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Feb 15, 2014

शिष्टाचार की कुछ सामान्य बातें (ओबामा को पत्र )

ओबामा जी,

वैसे संसारिकता और प्रेक्टिकलता का तकाज़ा तो यह है कि जिससे कोई स्वार्थ सधता हो उसके अलावा किसी से भी कोई बात नहीं की जाए जैसे कि आजकल लोग मोदी-उन्मुख होते नज़र आ रहे हैं । उसने चाय बेचने के बल पर प्रधानमंत्री पद की आशा पाल ली तो लालू प्रसाद को अपने चाय बेचने के दिन याद आ रहे हैं । शायद कुछ समर्थन मिल जाए । बड़े लोग सोच रहे हैं कि यदि राजकुमारों के लिए बचपन में चाय बेचने का कोई प्रमाण-पत्र ले लिया होता तो आज काम आता । हो सकता है कोई बचपन का चाय की केतली थामे फोटो प्रकाश में आ जाए । लेकिन हमारा आपसे इस समय कोई स्वार्थ सधने वाला नहीं है फिर भी हम भूतपूर्वोन्मुख आप (केजरीवाल नहीं) को पत्र लिख रहे हैं । इसके तीन कारण हैं- हम आपमें एक पूर्वी युवक की छवि देख रहे थे; आपने अपने प्रथम चुनाव प्रचार के दौरान एक नई आशा जगाई थी; हम अनुभव कर रहे हैं कि आपको सामान्य शिष्टाचार की कुछ बातें बताना ज़रूरी है ।

हालाँकि आपने हमसे ऐसी कोई प्रार्थना नहीं की है । कोई वकील होता तो अमरीकी रेट के हिसाब से कम से कम २५० डालर प्रति घंटे के हिसाब से फीस पहले रखवा लेता । मगर एक हम हैं कि अध्यापक होने के नाते मुफ्त में ही सही सलाह देने के लिए आदतन विवश हैं ।


1.



आपके यहाँ भारतीय दूतावास की एक महिला अधिकारी के साथ जिस प्रकार का अशोभनीय व्यवहार किया गया वह असामान्य और अशिष्ट है । अमरीकी कानून के अनुसार उसे उचित ठहराया जा रहा है । हो सकता है कोई बाल की खाल निकालने वाला राम जेठमलानी जैसा वकील इसे कानूनी रूप से गलत सिद्ध न होने दे लेकिन जो कानून सामान्य व्यवहार, मानवीय गरिमा और नारी का सम्मान न करे वह कैसा कानून । कानून खून के प्यासे पहलवानों का दंगल नहीं बल्कि वह करुणा और न्याय से जन्म लेने वाली एक व्यवस्था है ।


वैसे आप कानूनन कह सकते हैं कि आपको बताया नहीं गया । हो सकता है आपके यहाँ कानून के रखवाले पुलिसियों को शिष्टाचार और मानवता की इतनी समझ न हो । 



लेकिन आप चाहें तो केरल में भारतीय समुद्री सीमा में दो भारतीय मछुवारों को बंदूक चलाकर मार डालने वाले इटली के कर्मचारियों वाली घटना को याद करें । उनके लिए इटली सरकार ने क्रिसमस मनाने के बहाने जमानत की अपील की और भारत सरकार ने उसे मान लिया और अब वे भले आदमी फरार हैं । इसमें भारत की मानवता और योरप से भय के प्रतिशत के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता और अब देखिए कि इटली उन्हें बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में जा चुका है । क्या भारतीय राजनयिक का अपराध उनसे भी गंभीर था ? अमरीकी मानवाधिकार प्रेम की पर्दादारी के लिए हिंदी में न लिखकर अंग्रेजी में 'केविटी सर्च' लिख रहे हैं । क्या उस महिला के पास विनाश के व्यापक हथियार छुपे होने का खतरा था ?

अमरीकी प्रशासन ने इस कृत्य में अब भी कोई अशिष्टता नहीं पाई है । अपनी-अपनी संस्कृति की बात है । वैसे इस मामले में कभी-कभी हम सोचते हैं कि क्या ऐसा ही व्यवहार अमरीका के कानून के रखवाले पुलिसिये चीन के किसी राजनयिक के साथ करने का साहस जुटा पाते तब क्या आप उसे अनदेखा कर देते ? जो शराबी किसी सभ्य, सीधे या कमजोर व्यक्ति से शराब के नशे के बहाने बदतमीजी कर देता है वही थानेदार के सामने लड़खड़ाता हुआ ही सही, नमस्ते करने लग जाता है । आपके पुलिस वालों का यह कानून-प्रेम कहीं उस शराबी वाला ही तो नहीं है ?

इस बारे में भी एक सच्ची घटना सुनिए- आपके जन्म से पहले राष्ट्रपति आइजनहावर के ज़माने की बात है । उस समय अमरीका ने नए-नए यू टू विमान बनाए थे जो किसी भी राडार की पकड़ में नहीं आते थे । सो अमरीका ने रूस की जासूसी के लिए एक ऐसा ही विमान भेजा । रूस ने शिकायत की तो कहा गया- हमने ऐसा कोई विमान नहीं भेजा । फिर रूस ने कहा- हमने एक यू टू विमान गिरा लिया है । तो कहा गया- हमारा ऐसा ही एक विमान रास्ता भटक गया है । हो सकता है यह वही विमान हो । फिर रूस ने उत्तर दिया - इस विमान के चालक को हमने जिंदा पकड़ लिया है और उसने बताया है कि उसे जासूसी के लिए भेजा गया था । अमरीका ने उत्तर दिया- हाँ, हमने भेजा था और भविष्य में भी भेजेंगे । रूस की चेतावनी थी - यदि भविष्य में ऐसा हुआ तो हम उस अड्डे को ही नष्ट कर देंगे जहां से वह उड़ कर आएगा । तब भी क्षमा नहीं मांगी गई लेकिन फिर कभी कोई यू टू रूस की सीमा में नहीं गया ।


2.

दूसरा कारण- जब आप मंडेला के अंतिम संस्कार में सपत्नीक दक्षिणी अफ्रिका गए थे तब का आपका एक फोटो देखा । आप योरप के एक देश की युवा, सुन्दर और अपने से कम उम्र की प्रधान मंत्री के साथ 'सेल्फी' फोटो लेने के लिए पोज़ बना रहे थे । बगल में ही  श्रीमती ओबामा थीं । पत्नी के इतने निकट होते हुए किसी सुंदरी से इतनी निकटता बढ़ाना बहुत साहस का काम है । हम आपके चरित्र और एक पत्नी-व्रत पर कोई प्रश्न नहीं उठा रहे हैं लेकिन ऐसे अवसर पर कोई सामान्य व्यक्ति भी, भले ही झूठ-मूठ ही सही, गंभीर और ग़मज़दा होने का नाटक ही सही, करता तो है । 


लेकिन आपने तो इस सामान्य से शिष्टाचार को भी ताक पर रख दिया । सौन्दर्य तो सामान्य क्या, बड़े-बड़ों को भी अपने जाल में फँसा लेता है, फिर आप तो अभी जवान हैं । लेकिन याद रखना चाहिए कि राजा से जितेन्द्रिय होने की अपेक्षा की जाती है । आप इतने शक्तिशाली देश के प्रथम नागरिक हैं तो आपसे तो और भी नियंत्रित होने की अपेक्षा की जाती है । क्लिंटन जी की दुर्गति तो ऐसे कर्मों के कारण जग-जाहिर है ही । संन्यास की उम्र पर पहुँच चुके इटली के पूर्व प्रधान मंत्री बर्लुस्कोनी शायद जेल में हैं । यदि नहीं, तो भी जनता ने तो उन्हें अपनी विस्मृति के गटर में डाल दिया होगा । फ़्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति महोदय अपनी लम्पटता के कारण सुर्ख़ियों में हैं । और पूर्व पत्नी भारत में मानसिक शांति तलाश रही है । हो सकता है आपका ऐसा कुछ इरादा नहीं रहा हो लेकिन पत्रकार तो बड़ी अफवाहें फैला रहे हैं । और पत्रकारों की ऐसी अफवाहें अब तक प्रायः सच ही निकली हैं ।



3.



तीसरा कारण- अभी एक खुलासा छपा है कि आपने नवम्बर २००९ में मनमोहन सिंह जी को जो डिनर दिया था उसमें पौने छः लाख डालर खर्च हुए थे । मनमोहन जी भले आदमी हैं । वे अपनों की बातों का ही ज़वाब नहीं देते तो आपको क्या कुछ कहेंगे । यह आपके और आपके प्रशासन के सोचने की बात है कि किसी भले आदमी को पहले तो निमंत्रण देकर घर बुलाओ और फिर इस तरह दुनिया में उसका जुलूस निकालो ।

एक किस्सा सुनाते हैं जिससे शायद हमारी बात स्पष्ट हो जाए । एक सेठ ने अपने नाई को किसी काम से अपने बेटे की ससुराल भेजा । वहाँ नाई को दस-दस ग्राम के पतले-पतले फुल्के परोसे गए । उन दिनों में आने-जाने के साधन बहुत कम थे और वैसे भी लोग दस-पंद्रह किलोमीटर के लिए कोई साधन लेते भी नहीं थे, पैदल ही चले जाते थे । नाई भी पैदल चलकर सेठ के बेटे की ससुराल पहुंचा । दिन भर का भूखा, पतले-पतले फुल्के , खा गया चालीस-पचास ।


नाई खाता जाता था और सोचता जाता था कि इतने पलते फुल्के परसे जाने का क्या चक्कर है ? आप जानते हैं कि नाई सत्तर घाट का पानी पिया एक चतुर प्राणी होता है । उसने छुपाकर एक फुल्का अपनी जेब में रख लिया । जब लौट कर सेठ को रिपोर्ट की तो अपने समधी की चिट्ठी पढ़कर सेठ ने कहा- नेवगी जी, आपने तो बेटे की ससुराल में हमारी नाक ही कटवा दी । अरे भाई, ऐसी भी क्या भूख । पचास फुल्के खा गए । नाई ने जेब से फुल्का निकाल कर दिखाया और कहा- सेठ, ये रहा फुल्के का नमूना ।


बात समझ में आ गई होगी । नहीं तो कुछ और स्पष्ट कर देते हैं । उस भोज में मनमोहन जी के साथ होंगे कोई बीस आदमी, जब कि आप वाले दो सौ । आपको याद होगा उस भोज में शराब के एक व्यापारी (सलाही) अपनी सुन्दर पत्नी के साथ बिना बुलाए आए और दारू पीकर चले गए । हो सकता है ऐसे ही बहुत से लोग बिना गिनती के आ गए होंगे और आपने खर्चा डाल दिया मनमोहन जी के खाते में । जैसा कि हमें याद है, उस भोज में मनमोहन जी को बैंगन का भुरता परोसा गया था और वह बैंगन भी मिशेल ने अपने किचन गार्डन में उगाया था । हमें लगता है कि कर्मचारियों ने इसमें कम से कम साठ प्रतिशत का घपला किया है । चालीस प्रतिशत में से मनमोहन जी के साथ वालों पर चार प्रतिशत खर्चा हुआ होगा । कुल मिलाकर दस हजार डालर से अधिक खर्चा अमरीकी सरकार का नहीं हुआ होगा । जब कि इससे कई गुना तो उन्होंने निजी हवाई जहाज से अमरीका आने-जाने में खर्च कर दिया होगा । जितने की झाँझ नहीं उतने के मंजीरे फूट गए और इतना बड़ा अहसान ऊपर से । इससे करोड़ों गुना तो अपने एक परमाणु सौदे में मनमोहन जी से कमा लिया होगा ।

हमारे यहाँ 'ऐसे' अतिथि सत्कार को ओछी-नीत कहते हैं लेकिन आपसे यही कहते हैं कि इतने बड़े देश के राष्ट्रपति होकर इतना छोटा दिल मत रखिए । अपने अकाउंट्स विभाग वालों से भी कह दें कि मेहमानों की रोटियाँ न गिना करें ।

ये तीनों बातें ही अशिष्टता हैं, क्षमा माँगने योग्य हैं लेकिन हमें पता है कि आप क्षमा नहीं मांगेंगे क्योंकि क्षमा माँगने के लिए क्षमा करने वाले से भी बड़ा दिल चाहिए ।

हमारे यहाँ शिव काल से भी बड़े, महाकाल हैं और इसीलिए महादेव हैं । उनसे क्षमा माँगने का एक मन्त्र है । उससे आप समझ जाएंगे कि वास्तव में सच्ची क्षमा-याचना क्या होती है ? यह कोई सॉरी जैसा दो अक्षरों में निबटा दिया जाने वाला रस्मी मामला नहीं है । सुनिए उस श्लोक का भावार्थ-
हे करुणा के सिन्धु महादेव शम्भु ! मैं अपने हाथों, पैरों से किए गए, शरीर और कर्म द्वारा किए गए, कानों और नेत्रों द्वारा किए गए, मन द्वारा किए गए, सभी व्यक्त और अव्यक्त अपराधों के लिए आपसे क्षमा माँगता हूँ । मुझे क्षमा करिए ।

ऐसी क्षमा किसी और का नहीं बल्कि स्वयं का भला करती है उसे पवित्र करती है । यदि इस भाव से क्षमा मांगी जाए तो ठीक है अन्यथा शाब्दिक चोंचलों का कोई अर्थ नहीं । वैसे हम जानते हैं कि आप ऐसी औपचारिक क्षमा भी नहीं मांगेंगे क्योंकि आपके सामने इण्डिया की स्थिति तो उस प्रेमिका जैसी है जो कहती है-
तड़पाओगे तड़पा लो, हम तड़प तड़प कर भी तुम्हारे गीत गाएंगे ।

वैस अब आपको अधिक सोचना भी नहीं चाहिए क्योंकि अब कौनसा चुनाव लड़ना है । अमरीका में कोई भी राष्ट्रपति अधिक से अधिक आठ वर्ष का सत्ता सुख ही भोग सकता है । सो आपके छः वर्ष तो बीत ही गए, दो और बीत जाएंगे । आपकी स्थिति तो हमारे अरविन्द केजरीवाल जैसी है । आपके लिए पाने को कुछ नहीं है और उसके पास कुछ खोने को नहीं है ।


‘जय शंकर बम भोले’ नहीं बोलेंगे क्योंकि क्या पता, कहीं हमारी भी 'केविटी सर्च ' न हो जाए । और उसमें व्यापक विनाश की कोई कविता या पत्र निकल आया तो क्या करेंगे । वैसे यह बम वह नहीं है जो आतंकवादी रखते हैं । यह तो शिव के प्रिय भंग के गोले से संबंधित है जिसका सेवन आपने भी किया हुआ है । क्या मज़े की चीज़ है ? एक आनंद ही आनंद । कोई कुंठा और ईर्ष्या-द्वेष नहीं । खाओ तो खाते ही जाओ, हँसो तो हँसते ही जाओ, रोओ तो रोते ही चले जाओ ।

आज 'वेलेंटाइन डे' भी है । ऐसे नहीं कहा जा रहा हो तो भंग का गोला चढ़ा कर ही सही, एक बार ढंग से मिशेल को 'आई लव यू' कह दो और भावी पारिवारिक जीवन को सुखद बना लो क्योंकि राष्ट्रपति न रहने पर, न कोई गायिका पूछने आएगी और न ही कोई युवा प्रधान मंत्री । यही भली औरत साथ निभाएगी ।

१४ फरवरी २०१४

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Jan 6, 2013

मनमोहनजी और बँगले से खतरा

हर मन को मोहने वाले, हमारे प्रिय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी,
सत् श्री अकाल ।

