Sep 29, 2022

चीतायन महाकाव्य


चीतायन महाकाव्य 


रात ढंग से नींद नहीं आई। सिर में थोड़ा दर्द भी था. उठ तो समय पर ही गए लेकिन कुछ करने को जी नहीं कर रहा था. समय से थोड़ा पहले ही बरामदे में आ बैठे। आँखें बंद किये सिर को दबा रहे थे. आराम मिल रहा था. पता ही नहीं चला कब तोताराम आकर हमारे बगल में बैठ गया. जब बोला तो पता चला. 

बोला- तू तो ऐसे बैठा है जैसे कोई योगी ईश्वर से साक्षात्कार करने के लिए ध्यानस्थ हो. यदि इलहाम हो गया हो, तत्त्व ज्ञान हो गया हो तो इस तन्द्रा से बाहर निकल और अपने अनुभव से इस नश्वर जगत को लाभान्वित कर. 

 हमने कहा- कैसा ज्ञान और कैसा इलहाम।रात का सारा चौथा पहर एक अजीब तनाव में गुजरा। कुछ समझ में नहीं आता।  

बोला- समझ के चक्कर में मत पड़।  समझ के चक्कर में पड़े रहने वाले परेशान रहते हैं। सभी बड़े-बड़े काम बिना योजना के, नासमझी और धुप्पल में ही हुए हैं। हनुमान जी ने बचपन में उगते हुए सूरज को क्या कोई योजना बनाकर मुंह में रखा था. लेकिन आज तक भक्त गाते है- बाल समय रवि लील लियो तब...... . महान लोग 'क्या कर रहे हैं' सोचने से पहले कर डालते हैं।  बाद में दूसरे दुखी लोग ही आकर उसे बताते हैं- भले आदमी, तूने यह क्या कर डाला। 

हमने कहा- हमने किया तो कुछ नहीं, बस ऐसे ही रात वाले ऊलजलूल सपने के बारे में सोच रहे थे. 

बोला- मैंने तो समझा कहीं तू मोदी जी की मदद करने के लिए चीतों के नाम सोच रहा था.

हमने कहा- मोदी जी नाम रखने के मामले में योगी जी के कोई काम थोड़े ही हैं. जब चाहें, जिसका जो नाम रख दें, जिसका चाहें नाम बदल दें.  क्या किसी को तनिक सा भी आभास  हुआ कि 'पटेल स्टेडियम' या  'राजीव गाँधी खेल रत्न' का नाम बदलने वाला है ? 

बोला- लेकिन मोदी जी सब कामों में सबका साथ लेते हैं. जैसे पिछली बार गणतंत्र दिवस की झांकियों को पुरस्कृत करने से पहले भी जनता से  ई वोटिंग करवाई थी. चाहते तो अभी नामीबिया से लाये गए सभी आठों चीते-चीतियों के नाम खुद ही रख देते लेकिन नहीं वे सभी राष्ट्रीय महत्त्व के कामों में जनता की पूरी भागीदरी चाहते हैं।  सबका साथ : सबका विकास।  इसीलिए एक प्रतियोगिता कर दी- चीते-चीतियों के नाम सुझाओ और इनाम पाओ. 

हमने कहा- मोदी जी ने एक चीती का नाम 'आशा' रखकर नामों के प्रकार का संकेत तो दे दिया।  अब सरलता से चीतियों के नाम 'आशा' की तर्ज़ पर प्रज्ञा, प्रेरणा, चेतना रखे जा सकते हैं. या फिर स्मृति, समृद्धि, प्रगति, उन्नति आदि.

बोला- और चीतों के नाम- विकास, विश्वास, प्रयास, उल्लास। अनुपम, अद्वितीय, अलौकिक, अनंत ।  वैसे तेरे सपने की बात तो रह ही गई।  बता, रात के अंतिम प्रहार में तुझे ऐसा क्या सपना आया था जिसने तुझे फिर सुबह तक सोने नहीं दिया। 

हमने कहा- था तो सपना चीतों के बारे में ही लेकिन मोदी जी की तरह पिछले ७५ साल से कांग्रेस के कारण नामीबिया के वनों में वनवास काट रहे चीतों को पुनः भारत लौटा लाने जितना बड़ा और चौंकाऊ सपना नहीं था. 

बोला- मोदी जी के सपने के बारे में तो बाद में बात करेंगे, पहले तू अपने सपने के बारे में बता.

