Apr 17, 2018

हम सभी शर्मसार हैं



 हम सभी शर्मसार हैं 

आज तोताराम नहीं आया |थोड़ी देर बाद हमने ही उसके हिस्से की चाय, जो ठंडी हो चुकी थी, पी ली | 

नहाने और नाश्ता करने के बाद भी जब तोताराम के आने की कोई संभावना नज़र नहीं आई तो मन  किया, चलो आज अपन ही तोताराम की तरफ हो आते हैं |जैसे ही उसके घर के आगे पहुँचे तो उसका पोता बंटी बरामदे में ही बैठा मिल गया |हमने पूछा तो उसने तोताराम के कमरे की तरफ इशारा कर दिया | कमरा अन्दर से बंद था | दरवाजे पर सूचनार्थ एक कागज लटका था-

 डिस्टर्ब न करें, हम सभी शर्मसार हैं |

हमने बंटी से पूछा- बंटी, अन्दर कौन-कौन हैं ?

बोला- और कौन होगा ? दादाजी अकेले ही हैं |आज तो चाय भी नहीं पी है |बस, अखबार के मुखपृष्ठ पर एक नज़र डाली और अन्दर जा बैठे |बोले- डिस्टर्ब मत करना |

विचित्र लगा |जब अकेला ही है तो 'सभी' क्यों लिखा ? अब तो हमें तोताराम की शर्मसारी से अधिक चिंता भाषा की होने लगी जैसे कि नेता को समाज में किसी नृशंस अपराध को लेकर पीड़ित से संवेदना की बजाय वोट बैंक खिसकने की फ़िक्र ज्यादा होने लगती है |

 हलके से कमरे को खटखटाया | सिर झुकाए उदास तोताराम ने दरवाजा खोला |हमने पूछा- क्यों, किस बात को लेकर शर्मसार है ?

उसने बिना कुछ बोले ही कुर्सी की ओर इशारा किया |वहाँ एक सेवक का फोटो रखा था जिसके नीचे लिखा था- एक देश और समाज के तौर पर हम सभी शर्मसार हैं | नेता के फोटो से हमें कुछ समझ में नहीं आया | सच कहें तो पहचान भी नहीं पाए क्योंकि नेता कुछ ज्यादा ही शर्मसार हो गया लगा जो कि आजकल के नेताओं के सामान्य स्वभाव के विपरीत है |आजकल नेता प्रायः गंभीर कम और ठहाका लगाते अधिक नज़र आते हैं |लगता है देश में कोई लाफ्टर शो चल रहा है |गंभीर से गंभीर बात को भी हँसी-मजाक में उड़ा देने का बचकाना रवैया |लगता है नीचे से ऊपर तक कहीं कोई गम्भीरता बची ही नहीं है |

हमने कहा- तू शर्मसार क्यों है ? इसमें तेरा क्या कसूर है ? जो सत्ता में हैं, जो कानून व्यवस्था बनाने, अच्छे दिन लाने और सुशासन के नाम पर चुन कर आए हैं और इसी बिना पर दुनिया भर के टेक्स लगा-लगा कर लोगों का जीना हरम किए हुए हैं वे शर्मसार हों | 

बोला- लगता है घटना वास्तव में शर्मसार होने जैसी ही है |तभी तो नेता जी शर्मसार हो रहे हैं |और जब नेता जी हमारे साथ सहानुभूति और संवेदना रखते हैं तो  क्या आज उनके शर्मसार होने पर मुझे शर्मसार नहीं होना चाहिए ? व्यक्तिगत रूप से नहीं बल्कि अपने सेवाभावी नेताओं के समर्थन में शर्मसार हूँ | 

हमने कहा- लेकिन इनमें से उन्नाव वाली घटना तो पिछले साल जून की है और कठुवा वाली घटना इस साल जनवरी के महिने की है | तो तू इतने दिन तक शर्मसार होने के लिए किसका इंतज़ार कर रहा था ?

बोला- यह कोई सामान्य आदमी थोड़े ही तय कर सकता है कि कौन घटना शर्मसार होने लायक है और कौन चुप लगा जाने लायक है और कौन ट्विटर पर 'वन लाइनर' में निबटाने लायक है |यह तो बड़े लोग तय करते हैं |अब पता चला है कि घटना शर्मसारी के लायक है तो शर्मसार हो रहे हैं |सुगठित और सच्चे लोकतंत्र में विकास-विनाश, सुख-दुःख सबका साझा होता है |तभी तो कहा गया है- सबका साथ : सबका विकास | और हम तो वैसे भी 'वसुधैव कुटुम्बकम' के आदर्श वाले श्रेष्ठ समाज हैं | 

हमने कहा- हम भी तो यही कह रहे हैं कि आजकल की सूचना प्रौद्योगिकी के युग में एक शर्म को कठुआ और उन्नाव से चलकर दिल्ली पहुँचने में क्या आठ महिने लग जाते हैं ? 
बोला- अब सबको तो तीव्र यातायात की सुविधा नहीं मिलती ना | तभी तो देश में बुलेट ट्रेन और सिक्स लेन हाइवेज का जाल बिछाया जा रहा है कि शर्म या ख़ुशी जल्दी से जल्दी एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच सके |और शर्मसारी और उत्सव मनाने में देरी न हो |

हमने कहा- तोताराम, भले ही आज लोग राम के नाम की आड़ में रावण बन रहे हैं, रामलीला के धंधे को सीढ़ी बनाकर सिंहासन पर चढ़ रहे हैं, हर साल बुराई पर अच्छाई की जीत के नाम पर रावण का पुतला जला रहे हैं, अपने निजी स्वार्थ के लिए राम का नारा लगा रहे हों लेकिन हमें तो तुलनात्मक रूप से इन सेवकों की बजाय रावण अधिक श्रेष्ठ लगता है |और राम ? याद कर | जब ऋषियों ने उन्हें  राक्षसों द्वारा मारे गए ऋषियों की हड्डियों के ढेर दिखाए तो वे शर्मसार नहीं हुए |

अस्थि समूह देखि मुनिराया |
पूछी मुनिन्ह लागि करि दाया ||
जानतहूँ पूछिअ कत स्वामी |
सबदरसी तुम्ह अंतरयामी ||
निसिचर निकर सकल मुनि खाए |
सुनि रघुवीर नयन जल छाए ||

निसिचर हीन करऊँ महि भुज उठाय पन कीन्ह |
सकल मुनिन्ह क आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह ||

उसके बाद राम ने क्या किया यह विश्वविदित है |

यदि इस शर्मसारी का फलागम राम जैसे कर्म में नहीं निकलता है तो ऐसों की रामभक्ति और शर्मसारी एक घटिया नाटक से अधिक कुछ नहीं है |जो समाज के इस अधःपतन पर भी राजनीति की रोटियाँ सेंक रहे हैं या सकेंगे और उसी गणित के हिसाब से मुँह खोल रहे हैं या खोलेंगे या बंद रख रहे हैं या मुँह बंद रखेंगे वे सभी इस पातक में शामिल होंगे और समय उनका हिसाब लेगा |और यदि आप राजनीति के मुद्दे वाले राम को नहीं बल्कि घट-घट वासी राम को मानते हैं तो वे भुज उठाकर प्रतिज्ञा कर चुके हैं |







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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

1 comment:

  1. बहुत ही अच्छा लेख प्रस्तुत किया.

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