हमने कोई बीस वर्ष हिंदी पढ़ी और फिर चालीस वर्ष तक बच्चों को हिंदी पढ़ाई । जो हमने झेला उससे दुगुना हमने बच्चों को झिला दिया । आजकल की बात अलग है । बच्चे और अध्यापक दोनों चतुर हो गए हैं सो पता ही नहीं लगता कि कौन किसको झेल रहा है और कौन किसको झिला रहा है । आजकल पता नहीं हिंदी में बच्चों से किस तरह के लेख लिखवाए जाते हैं ? जब हम पढ़ते थे तो कई तरह के निबंध लिखवाए जाते थे जिनमें कुछ ऐसे भी होते थे – ‘मेरा प्रिय कवि’ या ‘मेरा प्रिय लेखक’ आदि । इसके बाद हमने नवें दशक में इसी शृंखला के और भी निबंध लिखवाए जैसे - 'मेरा प्रिय प्रधानमंत्री' । हमारे विद्यार्थी-काल में ऐसे निबंध नहीं हुआ करते थे क्योंकि ले देकर एक ही तो प्रधानमंत्री थे- नेहरू जी । भले ही किसी को प्रिय लगो या अप्रिय ।

अब आपने आकर थोड़ा स्थायित्व प्रदान किया है अन्यथा तो एक ज़माना था जब कभी भी प्रधानमंत्री बदल जाया करते थे । देवेगौड़ा, चरणसिंह, चंद्रशेखर और गुजराल साहब का क्या प्रधानमंत्री बनना और क्या न बनना । हाँ, सरकारी बँगले के उम्मीदवार ज़रूर बढ़ गए । वैसे यदि तिबारा चांस नहीं मिलता तो अटल जी भी इसी श्रेणी में धरे रखे ही थे । तो इस प्रकार गिनती तो बढ़ ही गई । और 'मेरा प्रिय प्रधानमंत्री ' निबंध लिखने वालों को चयन का अवसर मिल गया । सुविधा भी बढ़ गई । चरणसिंह जी को चुन लो या चंद्रशेखर जी या फिर गुजराल साहब या देवेगौड़ा जी - सबकी प्रधानमंत्री के रूप में प्रियता का समय कम होने से सिलेबस भी कम हो गया ।

खैर, अब आपके होते हुए दूर-दूर तक कोई विकल्प नज़र ही नहीं आता । नई सदी में प्रिय या अप्रिय आप ही हो । कई बार लगा कि इस या उस मुद्दे पर अब गए और तब गए, लेकिन साहब मान गई दुनिया कि ‘पीसा की झूलती मीनारें’ भी इतना सस्पेंस पैदा नहीं करती जितना आपको लेकर मचा । लेकिन अब लोगों को विश्वास हो गया है कि भले ही पीसा की मीनारें गिर जाएँ लेकिन भगवान कि दया से या इस देश के सौभाग्य से आपका हिलना और गिरना दोनों ही संभव नहीं लगता । भले ही अडवाणी जी या मुलायम या मायावती कोई भी आशा लगाए लेकिन हमें उनकी मुरादें पूरी होती नहीं लगतीं क्योंकि आप जैसा काबिल और देश का हितचिन्तक प्रधानमंत्री इस देश को मिलने से रहा । किसी न किसी प्रकार आपने देश का हित करके ही छोड़ा, चाहे कोई भी जोड़-तोड़ करके बहुमत जुटाना पड़ा । मुँह न देखने लायक के पाँव देखे, देश के हित के सामने अपने मान-सम्मान की चिंता भी नहीं की, जाने किस-किस के ताने सहे मगर देश का हित करके ही छोड़ा फिर चाहे परमाणु समझौता हो या वालमार्ट के लिए पलकें बिछाना । देश के हित के लिए यह कोई छोटा काम नहीं है । कोई और होता तो इतनी आलोचना के बाद कब का भाग लेता ।

सो हमारे प्रिय प्रधानमंत्री तो आप ही हैं भले ही ब्रिटेन वाले आपको किसी का गुड्डा कहें या अमरीका वाले अंडर-अचीवर । हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता । हम तो जिसके भी होते हैं अंध-भक्त होते है, सच्चे श्रद्धालु होते हैं आपकी तरह ।

आजकल हमारे राजस्थान में भयंकर सर्दी पड़ रही है । वैसे हमारा मानना है कि आजकल के मुकाबले सर्दी पहले अधिक पड़ती थी । आजकल तो प्रदूषणजनित ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण फिर भी ठण्ड काफ़ी कम हो गई है फिर भी बड़े तो बड़े बच्चों तक को घर में बने हुए लेटरिन में जाते हुए भी ठण्ड लगती है । एक हमारा समय था जब आठ बजे तक सूरज के दर्शन नहीं होते थे । बच्चे सुबह होते ही पानी का लोटा लेकर जंगल-दिशा के लिए चल पड़ते थे । उस समय जयराम रमेश जी वाले विभाग को इसी नाम से जाना जाता था । लोटा एक और बच्चे चार-पाँच । हालाँकि राजस्थान में पानी की कमी है लेकिन इतनी भी नहीं कि जलाभाव में चार बच्चे एक ही लोटा पानी से काम चलाएँ । यह तो ठण्ड में लोटा पकड़े रहने की पीड़ा का सभी उम्मीदवारों में सामान वितरण के लिए किया जाता था ।

खैर जी, हम भी क्या फालतू ज़िक्र लेकर बैठ गए । आपको कहाँ फुर्सत है ऐसी छोटी-मोटी बातों पर ध्यान देने की । आपके सामने तो और बड़ी-सदी समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं । अब चुनाव में दिन ही कितने रह गए हैं । भले ही मौत का पता नहीं चले लेकिन कुर्सी पर बैठा आदमी पूरे पाँच बरस तक अपने संभावित पतन के बारे में ही चौबीसों घंटे सोच-सोचकर जागता और पैसे जोड़ता रहता है । लेकिन आपकी बात ही और है । आप तो इस मामले में सच्चे निस्पृह संत हैं । न हार आपकी और न जीत आपकी । फ़िक्र तो उनको होनी चाहिए जो आपको मनोनीत करते हैं । चुनाव का झंझट तो आपने कभी पाला ही नहीं । चुनाव लड़ाने वालों को भी एक बार आपको दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़वाने के बाद समझ में आ गया कि अपन कितने लोकप्रिय हैं ।

तो भाई साहब, बात हो रही थी ठण्ड की । जिनके पास ठण्ड से बचने की सुविधा होती है जैसे एयरकंडीशनिंग या फिर सर्दी में खाने को गिज़ा या फिर दारू, वे जानबूझकर बार-बार ठण्ड की अधिकता की चर्चा करते हैं । हमारे पास तो ले दे कर एक बीस साल पुराना, दिल्ली के रीगल सिनेमा के पास रेड़ी लगाने वाले से ख़रीदा हुआ, सेकण्ड-हैंड कोट है । अब तो न उस कोट में गरमी बची और न हमारे सत्तर साल पुराने इस अस्थिपंजर में । इसलिए अपनी हीन भावना को छुपाने के लिए, यदि कोई कहता भी है कि आज सर्दी बहुत है तो हम अकड़ कर उसका विरोध करते हुए कहते हैं- नहीं ,कोई खास नहीं । कुछ खाया-पिया करो । जब कि हम खुद अपनी हालत जानते हैं कि दारू तो दूर, दवा तक के लिए भी कंजूसी करते हैं । आपको तो खैर, भगवान की दया से सभी सुविधाएँ हैं- गिज़ा भी, दवा भी और दारू भी । और फिर ठण्ड तो हम जैसे जमना-जल में खड़े ब्राह्मण को लगेगी, महलों में तो सारे मौसम आशिकाना होते हैं । ये राजभवन भी बड़ी अजीब शै हैं । इनमें घुसते ही पचासी बरस का बूढ़ा भी फुदकने लगता है । आप तो फिर भी हमारी तरह अस्सी से कम ही हैं । वैसे हम तो आपकी तटस्थता और सादगी के कायल हैं ।

तो साहब, हम ठण्ड से बचने के लिए रजाई में घुसे बैठे थे । घर से बाहर निकल कर कहाँ जाएँ । घूमना-फिरना तो उसको सूझता है जिसकी जेब में माल हो-

इशक करे ऊ जिसकी जेब में माल वाह रे बलमू ।
कदर गँवाए जो कड़का कंगाल वाह रे बलमू ॥

सो हमने बाज़ार तो दूर, बिना बात घर से निकलना तक छोड़ दिया है । दोपहर का समय, लेकिन हम रजाई में घुसे-घुसे भी ठिठुर रहे थे । पोती के पास कम्प्यूटर है और वह उस पर कभी-कभी समाचार भी देख लिया करती है । सो पता नहीं क्या पढ़ लिया कि दौड़ी-दौड़ी हमारे पास आई और कहने लगी- बाबा, मनमोहन सिंह जी की रक्षा कीजिए । उसे पता नहीं, जो आदमी ज़रा सी सर्दी से अपनी रक्षा नहीं कर सकता, बढ़ती महँगाई से अपने घर की अर्थव्यवस्था की रक्षा नहीं कर सकता, जो सब्सिडी के छः सिलेंडरों में एक साल खाना नहीं बना सकता - वह किसी की क्या रक्षा कर सकता है ।

फिर भी सुनते ही हमें इस भयंकर सर्दी में भी पसीना आ गया और बच्ची की हिम्मत बढ़ाने के लिए कहा- कहो बेटी, उन पर क्या संकट है ? यदि आँख में कोई खराबी है तो हम अपनी आँख देने को तैयार हैं ।

बच्ची भी कोई कम नहीं । कहने लगी- बाबा, आपकी आँखें लेकर मनमोहन सिंह जी क्या करेंगे ? क्या आपको देश का भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है ? जब देखो तब महँगाई, बेकारी, बीमारी, कुपोषण, महिलाओं की असुरक्षा, धर्म जाति के आधार पर भेदभाव, विदेशी अपसंस्कृति - जाने किस- किस का रोना लेकर बैठे रहते हो । सभी समस्याओं के बावज़ूद मनमोहन जी को देश का जो उज्ज्वल भविष्य नज़र आ रहा है, वह आपकी आँखों से तो नज़र आने से रहा । आपकी आँखे लेकर क्या करेंगे ? न आपके गुर्दे इतने मज़बूत कि बिना स्पष्ट बहुमत के परमाणु समझौता और एफ.डी.आई. पास करवा लें । अभी तो उन्हें जाने कितने कठिन कदम उठाने हैं देश के लिए । आपका कोई भी अंग उनके काम का नहीं है । और फिर क्या वे आपके अंगों के भरोसे देश को चला रहे हैं ? इस पिछड़े देश को विकास की सही दिशा दिखाने के लिए आँखें, और कठोर निर्णय लेने के लिए मजबूत गुर्दे देने के लिए वर्ल्ड बैंक, विश्व व्यापार संगठन, डंकल-बुश-ओबामा जाने कौन-कौन तैयार बैठे हैं । वैसे भगवान की दया से उनके सभी अंग-प्रत्यंग ठीक हैं और फिर यदि कोई खराबी-शराबी होगी तो अमरीका कौन दूर है ? जाएँगे और करवा आएँगे ओवरहालिंग । आप बिना बात मुझे असली बात से भटकाओ मत और ध्यान से सुनो । उनको न तो कोई शारीरिक खतरा है और मानसिक । न किसी आतंकवादी से और न महँगाई और बेकारी से । भगवान की दया से सारी बेटियाँ ब्याह दीं । कमा-खा रही हैं; अपने घर में खुश हैं ।
उन्हें खतरा तो अपने बँगले से है ।

फिर हमारा दिमाग अपने हिसाब से सक्रिय हो गया और पूछा- क्या उनका बंगला टपकता है, क्या वहाँ अपनी गली की तरह बरसात में पानी भरता है, क्या उनके घर के पास स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मोबाइल का टावर लगा हुआ जो उनके हार्ट के लिए खतरनाक हो सकता है , क्या किसी भू-माफिया ने उनके घर पर कब्ज़ा करने का मन बना लिया है , क्या उनके घर में पानी नहीं आता या फिर नए मीटर के कारण बिजली का बिल ज्यादा आता है ? या उनके घर में किसी भूत-प्रेत का प्रकोप है ?

बच्ची जोर से हँस पड़ी और कहने लगी- जूते बनाने वाले की पहुँच कहाँ तक होगी ? वह जूतों से ही आदमी मापता है । अब आप कुछ मत सोचो और कुछ मत बोलो और सुनो- मनमोहन जी का बंगला इतना पुराना हो चुका है कि कभी भी गिर सकता है ।

हमने कहा- तो क्या बात है ? जैसे हम लोग कोई प्राकृतिक आपदा आने पर किसी सरकारी इमारत, स्कूल, धर्मशाला आदि में शरण ले लेते हैं तो वे भी कुछ दिन के लिए राष्ट्रपति भवन में शरण ले लें । और शरण क्या, स्थाई रूप से भी वहाँ रह सकते हैं । तीन सौ कमरे हैं । प्रणव दा क्या तीन सौ कमरों में रहते हैं ? चाहे तो मनमोहन जी ही क्या सारा मंत्रिमंडल राष्ट्रपति भवन में रह सकता है । मंत्रियों के सारे बँगले दिल्ली के प्रोपर्टी डीलरों को नीलाम कर दें । वैसे भी सरकार अच्छे-भले सरकारी उपक्रमों को धूल के भाव निजी क्षेत्रों को बेच ही रही है । वैसे तुमने यह तो बताया ही नहीं कि १९३० में बने अंग्रेजों के बनवाए बँगले अस्सी साल में ही गिरने कैसे लग गए ? यदि आजकल की पी.डब्लू.डी. वालों ने बनाए होते या मनरेगा में बने होते तो बात और थी ।

बच्ची ने कारण बताया कि ये मकान केवल चूने और ईंटों से बने हैं, इनमें स्टील का उपयोग नहीं हुआ है इसलिए इनके गिरने का समय आ गया है । हमने फिर प्रतिवाद किया- अरे, चूने से बनी क़ुतुबमीनार को तो कुछ नहीं हुआ, बिना स्टील के कंस का किला, बनारस का विश्वनाथ मंदिर, वृहदेश्वर का मंदिर, मीनाक्षी मंदिर सभी खड़े हैं । हमें तो लगता है कि ये पी.डब्लू. डी. वाले डरा कर पहले तो इन मकानों को गिरवाने में पैसे कमाएँगे और फिर बनवाने में । इनका क्या, ये चाहें तो कागज पर मकान बना दें, कागज पर कुएँ खुदवा दें और फिर पानी न निकलने पर भरवा दें और दोनों कामों के पैसे खा जाएँ जैसे कि मंत्री जी अपने एन.जी.ओ. में हवाई विकलांगों को व्हील चेयर बँटवा दें । इनकी किसी राय को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए ।

बच्ची ने कहा- नहीं बाबा, ये लोग तो बेचारे बहुत ईमानदार हैं । एक इंजीनीयर ने तो यहाँ तक कहा है कि यह तो पी.डब्लू. डी. वालों की समय-समय पर की गई मरम्मत का चमत्कार है कि ये इतने दिन भी चल गए वरना तो इन्हें कभी का गिर जाना चाहिए था ।