हमने कहा- सपने का क्या। छोड़।  सपने तो आल-जंजाल होते हैं।  बुढ़ापे में ऐसे ही आते रहते हैं।  ऐसे ही था, बस। 

बोला- मास्टर, बता दे।  मन हल्का हो जाएगा। दुःख और तनाव का यही मनोविज्ञान है कि बता दो तो टेंशन ख़त्म हो जाता है। तभी तो गुरुदेव टैगोर कहते थे- यदि मुक्त होना है तो खुद को अभिव्यक्त कर दो। मोदी जी को कितने काम रहते हैं लेकिन उनको क्या कभी तनावग्रस्त देखा ? और सिरदर्द तो होने का सवाल ही नहीं। 

इसका कारण है कि वे नियमित रूप से हर महिने अपने 'मन की बात' करते रहते हैं।  यदि अधिक सिर दर्द होने लगता है तो बीच में भी एक बूस्टर डोज़ दे देते हैं। अपना सिर दर्द शेयर कर लेते हैं।  वैसे ही जैसे एक बार एक किरायेदार रात को दो बजे अपने मकान मालिक के पास गया और बोला- मैं इस महिने का किराया नहीं दे पाऊँगा। 

मकान मालिक ने कहा- यह बात तुम दिन में भी कह सकते थे।  

किरायेदार ने उत्तर दिया- मैंने सोचा- मैं अकेला ही टेंशन में क्यों रहूं।  

सो तू भी अपना सपना कह ही डाल।  

हमने कहा- कुछ ख़ास नहीं है फिर भी सुन।  रात को तीन साढ़े तीन बजे की बात रही होगी। हमने देखा- कई जंगली पशु दौड़ते हुए हमारे पास आए। ज़्यादा तो नहीं देख पाए लेकिन उनके शरीर पर चकत्ते, धब्बे, धारियां जैसा कुछ था। हम डर गए और भागने लगे। वे भी हमारे पीछे दौड़े। हम भी जान बचाने के लिए जी जान से वैसे ही दौड़े जैसे कूनो के जंगल में चीतों के भोजन के लिए राजस्थान से ले जाकर छोड़े गए चीतल दौड़े रहे होंगे। जब तक वे हिंस्र पशु हमें पकड़ पाते, हमारी आँखें खुल गईं। 

क्या बताएं तोतराम, था तो स्वप्न लेकिन डर वास्तविक जैसा ही लगा।  हम एकदम पसीने में तर-बतर। लगा जैसे सारे शरीर की जितनी भी थोड़ी बहुत जान थी, सब निचुड़ गई। उसी के मारे अब तक सिर दर्द हो रहा है।   

बोला- इसीलिए महान लोग सोते नहीं हैं।  बस, कोई न कोई खुराफात करते रहते हैं सोने वालो की नींद खराब करने के लिए। लेकिन तेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए न सो पाना संभव नहीं।ऐसा महान सेवक तो युगों-युगों में कोई ही पैदा होता है जो बिना सोये जनता की सेवा करता रह सके। 

हमने कहा- तोताराम,  इस दुःस्वप्न का क्या अर्थ हो सकता है ? क्या अखबारों में रोज  'मोदी जी का केन्द्रीय कर्मचारियों को दिवाली का तोहफा' के नाम से बहुप्रचारित समाचार के सच होने से पहले ही हमें मृत्यु रूपी ये जंगली पशु फाड़ खाएंगे ? क्या किसी स्वप्न विचारक वैज्ञानिक से पूछा जाए ? 

बोला- आजकल हिन्दुत्त्व के चक्कर में बहुत से ज्योतिषी, तांत्रिक और लम्पट सक्रिय हो रहे हैं।  एक विश्वविद्यालय में तो ऐसे बदमाशों ने डॉक्टर से इलाज से पहले मरीजों की जन्मपत्री देखने का नाटक शुरू कर दिया है। लेकिन ये सब फालतू बातें हैं।  मुझे तो मोदी जी की तरह तेरी इस आपदा में एक अवसर दिखाई दे रहा है। 

जिन्हें तू कोई चित्तीदार, धारीदार या धब्बेदार प्राणी बता रहा है वे चीते ही थे।  यह बात और है कि टी वी और मीडया पर मोदी जी को खुश करने के लिए चीतामय हुए जा रहे भक्तों, एंकरों और मंत्रियों को उसी तरह चीता, शेर, तेंदुआ, बघेरा, बाघ और जगुआर में फर्क नहीं मालूम जैसे कि कृषिमंत्री को जौ और गेहूँ, गेंदे और गाजर घास में फर्क नहीं मालूम। 

