Showing posts with label Obama. Show all posts
Showing posts with label Obama. Show all posts

Feb 15, 2014

शिष्टाचार की कुछ सामान्य बातें (ओबामा को पत्र )

ओबामा जी,

वैसे संसारिकता और प्रेक्टिकलता का तकाज़ा तो यह है कि जिससे कोई स्वार्थ सधता हो उसके अलावा किसी से भी कोई बात नहीं की जाए जैसे कि आजकल लोग मोदी-उन्मुख होते नज़र आ रहे हैं । उसने चाय बेचने के बल पर प्रधानमंत्री पद की आशा पाल ली तो लालू प्रसाद को अपने चाय बेचने के दिन याद आ रहे हैं । शायद कुछ समर्थन मिल जाए । बड़े लोग सोच रहे हैं कि यदि राजकुमारों के लिए बचपन में चाय बेचने का कोई प्रमाण-पत्र ले लिया होता तो आज काम आता । हो सकता है कोई बचपन का चाय की केतली थामे फोटो प्रकाश में आ जाए । लेकिन हमारा आपसे इस समय कोई स्वार्थ सधने वाला नहीं है फिर भी हम भूतपूर्वोन्मुख आप (केजरीवाल नहीं) को पत्र लिख रहे हैं । इसके तीन कारण हैं- हम आपमें एक पूर्वी युवक की छवि देख रहे थे; आपने अपने प्रथम चुनाव प्रचार के दौरान एक नई आशा जगाई थी; हम अनुभव कर रहे हैं कि आपको सामान्य शिष्टाचार की कुछ बातें बताना ज़रूरी है ।

हालाँकि आपने हमसे ऐसी कोई प्रार्थना नहीं की है । कोई वकील होता तो अमरीकी रेट के हिसाब से कम से कम २५० डालर प्रति घंटे के हिसाब से फीस पहले रखवा लेता । मगर एक हम हैं कि अध्यापक होने के नाते मुफ्त में ही सही सलाह देने के लिए आदतन विवश हैं ।


1.



आपके यहाँ भारतीय दूतावास की एक महिला अधिकारी के साथ जिस प्रकार का अशोभनीय व्यवहार किया गया वह असामान्य और अशिष्ट है । अमरीकी कानून के अनुसार उसे उचित ठहराया जा रहा है । हो सकता है कोई बाल की खाल निकालने वाला राम जेठमलानी जैसा वकील इसे कानूनी रूप से गलत सिद्ध न होने दे लेकिन जो कानून सामान्य व्यवहार, मानवीय गरिमा और नारी का सम्मान न करे वह कैसा कानून । कानून खून के प्यासे पहलवानों का दंगल नहीं बल्कि वह करुणा और न्याय से जन्म लेने वाली एक व्यवस्था है ।


वैसे आप कानूनन कह सकते हैं कि आपको बताया नहीं गया । हो सकता है आपके यहाँ कानून के रखवाले पुलिसियों को शिष्टाचार और मानवता की इतनी समझ न हो । 



लेकिन आप चाहें तो केरल में भारतीय समुद्री सीमा में दो भारतीय मछुवारों को बंदूक चलाकर मार डालने वाले इटली के कर्मचारियों वाली घटना को याद करें । उनके लिए इटली सरकार ने क्रिसमस मनाने के बहाने जमानत की अपील की और भारत सरकार ने उसे मान लिया और अब वे भले आदमी फरार हैं । इसमें भारत की मानवता और योरप से भय के प्रतिशत के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता और अब देखिए कि इटली उन्हें बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में जा चुका है । क्या भारतीय राजनयिक का अपराध उनसे भी गंभीर था ? अमरीकी मानवाधिकार प्रेम की पर्दादारी के लिए हिंदी में न लिखकर अंग्रेजी में 'केविटी सर्च' लिख रहे हैं । क्या उस महिला के पास विनाश के व्यापक हथियार छुपे होने का खतरा था ?

अमरीकी प्रशासन ने इस कृत्य में अब भी कोई अशिष्टता नहीं पाई है । अपनी-अपनी संस्कृति की बात है । वैसे इस मामले में कभी-कभी हम सोचते हैं कि क्या ऐसा ही व्यवहार अमरीका के कानून के रखवाले पुलिसिये चीन के किसी राजनयिक के साथ करने का साहस जुटा पाते तब क्या आप उसे अनदेखा कर देते ? जो शराबी किसी सभ्य, सीधे या कमजोर व्यक्ति से शराब के नशे के बहाने बदतमीजी कर देता है वही थानेदार के सामने लड़खड़ाता हुआ ही सही, नमस्ते करने लग जाता है । आपके पुलिस वालों का यह कानून-प्रेम कहीं उस शराबी वाला ही तो नहीं है ?

इस बारे में भी एक सच्ची घटना सुनिए- आपके जन्म से पहले राष्ट्रपति आइजनहावर के ज़माने की बात है । उस समय अमरीका ने नए-नए यू टू विमान बनाए थे जो किसी भी राडार की पकड़ में नहीं आते थे । सो अमरीका ने रूस की जासूसी के लिए एक ऐसा ही विमान भेजा । रूस ने शिकायत की तो कहा गया- हमने ऐसा कोई विमान नहीं भेजा । फिर रूस ने कहा- हमने एक यू टू विमान गिरा लिया है । तो कहा गया- हमारा ऐसा ही एक विमान रास्ता भटक गया है । हो सकता है यह वही विमान हो । फिर रूस ने उत्तर दिया - इस विमान के चालक को हमने जिंदा पकड़ लिया है और उसने बताया है कि उसे जासूसी के लिए भेजा गया था । अमरीका ने उत्तर दिया- हाँ, हमने भेजा था और भविष्य में भी भेजेंगे । रूस की चेतावनी थी - यदि भविष्य में ऐसा हुआ तो हम उस अड्डे को ही नष्ट कर देंगे जहां से वह उड़ कर आएगा । तब भी क्षमा नहीं मांगी गई लेकिन फिर कभी कोई यू टू रूस की सीमा में नहीं गया ।


2.

दूसरा कारण- जब आप मंडेला के अंतिम संस्कार में सपत्नीक दक्षिणी अफ्रिका गए थे तब का आपका एक फोटो देखा । आप योरप के एक देश की युवा, सुन्दर और अपने से कम उम्र की प्रधान मंत्री के साथ 'सेल्फी' फोटो लेने के लिए पोज़ बना रहे थे । बगल में ही  श्रीमती ओबामा थीं । पत्नी के इतने निकट होते हुए किसी सुंदरी से इतनी निकटता बढ़ाना बहुत साहस का काम है । हम आपके चरित्र और एक पत्नी-व्रत पर कोई प्रश्न नहीं उठा रहे हैं लेकिन ऐसे अवसर पर कोई सामान्य व्यक्ति भी, भले ही झूठ-मूठ ही सही, गंभीर और ग़मज़दा होने का नाटक ही सही, करता तो है । 


लेकिन आपने तो इस सामान्य से शिष्टाचार को भी ताक पर रख दिया । सौन्दर्य तो सामान्य क्या, बड़े-बड़ों को भी अपने जाल में फँसा लेता है, फिर आप तो अभी जवान हैं । लेकिन याद रखना चाहिए कि राजा से जितेन्द्रिय होने की अपेक्षा की जाती है । आप इतने शक्तिशाली देश के प्रथम नागरिक हैं तो आपसे तो और भी नियंत्रित होने की अपेक्षा की जाती है । क्लिंटन जी की दुर्गति तो ऐसे कर्मों के कारण जग-जाहिर है ही । संन्यास की उम्र पर पहुँच चुके इटली के पूर्व प्रधान मंत्री बर्लुस्कोनी शायद जेल में हैं । यदि नहीं, तो भी जनता ने तो उन्हें अपनी विस्मृति के गटर में डाल दिया होगा । फ़्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति महोदय अपनी लम्पटता के कारण सुर्ख़ियों में हैं । और पूर्व पत्नी भारत में मानसिक शांति तलाश रही है । हो सकता है आपका ऐसा कुछ इरादा नहीं रहा हो लेकिन पत्रकार तो बड़ी अफवाहें फैला रहे हैं । और पत्रकारों की ऐसी अफवाहें अब तक प्रायः सच ही निकली हैं ।



3.



तीसरा कारण- अभी एक खुलासा छपा है कि आपने नवम्बर २००९ में मनमोहन सिंह जी को जो डिनर दिया था उसमें पौने छः लाख डालर खर्च हुए थे । मनमोहन जी भले आदमी हैं । वे अपनों की बातों का ही ज़वाब नहीं देते तो आपको क्या कुछ कहेंगे । यह आपके और आपके प्रशासन के सोचने की बात है कि किसी भले आदमी को पहले तो निमंत्रण देकर घर बुलाओ और फिर इस तरह दुनिया में उसका जुलूस निकालो ।

एक किस्सा सुनाते हैं जिससे शायद हमारी बात स्पष्ट हो जाए । एक सेठ ने अपने नाई को किसी काम से अपने बेटे की ससुराल भेजा । वहाँ नाई को दस-दस ग्राम के पतले-पतले फुल्के परोसे गए । उन दिनों में आने-जाने के साधन बहुत कम थे और वैसे भी लोग दस-पंद्रह किलोमीटर के लिए कोई साधन लेते भी नहीं थे, पैदल ही चले जाते थे । नाई भी पैदल चलकर सेठ के बेटे की ससुराल पहुंचा । दिन भर का भूखा, पतले-पतले फुल्के , खा गया चालीस-पचास ।


नाई खाता जाता था और सोचता जाता था कि इतने पलते फुल्के परसे जाने का क्या चक्कर है ? आप जानते हैं कि नाई सत्तर घाट का पानी पिया एक चतुर प्राणी होता है । उसने छुपाकर एक फुल्का अपनी जेब में रख लिया । जब लौट कर सेठ को रिपोर्ट की तो अपने समधी की चिट्ठी पढ़कर सेठ ने कहा- नेवगी जी, आपने तो बेटे की ससुराल में हमारी नाक ही कटवा दी । अरे भाई, ऐसी भी क्या भूख । पचास फुल्के खा गए । नाई ने जेब से फुल्का निकाल कर दिखाया और कहा- सेठ, ये रहा फुल्के का नमूना ।


बात समझ में आ गई होगी । नहीं तो कुछ और स्पष्ट कर देते हैं । उस भोज में मनमोहन जी के साथ होंगे कोई बीस आदमी, जब कि आप वाले दो सौ । आपको याद होगा उस भोज में शराब के एक व्यापारी (सलाही) अपनी सुन्दर पत्नी के साथ बिना बुलाए आए और दारू पीकर चले गए । हो सकता है ऐसे ही बहुत से लोग बिना गिनती के आ गए होंगे और आपने खर्चा डाल दिया मनमोहन जी के खाते में । जैसा कि हमें याद है, उस भोज में मनमोहन जी को बैंगन का भुरता परोसा गया था और वह बैंगन भी मिशेल ने अपने किचन गार्डन में उगाया था । हमें लगता है कि कर्मचारियों ने इसमें कम से कम साठ प्रतिशत का घपला किया है । चालीस प्रतिशत में से मनमोहन जी के साथ वालों पर चार प्रतिशत खर्चा हुआ होगा । कुल मिलाकर दस हजार डालर से अधिक खर्चा अमरीकी सरकार का नहीं हुआ होगा । जब कि इससे कई गुना तो उन्होंने निजी हवाई जहाज से अमरीका आने-जाने में खर्च कर दिया होगा । जितने की झाँझ नहीं उतने के मंजीरे फूट गए और इतना बड़ा अहसान ऊपर से । इससे करोड़ों गुना तो अपने एक परमाणु सौदे में मनमोहन जी से कमा लिया होगा ।

हमारे यहाँ 'ऐसे' अतिथि सत्कार को ओछी-नीत कहते हैं लेकिन आपसे यही कहते हैं कि इतने बड़े देश के राष्ट्रपति होकर इतना छोटा दिल मत रखिए । अपने अकाउंट्स विभाग वालों से भी कह दें कि मेहमानों की रोटियाँ न गिना करें ।

ये तीनों बातें ही अशिष्टता हैं, क्षमा माँगने योग्य हैं लेकिन हमें पता है कि आप क्षमा नहीं मांगेंगे क्योंकि क्षमा माँगने के लिए क्षमा करने वाले से भी बड़ा दिल चाहिए ।

हमारे यहाँ शिव काल से भी बड़े, महाकाल हैं और इसीलिए महादेव हैं । उनसे क्षमा माँगने का एक मन्त्र है । उससे आप समझ जाएंगे कि वास्तव में सच्ची क्षमा-याचना क्या होती है ? यह कोई सॉरी जैसा दो अक्षरों में निबटा दिया जाने वाला रस्मी मामला नहीं है । सुनिए उस श्लोक का भावार्थ-
हे करुणा के सिन्धु महादेव शम्भु ! मैं अपने हाथों, पैरों से किए गए, शरीर और कर्म द्वारा किए गए, कानों और नेत्रों द्वारा किए गए, मन द्वारा किए गए, सभी व्यक्त और अव्यक्त अपराधों के लिए आपसे क्षमा माँगता हूँ । मुझे क्षमा करिए ।

ऐसी क्षमा किसी और का नहीं बल्कि स्वयं का भला करती है उसे पवित्र करती है । यदि इस भाव से क्षमा मांगी जाए तो ठीक है अन्यथा शाब्दिक चोंचलों का कोई अर्थ नहीं । वैसे हम जानते हैं कि आप ऐसी औपचारिक क्षमा भी नहीं मांगेंगे क्योंकि आपके सामने इण्डिया की स्थिति तो उस प्रेमिका जैसी है जो कहती है-
तड़पाओगे तड़पा लो, हम तड़प तड़प कर भी तुम्हारे गीत गाएंगे ।

वैस अब आपको अधिक सोचना भी नहीं चाहिए क्योंकि अब कौनसा चुनाव लड़ना है । अमरीका में कोई भी राष्ट्रपति अधिक से अधिक आठ वर्ष का सत्ता सुख ही भोग सकता है । सो आपके छः वर्ष तो बीत ही गए, दो और बीत जाएंगे । आपकी स्थिति तो हमारे अरविन्द केजरीवाल जैसी है । आपके लिए पाने को कुछ नहीं है और उसके पास कुछ खोने को नहीं है ।


‘जय शंकर बम भोले’ नहीं बोलेंगे क्योंकि क्या पता, कहीं हमारी भी 'केविटी सर्च ' न हो जाए । और उसमें व्यापक विनाश की कोई कविता या पत्र निकल आया तो क्या करेंगे । वैसे यह बम वह नहीं है जो आतंकवादी रखते हैं । यह तो शिव के प्रिय भंग के गोले से संबंधित है जिसका सेवन आपने भी किया हुआ है । क्या मज़े की चीज़ है ? एक आनंद ही आनंद । कोई कुंठा और ईर्ष्या-द्वेष नहीं । खाओ तो खाते ही जाओ, हँसो तो हँसते ही जाओ, रोओ तो रोते ही चले जाओ ।

आज 'वेलेंटाइन डे' भी है । ऐसे नहीं कहा जा रहा हो तो भंग का गोला चढ़ा कर ही सही, एक बार ढंग से मिशेल को 'आई लव यू' कह दो और भावी पारिवारिक जीवन को सुखद बना लो क्योंकि राष्ट्रपति न रहने पर, न कोई गायिका पूछने आएगी और न ही कोई युवा प्रधान मंत्री । यही भली औरत साथ निभाएगी ।

१४ फरवरी २०१४

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Nov 24, 2012

भाई साहब का भटकना


तोताराम से सत्संग हुए कोई छः महिने हो गए । हालाँकि ऐसा नहीं है कि यह दुनिया स्वर्ग हो गई है और इसमें निन्दा-स्तुति के योग्य कुछ नहीं बचा । हाँ, यह बात ज़रूर है कि क्या देश और क्या दुनिया हालत यह हो गई है कि 'पंचों का कहना सिर माथे लेकिन पतनाला वहीं गिरेगा' । और जब ससुर पतनाले को वहीं गिरना है तो काहे को मगजपच्ची करें । मगर जैसे सरकार कुपोषित जनता का भी तेल निकाल सकती है तो तोताराम बात करने के लिए कुछ न कुछ निकाल ही लेता है । बस, कारण रहा कि हम छः महिने से अमरीका गए हुए थे । आजकल भले ही आदमी को पूरी रोटी और शुद्ध पानी नहीं मिल रहे हों लेकिन संचार के इतने साधन हो गए हैं कि कहीं भी बैठकर दुनिया से संपर्क बनाए रखा जा सकता है मगर जो बात आमने-सामने मिलकर होती है, जो आनंद गले मिलकर आता है वह आनंन्द फोन और मेसेज या स्काइप में कहाँ? यदि टी.वी. पर मिठाइयाँ और फल देखकर ही तृप्ति हो जाती तो फिर बात ही क्या थी? सो पिछले छः महिने से तोताराम से कभी कभार बातें तो होती रहीं, अखबार भी इंटरनेट पर पढ़ते रहे लेकिन वह बात कहाँ? मेले का समाचार देख-सुनकर वह मज़ा कैसे आ सकता है जो वहाँ जाकर भीड़ में धक्के खाने या भगदड़ में हाथ-पैर तुड़वाकर आता है ।