अब हमने कहा- बेटा, अब हम तुम्हें कैसे समझाएँ कि पी.डब्लू.डी., एम.ई.एस., कस्टम-एक्साइज, पुलिस और इनकम टेक्स विभाग को कमाऊ विभाग क्यों कहा जाता है । बस, यह समझ लो कि मिस्र के पिरामिड यदि इन्होंने बनाए होते तो कब के ढेर हो गए होते या साँची और सारनाथ के स्तूपों का ठेका इन्होंने लिया होता तो जाने कितने भिक्षु दब कर मर गए होते ।

पर खैर, कोई बात नहीं । हम और तो कुछ कर नहीं सकते । तू इनको लिख दे कि यदि और कोई व्यवस्था नहीं हो तब तक अपने यहाँ आ जाएँ । पास में कृषिमंडी का हेलीपेड है । रोजाना सरकारी हेलीकोप्टर से अप-डाउन कर लेंगे । कौन सा अपनी कार और अपना पेट्रोल लगाना है । वैसे कुछ भगवान पर भी विश्वास करना चाहिए । ‘जाको राखे साइयां मार सके ना कोय’ और फिर जिसकी मौत आ ही गई उसे कोई बचा भी नहीं सकता । चारपाई से गिर कर भी आदमी मर सकता है और प्रह्लाद भक्त की तरह पहाड़ पर से लुढ़काया जाकर भी बच जाता है । अरे, और कुछ नहीं तो बिजली ही गिर पड़े उसे कौन कमांडो और सिक्योरिटी रोक लेगी । राजा परीक्षित को तो फल में से निकल कर एक कीड़े ने काट लिया था । और फिर रहीम जी ने भी कहा है-

रहिमन बहु भेषज करत ब्याधि न छांडत साथ ।
खग मृग बसत अरोग बन हरि अनाथ के नाथ ॥

बच्ची भी हिंदी पढ़ती है । उसने भी व्यंजना निकाली- कहने लगी । यही तो समस्या है । वे अनाथ भी तो नहीं कि भगवान उनकी जिम्मेदारी लें । वे तो पहले से ही ‘भारत माता’ की शरण में हैं ।

हमने कहा- तो फिर हम क्यों उनकी फ़िक्र करें । जिसने प्रधानमंत्री बनाया है वही उनकी रक्षा भी करेगा । हमारे पास तो जो विकल्प थे सो तुम्हें बता दिए । और हम फिर रजाई में घुस गए ।

तो भाईजान, हमारा तो यही लिखना है कि आप हमारे भरोसे नहीं रहें ।
जै राम जी की ।

05-01-2013

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Nov 24, 2012

भाई साहब का भटकना


तोताराम से सत्संग हुए कोई छः महिने हो गए । हालाँकि ऐसा नहीं है कि यह दुनिया स्वर्ग हो गई है और इसमें निन्दा-स्तुति के योग्य कुछ नहीं बचा । हाँ, यह बात ज़रूर है कि क्या देश और क्या दुनिया हालत यह हो गई है कि 'पंचों का कहना सिर माथे लेकिन पतनाला वहीं गिरेगा' । और जब ससुर पतनाले को वहीं गिरना है तो काहे को मगजपच्ची करें । मगर जैसे सरकार कुपोषित जनता का भी तेल निकाल सकती है तो तोताराम बात करने के लिए कुछ न कुछ निकाल ही लेता है । बस, कारण रहा कि हम छः महिने से अमरीका गए हुए थे । आजकल भले ही आदमी को पूरी रोटी और शुद्ध पानी नहीं मिल रहे हों लेकिन संचार के इतने साधन हो गए हैं कि कहीं भी बैठकर दुनिया से संपर्क बनाए रखा जा सकता है मगर जो बात आमने-सामने मिलकर होती है, जो आनंद गले मिलकर आता है वह आनंन्द फोन और मेसेज या स्काइप में कहाँ? यदि टी.वी. पर मिठाइयाँ और फल देखकर ही तृप्ति हो जाती तो फिर बात ही क्या थी? सो पिछले छः महिने से तोताराम से कभी कभार बातें तो होती रहीं, अखबार भी इंटरनेट पर पढ़ते रहे लेकिन वह बात कहाँ? मेले का समाचार देख-सुनकर वह मज़ा कैसे आ सकता है जो वहाँ जाकर भीड़ में धक्के खाने या भगदड़ में हाथ-पैर तुड़वाकर आता है ।

तो साहब, आज तोताराम पधारे । जैसा कि आप जानते हैं पिछले पचास वर्षों से, जब भी वे या हम गाँव में मौजूद रहे, चाय और अखबार का सेवन उन्होंने हमारे यहीं करके हमें कृतार्थ किया । आज आशा के विपरीत वे अखबार अपने साथ लाए और एक नहीं दो-दो - एक हिंदी का और एक अंग्रेजी का ।

हमारे सामने अखबार पटकते हुए बोला- मास्टर, भाभी से कह सोनिया जी को फ़ोन लगाने की कोशिश करे, तब तक मेरी बात ध्यान से सुन- अपने भाई साहब मनमोहन सिंह जी किसी एसीअन (ASEAN) की मीटिंग में भाग लेने गए थे । अब यह क्या मीटिंग है और जगह कहाँ है मुझे तो पता नहीं? हिंदी वाले अखबार में जगह का नाम 'नोम पेन्ह' लिखा है और अंग्रेजी वाले 'फ्नोम पेन्ह' लिखा है ।

हमने उसे समझाया कि यह कोई मीटिंग है जिसमें दक्षिण एशिया के कोई दसेक देश भाग लेंगें और अमरीका न तो एशिया में है और न ही दक्षिण में लेकिन वह भी भाग लेता है क्योंकि अमरीका के बिना न तो कहीं लोकतंत्र हो सकता है और न ही व्यापार । और यह ‘नोम पेन्ह’ और ‘फ्नोम पेन्ह’ एक ही है । यह कोई अपनी लिपि देवनागरी तो है नहीं कि जो लिखो सो पढ़ो । यह तो रोमन लिपि है जिसमें कोई भी ध्वनि, कभी भी, समझदार नेता की तरह साइलेंट मोड़ में चली जाती है । मगर इसमें सोनिया जी को फ़ोन लगाने की क्या बात है? वे तो वैसे भी संसद के अधिवेशन की तैयारी में व्यस्त होंगीं । और फिर मनमोहन जी कोई बच्चे थोड़े ही हैं जो रास्ता भूल जाएँगे? आ जाएँगे ।




तोताराम हमारे सामने २० नवंबर २०१२ के हिंदी और अंग्रेजी के दोनों अखबार रखते हुए बोला- समझने की कोशिश कर । देख, इस सम्मलेन में दस देश भाग लेने वाले हैं । हिंदी के अखबार में अपने भाई साहब मनमोहन जी चीनी नेता के साथ खड़े हैं और लिखा है- गहरे दोस्त जैसे मिले मन-वेन । अंग्रेजी वाले अखबार में भाई साहब अपने चिर परिचित जोधपुरी सूट या कुर्ता-पायजामा और जेकेट की बजाय एक सस्ती सी चमकीली सी लाल रंग की बुशशर्ट पहने सावधान की मुद्रा में सहमे हुए से जुलिया गिलार्ड के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं । फोटो भाई साहब की ही है क्योंकि इतना शालीन और कोई हो ही नहीं सकता । और, किसी अन्य के फोटो के साथ भाई साहब का सिर चिपका कर ट्रिक करने की हिमाकत कोई भारतीय अखबार नहीं कर सकता क्योंकि तू जानता है कि यहाँ तो किसी नेता की शव-यात्रा से लगे जाम से परेशान होकर यदि कोई फेस बुक पर भी कुछ लिख दे तो पुलिस पकड़ लेती है । अंग्रेजी के इसी अखबार में एक पेज पर ओबामा की के साथ हाथों को दाएँ-बाएँ करके पकड़े हुए एक चेन सी बनाते हुए चार नेताओं का फोटो है लेकिन उसमें चीनी नेता, अपने भाई साहब और आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री जूलिया गिलार्ड तीनों ही नहीं हैं । मेरा तो कलेजा मुँह को आ रहा है । बेचारे झिक-झिक से पीछा छुड़ाकर दो दिन कहीं घूमने गए थे और पता नहीं कहाँ पहुँच गए?

पत्नी ने बताया कि फ़ोन नहीं मिल रहा है और कोई बोल रही है कि जिस नंबर से आप बात करना चाहते हैं वह अभी व्यस्त है । कृपया होल्ड रखें या थोड़ी देर बाद फिर कोशिश करें । इसके बाद कई बार कोशिश की लेकिन बात नहीं हो सकी ।

तोताराम ने निराश होकर कहा- ठीक है मास्टर, चलता हूँ । वैसे सारी बात का पता चल जाता तो तसल्ली हो जाती । मुझे तो लगता है भाई साहब कहीं और तो नहीं चले गए हैं । भले आदमी हैं । बेचारे किसी से कुछ नहीं कहते फिर भी लोग हैं कि जीने ही नहीं देते । लोगों में ज़रा भी रहम नहीं है । एक तो बेचारे अस्सी साल के होने को आ रहे हैं ऊपर से हार्ट के मेज़र ऑपरेशन करवाए हुए तिस पर पौरुष-ग्रंथि अलग निकलवा चुके हैं । कभी किसी चुनाव के चक्कर में नहीं पड़े । भटकते-भटकते हुए दिल्ली पहुँचे तो लोगों ने ज़बरदस्ती पकड़ कर प्रधान मंत्री बना दिया । अब न कोई दूसरा मिले और न इनका पीछा छूटे ।

हमने तोताराम को तसल्ली दी- चिंता मत कर । भाई साहब दुनिया घूमे हैं । दिल्ली विश्वविद्यालय और रिज़र्व बैंक ही क्या, वर्ल्ड बैंक तक चक्कर लगा चुके हैं । कहीं नहीं खोएँगे । लौट आएँगे एक दो दिन में । और फिर चुप रहने मात्र से ही क्या कोई कमजोर हो जाता है? अरे, चुप रहने वाले ज्यादा शक्तिशाली होते हैं । कहा भी है- ‘थोथा चना बाजे घना’ या ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ । अपने भाई साहब चुप रहकर भी वह कर गुजरते हैं जो बड़े-बड़े गरजने वाले नहीं कर पाए । दस साल पहले अपनी पेंशन चार हजार रुपए थी और आज पन्द्रह हजार है पर क्या तुझे पता चला कि कब भाई साहब ने अपने रुपए की क्रय शक्ति उस चार हजार से भी कम कर दी या कब बीस साल में रुपया डालर के मुकाबले एक तिहाई रह गया या कब पेट्रोल, गैस, घी, फल और सब्जियाँ लोगों की पहुँच से बाहर हो गए? किस दिन २५ रुपए वाला स्पीड-पोस्ट चुपचाप ४० रुपए का हो गया? चिंता मत कर ऐसा ही कोई महान काम करके लौटेंगे अपने भाई साहब ।

तोताराम चला गया लेकिन अगले ही दिन फिर लौट आया । बहुत खुश था और हमारे सामने २१ नवंबर का अखबार रखते हुए बोला- मिल गए भाई साहब । देख, जोधपुरी सूट में ओबामा से हाथ मिलाते अपने भाई साहब । वही बाल-सुलभ सकुचाई सी मुस्कान और वही गद्गद् भाव । और तो और इसी दौरे में जापान के प्रधान मंत्री से २.२६ अरब डालर का कर्ज़ा कबाड़ लिया सो अलग ।


हमने कहा- ठीक है मिल गए भाई साहब । लेकिन क़र्ज़ लेने में खुश होने की क्या बात है? साठ बरस हो गए कभी दो पैसे बचाकर किसी को क़र्ज़ देने लायक भी तो बनो । जापान १९४५ में ध्वस्त हो गया था और तुम १९४७ में आज़ाद हुए थे । एक प्रकार से दोनों ने एक साथ ही शुरुआत की लेकिन अब देख कहाँ जापान और कहाँ हम?

तोताराम कहाँ हार मानने वाला था, बोला- अरे कर्ज भी तो उन्हें ही मिलता है जिनकी कोई साख होती है । बता क्या किसी बैंक ने तुझे बेटी की पढ़ाई के लिए लोन दिया? और फिर इन्हें कौन हजार बरस जीना है । अभी तो 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्'; बाद की बाद में आने वाली पीढ़ी जाने ।

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Sep 30, 2012

मनमोहन सिंह की आर्थिक नीति और देश की रामायण

आदरणीय मनमोहन जी,

आपने १९ दिसंबर २००७ को राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में अगली पंचवर्षीय योजना पर विचार-विमर्श के दौरान बताया था कि महँगाई की मार के लिए तैयार रहें । धन्यवाद । और अब आपने २७ सितम्बर २०१२ को कहा है कि सुधार एक सतत प्रक्रिया है और ये जारी रहेंगे । इसलिए आज फिर से आपको अपनी इस प्रतिबद्धता के लिए बधाई देने का मन हो रहा है । स्वीकार करें ।

इस प्रसंग में एक चुटकला सुनाएँ ? एक किरायेदार ने रात के दो बजे अपने मकान मालिक को जगा कर कहा कि मैं इस महिने का किराया नहीं दे पाऊँगा । मकान मालिक ने पूछा- यह बात तुम काल सवेरे भी कह सकते थे फिर इस समय आने की क्या जरूरत थी ? किरायेदार ने उत्तर दिया- मैं अकले ही इस चिंता में परेशान क्यों रहूँ । सो आपको बताने चला आया । 


तो उस किरायेदार की तरह से आपने भी अपनी चिंता हमारे सर डाल दी । पर याद रखिए हम परेशान होने वाले नहीं हैं । हमें तो पहले ही पता था कि इस या उस कारण से महँगाई बढ़ने वाली ही है । इसे किसी का बाप नहीं रोक सकता । बेकारी कभी कम हुई है ? हमें तो आश्चर्य इस बात का हो रहा है कि आप परेशान और चिंतित हैं । यहाँ तो एक छोटा सा एम.एल.ए. तक चिंतित नहीं है । एक बार सरपंच का चुनाव जीतने के बाद आदमी ज़िंदगी भर जीप में घूमता है । चार चमचे साथ, हाथ में मोबाइल, झकाझक कुर्ता-पायजामा, दिन भर सिगरेट और चाय फिर शाम को दारू । आप तो प्रधान मंत्री हैं । कोई बुरी आदत भी नहीं है । खाना भी कम ही खाते है और गेंहूँ तो और भी कम भी । ज्यूस, फल, मेवे ही खाते होंगे । मोरारजी की गाय तो वह गिज़ा खाती थी कि कल्पना करना तक हमारे बस का नहीं है । और फिर आपको तो अच्छी पेंशन मिलती है । यदि अगली बार प्रधानमंत्री या सांसद भी नहीं रहे तो भी भूतपूर्व की हैसियत से अच्छी-खासी पेंशन मिलेगी । एक-दो पेंशन पहले से भी मिल रही होगी । हमें तो चालीस साल की मास्टरी के बाद कुल छः हजार रुपए पेंशन मिलती है । हम तो उसी में मस्त हैं ।

वैसे महँगाई और बेकारी की चिंता आपने खामखाँ ही की । रोजगार देना न तो सरकार की जिम्मेदारी है और न ही कभी होने वाली । जिसने चोंच दी है, चुग्गा देना उसी की जिम्मदारी है । लोग अपनी फाड़े-सिएँगे । आप तो विकास में लगे रहिए । आजकल तो यहाँ के कारखानों में ही तालाबंदी कोई बड़ी बात नहीं है फिर विदेशी कंपनियों पर तो हमारे नियम लागू भी नहीं होते । इन्हें क्यों हमारा दुःख सताने लगा ? इन्हें न शर्म है, न दया, न जिम्मेदारी । और फिर यहाँ की जनता हर हाल में मस्त है । कितनी ही महँगाई बढ़े पर गुटका, शराब, बीड़ी, सिगरेट, चाय सब चलते रहेंगे । समारोह, शादी, त्योहार, पटाखे, मेले बदस्तूर जारी रहेंगे ।