लगता है,  ये चीते खुद को नेहरू जी द्वारा नामीबिया भगा दिए जाने के बाद की अपनी करुण-कथा तुझे सुनाना चाहते हों। और चाहते हों कि तू अपनी कविता में इनकी पीड़ा को वाणी देकर इन्हें अमर कर दे ।  मास्टर, हो सकता है ये चीते-चीतियाँ तेरे सपने में वैसे ही आये हों जैसे किसी भक्त को सपने में किसी खेत में कोई मूर्ति या किसी मस्जिद के नीचे मंदिर बनाये जाने हेतु शिव लिंग दिखाई दे जाता है।  

इसलिए अब तू इन चीतों की पीड़ा पर करुणरस का एक महाकाव्य लिख मार जिसके नायक हों उन्हें ७५ वर्ष के वनवास से नामीबिया से लाने वाले कल्कि अवतार मोदी जी. 

हमने कहा- देखते हैं।  कुछ बना तो।  वैसे आजकल ज़माना तो चुटकलों, जुमलों और मिमिक्री का है, फिर भी।  

बोला- फिर भी-विर भी कुछ नहीं।  लिख ही नहीं, पहले जल्दी से जल्दी 'चीतायन' नाम से इस महाकाव्य का रजिस्ट्रेशन भी करवा ले.  

हो सकता है अब तक प्रसून जोशी ने इस नाम से महाकाव्य का और अक्षय कुमार ने किसी फिल्म का नाम रजिस्टर न करवा लिया हो. 



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Sep 26, 2022

हिंदी करने के दिन आये


हिंदी करने के दिन आये 


चाय आ गई लेकिन तोताराम फव्वारे में शिव लिंग देखने वाले भक्तों की तरह अपनी ही मस्ती में गुनगुनाने में मगन था-  ...दिन आये . ध्यान से सुना तो अंत के चार-पांच शब्द समझ में आये- हिंदी करने के दिन आये.

हमने कहा- आज तो हिंदी के श्राद्ध पक्ष का समापन दिवस है. राष्ट्रभाषा की रुदालियों की दान-दक्षिणा के पेमेंट का अंतिम दिन. मतलब हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा सब समाप्त. अब तो जनवरी में प्रवासियों को हिंदी के तथाकथित प्रचार-प्रसार के लिए 'प्रवासी हिंदी सेवी सम्मान' के जुगाड़ का गाना गा. 

हाँ, यदि इसका अर्थ विश्व में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान का हिंदी में अनुवाद करने से है तो बड़ी ख़ुशी की बात है. आज तक हिंदी के नाम से बजट बना और निबटाया गया है. कोई ठोस काम नहीं हुआ. ज्ञान दुनिया की सभी भाषाओं में उपलब्ध है लेकिन किसी के लिये भी सभी भाषाएँ जानना संभव नहीं है. इसीलिए लोग ज्ञान प्राप्ति के लिए दुनिया में भटके और अपनी भाषा में उस ज्ञान को अनूदित करके लाये. जापान में दुनिया की किसी भी भाषा में प्रकाशित ज्ञान-विज्ञान के शोध पत्र का जापानी अनुवाद महिने-पंद्रह दिन में उपलब्ध हो जाता है. और हम हैं कि 'इण्डिया' और 'हिंदिया' ही करते रह जाते हैं. हिंदी ही क्यों हमारा तो मानना है कि देश की हर भाषा में दुनिया भर का ज्ञान उपलब्ध करवा दिया जाए तो अंग्रेजी का साम्राज्य अपने आप ही समाप्त हो जाएगा. फिर अपनी असफलता को टांगने के लिए किसी मैकाले की खूँटी की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. 

तोताराम ने हमारे पैरों की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा- पता नहीं, मैं क्यों चुपचाप चाय पीकर चला नहीं जाता. कहते हैं जब गीदड़ की मौत आती है तो वह गाँव की तरफ भागता है. उसी तरह जब मेरा दिमाग खराब होता है तो मैं तुझसे कोई ज्ञान की बात कहता हूँ. मैं भूल जाता हूँ कि तेरा ब्रेक खराब है. एक बार बोलना शुरू करता है तो २०२२ से पीछे खिसकता-खिसकता गाँधी-नेहरू के काल में पहुँच कर उन्हें गरियाने से पहले रुकता ही नहीं.  

