Oct 11, 2026

10-10-2026 आई मौज फकीर की

10-10-2026  

 

आई मौज फकीर की  

 

 

 

 

 

   

 

आज जब हमने तोताराम के सामने चाय के साथ प्लेट में 10 रुपये का छोटे छोटे नमकीन बिस्किट वाला एक पैकेट खोल कर फैलाया दिया तो बोला- क्यों भई रईस की दुम । आज तो बड़ा अदानी-अंबानी हो रहा है । इतनी फिजूल खर्ची अच्छी नहीं है और वह भी मोदी जी के मितव्ययिता के आदेश के बाद । कोई इससे छोटा पैकेट नहीं मिला क्या ?  

हमने कहा- एक तो बिना किसी बड़े अवसर के बिस्किट खिला रहे हैं और ऊपर से यह तंज़ ! नहीं खाने हैं तो वापिस रख देते हैं ।  

बोला- मैं इतना असभ्य भी नहीं हूँ कि तेरा यह स्वागत स्वीकार न  करूँ । लेकिन इससे अधिक तो फकीर और जोगी लोग एक दूसरे पर खर्च कर देते हैं ।  

हमने कहा- क्या खर्च कर देते हैं ? एक दूसरे को चिलम पिला देते होंगे । बहुत हुआ तो कोई कमंडल भेंट कर देते होंगे ।  जोगी- फकीरों का धन तो त्याग और फकीरी होता है । जैसे गृहिणी की शोभा लज्जा है वैसे ही निर्लज्जता वारांगना का गुण माना जाता है । ब्राह्मण की शोभा संतोष है । तभी  फकीरों को शाहों के शाह कहा गया है- 

जिनको कछू न चाहिए सो ही साहंसाह ।  

राजा चाले हाथी घोडा पालकी मंगवायके  

साधू चाले नंगे पैरों चीनी को बचायके  

बोला- कर दी ना वही मास्टरों वाली छोटी बात ! मोदी जी के देश सेवा के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में जोगी जी ने मोदी को हजारों करोड़ का जेवर पहनाया है ।  

हमने आश्चर्यचकित होकर पूछा- हजारों करोड़ का जेवर ! मोदी जी को महंगे पेन, चश्मों, कपड़ों का शौक तो है लेकिन गहने पहने तो उन्हें नहीं देखा । वैसे अगर कोहिनूर हीरा भी पहनें तो ज्यादा से ज्यादा दो चार सौ करोड़ का होगा । हजारों करोड़ का कौनसा और कितना जेवर पहनेंगे । सही है कि वे महाबली है, 56 इंच की छाती है लेकिन इतने गहनों का बोझ कैसे उठायेंगे ?  और फिर जोगी भी कौन से सेठ हैं । एक मठ के महंत ही तो हैं । ठीक है रुतबा है लेकिन जोगी जी गोरख पंथ के ‘कनफड़ा’ जोगी है जो कानों में दो कुंडल पहनते हैं जो ताँबा, मिट्टी से लेकर सोने तक के हो सकते हैं । हम भी तो सुनें उस जेवर का नाम ।  

बोला- अपने को बहुत बड़ा साहित्यकार समझता है और इतनी सी व्यंजना भी नहीं समझा ।  जेवर कोई गहना नहीं, हवाई अड्डा है जो पूरा होने पर देश का सबसे बड़ा हवाई अड्डा बन जाएगा । जैसे सरदार पटेल के नाम से जाना जाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम अब ‘नरेंद्र मोदी स्टेडियम’ बन गया है ।  

हमने कहा- यह कोई उपलब्धि नहीं है । यह देश का नहीं, भक्तों के वेश में चतुर लोगों का निर्णय है । कल को हिमालय का नाम ‘नरेंद्र गिरि’ ,  देश का नाम ‘मोदी लैंड ’  और हिंदमहासागर को ‘नरेन्द्रसागर’ करने से वे भगवान नहीं हो जाएंगे । भले ही उनको मक्खन लगाने के लिए लोग उन्हें विष्णु का अवतार कहें या वे खुद को ‘नॉन बाइलॉजीकल’ कहें । 

बोला- लेकिन इससे पहले के भी बहुत से स्थान, मार्ग हैं जो गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव के नाम पर रखे गए हैं । उसके लिए तो तुम लोगों के पेट में दर्द नहीं होता । 

हमने कहा- तोताराम, इससे पहले भी अपने समय धाकड़ और तिलक, तराजू और तलवार को जूते मारने वाली  मायावती ने अपनी मूर्तियाँ लगवाई थीं लेकिन अब उनका क्या हश्र हुआ ? 'सेल्फ रिकमन्डेशन इज नो रिकमन्डेशन' । महात्मा गांधी, नेहरू इंदिरा राजीव के नाम पर यह सब उनके जीते जी नहीं हुआ । और उनका योगदान भी समय सिद्ध था, प्रचार और पी आर आधारित नहीं । 

बड़े बड़ाई ना करें बड़े न बोलें बोल । 

हीरा मुख से ना कहे लाख हमारो  मोल ।। 

कई बार तुमने गांवों में छोटे-छोटे कामों के नाम पट्ट पर अपना नाम न लिखे जाने पर सरपंच, एम एल ए और एम पी में जूतम पैजार होने के समाचार जरूर सुने-पढे होंगे । 

हालांकि उदाहरण तुम्हें गलत लग सकता है लेकिन कुछ वृद्ध लोग जिन्हें अपनी संतानों या अपने कर्मों पर विश्वास नहीं होता वे अपना जीवत श्राद्ध करते हैं । जीवत श्राद्ध मतलब जीते जी अपनी मृत्यु और दाहसंस्कार से पहले ही मृत्यु भोज आदि कर्मकांड करना । 

बोला- यह सब कोई मोदी जी थोड़े कहते हैं । यह तो लोगों की श्रद्धा है कि वे उनके जन्म दिन पर करोड़ों दीये जलाते हैं , उनके मंदिर बनाते हैं या उन पर महाकाव्य लिखते हैं ।  

मोदी जी को अपने लिए कुछ नहीं चाहिए । उनका कौन है जिसके लिए मोह-माया पालेंगे । फकीर हैं । 

कहा भी है-  

आई मौज फकीर की दिया झोंपड़ा फूँक ।  

किसी दिन चल देंगे झोला उठाकर और ये जेवर-फ़ेवर किसी भी अदानी-अंबानी जैसे याचक को दे जाएंगे ।  

 

 



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