वैसे यदि बेकारी और महँगाई के कारणों का विश्लेषण करना चाहें तो सुन लीजिए । आप विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं । हमने भी आज से पैंतालीस बरस पहले बी.ए. में अर्थशास्त्र पढ़ा था । उसमें माल्थस की एक थ्योरी आती है जिसमें वे कहते है कि एक आदमी अगर एक मुँह लाता है तो दो हाथ भी लाता है । बढती जनसंख्या से डरने की जरूरत नहीं है । यह बात उसने योरप के लिए कही थी जहाँ जनसँख्या वृद्धि लगभग स्थिर सी है पर हमने मूर्खों की तरह से उसे अक्षरशः मान लिया और मूर्खों की तरह से पैंतीस करोड़ से एक सौ बीस करोड़ हो गए । और सरकार है कि उसके लिए कोई कठोर कदम उठाने से घबराती है । कौन बिना बात अपनी कुर्सी खतरे में डाले ? अपनी कौनसी जिम्मेदारी है ? जो पैदा करेगा, सो भुगतेगा ।

उलटे वोट बैंक बनाने के चक्कर में सरकारें वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारी भत्ता, सस्ता अनाज, मुफ्त बिजली, धोती, टेलीविजन बाँटने जैसे हरामखोरी बढ़ाने वाले नुस्खे अपनाती हैं । कांग्रेस ने तो गुजरात में वोट के बदले तेल, दालें, अनाज और केरोसिन का वादा भी किया है । इसके स्थान पर कोई भी नेता इन लोगों को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाने की नहीं सोचता । ठीक भी है, काम की बजाय खैरात बाँटने में घपले की गुंजाइश ज्यादा निकल सकती है । आत्मनिर्भर होने पर क्या पता कोई वोट दे या न दे । दे तो सोच समझकर दे । दोनों ही स्थितियों में भ्रष्ट राजनीति को खतरा नज़र आता है ।

पहले तो मंदी का अर्थ हम यह समझते थे कि सब चीजें सस्ती हो जाएँगी पर अब पता चला कि मंदी का मतलब है- आदमी सस्ता हो जाएगा । उसे टके कोस दौड़ाया जा सकेगा । डबल मार- महँगाई और बेकारी । आपको इस स्थिति के लिए आश्चर्य हो रहा होगा पर हमें कोई शंका नहीं थी । जब यह नई आर्थिक नीति शुरु हुई थी तभी हमारा माथा ठनका था । निवेशकों को आपमें कोई खुशबू थोड़े ही आती है जो नोट लुटाएगा । उसने तो चार के चालीस बनाने के लिए धंधा किया है । अब तक तो जितना लगाया था उससे चालीस गुना कमाकर ले गए । अब तामझाम समेट भी लें तो क्या फर्क पड़ता है ? आपको इनमें कोई परोपकारी संत नज़र आया होगा । हम तो जानते हैं कि हमेशा ही उपनिवेश से पहले निवेशक आते हैं । इतिहास तो यही है । आपने, चिदंबरम जी ने, और स्वर्गीय नरसिंह राव जी ने पढ़ा या नहीं, पता नहीं ।

आप हमेशा कहते हैं कि इस मुक्त बाजार वाली आर्थिक नीति से पीछे नहीं हटा जा सकता । पता नहीं किस का क्या लेकर खा रखा है ? दृढ निश्चय हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है । क्या अंग्रेजों का जाना आसान नज़र आता था ? पर उन्हें जाना पड़ा । यह बात और है कि उनके जाने के बाद जो आए वे उनके भी बाप निकले देश को लूटने के मामले में । और अब भी नेता उन्हीं के एजेंटों के रूप में काम कर रहे हैं । कई नेता तो विदेशी कंपनियों के 'पे-रोल' पर हैं ।

कोई बात नहीं भाई साहब, आप तो रामायण-पाठ चालू रखिए । हमने तो सदा से पीठ खोल कर रखी है डंडे खाने के लिए । फिर चाहे मारने वाले आप हैं या अंग्रेज थे - क्या फर्क पड़ता है ? लोहे का स्वाद तो घोड़े को पता होता है, सवार क्या जाने ? 


खैर, 'रामायण-पाठ' वाली बात स्पष्ट करके कथा समाप्त करें । एक चरवाहा था । उसकी बकरी बीमार पड़ी । वह पंडित जी के पास गया । पंडित जी ने कहा- रामायण का पाठ किया कर । चमत्कार ! इधर रामायण शुरु और उधर एक बकरी मर गई । बेचारा चरवाहा फिर पंडित जी से पास गया । पंडित ने कहा- चिंता मत कर, भगवान पर भरोसा करके रामायण चालू रख । रामायण चलती रही और बकरियाँ मरती रहीं । अंत में सारा रेवड़ निबट गया । एक मेमना बचा । अब चरवाहे के पास कोई काम नहीं । सो घुटनों में सर दिए बैठा था कि मेमना उसके पास चला आया । मेमना तो चंचल होता ही है । लगा उसका मुँह चाटने । चरवाहे को गुस्सा आ गया । कहने लगा- साले, क्यों मरने के काम करता है ? 'रामायण' ने तो बड़े-बड़ों को निबटा दिया । तू तो एक चौपाई का भी नहीं है । 

सो आप तो आर्थिक सुधारों का 'रामायण-पाठ' चालू रखिए । रेवड़ का तो राम रखवाला है ।

२८ सितम्बर २०१२

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Sep 11, 2012

साइलेंस इज गोल्डन

मनमोहन जी,
आपके चुप रहने पर भारत के विरोधी दल विशेष रूप से भाजपा और उसके सहयोगी दल हल्ला मचा रहे हैं और अब तो आपकी अमरीकी अखबारों में होने वाली निंदा का सन्दर्भ भी देने लगे हैं । आजकल हम अमरीका में हैं लेकिन हमने तो कहीं भी आपकी कोई निंदा नहीं सुनी । अरे, यहाँ जब लोगों को अपने बीवी-बच्चों से बात करने की फुर्सत नहीं है तो किसके पास फुर्सत है किसी की निंदा करने की । जिनके पास कोई काम नहीं, वे ही समय बिताने के लिए ऐसी अन्त्याक्षरी कर रहे हैं । जब खुद सत्ता में आ जाएँगे तो अभिनन्दनों और विदेश यात्राओं से ही फुर्सत नहीं मिलेगी । 

यहाँ तो आपकी बात तो दूर, हमने सोनिया जी के आने-जाने की ही कोई खबर नहीं पढ़ी । वैसे भी आजकल यहीं क्या, भारत तक में अखबार और किताबें पढ़ना बंद हो चुका है फिर किसी एक दिन के कोई एक अखबार में कोई कुछ लिख देता है तो क्या फर्क पड़ता है । अब तक तो उस दिन का अखबार कूड़ा उठाने वाला ट्रक लेकर कहाँ लैंड फिलिंग में डाल चुका होगा । और फिर समझदार लोग जानते हैं कि अमरीका में आपकी आलोचना इसलिए हो रही कि आपने हवाई जहाजों का ठेका उसे देने की बजाय फ़्रांस को दे दिया । अब यह तो नहीं हो सकता कि आप सारे ठेके अमरीका को ही दे दो । और भी देश हैं । राजनीति में बेलेंस बनाकर रखना ही पड़ता हैं ।

आप अपनी आलोचना करने वालों को आपके बारे में बुश साहब और ओबामा जी द्वारा दिए गए वक्तव्य दिखा सकते हैं लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं क्योंकि जिसे आलोचना करनी है वह तो करेगा ही । आपने तो बाप-बेटे की वह कहानी पढ़ी ही होगी जिसमें वे अपने गधे के साथ बाजार जा रहे हैं । बेटा गधे पर बैठा था और बाप पैदल । उन्हें देखकर बुजुर्गों ने कहा कैसा ज़माना आ गया है कि बाप पैदल चल रहा है और बेटा गधे पर बैठा है । बेटे ने बाप को गधे पर बैठा दिया और खुद पैदल चलने लगा । आगे कुछ औरतें मिलीं और कहने लगीं- देखो, बुड्ढे को शर्म नहीं आती । खुद तो ठाठ से गधे पर बैठा है यह मासूम बच्चा पैदल चल रहा है । तो पिता-पुत्र दोनों गधे पर बैठ गए । तो लोगों ने कहा- अरे ठीक है, अपना जानवर है पर क्या बेचारे जानवर को मार ही देंगे, देखो दो-दो लदे हुए हैं । कुढ़कर दोनों पैदल चलने लगे तो लोगों ने कहना शुरु कर दिया- कैसे बेवकूफ हैं जो जानवर होते हुए भी पैदल चल रहे हैं । 


सो हमारे अनुसार आप उन आप्त वाक्यों की तरह ठीक कर रहे है- 'जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले' या 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना' । मीना कुमारी की भी एक बहुत हिट फिल्म है- मैं चुप रहूँगी । और फिर भारतीय कहावतों में ही नहीं, अंग्रेजी में भी कहा गया है- स्पीच इज सिल्वर, साइलेंस इज गोल्डन । सो ऐसे ही थोड़े कहा है ? दुनिया की सारी अर्थव्यवस्था ही सोने के आधार पर चलती है । और अगर सोने का दूसरा अर्थ लिया जाए तो अधिक सोने वाला दीर्घायु होता है जैसे कि अपने खोल में छुपा कछुआ । सोने से ताज़गी आती है, स्लीपिंग ब्यूटी सबसे सुन्दर मानी जाती है । जब डाक्टरों को कुछ समझ में नहीं आता तो वे मरीज को सोने की दवा दे देते हैं ।

आप तो नरसिंह राव जी की पसंद है और उन्हीं के आग्रह पर ही इस पिछड़े देश को अपने आर्थिक सुधारों द्वारा विश्व-पटल पर स्थापित करने के लिए मंत्रीमंडल में शामिल हुए । हमने 'राजनीति में आए' नहीं कहा क्योंकि राजनीति में तो आप न तब थे और न अब । हमें आपके दक्षिण दिल्ली से विजय कुमार मल्होत्रा के सामने लड़े गए आपके लोकसभा-चुनाव की याद है । जब 'नर सिंह' होकर भी राव साहब कभी नहीं दहाड़े तो आप ही को क्या पड़ी है । जैसे उन्होंने मौन के बल पर पाँच साल शांति से निकाल दिए तो आपके भी पन्द्रह बरस निकल जाएँगे । यदि आप भी इन्हीं लोगों की तरह झखते रहते तो उलझे रहते मगर यह मौन का ही प्रताप है कि लोग कोमनवेल्थ गेम्स, टू जी भूल चुके हैं सो कुछ दिन में यह 'कोयला' भी भूल जाएँगे ।

हमारे एक मित्र थे । वे मास्टरी के अलावा एक्स्ट्रा इनकम के लिए डाक्टरी में हाथ आजमा लिया करते थे । एक बार एक रोगी को बुखार था सो उन्होंने इंजेक्शन लगा दिया और दुर्भाग्य से वह इंजेक्शन पक गया । मरीज कहने लगा- मास्टर जी, बुखार की तो देखी जाएगी आप तो मेरा यह जो इंजेक्शन पक गया है इसे ठीक कर दो । सो आप निश्चिन्त रहिए । इसी सिद्धांत के आधार पर सब ठीक हो जाएगा ।

और फिर यह भी है कि अधिक बोलने वाले की कोई सुनता भी नहीं । जो कम बोलता है उसका एक-एक शब्द लोग ध्यान से सुनते है, तरसते है जैसे कि अटल जी के बोलते-बोलते बीच में आने वाले ब्रेक के दौरान लोग अगले शब्द की कितना उत्सुक होकर प्रतीक्षा करते थे ? जैसे कि 'पाकीज़ा' में 'पायल निगोड़ी' में । सुषमा स्वराज के लंबे और ओजस्वी भाषण पर कैसे आपका वह शे'र 'माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं' भारी पड़ा था । ऐसे ही जब कोई चंदा या भीख माँगने आता है तो जो लोग उसको समझाने लगते हैं वे उलझ जाते है और जो उनकी किसी बात का उत्तर नहीं देते उनका पीछा जल्दी छूट जाता है । कालीदास की विद्वान बनने से पहले की कहानी तो सब जानते ही हैं कि वे मौन रहे और विद्यावती से जलने वाले विद्वानों ने ही कालीदास के संकेतों का अर्थ लगाकर कैसे विद्यावती को हरा दिया और कालीदास को जिता दिया । सो आप भी दिग्विजय सिंह जैसे मनीषियों की व्याख्या-क्षमता पर विश्वास कीजिए और चुप रहिए । वैसे हमें विश्वास है कि आप हमारी सलाह के बिना भी इस व्रत और समाधि को भंग नहीं करते । हम तो कहते है कि आप तो गाँधी जी के तीन बंदरों की तरह बोलना ही क्या, सुनना और देखना भी बंद कर दीजिए । और हमारा तो मानना है कि व्यक्ति सच्चे मौन में तभी तक रह सकता है जब तक वह सुनना और देखना बंद रखता है ।

एक कहानी है । एक राजा के सिर में सींग थे लेकिन किसी को पता नहीं था । एक बार एक नाई ने उनकी हजामत बनाते हुए उन सींगों को देख लिया । उस गरीब का तो यह देखकर पेट ही फूल गया । किसी को बताए तो राजा का डर और न बताए तो पेट दर्द । अंत में सुनसान स्थान पर जाकर एक पेड़ से लिपटकर उसे अपनी बात कह दी । अब संयोग देखिए कि उस पेड़ की लकड़ी से एक कारीगर ने एक सारंगी बनाई । जब उसे बजाया जाता तो उसमें से आवाज़ निकलती- राजा के सिर में सींग । सो कहीं भी, कभी भी, कुछ भी बोला हुआ पता नहीं कब दुःख दे जाए इसलिए सबसे भली चुप ।

आप तो जानते हैं कि साधना और भक्ति में बाधा डालने के लिए इंद्र तरह-तरह के भूत-प्रेत, शैतान और अप्सराएँ भेजता है लेकिन सच्चे साधक निर्विकार भाव से साधना में लीन रहते हैं । वाचाल लोग मौन का महत्त्व क्या जानें ? जब बाहर के शोर से विरत होकर साधक स्वयं में स्थापित होता है तो 'अनहद' नाद सुनता है । तब सहस्रार से अमृत झरता है । जैसे योगासनों में सबसे कठिन है शवासन वैसे की सबसे बड़ी साधना है- मौन व्रत । गाँधी जी का भी अनशन के बाद दूसरा सबसे बड़ा हथियार मौन ही था ।

गाँधी को कुछ आलोचकों ने 'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी' कह-कह कर उन्हें एक 'प्रतीक' बना दिया । किसी का जीते जी प्रतीक बन जाना सबसे बड़ी उपलब्धि है । भले ही आपका पूनम पांडे के साथ कोई संबंध नहीं है लेकिन मान लीजिए कि जब कोई ‘चिकनी चमेली’ या ‘शीला की जवानी’ या ‘बीड़ी जलाइले’ जैसा महान गीतकर यह लिखे-
मैं पूनम पांडे हो गई रे
पप्पू तेरे कारण ।
तो पूनम पांडे का अर्थ बताने की जरूरत नहीं रह जाती । वह एक क्रिया का पर्याय बन गई है । यही जीते जी प्रतीक या मिथक बनना है । आप भी उस ऊँचाई तक पहुँच गए है सो हमारे हिसाब से तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जो महात्मा गाँधी के बाद केवल आपको ही हासिल हुई है ।