हमने कहा- 'हिंदी करने के दिन आये' गीत के शब्द तेरे हो सकते हैं लेकिन वास्तव में यह गीत 'चौदहवीं का चाँद' का है जिसे शकील ने लिखा, रवि ने धुन बनाई और गीता दत्त ने गाया है, बोल हैं-

बालम से मिलन होगा, शरमाने के दिन आये

मारेंगे नज़र सैंयाँ मर जाने के दिन आये 

तोताराम ने कहा- अब अगर तू चुप नहीं हुआ तो मैं चाय पिए बिना ही चला जाऊँगा. 

हमें लगा, यह कोई गुलाम नबी आज़ाद और अमरिंदर सिंह की तरह भाजपा की तरफ खिसकने जैसा सामान्य और पर्याप्त पूर्वानुमानित मसला नहीं है. हमारे लिए तोताराम पार्टी के एक 'खिसकूँ-खिसकूँ' सदस्य के जाने से अधिक बड़ा मामला है. इसलिए हमने उससे कहा- अब जब तक तेरी बात पूरी नहीं हो जायेगी हम कुछ नहीं  बोलेंगे. 

आश्वासन पाकर तोताराम ने कहा- 'हिंदी करने के दिन आये'  से मेरा मतलब इस हिंदी दिवस, सप्ताह, पखवाड़े और माह में दो विशिष्ट लोगों ने गणित की हिंदी कर दी. राहुल गाँधी ने अध्यापक दिवस पांच सितम्बर २०२२ को आवश्यक वस्तुओं के भावों की तुलना करते हुए बताया कि आटा पहले २२ रुपए लीटर था और आज ४० रुपए लीटर. 

हमने कहा- लेकिन राहुल ने उसी समय ध्यान आते ही सुधार तो लिया.

बोला- लेकिन जिनकी ऐसी बातें खोजने की ही नौकरी है उन्हें पूरे वाक्य से कोई मतलब नहीं है. उन्हें तो अपने काम के दो शब्द निकालकर वाइरल करवाने हैं. इसके बाद अमित शाह जी ने १२ सितम्बर २०२२ को नॉएडा में वर्ल्ड डेयरी सम्मेलन में बताया कि १९६९-७० में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता ४० ग्राम थी जो अब मोदी जी के राज में बढ़कर १५५ ग्राम हो गई. 

दूध लीटर में मापा जाता है और आटा किलोग्राम में तौला जाता है.  

हमने कहा- कोई बात नहीं. राहुल ने तौलने  के गणित की हिंदी की तो शाह साहब को भी उसके ज़वाब में दूध के माप के गणित की हिंदी करने कुछ अधिकार तो है ही. और फिर वे सबसे बड़ी पार्टी के बड़े नेता हैं, और नंबर टू भी. इसलिए वे ग्राम में दूध मापेंगे और अपनी भूल सुधार कर कायरता का परिचय भी नहीं देंगे. 

बोला- तो क्या हम इसी तरह ज्ञान विज्ञान का मज़ाक उड़ाते रहेंगे ?

हमने कहा- ज्ञान-विज्ञान नेताओं का विषय नहीं है. क्या कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री अपने बिजली-पानी और फोन के मीटर का ध्यान रखता है ? उसके लिए तो सब फ्री होता है. यह गणित और हिसाब-किताब तो तेरे हमारे लिए है कि कितनी महंगाई बढ़ने पर कितना उपभोग कम करना है. 

वैसे हमें तो शाह साहब की बात में भी कोई गलती नज़र नहीं आती. भई, बेचने वाले की मर्ज़ी है चाहे जैसे बेचे. जिसमें फायदा हो उसी में बेचे. जैसे दूध हल्का होता है इसलिए लीटर में बेचते हैं लेकिन कोई भी दुकानदार शहद लीटर में नहीं बेचता क्योंकि एक लीटर के पात्र में कोई तीन किलो शहद आ जाएगा. हाँ, वह पांच ग्राम चिप्स को पांच लीटर के लिफाफे में हवा भरकर पैक करके आकार के हिसाब से बेच सकता है.  

क्या तू 'अच्छे दिन' को बेचने के माप तौल का गणित बता सकता है ? तब तो कुछ नहीं पूछा और खल्लास कर आया सारे घर के वोट.  

