Nov 24, 2012

भाई साहब का भटकना


तोताराम से सत्संग हुए कोई छः महिने हो गए । हालाँकि ऐसा नहीं है कि यह दुनिया स्वर्ग हो गई है और इसमें निन्दा-स्तुति के योग्य कुछ नहीं बचा । हाँ, यह बात ज़रूर है कि क्या देश और क्या दुनिया हालत यह हो गई है कि 'पंचों का कहना सिर माथे लेकिन पतनाला वहीं गिरेगा' । और जब ससुर पतनाले को वहीं गिरना है तो काहे को मगजपच्ची करें । मगर जैसे सरकार कुपोषित जनता का भी तेल निकाल सकती है तो तोताराम बात करने के लिए कुछ न कुछ निकाल ही लेता है । बस, कारण रहा कि हम छः महिने से अमरीका गए हुए थे । आजकल भले ही आदमी को पूरी रोटी और शुद्ध पानी नहीं मिल रहे हों लेकिन संचार के इतने साधन हो गए हैं कि कहीं भी बैठकर दुनिया से संपर्क बनाए रखा जा सकता है मगर जो बात आमने-सामने मिलकर होती है, जो आनंद गले मिलकर आता है वह आनंन्द फोन और मेसेज या स्काइप में कहाँ? यदि टी.वी. पर मिठाइयाँ और फल देखकर ही तृप्ति हो जाती तो फिर बात ही क्या थी? सो पिछले छः महिने से तोताराम से कभी कभार बातें तो होती रहीं, अखबार भी इंटरनेट पर पढ़ते रहे लेकिन वह बात कहाँ? मेले का समाचार देख-सुनकर वह मज़ा कैसे आ सकता है जो वहाँ जाकर भीड़ में धक्के खाने या भगदड़ में हाथ-पैर तुड़वाकर आता है ।

तो साहब, आज तोताराम पधारे । जैसा कि आप जानते हैं पिछले पचास वर्षों से, जब भी वे या हम गाँव में मौजूद रहे, चाय और अखबार का सेवन उन्होंने हमारे यहीं करके हमें कृतार्थ किया । आज आशा के विपरीत वे अखबार अपने साथ लाए और एक नहीं दो-दो - एक हिंदी का और एक अंग्रेजी का ।

हमारे सामने अखबार पटकते हुए बोला- मास्टर, भाभी से कह सोनिया जी को फ़ोन लगाने की कोशिश करे, तब तक मेरी बात ध्यान से सुन- अपने भाई साहब मनमोहन सिंह जी किसी एसीअन (ASEAN) की मीटिंग में भाग लेने गए थे । अब यह क्या मीटिंग है और जगह कहाँ है मुझे तो पता नहीं? हिंदी वाले अखबार में जगह का नाम 'नोम पेन्ह' लिखा है और अंग्रेजी वाले 'फ्नोम पेन्ह' लिखा है ।

हमने उसे समझाया कि यह कोई मीटिंग है जिसमें दक्षिण एशिया के कोई दसेक देश भाग लेंगें और अमरीका न तो एशिया में है और न ही दक्षिण में लेकिन वह भी भाग लेता है क्योंकि अमरीका के बिना न तो कहीं लोकतंत्र हो सकता है और न ही व्यापार । और यह ‘नोम पेन्ह’ और ‘फ्नोम पेन्ह’ एक ही है । यह कोई अपनी लिपि देवनागरी तो है नहीं कि जो लिखो सो पढ़ो । यह तो रोमन लिपि है जिसमें कोई भी ध्वनि, कभी भी, समझदार नेता की तरह साइलेंट मोड़ में चली जाती है । मगर इसमें सोनिया जी को फ़ोन लगाने की क्या बात है? वे तो वैसे भी संसद के अधिवेशन की तैयारी में व्यस्त होंगीं । और फिर मनमोहन जी कोई बच्चे थोड़े ही हैं जो रास्ता भूल जाएँगे? आ जाएँगे ।




