Dec 23, 2010

साध्य और साधन


गाँधी जी की एक बात बहुत महत्त्वपूर्ण है किन्तु उसको जीवन में उतारना सरल नहीं है । वे कहते थे- यदि आपका लक्ष्य पवित्र है तो उसको प्राप्त करने के साधन भी पवित्र होने चाहिएँ अन्यथा अपवित्र साधनों से प्राप्त किया गया लक्ष्य पवित्र नहीं रह जाएगा । तिलक महाराज ने जब अपना आन्दोलन चलाया तो उन्होंने 'एक पैसा' फंड शुरु किया । इसका सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि उनका आन्दोलन वास्तव में जनता का आन्दोलन बने । सब उसमें बराबर के भागीदार बनें । कोई धन-बल से आन्दोलन को हथिया न ले ।

किसी लक्ष्य में सहयोग देने में दाता का भाव सबसे महत्त्वपूर्ण होता है । आज भी गिलहरी द्वारा सेतुबंध के निर्माण में दिए गए सहयोग की चर्चा बड़े आदर से होती है । भगवान बुद्ध जब धर्मप्रचार के लिए निकले थे तो लोग अपने-अपने हिसाब से उसमें सहयोग दे रहे थे । एक दिन शाम को उनके प्रिय शिष्य आनंन्द ने पूछा- शास्ता, आज की सभी भेंटों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भेंट कौनसी है ? बुद्ध ने सारे हीरे-जवाहरात, सोने-चाँदी को छोड़ एक अधखाया अनार उठा कर कहा – यह अधखाया अनार । आनंद चकित । कैसे ? बुद्ध ने स्पष्ट किया- जिस बुढ़िया ने यह अनार भेंट किया है, हो सकता है उसके पास इसके अलावा देने के लिए और कुछ हो ही नहीं । वह इसे खा रही होगी । हो सकता है कि उसे और भूख रही हो किन्तु उसने अपनी भूख की परवाह नहीं की और स्वयं भूखे रहकर यह अनार मुझे भेंट में दे दिया हो । पर जिन लोगों ने स्वर्ण, रत्न दिए हैं उनके पास अभी भी अपार सम्पदा है, उन्हें इस दान से कोई फर्क नहीं पड़ा है । इसलिए बुढ़िया का यह अधखाया अनार सबसे बड़ा दान है, सबसे बड़ी भेंट है, सर्वस्व समर्पण है इसलिए अतुल्य है । भगवान कृष्ण ने दुर्योधन के मेवों से अधिक महत्त्व विदुर-पत्नी के शाक-पात को दिया ।

जिसे भारतीय बोध कथाओं और चिंतन का थोड़ा सा भी ज्ञान है उसे ये बातें बहुत नई और विचित्र नहीं लगेंगी । इस आलेख के शुरु में इन बातों का ज़िक्र करने का कारण है- दो खबरें । एक खबर है इंडोनेशिया की । जहाँ कुछ समय पहले तूफान और उसके बाद ज्वालामुखी के विस्फोट की दो प्राकृतिक आपदाएँ आईं । इन घटनाओं के बाद एक समाचार आया कि किसी पामेला एंडरसन नामक माडल ने किसी पत्रिका को एक न्यूड पोज देकर मिले २५ हजार डालर इंडोनेशिया की एक संस्था 'वेव्स फॉर वाटर' को दान दिए जो लोगों को साफ पानी उपलब्ध करवाती है । इसके बाद एफ.पी.आई. नामक एक इस्लामी संस्था का बयान आया कि इंडोनेशिया पर ये प्राकृतिक आपदाएँ इसलिए आईं कि उसने पामेला एंडरसन की हराम की कमाई का पैसा दान में लिया । किसी माडल का जीविकोपार्जन का साधन ही जब फोटो खिंचवाना है तो यह पैसा चोरी, डाका या हराम का तो नहीं कहा जा सकता । यह बात और है कि आपको इस प्रकार उपार्जन नहीं करना चाहें यदि आपके पास जीविका के कोई और शालीन साधन उपलब्ध है ।

विकिलीक्स के अनुसार इसी प्रकार का एक और समाचार है- पाकिस्तानी आतंकवादी हज के बहाने बार-बार अरब देशों में जाते थे और वहाँ के अमीर लोगों द्वारा निकाली गई ज़कात में से अपने देश के गरीब लोगों को हज़ करवाने के नाम पर चंदा लाते थे । उस चंदे के धन से मुम्बई आतंकवादी हमलों की साजिश रची गई ।

इन दोनों घटनाओं से दो पक्ष उभरते हैं । एक तो माडल द्वारा दिया गया दान- जिसे आप उसके व्यवसाय के प्रति अपनी व्यक्तिगत धारणा के कारण बुरा बता सकते हैं मगर उसका उद्देश्य बुरा नहीं था । यह दान किसी संकीर्ण मज़हबी या सांप्रदायिकता के भाव से भी नहीं दिया गया था । इस मामले में अधिक से अधिक यह हो सकता था कि संस्था के अधिकारी उसमें से गबन करके लाख-दो लाख रुपया हड़प जाते । इसी तरह दूसरा दान है जकात में से हज़ के लिए चंदा । हो सकता है कि चंदा देने वाले का उद्देश्य शुद्ध मज़हबी रहा हो । मगर इसमें कोई बड़ा मानवीय दृष्टिकोण नज़र नहीं आता । यह एक प्रकार से स्वर्ग प्राप्ति के लालच में दी गई फीस है ।

आज जब सारी दुनिया में चंदा एक बहुत बड़ा धंधा बन गया है और सभी तरह के चालाक लोग और यहाँ तक कि सरकारें तक इसमें घुस गए हैं तो फिर या तो पुण्य अपने हाथों से लिया जाए या फिर बहुत सोच-समझकर दान दिया जाए । पाकिस्तानी सरकार आतंकवाद से लड़ने के नाम पर मिल रहे चंदे के बल पर चल रही है । अपने यहाँ भी गौशाला का चंदा खाने का रिवाज़ बहुत पुराना है । अनाथालय, भंडारा, मंदिर निर्माण आदि बहुत से कामों के लिए चंदा चुगने वाले बसों से लेकर टी.वी. तक में दिख जाएँगे ।

इसलिए सबसे मुख्य बात यह है अब दान किसी मज़हब के नाम से नहीं बल्कि महत्त्वपूर्ण मानवीय कार्य के लिए दिया जाए जिस पर निर्विवाद और निःस्वार्थ लोगों की निगरानी हो वरना कोई पता नहीं कि आपका दान किसी आपराधिक कार्य को बल प्रदान कर रहा हो । तभी हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि दान किसे दिया जाए ?

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् । । गीता १७:२०
अर्थात् 'देना ही है' इस भाव से किसी ऐसे को दिया दान जो बदले में उपकार न कर सके, और स्थान, समय और पात्र की पात्रता को ध्यान में रख कर दिया जाये, वह दान सात्त्विक कहलाता है ।

५-१२-२०१०


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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

1 comment:

  1. फतवा जारी करने वालों की मानसिकता के बारे में क्या कहा जाये..

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