बोला- ठीक है, अमित जी के ग्राम में दूध तौलने को तो सही बता दिया लेकिन राहुल के लीटर में आटा मापने का क्या तुक है ? 

हमने कहा- अब कांग्रेस का सीटों की कंगाली का आटा इतना गीला हो चुका है कि तौलने में नहीं आ रहा है, सिंधिया, आज़ाद और अमरिंदर के रूप में बह-बहकर भाजपा के कीचड़ में मिल रहा है तो ऐसे में आटा लीटर में ही मापना पड़ेगा. 

एक चुटकुले में हलवाई को जल्दी ठंडा करने के लिए दूध को एक बरतन से ऊंचाई से दूसरे बरतन में उंडेलते देखकर एक गणितज्ञ ग्राहक ने आधा मीटर दूध का आर्डर नहीं दे दिया था ? 

 




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Sep 23, 2022

५६ इंच मोदी थाली


५६ इंच मोदी थाली 


आज इतवार है. हमारे लिए तो सभी 'वार' बराबर हैं. कुछ कर नहीं सकते. हर 'वार' को निहत्थे और नंगी पीठ सहना है फिर चाहे वह बाज़ार का वार हो या सरकार का. दोनों ही बिना पूर्वसूचना के इकतरफा निर्णय ले लेते हैं. ये तो मोदी जी हैं जो चाहे नोटबंदी हो या घरबंदी, कम से कम चार घंटे का नोटिस तो देते हैं. 

सोचा, आज घर में किसी को ड्यूटी जाने की जल्दी नहीं है सो दूध देर से लाया जा सकता है. और बरामदे में बैठकर तोताराम का इंतज़ार करने लगे. यह हम जानते हैं कि तोताराम की बात में नेताओं के जुमलों और बड़ी-बड़ी योजनाओं की घोषणाओं की तरह कोई काम की चीज नहीं निकलने वाली फिर भी इनके चक्कर में छुटभय्ये नेता कुछ धंधा करने और फिर उसके माध्यम से नेतागीरी और दलाली करने ई मित्र के खोखे पर पहुँच जाते हैं. 

टीवी में किसी धारावाहिक को ऐसे मोड़ पर लाकर छोड़ा जाता है कि अगली कड़ी तक रोमांच बना रहे जैसे एक पात्र ने किसी पर बन्दूक तानी और 'कट' . अब आप सोचते रहिये कि गोली चली या नहीं, निशाना सही लगा या नहीं, पुलिस के बारे में तो खैर कुछ सोचने की बात ही नहीं क्योंकि वह तो विलंब से ही पहुंचेगी.हाँ, पीड़ितों के जाति-धर्म से दर्शक यह तो तय कर ही लेता है कि ऍफ़ आई आर लिखी जायेगी या नहीं. और लिखी जायेगी तो किस प्रकार. 

कल तोताराम ने मोदी जी के जन्मदिन पर दिल्ली का कार्यक्रम केंसिल कर दिया लेकिन २६ सितम्बर तक ज़रूर चलने का संकेत भी दे दिया तो सस्पेंस था कि क्या मोदी जी का जन्म दिन एक सप्ताह तक मनेगा ? क्या जन्म दिन का कोई विकल्प हो सकता है ? वैसे कुछ भी हो सकता है. बड़े आदमी और फिर मोदी जी जितने बड़े आदमी, कंगना के अनुसार विष्णु के अवतार. वैसे विष्णु को तो अजन्मा भी कहा गया है. फिर कैसा जन्म दिन ?

ज्यादा कन्फ्यूज होने से पहले ही तोताराम प्रकट हो गया. 

हमने पूछा- अब कब, क्यों और कहाँ चलना है. और जन्मदिन से हमारे चलने का क्या संबंध होगा ? क्या वहाँ मोदी जी के दर्शन संभव होंगे ?

बोला- दिल्ली में १७ से २६ सितम्बर २०२२ तक कनाट प्लेस स्थित 'आर्डार २.१' नाम के एक रेस्टोरेंट ने एक स्कीम शुरू की है जिसके अंतर्गत उनकी '५६ इंच मोदी थाली' को ४० मिनट में ख़त्म कर देने वाले को ८ लाख रूपए का ईनाम दिया जायेगा. और केदारनाथ की फ्री यात्रा भी करवाई जायेगी. 