तो साहब, आज तोताराम पधारे । जैसा कि आप जानते हैं पिछले पचास वर्षों से, जब भी वे या हम गाँव में मौजूद रहे, चाय और अखबार का सेवन उन्होंने हमारे यहीं करके हमें कृतार्थ किया । आज आशा के विपरीत वे अखबार अपने साथ लाए और एक नहीं दो-दो - एक हिंदी का और एक अंग्रेजी का ।

हमारे सामने अखबार पटकते हुए बोला- मास्टर, भाभी से कह सोनिया जी को फ़ोन लगाने की कोशिश करे, तब तक मेरी बात ध्यान से सुन- अपने भाई साहब मनमोहन सिंह जी किसी एसीअन (ASEAN) की मीटिंग में भाग लेने गए थे । अब यह क्या मीटिंग है और जगह कहाँ है मुझे तो पता नहीं? हिंदी वाले अखबार में जगह का नाम 'नोम पेन्ह' लिखा है और अंग्रेजी वाले 'फ्नोम पेन्ह' लिखा है ।

हमने उसे समझाया कि यह कोई मीटिंग है जिसमें दक्षिण एशिया के कोई दसेक देश भाग लेंगें और अमरीका न तो एशिया में है और न ही दक्षिण में लेकिन वह भी भाग लेता है क्योंकि अमरीका के बिना न तो कहीं लोकतंत्र हो सकता है और न ही व्यापार । और यह ‘नोम पेन्ह’ और ‘फ्नोम पेन्ह’ एक ही है । यह कोई अपनी लिपि देवनागरी तो है नहीं कि जो लिखो सो पढ़ो । यह तो रोमन लिपि है जिसमें कोई भी ध्वनि, कभी भी, समझदार नेता की तरह साइलेंट मोड़ में चली जाती है । मगर इसमें सोनिया जी को फ़ोन लगाने की क्या बात है? वे तो वैसे भी संसद के अधिवेशन की तैयारी में व्यस्त होंगीं । और फिर मनमोहन जी कोई बच्चे थोड़े ही हैं जो रास्ता भूल जाएँगे? आ जाएँगे ।




तोताराम हमारे सामने २० नवंबर २०१२ के हिंदी और अंग्रेजी के दोनों अखबार रखते हुए बोला- समझने की कोशिश कर । देख, इस सम्मलेन में दस देश भाग लेने वाले हैं । हिंदी के अखबार में अपने भाई साहब मनमोहन जी चीनी नेता के साथ खड़े हैं और लिखा है- गहरे दोस्त जैसे मिले मन-वेन । अंग्रेजी वाले अखबार में भाई साहब अपने चिर परिचित जोधपुरी सूट या कुर्ता-पायजामा और जेकेट की बजाय एक सस्ती सी चमकीली सी लाल रंग की बुशशर्ट पहने सावधान की मुद्रा में सहमे हुए से जुलिया गिलार्ड के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं । फोटो भाई साहब की ही है क्योंकि इतना शालीन और कोई हो ही नहीं सकता । और, किसी अन्य के फोटो के साथ भाई साहब का सिर चिपका कर ट्रिक करने की हिमाकत कोई भारतीय अखबार नहीं कर सकता क्योंकि तू जानता है कि यहाँ तो किसी नेता की शव-यात्रा से लगे जाम से परेशान होकर यदि कोई फेस बुक पर भी कुछ लिख दे तो पुलिस पकड़ लेती है । अंग्रेजी के इसी अखबार में एक पेज पर ओबामा की के साथ हाथों को दाएँ-बाएँ करके पकड़े हुए एक चेन सी बनाते हुए चार नेताओं का फोटो है लेकिन उसमें चीनी नेता, अपने भाई साहब और आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री जूलिया गिलार्ड तीनों ही नहीं हैं । मेरा तो कलेजा मुँह को आ रहा है । बेचारे झिक-झिक से पीछा छुड़ाकर दो दिन कहीं घूमने गए थे और पता नहीं कहाँ पहुँच गए?

पत्नी ने बताया कि फ़ोन नहीं मिल रहा है और कोई बोल रही है कि जिस नंबर से आप बात करना चाहते हैं वह अभी व्यस्त है । कृपया होल्ड रखें या थोड़ी देर बाद फिर कोशिश करें । इसके बाद कई बार कोशिश की लेकिन बात नहीं हो सकी ।

तोताराम ने निराश होकर कहा- ठीक है मास्टर, चलता हूँ । वैसे सारी बात का पता चल जाता तो तसल्ली हो जाती । मुझे तो लगता है भाई साहब कहीं और तो नहीं चले गए हैं । भले आदमी हैं । बेचारे किसी से कुछ नहीं कहते फिर भी लोग हैं कि जीने ही नहीं देते । लोगों में ज़रा भी रहम नहीं है । एक तो बेचारे अस्सी साल के होने को आ रहे हैं ऊपर से हार्ट के मेज़र ऑपरेशन करवाए हुए तिस पर पौरुष-ग्रंथि अलग निकलवा चुके हैं । कभी किसी चुनाव के चक्कर में नहीं पड़े । भटकते-भटकते हुए दिल्ली पहुँचे तो लोगों ने ज़बरदस्ती पकड़ कर प्रधान मंत्री बना दिया । अब न कोई दूसरा मिले और न इनका पीछा छूटे ।

हमने तोताराम को तसल्ली दी- चिंता मत कर । भाई साहब दुनिया घूमे हैं । दिल्ली विश्वविद्यालय और रिज़र्व बैंक ही क्या, वर्ल्ड बैंक तक चक्कर लगा चुके हैं । कहीं नहीं खोएँगे । लौट आएँगे एक दो दिन में । और फिर चुप रहने मात्र से ही क्या कोई कमजोर हो जाता है? अरे, चुप रहने वाले ज्यादा शक्तिशाली होते हैं । कहा भी है- ‘थोथा चना बाजे घना’ या ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ । अपने भाई साहब चुप रहकर भी वह कर गुजरते हैं जो बड़े-बड़े गरजने वाले नहीं कर पाए । दस साल पहले अपनी पेंशन चार हजार रुपए थी और आज पन्द्रह हजार है पर क्या तुझे पता चला कि कब भाई साहब ने अपने रुपए की क्रय शक्ति उस चार हजार से भी कम कर दी या कब बीस साल में रुपया डालर के मुकाबले एक तिहाई रह गया या कब पेट्रोल, गैस, घी, फल और सब्जियाँ लोगों की पहुँच से बाहर हो गए? किस दिन २५ रुपए वाला स्पीड-पोस्ट चुपचाप ४० रुपए का हो गया? चिंता मत कर ऐसा ही कोई महान काम करके लौटेंगे अपने भाई साहब ।

तोताराम चला गया लेकिन अगले ही दिन फिर लौट आया । बहुत खुश था और हमारे सामने २१ नवंबर का अखबार रखते हुए बोला- मिल गए भाई साहब । देख, जोधपुरी सूट में ओबामा से हाथ मिलाते अपने भाई साहब । वही बाल-सुलभ सकुचाई सी मुस्कान और वही गद्गद् भाव । और तो और इसी दौरे में जापान के प्रधान मंत्री से २.२६ अरब डालर का कर्ज़ा कबाड़ लिया सो अलग ।


हमने कहा- ठीक है मिल गए भाई साहब । लेकिन क़र्ज़ लेने में खुश होने की क्या बात है? साठ बरस हो गए कभी दो पैसे बचाकर किसी को क़र्ज़ देने लायक भी तो बनो । जापान १९४५ में ध्वस्त हो गया था और तुम १९४७ में आज़ाद हुए थे । एक प्रकार से दोनों ने एक साथ ही शुरुआत की लेकिन अब देख कहाँ जापान और कहाँ हम?

तोताराम कहाँ हार मानने वाला था, बोला- अरे कर्ज भी तो उन्हें ही मिलता है जिनकी कोई साख होती है । बता क्या किसी बैंक ने तुझे बेटी की पढ़ाई के लिए लोन दिया? और फिर इन्हें कौन हजार बरस जीना है । अभी तो 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्'; बाद की बाद में आने वाली पीढ़ी जाने ।

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Sep 13, 2012

ड्रिंक और डेमोक्रेसी उर्फ़ बराक ओबामा की बीयर

ओबामा जी,
थ्री चीयर्स । आशा है चुनाव अभियान अच्छी तरह से चल रहा होगा । दिन, चुनावी वादों से लोगों को बहलाने में और शाम, बीयर पीने-पिलाने में गुजर रहे होंगे । हमें विश्वास है कि आप निश्चय ही चुनाव जीतेंगे । जब से क्लिंटन जी ने दो-दो टर्म कुर्सी पकड़े रखने का चलन शुरू किया है तब से कोई भी दो टर्म से पहले पीछा नहीं छोड़ रहा है । आपके दो टर्म के बाद फिर रिपब्लिकन आने ही हैं जैसे तमिलनाडु की जनता जयललिता और करुणानिधि के बीच पेंडुलम की तरह झूल रही है वैसे ही अमरीकी जनता डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन की बीच धक्के खा रही है । बारी-बारी से नागनाथ जी और साँपनाथ जी में से ही किसी एक को आना है । हम तो आपके जन्म (१९६१) से पहले ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव कराते रहे हैं । २००२ में रिटायर होने के बाद इस लोकतान्त्रिक कर्म से पीछा छूटा है ।

हम अपने इसी अनुभव के आधार पर कह सकते हैं कि यह चुनाव आप ही जीतेंगे । इसीलिए हमने आपको शुरु में ही थ्री चीयर्स कह दिया । यह आपकी विजय के लिए भी है और आपकी बीयर के लिए भी जिसके बारे में अभी २ सितम्बर २०१२ को समाचार आया है कि आप व्हाईट हाउस में अपनी कोई निजी नुस्खे वाली बीयर बनाते हैं और पीते हैं (वीडियो)। जिस तरह से आपने बीयर को राष्ट्रीय सम्मान दिया है वह अनोखा, अद्भुत और अभूतपूर्व है । वैसे यह ओपन सीक्रेट है कि ड्रिंक और डेमोक्रेसी का हमेशा से घनिष्ट संबंध रहा है । हमारे यहाँ तो उम्मीदवार चुनाव के लिए फार्म भरने बाद में जाता है और दारू का भण्डारण पहले करता है । सभी दारू का खुला प्रयोग करते हैं । सभी मतदाता जिससे भी मिले दारू लेते हैं और उसी मधुमती भूमिका में वोट डाल आते हैं । अब नशे की स्थिति में कौन सा बटन दबा, किसे पता ? जो जीत जाता है- सब यही कहते हैं कि हमने उसे ही वोट दिया था । मगर जीतने वाला जानता है कि जीती दारू है । हमारे एक मित्र, जिन्हें हम पूनम पांडे की तरह पूरी पारदर्शिता से जानते थे, की एक बार एक साथ कई अखबारों और पत्रिकाओं में कई गज़लें छपीं तो हमने कहा- बंधु, आजकल तो बहुत छप रहे हो तो वे सकुचाकर बड़ी ईमानदारी से बोले- भाई साहब, आप तो जानते हो । मैं क्या, बोतल छप रही है ।

सो हम तो कहते हैं कि आप पिछली बार भी दारू के बल पर ही जीते थे और इस बार भी दारू के बल पर ही जीतेंगे । आप कहेंगे कि आपने पिछले चुनावों में तो दारू की कोई बात नहीं की थी । लेकिन याद कीजिए आपने कहा था- वी कैन । आपके चुनावी नारे वाले 'कैन' का क्या मतलब होता है पता नहीं, लेकिन बीयर का 'कैन' सभी समझते हैं और उसी की आशा में लोगों ने आपको वोट दे दिया । अब आपने अपने किसी आदमी से सूचना के अधिकार के तहत एक अप्लीकेशन लगवा कर, ईमानदारी का नाटक करते हुए अपना बीयर वाला नुस्खा जग-जाहिर कर दिया । वैसे यदि आपमें जन-कल्याण का इतना ही ज़ज्बा होता तो व्हाईट हाउस में चुपचाप दारू बनवा कर मज़े से पीते रहने की बजाय अंदर बीयर का एक बड़ा सा ओवर-हैड टेंक बनवा देते और उसका एक कनेक्शन बाहर लगवा देते । जिसका मन हो नल खोले और मस्त हो जाए । यदि आप ऐसा करते तो यह नौबत ही नहीं आती । लोग वैसे ही आपको आजीवन राष्ट्रपति बना देते । वैसे इसमें जनता का जाता भी क्या । होना तो वही है जो इस देश की विभिन्न लॉबियाँ जैसे गन लॉबी, पेट्रोल लॉबी, कार लॉबी, कोल्ड ड्रिंक लॉबी, पिज्जा लॉबी आदि चाहेंगी ।
अमरीका की राजनीति में ऐसा कहा जाता है कि जनता उसी को वोट देती है जिसके साथ उसे बीयर पी सकने की उम्मीद होती है । आप जनता के इस विश्वास पर खरे उतरेंगे । बुश साहब ने तो सुनते हैं कि आखिरी वक्त में तौबा कर ली थी और इन रोमनी महाशय के बारे में तो लोग जानते ही हैं कि ये पीते नहीं ।

सोचिए बिना दारू के क्या जीवन ? कहाँ से हिम्मत आए और कहाँ से ताज़गी और कहाँ से दिन भर भौंकने और धक्के खाने की शक्ति । हमारे इलाके से तो एक सज्जन चुनाव में खड़े हुआ करते थे । उनके हर चुनाव कार्यालय में दारू का अटूट भंडार रहता था । कोई भी आए, कितनी भी पिए, पूरी छूट । वे खुद भी हर चुनाव सभा की समाप्ति पर अगली सभा के लिए जाते समय कार में बैठकर पीते हुए जाते थे । और इस तरह से हर सभा में वैसे ही तरोताज़ा और मस्त । कभी चुनाव नहीं हारे । सो आप तो दारू की सप्लाई बनाए रखिए ।

हमारे बच्चन जी ने ऐसे ही नहीं कहा है- ‘मंदिर मस्जिद बैर कराते, प्यार कराती मधुशाला’ । न पीने वाले के मन में भले ही खोट आ जाए लेकिन हम-पियाला लोगों को देखिए कैसे खुद से पहले, साथ वाले को बढ़-चढ़कर खिलाने-पिलाने की हसरत रहती है । कहने को तो कोई यह भी कह सकता है कि राष्ट्रपति होकर घर में दारू बनाते हैं । तो इसमें क्या है हमारे यहाँ भी ठाकुर लोग अपने घरों में दारू बनाया करते थे । कुछ वर्षों पहले राजस्थान में उन्हें 'रजवाड़ी दारू' के नाम से लाइसेंस दिया गया था । अमरीका में भी राष्ट्रपति को अपने नुस्खे और अपने नाम की दारू बनाने और बेचने का अधिकार होना चाहिए । वैसे तो इस साली कुर्सी में ही इतना नशा है कि आदमी को होश नहीं आता लेकिन जनता के पास तो पाँव के नीचे ज़मीन ही नहीं । ऐसे में उसमें क्या नशा ? उसके तो होश तक हिरण हो रहे हैं । इसलिए उसे तो वास्तविक दारू चाहिए गम गलत करने के लिए । सत्ताओं के भरोसे किसके गम दूर हुए हैं ?

इसलिए आप भी सभी नेताओं की तरह केवल उजले सपनों की ही नहीं बल्कि व्हाईट हाउस की बोतल वाली रजवाड़ी बीयर पिलाते रहिए और चुनाव जीतकर लोकतंत्र को सुरक्षित रखते रहिए । वैसे लोकतंत्र हमेशा सुरक्षित रहता है- कभी डेमोक्रेट का तो कभी रिपब्लिकन का । कुल मिलाकर लोकतंत्र को कभी कोई खतरा नहीं । हो सके तो हमारे जैसे आपके शुभेच्छु को व्हाईट हाउस में खींची बीयर का एक क्रेट भिजवा दें तो यहीं घर बैठे ही आपकी जीत को अभी एडवांस में ही सेलेब्रेट कर लें वरना जीत के बाद कौन किसे याद रखता है ?