मुबारक हो ।

2012-09-08

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Jul 23, 2012

माँगे का कम्बल

प्राहजी मनमोहन जी,
सतश्री अकाल । यह क्या हुआ हाल ? हमारे भारत छोड़ते ही लोग खींचने लगे खाल । चलो, अपनों की तो उन्नीस-बीस बर्दाश्त भी की जा सकती है पर अब तो जिसके जो मन में आया बक रहा है ।

बाल ठाकरे जी तो अभी तक 'बाल' हैं इसलिए वे चाहे जिस को कुछ भी कहने का बचपना कर सकते हैं । जब किसी की पत्नी मैके चली जाती है तो साठ साल के बूढ़े ठूँठ में भी दो दिन बाद कल्ले फूटने लग जाते हैं । फिर वे तो विधुर हैं इसलिए पौरुष की बातें कर सकते हैं पर यह क्या कि पाँच-सात दिन पहले आपको 'राजनीतक रूप से नपुंसक' कह दिया ? अब लोग नपुंसकता के प्रकार को तो याद नहीं रखेंगे बस उन्हें तो 'नपुंसक' ही याद रहेगा । आदमी अपनी मर्ज़ी से ब्रह्मचर्य धारण कर ले तो संत या ब्रह्मचारी जी के नाम से आदरणीय हो जाता है । स्त्री अपनी मर्जी से अपने फिगर के लिए बच्चे पैदा न करे तो यह बात और है वरना पुरुष के लिए नपुंसक और स्त्री के बाँझ सबसे बड़ी गाली है ।

हमारे एक मित्र है जो कल तक चौहत्तर वर्ष की उम्र में भी जवानों जैसी डींगें मारते थे । गत वर्ष उनकी पौरुष ग्रंथि में कुछ समस्या पैदा हो गई तो डाक्टरों के उस ग्रंथि को निकाल ही दिया । हमारे मित्र कहते हैं कि इससे उनके पौरुष पर कोई असर नहीं पड़ा पर लोगों को विश्वास हो तब ना ? लोग अब उन्हें नपुंसक मानने लगे हैं । कुछ लोग किसी ग्रंथि के कारण कुंठित होते हैं और हमारे मित्र हैं कि ग्रंथि से मुक्त होकर कुंठित रहने लग गए हैं । और फिर आपकी तो इस ग्रंथि के ऑपरेशन का समाचार सारी दुनिया में फ़ैल चुका है ।

हमें आपकी सच्चरित्रता पर पूरा विश्वास है । आप हमेशा से इतने ही सज्जन हैं । एक बुजुर्ग कह रहे थे कि हम जवानी में जितने ताकतवर थे आज भी उतने ही ताकतवर हैं । हमारी जवानी पर उम्र ने कोई असर नहीं डाला । लोगों ने आश्चर्यचकित होकर पूछा तो कहने लगे- वो पत्थर देख रहे हैं ना, वह हमसे न तब उठता था और न अब उठता है ।

जब आप १९९१ में पहली बार योरप और अमरीका की पसंद के रूप में उनकी सिफारिश पर वित्त मंत्री बनाए गए थे तब आपने इस देश की गुलाम अर्थव्यवस्था को पहली बार मुक्त किया और देश की सारी श्रम-शक्ति को बँधुआ बना दिया । परिणाम यह हुआ कि मजदूर को पीलिया हो गया और और शेयर बाजार एक छिनाल औरत या बेलगाम मुँहजोर घोड़ी की तरह अनियंत्रित हो गया । लोग कहने लगे कि अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है जब कि अब पता लग रहा है कि यह विकास किसी नाजायज़ गर्भवती औरत के निखार की तरह था । इसी रास्ते पर चल कर खुद योरप और अमरीका की हालत खराब हो रही है तो आप कौनसे ऊपर से उतर कर आए हैं ?

पर हमें तो इस बात से सबसे अधिक दुःख हो रहा है कि कल तक जो योरप और अमरीका आपको अवतारी और चमत्कारी पुरुष बताया करते थे वे ही आज कल आपकी पगड़ी उछालने लगे हैं । कल तक ओबामा जी कहा करते थे कि उन्हें आपसे मिलने का इंतज़ार रहता है या जब मनमोहन जी बोलते हैं तो सारी दुनिया सुनती है । आपको उनके यहाँ की संस्थाओं ने कई अवार्ड दे दिए और अब टाइम मैगजीन वाले आपको अंडर अचीवर अर्थात् फिसड्डी बता रहे है । आप कहेंगे कि यह तो उस मैगजीन की अपनी राय है । इसमें ओबामा जी क्या कर सकते हैं ? यदि अमरीका की सरकार और वहाँ के मीडिया की राय अलग-अलग होती तो ९/११ के मामले में कोई तो अमरीका के खिलाफ बोलता लेकिन कोई नहीं बोला । इसका मतलब है कि आज जब टाइम वाला आपको फिसड्डी कह रहा है तो कहीं न कहीं ओबामा जी की भी यही राय है । वरना आपके चमत्कार का हाल तो तब भी यही था जब आपने ५०० अरब का परमाणु समझौता अमरीका से किया था । आप अब विमानों वाला ठेका फ़्रांस से लेकर अमरीका को दे दीजिए फिर देखिए कि आप किस तरह फिर अमरीका और उसके मीडिया के लिए चमत्कारी और अवतारी पुरुष बन जाते हैं ? मतलब कि जब तक आप उन्हें देश का पैसा लुटाते रहेंगे तब तक वे आपकी प्रशंसा करते रहेंगे । जब ओबामा जी दिवाली पर भारत आए थे तभी दुनिया के चार अन्य महारथी ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस, चीन के नेता भी आए थे परमाणु और हथियारों का सौदा करने । यह कोई कुंती द्वारा निकाला गया द्रौपदी की समस्या का हल तो है नहीं । इसमें तो पैसा खर्च करना पड़ता है जो कि पहले से ही अपनी औकात से बाहर है फिर पाँच-पाँच को संतुष्ट करना कैसे संभव है ? तो ठेका न मिलने वाले दो-तीन जनों को तो नाराज़ होना ही था सो ब्रिटेन ने भी ठेका न मिलने पर आपको सोनिया जी का गुड्डा कह दिया । हमारी अपनी लोकंतान्त्रिक व्यवस्था की बात और है । उसमें तो गुड्डा और फिसड्डी ही क्या, गाली-गलौच तक सब कुछ चलता है । सबको ऐसे वक्तव्यों से अपनी-अपनी राजनीतिक हँडिया के नीचे आँच देनी होती है । मगर हम तो कहते हैं कि ये अमरीका और ब्रिटेन वाले कौन होते हैं ?

वैसे हमें तो ये सब दुष्ट ही नहीं अज्ञानी भी लगते हैं । ये नहीं जानते कि हर जीव नियति के हाथ की कठपुतली या गुड्डा है । और यह नियति किसी के लिए किस रूप में आती है और किसी के लिए किस रूप में । जब सब ही किसी न किसी के गुड्डे हैं तो किसी के भी गुड्डे होने से क्या फर्क पड़ता है ? आपके नेतृत्त्व में जो अर्थव्यवस्था की गिलहरी इतना उछल रही थी, अब भारत की जनता की हालत दुनिया की निगाह में भी, धोने के बाद निचोड़ कर सुखाई गई बिल्ली की तरह से हो गई है । खैर, कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना । आप तो एक किस्सा सुनिए ।

एक ठाकुर साहब थे । जब से राज गया है हालत खस्ता है । बस नाम के ही ठाकुर रह गए हैं । अंदर से हालत यह है कि दो जून की रोटी भी भारी हो रही है । बस, मूँछों पर ताव देकर काम चला रहे हैं । सो एक बार ठाकुर साहब को एक शादी में अपनी ससुराल जाना था । सर्दी के दिन थे और ठाकुर साहब के पास एक कम्बल तक नहीं । सर्दी तो किसी तरह मुट्ठी काँख में दबाकर झेल जाएँ पर दिखाने के लिए, कैसा भी हो एक कंबल तो चाहिए ही । कम्बल उनके एक नाई मित्र के पास था जो शादी में साथ ले चलेने की शर्त पर कम्बल देने को तैयार हुआ । पुराना समय और गाँव का इलाका सो लोग आने-जाने वालों से बिना बात सी.बी.आई. की तरह पूछताछ करने लग जाते थे । सो ठाकुर साहब से भी लोग कुछ पूछते तो ज़वाब नाई देता । और ज़वाब भी क्या ? बड़े विस्तार से बताता- जी, हम फलाँ गाँव से आ रहे हैं और फलाँ गाँव, फलाँ के यहाँ बरात में जा रहे हैं । ये ठाकुर साहब फलाँ-फलाँ हैं और मैं इनका नाई फलाँ-फलाँ हूँ और इन्होंने अपने कंधे पर जो कम्बल रखा है वह मेरा है ।

जब भी जो भी पूछता, नाई यही ज़वाब देता । अब आप सोच लीजिए कि ठाकुर साहब की ठकुराई और रुतबे का क्या कचरा हुआ होगा ? सो भाई जान, माँगे के कम्बल से इज्ज़त में ऐसे ही इज़ाफा होता है ।

2012-07-17


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Feb 29, 2012

खुराफात की जड़

मनमोहन पा’ जी,
सत् श्री अकाल । मार दिया पापड़ वाले को उस्ताद । हम तो समझे थे कि आप में दम ही नहीं है । आप कुछ भी कहते हैं तो उसी एक स्वर में कहते हैं जैसे कि डिक्टेशन लिखवा रहे हों । पता नहीं यह बात जिसके लिए हम आप पर कुर्बान हुए जा रहे हैं वह आपने किस लहज़े में कही है मगर बात है दमदार । मज़ा आ गया । अब आप जड़ की तरफ जा रहे हैं तो समस्या के हल की भी उम्मीद की जानी चाहिए । अपने तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के विरोध के पीछे अमरीका स्थित तीन एन.जी.ओ. का हाथ बताया है । अच्छा हुआ जो दिग्विजय सिंह जी इस समय यू.पी. में व्यस्त हैं । यदि थोड़ा सा भी ठाले हुए होते तो वे इसमें भी आर.एस.एस. का हाथ ढूँढ़ लेते । खैर ।

वैसे यह भी बताया गया है कि ये एन.जी.ओ. भोजन का लालच देकर लोगों को आन्दोलन में लाते हैं । तो यह तो देखिए भाईजान, लोकतंत्र में यह तो स्वाभाविक है । अपन भी तो चुनाव सभा में, जुलूस में पैसे देकर ही तो तथाकथित समर्थकों को लाते हैं । हमने आपको दक्षिण दिल्ली के लोकसभा के चुनावों में एक ट्रक में दिल्ली कैंट से पालम की तरफ जाते देखा था । गिनकर पाँच आदमी थे । आपने पैसा भी तो नहीं खर्चा । आजकल फ्री में क्या मिलता है ? ये कुडनकलम वाले तो केवल खाने के लालच में ही आते हैं । कश्मीर में भी तो पत्थर फेंकने के ही दो सौ रुपए रोज के लेते हैं । इसमें वैसे अपनी भी गलती तो है ही कि हमने जनता को इतना सस्ता बना दिया कि बिना सोचे समझे, केवल खाने के लिए ही किसी के भी साथ चल पड़ती है ।

आपके बयान के एक दिन बाद ही नारायणसामी जी ने उन सेवाभावी संस्थानों के चोगे को भी फाड़ दिया और बताया कि इन तीन संस्थानों को अमरीका और स्केंडिनेवियन देशों से पैसा मिलता है । इन संस्थानों की, बाहरी रूप से दिखावे के लिए, विकलांगों की मदद करना और कोढ़ उन्मूलन जैसी गतिविधियाँ हैं मगर ये इस देश और समाज के लिए खुद ही कोढ़ बनी हुई हैं । अंदरखाने परमाणु संयंत्र विरोध ही नहीं पता नहीं जाने क्या-क्या गतिविधियाँ चलाती हैं । ध्यान रहे, यह संयंत्र अमरीका के पुराने विरोधी रूस द्वारा लगाया जा रहा है ।

आप तो अमरीका में अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भी रहे हैं तो फिर अमरीका की कौन सी ‘मुद्रा’ आपसे छिपी होगी ? आपने तो उसे हर मुद्रा में देखा होगा । हम तो जो थोड़ा बहुत जानते हैं वह बस अखबारों में पढ़े तक ही सीमित है । उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि अमरीका किसी का दोस्त नहीं है । वह अपने मतलब का यार है । संयुक्त राष्ट्र संघ के थ्रू कश्मीर पाकिस्तान को नहीं सौंपा जा सका तो यह रूस की कृपा थी वरना तो अमरीका ने कोई कसर थोड़े ही छोड़ी थी । हालाँकि हम यह नहीं कहते कि रूस कोई परमार्थ कर रहा था । फिर भी यह तो विचारणीय है कि हमें किससे क्या फायदा या नुकसान हुआ ?

जहाँ तक विकास में सहयोग देने की बात है तो याद कीजिए कि मिस्र को आस्वान बाँध बना कर देने का समझौता करके भी अमरीका उसे टरकाता रहा और अंत में रूस से उसे बनाने का समझौता हुआ तो ऐसे ही कुछ संगठनों से विरोध करवाया गया कि इस बाँध की डूब में एक पुराना धार्मिक स्थान आ रहा है इसलिए यह बाँध नहीं बनाया जाना चाहिए । तब रूस ने अपनी उन्नत तकनीक से उस ढाँचे को बड़ी सावधानी से वैसे का वैसा उठा कर अन्यत्र स्थापित किया तो बाँध बना । स्वतंत्रता-प्राप्ति के तत्काल बाद नेहरू जी ने भारत में बड़े-बड़े आधारभूत उद्योग लगवाने की योजना बनाई जिसके तहत इस्पात के कई बड़े-बड़े कारखाने जैसे भिलाई, दुर्गापुर आदि कई विकसित देशों ने बनाए । अमरीका को भी इनमें से एक कारखाना बोकारो में लगाना था मगर इसमें भी इसने वही मिस्र वाला हथकंडा अपनाया और कई वर्षों तक अटकाए रखा । अंत में इसे भी रूस की सहायता से ही बनाया गया । तो ये दो उदहारण हैं अमरीका के दूसरे देशों के विकास में रुचि लेने के ।

वैसे यदि परमाणु ऊर्जा की बात करें तो हमें परमाणु ऊर्जा बेचकर धंधा करने वाले देशों के, अपने ही देश में, नए संयंत्र लगाने की योजनाएँ निरस्त कर दी गई हैं और पुरानी योजनाओं का कार्यकाल नहीं बढ़ाया जाएगा । जापान के परमाणु संयंत्र में रिसाव की घटना पुरानी नहीं है । रूस में भी ऐसी घटना चेरनोबिल में हो चुकी है ।

