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May 13, 2009

तोताराम के तर्क - सौ सुनार की एक लुहार की



कभी आनंद शर्मा टीवी चेनल पर जेम्स ओटिस से अपील कर रहे हैं कि गाँधी की वस्तुओं को नीलामी से हटा लें तो कभी न्यूयार्क में महावाणिज्य वाणिज्य दूत कोशिश कर रहे हैं तो कभी भारत मूल के होटल व्यवसायी नीलामी में भाग लेने के लिए संयुक्त मोर्चा बना रहे हैं तो कभी मनमोहन सिंहजी अम्बिका सोनी से कह रहे हैं कि गाँधी जी की वस्तुएं किसी भी हालत में भारत लानी हैं तो कभी अम्बिका सोनी स्वयं पर्यटन में गाँधी जी के महत्व को देखते हुए प्रयत्नशील हैं ।

मगर सौ अम्बिका सोनी की और एक विजयमाल्या की । विजयमाल्या भी लाइन में लग गए और एक ही झटके में ले आए बापू का सारा सामान । ऐसे काम भाषणों से नहीं होते । जुआ और नीलामी दिल के खेल हैं । दिलवाले ही ऐसे खेलों में भाग लेते हैं और धाँसू तरीके से जीतते भी हैं । या तो पुलिस उचित भेंट पूजा से मान जाती है या फिर देसी दारू बनाने वालों के पास लट्ठ है ही । सरकार को भले ही अपनी कुर्सी बचाने के लिए संसद-खरीद के गटर में उतरना पड़ता है पर दारूवालों की अपनी लाबी होती है और पूरी सिद्दत से काम करती है ।

अंदरखाने यह भी सुना जा रहा है कि विजयमाल्या भारत सरकार के लिए काम कर रहे थे पर विजय माल्या ने इससे मना कर दिता है । वैसे यह गिव एंड टेक का मामला हो सकता था क्योंकि सरकार दारूवालों का ध्यान रखती है तो दारूवाले भी सरकार का ध्यान रखते हैं । नीलामी करने वाले ने सोचा था कि चुनावों का मौसम है सो गाँधी के नाम से वोट माँगने वाली सरकार ज़रूर अच्छी कीमत दे देगी । पर जब सरकार नहीं पहुँची तो उसने सोचा कि जो मिल रहा है वही अच्छा वरना मामला गया फिर पाँच साल पर ।

हमने सोचा कि इस मामले में क्यों न सीधे ओटिस महाशय से ही संपर्क किए जाए । पूछा- बन्धु, गाँधीजी तो कभी अमरीका आए नहीं फिर ये चीजें आपके हाथ कैसे लगीं ? बोले - हमारे गोरे भाइयों ने इस बुड्ढे की अफ्रीका और भारत में बहुत ठुकाई की थी उसी दौरान ये चीजें गिर पड़ी होंगी और कहीं पुलिस के मालखाने में पड़ी होंगी । सो कोई हमें दे गया होगा । हमने भी यह सोच कर रख लीं कि क्या पता कभी ये भी कुछ दे ही जायेंगीं । वैसे हम तो एक्टर-एक्ट्रेसों और लम्पटों की चड्डी-चोली में ही ज़्यादा डील करते हैं क्योंकि आजकल खाली दिमाग और भारी जेबोंवाले ये ही चीजें ख़रीदते हैं । योरप अमरीका में इनका अच्छा मार्केट है ।

आज तोताराम आया तो बड़ा खुश था, बोला- देख लिया ? तू दारू पीनेवालों की बहुत बुराई किया करता था । अरे, खोटा पैसा और खोटा बेटा ही समय पर कम आता है । हमने शंका प्रकट की- यार, कहीं यह माल्या मस्ती में आकर गाँधी जी के कटोरे में ही बीयर डाल कर सेलेब्रेट न कर ले । तोताराम बोला- तो क्या आसमान टूट पड़ेगा । सरकारें दारू बेचती हैं और ऊपर से नैतिकता के भाषण झाड़ती है । विजय माल्या जैसा भी है पर सरकार की तरह ढोंगी तो नहीं है । और फिर दारू से सरकार को कल्याणकारी योजनाओं के लिए टेक्स भी तो मिलता है । तू समझता है कि सरकारें तेरे जैसे मक्खीचूसों से चलती हैं ?