हमने कहा- इसका क्या मतलब है ? क्या इस थाली का घेरा ५६ इंच है ? क्या मोदी जी दिन में रोज दो-तीन बार इतनी बड़ी थाली में भोजन करते हैं ? क्या इस थाली को खाने से किसी की छाती ५६ इंच की हो जायेगी ? क्या इस स्किल डेवलपमेंट या आत्मनिर्भर भारत या वोकल फॉर लोकल में मोदी जी की कोई पार्टनरशिप है ? 

बोला- तेरे जैसे आदमी न कुछ कर सकते हैं और न ही किसी को कोई निर्णय लेने दे सकते हैं. यदि मोदी जी तुझ जैसे किसी लीचड़ विचारक से पूछते तो आज तक देश की अर्थव्यवस्था को उछाल प्रदान करने वाले नोटबंदी, जीएसटी और लोक डाउन जैसा कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठा सकते थे. अरे, एक कोई सच्चा देशभक्त मोदी जी के जन्मदिन पर उत्साहित होकर एक ऑफर दे रहा है. और तू है कि बिना बात की मीन-मेख निकाल रहा है. 

चलते हैं दिल्ली. आने जाने का किराया ही तो लगेगा. यदि मोदी जी उपलब्ध हुए तो व्यक्तिगत रूप से बधाई दे आयेंगे, 'कर्तव्य पथ' से कर्तव्य की प्रेरणा ले आयेंगे. और यह भी देख आयेंगे कि मोदी जी द्वारा गुलामी का अंतिम चिह्न मिटा देने के सच्ची और सम्पूर्ण स्वतंत्रता की अनुभूति कैसी होती है ? 

हमने कहा- लेकिन बार के भोजन के लिए दो-तीन हजार का दिल्ली आने जाने का खर्च क्या उचित रहेगा ?

बोला- यह भी तो सोच अगर हमने ४० मिनट में थाली चट कर दी तो ८-८ लाख के हिसाब से १६ लाख रुपए भी तो जीत लेंगे. फिर १५-१५ लाख खाते में आने के चक्कर में भाजपा को वोट देने वाले अनन्त काल तक सर धुनते रहें लेकिन अपने तो न सही १५-१५ लाख ८-८ लाख तो वसूल हो ही जायेंगे. 

हमने कहा- तोताराम, जिस तरह मोदी जी के अभी कार्यक्रम किंग साइज़ के होते हैं वैसे ही यह ५६ इंच थाली भी कोई सामान्य थाली तो नहीं होगी. हम कैसे खा सकेंगे  ?

बोला- चलने से पहले दो दिन खाना नहीं खायेंगे. कहीं से मिल गई तो भांग का गोला लगा लेंगे. सोच अगर थाली चट कर दी तो ८-८- लाख खरे. खिलाड़ी भी तो इनाम और नौकरी के चक्कर में कितना पसीना बहते और रिस्क लेते हैं. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा. दो चार दस्त लग जायेंगे, उलटी हो जायेगी. दो तीन दिन उपवास कर लेंगे. डबल हाजमोला खा लेंगे. 

हमने कहा- तो फिर कर लेते हैं हिम्मत. खेल जाते हैं यह लाटरी भी. लेकिन चलने से पहले एक बार उस समाचार को फिर पढ़ लेते हैं. आजकल लोग ऐसे लालच के चक्कर में बड़े-बड़े लोगों को फंसा लेते हैं. तुझे पता नहीं कर्नाटक में सौ करोड़ में मंत्री बनवाने के चक्कर में कई लोग ठगे गए थे. 

बोला- मोदी जी के नाम पर है तो इसमें कोई धोखा नहीं हो सकता.  मोदी जी के नाम से है तो इस थाली में उनकी पसंद का ३०-४० हजार रुपए किलो वाला कम से कम सौ ग्राम मशरूम तो होगा ही. उसीमें अपना दिल्ली आने जाने का खर्च वसूल हो जाएगा. एक बार का खाया मशरूम पांच साल तो चलेगा. 

हमने कहा- फिर भी समाचार....

तोताराम ने अपने स्मार्ट फोन में संबंधित समाचार निकाला. लिखा था- एक थाली की कीमत होगी २९००/-रु.

हमने कहा- तोताराम, हम यह छह हजार की लाटरी खेलने के पक्ष में कतई नहीं हैं. 