जहाँ तक सुरक्षा की बात है तो जापान से ज्यादा हम क्या कर सकेंगे । और फिर इन संयंत्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी तो लगाने वाले देशों की होगी फिर चाहे वह रूस हो या अमरीका हो । अमरीका की जेम्मेदारी का उदहारण है भोपाल की गैस दुखान्तिका । अमरीका में सबसे बड़ी रासायनिक दुर्घटना जब हुई थी उसमें ३०० लोग मरे गए थे । उसके बाद वहाँ ऐसे कारखाने लगाने बंद कर दिए गए । फिर विदेशी निवेश से उपकृत करने के नाम पर ऐसे कारखाने विकासशील देशों में लगाए जाने लगे जैसे भारत में यूनियन कार्बाइड । यूनियन कार्बाइड ने अपनी सुरक्षा जिम्मेदारी कैसे निभाई और उसमें हमारे जनसेवकों ने कैसी संवेदनशीलता दिखाई यह सब जानते हैं । एक मुख्य मंत्री के एंडरसन से व्यक्तिगत संबंध थे जिसके चलते ही एक एस.पी. और जिला कलेक्टर ने विशेष कार और फिर विशेष विमान द्वारा उसे दिल्ली पहुँचाया । जहाँ वह राष्ट्रपति से मिला और विधिवत विदा हुआ ।

अमरीका और उसके अन्य मित्र देशों के सहायता प्राप्त ऐसे संस्थान ऐसे आंदोलनों को ही मदद नहीं देते बल्कि वे संतों के वेश में विदेशी सहायता से और भी खतरनाक गतिविधियों में संलग्न हैं । क्या इस दृष्टि से भी इन संस्थानों पर नज़र रखी जाएगी ? इन पश्चिमी गोरे देशों से ही नहीं बल्कि इस्लामिक देशो से भी यहाँ ऐसे ही परोपकारी कार्यों के लिए सहायता आती है । इसलिए यह आवश्यक है कि विदेशों से आने वाले एक-एक डालर का हिसाब रखा जाना चाहिए । इनका भी बकायदा ऑडिट होना चाहिए और यदि इनके कोई धार्मिक संस्थान हैं तो वहाँ भी तिरुपति और वैष्णो देवी की तरह सरकारी ट्रस्ट क्यों नहीं बना दिए जाते जिनमें दूसरे धर्मों के या नास्तिक लोग भी बोर्ड में बैठें हो ? किसी खास तरह की धार्मिक शिक्षा यदि दी जानी ज़रूरी है तो उसे केवल धर्म तक ही रखा जाना चाहिए । ऐसे धार्मिक स्कूलों को किसी भी नौकरी के लिए मान्यता नहीं दी जानी चाहिए ।

और फिर यह भी तो सोचा जाना चाहिए कि क्या इनके देशों में विकलांग या कोढ़ी या अशिक्षित नहीं है जो ये दयालु, दानवीर इस देश में आते हैं या यहाँ के संगठनों को पैसा देते हैं । विदेशी पैसा ऐसी ही खुराफातें फ़ैलाने के लिए और भी बहुत सी संस्थाओं के पास आ रहा है । ऐसे विदेशी पैसे से कोई भी देश-हित का काम नहीं हो रहा है । या तो यह पैसा धर्मान्तरण के काम आता है या फिर आतंकवादी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने में काम आता है । सेवा और धर्म के नाम पर विदेशी पैसे से चलने वाली गतिविधियों के स्टाइल में फर्क हो सकता है । कोई दादागिरी से तो चुप्पम-चुप्पा मगर देश का कोई भला इनसे नहीं हो रहा है । क्या महाशक्ति बनने के दंभ भरने वाला देश के लिए, अपने लोगों को छोटी-मोटी सुविधा देना भी विदेशी कुधन के बिना संभव नहीं है ?

तुलसीदास जी ने कहा है- तुलसी देखि सुवेष भूलहिं मूढ़, न चतुर नर ।

सो प्राजी, इन विदेशी सहायता प्राप्त लंबे चोगे वाले संतों के वेश से चक्कर में मत आइए । रावण भी सीता के हरण के लिए साधु के वेश में ही आया था ।

अपनी चिरपरिचत शांत शैली में ही सही मगर हिम्मत करो भाई जान ! जो बोले सो निहाल, सतश्री अकाल । सो सतश्री अकाल बोल कर इस खुराफात की जड़ पर चला ही दीजिए कुल्हाड़ी । फिर देखिए कैसे तस्वीर बदलती है । हम जैसे भी हैं , आपके साथ हैं । बस, एक ही लफड़ा है कि क्या वोट बैंक की राजनीति, कुर्सी को खतरे में डाल कर, राष्ट्रहित के मंगलकारी मार्ग पर चलने देगी या नहीं ?

२५-२-२०१२
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Feb 13, 2012

तोताराम के तर्क - गुनाह बेलज्ज़त

तोताराम के आते ही हमने उसके सामने चाय के साथ लड्डू का एक टुकड़ा रखते हुए कहा- ले, सेलिब्रेट कर ।

खुश होने की बजाय तोताराम उफन पड़ा- क्या सेलिब्रेट करूँ? क्रिकेट में भारत का इंग्लैण्ड के बाद अब आस्ट्रेलिया में सूपड़ा साफ़ या भारत का फ़्रांस के साथ ५०४ अरब रुपए का विमान समझौता?

हमने कहा- ये सब अपने मतलब की बातें नहीं हैं । तू तो डी.ए. की सात परसेंट की एक नई किस्त सेलिब्रेट कर । रात को ही न्यूज थी । अभी अखबार आया जाता है, विश्वास नहीं हो तो पढ़कर कन्फर्म कर लेना ।

'अच्छा'- कहते हुए तोताराम झूमने सा लगा और फिर एक तरफ झुकता हुआ गिरने को हुआ । हमने उसे थामकर वहीं चबूतरे पर लिटाया और पोती को जल्दी से ब्लड प्रेशर नापने वाला यंत्र लाने को कहा तो तोताराम ने इशारे से मनाकर दिया । हमें लगा कोई बड़े खतरे की बात नहीं है । फिर भी कहा- कुछ बोल भी तो सही जिससे कुछ तसल्ली हो ।


तो बोला- एम.एम. का पाठ.... एम.एम.
हमनें सोचा- यह महामृत्युंजय का शोर्ट फॉर्म होगा, सो कहा-ठीक है, अभी शुरु करते हैं महामृत्युंजय का पाठ । 



तोताराम ने गर्दन हिला दी और चुप हो गया । तब तक पत्नी चाय ले आई । तोताराम ने चाय पी और खखार कर उठ बैठा ।

हमने सहानुभूति दिखाते हुए कहा- क्या पहले भी कभी ऐसा हुआ है? आज ही किसी अच्छे से डाक्टर के पास चलते हैं और पूरा चेकप कराते हैं । लापरवाही ठीक नहीं ।

तोताराम ने धीरे-धीरे बोलते हुए कहा- वैसे तो सब कुछ ठीक है । पर अचानक डी.ए. की किस्त की सुनकर आँखों के आगे अँधेरा छा गया और चक्कर आ गया ।
हमने कहा- खुश होने की बात पर चक्कर? तू भी अजीब है ।

बोला- अजीब का पता तो जब थोड़ी देर में लाला की दुकान पर जाएगा तब पता चलेगा । उसने पहले से ही पन्द्रह प्रतिशत भाव बढ़ाकर तैयार कर लिए होंगे । मीडिया को देने से पहले सरकार लाला को खबर देती है । सात प्रतिशत महँगाई बढ़ने का मतलब है हमारी ताकत पन्द्रह प्रतिशत कम होना । अब सोच ऐसे ही बैठे बिठाए साल में दो बार महँगाई भत्ता बढ़ता है और अपनी रिटायरमेंट की पोस्ट ऑफिस में जमा राशि की ताकत तीस प्रतिशत कम हो जाती है ।

हमने कहा- लेकिन महँगाई बढ़ने पर भत्ता भी तो बढ़ता है । क्या फर्क पड़ता है?
तोताराम ने ऐतराज़ किया- पड़ता है, बहुत फर्क पड़ता है । यह ठीक है कि कुछ नेताओं के चहेते, कुछ दादा टाइप, कुछ वोट बैंक के अम्मर बकरे सरकारी नौकरी में मौज कर रहे हैं, कुछ साहसी और नेताओं और अफसरों के चमचे घूस भी खाते हैं मगर अधिकतर ईमानदार कर्मचारी काम भी करते हैं, घर से दूर कठिन स्थानों में रहकर सेवा अंजाम दे रहे हैं । उनके लिए तो यह महँगाई भत्ते और वेतन आयोग का चक्कर ऐसी हड्डी है जिसे चबाते रहो और अपना ही खून चाटते रहो । यह बड़ा दुष्चक्र है । इसका कहीं अंत नहीं है । बस, समझो कि न तो मरीज़ ठीक होता है और न मरता है । डाक्टर और दवा वालों का धंधा चलता रहता है । जब नौकरी शुरु की थी तब जितना दूध लाते थे आज भी उतना ही दूध आता है । बस, फर्क इतना है कि अब पानी अधिक होता है । पानी तक भी ठीक है मगर अब तो उसके सिंथेटिक होने का भी खतरा रहता है यह एक प्रकार से नशीली चाय पिलाकर माल उड़ा ले जाने वाली हरकत है ।

और फिर तुमने कभी यह भी सोचा है कि जिन को इस वैश्वीकरण के समय में नौकरी या मज़दूरी नहीं मिलती, वे कहाँ जाएँ? । कौन सी सरकारी नौकरी है जो भत्ता बढ़ जाएगा । ऐसे लोगों के नाम पर जो अरबों-खरबों का दान-पुण्य करने वाली योजनाएँ बनती हैं उनका पैसा भी अधिकतर नेता लोग ही खा जाते हैं । ऐसे गरीब लोग कहाँ जाएँ? जब यह देश आज की तरह तथाकथित रूप से विकसित नहीं था तब कोई गरीब को दो मुट्ठी आटे से या और भी इसी तरह से कुछ मदद कर दिया करता था मगर अब तो हाल यह है कि बीस-तीस हज़ार रुपए महिने के कमाने वाले भी गिनकर रोटियाँ बनाते हैं । किसी की क्या मदद करेंगे । मेरे ख्याल से अपनी वह एक सौ रुपए महिने की नौकरी वाला समय ही अच्छा था । आज जब सरकार के आँकडे बताते हैं कि भारत में प्रतिव्यक्ति आय पचास हजार सालाना हो गई तो उसके साथ-साथ किसानों की आत्महत्या और भूख और कुपोषण से मरने के भी समाचार कम नहीं होते ।

यदि यह मुक्त अर्थव्यवस्था इसी गति से बढती चली गई तो वह दिन दूर नहीं जब हम बाज़ार से पाँच किलो आटा और पाँव भर सब्जी लेकर आएँगे और कोई उसे रस्ते में ही लूट लेगा । जहाँ तक कानून व्यवस्था की बात है तो वह हमेशा एक जैसी ही रहती है जैसी आज वैसी ही कल । बड़े लोगों को तो खैर, तब भी सुरक्षा मिल जाएगी पर अपना क्या होगा? हम तो कहते हैं भैय्या, छोड़ो यह महँगाई भत्ता और पे-कमीशन, क्रिकेट, कोकाकोला, मोबाइल, ट्विटर और छम्मक-छल्लो । बस, आप तो यह कर दो कि हर पेट को रोटी, पढ़ने वाले को स्कूल और मरीज को इलाज मिल जाए ।

हमारे पास तोताराम के प्रश्नों और शिकायतों का तो कोई हल नहीं था मगर फिर भी बात बदलकर माहौल ठीक करने के लिए कहा- तू वह महामृत्युंजय के जाप वाली क्या बात कर रहा था?

बोला- एम.एम. से मेरा मतलब मनमोहन का जाप करने से था क्योंकि देश में इस संवेदनहीन मुक्त बाजार की गंगा को लाने वाले भागीरथ वे ही हैं । क्या पता, जाप से प्रसन्न होकर केवल 'मन-मोहन' ही नहीं, कुछ 'तन-मोहन' का भी इंतज़ाम कर दें । वैसे पता तो जब कुछ होगा तभी चलेगा क्योंकि शक्ल और शब्दों से तो पता चलता नहीं कि रो रहे हैं या हँस रहे हैं? कृपा करेंगे या क़त्ल?

खैर, एक छोटी सी क्षणिका सुन ।
हमने पूछा- किसकी है?
बोला- खाकसार की है ।


हमने तोताराम को बहुत सी कविताएँ सुनाई हैं तो फिर उसे मना कैसे कर सकते थे और फिर कुछ उत्सुकता भी थी । क्षणिका इस प्रकार है-

मनमोहन जी,
आप सात प्रतिशत महँगाई भत्ते की खबर उड़ा देते हैं
और परचून वाले लालजी पन्द्रह प्रतिशत महँगाई बढ़ा देते हैं ।
आप देने वाले और वे लेने वाले,
हमें इस लेन-देन के बीच फँसाना छोड़ दीजिए
हो सके तो
हमारे इस महँगाई भत्ते को लालाजी की दुकान से जोड़ दीजिए ।


२-२-२०१२
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Nov 11, 2011

शांति-पुरुष और विकास-पुरुष



(मनमोहन ने मालदीव सार्क सम्मेलन में पाकिस्तानी प्रधान मंत्री युसूफ राजा गिलानी को 'शांति-पुरुष' कहा- १० नवंबर २०११)


(1)
शांति-पुरुष यूसुफ रज़ा, औ' विकास के आप ।
इससे बढ़कर और क्या, हो सकता अभिशाप ।
हो सकता अभिशाप, भेजते वे आतंकी ।
बात-बात में देते रहते हमको धमकी ।
जोशी, और आपकी छाया में महँगाई ।
बढ़ती है दिन रात, देश की शामत आई ।





(2)
दो महान आत्मा मिलें, तो हो शांति-विकास ।
लेकिन दोनों के यहाँ, केवल भ्रान्ति-विनाश ।
केवल भ्रान्ति-विनाश, वहाँ भी हालत खस्ता ।
और यहाँ भी जीना महँगा, मरना सस्ता ।
कह जोशी कविराय, आप यदि पीछा छोड़ें ।
तो दोनों की जनता, शायद बेहतर सोचे ।

११ नवंबर २०११

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Dec 26, 2010

२-जी घोटाला या सब्सिडी?


 हम तो जब २००० में पहली बार अमरीका गए थे तो रास्ते में खीरे छीलने के लिए एक छोटा सा चाकू ले गए थे तो चेकिंग वालों ने उसे खतरनाक मान कर रखवा लिया था । अब तो ९/११ के बाद हो सकता है सेफ्टी पिन भी नहीं ले जाने देते होंगे । आज के अखबार में भ्रष्टाचार पर महासंग्राम पर एन.डी.ए. की रैली में कई छोटे-बड़े नेताओं को मंच पर तलवारें लहराते हुए देखा तो अजीब नहीं लगा क्योंकि यह हमारे लोकतंत्र की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है । जब-तब कार्यकर्ता नेताओं को तलवारें देकर अभिनन्दन करते हैं तो क्या वह ऐसे ही है ? कभी न कभी तो उन तलवारों का प्रयोग होना ही चाहिए ।

जब यह समाचार पढ़ रहे थे तो तोताराम आ गया । हमने कहा- तोताराम, अब भ्रष्टाचार को कोई नहीं बचा सकता । देख, जन-सेवक तलवारें लहराते हुए निकल पड़े हैं ।

तोताराम ने कहा- मास्टर, यह विरोध बिना बात किया जा रहा है । राजा, जिनके नाम से सरकार पर निशाना साधा जा रहा है, वे बेचारे कह रहे हैं कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया । वे तो 'पहले आओ : पहले पाओ' की परम्परा का निर्वाह कर रहे थे । यह परंपरा हमारे देश में वैसे भी बहुत पुरानी है । जब किसी राज्य में राजा के बारे में फैसला नहीं हो पाता था यही तरीका अपनाया जाता था । जो भी अगले दिन नगर के मुख्यद्वार पर मिलता था उसी को राजा बना दिया जाता था । उस समय का किसी के भी विरोध करने का प्रमाण नहीं मिलता । फिर आज ही विरोध क्यों ?