वैसे भी न तो आपको तीसरी बार चुनाव में खड़े होना और न हम रिजल्ट वाले दिन यहाँ रहने वाले क्योंकि हमारा वापसी का टिकट नवंबर में है ।

2012-09-11
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Jun 5, 2011

फेयर डील

ओबामा जी,
नमस्ते । बधाई तो हमने पहले ही दे दी थी आपको ओसामा को निबटाने की । हमारा कौन सा वोट बैंक है जो खिसक जाएगा । जिनको वोट बैंक खिसकने का डर है वे चुप्पी लगाए हुए हैं । आज जब पढ़ा कि अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बुश साहब ने आज से कोई दस साल पहले ही यह 'डील' कर ली थी कि यदि ओसामा पाकिस्तान में हुआ तो अमरीका उसे पकड़ने या मारने की सीधी कार्यवाही कर सकेगा । इसे कहते हैं दूरदर्शिता । वैसे बुश साहब को पहले से ही यह विश्वास था कि ओसामा के खिलाफ़ कार्यवाही तो करनी पड़ेगी, आज नहीं तो कल और ओसामा जब भी मिलेगा, पाकिस्तान में ही मिलेगा । मतलब कि 'डील' करने से पहले सामने वाले का 'डौल' देख लेना चाहिए । आज 'डील-डौल' शब्द के इस नए अर्थ से हम खुद चमत्कृत हैं । पर क्या बताएँ, हमारा नेतृत्त्व इतना समझदार नहीं है कि सामने वाले का 'डौल' देख-समझ सके । तभी चीन और पाकिस्तान से बार-बार वार्ता करता है और धोखा खाता रहता है । आपकी इस दूरदर्शिता के लिए राजस्थानी में एक कहावत है- 'वड़ों से पहले तेल पीना' । जिसे लगता है कि क्या पता, वड़े मिलें या नहीं तो वह वड़े बनने का इंतज़ार नहीं करता बल्कि पहले ही तेल पी जाता है ।

हमें तो लगता है कि अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने, जब ओसामा को रूस के खिलाफ़ खड़ा किया था, तभी यह 'डील' कर ली होगी क्योंकि भस्मासुर को वरदान देने से पहले उसकी काट तय कर लेनी चाहिए । हमारे शिवजी इतने समझदार नहीं थे तभी उनकी रक्षा के लिए विष्णु भगवान को आना पड़ा । हमारे पुराणों में भी बहुत से किस्से आते हैं कि जब भी ब्रह्माजी किसी राक्षस को वरदान देते थे तो उसकी काट पहले से सोच लेते थे । जब हिरण्यकश्यप को वरदान दिया कि न दिन में मरेगा न रात में, न घर में मरेगा न बाहर, न आदमी से मरेगा न जानवर से, तभी सोच लिया था कि इसे मारने के लिए नृसिंह भगवान अवतार लेंगे और वे उसे संध्या के समय उसके महल की देहली पर मारेंगे । हमारे नेता तो जो कुछ सीखते हैं वह पश्चिम की अनुपयुक्त हो चुकी टेक्नोलोजी और फेल हो चुके सिद्धांतों से सीखते हैं । हमारे पुराणों का तो सही फायदा अमरीकी नेतृत्त्व ने ही उठाया है कि ओसामा के जन्म के साथ ही उसकी वध की योजना भी बना ली । लगता है कि अमरीकी नेतृत्त्व ने भोपाल में यूनियन कार्बाइड का कारखाना लगाते समय ही भारत सरकार से एंडरसन को ‘सेफ़ पैसेज’ देने का समझौता कर लिया था वरना यह कैसे हो सकता है कि वह इस आपराधिक कर्म के बाद भी मध्यप्रदेश के सरकारी तंत्र द्वारा विशेष विमान से दिल्ली पहुँचाया जाए और वह वहाँ राष्ट्रपति से मिलकर सकुशल अमरीका पहुँच जाए ?

वैसे यह भी सच है कि यदि अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने ओसामा को लेकर पकिस्तान से यह समझौता नहीं किया होता तो भी आप उसे पाकिस्तान में जाकर पकड़ सकते थे । पहले भी तो एक वांछित अपराधी को आपके जासूसों ने पाकिस्तान के एक होटल से गिरफ्तार किया था । इसी को कहते है- 'ठाडे का तो डोका भी डाँग होता है' मतलब कि शक्तिशाली का तो तिनका भी लट्ठ का काम करता है । प्रथम विश्वयुद्ध में हार के बाद जर्मनी पर बहुत सी अपमानजनक शर्तें लादी गई थीं मगर बेचारा कुछ नहीं बोल सका । फिर जब हिटलर शक्तिशाली हुआ तो उसने सारी संधियों को तोड़ डाला । और एक हमारा हाल है कि हम सबूत पर सबूत दिए जा रहे हैं मगर पकिस्तान मान ही नहीं रहा है । दाऊद इब्राहीम पाकिस्तान के एक क्रिकेटर के बेटे से अपनी लड़की की शादी करता है । दुनिया के बहुत से मेहमान, क्रिकेटर और यहाँ तक कि भारत के टी.वी. की रिपोर्टर भी उस शादी में जाती है मगर पाकिस्तान की सरकार को पता ही नहीं लगता कि दाऊद पाकिस्तान में है या नहीं । जैसे कि साधू यादव पर गिरफ्तारी का वारंट था तब भी वह संसद में आया, हाजरी लगाई और चला गया मगर पुलिस को पता ही नहीं चला । इसी तरह पाकिस्तान को क्या पता नहीं था कि ओसामा उसी के यहाँ रह रहा है मगर वह झूठ बोलता रहा ? मगर हम यह नहीं मान सकते कि बुश साहब को भी पता नहीं था कि ओसामा पाकिस्तान में नहीं है ।

हमें लगता है कि उन्हें पता था कि ओसामा पाकिस्तान में ही है पर उन्होंने उसे पकड़ने में कोई जल्दी नहीं दिखाई क्योंकि राजनीति में ऐसे मुद्दे बड़ी मुश्किल से हाथ आते हैं जो दीर्घकालिक हों और शर्तिया चुनाव जिताने वाले हों । पाकिस्तान का कोई भी राष्ट्रपति कश्मीर का मुद्दा हल नहीं करना चाहता । इसी तरह से आतंकवाद का मुद्दा भी पाकिस्तान की सेना और नेतृत्त्व के लिए दुधारू गाय है जिसे जितने समय तक हो सके, दुहते रहना चाहिए । हमारे यहाँ आरक्षण भी इसी तरह का मुद्दा है । वरना जिस दवा से पिछडों और दलितों का पूर्ण रूप से इलाज़ नहीं हुआ क्या उस दवा को बदल नहीं देना चाहिए ? पर जब तक डाक्टर को मरीज से और अधिक मुनाफ़ा कमाने वाली दवा न मिल जाए तब तक उसे पुरानी दवा ही चालू रखनी चाहिए । सो यह बेअसर दवा चालू है, मरीज की हालत बिगड़ रही है मगर डाक्टर की प्रेक्टिस चालू है । सो जब तक तेल भंडारों पर कब्ज़ा बनाए रखने के लिए आतंकवाद से बेहतर और कोई तरीका नहीं मिल जाता तब तक इसे ही पकड़े रखना चाहिए भले ही पाकिस्तान को हर साल दस-बीस अरब डालर देते रहना पड़े । धंधे के लिए बहुत से ओवरहैड खर्चे करने ही पड़ते हैं । इतने खर्चे के बाद भी तो कुछ तो बचेगा ही ।

अब हमारे नेतृत्त्व को ओसामा के पकड़े जाने पर लग रहा है कि आप जिस तरह से अपने लिए पाकिस्तान को गरिया रहे हैं वैसे ही इसके लिए भी उसे डाँटेंगे और सही रास्ते पर लाएँगे मगर वह यह भूल जाता है कि आप धंधा करने निकले हैं कोई जनकल्याण करने नहीं । हाँ, यदि भारत डरकर हथियार खरीदना चाहे तो आपको कोई ऐतराज़ नहीं है । ख़रीदे, शौक से खरीदे, भले ही कृषि, शिक्षा, चिकित्सा आदि के कल्याणकारी खर्चे कम करके ही ख़रीदे ।

वैसे हम अमरीका की इस बात के लिए भी प्रशंसा करते हैं कि उसने कुछ भी अनुचित नहीं किया । जो कुछ किया समझौते के तहत किया । 'डील' तो डील ही होती है और हमें तो अमरीका से अधिक 'फेयर डील' करने वाला कोई दूसरा दुनिया में लगा नहीं ?

११-५-२०११

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

May 8, 2011

आपको भी बधाई, ओबामा जी

( १ मई २०११ को आधी रात के बाद अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने घोषणा की कि पकिस्स्तान में अमरीकी कमांडो द्वारा ओसामा मारा गया )


ओबामा जी,
नमस्ते । पत्र का शीर्षक देखकर अन्यथा नहीं लीजिएगा । हमने आपसे पहले बुश साहब को बधाई दी है इसलिए यह शीर्षक दे दिया है । बुश साहब को पहले इसलिए कि इस शुभ अवसर के मूल प्रणेता वे ही हैं । यदि उनके काल में ९/११ नहीं हुआ होता तो यह शुभ अवसर आता ही नहीं । कुछ भी हो, मुद्दा खूब चला । इसी के सहारे बुश साहब दो टर्म खींच गए और हमारा विश्वास है कि अब आप भी दो टर्म बने रहेंगे ।

इसके लिए आपको कोई दोष नहीं देगा । आपके गले में तो ये रोज़े बुश साहब डाल गए । आपने चुनाव-प्रचार के समय जो नारा दिया था- 'वी कैन', वह नारा चला और आप जीत गए । बाद में बहुत से विज्ञापनों में भी हमने इस नारे का उपयोग करते लोगों को देखा । बुश साहब के काल में शुरु हुए बैंकों के फेल होने के सिलसिले ने आपको बहुत चक्कर में डाला और आपकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे जाने लगा । मगर आपने बुश साहब द्वारा गले में डाले गए इन रोज़ों को बड़ी चतुरता से निबटाया और उसे एक लाभ का सौदा बना लिया ।

यह ज़रूरी भी था । उस दुष्ट ने तो अमरीका की नाक ही काट ली थी । बात यह है कि बड़े आदमियों की नाक भी बड़ी होती है । वह सारी दुनिया में फैली होती है, इसलिए उसका कहीं भी कटना संभव है । और फिर नाक का कटना मानने पर भी निर्भर करता है । अब हमें देखिए, हमले हमारे यहाँ भी होते हैं मगर हमारी नाक कभी नहीं कटती । विपक्षी कभी कसाब तो कभी कंधार तो कभी अफज़ल के नाम से उसे काटने की कोशिश करते हैं । मगर हम उसे बचा ही लेते हैं और नहीं बचा पाते तो भी हम कभी मानते ही नहीं कि नाक कटी है । आपने किसी दूसरे के कार्यकाल में कटी देश की नाक को अपनी मान कर उसे फिर से लाकर सर्जरी करवाकर जुड़वा लिया । चलो इज्ज़त बची और लाखों पाए । अब इस विजय का बहाना बनाकर अफगानिस्तान से निकलना आसान हो जाएगा । वियतनाम में तो बड़ी भद्द हुई थी ।

हम तो यही सोच कर हैरान हैं कि इस ग्लोबल-गाँव हो चुकी छोटी सी दुनिया में छः फुट लंबे दुबले-पतले से आदमी को नहीं ढूँढ़ पाए । हमारी पुलिस को ठेका दे दिया हो तो अब तक दस-पन्द्रह ओसामाओं को पकड़ कर आपके सामने हाज़िर कर देती । आप कह सकते हैं कि वे असली थोड़े ही होते ? ठीक है, ओसामा तो एक है, दस-पन्द्रह कैसे हो सकते हैं ? मगर हमारे यहाँ एक रक्त-बीज नाम के राक्षस का किस्सा आता है जिसके रक्त की जितनी बूँदें गिरती थीं उतने ही रक्त-बीज और पैदा हो जाते थे । यह सब प्रतीकात्मक है पर है विचारणीय क्योंकि ओसामा एक विचारधारा की उपज है । भले ही वह विचारधारा कैसी भी हो । वरना केवल पैसे के लिए कोई मानव-बम नहीं बनता । इसलिए यदि ओसमाओं के 'रक्त-बीज' को खत्म करना है तो घृणा की विचारधारा को सभी स्तरों पर समाप्त किया जाना चाहिए, फिर चाहे वह धर्म की हो या रंग की हो या देश की हो । मानव को मानव समझे बिना यह दुनिया शांत और सुरक्षित नहीं हो सकती ।

बुश साहब वैसे बहुत बहादुर हैं । हमला होते ही बदला लेने निकल पड़े और पूरे आठ साल तक गरजते रहे । पर हमें शुरु से ही लगता था कि यह इनके बस का काम नहीं है । क्योंकि जब आदमी बूढ़ा हो जाता है तो उसे कोई भी पुरानी प्रेमिका आसानी से धोखा दे सकती है । उम्र बढ़ने पर प्रेमी, यदि बर्लुस्कोनी की तरह घुटा हुआ नहीं हुआ तो, सोचता है कि अब पता नहीं दूसरी मिलेगी कि नहीं सो पुरानी वाली से ही निभाना चाहता है । और इस निभाने के चक्कर में ही प्रेमिका और भी कइयों से टाँका भिड़ा लेती है । पुराना प्रेमी पलंग पर होता है तो नया बेड के नीचे छुपा हुआ अपनी बारी का इंतज़ार करता रहता है । सफल प्रेमिका वही है जो एक साथ कई प्रेमियों को उलझाकर रखे । पाकिस्तान की भूमिका पर यह रूपक फिट बैठता है । वह बुश और ओसामा दोनों को निभाता रहा और अब भी उसने अपने को ओसामा वाले कांड से बिलकुल अलग करके अपने यहाँ के आतंकवादियों को भी छिटकाया नहीं है ।

आप जवान हैं इसलिए आजकल की प्रेमिकाओं को अच्छी तरह से समझते हैं । इसलिए आपने उसके प्रेमी को उसके बिस्तर के नीचे से ही बरामद कर लिया । हम तो पहले से ही जानते थे कि यह संत वहीं होगा पर पता नहीं क्यों हमारी बात को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया । हो सकता है कि गंभीरता से लिया भी हो तो माना नहीं क्योंकि सोचा हो कि ब्राह्मण कहीं इनाम न माँगने लग जाए पर अब हमारा अनुमान सच सिद्ध हो गया है ।

आप को अभी बहुत समय अमरीका की राजनीति में रहना है और बहुत से ओसामाओं को पकड़ना है । इसलिए बताते हैं कि कभी ऐसी प्रेमिकाओं के चक्कर में न पड़ें और यदि किसी से नैना लड़ भी जाएँ तो फटाफट शादी करके पाँच-चार बच्चे पैदा कर देने चाहिएँ कि वह किसी और को पटाने लायक ही नहीं रहे जैसे कि सोवियत रूस के विघटन के बाद नए समीकरणों के अनुसार अमरीका ने भारत के साथ किया ।

आपने ओसामा के शव को जल-समधि भी फटाफट दिलवा दी । ठीक भी है, ऐसे काम को फटाफट ही निबटा देना चाहिए । पता नहीं कब कोई मानवाधिकार का मुद्दा उठ खड़ा हो । सद्दाम को तो जब फाँसी दी गई तो लोग उसका मजाक उड़ा रहे थे , गाली निकाल रहे थे और फोटो खींच रहे थे । मगर आपने बहुत शालीनता बरती । जल-समाधि देने से पहले मन्त्र पढ़े गए, उनका अरबी में अनुवाद भी किया गया और ओसामा को नहलाया भी गया यदि नहीं भी नहलाते तो समुद्र में कौन सी पानी की कमी थी । लोग सोचते हैं अब उसका कोई मज़ार या समाधि बनाना संभव नहीं है । मगर किसी का असली मज़ार तो दिलों में होता है । मन से ऐसे दुर्विचार निकलें तो बात बने ।

२-५-२०११

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Feb 13, 2011

लिखे कोई, पढ़े कोई - संयुक्त राष्ट्र संघ में विदेश मंत्री कृष्णा


आज अखबार खोला तो पहले ही पेज पर छपा था- संयुक्त राष्ट्र संघ में विदेश मंत्री कृष्णा पुर्तगाल वाले का भाषण पढ़ने लगे और पूरे तीन मिनट तक पढ़ते रहे । जब उनके सहयोगी सूरी ने याद दिलाया तो फिर ठीक किया । जैसे ही तोताराम आया तो हमने उससे कहा- देख ली अपने रहनुमाओं की काबिलियत ? पा लिया मौलिकता का परिचय ?