इससे बेहतर तो हम इस राशि से गली के कुत्तों को दो-चार महिने रोटियाँ खिलाना समझते हैं. नरक यहाँ भोग रहे हैं, स्वर्ग में हमारा विश्वास नहीं. लेकिन इतना तय है कि कुत्ते नेताओं की तरह अहसान फरामोश नहीं होते. कभी रात-बिरात निकलना हुआ तो कम से कम काटेंगे तो नहीं.  

बोला- तो फिर दोनों परिवारों का एक वक्त का भोजन एक बड़ी परात में सजाकर उसके पास बैठे हुए फोटो खिंचवाकर फेसबुक पर डाल देते हैं या मोदी जी को ट्वीट कर देते हैं. 

और शीर्षक लगा देते हैं- दिल्ली में '५६ इंच मोदी थाली' का आनंद लेते बरामदा संसद के दो वरिष्ठ सदस्य. 

हमने कहा- क्या इसके साथ 'सेन्ट्रल विष्ठा' शब्द जोड़ा जा सकता है ?

बोला- नहीं, नखदंत विहीन उपेक्षित लोग 'बरामदा संसद' में ही बैठते हैं. लेकिन तू 'सेन्ट्रल विष्टा' की जगह बार-बार 'सेन्ट्रल विष्ठा' क्यों बोलता है. यह लोकतंत्र और संसद अपमान है. 

हमने कहा- लोकतंत्र और संसद का अपमान तब होता है जब जाति-धर्म और विचारधारा के आधार पर लोगों से भेदभाव किया जाता है, असहमत लोगों को इस-उस बहाने से जेल में डाला जाता है, उनकी जबानें बंद की जाती हैं. और जहां तक 'विष्ठा' की बात है तो पता नहीं क्यों हमें इस शब्द में 'निष्ठा' और 'प्रतिष्ठा' जैसा गर्व और रुतबा अनुभव होता है. 

बोला- कोई बात नहीं, मोदी जी वाला ३०-४० हजार रूपए किलो का मशरूम चखने का संयोग तो नहीं बना लेकिन कोई बात नहीं उसका सस्ता विकल्प तो है, मोरिंगा के परांठे. तेरे यहाँ बाड़े में लगा तो हुआ है. आज उसी के परांठे बनवाता हूँ. 

हमने कहा- ले जा जितना चाहे. हम तो उसे कोई दस बार काट चुके हैं लेकिन फिर फूट आता है. लेकिन आज तक एक भी फली नहीं लगी. पता नहीं कौन सी नस्ल है. 

बोला- किसी भी जीव की ऐसी नस्ल ही महत्त्वपूर्ण होती है जिसकी संतति नहीं चलती. सब कुछ अपने में ही समेटे हुए. अनुपम, अद्वितीय, अलौकिक. 





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Sep 20, 2022

साहेब, मजा छे

साहेब, मजा छे


हम तो यथासमय ही जगे थे. कोई विलम्ब नहीं हुआ लेकिन पता नहीं तोताराम कब आकर हमसे पहले ही बरामदे में बैठ गया. जैसे ही बरामदे में पैर रखा तोताराम की खनकती हुई आवाज़ सुनी- मास्टर, इधर आ जा. अभी नो चाय, कंट्री फर्स्ट।

देखा, बरामदे में एक आसन पर बैठे तोताराम के पीछे मोदी जी का कहीं से कबाड़ा गया कोई पोस्टर लगा हुआ है,  खुद के बाएं हाथ में रूई की पूनी और दाएं हाथ में तकली। पता नहीं, तकली कहाँ से जुगाड़ लाया। यह कौशल विकास तो हमारे बचपन में हुआ करता था. आजकल तो बच्चों को यह भी पता नहीं कि जीवन में होम वर्क करने और गाइड रटने के अलावा भी कुछ होता है क्या।  

हमने पूछा- कौन सा कंट्री है यह ? यह कंट्री आज ही बना है क्या ? 

बोला- क्या बकवास कर रहा है ? भारत देश तो शाश्वत और सनातन है. दुनिया और ब्रह्माण्ड में जो कुछ है वह सब  इसकी कृपा से है और सब कुछ इसके बाद में बना है. मैं भारत की बात कर रहा हूँ.