हमने कहा- विरोध क्यों नहीं । इससे सरकार को एक लाख छियत्तर हज़ार करोड़ का नुकसान हुआ है ।


बोला- कोई नुकसान नहीं हुआ है । जिसे तुम नुकसान कह रहे हो उसे सब्सिडी क्यों नहीं मान लेते । इस सब्सिडी के कारण ही तो फोन काल इतने सस्ते हुए हैं । यदि फोन कंपनियों को यह स्पेकट्रम सस्ता नहीं मिलता तो फोन काल इतने सस्ते कैसे होते ? इन्हें राजा ने दिया और इन कंपनियों ने प्रजा को दे दिया । ये तो बिजली के तार हैं । उत्पादक और उपभोक्ता तो कोई और हैं । यह एक प्रकार की अप्रत्यक्ष सब्सिडी है । किसानों को सब्सिडी दी जाती है, हज के लिए सब्सिडी दी जाती है तो यह भी देश में फोन सेवा के विस्तार के लिए दी गई सब्सिडी ही है । इसके लिए बेचारे राजा और प्रधान मंत्री को इतना हड़काने की क्या ज़रूरत है ? पहले भी तो, पहले आने वालों को स्पेक्ट्रम पहले दिया गया था । अब इस बात का कोई क्या करे कि इस घोषणा के समय कुछ लोग पहले से ही टेबल के नीचे घुसे बैठे थे । तुझे चाहिए तो चल तुझे भी दिला देते हैं कोई न कोई स्पेक्ट्रम । मगर लेना-देना तो कुछ है नहीं और बिना बात टाँग अड़ाता है ।

तुझे पता है अमरीका में मक्के पर किसानों को सब्सिडी दी जाती है । किसान गायों को मक्का खिलाते हैं तो उनका मांस सस्ता पड़ता है । उस सस्ते मांस से मेकडोनाल्ड सस्ते मीट-बर्गर जनता को बेचता है । अंततः तो यह सब्सिडी जनता को ही मिली ना ? अब बेचारे मोबाइल का धंधा करने वालों को बिना बात लतियाने से क्या फायदा ? वे तो सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं को जनता तक पहुँचा रहे थे । दूत, कुटनी और दलाल अवध्य होते हैं । सरकार और भी तो पैसा जनता में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बाँट ही रही है । और यह बता, क्या इस तथाकथित घोटाले से क्या सरकार का बजट घाटा बढ़ा ? यदि नहीं, तो फिर कैसा और किसका नुकसान ?

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई । एक युवक अंदर आया और बोला- तोताराम जी कौनसे हैं ? तोताराम ने उत्तर दिया- कहिए, हमीं है ।

युवक ने कहा- टाटा, अम्बानी, राजा और राडिया ने अपना केस लड़ने के लिए आपको याद किया है ।


२३-१२-२०१०


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Dec 8, 2010

तोताराम और मनमोहन जी का एहसान


इस साल बरसात ज्यादा ही हुई और दिवाली तक भी पीछा नहीं छूटा । अब जाकर बरसात बंद हुई तो सर्दी भी जल्दी ही आ गई । अभी तो दिसंबर शुरु ही हुआ है कि पारा पाँच डिग्री पर चला गया और ऊपर से कोहरा । वैसे हमारी कौन सी फ्लाईट लेट हो रही है मगर दिन में कोहरा पड़ने से फिर रात और दिन बराबर हो जाते हैं । दिन में धूप निकलने से कुछ राहत मिल जाया करती थी मगर अब वह भी नहीं । दिन में भी रात जैसी ठिठुरन । सुबह होते ही लाइट चली गई थी । बाहर बैठने से कोई फायदा नहीं, हवा है । अंदर बैठ कर अखबार पढ़ सकने जैसी रोशनी नहीं सो रजाई में बैठे-बैठे ही समाचार सुन रहे थे कि बाहर से तोताराम की आवाज़ आई- अरे मक्खीचूस, इतनी बचत करके क्या करेगा ? लाइट तो जला ले । हम ज़वाब देते उससे पहले तो तोताराम हमारी रजाई के अंदर ।

कहने लगा- लाइट बंद क्यों कर रखी है ? हमने कहा- तुमने सुना नहीं कि ‘लाइट सेव्ड इज लाइट जेनरेटेड’ मतलब कि ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा का उत्पादन है । सो ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं ।

तोताराम कहने लगा- अरे, अब तो बिजली-बिजली रोना छोड़ । अब तो तेरे लिए मनमोहन सिंह जी, जो भी आता है उसी से, दो-चार परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए करार कर तो रहे हैं । अभी फ़्रांस के राष्ट्रपति आए तो साढ़े छः अरब डालर की दर से छः संयंत्रों का समझौता किया कि नहीं । इससे पहले ओबामा जी आए तो भी दस हजार करोड़ का एक समझौता किया ही था । और अब रूस के राष्ट्रपति आ रहे हैं तो उनसे भी कुछ इंतज़ाम करवाएँगे । अब और क्या चाहता है तू मनमोहन सिंह जी से ? क्या नरेगा वाला पैसा भी लगा दें, तेरे लिए बिजली बनवाने के लिए ?

हमने कहा- भैया, यह खर्चा हमारे लिए नहीं, भारत की सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए कर रहे हैं जिससे अगले चुनाव में कोई तो उपलब्धि बताई जा सके । अब २-जी स्पेक्ट्रम तो कोई उपलब्धि रही नहीं ।

तोताराम बोला- विकास के लिए इतनी सिद्दत से किए गए प्रयत्नों को जान बूझ कर छोटा करने की कोशिश मत कर । अरे, जब बिजली बनेगी तो सारे राष्ट्र के ही काम आएगी । राज चाहे किसी भी पार्टी का हो । यह तो अगली पीढ़ियों के लिए पेड़ लगाने जैसा पवित्र काम है ।

हमने फिर अपनी बात रखी- यदि यह वास्तव में केवल विकास के लिए बिजली की ही बात है तो भी हमें क्या फायदा ? हमें तो दो सौ रुपए महिने से ज्यादा की बिजली जलानी नहीं । यदि सारे महिने भी बिजली न आए तो भी मिनिमम चार्जेज तो देना ही पड़ेगा जैसे कि एक भी काल न करो तो भी लेंडलाइन का दो सौ रुपया महीना तो देना ही पड़ेगा । वैसे यह देश जब बिजली का आविष्कार भी नहीं हुआ था तब मशालों और दिए की रोशनी में ही सोने की चिड़िया बन गया था । ये परमाणु बिजली घर हमारे लिए नहीं, अम्बानियों के लिए लगाए जा रहे हैं । पता है, मुकेश अम्बानी के घर का बिजली का एक महिने का बिल कितना है ? सत्तर लाख रुपए । हमारी-तुम्हारी सारी ज़िंदगी की नौकरी की तनख्वाह और पेंशन भी सत्तर लाख नहीं बनेगी ।

तोताराम अम्बानी का भक्त है क्योंकि आज तक जो दुनिया किसी की मुट्ठी में नहीं हुई उसे मुकेश ने अपनी मुट्ठी में जो कर लिया । बोला- तेरा घर है एक लाख रुपए का और बिजली का बिल आता है दो सौ रुपए महीने । मुकेश का घर है चार हजार पाँच सौ करोड़ का और उसका महीने का बिजली का बिल केवल सत्तर लाख । घर की कीमत के हिसाब से उसका बिजली का बिल आना चाहिए नब्बे लाख रुपए महिना । हर महिने वह बिजली पर बीस लाख रुपए कम खर्च कर रहा है । और क्या चाहता है ? क्या इतना बड़ा आदमी लालटेन जलाकर रहे ? कुछ तो देश की इमेज का ख्याल कर ।

हम ऐसे सकारात्मक चिंतन वाले को और क्या कह सकते थे, कहा- तो ठीक है तोताराम, कल कहीं से एक सोलर लालटेन का इंतज़ाम कर फिर यह बिजली का कनेक्शन ही कटवा देते हैं । वैसे कटवा तो आज ही देते और अपने वाली लालटेन जलाना शुरु कर देते मगर सरकार हमें केरोसिन जलाने जितना गरीब नहीं मानती । उसके हिसाब से हम सवर्ण हैं और हर सवर्ण सेठ होता है । गरीब तो रामविलास पासवान और मायावती जैसे दलित हैं । फिर तेरे मनमोहन जी को लिख देते हैं कि साहब, हमारी तरफ से चाहे जितने अरब-खरब डालर के समझौते करें पर हम पर कोई एहसान लादने की ज़रूरत नहीं है ।

८-१२-२०१०

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Nov 25, 2010

बुढ़ापे में परीक्षा

मनमोहन जी भाई साहब,
सत् श्री अकाल । यह ‘भाई साहब’ संबोधन आर.एस.एस. वाला नहीं है यह तो अपने डिपार्टमेंट वाला है क्योंकि आप भी मास्टर रहे और हमने भी जीवन भर राष्ट्र निर्माण ही किया । हुआ या नहीं या कितना हुआ यह तो भगवान जाने पर हमने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी । साठ के होते ही छुट्टी हो गई मगर तभी ऊपर स्वर्ग में सीट का निर्माण करने में जुट गए । कितना क्या हो पाएगा यह तो वहाँ जाकर पता चलेगा । आपको तो नौकरी से छुट्टी मिलते ही नरसिंह राव साहब ने पकड़ लिया और जोत दिया राष्ट्र निर्माण में । अच्छा भला अमरीका की तरह भारत का निर्माण करने में लगे हुए थे कि अब ये बी.जे.पी. वाले आपकी परीक्षा लेने पर उतर आए लेकिन अपने वाले बच्चे को नहीं देखते जो नक़ल करते पकड़ा गया । और परीक्षा भी ऐसी वैसी नहीं, हाईस्कूल वाली । आजकल इसे सेकेंडरी स्कूल परीक्षा कहते हैं । अपने जमाने में इसी को मेट्रिक भी कहा जाता था । तब यह बहुत बड़ी चीज हुआ करती थी । उस ज़माने में कहते हैं कि आठवीं पास भी मास्टर और यहाँ तक कि तहसीलदार बन जाया करता था । आजकल तो चपरासी बनने के लिए भी कम से कम दसवीं पास चाहिए । तभी दसवीं पास की कद्र भी चपरासी जितनी ही रह गई है ।

वैसे तो अध्यापन आपने भी किया है इसलिए परीक्षा पास करने के गुर जानते ही होंगे । पर बात यह है कि आपने कालेजों में पढ़ाया है और हमने स्कूल मास्टरी में ही जिंदगी गुजारी है सो जब २१ नवंबर के अखबार में पढ़ा कि आपको लग रहा है कि आप दसवीं की तरह एक के बाद एक टेस्ट दे रहे हैं तो सोचा कि क्यों न आपकी कुछ मदद की जाए । लोग तो तमाशा देख रहे हैं पर जो संकट के समय मदद करे वही सच्चा मित्र होता है-
धीरज, धरम, मित्र अरु नारी । आपत काल परखिए चारी । ।

तो एक सच्चे मित्र और शुभचिंतक की तरह से आपको सलाह दे रहे हैं । आशा है कुछ काम आएँगी ।

वैसे कई चीजें जो जवानी में इतना तकलीफ नहीं देतीं जितनी बुढ़ापे में, जैसे कि शादी, संतान, इश्क, परीक्षा आदि । अब सलमान रुश्दी को ही देख लीजिए, उमर साठ से ऊपर है मगर इश्क फरमाने से बाज़ नहीं आते । जवान और चालू औरतें आती हैं और उल्लू बनाकर खिसक लेती हैं । बुढ़ापे की औलाद ज्यादा लाड़-प्यार के कारण बिगड़ जाती है और बड़ी होकर बहुत दुःख देती है । वैसे आजकल तो छोटे बच्चों को भी कूट-पीट कर सुधारने का अधिकार नहीं रहा फिर जवान बेटा आप पर ही हाथ छोड़ दे तो क्या कर लेंगे । बुढ़ापे में शादी करने पर जवान पड़ोसियों का आना-जाना बढ़ जाता है और कहीं जाओ तो पीछे से चिंता लगी रहती है कि पता नहीं नई बीवी क्या गुल खिला रही होगी । बुढ़ापे की बीवी की फरमाइशें भी ज्यादा होती हैं । खुद को जवान दिखाने के लिए रोज़ बाल रँगने पड़ते हैं और अकड़ कर भी चलना पड़ता है जिससे कमर में दर्द होने लग जाता है । और बुढ़ापे में परीक्षा देना भी कम कष्ट का काम नहीं है ।

आपने तो लगातार ही सारी पढ़ाई और परीक्षाएँ निबटा दीं । हम तो बारहवीं पास करते ही मास्टर बन गए थे और फिर बी.ए., एम.ए. और बी.एड. सभी नौकरी करते हुए पास कीं । बी.ए. और एम.ए. तो खैर सत्ताईस बरस की उम्र तक निबटा दीं मगर बी.एड. काफी देर से की । हम जानते हैं कि कैसे, क्या नैया पार लगी । वैसे याद तो सब कर लेते थे मगर चूँकि लिखने का अभ्यास छूट गया था सो लगता था कि पेपर पूरा ही नहीं कर पाएँगे तीन घंटे में । अब आपको सतत्तर साल की उम्र में हाई स्कूल की परीक्षा देनी पड़ रही है । बात तो चिंता की है । एम.ए. में तो एक ही सब्जेक्ट होता है पर हाई स्कूल अर्थात मेट्रिक में तो पाँच-सात सब्जेक्ट होते हैं । इसीलिए पुराने लोग मेट्रिक को बहुत बड़ी चीज मानते थे । हमसे मास्टर बनने के बाद एक बार एक बुजुर्ग ने पूछा- कहाँ तक पढाई की रे छोरे ? हमने कहा- ताऊ. एम.ए. कर ली है । तो कहने लगे- ठीक है बेटा, अब हिम्मत करके मेट्रिक भी कर ले तो और भी अच्छी नौकरी मिल जाएगी । एक ही वाक्य में उन्होंने हमारी मेरिट से पास की एम.ए. की ऐसी-तैसी कर दी । अब कहाँ तो आपकी हार्वड या ओक्सफोर्ड की एम.ए. और डी.लिट. और कहाँ अब विपक्ष के चक्कर में मेट्रिक की परीक्षा ।

वैसे अब भी आपको कोई न कोई यूनिवर्सिटी पी.एच.डी. दे सकती है मगर ये उससे संतुष्ट होने वाले नहीं हैं । लाने को तो नकली सर्टिफिकेट भी लाया जा सकता है मगर ये स्विस बैंक की सूचना कबाड़ने वाले 'स्वामी' उस नकली सर्टिफिकेट का भी भंडा-फोड़ कर सकते हैं । एक ओपन स्कूल जैसी भी चीज आजकल चल निकली है जिसमें सुनते हैं बहुत नक़ल चलती है और परीक्षा में सारे सब्जेक्ट एक साथ पास होने का झंझट भी नहीं है । एक साल में एक सब्जेक्ट पास कर लो, वह आपका जमा हो जाएगा । इस तरह आप पाँच साल में भी मेट्रिक कर सकते हैं मगर विपक्ष वालों को तो इतना धैर्य नहीं है । वे तो अभी सर्टिफिकेट देखना चाहते हैं । इससे पहले भी हर साल रिपोर्ट कार्ड देखा करते थे ।

अपने जमाने में तो मास्टर लोग कुंजी लाने से मना करते थे मगर आजकल कई तरह की कुंजियाँ बाज़ार में आ गई हैं । मास्टर लोग खुद ही कुंजी से पढ़ाते हैं और कमीशन देने वाले प्रकाशक की कुंजी खुद बच्चों को रेफर करते हैं । कई तरह की पास बुक्स भी आजकल बाजार में आती हैं- ट्वंटी फोर आवर सीरीज, वन वीक सीरीज, स्योर शोट आदि । कई तरह के गेस पेपर भी आते हैं जिन्हें पेपर सेट करने वालों द्वारा छद्म नामों से छापा जाता है । कई स्कूल तो पास करवाने की गारंटी भी देते हैं । हम यह सब आप की काबिलियत पर शंका के कारण नहीं बल्कि शक्ति और समय बचाने की दृष्टि से कह रहे हैं । अब आपके पास इतना समय कहाँ ? देश का विकास करें कि पढाई करें या बुढ़ापे में इन बदमाश बच्चों को सँभालें । अब बच्चे तो बच्चे ही हैं ना ? सब्जी लाने के लिए पैसे दो और ये उसी पैसे में से चाकलेट खा जाएँ । ज्यादा बड़े हों तो सिनेमा देखने चले जाएँ या बीयर में ही सब्जी के पैसे लुटा आएँ । अब बाप घर सँभाले या बच्चों के पीछे घूमता रहे । एक बार जब हम बच्चे थे तो एक खेत में घुस कर चार काचर (ककड़ी) तोड़ लिए । चार थे हम लोग सो हमें तो उन चार काचरों में से एक ही हाथ लगा पर जब शिकायत पिताजी के पास पहुँची तो हमारी पिटाई पूरे चार काचरों जितनी हुई । अब एक नादान बच्चे ने १ लाख ७६ हजार करोड़ के दस काचर तोड़ लिए । शिकायत आपके पास है । अब आप भी क्या करें ? बच्चे ने दस काचर तोड़े मगर उसके हाथ तो केवल दस परसेंट ही लगे बाकी नब्बे परसेंट तो औरों ने ही खा लिए । अब आप बच्चे को उलटा भी लटका दें तो एक काचर से ज्यादा निकलने वाला नहीं । और वह भी पेट में से निकला काचर किस काम का बचा होगा ?