तोताराम जोर से हँसा और बोला- तुझे यह भ्रम हुआ ही कैसे कि नेता मौलिक होते हैं ? सब किसी और का ही लिखा पढ़ते हैं । पहले भाजपा वाले सोनिया जी का मज़ाक उड़ाया करते थे कि वे लिखा हुआ भाषण पढती हैं । बाद में पता लगा कि अडवाणी जी भी किसी कुलकर्णी जी का लिखा भाषण पढ़ते हैं । नेताओं को रोजाना इतने भाषण देने होते हैं, इतने सन्देश भेजने होते हैं तो उनके पास कहाँ तो इतना ज्ञान है और कहाँ इतना समय । ये सब काम तो नीचे वाले पी.ए., शी.ए. करते रहते हैं । वे तो दस्तखत करते हैं और कभी कागज ज्यादा हुए तो दस्तखत भी स्केन किए हुए ही छाप दिए जाते हैं । नोटों पर क्या वास्वव में रिज़र्व बैंक का गवर्नर साइन करता है ? जब विधान सभा या लोकसभा के सत्र में राज्यपाल या राष्ट्रपति भाषण पढ़ते हैं तो वह सत्ताधारी पार्टी की तरफ से लिखा जाता है । नेताओं के असली भाषण और विचार तो वे होते हैं जो किसी स्टिंग ऑपरेशन में टेप किए जाते हैं ।

और फिर मान ले कृष्णा जी ने पुर्तगाल वाले का भाषण पढ़ भी दिया तो क्या हो गया ? वैसे यदि वे अपना लिखा भाषण भी पढ़ते तो क्या फाड़ कर एक के दो कर देते । होगा तो वही जो पाकिस्तान, अमरीका और चीन चाहेंगे । हाँ, तुम्हारी यह बात मानी जा सकती है कि ध्यान रखना चाहिए । मगर भैया, बड़ी जगह हो, बड़े लोगों के बीच में पढ़ना या बोलना हो तो आदमी उक-चुक हो ही जाता है । पहली बार जब एक पत्नी पति को पत्र लिखती है तो आपके ‘चरणों की दासी’ की जगह आपके ‘प्राणों की प्यासी’ लिख जाती है । एक बार एक महिला तलाक के मामले में कोर्ट में हाजिर हुई तो घबराहट में कह गई- जज, साहब आप मुझे तलाक दे दीजिए । जज साहब कहने लगे- यह नहीं हो सकता । तलाक तो वही दे सकता है जिसने आप से शादी की है । मगर आप घबराइए नहीं, शांत भाव से अपनी बात कहिए । तो बोली- क्या बताऊँ जज साहब, यह मेरा पहला-पहला तलाक है ना ।

जिस आदमी के पास अपने विचार होते हैं तो उसे किसी का लिखा हुआ भाषण पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती । गाँधी जी कभी लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते थे, नेहरू जी भी एक्सटेम्पोर ही बोलते थे । अटलजी जब हिन्दी में बोलते थे तो अपना लिखा हुआ बोलते थे मगर जब अंग्रेजी में बोलना होता तो किसी और का लिखा ही पढ़ते थे । अपने देश का बजट-भाषण भी तुम समझते हो कि वित्तमंत्री का लिखा हुआ होता है ? वह भी यहाँ के उद्योगपतियों और वर्ल्ड बैंक वालों का लिखा हुआ होता है । फिल्म में तुम जिस डायलाग को सुन कर गदगद हो जाते हो, जिस गीत पर तुम झूम जाते हो उसे न तो हीरो गाता है, न कम्पोज करता है और न ही उसका लिखा होता है । वह तो प्ले बैक सिंगर, गीतकार और संगीतकार की कला का कमाल है । और श्रेय मुफ्त में ले जाता है हीरो ।

आजकल कई अखबारों के मालिक दार्शनिक और वेदों के विद्वान के रूप में छाये हुए हैं, तो वे भी किसी और के बल पर ही । लिखता अखबार का कोई कर्मचारी है और छपता है मालिक के नाम से । गुजरात के एक प्रसिद्ध संगीत निर्देशक थे । दूर-दूर से कई गायक उनके पास चांस की आशा में आते थे और वे उनकी धुनें चुराकर फिल्मों में पेल देते थे । कई संपादक नए लेखकों की रचनाएँ अपने नाम से छाप देते हैं । बेचारा छोटा लेखक कहाँ गुहार लगाने जाए । मन मार कर रह जाता है । अरे, अमरीका के राष्ट्रपति का भी शपथ-ग्रहण का भाषण कोई और ही लिखता है तथा राष्ट्रपति को कई-कई बार उसकी रिहर्सल करवाई जाती । जब वह स्टेज पर बोल रहा होता हो तो भले ही कागज दिखाई न दे मगर वह एक टेलेप्रोम्प्टर ही पढ़ रहा होता है । हम इसे उस वक्ता की योग्यता मान कर प्रभावित हो जाते हैं । और टेलेप्रोम्प्टर के खराब होने पर बौखला जाता है ।

हमने कहा- तोताराम, तो फिर नेताओं के असली विचार और भाषा-शैली क्या होती है ?

तोताराम ने कहा- एक बार एक राजा के दरबार में एक विद्वान आया जो कई भाषाएँ बोलता था । राजा जानना चाहता था कि इसकी मातृभाषा कौन सी है ? कोई भी पता नहीं लगा पाया । तो एक चतुर मंत्री ने रात को सोते हुए विद्वान पर अचानक पानी की एक बाल्टी डाल दी । विद्वान गुस्से में चिल्ला उठा- कौन है बे, साले ?

मंत्री ने कहा- महाराज, इसकी मातृभाषा हिन्दी है ।

१३-२-२०११

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Nov 19, 2010

जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी


चार-पाँच दिन से अखबार में ओबामा-ओबामा पढ़कर खोपड़ी भन्ना गई । मीडिया की हालत भक्त प्रह्लाद जैसी हो रही थी- खंभ में राम, खड्ग में राम, मुझमें राम, तुझमें राम । जहाँ देखूँ तहँ राम ही राम । ऐसी हालत तो राम के वनवास की अवधि समाप्त होने पर अयोध्यावासियों की भी नहीं हुई होगी । जैसे ही ९ तारीख़ को तोताराम आया, हम उसी पर पिल पड़े- पहुँचा आया, महामहिम को जकार्ता ?

वह पट्ठा भी कौन-सा चूकने वाला था, बोला- क्या किया जाए, जब प्लेन में सलमान खुर्शीद के लिए ही जगह नहीं थी तो मैं कहाँ से घुस जाता । हाँ, जगह होती तो पहुँचा आने में क्या बुराई थी । वे जब हमारे लिए इतनी दूर से लाव-लश्कर के साथ, इतना खर्चा करके, उड़ कर आ सकते हैं तो क्या हम इतने गए-गुजरे हैं कि जकार्ता तक छोड़ कर भी नहीं आ सकते ?

हमने कहा- वे न तो तेरे दर्शन करने आए थे और न ही तुझे दर्शन देने । उनके देश की तो आजकल हालत ज़रा ऐसे ही चल रही है सो कुछ न कुछ बेचने आए थे सो बेच गए दस अरब डालर का माल और रोज़ ९०० करोड़ का सुरक्षा व्यवस्था का खर्चा करवा गए सो अलग ।



तोताराम कहने लगा- अरे, हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं । हमारे लिए दस अरब क्या बड़ी चीज़ है । ७९ हज़ार करोड़ रुपए तो हमने अभी-अभी खेलों में खर्चे हैं और यदि मिल जाए तो ओलम्पिक करवाने का माद्दा भी रखते हैं । हजारों करोड़ का तो हमारे यहाँ अनाज खुले में पड़े सड़ जाता है । आज मित्र यदि थोड़ा परेशानी में है तो क्या हुआ ? उसके यहाँ आजकल बहुत बेकारी चल रही है, सौ-पचास हजार लोगों को रोजगार मिल जाएगा । लोग दुआ देंगे । वैसे अमरीका के लिए तेरे ये दस अरब डालर कोई बड़ी रकम भी नहीं है । तुझे पता है, उस पर आज भी 1345 अरब डालर का कर्जा है । यह तो घर आए को हाथ का उत्तर देने वाली बात थी ।

हमने कहा- बेकार तो अपने यहाँ भी चार करोड़ हैं । उनकी फ़िक्र क्यों नहीं करते ?

कहने लगा- अपने यहाँ तो लोगों को आदत है बेकारी की । नौकरी पर होते हैं तो ही कौन-सा काम करके निहाल करते हैं ? और फिर ‘नरेगा’ और ‘बी.पी.एल.’ में सारी सुविधाएँ दे तो रखी हैं । वहाँ के लोगों का खर्चा बहुत है भैया । बिना दारू पिए लोगों से खाना नहीं खाया जाता । कार भी सभी को मेंटेन करनी पड़ती है । सो क्या हो गया थोड़ी-बहुत मदद कर दी तो । तुलसीदास जी ने भी कहा है- “जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी । तिनहिं विलोकत पातक भारी । । ”

और फिर यह १० अरब डालर कोई दान में थोड़े ही दिए हैं । अगला बदले में माल भी तो देगा । भले ही लोगों को दाल-रोटी न मिलें पर शक्ति संतुलन के नाम पर हथियार तो खरीदने ही पड़ेंगे, अमरीका से नहीं तो फ़्रांस से, फ़्रांस से नहीं तो ब्रिटेन से । और फिर अपने यहाँ के लोगों को भी तो रोजगार मिलेगा ही- इन प्लेनों को चलाने में, इनकी सफाई करने में, इनमें तेल-पानी भरने में । अमरीका ने भी तो पी.एल. ४८० के तहत हमारी मदद की थी जब स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय हमारे यहाँ अनाज की कमी थी तब । भले ही गेंहूँ लाल था, आटा गूँदने पर रबड़ की तरह खिंचता था, थोड़ी ही देर में रोटी एकदम चीमड़ हो जाती थी, उसके साथ गाजर घास के बीज भी आ गए थे पर बखत पर काम तो चल गया । और फिर तू यह क्यों भूल जाता है कि ओबामा जी ने हमें बराबर का दर्जा दिया है । संसार से आतंकवाद मिटाने के लिए हमारे महत्व को रेखांकित किया है ।

हमने कहा- तोताराम, हमें तो लगता है, अमरीका हमें बाँस पर चढ़ा रहा है । हमें अफ़गानिस्तान में उलझाकर खुद खिसक जाएगा । हम में वही मियाँ जी वाली होगी कि 'नमाज़ छुड़ाने गए थे और रोज़े गले पड़ गए' ।

तोताराम ने एक ही वाक्य में हमारा मुँह बंद कर दिया, बोला- जब इतना ही डर लगता है तो महाशक्ति बनने का मोह क्यों पाल रहा है ? जब अपने दरवाजे सँकडे हों तो महावतों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए । महाशक्ति का मतलब होता है बात और बिना बात हर किसी फ़टे में टाँग फँसाना, न खुद जीना और न दूसरों को सुख से जीने देना ।

१०-११-२०१०

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Nov 13, 2010

नारियल, कुत्ता, ओबामा और तोताराम


पत्नी का दिवाली की सफाई का कार्यक्रम आज छोटी दिवाली तक भी चल ही रहा था । इसलिए हो सकता है चाय मिलने में अधिक विलंब हो, सो हमने कहा- तोताराम, आज उधर बगल वाले प्लाट में पेड़ के नीचे बैठते हैं । वहाँ जाकर देखा तो पाया कि नीम के पेड़ के नीचे पटाखों के ढेर सारे छिलके बिखरे पड़े थे । सो कुर्सियाँ खींच कर बेल के पेड़ के नीचे सरका ली, मगर तोताराम दूर ही खड़ा रहा ।

हमने उसका हाथ पकड़ कर खींचा- आ जा, बैठ जा । अभी चाय आने में पता नहीं कितनी देर लगेगी ।

कहने लगा- कोई बात नहीं, मैं यहीं खड़े-खड़े इंतज़ार कर लूँगा ।

हमें बड़ा अजीब लगा, पूछा- क्या किसी ने तुझे खड़ा रहने की सजा दे रखी है ? बोला- नहीं, ऐसी बात नहीं है पर ऊपर देख, एक सूखा-सा बेल का फल लटक रहा है । क्या पता, मैं इसके नीचे बैठूँ और वह फल मेरे सर पर गिर पड़े ।

हमें हँसी आ गई । अरे, यह सब 'काकतालीय न्याय' वाली बात है । क्या कहीं कौए के बैठने से पेड़ की डाल टूटती है ? कभी संयोग हो गया तो इसका मतलब यह नहीं है कि जब-जब भी कौआ बैठेगा तब-तब डाल टूटेगी ही । हमने तो कभी नहीं सुना कि पेड़ के नीचे बैठे किसी व्यक्ति का सर फल गिरने से फूट गया हो । यह तो ज़रूर पढ़ा है कि सिद्धार्थ को बरगद के पेड़ के नीचे बैठने से ज्ञान प्राप्त हुआ था । न्यूटन पेड़ के नीचे बैठा था तो पेड़ से गिरने वाले सेव को देखकर उसे गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत पता चल गया । प्राचीन काल में पेड़ों के नीचे बैठकर ही विद्यार्थी ऊँचे से ऊँचा ज्ञान प्राप्त कर लिया करते थे । और तू है कि पेड़ के नीचे थोड़ी देर बैठने से ही घबरा रहा है । अरे, हमारी तो संस्कृति ही पेड़ों के नीचे विकसित हुई है । तभी तो 'आरण्यक' नामक ग्रन्थ हमारे यहीं पाए जाते हैं ।

कहने लगा- मास्टर, ज़माना बहुत आगे बढ़ गया है और उसी हिसाब से उसकी समस्याएँ भी । तुमने पढ़ा नहीं कि ओबामा जी के आने से पहले मणि-भवन के नारियल के पेड़ों के फल तोड़ दिए गए हैं । क्या पता, ओबामा जी का घुसना हो और फल का गिरना हो और अरबों रुपए खर्च करके किए जा रहे उनके स्वागत के रंग में भंग पड़ जाए । भले ही नारियल का फल बहुत बड़ा नहीं होता और उसके अपने आप गिरने की संभावना भी नहीं होती फिर भी भाग्य का कुछ भी पता नहीं । यदि गिर जाए तो बड़ी तगड़ी चोट लगती है । क्या पता, ब्रेन हेमरेज हो जाए । तो यह तेरा बेल का एकमात्र फल क्या पता, मेरे सर पर ही न गिर पड़े ।

हमने कहा- तो तू अपने को ओबामा समझ रहा है जिसके सर को पेड़ों पर लगे फलों से भी खतरा हो । यदि इतना ही डर लग रहा है तो तू भी अपने साथ पासपोर्ट बनवाकर किसी सूँघने वाले कुत्ते को अपने साथ ले आता ।

बोला- भले ही आजकल पुलिस आदमी से ज्यादा कुत्तों पर विश्वास करने लग गई हो पर कोई भी ज़मीन पर खड़ा कुत्ता नारियल के पेड़ पर लगे फल में घुसे विस्फोटक को नहीं सूँघ सकता ।

हमने कहा- कोई कुत्ता नारियल के फलों में घुसे विस्फोटक को नहीं सूँघ सकता और जब फलों को कटवाना ही था तो कुत्ते को लाने का खर्चा करने की क्या ज़रूरत थी । और वैसे भी अपने यहाँ कहावत भी तो है कि 'कुत्ता नारियल का क्या करेगा' ?

तोताराम कहने लगा- क्या पता, बुश साहब की तरह राजघाट जाने से पहले समाधि की सुरक्षा जाँच करवाने के लिए कुत्ते को उस पर चढ़ाना हो ? मगर ओबामा जी गाँधी जी के भक्त हैं । वे ऐसा तो हरगिज नहीं करेंगे ।


अभी तक तोताराम पेड़ के नीचे आकर नहीं बैठा तो हमें ही स्टूल को धूप में लाना पड़ा । हालाँकि धूप बहुत तेज नहीं थी फिर भी कार्तिक की धूप है, सुहानी भी कैसे हो सकती है । हमने बात जारी रखते हुए कहा- तोताराम, तू बिना बात ही डर रहा है । आज तक बता किस महान पुरुष की मौत पेड़ से गिरे फल की चोट से हुई है । लिंकन, कैनेडी, महात्मा गाँधी, इंदिराजी, राजीव गाँधी, बेनजीर, मुजीब, भंडार नायके सभी तो षडयंत्रों का शिकार हुए हैं ।

बोला- तुझे नहीं पता, ये खुराफाती लोग बड़े चालाक हैं । चोर चौकीदार से ज्यादा चतुर होता है । गृहस्थ को तो दिन भर काम करके रात को आराम करना होता है ताकि दूसरे दिन फिर काम पर जा सकें, पर इन खुराफातियों को कौन सी ड्यूटी करनी होती है । इन्हें तो सारे दिन ये खुराफातें ही सोचनी हैं । किसने सोचा होगा कि सर्जरी करके कुत्ते के पेट में विस्फोटक फिट कर दो और फिर रिमोट से उनका विस्फोट कर दो । यह बात और है कि संयोग से वह कुत्ता जहाज में बैठाए जाने से पहले ही फट गया । प्रिंटर के कार्ट्रिज में स्याही की जगह विस्फोटक भरकर कार्गो प्लेन में चढ़ा दो और मौका देखकर रिमोट से विस्फोट कर दो । ये तो तक्षक के भी बाप हैं जो परीक्षित को काटने के लिए फल में कीड़ा बनकर परीक्षित के पास पँहुच गया और दे ही दिया आतंकवादी गतिविधि को अंजाम ।

हमने पूछा- तोताराम, इन खुराफातियों में इतनी अक्ल और ट्रेनिंग कहाँ से आती है ? क्या इसका कोई स्कूल होता है ?

