Jul 11, 2014

२०१४ का बजट - दिल छोटा नहीं करते

अरुण जी
आपने बजट पेश किया । करना ही था । यह एक प्रकार से जनता के पसीने की कमाई का वार्षिक श्राद्ध है जिसे हर वित्त मंत्री को करना होता है । इस साल आप कर रहे हैं । सब अपने-अपने हिसाब से प्रतिक्रिया दे रहे हैं । ये सब वे हैं जिन पर किसी बजट का कोई असर नहीं पड़ता । इन सब के अपने-अपने साधन-स्रोत हैं । हम तो आपकी इस बात से खुश हैं कि शाब्दिक ही सही कुछ सहानुभूति तो ज़ाहिर की ।

आपने कहा- काश ! मैं टेक्स-पेयर को कुछ दे पाता । हम तो आपके पैदा होने के दस-बारह वर्ष पहले से देखते आ रहे हैं । सब बेचारे टेक्स-पेयर से लेने के चक्कर में ही रहते हैं । सो आप भी लें । हम तो इसे खाने से पहले अछूता निकालने की तरह दरिया में डाल देते हैं । मछली-मगरमच्छ जो चाहे खाए ।

आपने अपनी कुछ न दे पाने की मज़बूरी ज़ाहिर कर दी, हमारे लिए तो यही बहुत है । हम तो 'उल्फत न सही, नफ़रत ही सही, इसको भी मुहब्बत कहते हैं ' वाले आशिक हैं । आपने सीनियर सिटिज़न के लिए टेक्स की सीमा बढ़ाई, बहुत-बहुत धन्यवाद । यदि दस-बीस हजार घटा भी देते तो हमें हुछ फर्क पड़ने वाला नहीं था ।

आप मात्र इकसठ वर्ष के हैं । हम तो आपका खल्वाट देखकर आपको अडवाणी जी की उम्र समझते थे । और आप निकले हमसे भी दस-बारह वर्ष छोटे ।
सच, काम और बोझ की अधिकता आदमी को समय से पहले बूढ़ा बना देती है । ठीक है कि आप बहुत कर्मठ हैं लेकिन यह भी तो ठीक नहीं कि आप पर दस मंत्रियों का बोझ डाल दिया जाय । दो-दो विभाग और वे भी तगड़े वाले । तभी आज तक किसी भी वित्त मंत्री को बजट पेश करते हुए कमर दर्द नहीं हुआ । इतने लोग पड़े हैं लेकिन एक अकेले आप पर ही इतना बोझ क्यों डाला गया ?

दिन में एक सौ बीस करोड़ की चाय-बीड़ी, नमक-तेल का हिसाब रखें और रात को पकिस्तान, चीन और बंगलादेश की सीमाओं पर पहरा दें । अब कमर दर्द नहीं होगा तो क्या होगा । अब तक जो वित्तमंत्री थे वे यहीं आसपास से सामान जुटा कर रख देते थे । पर ‘अच्छे दिनों’ के चक्कर में मोदी जी ने आपको द्रोणाचल से संजीवनी लाने भेज दिया । हनुमान जी की बात और थी । वे तो वज्र के थे । हम तो साधारण आदमी हैं । ठीक है, आप में उत्साह और लगन है लेकिन आदमी की शक्ति की भी एक सीमा होती है । कमर की भी क्या गलती । उठाने वाला एक और बोझ एक सौ बीस करोड़ आदमियों का । लोगों के लिए एक छोटा-सा परिवार चलाना मुश्किल हो जाता है ।
यह कमर-दर्द भी दाँत-दर्द की तरह बहुत गन्दी तकलीफ़ है । ‘जाके पैर न फटी बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई ’ । हमें पता है । बाहर से कुछ नहीं दीखता लेकिन ज़रा-सा भी पोस्चर गड़बड़ हुआ तो दर्द का ऐसा काँटा-सा चुभता है कि बस ।

खैर, आपको विभाग दिए तो महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन ये ही वे दो विभाग हैं जिनमें सबसे अधिक आलोचना झेलनी पड़ती है । अब तक हमने देखा है कि सब वित्त मंत्री आज तक घाटे का बजट बनाते रहे हैं । अरे, जब है ही घाटा तो किससे क्या उम्मीद कर रहे हो ? और आपको पता है कि सारे झगड़े होते ही घाटे के हैं । जब अनाप-शनाप पैसा हो तो किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं रहती । चाहे दो सौ करोड़ खर्च करके पत्नी का जन्मदिन मनाओ या बेटे को दो करोड़ की कार भिड़ा देने के लिए दे दो ।

अब जब पैसा लिमिटेड हो और देश को बनाना हो पेरिस और लन्दन, तो खींचतान तो होगी ही । इस देश के लोग भी वास्तव में बड़े लीचड़ हैं । न मूर्तियाँ देखकर खुश होते हैं, और न टी.वी. से, न कम्प्यूटर से, न आधुनिकतम सेल-फोन से । हर समय आलू-प्याज, रोटी-पानी । पता नहीं, किस अकाल की पैदाइश हैं ये लोग !

आप तो अपनी गति से चलते रहिए जैसे अब तक के वित्तमंत्री चलते रहे हैं । हाथी को अपनी मस्ती में चलते रहना चाहिए । भौंकने वाले ऐसे ही भौंकते रहते हैं । घाटे का बजट बनाइए, और टेक्स लगाइए और जो कमियाँ हैं उनके लिए पिछली सरकार को दोष दीजिए । यही भारत की राजनीति की समृद्ध परम्परा है ।

आपने कुछ न कर पाने का अफसोस जता कर हमारे दुखते घुटनों पर महानारायण तेल लगा दिया । अब आप जो संजीवनी लाए हैं वह सडसठ साल से बेहोश लक्ष्मण को जिंदा करने के लिए सूर्योदय से पहले पहुँचेगी या नहीं यह विधाता जाने । हो सके तो इस संजीवनी की दो बूँदें आत्महत्या कर चुके किसानों, भूख और कुपोषण से मर चुके बच्चों के नाम से भी आकाश में छींट दीजिएगा । क्या पता, अब तक नेतृत्वों का पाप प्रक्षालन हो जाए ।

हमने तो जो सुख देखने थे सो इन बहत्तर वर्षों में देख लिए ।

११ जुलाई २०१४

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

1 comment:

  1. क्या आसानी से अपने इतनी गहरी बात कह दी।काश हमारी तरह अरुण जेटली को भी यह लेख पढ़ने का अवसर मिले।

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