वैसे जहाँ तक परीक्षा की बात है तो उसमें अध्यापकों की कृपा भी बहुत काम आती है । विद्यार्थी को, कुछ भी न जानते हुए भी वे प्रेक्टिकल में पूरे नंबर दिलवा सकते हैं । और परीक्षा में भी नक़ल में मदद कर सकते हैं । आजकल मास्टर इस कृपा के बदले में ट्यूशन पढ़ने वालों को विशेष महत्व देते हैं । यदि सारे साल ट्यूशन न पढ़ सको तो मय ब्याज के पूरे साल की ट्यूशन फीस एक साथ दे दो तो भी मान जाते हैं । गुरु जी फीस न दे सकने वाले कुछ गरीब किन्तु घनघोर सेवाभावी शिष्यों पर भी अपनी कृपा दृष्टि रखते हैं ।

कुछ भी हो, आप पर तो टीचर मेडम की कृपा दृष्टि है ही सो नैया पार लग ही जाएगी । जल्दी से मेट्रिक पास करके इन विपक्षियों का मुँह बंद कर ही दीजिए ।

२३-११-२०१०

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Nov 13, 2010

तोताराम की आवाज़ का पेटेंट


आज तोताराम नहीं आया । नौ बज गए । अब उसके आने की कोई उम्मीद लगती । जैसे ही हम अंदर जाने लगे तो एक उजबंग से सज्जन के साथ तोताराम आता दिखाई दिया । हमने रोकना चाहा, तो बोला- अभी जल्दी में हूँ, वकील से मिलना है ।

हमने पूछा- तेरा वकील से क्या काम आ पड़ा ? क्या कहीं तूने भी आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में फ्लेट तो नहीं कबाड़ा था ?

कहने लगा- मौका मिलने पर कौन चूकता है, पर मैं अभी इतना बड़ा आदमी नहीं बना कि उस सोसाइटी में फ्लेट कबाड़ सकूँ । मुख्यमंत्रियों, सेनाध्यक्षों का पेट भरे तो किसी और का नंबर आए ना । मैं तो अपने इस ब्रदर-इन-ला के काम से जा रहा हूँ ।

हमने कहा- तेरे सभी सालों को हम जानते हैं । ये सज्जन उन में से तो कोई भी नहीं हैं ।

कहने लगा- इनकी और मेरी एक ही समस्या है और उसी के कानूनी हल के लिए हम वकील की सलाह लेने जा रहे हैं इसलिए हम दोनों ब्रदर-इन-ला हुए कि नहीं ?

ब्रदर-इन-ला की इस नई व्युत्पत्ति ने हमें आश्चर्यचकित कर दिया ।

हमने कहा- अच्छी बात है । चले जाना, एक-एक चाय तो हो जाए ।

दरअसल हमारी रुचि चाय पिलाने में इतनी नहीं थी जितनी कि कानूनी मामले को जानने में थी ।

हमने पूछा- तुम्हारे साले साहब, सॉरी, ब्रदर-इन-ला की क्या समस्या है ?

तोताराम ने बताया कि इन सज्जन का नाम है 'नवारी लाल' । हमें नाम बड़ा अजीब लगा । पूछने पर तोताराम की जगह वे सज्जन खुद ही बताने लगे- जैसे आप तोताराम जी के भाई साहब हैं वैसे ही हमारे भी । सो भाई साहब, बात यह है कि नाम तो हमारा बनवारी लाल है और हम टीचर के बताए अनुसार बड़े 'बी' से अपना नाम शुरु करते थे मगर जब से एक महानायक 'बिग बी' बन गए तो हमने सोचा- 'राड़ से बाड़ भली' । अपना क्या है, छोटे बी से अपना नाम लिखना शुरु कर लिया करेंगे । फिर पता चला कि उनके साहबजादे भी फिल्मों में चल निकले हैं तो स्माल बी उनके लिए रिज़र्व हो जाएगा । सो कोई टोके उससे पहले ही मैंने अपना स्माल बी भी हटा दिया और अब मात्र 'नवारी लाल' रह गया हूँ । सोचता हूँ, कोई इन बचे हुए तीन अक्षरों को भी कब्ज़ा ले उससे पहले ही इनका तो पेटेंट करवा लूँ ।

अब हम तोताराम की तरफ मुखातिब हुए- तो महाशय तोताराम जी बताइए, आप किस चीज का पेटेंट करवाने जा रहे हैं ? कहीं अपनी आवाज़ का पेटेंट तो नहीं करवाने जा रहे, अमिताभ बच्चन की तरह ? ठीक भी है, इस गुरु गंभीर आवाज़ का पेटेंट करवा ही लेना चाहिए । ऐसी आवाज़ सदियों में ही किसी एक को भगवान अता फरमाता है ।

 तोताराम कहने लगा- मैं सब समझता हूँ तुम्हारा इशारा । ठीक है, मेरी आवाज़ मनमोहन सिंह जी की तरह शालीन है पर है तो विशिष्ट ना । और मुझे मालूम है कि तू इसे अपनी भाषा में 'मिमियाती' हुई आवाज़ कहेगा । मगर याद रख मिमियाती आवाज़ का भी महत्व होता है । क्या दहाड़ती आवाज़ के बल पर अडवानी जी प्रधान मंत्री बन सके ? और मान लो बन भी जाते तो कितना टिक पाते ? और मान लो अटल जी की तरह किसी तरह टिक भी जाते तो क्या दूसरी टर्म के लिए चुने जाते ? और मान लो चुने भी जाते तो क्या ओबामा और मिशेल को इस तरह नचा पाते जैसे कि मनमोहन जी ने दिल्ली और मुम्बई में नचा दिया ? यह इस मिमियाती आवाज़ का ही कमाल है । सो जब तक कोई और दूसरा कूद नहीं पड़े उससे पहले मैं भी अपनी इस मिमियाती आवाज़ का पेटेंट करने जा रहा हूँ । 

हम सोच रहे थे कि ज़माना कितना बदल गया है । राम ने धनुष-बाण का, कृष्ण ने बाँसुरी का, शिव ने त्रिशूल का, विष्णु ने सुदर्शन चक्र का, सरस्वती ने वीणा का पेटेंट नहीं करवाया और लोग हैं कि अपनी आवाज़ का पेटेंट करवा रहे हैं । अरे भाई, आवाज़ क्या अपनी है ? यह तो भगवान की दी हुई है ? और किसे पता है, कब बंद हो जाए मगर नहीं साहब, यह हमारी आवाज़ है और हम इसका पेटेंट करवाएँगे । ठीक है करवाइए । हमें क्या ?

८-११-२०१०

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Sep 30, 2010

सहिष्णु तोताराम की पौरुष-ग्रंथि


आज तोताराम ने आते ही चाय पीने से मना कर दिया, कहने लगा- डाक्टर ने कहा कि ऑपरेशन से पहले कुछ नहीं खाना है और पानी भी नहीं पीना है । अब तू जल्दी से चाय पी ले और मेरे साथ चल । ज्यादा देर का काम नहीं है । तीन-चार घंटे में आना-जाना और ऑपरेशन सब निबट आएगा ।

इससे पहले किसी प्रकार अस्वस्थता की कोई बात तोताराम ने हमें नहीं बताई थी । हमें अजीब लगा । हमने तोताराम को बैठाया और कहा- भैया, ज़रा तसल्ली से बता । क्या बात हुई, अचानक यह ऑपरेशन की नौबत कैसे आ गई ? तोताराम ने कहा- चिंता की कोई बात नहीं है ? न किसी डाक्टर ने कोई समस्या बताई है और न ही मुझे कोई तकलीफ है । मैं तो बस, अपनी पौरुष-ग्रंथि का ऑपरेशन करवाना चाहता हूँ । इसे निकलवाना है ।

हमने कहा- तोताराम, इससे पहले भी एक बार तू रक्त-दान करने गया था मगर डाक्टर ने कह दिया था कि देने की बजाय यदि कोई तुम्हें खून देने वाला मिल जाए तो ले आओ । तुम्हें तो खुद खून की ज़रूरत है । और तुम्हें सधन्यवाद वापिस भेज दिया था । इसके बाद तू ज्योति दा के दिमाग-दान से प्रेरित होकर दिमाग-दान करने के लिए गया था तो डाक्टरों ने तेरी खोपड़ी खोल कर यह कहते हुए फिर वापिस बंद कर दी थी कि मास्टर जी, इसमें तो दिमाग है ही नहीं । क्या निकालें और किसे क्या दान दें ? यह ठीक है कि अब न तो कोई पौरुष तेरे बस का है और फिर नसबंदी तो हम दोनों ने बहुत पहले ही करवा ही ली थी । अब जब तक कोई तकलीफ न हो तब तक क्यों बेकार चक्कर में पड़ता है ? कभी तकलीफ हुई तो देखा जाएगा ।

वैसे यदि पौरुष ग्रंथि का साहस से या प्रोटेस्ट करने से कोई सम्बन्ध है तो वह इसके होते हुए भी तुमसे-हमसे कभी नहीं हुआ । हमेशा अन्याय होते हुए देखते रहे । और तो और किसी लम्पट और चोर को भी यह नहीं कह सके कि हम तुम्हें वोट नहीं देंगे । उसके सामने भी यही कहते रहे- हाँ जी, आपको ही देंगे वोट । सो इस ग्रंथि की चिंता छोड़ । यह तो कल भी और आज भी, हुई न हुई के बराबर थी । अपन, जैसे सूरमा जवानी में थे, वैसे ही सूरमा आज भी हैं ।

तोताराम चिढ़ गया, कहने लगा- जब देखो तब ऐसी ही बातें करता रहता है । कहने को जागरूक पाठक और लेखक बना फिरता है पर ढंग के समाचारों के बारे में ज़रा भी जानकारी नहीं है । अभी कुछ दिनों पहले अपने मनमोहन सिंह जी को एक पुरस्कार की घोषणा हुई थी । अखबारों में पढ़ने को मिला २४ सितम्बर २०१० को कि इन्हें न्यूयार्क की किसी 'अपील ऑफ कोंशियस फाउन्डेशन' नामक संस्था ने उन्हें 'वर्ष २०१० के लिए वर्ल्ड स्टेट्समैन' घोषित किया है । मनमोहन जी खुद तो नहीं जा सके । उनकी तरफ से अमरीका में भारत की राजदूत ने यह सम्मान ग्रहण किया है । यह पुरस्कार ‘समझ और सहिष्णुता’ के लिए दिया जाता है ।

हमने कहा- तो तुझे यह भी पता होगा कि इस संस्था से हेनरी किसिंगर जुड़े हुए हैं । ये वे ही सज्जन हैं जो कभी निक्सन के समय में अमरीका के विदेश मंत्री हुआ करते थे और जिनके साथ बातचीत में निक्सन ने इंदिरा गाँधी को 'बूढ़ी-चुड़ैल' कहा था । यह तो उनकी खुद की सहिष्णुता और सज्जनता का नमूना है । और वियतनाम, मिस्र, ईरान, ईराक, अफगानिस्तान के बारे में तो खुद अमरीका ने सहिष्णुता नहीं दिखाई । और मनमोहन जी को सहिष्णुता के लिए सम्मानित कर रहे हैं । इस सहिष्णुता का मतलब है कि जब अमरीका चाहे तब सहिष्णु बनो । अब अमरीका खुद अफगानिस्तान, ईराक और पाकिस्तान में उलझा हुआ है तो भारत से चाहता है वह अपमानित होकर भी सहिष्णु बना रहे । सबसे बातचीत करता रहे । कश्मीर के अलगाववादी मनमोहन जी की बेइज्जती करके लौटाते रहें और फिर भी वे उनसे वार्ता करते रहें ।

तोताराम कहने लगा- मास्टर, कहा भी गया है कि ठंडा लोहा गरम लोहे को काटता है । सत्य-अहिंसा अपने पुराने सिद्धांत हैं । हमें इन्हें नहीं छोड़ना चाहिए ।

हमने कहा- सत्य और अहिंसा वाला बौद्ध धर्म तो चीन में भी है मगर कल जब चीन को अपने जापान द्वारा पकड़े नौका के कप्तान को छुड़ाना था तो जापान को धमकी दी तो कप्तान एक ही दिन में छूट गया । और अब मज़े की बात यह कि वह जापान से हर्जाने और माफ़ी की माँग और कर रहा है । मनमोहन जी की तरह वार्ता करता रहता तो छूट लिया था कप्तान । न मिले किसिंगर जी का पुरस्कार, देश की इज्जत तो बनी रही, बल्कि और बढ़ गई ।

हमें लगा कि हम कुछ ज्यादा ही बोल गए हैं । सो हमने फिर तोताराम की तरफ ध्यान केंद्रित करते हुए कहा- छोड़ यार,इन बातों को । यह बता, तू क्यों करवाने जा रहा था अपनी पौरुष-ग्रंथि का ऑपरेशन ?

तोताराम ने कहा- मैंने सोचा, मनमोहन जी को यह सम्मान पौरुष-ग्रंथि का ऑपरेशन करवाने के बाद मिला है तो क्या पता, मेरा भी नंबर आ जाए । देश की चिंता करने से क्या फायदा ? उसका तो वही होगा जो अमरीका और मुक्त-बाजार चाहेगा ।

हमने ठहाका लगाते हुए कहा- अब तो चाय पिएगा ना, मेरे सहिष्णु ?

तोताराम शरमा गया ।

२६-९-२०१०

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