बोला- शीत-युद्ध के समय अमरीका ने ही रूस को घेरने के लिए उसकी सीमा से लगे मुस्लिम देशों में ऐसे खुराफाती स्कूल खुलवाए थे और इन्हें बहुत सहायता भी दी थी । अब ये आत्मनिर्भर हो गए है और अमरीका के लिए सिर दर्द भी । गलती किसी की और नारियलों से बचते फिर रहे हैं बेचारे ओबामा । इसी को कहते हैं 'बंदर की बला तबेले के सर' ।

हमने कहा- चलो भई, कब-कब आते हैं ऐसे मेहमान, दस-बीस पेड़ों के फल ही तो कटे हैं । यहाँ तो छोटे-मोटे आयोजन के लिए ही जाने कितने पेड़ काट दिए जाते हैं । आजकल तो वैसे भी इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया जा रहा है तो जाने कितने हजार एकड़ कृषि भूमि और कितने लाख पेड़ बलि चढ़ रहे हैं इस विकास की ।

तेरे साथ हम भी कामना कर ही देते हैं कि 'यात्रा सफल हो' पर असली पता तो कुछ दिनों के बाद लगेगा जब सब अपने-अपने हाथ सँभालेंगे कि मिलाए गए कौन-कौन से हाथ सलामत हैं और कौन से गायब ।

४-११-२०१०

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Nov 1, 2010

हैप्पी दिवाली, ओबामा जी


ओबामा जी,
नमस्ते । इस बार आप दिवाली पर भारत में होंगे । धन्न भाग । आपसे पहले बुश साहब ने भी दिवाली की शुरुआत की थी मगर मेन व्हाईट हाउस में नहीं बल्कि उससे जुड़ी इमारत 'इंडियन ट्रीटी रूम' में । यह वैसे ही था जैसे हमारी भाभी लहुसन नहीं खातीं तो भाई साहब को लहसुन की चटनी स्टोव पर और अलग से रखे बर्तनों में बनानी पड़ती है, फिर भी हम तो इसी में धन्य हो गए थे । इसके बाद आपने १४ अक्टूबर २००९ को धन तेरस को व्हाईट हाउस के ईस्ट रूम में दीया जलाकर दिवाली मनाई और अब आप ७ नवंबर को मुम्बई में दिवाली मनाएँगे । वैसे बताते चलें कि वास्तव में दिवाली ५ नवंबर को है लेकिन अमरीका में त्यौहार अपने आसपास के संडे के हिसाब से मनाया जाता है । बिना बात एक कार्य दिवस का व्यापारी को नुकसान क्यों हो ? आपके यहाँ भारत मूल के कोई तीस लाख लोग हैं मगर एक दिन के लिए भी दिवाली की छुट्टी नहीं होती । हमारे यहाँ की बात और है । यहाँ तो क्रिसमस की छुट्टी २५ दिसंबर को ही होती है । किसी आसपास के संडे पर नहीं टरकाया जाता । स्कूलों में तो कम से कम एक हफ्ते की छुट्टियाँ होती हैं । कुछ भी हो, आपका आना खुशी की बात तो है ही । और कहें तो खुशी से मर जाने का दिन है ।

दरअसल बात यह है कि इस देश को एक हज़ार साल से विभिन्न आक्रमणकारियों के जूते खाने का दारुण अनुभव है सो यह ज़रा सी सहानुभूति और आदर से ही गदगदायमान हो जाता है । भले ही भारत में हिंदी की दुर्गति हो रही हो मगर जब एक अंतरिक्ष यान में कई देशों के साथ भारत का भी झंडा और हिदी में लिखे दो शब्द चन्द्रमा पर भेजे गए तो हम बल्लियों उछले थे । जब आप चुनाव लड़ रहे थे तो लोग खबर उड़ा लाए कि आप हनुमान जी के भक्त हैं क्योंकि आपके हाथ में जो ब्रेसलेट है उसमें एक बंदर की शक्ल जैसी कोई चीज है । इससे उत्साहित होकर एक हनुमान-भक्त ने आपको हनुमान जी की सोने का पानी चढ़ी एक मूर्ति भी भिजवा दी थी । अब यह पता नहीं कि वह आप तक पहुँची या नहीं ।

तो आप ऐन दिवाली के दिन नहीं भी तो उसके आसपास आ रहे हैं, यही बहुत है । दिवाली के बाद महाजन नई बही शुरु करते हैं । अच्छा है - नई बही और दस बीस हज़ार करोड़ के सौदे से शुरुआत । आपसे पहले हमारे पुराने राजा ब्रिटेन के प्रधान मंत्री कैमरून साहब भी आए थे और तीन हज़ार करोड़ का सौदा कर गए । और इस सौदे से पहले दो चार अच्छी-अच्छी बातें करनी थीं सो वे भी कीं । अच्छी बातें मतलब कि भारत से 'पाकिस्तान नामक बीमारी' के बारे में सहानुभूति दिखाना । वैसे सौदा करके यहाँ से ब्रिटेन पहुँचते ही ज़रदारी का स्वागत बड़े जोश-ओ-खरोश से किया और थूक कर चाटने जैसा एक बयान दे दिया क्योंकि धंधा तो उसके साथ भी करना है । सुनार को ग्राहक और चोर दोनों का ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि चोर से चोरी का सोना सस्ते में खरीदना है और ग्राहक को खोट मिलाकर मार्केट रेट पर बेचना है । उसके लिए तो दोनों ही महत्वपूर्ण हैं । कैमरून से पहले, जब ब्लेयर प्रधान मंत्री थे तब वे भी आए थे और चार हजार करोड़ का सौदा कर गए थे ।

आपके बाद छः दिसंबर को फ़्रांस के राष्ट्रपति आ रहे हैं । उन्हें भी कोई न कोई सौदा पटाना है । फिर आएँगे दिसंबर मध्य में रूस के राष्ट्रपति । वे भी कोई न कोई सौदा करके ही जाएँगे । दिसंबर में ही चीन के प्रधान मंत्री को भी बुलाने की कोशिश हो रही है क्योंकि वह भी जब-तब छेड़-छाड़ करता रहता है सो उसे भी कहना है कि भाई, क्यों ज्यादा परेशान कर रहा है ? तू भी दो-पाँच हजार करोड़ का माल हमें टिका दे । वैसे भी चीन का घटिया माल इस देश में चोरी छुपे और खुले भी आ ही रहा है । अब कोई विदेशी माल का बहिष्कार करके स्वदेशी आन्दोलन तो गाँधी की तरह चलाना नहीं है । सस्ते माल में मुनाफा ज्यादा होता है । और व्यापारी को मुनाफे से मतलब है फिर चाहे वह अमरीका का हो या भारत का । देश का क्या है ?

सो आप भी सौदा करने आ रहे है । पहले जब शीत युद्ध का ज़माना था तब अमरीका का कोई भी राष्ट्रपति न तो भारत की इतनी मुँहदेखी बड़ाई करता था और न ही इतनी जल्दी-जल्दी भारत आता था क्योंकि तब भारत रूस से हथियार खरीदता था । तब भी हमें इसलिए हथियार खरीदने पड़ते थे क्योंकि आप पकिस्तान को मुफ्त में या सस्ते में हथियार दिया करते थे । वैसे अब भी आपने कौनसा उसे हथियार देना बंद कर दिया । उसे देंगे तो हमें भी शक्ति संतुलन के नाम पर हथियार खरीदने ही पड़ेंगे । अब यही तो तरीका बच गया है, दुनिया में अपने उपनिवेश बनाकर शोषण करने वाले गोरों के लिए, अपनी आमदनी बनाए रखने का । वैसे सभी जानते हैं कि इन देशों को हथियारों से ज्यादा औजारों और मितव्ययी होने की ज़रूरत है ।

राजस्थानी में एक कहावत है- ‘गाँव बावळी नै बदै ना और बावळी गाँव नै बदै ना' मतलब कि पगली की गाँव नहीं सुनता और पगली गाँव की नहीं सुनती । सो हमारी भी कोई नहीं सुनेगा क्योंकि सबको अपने-अपने धंधे से मतलब है मगर क्या बताएँ, हम भी आदत से मजबूर हैं । तो आप आ रहे हैं और अखबार आपकी भव्यता का आतंक फैलाने वाली खबरें छाप कर गौरवान्वित हो रहे हैं । अखबारों का क्या है ? वे तो मोनिका लेवेंस्की, ब्रिटनी और लेडी गागा सभी की चड्डी-चोलियों को उसी भक्ति भाव से छापते हैं जिस तत्परता से होली-दिवाली के विज्ञापनी परिशिष्ट । जब मंदिर ही प्रसाद और दर्शन कराने का धंधा करते हैं, तथाकथित संत टिकट लगाकर योग सिखाते हैं या च्यवनप्राश बेचते हैं तो फिर मीडिया में तो सेठों का अरबों रुपया लगा है । वह समाज सुधार के लिए है क्या ? दो पैसे कमाने के लिए है । और सेक्स, सनसनी और अजूबे बेचने से अच्छा और सुरक्षित कुछ नहीं हो सकता ।

मिडिया छाप रहा है कि आप जिस कमरे में ठहरेंगे, उस कमरे में मैडम के लिए विदेशों से मँगवा कर सौंदर्य प्रसाधन रखे गए हैं और आपके लिए विशेष शराबें रखी गई हैं जिनके एक गिलास की कीमत ३००० हज़ार रुपए है । वैसे हमने कुछ दिन पहले एक समाचार पढ़ा था कि व्हिस्की की एक बोतल दो करोड़ में नीलाम हुई है । हमारे यहाँ भी गाज़ियाबाद में दिवाली पर भ्रष्टों द्वारा भ्रष्टों को उपहार में दिए जाने के लिए चाँदी की बोतल में पेक की गई ७५० मिलीलीटर व्हिस्की ५१ हज़ार में बिक रही है । विजय माल्या ने भी पिछली दिवाली को सभी सांसदों को ब्लेक डॉग की एक-एक बोतल व्हिस्की भेंट दी थी । प्रभात झा नाम के एक सांसद ने बोतल लौटा दी । मगर और किसी ने भी चूँ तक नहीं की । चुपचाप दिवाली सेलेब्रेट करते रहे । मतलब कि झा को छोड़ कर सारे के सारे बेवड़े हैं ।

आपके बारे में और भी छापा गया है कि मुख्य रसोइए हेमंत ओबेराय आपकी मनपसंद डिशें तैयार कर रहे हैं और उनका मार्ग दर्शन करने के लिए आपका विशेष रसोइया आ रहा है । यहाँ आपकी सवारी के लिए जो कार आ रही है उसके बारे में भी बहुत कुछ छापा है जिसका वर्णन करना कुछ ज्यादा ही विस्तार हो जाएगा मगर इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह कार मौत के अलावा सभी खतरों से सुरक्षित है । वैसे जब बुश यहाँ आए थे तो सुना है कि वे अपना पानी भी अपने साथ अमरीका से लाए थे और उनका मल-मूत्र भी एक विशेष टायलेट में विसर्जित हुआ और जिसे वापिस अमरीका ले जाया गया । साँस लेने के लिए हवा का हमें पता नहीं कि वे अमरीका से ही लाए थे या यहीं की हवा में साँस ली । आज से साढ़े दस साल पहले होली के मौके पर क्लिंटन भी आए थे मगर न तो हिलेरी को साथ लाए और न ही मोनिका लेवेंस्की को । सारा मज़ा किरकिरा कर लिया होली का । शायद इसी गम में मौर्या होटल में विशेष रूप से रखी गई शराब को भी हाथ तक नहीं लगाया ।

आप भी उसी मौर्या होटल में ठहरेंगे । जब क्लिंटन आए थे तब हम दिल्ली में ही थे, दिल्ली कैंट में । सो धौला कुआँ की तरफ आना-जाना होता रहता था । एक दिन हमने देखा कि मौर्या होटल के सामने की सड़क पर लोग फूलों के गमले रख जा रहे हैं । कारण पूछने पर पता लगा कि क्लिंटन आने वाले हैं । सो अब भी वह इलाका सज रहा होगा । एक दिन जुलाई की दोपहर को हम अपने मित्र के स्कूटर के पीछे बैठे इसी मौर्या होटल के सामने से गुजर रहे थे । हल्की-हल्की बूँदाबाँदी हुई थी । सड़क का पानी ढलक कर बरसाती नाले में जा रहा था । एक पागल सा लगने वाला गरीब आदमी उस पानी को अपनी अँजुरी में भरकर पी रहा था । उन दिनों पानी का एक गिलास पचास पैसे का मिलता था और निश्चित ही उस आदमी के पास इतने पैसे नहीं थे । और पानी की प्याऊ लगवाना तो पुराने ज़माने की पिछड़ी बात है । उसका इस उपभोक्तावाद और मुक्त बाज़ार में कहाँ स्थान ? इस पानी पीने का कारण उसका पागलपन नहीं, गरीबी थी क्योंकि कोई भी इतना पागल नहीं होता । तब भी यह देश एक उभरती शक्ति और सबसे बड़ा लोकतंत्र और सबसे बड़ा बाज़ार था । अब तो राष्ट्र मंडल खेलों के चक्कर में ऐसे ग़रीबों को दूर ले जाकर पटक दिया था । अब तक तो क्या लौट कर आए होंगे ? आ गए होंगे तो भी मौर्या होटल तक तो उनका पहुँचना असंभव है ।

आप अपने कार्यक्रम में मुम्बई में मणि भवन के उस संग्रहालय को भी देखेंगे जिसमें महात्मा गाँधी कभी रहे थे और स्वदेशी, खिलाफत और असहयोग जैसे आन्दोलनों की रूपरेखा बनाई थी । देख लीजिए । अब इस देश में गाँधी इतना ही बच गया है ? हो सकता है कि किसी दिन इतना भी न बचे क्योंकि हम बड़ी तेजी से प्रगति कर रहे हैं और इस प्रगति में उस बूढ़े के लिए कोई जगह नहीं है । अब हमारे यहाँ भी स्कूल और कालेज के ४० प्रतिशत बच्चे दारू पीने लगे हैं, पढ़ाई की जगह स्कूलों में सौंदर्य प्रतियोगिताएँ और सेक्स एज्यूकेशन शुरु हो गई है, विश्वविद्यालयों में कंडोम बेचने वाली मशीनें लग गई हैं, कुँवारे मातृत्व, समलैंगिकता और लिव-इन-रिलेशनशिप के पक्ष में तथाकथित बुद्धिजीवी अभियान चला रहे हैं ।

आपका स्वर्ण-मंदिर जाने का कार्यक्रम भी था मगर आपके वहाँ के बुद्धिजीवियों ने बताया कि इससे गलत सन्देश जा सकता है । सर पर कपड़ा बाँधने से मुसलमान की सी झलक आ सकती है जो कि अमरीका के मुस्लिम-विरोधी लोगों को पसंद न आए । इससे पहले भी आपके नाइजीरिया में वहाँ की ड्रेस पहने हुए फोटो को लेकर चुनाव प्रचार में बड़ा हल्ला मचाया गया था । यह ठीक है कि आपके स्वर्णमंदिर जाने से सरदार प्रकाश सिंह बादल का कद कुछ और बढ़ जाता पर आप यहाँ न तो चुनाव के लिए कोई सर्व-धर्म-सम-भाव के लिए आ रहे हैं और न ही किसी तीर्थ यात्रा पर और न ही किसी का कद बढ़ाने । आप तो धंधा करने आ रहे हैं । सो उसी पर ध्यान देना है । फालतू के चक्करों में पड़ने से क्या फायदा । हाँ, यदि कोई दस-बीस हज़ार करोड़ का सौदा होता तो बात और थी । तब तो गुरूद्वारे में क्या, गटर में भी जाया जा सकता था ।

हमारे यहाँ की बात और है । हमारे यहाँ के नेताओं को ऐसे सर्व-धर्म-समभाव के नाटक करने में ही अपना भविष्य दिखाई देता है । जिसे देखो इफ्तार की दावत देने लग जाता है, भले ही कोई उन्हें एकादशी पर फलाहार न करवाए । हज़ पर सब्सीडी तो खैर मिलती ही है । वैसे हम आपको अपने बचपन की बातें बताते चलें । ये बातें आजादी के दस-पन्द्रह साल बाद तक की हैं । तब न तो किसी मुसलमान को किसी खास तरह की दाढ़ी रखने की ज़रूरत महसूस होती थी और न ही किसी हिंदू को चोटी और तिलक की । हम बीमार होते थे तो माँ मस्जिद में जाकर मुल्ला जी से डोरा बनवा लाती थी । शीतला माता के मेले में हिंदू मुसलमान सभी गाते हुए जाते थे । हमारे एक शायर मित्र हैं जो पूजा करते हैं । एक और कवि हैं बशीर अहमद मयूख जिन्होंने वेदों का उर्दू में अनुवाद किया है । वे अपने घर में राम, कृष्ण, शिव की मूर्तियाँ रखकर मंदिर बनाए हुए हैं । हमारे एक सहपाठी का नाम लीलाधर था । उसके यहाँ शादी में वे ही गीत गाए जाते थे जो हिंदुओं के यहाँ गाए जाते हैं । अब भी हमारे इलाके में बहुत से मुसलमानों के सरनेम पवार, चौहान, गौड़ आदि हैं । पर जब से अमरीका ने रूस को घेरने के लिए मध्यपूर्व में कट्टर पंथी इस्लाम को बढ़ावा दिया, मुसलमान काम के लिए अरब देशों में जाने लगे और उनके साथ पेट्रो डालर और कट्टरता आने लगी और फिर उसके ज़वाब में हमारे यहाँ के कुछ हिंदुओं ने कट्टरता में अपना राजनीतिक भविष्य देखना शुरु किया और उसकी परिणति मंदिर विवाद में हुई तब से इस देश की एकता को असली झटका लगा । जिसकी धमक आज सारी दुनिया में सुनाई दे रही है । और अमरीका भी अपने पैदा किए हुए इस जिन्न से बुरी तरह से घबराया हुआ है । सच पूछें तो साधारण आदमी आज भी कट्टर नहीं है और मिल कर रहना चाहता है ।


