13-10-2026
जनगणना
आज आते ही तोताराम ने राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा उठाया, बोला- मई में घरों पर नंबर लिखने के बाद जनगणना वाले दिखाई ही नहीं दिए । जब तक जनगणना नहीं होगी तब तक सरकार के लिए सभी को उनकी संख्या के हिसाब से विकास में भागीदारी देना कैसे संभव होगा ?
हमने कहा- हम जनसंख्या के मामले में चीन को पछाड़कर कर नंबर वन हो गए हैं । जब सबसे बड़े हो गए हैं तो फिर क्या सोचना । दीये जलाने का विश्व रिकार्ड बना दिया तो हो गया कल्याण । हो गया सनातन सुरक्षित हालांकि इतने पर भी संत और सनातनी संतुष्ट नहीं हैं ।वे अब भी हिंदुओं को जनसंख्या बढ़ाने के इस धर्मयुद्ध में डटे रहने के लिए प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे ।
वैसे अबकी बार जनगणना छह साल देर से हो रही है तो भी क्या आसमान टूट पड़ा । जैसे लोकतंत्र चुनाव आयोग की वोट काट-जोड़ नीति के बावजूद सुरक्षित है वैसे ही जनगणना में विलंब के बावजूद विकास में सबको हिस्सा मिलता रहेगा । हमारे विचार से सरकार को अब कॉकरोचों की गणना करनी चाहिए । यह देश के तात्कालिक ही नहीं दूरगामी हित के लिए भी जरूरी है ।
बोला- अभी तो देश को 2047 तक विश्व में नंबर वन बनाना है जिसके लिए मोदी जी लगे हुए हैं दिन में 25 घंटे, अनथक । अब इस फालतू काम के लिए कहाँ समय है । कल को तू कहेगा दीमकों, चींटियों, मक्खियों, मच्छरों की भी गणना होनी चाहिए ।
हमने कहा- महत्वपूर्ण तो ये भी कम नहीं हैं । फिर भी जिस तरह कॉकरोचों ने अपने स्वाभिमान के लिए देश को आंदोलित और सरकार को भयभीत कर रखा है उसे देखते हुए उनकी गणना और गहन अध्ययन बहुत आवश्यक हो जाता है ।
बोला- कॉकरोचों से क्या भयभीत होना । रसोई में जूठन न छोड़ें, सीलन न हो । कई तरह के स्प्रे आते हैं इन्हें मारने और भगाने के । और नहीं तो झाड़ू तो है ही, केजरीवाल वाली नहीं, मोदी जी की स्वच्छ भारत वाली । और नहीं तो इन्हें तो केरल वाले संघ के बौद्धिक मोहन जी के अनुसार गोलियों से भून देना चाहिए ।
हमने कहा- अगर इतना ही आसान होता तो दिल्ली में हजारों पुलिस, बेरिकेड, पेलेट गन, कीलों वाली लठियों और ए के 47 की जरूरत ही नहीं होती । इनके बावजूद ये इतने दुष्ट और ढीठ हैं कि किसी न किसी तरह पहुँच ही जाते हैं । सुनते हैं इन पर गोली तो क्या परमाणु विकीरण तक का असर भी नहीं होता ।
बोला- फिर तो इनसे निबटने के लिए तुम्हारा इनकी जनगणना करवाने वाला उपाय ही ठीक है । वैसे मोदी जी ने इनसे संवाद स्थापित करने के लिए आधी रात को इंस्टाग्राम पर रील भी बनाई थी । इनकी शब्दावली में कुछ संवाद भी किया था लेकिन ये लपेटे में नहीं आए । इनका एक ही उपाय हो सकता है कि इनकी SIR की तरह धर्म, जाति, नक्सल, अर्बन नक्सल और दिमागी नक्सल आदि के अनुसार गहन जाँचपूर्वक गणना करवाई जाए ।
हमने कहा- लेकिन हमें तो सभी कॉकरोच एक जैसे ही लगते हैं । कपड़े भी नहीं पहनते कि मुसलमानों की तरह दूर से ही पहचान लें ।
बोला- इनके सिर पर डंडा मारकर देखा जाए । जिसमें दिमाग हो वह दिमागी नक्सल और जिसमें दिमाग नहीं हो, जो एकदम ठोस को पत्थर की तरह वह आस्थावान भक्त ।
हमने कहा- एक और उपाय भी हो सकता है कि इन दिमागी नक्सलियों के खिलाफ बिना दिमाग के भक्तों की एक हिन्दू सेना बना दी जाए । उसे कहीं भी जाने और कुछ भी करने की स्वतंत्रता और संरक्षण प्रदान किया जाए ।
लोहा लोहे को काटता है, जहर को जहर मारता है । वही अस्सी बीस वाला फार्मूला ।
बोला- फिर भी यह जन्तु है प्राणघातक न होते हुए भी है बड़ी समस्या । कल्पना कर, कहीं कोई संयुक्त राष्ट्र संघ, किसी जी 20 सम्मेलन में भाग ले रहा हो या स्वतंत्रता दिवस पर झण्डा फहरा रहा हो, वन्देमातरम के छहों स्टेन्जा में सावधान खड़ा हो, कोई रोड़ शो कर रहा हो या किसी कार्यक्रम में अपने झोले से निकालकर खंजड़ी बजा रहा हो और तब उसके पेंट-पायजामे में कहीं से आकर कोई कॉकरोच घुस जाए तो ? कैसा दृश्य होगा !
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