हम पूरी जी-जान लगा कर बापू की वस्तुएँ भारत वापस आने से गर्वित होने का प्रयत्न करने लगे । शायद सफलता मिल ही जाए ।


बातें करता रह गया भोला हिन्दुस्तान ।
अमरीका में बिक गया बापू का सामान ॥
बापू का सामान, वस्तु की पूजा करते ।
पर बापू की आदर्शों पर ध्यान न धरते ॥
कह जोशीकविराय राम का काम कीजिए ।
राम और बापू का नाटक बंद कीजिए ॥

७ मार्च २००९

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
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Jhootha Sach

May 12, 2009

तोताराम के तर्क - गाँधी जी का सामान




ओटिस ने गाँधी की चीज़ें नीलाम कीं

गुलज़ार का एक गीत है जिसे आशा ने बड़ी सिद्दत से गाया है- 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है । मेरा वो सामान मुझे लौटा दो' । ये प्रेमी भी अजीब होते हैं । या तो अपना सामान छोड़ आते हैं या दूसरे का उठा लाते हैं जिससे आने-जाने का बहाना बना रहे । पर गाँधी जी के पास न इतना सामान था और न वे इतने असावधान थे कि अपना सामान छोड़ आयें । कौन जय ललिता की तरह चप्पलों की हजारों जोड़ियाँ थीं या दस पाँच चश्मे थे कि भूल आते । एक चश्मा आँखों पर और एक जोड़ी चप्पल पैरों में । भूलने का प्रश्न ही नहीं । हमें तो लगता है कि यह ओटिस नाम का आदमी कोई चालाकी कर रहा है । भारत में चुनाव आ रहे हैं और कांग्रेस के लिए गाँधी के बहाने कोई न कोई मुद्दा बन सकता है । सो पट्ठे ने गाँधी जी की वस्तुओं की बात उड़ा दी । और सब लगे चिल्लाने कि गाँधी की वस्तुओं को किसी भी कीमत पर वापस भारत लाओ ।

इस आदमी की जालसाजी एक और बात से समझ आती है कि यह कह रहा है कि इसके पास गाँधी जी के खून का सेम्पल है और गाँधी की भस्म भी । गाँधी का खून हमने ही इतना पी लिया था कि और बचने का प्रश्न ही नहीं । रही बात राख की सो क्या पता चलता है कि यह राख किसकी है । यह तो अपने जलने का विधान है वरना यह आदमी यह भी कह सकता था कि उसके पास गाँधी जी की खोपड़ी है ।

हम इसी पहेली में फँसे हुए थे कि तोताराम आ गया । हमने सोचा कि यह शायद हमारी मदद करेगा पर उसने तो आते ही समस्या को और उलझा दिया । बोला- मास्टर मेरे पास गाँधी जी की पाँच-सात चीजें हैं । मैं उस ओटिस जितना कमीना नहीं हूँ जो बापू की चीजों को नीलाम करूँ । बाप की विरासत को तो सँभाला जाता है, सही सलामत अगली पीढ़ी को सौंपा जाता है न कि नीलाम किया जाता है । हमें हँसी आगई, कहा- तोताराम हमें तो लगता है कि किसी दिन कोई कबाड़ी घर के आगे से गुज़रेगा- बापू की चीजें ले लो । चश्मा, घड़ी, थाली, कटोरा। हर माल पचास रूपया ।


तोताराम गंभीर हो गया, बोला- मास्टर मज़ाक नहीं । सच कह रहा हूँ मेरे पास बापू की खादीई, शराब-बंदी, मितव्ययिता, सादगी, सत्य, अहिंसा, सर्व धर्म समभाव, ग्राम स्वराज आदि सब अच्छी हालत में हैं । सुरक्षित है । मैं इन्हें बिना किसी मूल्य के देना चाहता हूँ । हमें फिर हँसी आ गई , तोताराम! बावला हुआ है क्या । इन चीजों की भला इक्कीसवीं सदी में किसे ज़रूरत हो सकती है । बापू की ये चींजें आचरण की माँग करती हैं । और यह आचरण करके नेताओं को क्या भूखा मरना है ? उन्हें तो वोट कबाड़ने के लिए बापू की भौतिक वस्तुओं की पूजा का नाटक करना है । लोग वस्तुओं के आगे हाथ जोड़ते रहें और ये कुर्सी की जोड़- तोड़ करके माया जोड़ते रहें ।

तोताराम ने लम्बी साँस मारी- लगता है अब ये वस्तुएँ स्वर्ग जाने पर मुझे ही बापू को स्वयं को ही सौंपनी पड़ेंगी।

खाता-पीता रात को औ' दिन को आराम ।
बुरी तरह से व्यस्त है भारत देश महान ॥
भारत देश महान, तनिक अवकाश न मिलता ।
मिलता तो बापू के रस्ते पर भी चलता ॥
कह जोशीकविराय हो गया अज़ब करिश्मा ।
दारू पीता देश पहन बापू का चश्मा ॥

६ मार्च २००९

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