वैसे कोई भी राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री हो, आजकल उसे अपने देश के सेठों के लिए सामान बेचने का काम ही करना पड़ता है । चाहे आप हों या क्लिंटन या फिर किसी और देश का राष्ट्रपति हो । हम आपको कोई हथियार, कारें, कोकाकोला बेचकर तो पैसे कमा नहीं सकते । हमारे पास तो बेचारे पढ़े लिखे लड़के हैं जो सस्ते दामों पर आपके देशों में नौकरी कर रहे हैं और ऊपर से नस्ली घृणा का शिकार हो रहे है सो अलग । तिस पर मुक्त बाज़ार के मसीहा आप अपने ओहायो राज्य में आउट सोर्सिंग पर प्रतिबन्ध लगाते हैं । और अपने बच्चों के यह कहते हैं कि ये भारत वाले तुम्हारी नौकरियाँ छीन रहे हैं जैसे कि ये कोई डाकू हों । आपके देश को तो माल बिकवाने वाला चाहिए । उसे और किसी अच्छी बुरी बात से कोई मतलब नहीं , भले ही कोई राष्ट्रपति क्लिंटन की तरह लम्पट ही क्यों ना हो ।

खैर, जी आप बुरा नहीं मानिएगा । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, भले ही विकिलीक वाले को आपके देश में जान का खतरा हो ।

तो दिवाली की फिर बधाई । जय राम जी की ।

२९-१०-२०१०


पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Oct 24, 2010

बैंगलोर, बीजिंग और बराक ओबामा

ओबामा जी,
नमस्ते । पहले ग्रामोफोन हुआ करता था । अपने समय का एक बहुत ही चमत्कारी आविष्कार । किसी इक्के-दुक्के के पास ही हुआ करता था । बड़ा तामझाम था । कोई दस किलो की मशीन तिस पर उसके रिकार्ड (डिस्क),सुई जिसे दस-पाँच गानों के बाद बदलना पड़ता था और बीच-बीच में हेंडल घुमा कर चाबी भरना । इन सब के बावजूद क्या जलवा होता था ग्रामोफोन का ! लोग शादी-विवाह में लाउड स्पीकर पर रिकार्ड बजवाया करते थे । आप सोच रहे होंगे कि यह मास्टर किस लिए अमरीका के राष्ट्रपति को इस पुराने ग्रामोफोन के बारे में बता रहा है जब कि आज के युवकों ने न तो इसे देखा है और न ही गाने सुनने के लिए इसके मोहताज हैं । आज तो एक बीस ग्राम का मोबाइल फोन जेब में रखा और दो तार कान में घुसेड़े और हो गए चालू । मजे से इस भरी दुनिया से अलग । गाने सुनो, गर्दन हिलाओ, अँगुलियों से घुटने पर तबला बजाओ, और ज्यादा ही मन-पसंद गाना आ जाए तो कमर भी मटकाओ । कुछ पुराने लोग भले की समझें कि कहीं इस छोकरे को मिर्गी का दौरा तो नहीं पड़ने वाला है ?

बात यह है मियाँ, कि इस ग्रामोफोन में एक बड़ी खराब बात थी कि जब इसका रिकार्ड खराब हो जाता था तो फिर वह सुई उसकी कुंडली में घूम कर गाना सुनाने के बजाय बार-बार घूम कर एक ही जगह आती रहती थी तो गाना आगे बढ़ने की बजाय एक-दो शब्दों को ही दुहराने लगता था जैसे- 'एक दिल के..दिल के..दिल के...' जिससे दर्द भरे गीत को सुनते हुए भी लोगों को हँसी आ जाती थी । तब माइक पर रिकार्ड बजाने वाला दौड़कर आता और उसे आगे बढ़ाता या उस रिकार्ड की साइड बदलता था ।

अब हमें मुख्य बात पर आ ही जाना चाहिए वरना हो सकता है आपको गुस्सा ही आ जाए । बात यह है कि उस रिकार्ड की तरह हर आदमी, देश, सिद्धांत या धर्म के रिकार्ड भी, बिना नई और प्रगतिशील सोच के खराब हो जाते हैं और फिर जब चाहे वे किसी एक जगह पर आकर फिर दिल के..दिल के.. दिल के ..गाने लगते हैं जो पहले तो हास्य पैदा करता है और फिर चिढ़ । अमरीका का भी बार-बार अपने बच्चों को बैंगलोर और बीजिंग का डर दिखाना, बुश साहब के ज़माने का, खराब हुआ रिकार्ड है । आप इसे बार-बार बजा कर क्यों तमाशा करते हैं ? पर जब कोई नया कार्यक्रम नहीं होता या कुछ करते हुए नज़र आने की मज़बूरी आ पड़ती है या फिर आदमी बोर होने लगता है तो ऐसे समय में यह पुराना रिकार्ड ही काम आता है । जैसे कि कोई मेहमान आ जाए और उससे बात करने को कुछ नहीं हो तो मेजबान उसे कोई शादी या किसी कार्यक्रम का एल्बम पकड़ा देता है कि देखता रह बेटा और होता रह बोर । सो ऐसे पुराने रेकार्डों को भी कभी फेंकना नहीं चाहिए, पता नहीं कब काम आ जाएँ ?

जब आप सत्ता में आए थे तब आपको लगा होगा कि आप बहुत कुछ कर सकते हैं मगर अब आपको समझ में आ गया कि किया तो कुछ जा नहीं सकता तो समय बिताने के लिए यह बुश वाले रिकार्ड की अन्त्याक्षरी ही शुरु कर दी जाए । हमारे पड़ोस में भी जब कोई समस्या आ जाती है तो कश्मीर का पुराना रिकार्ड शुरु हो जाता है । जब चुनाव आते हैं तो कोई मंदिर और राष्ट्रीय संस्कृति और अस्मिता का रिकार्ड बजाना शुरु कर देता है तो कोई धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता-विरोध का अपना रिकार्ड शुरु कर देता है । किसी का अपना दलितों और मनुवादियों को जूते मारने का रिकार्ड है जिसे चुनाव के समय पर निकाल लिया जाता है । किसी को चुनाव के समय देश के विकास के लिए किसी दलित को प्रधान मंत्री बनाने की आवश्यकता अनुभव होती है मगर किसी दलित का नाम सुझाने की बात आती है तो पता चलता है कि उनके अलावा भारतीय राजनीति में कोई दलित है ही नहीं । जब अटल जी पहली बार विदेश मंत्री बने तो कहा करते थे कि अब वे भारत की विदेश नीति बदल देंगे पर फाइलें देखने पर पता चला कि संभव नहीं है सो उसी नेहरू जी वाली नीति पर ही चलते रहे । यह बात और है कि अब मनमोहन जी ने भाजपा वाली सारी दक्षिणपंथी नीति ही अपना ली तो अब भाजपा के पास कोई कार्यक्रम रहा ही नहीं ।

तो आप भी बुश जी वाला ही रिकार्ड बजा रहे हैं कि पढ़ो, नहीं तो तुम्हारी नौकरियाँ भारत और चीन के युवक ले जाएँगे । अरे भाई, ये भारत और चीन के बच्चे तो पहले यहाँ सारे सुख और जवानी की मौज-मस्ती छोड़ कर कठोर परिश्रम करके पढ़े और फिर अपने माँ-बाप की खून पसीने की कमाई खर्च करके आपके वहाँ पढ़ने गए । वहाँ भी इन्होनें छोटे-मोटे काम किए, बहुत सादगी से रह कर पढ़े और जब नौकरी की बात आई, तो वहाँ के मालिकों को ये ज्यादा मेहनती और सस्ते लगे, सो रख लिया । अब आप समझते है कि चीन और भारत के ये युवक आपके बच्चों की नौकरियाँ खा जा रहे हैं । अगर अमरीका के गोरे बच्चे भारत और चीन के बच्चों के बराबर पैसे लेकर वैसा ही काम करने को तैयार होंगे तो किसी भी अमरीकी मालिक को भारत और चीन से कोई लगाव नहीं है । उसे तो काम और कमाई चाहिए । पहले बुश और अब आप, जब भारत और चीन का नाम लेकर बात करते हैं तो उससे अच्छा सन्देश नहीं जाता । इससे अमरीकी बच्चे भारत और चीन के बच्चों को अपना दुश्मन समझने लग जाते हैं जो कि किसी देश की सामाजिक समरसता के लिए ठीक नहीं है । हमें लगता है कि कहीं न कहीं आस्ट्रेलिया में भारतीय युवकों के प्रति घृणा का यह भी एक कारण हो । छोटे नेता तो अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए ऐसे ओछे स्टेटमेंट देते रहते ही हैं । बड़े नेता भी इससे अछूते नहीं हैं । आपका इरादा ऐसा नहीं है मगर बार-बार ऐसे वक्तव्यों से यह सन्देश जाना असंभव नहीं है ।

कुछ शिक्षाएँ या कौशल तो ऐसे हैं जो किसी भी जीव को उसके माता-पिता उसे सिखाते ही हैं । पशु-पक्षियों में यह प्रवृत्ति सहज होती है । वे अपने शिशुओं को भोजन ढूँढ़ना, शिकार करना, अपना बचाव करना, आवास खोजना या बनाना आदि सिखाते हैं और कुछ बच्चे अपने परिवेश से सीखते हैं । जो नहीं सीखते वे नष्ट हो जाते हैं । मानव समाज उनसे कुछ अधिक संलिष्ट हो गया है इसलिए वह दूसरों के लिए काम करके अपनी नौकरी या जीविका अपनाता है । आज आदमी यह नहीं सोचता कि उसे अपने लिए क्या चाहिए बल्कि यह सोचता है कि कौन सा काम सीखकर नौकरी मिलेगी । इस प्रकार वह अपने लिए नहीं सीखता और एक प्रकार से गुलाम हो रहा है । भले ही उसे उपभोक्तावादी संस्कृति 'स्वतंत्रता' का नाम दे । मगर इस संस्कृति में किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं होती जब कि गुलाम के प्रति भी उसके मालिक की कोई न कोई जिम्मेदारी तो होती ही है, भले ही वह अपने स्वार्थ के लिए ही हो । इस दृष्टि से यह आज की तथाकथित मुक्त अर्थव्यवस्था बहुत गैरजिम्मेदार है जो स्वतंत्रता का केवल भ्रम देती है । पहले जब किसान मिश्रित खेती करता था और अपने समाज के साथ मिलकर रहता था तब वह आत्मनिर्भर और सामाजिक था मगर अब औद्योगीकरण और बाज़ार ने उसे भी किसी बड़ी कंपनी का बंधुआ मजदूर बना दिया है ।

इस व्यवस्था में न तो कारीगर को अपने कार्य की सम्पूर्णता और कर्ता होने का सुख मिलता है और न ही उसे समाज में वह सम्मान मिलता है जो एक सर्जक को मिलना चाहिए । उत्पाद कंपनी के नाम से बिकता है और उसके असली निर्माता की पहचान ही समाप्त हो गई है । खैर, काम कोई भी हो, जीविका का कोई भी साधन हो मगर फिर भी आदमी को आदमी की ज़रूरत होती है । मानव का विकल्प रोबोट नहीं हो सकता । पुत्र-पुत्री द्वारा की गई सेवा का विकल्प किराये की नर्स नहीं हो सकती । माँ के हाथ के खाने की बात ही कुछ और होती है । मेकडोनाल्ड उसका स्थान नहीं ले सकता । यद्यपि बाजार कहता है कि तू किसी की चिंता क्यों करता है 'मैं हूँ ना' । पैसा फेंक और जो चाहे हाजिर है ।
पुरानी जीवन शैली में कहा गया है कि अनुशासन ही सभी गुणों, शिक्षाओं और समाज के सुखी होने का आधार है । हमारे यहाँ भी कहा गया है-
लालयेत् पंच वर्षाणि, दस वर्षाणि ताडयेत् ।
प्राप्ते तु षोडषे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥

अर्थात पाँच वर्ष तक बच्चे को लाड़-प्यार दो, अगले दस वर्ष तक अनुशासन में रखो और सोलह वर्ष का होने पर उसके साथ मित्र के समान व्यवहार करो । मतलब कि बच्चे को मित्र के समान समझदार बनने के लिए पाँच वर्ष तक प्यार और दस वर्ष तक अनुशासन चाहिए । इसका मतलब यह नहीं है बाद में प्यार समाप्त हो जाना चाहिए । प्यार तो जीवन भर रहता है । उसके बिना तो जीवन से बड़ा कोई दंड नहीं रह जाएगा । मगर लाड़-प्यार को नियंत्रित किए बिना अनुशासन सिखाना मुश्किल हो जाता है । इसीलिए राजा लोग भी अपने राजकुमारों को किसी ऋषि के आश्रम में पढ़ने के लिए भेजते थे जहाँ रहकर वह आज्ञा-पालन, कठिन परिश्रम करना, खेती करना, पशु-पालन करना, भिक्षा माँगने के बहाने समाज की सही स्थिति जानना सीखता था । आज के धनवानों के बच्चों को अपने सुख और मौज-मज़े के अलावा दीन-दुनिया की खबर ही नहीं रहती । वह अपने सुख के लिए सारी दुनिया को फूँकने में भी नहीं हिचकता । ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात तो बहुत दूर की है । जहाँ-जहाँ भी उपभोक्तावाद की अति होती है वहाँ ऐसे ही हृदयहीन लोग पैदा होंगे । महलों में रहकर अनावश्यक लाड़-प्यार में पलने वाले ही कौरव बन कर निकलते हैं । पांडव तो वन में घूम-घूम कर, विघ्न-बाधाओं को चूम-चूम कर ही बनते हैं । यही अनुशासन है ।

उपभोक्तावाद नहीं चाहता कि कोई भी इस प्रकार से संवेदनशील बने । यदि लोग संवेदनशील बन गए तो अपनी सारी तनख्वाह अपने लिए फूँकने से पहले, आदमी परिवार के बारे में दस बार सोचेगा । बस, यही आदमी उपभोक्तावाद के लिए सबसे बड़ा खतरा है । हमारे बचपन में माता-पिता बच्चे को स्कूल छोड़ने जाते तो गुरुजी से कहते थे- गुरुजी, मांस-मांस आपका और हड्डी-हड्डी हमारी । इसका मतलब यह नहीं था कि गुरुजी कोई मांस का व्यापार करने वाले होते थे । इसका मतलब यह होता था कि गुरु जी बच्चे को अनुशासित बनाने के लिए जो भी कठिन जीवन का विधान करें, उससे माता-पिता को कोई ऐतराज नहीं होता था ।

पुरानी शिक्षा पद्धति में सबसे मुख्य बात होती थी- आज्ञापालन । उपमन्यु की कथा आती है । उसे खाने में बहुत रुचि थी जो गुरु के अनुसार अनुशासन और शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा थी । सो उन्होंने उसकी इस आदत को सुधारने के लिए उसे खाना नहीं दिया । फिर भी उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा । पूछा तो पता लगा कि वह दुबारा भिक्षा माँग कर ले आता था । गुरु जी ने कहा कि वह दुबारा भिक्षा माँग कर नहीं लाएगा । फिर भी बालक उपमन्यु मस्त । जाँच की तो पाया कि वह गायों का दूध पी लेता है । गुरु जी उसके लिए भी मना किया क्योंकि दूध पर तो सबसे पहला अधिकार गाय के बच्चे का होता है । फिर भी बालक उपमन्यु पर कोई असर नहीं । वह बछड़ों के दूध पीते समय गिरने वाले झाग को चाट लेता था । गुरु जी ने उसके लिए भी मना कर दिया । अब तो उपमन्यु के सारे रास्ते बंद हो गए । एक दिन भूख से व्याकुल होकर उसने कोई जंगली पौधा खा लिया जिससे उसकी दृष्टि चली गई और वह रास्ता देख न पाने के कारण एक कुएँ में गिर गया । गुरु कोई जल्लाद नहीं थे । वे तो उसे अनुशासन सिखा रहे थे । शाम को जब गाएँ अकेली ही लौट आईं तो गुरु को चिंता हुई । वे उपमन्यु को खोजने के लिए अँधेरी रात में ही चल पड़े । जंगल में जाकर उन्होंने आवाज़ लगाई तो एक कुएँ में से आवाज़ आई- गुरु जी मैं यहाँ हूँ । गुरु जी ने पूछा- तुम इस कुएँ में कैसे गिर गए तो उपमन्यु ने सारी बात बताई । गुरु जी ने उसे मन्त्र बताया जिसे जपने से देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार प्रकट हुए और उपमन्यु को एक दवा देकर कहा- इसे खालो । तुम्हारी दृष्टि वापिस आ जाएगी । उपमन्यु ने कहा- मैं गुरु जी को अर्पित किए और उनके अपने हाथ से दिए बिना कुछ नहीं खाऊँगा । इतना कहते ही उपमन्यु की दृष्टि वापिस आ गई । उसकी प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा पूरी हुई ।

