07-05-2026
बरामदा मेट गाला मॉर्निंग
आज तोताराम एक अजीब सा लबादा और कमर पर एक गमछा बांधे प्रकट हुआ । इस गरमी में बड़ा विचित्र लगा । हमारा तो छह महिने का ‘मात्र लुंगी’ काल चल रहा है जैसे अंग्रेजी राज में वायसराय सर्दी में दिल्ली में रहते थे और गरमी में लवाज़में के साथ शिमला चले जाते थे ठीक वैसे ही । या फिर वैसे जैसे गरमियों में स्कूलों का समय बदल जाता है ।
हमने कहा- यह क्या तमाशा है । क्या अघोरियों का वेश बना रखा है । जनता को ऊटपटाँग हरकतों से प्रभावित करने वाले बाबाओं की तरह गरमी में पंचाग्नि तप का तमाशा कर रहा है ।
बोला- जब मोदी जी ने संसद में प्लास्टिक की बोतलों से बनी जैकेट का प्रदर्शन किया था तब तो कुछ नहीं बोला था तू । और तो और गोदीमीडिया उस पर विशेष कार्यक्रम करने लगा । और तोताराम कुछ प्रेरक और नया करे तो तमाशा !
हमने कहा- सही बात है सेठ कांच भी पहने तो हीरा और गरीब हीरा भी पहने तो कांच । ब्रांड अम्बेडसर बनना, प्रेरणा देना नहीं, कर्म करके दिखाना अधिक महत्वपूर्ण होता है । फिर भी तेरे इस गूदड़ का क्या विशेष अर्थ और संदेश है ।
बोला- तुझे पता है एक वार्षिक आयोजन होता है न्यूयार्क में ‘मेट गाला नाइट’ ? इसे फैशन की सबसे बड़ी रात माना जाता है । इसकी एक टिकट होती है 1 करोड़ रुपए की और अगर टेबल रिजर्व करवाओ तो साढ़े तीन करोड़ । इस बार इसमें कई भारतीय भी शामिल हुए थे जैसे ईशा अंबानी, करण जौहर, मनीष मल्होत्रा, सुधा रेड्डी आदि । सो मैंने सोचा अपने बरामदे में आम आदमी के लिए एक सस्ता ‘मेट गाला मॉर्निंग’ आयोजित कर लिया जाए तो बरामदे के लिए कुछ फंड इकट्ठा हो जाएगा । सो पिताजी के जमाने का एक कंबल और यह गमछा बांध कर आ गया ।
बहुत गर्मी लग रही है, कहते हुए तोताराम ने उस गूदड़ को बरामदे के एक कोने में पटक दिया ।
हमने कहा- तोताराम, ये सब कुंठित धनवान लोगों के नाटक हैं । अन्यथा इन वस्त्रों की क्या कोई उपयोगिता है ? शादी के लंबे गाउन या किसी लबादे का क्या अर्थ है । न तो उसे पहनकर कोई कुछ काम कर सकता है, न ही उसे पहनकर कोई सोता है, न ही ऐसे वस्त्र आरामदायक होते हैं ।
बोला- तो फिर ये लोग इन पर इतना खर्च क्यों करते हैं, क्यों पहनते हैं ?
हमने कहा- जब व्यक्ति के पास अपार धन आ जाता है और धन की सार्थकता का पता नहीं होता तो वह ऐसे ही करता है । शास्त्रों ने धन की तीन गतियाँ बताई हैं-
"दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥"
( धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न देता है, न भोगता है, उसके धन की तीसरी गति—नाश—होती है)।
भोग की भी एक सीमा होती है । अधिक भोग आपको क्षीण करता है । दान की कोई सीमा नहीं होती । वह जरूरी है । न दोगे तो भी तुम्हारे साथ जाने वाला नहीं है । इसलिए अच्छा है अपने हाथ से परोपकार कर जाओ । और परोपकार का भी भ्रम मत पालो क्योंकि तुम इसे अपने साथ लेकर नहीं आये थे । यह यहीं से, यहीं के लोगों के साथ, यहीं के लिए कमाया हुआ है ।
ज्ञानहीन धनवानों के साथ अनेक झूठे और स्वार्थी प्रशंसक चिपके रहते हैं और उन्हें ऐसे ही फालतू कामों में उलझाकर झूठी सार्थकता और यश का भरोसा दिलाते रहते हैं जबकि समाज के लिए कुछ न करने वाले ऐसे धनवानों के मरने जीने का कोई अर्थ नहीं होता ।
बोला- तो क्या ईशा अंबानी ने जो हीरे मोतियों की चोली पहनी है, या सुधा रेड्डी ने 250 करोड़ का हार पहना है या करण जौहर ने गलीचा सा ओढ़ रखा है उसका कोई महत्व नहीं है । हो सकता है इन वस्त्रों में गर्मी सर्दी नहीं लगती हो, यह खाना अच्छी तरह से पचता हो, या कब्ज नहीं होती हो, या दाँत न सड़ते हों या बाल न झड़ते, सफेद होते हों ।
हमने कहा- अगर इनसे ऐसा कुछ होता तो फिर धनवान तो न बूढ़े होटे, न बीमार पड़ते और न मरते । अगर इन बातों में कोई दम होता तो क्या कभी बिरला, टाटा या अज़ीम प्रेम जी को ऐसे कार्यक्रमों में क्यों नहीं देखा ? भारत में समाज सेवा के लिए सबसे अधिक दान देने वालों में टाटा का नंबर पहला है ।
याद रख, त्यागने से महावीर,बुद्ध, ईसा, गाँधी, नेहरू बड़े बने हैं ऐसे ऊटपटाँग कपड़े पहनने और वस्तुएं बटोरने से नहीं । यह दुनिया गांधी की दीवानी उनकी आधी धोती के कारण नहीं उनके त्याग और कर्मों के कारण है । लाखों का पेन और लाखों का चश्मा खरीद लेने से कोई शिक्षित, लेखक और बुद्धिजीवी नहीं बन जाता ।
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
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