ तत्त्व । जैसे राम में रामत्त्व, कृष्ण में कृष्णत्त्व , बुद्ध में बुद्धत्त्व  । 

हमने पूछा- क्या गाँधीत्त्वा  , नेहरूत्त्व , पटेलत्त्व, भगत सिंहत्त्व, सुभाषत्त्व, कलामत्त्व आदि से काम नहीं चलेगा । मनुष्यत्त्व से काम चले तो हम थोड़ा मनुष्यत्त्व का तो दावा कर सकते हैं ।  

बोला- कह नहीं सकता लेकिन अभी एक नया तत्त्व खोजा गया है । भारत के एक ज्ञान-विज्ञान प्रधान राज्य गुजरात के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ‘महाराजा सयाजीराव गायकवाड विश्वविद्यालय, बड़ोदरा’ के समाजशास्त्र विभाग ने एक नया तत्त्व खोजा है- मोदीतत्त्व । उसका अध्ययन करने और उसे जीवन में उतारने के बाद यह जीवन अधम नहीं रहेगा । 

विश्वविद्यालय ऐसे ही मोदी को मक्खन लगाने के लिए ऐसा नहीं कर रहे हैं । इसके बारे में कोई 500-600 कबीर साफ कह गए हैं-

क्षिति जल पावक गगन समीरा 

पंच रचित यह अधम सरीरा 

छठवाँ ‘मोदी तत्व’ मिले तो 

जन्म धन्य हो जाय  कबीरा । 

हमने पूछा- तो फिर इस तत्त्व में किस सत्कर्म का सबसे अधिक योगदान और महत्व माना जाएगा ?

मगरमच्छ का बच्चा उठकर लाना, चाय बेचना, शादी करके पत्नी का परित्याग करना, भीख मांगना या दिन में चार बार नए नए वस्त्र धारण करना । 

बोला- नहीं ये तो कोई भी कर सकता है । प्रधानममंत्री बनकर सब संसाधन आत्मप्रशंसा और विज्ञापन में लगाए बिना यह नहीं हो सकता । 

हमने कहा- लेकिन यह टिकेगा कब तक ? 

बोला- साफ बात है जब तक आप पद पर हैं । तूने वह कहानी सुनी कि नहीं ? जब नवाब साहब की कुतिया बीमार हुई तो सारा गाँव हालचाल पूछने आया लेकिन जब नवाब साहब मरे तो चार कंधे भी नहीं जुटे । 

यह चतुर चमचों का युग है मास्टर । चिलमिया भाई किसके, दम लगाया और खिसके ।

हमने कहा- वैसे हमारा सुझाव है कि द्वितीय विश्व युद्ध से पहले ऐसी ही जिस मानसिकता का योरप में उदय हुआ था उसके साथ इसका तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाना चाहिए जिससे बात और अच्छी तरह समझ में आएगी और इसके वैश्विक संदर्भ का भी पता चलेगा । फिर भी चल, लास्ट में तूने सच बोल दिया , यही दुनिया के व्यवहार का सार तत्त्व है । रुक, अभी चाय बनवाते हैं ।




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