खाने के बारे में इतनी बार गुरुजी की आज्ञा न मानने पर भी गुरुजी उसे माफ क्यों करते रहे क्योंकि भले ही उसकी खाने की अतिरिक्त रुचि खत्म नहीं हुई थी मगर वह सच बोल रहा था और सच बोलना मनुष्य का सबसे गुण है । तभी कहा गया है-
साँच बरोबर ताप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदय साँच है ताके हिरदय आप ॥

आपके देश का ध्येय वाक्य है- ‘इन गोड वी ट्रस्ट’ । गोड को किसने देखा है ? मगर सत्य तो साक्षात् देखा जा सकता है और इसीलिए हमने तो सत्य को ही भगवान माना है । तभी हमारा ध्येय वाक्य है- ‘सत्यमेव जयते’ । यह बात और है कि अब वह हमारे देश में भी कम ही देखने को मिलता है । सत्य और अनुशासन की शुरुआत घर से ही होती है । मगर आजकल कौन सा घर ? आपके यहाँ तो पचास प्रतिशत बच्चों को असली माता-पिता ही उपलब्ध नहीं हैं । जब माता-पिता ही असली नहीं हैं तो फिर कौन सी चीज है जो असली बची होगी । परिवार को बचाइए, बच्चों को अनुशासन सिखाइए, खुद के अलावा किसी और के बारे में भी सोचना सिखाइए । यह तो पता नहीं कब और कैसे होगा और उसे करने के लिए आपकी उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था कितनी छूट देगी मगर जहाँ तक भारत और चीन से डरने की बात है तो आप निश्चिन्त रहिए ।

चीन और भारत में अभी इनकी पुरानी संस्कृति की जड़ें पूरी तरह से उखड़ी नहीं है । वैसे चीन के बारे में तो हम ज्यादा नहीं जानते पर अब पढ़ा है कि वहाँ भी तलाक दस प्रतिशत बढ़ गए हैं और वहाँ भी लड़कियाँ खुले हाथ कर्च करने के लिए सेक्स बेचने लगी हैं । भारत के बारे में हम कह सकते हैं कि आप निश्चिन्त रहिए । यह एक नंबर का नकलची देश है । जब अंग्रेज यहाँ आए तो इसने अंग्रेजों से ज्यादा अंग्रेज बनने में देर नहीं लगाई । अब रंग का तो ये क्या करें लाख फेयरनेस क्रीम लगाने पर भी प्रिंस चार्ल्स जैसा नहीं हो पा रहा है । मगर जहाँ तक अंग्रेजी और उनके तौर-तरीकों की बात है तो हम उनके भी बाप हैं । अब हम पर अमरीका बनने का नशा सवार है सो हम बहुत जल्दी ही अमीरीकी विकृतियों में अमरीका से भी आगे निकल जाएँगे । अब हमारे बच्चों को माँ के हाथ की गरम रोटी की बजाय बासी पिज्जा और बर्गर अच्छे लगते हैं । अब हम छाछ, शिकंजी की जगह कोकाकोला पीना ज्यादा पसंद करते हैं । धोती बाँधना किसी को नहीं आता । अब बच्चे माता-पिता के चरण छूने में शर्म महसूस करते हैं और दूर से ही 'हाय' करके काम चलाना चाहते हैं । अब लड़के-लड़कियों का देर से घर आना बुरा नहीं समझा जाता । बल्कि यूँ कहिए कि उनको कुछ कहते हुए माँ-बाप को डर लगने लगा है क्योंकि अब हमारे यहाँ भी माता-पिता अधिकार की जगह बाल-अधिकार अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं । न माता-पिता बच्चों को डाँट सकते हैं और न ही अध्यापक । मोहल्ले का बड़ा-बुजुर्ग तो कुछ कहने का अधिकार रखता ही नहीं । अब ब्रह्मचर्य एक पुरातनपंथी धारणा मानी जाने लगी है । अब यहाँ भी भाई-बहनों से निकटता की बजाय गर्ल और बॉय फ्रेंड का चलन चल पड़ा है । आपके यहाँ की तरह अब यहाँ भी लड़के-लडकियाँ शराब और सेक्स को एक शैक्षणिक गतिविधि मानने लगे हैं । अब देश की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटियों में कंडोम बेचने वाली मशीनें लग गई हैं । छोटे-छोटे कस्बों में सांस्कृतिक गतिविधियों के अंतर्गत सौन्दर्य प्रतियोगिताएँ होने लगी हैं । ब्रह्ममुहूर्त में उठना पिछड़ेपन की निशानी हो गई है । समलैंगिकता की वकालत की जाने लगी है । बिना शादी किए साथ रहना प्रगतिशीलता कहा जाने लगा है ।

अब हमारे यहाँ भी शिक्षा में रटने को हटा दिया गया है जब कि एक अध्यापक होने के नाते हम कह सकते है कि शिक्षा और जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जिसे बिना सोचे समझे रटना और मानना पड़ता है । बड़े होकर तर्क करने लायक बनने पर ही तर्क सार्थक होता है, नहीं तो वह सीखने में बाधा ही डालता है । क्या आज भी हम डाक्टर या और किसी विशेषज्ञ की बात बिना तर्क के नहीं मानते ? जीवन में बहुत कुछ अपरिवर्तनीय है । वह अपरिवर्तनीय ही सत्य और ईश्वर है । मगर आज स्वतंत्रता के नाम पर उसी पर सबसे ज्यादा प्रश्न उठाए जा रहे हैं । पहले तो हम ब्रेन ड्रेन की चिंता किया करते थे मगर अब तो ब्रेन को पूरी तरह भोग की ड्रेन में ही डाल दिया गया है । इसलिए आप भारत के ब्रेन से मत घबराइए ।

आज हमारे यहाँ भी बच्चों क्या, बड़ों को भी कोई बात समझाने के लिए फिल्मी लोगों को लाया जाता है । सो आपको इस जगद्गुरु से घबराने की ज़रूरत नहीं है । यह तो कान में मोबाइल की घुंडी ठूँसे गाने सुनने में व्यस्त है, लेडी 'गा-गा' के लटके-झटकों में लस्त-पस्त है, बीयर और बर्गर में मस्त है । अब चाहे अमरीका या कोई और कपड़े ही क्यों न उतार ले जाए ।

वैसे कहा गया है कि 'सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया' ।
मगर हम तो इतने आशावादी हैं कि होश तो कभी भी आए, अच्छा ही है ! विनाश के बाद भी तो नई सृष्टि शुरु होती है कि नहीं ?

२१-९-२०१०

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Sep 30, 2010

ओबामा की शादी की अँगूठी



ओबामा जी,
नमस्ते । १२ सितंबर की एक ब्रेकिंग न्यूज थी- 'ओबामा की शादी की अँगूठी गायब' । वैसे तो हमारे देश के अंग्रेजी अखबारों और उनकी देखा-देखी क्षेत्रीय भाषाओँ के अखबारों का भी यह हाल है कि योरप-अमरीका के ऐरे-गैर, नत्थू-खैरे की छोटी से छोटी खबरें भी इतनी प्रमुखता से छापी जाती हैं कि आज की भारतीय पत्रकारिता पर शर्म आती है । एक बार ब्रिटनी स्पीयर्स इंग्लैण्ड के तत्कालीन प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर से मिलने गई तो उसके कुत्ते बिटबिट ने ब्लेयर साहब के कारपेट पर छी-छी कर दी । हमारे अखबारों के लिए यह एक बड़ी खबर थी । इसी तरह १५ अगस्त को हेली बेरी नाम की एक अभिनेत्री ने कहा कि यदि लोग परेशान न करें तो वह रोजाना न्यूड होकर फोटो खिंचवाए । उसने सार्वजनिक रूप से नंगे होने की भी आजादी माँगी । यह भी हमारे अखबारों के लिए एक बड़ी खबर थी । हमारे यहाँ बिहार में एक साठ साल के बूढ़े ने गाँव की पानी की समस्या को हल करने के लिए खुरपी से अकेले ही एक बड़ा तालाब खोद दिया मगर यह किसी अखबार को बड़ी खबर नहीं लगी । आपके यहाँ भी ऐसा ही होता होगा । अब मीडिया का काम जनता को जागृत करना और अपनी क्षमताओं को पहचानने के लिए प्रेरित करना नहीं रहा बल्कि उसे ऐसे ही भाँडों की लम्पटताओं में उलझाए रखना है ।

सो किसी की अँगूठी खो जाना कोई बड़ी बात नहीं और न ही यह कोई अन्तराष्ट्रीय खबर है मगर आपकी शादी की अँगूठी के गायब होने से हमें भी चिंता हुई क्योंकि आजकल दुनिया के बड़े-बड़े नेता कोई अच्छे काम करने की बजाय लम्पटताओं के लिए चर्चित हो रहे हैं और मीडिया को तो और चाहिए ही क्या ? इटली के प्रधान मंत्री की अपनी लम्पटताओं के लिए पिटाई भी हो गई थी ।
फ़्रांस के राष्ट्रपति ने दो-दो पत्नियाँ छोड़ कर, पहले भी दो-दो पतियों के प्रति वफादारी की शपथ लेकर छुट्टी हो चुकी, कार्ला ब्रूनी से शादी कर ली । अभी दो-चार दिन पहले फोटो देखा कि रूस के पुतिन जी महाराज एक चौबीस साल की जिमनास्ट को खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे थे और नीचे खबर थी वे अपनी पत्नी को तलाक दे चुके हैं और इस युवती से शादी करने वाले हैं । क्लिंटन जी के किस्से तो जग जाहिर हैं ही । प्रिंस चार्ल्स की मजनूगीरी तो अब पुरानी हो चुकी । हमारे यहाँ शशि थरूर जी भी स्वयं थर्ड हैंड होकर एक थर्ड हैंड महिला से शादी रचा चुके हैं और आजकल हनीमून पर हैं । दक्षिणी अफ्रीका के जूमा जी तो शायद पाँच छः के घोषित पति हैं और अभी कुछ दिनों पहले २२ वीं संतान के पिताश्री बने हैं । स्वाजीलैंड के राजा साहब तो हर साल एक नृत्य प्रतियोगिता कराकर उसमें से एक नई सुन्दरी को पत्नी के रूप में चुनते हैं । अब सुना है कि उनकी एक पत्नी किसी मंत्री के साथ पकड़ी गई है । इसीलिए कहा गया है कि एक पत्नी हो तो वह अपनी होती है और यदि दो हों तो वे दोनों ही किसी और की होती हैं । मगर ऐसे पति और पत्नियों को ऐसी दकियानूसी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता ।

आपके यहाँ कहा जाता है कि जब तक शादी चलती है तब तक पति और पत्नी शादी की अँगूठी नहीं उतारते । और यदि शादी की अँगूठी नहीं है तो मतलब यह निकाला जाता है कि या तो शादी टूट गई है या शादी हुई नहीं है । तो आपकी शादी की अँगूठी के गायब होने से हमें यह आशंका हुई कि कहीं आप पर भी इन लम्पटों का कोई असर तो नहीं हो गया ? वैसे हम आपको इस मामले में बहुत भला आदमी समझते है । सो खूब खोजने पर जानकारी मिली कि आपकी अँगूठी गायब नहीं हुई है और आपकी नीयत भी सही सलामत है बल्कि आपने अँगूठी मरम्मत के लिए दी है ।

भले ही ये नेता लोग अपने आपको बहुत एडवांस समझें मगर जनता चाहे कहीं की भी, और खुद चाहे कितनी भी भ्रष्ट हो मगर अपने नेता को आदर्श ही देखना चाहती है । तभी तो आपको याद होगा कि जब अमरीका में क्लिंटन वाले मामले में मीडिया ने उसे छोड़ा ही नहीं तो आपके वहाँ की जनता ने ही इसका विरोध किया था कि यह क्या चल रहा है ? हमारे बच्चे भी पूछने लगे हैं । हम उन्हें क्या बताएँ ? इसे बंद किया जाना चाहिए ।

बड़ों की इस लम्पटता का दंड बेचारे बच्चों को भुगतना पड़ता है । उनकी क्या गलती है ? उन्हें तो माता-पिता दोनों ही असली चाहिएँ । इसलिए यदि कोई भी शासन और शासक देश में सुख शांति चाहता है तो उसे परिवारों को टूटने से बचाना चाहिए । खुद भला बन कर ही राजा या नेता किसी को उपदेश दे सकता है । बुश की और हजार आलोचनाएँ की जाएँ मगर इस मामले में तो वे बेदाग़ हैं ।

आप और मिशेल से हमें इन लम्पटों जैसी कोई आशंका नहीं है । भगवान आपका वैवाहिक जीवन अखंड और अटूट रखे ।

२६-९-२०१०

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.Jhootha Sach

Sep 9, 2010

चेलसी की शादी और ओबामा


ओबामा जी,
नमस्ते । ये मीडिया वाले भी बड़े फालतू लोग होते हैं । कहीं तो मरने जीने जैसी ज़रूरी बातों पर ध्यान नहीं देते और कहीं कुछ नेकनाम या बदनाम लोगों के गू-मूत तक के चर्चों से अखबार के फ्रंट पेज और टी.वी. के प्राइम टाइम को इतना भर देते हैं कि सारे घर में बदबू आने लगती है । पर क्या किया जाए । आदमी स्वाइन फ्लू और एड्स से बच सकता है मगर इनसे बचना मुश्किल है । हम यहाँ ऐसी बदबू फैलाने वाली चर्चा नहीं करने जा रहे हैं । हम तो आपको बताना चाहते हैं कि लोगों ने इसी बात का बतंगड़ बना दिया कि क्लिंटन दंपत्ति ने अपनी बेटी की शादी में ओबामा को नहीं बुलाया ।

हम तो कहते हैं कि अच्छा किया । अब एक महाशक्ति देश के राष्ट्रपति के पास यही काम है क्या कि शादियाँ अटेंड करता फिरे । छोटे-मोटे नेताओं की बात और है कि उन्हें कोई पूछता नहीं और न ही उनके पास कोई काम होता है सो वे तो इंतज़ार ही करते रहते हैं । कोई बुलाए या न बुलाए वे पहुँच ही जाते हैं । जैसे कि चंदा और वोट माँगने वाले शवयात्रा के साथ, कोई न कोई ग्राहक पकड़ने के लालच में, श्मशान घाट भी पहुँच जाते हैं । लोगों ने इस बात को इस तरह प्रोजेक्ट किया जैसे कि यह आपका अपमान है । अरे भई, ऐसी बातों में क्या अपमान और क्या मान । यह तो सबका निजी मामला होता है ।

हमारे यहाँ प्रियंका गाँधी की शादी हुई तो उसमें नरसिंह राव और नारायण दत्त तिवारी जैसे लोगों को भी नहीं बुलाया । मगर उन्होंने कोई बुरा नहीं माना । और घर के बाहर ही नाच कर लड्डू बाँटकर अपनी खुशी जाहिर कर ली । संवेदनशील और उत्साही लोगों को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता उन्हें तो खुश होना है सो हो लेते हैं । लोग तो कम्प्यूटर में देख कर काम चला लेते हैं । यहाँ तो शादी की मिठाइयों की खुशबू सात समंदर पार से भारत तक आ रही थी ।

हमारे यहाँ शवयात्रा और लड़की की शादी में जाना दोनों पुण्य के काम माने जाते हैं और इनमें निमंत्रण का इंतज़ार नहीं किया जाता । ये अवसर तो किसी की मदद करने के होते हैं । मगर आजकल तो शादी ही क्या अंतिम संस्कार तक के काम भी ठेके पर होने लगे इसलिए घरवाले भी पेंट की जेबों में हाथ डाले घूमते रहते हैं । पता ही नहीं चलता कि बन्दा घराती है या बराती । पहले उक्त दोनों ही कामों में लोगों की मदद की जरूरत पड़ती थी । और लोग लड़की की शादी में केवल काम करवाने जाते थे । खाने के समय जानबूझ कर खिसक लेते थे । पर आजकल तो लोग केवल खाने के लिए ही शादी में जाते हैं । आपने जब मनमोहन जी को पार्टी दी थी तब 'सलाही दंपत्ति' केवल दारू पीने ही चले आए, सारे सुरक्षा इंतजामों को धता बताकर ।