तोताराम हमारे सामने २० नवंबर २०१२ के हिंदी और अंग्रेजी के दोनों अखबार रखते हुए बोला- समझने की कोशिश कर । देख, इस सम्मलेन में दस देश भाग लेने वाले हैं । हिंदी के अखबार में अपने भाई साहब मनमोहन जी चीनी नेता के साथ खड़े हैं और लिखा है- गहरे दोस्त जैसे मिले मन-वेन । अंग्रेजी वाले अखबार में भाई साहब अपने चिर परिचित जोधपुरी सूट या कुर्ता-पायजामा और जेकेट की बजाय एक सस्ती सी चमकीली सी लाल रंग की बुशशर्ट पहने सावधान की मुद्रा में सहमे हुए से जुलिया गिलार्ड के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं । फोटो भाई साहब की ही है क्योंकि इतना शालीन और कोई हो ही नहीं सकता । और, किसी अन्य के फोटो के साथ भाई साहब का सिर चिपका कर ट्रिक करने की हिमाकत कोई भारतीय अखबार नहीं कर सकता क्योंकि तू जानता है कि यहाँ तो किसी नेता की शव-यात्रा से लगे जाम से परेशान होकर यदि कोई फेस बुक पर भी कुछ लिख दे तो पुलिस पकड़ लेती है । अंग्रेजी के इसी अखबार में एक पेज पर ओबामा की के साथ हाथों को दाएँ-बाएँ करके पकड़े हुए एक चेन सी बनाते हुए चार नेताओं का फोटो है लेकिन उसमें चीनी नेता, अपने भाई साहब और आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री जूलिया गिलार्ड तीनों ही नहीं हैं । मेरा तो कलेजा मुँह को आ रहा है । बेचारे झिक-झिक से पीछा छुड़ाकर दो दिन कहीं घूमने गए थे और पता नहीं कहाँ पहुँच गए?

पत्नी ने बताया कि फ़ोन नहीं मिल रहा है और कोई बोल रही है कि जिस नंबर से आप बात करना चाहते हैं वह अभी व्यस्त है । कृपया होल्ड रखें या थोड़ी देर बाद फिर कोशिश करें । इसके बाद कई बार कोशिश की लेकिन बात नहीं हो सकी ।

तोताराम ने निराश होकर कहा- ठीक है मास्टर, चलता हूँ । वैसे सारी बात का पता चल जाता तो तसल्ली हो जाती । मुझे तो लगता है भाई साहब कहीं और तो नहीं चले गए हैं । भले आदमी हैं । बेचारे किसी से कुछ नहीं कहते फिर भी लोग हैं कि जीने ही नहीं देते । लोगों में ज़रा भी रहम नहीं है । एक तो बेचारे अस्सी साल के होने को आ रहे हैं ऊपर से हार्ट के मेज़र ऑपरेशन करवाए हुए तिस पर पौरुष-ग्रंथि अलग निकलवा चुके हैं । कभी किसी चुनाव के चक्कर में नहीं पड़े । भटकते-भटकते हुए दिल्ली पहुँचे तो लोगों ने ज़बरदस्ती पकड़ कर प्रधान मंत्री बना दिया । अब न कोई दूसरा मिले और न इनका पीछा छूटे ।

हमने तोताराम को तसल्ली दी- चिंता मत कर । भाई साहब दुनिया घूमे हैं । दिल्ली विश्वविद्यालय और रिज़र्व बैंक ही क्या, वर्ल्ड बैंक तक चक्कर लगा चुके हैं । कहीं नहीं खोएँगे । लौट आएँगे एक दो दिन में । और फिर चुप रहने मात्र से ही क्या कोई कमजोर हो जाता है? अरे, चुप रहने वाले ज्यादा शक्तिशाली होते हैं । कहा भी है- ‘थोथा चना बाजे घना’ या ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ । अपने भाई साहब चुप रहकर भी वह कर गुजरते हैं जो बड़े-बड़े गरजने वाले नहीं कर पाए । दस साल पहले अपनी पेंशन चार हजार रुपए थी और आज पन्द्रह हजार है पर क्या तुझे पता चला कि कब भाई साहब ने अपने रुपए की क्रय शक्ति उस चार हजार से भी कम कर दी या कब बीस साल में रुपया डालर के मुकाबले एक तिहाई रह गया या कब पेट्रोल, गैस, घी, फल और सब्जियाँ लोगों की पहुँच से बाहर हो गए? किस दिन २५ रुपए वाला स्पीड-पोस्ट चुपचाप ४० रुपए का हो गया? चिंता मत कर ऐसा ही कोई महान काम करके लौटेंगे अपने भाई साहब ।