हमने कहा- हमने तो हमेशा ही अपनी शक्ति के अनुसार देश को ही प्राथमिकता दी है. लाल किले पर झंडा फहराना ही देश प्रेम है क्या ? जो कहीं कूड़ा नहीं फैलाता और सबके साथ मिलकर प्रेम से रहता है, वह भी कोई कम देशभक्त नहीं है. वह भी कंट्री फर्स्ट ही है. लेकिन तुझे आज यह जुमला कहाँ से सूझा ? जुमलाबाजी तो हमारा नहीं, बड़े-बड़े सेवकों का काम है. 

बोला- जुमला नहीं, मैं तकली पर सूत कातकर एक महायज्ञ में शामिल हो रहा हूँ. लगता है मोदी जी ने अचानक कार्यक्रम बना लिया है, तभी कोई निमंत्रण नहीं दिया, घोषणा नहीं हुई, मन की बात में भी चर्चा नहीं की. 

हमने कहा- वैसे मोदी जी हैं बड़े क्रिएटिव। कुछ न कुछ अनोखा करते और सोचते ही रहते हैं. आज का क्या कार्यक्रम है ?

बोला- देख नहीं रहा पीछे अखबार की कटिंग में ? ७५०० चरखे। 

हमने देखा- अखबार की उस कटिंग में ७५०० के बाद किसी ने बॉलपेन से  +१ और लगा दिया था. तोताराम, यह क्या जालसाजी है. 

बोला- जालसाजी क्या ? करेक्शन है. इसमें ७५०० महिलाओं के साथ मैं भी तो यहां से प्रतीकात्मक रूप से शामिल हो रहा हूँ. इसलिए +१ किया है.  तू चाहे तो तू भी शामिल हो जा. 

हमने कहा- लेकिन तेरे इस प्रकार +१ करने से कविता की तरह कार्यक्रम में कुछ गति-यति का दोष तो नहीं आ जाएगा। यह कार्यक्रम आज़ादी के ७५ वें  वर्ष की समाप्ति पर हो रहा है और इसमें ७५ कलाकार रावणहत्थे बजाकर उनका स्वागत करेंगे।हो सकता है मोदी जी इस अवसर पर ७५ मिनट का भाषण भी दें.  ७५ के साथ यह +१ अजीब तो नहीं लगेगा। 

बोला- यह प्रेम का  मामला है. प्रेम में सब चलता है. मुझे कौन सी पद्म श्री चाहिए है. यह मोदी जी का खादी प्रेम है.और मैं इसमें 'मोदी-प्रेम' के कारण शामिल हो रहा हूँ. 

हमने कहा- लेकिन तोताराम, तिरंगा तो हमेशा खादी का ही बनता रहा है. खादी के साथ हमारे स्वतंत्रता संग्राम  का भावनात्मक संबंध रहा है. अब ये सिंथेटिक झंडे फहराने की छूट मोदी जी ने दे तो दी लेकिन वह खादी वाला मज़ा नहीं। लगता है हम तिरंगा नहीं फहरा रहे बल्कि कोई नाटक कर रहे हैं. 

बोला- खादी और सिंथेटिक के चक्कर में मत पड़. मोदी जी की भावना और उत्साह को देख. आज तक किसी को  एक साथ करोड़ों तिरंगे फहराने का ख़याल भी आया ? 

यह खादी-उत्सव मनाकर मोदी जी देश दुनिया का ध्यान खादी की ओर आकर्षित कर रहे हैं. यह एक अनोखा कार्यक्रम है. और संभवतः एक वर्ल्ड रिकार्ड भी.इससे सिंथेटिक तिरंगे वाला दुष्प्रभाव भी दूर हो जाएगा। बेलेंस बनाना बहुत  ज़रूरी है. 

हमने कहा- तोताराम, प्रतीकात्मकता का महत्त्व एक सीमा तक ही होता है. प्रतीकात्मकता से एल्बम  बन सकता है, ज़िन्दगी नहीं चलती। 

बोला- उनके कन्धों पर १४० करोड़ भारतीयों का भार है. ऊपर से सारी दुनिया के मार्गदर्शन का उत्तरदायित्त्व।  इतना कर लेते हैं, यही क्या कम है. 

हमने कहा- कभी चरखा चलाने वाली महिलाओं से एकांत में, वास्तव में, तसल्ली से इतना तो पूछ लें कि सारे दिन  चरखा चलाकर उनका जीवन कैसा चल रहा है ?

 सबके सामने तो वे यही कहेंगी- सब ठीक है. 

क्या कभी कोई कहता है- मज़ा नथी. सब यही कहेंगी- साहेब, मजा छे.  





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