वैसे हम सोचते हैं कि आजकल आपके पास इतने काम हैं कि यदि निमंत्रण आता भी तो आपके लिए जाना कहाँ संभव हो पाता ? बड़े और राजनीतिक लोगों में बात आने-जाने की नहीं होती, बात होती है पालिसी की । सो आपको न बुलाने का फैसला किसी न किसी नीति के तहत ही लिया गया होगा । हम तो क्लिंटन साहब की जगह होते तो ऐसा पत्र लिखते कि आने वाला न तो आ ही सकता था और न ही यह कह सकता कि उसे बुलाया नहीं गया । जैसे कि लिख देते- “निमंत्रण भेज रहे हैं । आप आते तो हमें बहुत खुशी होती मगर आपके समय के महत्व और वर्तमान ज़रूरी कामों को देखते हुए बहुत ज्यादा आग्रह भी तो नहीं कर सकते । बड़े लोगों का तो आशीर्वाद ही बहुत होता है । शारीरिक उपस्थिति का क्या है, भाव महत्त्वपूर्ण होता है वैसे आप आ पाते तो वास्तव में बहुत खुशी होती” । आने लायक भी नहीं छोड़ा और शिकायत करने लायक भी नहीं छोड़ा ।

आपको भी निमंत्रण न मिलने से कोई शिकायत नहीं हुई होगी । हमें भी जब प्रियंका की शादी में नहीं बुलाया गया तो कोई शिकायत नहीं हुई । जमाना बदल गया है । अरुण नायर ने लिज़ हर्ले के साथ अपनी शादी में आपने बाप को भी नहीं बुलाया । उनकी पहले वाली शादियों के बारे में हमें पता नहीं । अमिताभ बच्चन ने भी अभिषेक की शादी में अपने गाँव के नजदीकी रिश्तेदारों को भी नहीं बुलाया और बहाना क्या बनाया कि बच्चे नहीं चाहते कि ज्यादा भीड़ हो । क्या मासूम बहाना है ? सुना है कि क्लिंटन दंपत्ति भी नहीं चाहते थे कि दूल्हा-दुल्हन के अलावा कोई और आकर्षण का केन्द्र बने । वैसे ठीक भी है । हमने कई बार देखा है कि जब गाँव में किसी की शादी में कोई छोटा-मोटा एम.एल.ए. भी आ जाता है तो लोग वर-वधू की बजाय नेता जी के साथ फोटो खिंचाने लग जाते हैं । पर चेल्सी के मामले में यह नहीं होता क्योंकि वहाँ आने वाले सभी बड़े लोग ही होते ।

खैर, जी न बुलाया न सही आपको और बहुत से काम हैं । अपन तो सभी को आशीर्वाद दें कि दूधों नहाओ, पूतों फलो । पर हमें इसमें कुछ और ही गंध आ रही है । इसे आप राजनीति की दृष्टि से समझ कर आगे की रणनीति बनाइएगा । भले ही आप अपने को मुसलमान नहीं मानते पर लोग तो एक कूटनीति के तहत आपको मुसलमान ही प्रचारित करते हैं । वैसे हमारे यहाँ पुत्र का धर्म पिता के धर्म के अनुसार होता है और फिर आपके नाम में हुसैन भी तो लगा हुआ है और फिर आप इफ्तार की दावत भी देने लगे हैं और अब तो ग्राउंड ज़ीरो के पास एक मस्जिद का भी विरोध नहीं कर रहे हैं । और फिर दूल्हा भी यहूदी है । यहूदियों और मुसलमानों का तो सदा से साँप और नेवले का सम्बन्ध है । और आपको याद होगा कि आपके सामने हिलेरी जी ने पार्टी केंडीडेट का चुनाव भी लड़ा था जिसमें आपके कीनियाई ड्रेस वाले फोटो को भी चुनावी लाभ के लिए काम में लिया था । और फिर भले ही लाख रंगभेद का पक्ष न लेने की बात करें, मगर गोरे लोगों में आज भी काले लोगों को लेकर एक ‘कोम्प्लेक्स’ है । हमने तो वैसे ही बता दिया । जानते तो आप भी सब कुछ हैं । हमारे देश ने भी अंग्रेजों के राज में इस भेदभाव को बहुत झेला है । और आज भी कौन सा यह भेद-भाव खत्म हो गया ?

आप भी भारतीय राजनीति की तरह सर्व-धर्म-समभाव के रास्ते पर चल रहे हैं पर यह रास्ता बहुत कठिन है । जोड़ने का हर रास्ता कठिन होता है । तोड़ने का क्या है । तोड़ने के तो हजार बहाने हैं ।

१०-८-२०१०

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.Jhootha Sach

Jul 6, 2010

ओबामा और चपाती-चिंतन





ओबामा जी,
'जय बजरंग बली' ।
आपको पत्र तो लिख रहे हैं पर यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आपको क्या संबोधन करें क्योंकि उम्र में आप हमारे बेटे से बड़े नहीं हैं, यदि किसी भारतीय स्कूल में पढ़े होते तो आप हमारे शिष्य हुए होते । पद में आप मनमोहन जी से बड़े हैं और ताकत में भीम के भी बाप । हाइट में देखें तो हम से एक हाथ ऊँचे । खैर, जब आप चुनाव के लिए खड़े हुए थे तो भारतीय लोगों ने आपके हाथ के ब्रेसलेट में बन्दर की आकृति जैसी कोई चीज देखकर उसे हनुमान मान लिया था और आपको हनुमान जी का भक्त मान कर यहाँ के एक सज्जन ने आपको हनुमान जी की एक मूर्ति भेजने का समाचार भी छपवा दिया था । हम तो वास्तव में हनुमान जी के भक्त हैं सो आपको 'जय बजरंग बली' का संबोधन कर रहे हैं ।

मई में आपके भारत आने का समाचार पढ़ा था जिसमें यह भी था कि आप भारत आकर चपाती खाना पसंद करेंगे । हम तो राजस्थान के रहने वाले हैं सो हमेशा से रोटी ही खाते चले आ रहे हैं । बाजरा, जौ, मक्का, गेंहूँ, जौ-चने, गेंहूँ-चने आदि की रोटियाँ । हमारे यहाँ चपाती नहीं बना करती थी । चपाती तो नफीस लोगों के यहाँ बना करती थीं । जितने आटे की हमारे यहाँ एक रोटी बनती थी उतने आटे में चपाती बनाने वाले पाँच चपातियाँ बना लेते थे ।

पहले तो जब हम अपने गाँव से बाहर नहीं निकले थे तब यही सोचा करते थे कि चपाती कोई रोटी जैसी चीज नहीं बल्कि कोई अन्य ही व्यंजन होता होगा । इसी तरह तंदूर की रोटी को भी किसी विशेष अनाज की रोटी समझा करते थे । हमारी पत्नी की जनरल नोलेज भी हमारे जैसी ही थी । हमारे उत्तर प्रदेश के बहुत से साथी अध्यापक खाने की चर्चा चलने पर बार-बार चपाती शब्द का प्रयोग किया करते थे । यह तो बहुत बाद में उनसे पूछने पर पता चला कि तंदूर एक विशेष प्रकार का चूल्हा होता है और चपाती गेंहूँ के आटे को ही चपत मार-मार कर पतली बना दी गई रोटी को कहते हैं ।

सो एक दिन हमने अपनी पत्नी से बड़ी अदा से कहा कि अब तक हम पिछड़े ही रहे । थोड़ा सा भी जीवन स्तर ऊँचा नहीं उठाया । अब तो बच्चे बड़े हो गए हैं । नौकरी करने लग गए हैं । अब से भारत को प्रधान मंत्री देते रहने वाले, सभी प्रश्नों की जड़, देश के सबसे बड़े प्रान्त उत्तर प्रदेश के लोगों की तरह हम भी दोनों टाइम चपाती खाया करेंगे । आज से रोटी बंद ।

पत्नी ने कहा- ठीक है, बच्चे बड़े हो गए हैं, घर की आर्थिक स्थिति ठीक-ठाक हो गई है पर इसका मतलब यह तो नहीं कि बुढ़ापे में मन को चंचल करो । अरे, अब तो भगवान का नाम लेने की उम्र है । तुम भी उन्हीं लोगों की तरह कर रहे हो जिन्हें मरते समय बच्चे पूछते हैं- बाबा, क्या इच्छा है ? तो गीता सुनने की बजाय कहेंगे, दही बड़े खाऊँगा । सैंकड़ों पीढ़ियाँ बीत गईं रोटी खाते-खाते । अब तुम्हें चपाती खाने का शौक चर्रा रहा है । पता नहीं बुढ़ापे में यह चपाती पचेगी भी या नहीं ।

हमने पत्नी के अज्ञान का मज़ाक सा उड़ाते हुए कहा- अरे, तुम्हें पता नहीं, चपाती भी गेंहूँ की रोटी ही होती है । बस, ज़रा पीट-पीट कर पतला बना दिया जाता है । थोड़ा सा समय ही तो अधिक लगेगा । क्या फ़र्क पड़ता है । बना दिया करो । और फिर सोचो, कितना रौब पड़ेगा जब हम चबूतरे पर बैठ कर आवाज लगाया करेंगे कि चिक्की की दादी, ज़रा एक चपाती तो और लाना ।

पत्नी चिढ़ गई । कहने लगी- ये फालतू के नखरे और चोचले छोड़ो । पानी को जल कहने से कोई विद्वान नहीं हो जाता । मेहतर को सफाई कर्मचारी या हरिजन कहने से या किसी जिले का नाम किसी दलित नेता के नाम पर रख देने से उसका कोई उद्धार नहीं होने वाला । उद्धार तो तब होगा जब उसे खाने को रोटी और शिक्षा मिलेगी; समाज में प्रेम और सद्भावना बढ़ेगी; जब समृद्ध हो चुकी जाति के लोग आरक्षण के नाम पर बार-बार लाभ लेते रहने का लालच छोड़ेंगे । है तो वही गेंहूँ का आटा । उसके चार पतले छिलके बनाकर खालो या एक ही ठीक-ठाक सी रोटी बना कर खालो । मतलब तो पेट भरने से ही है ना ।

अब उसे कौन समझाए कि नफासत भी कोई चीज़ होती है । सो ओबामा जी, हमारा तो चपाती चिंतन यही है । वैसे हम जानते हैं कि असली चीज है भूख और उसकी शांति । हमारे देश के साथ तो हमेशा से यही हुआ है कि हमारे यहाँ कुछ तो पानी की सुविधा थी और कुछ जलवायु अनुकूल थी सो अन्न की कमी नहीं थी और लोग भी संतोषी थे, सो हम कभी भूख से परेशान होकर या ज्यादा के लालच में हथियार लेकर दूसरों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करने के लिए नहीं गए । लोग ही अढ़ाई हज़ार बरसों से भारत की रोटी की तरफ ललचाकर हथियार लेकर आते रहे- क्या हूण, क्या शक, क्या तुर्क, क्या मंगोल, क्या मुग़ल, क्या ब्रिटिश, क्या पुर्तगाली, क्या फ्रांसीसी । अब भी बंगलादेश और पाकिस्तान से लोग चपाती खाने के लिए घुस ही आते हैं ।

और अब आप कह रहे हैं कि आप भी भारत आकर चपाती खाना चाहते हैं । हम जानते हैं कि आपके यहाँ अनाज की कोई कमी नहीं है । आप तो जब अनाज सड़ जाता है तो उस अनाज को परोपकार के लिए पिछड़े देशों को बेच देते हैं । धर्म का धर्म और धंधे का धंधा । आपको खाने-पीने की क्या कमी । आप तो हमारा दिल रखने के लिए कह रहे हैं । जैसे भगवान ने विदुर की पत्नी के हाथ से केले के छिलके खा लिए, शबरी के बेर खाए, करमा बाई का खीचड़ा खा लिया, सुदामा के चावल खाए । या आजकल कई नेता दलितों के घर जाकर खाना खाते हैं । इस अदा से आप हमारे दिलों के और नज़दीक आ गए हैं । यही तो है गरीब का दिल जीतने का स्टाइल । गरीब का दिल जीत लो फिर चाहे उसकी जेब ही काट लो । पर हमें आपके इरादे पर कोई शक नहीं है क्योंकि आप भी शुद्ध गोरे नहीं हैं और हम भी ब्रिटिश राज के ज़मीन पर हगनेवाले काले आदमी हैं ।

अब आप कहें तो चपाती निर्माण कला के बारे में कुछ बात हो जाए । वैसे आपको बता दें कि हमारे यहाँ आज कल तथाकथित बड़े और आधुनिक लोग चपाती, रोटी, दलिया, सत्तू, दाल, भात, छाछ, शिकंजी, राबड़ी आदि को तुच्छ, यहाँ तक कि हेय समझने लगे हैं । वे तो पिज्जा, बर्गर, ब्रेड, कोकाकोला, पास्ता, बीयर आदि की तरफ भागने लगे हैं । पर आप हैं कि चपाती खाने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं सो हमारे धन्य भाग और चपाती के भी । हो सकता है कि आपके कारण ही चपाती के दिन फिर जाएँ ।

तो चपाती निर्माण की बात । चपाती बनाना कोई आसान काम नहीं है । यह कोई ब्रेड तो है नहीं कि लोथड़ा बनाया और मशीन में डाल दिया और पक कर बाहर । इसमें तो पहले बारीक आटे को गूँधो फिर कई देर तक भिगोओ । फिर तेल या घी लगाकर म्हलाव देकर मुलायम बनाओ । और उसके बाद चपत लगाते-लगाते उछाल-उछाल कर पतली बनाते जाओ । यदि उछालने में नीचे गिर जाए तो फिर वही परेशानी । लेकिन यह चपाती बारीक आटे की बनती है इसलिए बड़ी ज़ल्दी सख्त हो जाती है और पचती भी ज़ल्दी नहीं और कहते हैं पतले आटे की चपाती कब्ज़ भी करती है । पर मोटे आटे की चपाती बनती भी तो नहीं । मोटे आटे की तो रोटी ही बनती है । पर उसे बहुत देर तक धीमी आँच में सेकना पड़ता है । तब कहीं जाकर खस्ता और करारी बनाती है । असली मज़ा तो रोटी खाने में ही है पर क्या करें आपने चपाती खाने की इच्छा ज़ाहिर की है सो ठीक है ।

वैसे आपके यहाँ से १९५० के आसपास भारत में आये लाल गेहूँ की चपाती भी बड़ी सख्त बनती थी पर भारत के भूखे लोग किसी तरह उसे भी खा ही गए । इसके बाद हमने अपने आप को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बना लिया । पर जब से वैश्वीकरण की हवा आई है, हमने अनाज से ज्यादा मोबाइल और कम्प्यूटर और क्रिकेट को ज़रूरी मान लिया । पवार साहब खेती से ज्यादा क्रिकेट पर ध्यान देने लगे । देश फसलों के सौंदर्य से ज्यादा चीयरलीडर्स का दीवाना हो गया । और रही सही कसर बुश साहब पूरी कर गए जब वे यहाँ आए तो भैंसों को दुलराते हुए और कंधे पर हल रखकर फ़ोटो खिंचवाया तब से भैसों ने दूध देना कम कर दिया । और हल भी हमें लगता है कि अपने साथ ले गए सो अनाज की भी कमी हो गयी इसीलिए दोनों चीजों के ही भाव बढ़ गए और आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया । पर क्या करें आपने मनमोहन सिंह जी को उनकी पसंद का बैंगन का भुरता खिलाया तो हम भी आपको चपाती खिलाने का इंतज़ाम करेंगे ही ।

पर क्या बताएँ जब से बाज़ार मुक्त हुआ है तब से उस पर सरकार का कोई नियंत्रण ही नहीं रहा । जो भी, जैसे चाहे मिलावट करता है । सरकार लाख ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ अभियान चलाती है मगर किसी पर कोई असर ही नहीं होता । लोग भगवान का प्रसाद समझ कर मिठाई खाते हैं मगर मिलावट होने के कारण अस्पताल पहुँच जाते हैं । पर आपसे यह सब क्या रोना रोएँ, यह तो हमारे घर की अपनी समस्या है । वैसे अभी हमारे मनमोहन सिंह जी कानपुर आई.आई.टी. में दीक्षांत भाषण देने गए थे । पता चला कि उनके खाने के लिए खरबूजे के जो बीज लाए गए थे वे फंगस लगे हुए थे । अब आप अंदाज लगा लो कि साधारण लोगों का क्या होता होगा । खैर हम आपके लिए विशेष सावधानी से गेहूँ चुनेंगे । बिना ज्यादा कीटनाशक वाला कोकाकोला तैयार करवाएँगे भले ही हमारे यहाँ कोकाकोला कम्पनी वाले अमरीका से दो सौ गुना कीटनाशक मिला कर पिलाते हों ।

अब आप तो दशमूलारिष्ट और हाजमोला जैसे पाचक पदार्थ लेकर चपाती खाने के लिए आने की तैयारी करें ।

वैसे हमें पता है कि जब आपकी दावत होगी तो मनमोहन जी हमें नहीं बुलाने वाले । वैसे उन्हें अर्थव्यवस्था संभालने से और पवार जी को क्रिकेट का उद्धार करने से ही फुर्सत नहीं । सो यदि यहाँ आने के बाद आपको चपाती के बारे में और कुछ जानकारी चाहिए तो हमें याद कर लीजिएगा ।

धन्यवाद ।

आपका,
रमेश जोशी
एक सेवा निवृत्त अध्यापक ।

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.Jhootha Sach