तोताराम चला गया लेकिन अगले ही दिन फिर लौट आया । बहुत खुश था और हमारे सामने २१ नवंबर का अखबार रखते हुए बोला- मिल गए भाई साहब । देख, जोधपुरी सूट में ओबामा से हाथ मिलाते अपने भाई साहब । वही बाल-सुलभ सकुचाई सी मुस्कान और वही गद्गद् भाव । और तो और इसी दौरे में जापान के प्रधान मंत्री से २.२६ अरब डालर का कर्ज़ा कबाड़ लिया सो अलग ।


हमने कहा- ठीक है मिल गए भाई साहब । लेकिन क़र्ज़ लेने में खुश होने की क्या बात है? साठ बरस हो गए कभी दो पैसे बचाकर किसी को क़र्ज़ देने लायक भी तो बनो । जापान १९४५ में ध्वस्त हो गया था और तुम १९४७ में आज़ाद हुए थे । एक प्रकार से दोनों ने एक साथ ही शुरुआत की लेकिन अब देख कहाँ जापान और कहाँ हम?

तोताराम कहाँ हार मानने वाला था, बोला- अरे कर्ज भी तो उन्हें ही मिलता है जिनकी कोई साख होती है । बता क्या किसी बैंक ने तुझे बेटी की पढ़ाई के लिए लोन दिया? और फिर इन्हें कौन हजार बरस जीना है । अभी तो 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्'; बाद की बाद में आने वाली पीढ़ी जाने ।

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

1 comment:



  1. प्रिय ब्लॉगर मित्र,

    हमें आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है साथ ही संकोच भी – विशेषकर उन ब्लॉगर्स को यह बताने में जिनके ब्लॉग इतने उच्च स्तर के हैं कि उन्हें किसी भी सूची में सम्मिलित करने से उस सूची का सम्मान बढ़ता है न कि उस ब्लॉग का – कि ITB की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगों की डाइरैक्टरी अब प्रकाशित हो चुकी है और आपका ब्लॉग उसमें सम्मिलित है।

    शुभकामनाओं सहित,
    ITB टीम

    http://indiantopblogs.com

    पुनश्च:

    1. हम कुछेक लोकप्रिय ब्लॉग्स को डाइरैक्टरी में शामिल नहीं कर पाए क्योंकि उनके कंटैंट तथा/या डिज़ाइन फूहड़ / निम्न-स्तरीय / खिजाने वाले हैं। दो-एक ब्लॉगर्स ने अपने एक ब्लॉग की सामग्री दूसरे ब्लॉग्स में डुप्लिकेट करने में डिज़ाइन की ऐसी तैसी कर रखी है। कुछ ब्लॉगर्स अपने मुँह मिया मिट्ठू बनते रहते हैं, लेकिन इस संकलन में हमने उनके ब्लॉग्स ले रखे हैं बशर्ते उनमें स्तरीय कंटैंट हो। डाइरैक्टरी में शामिल किए / नहीं किए गए ब्लॉग्स के बारे में आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा।

    2. ITB के लोग ब्लॉग्स पर बहुत कम कमेंट कर पाते हैं और कमेंट तभी करते हैं जब विषय-वस्तु के प्रसंग में कुछ कहना होता है। यह कमेंट हमने यहाँ इसलिए किया क्योंकि हमें आपका ईमेल ब्लॉग में नहीं मिला। [यह भी हो सकता है कि हम ठीक से ईमेल ढूंढ नहीं पाए।] बिना प्रसंग के इस कमेंट के लिए क्षमा कीजिएगा।


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