Mar 7, 2012

सम्पूर्ण भारत का धर्म परिवर्तन



तोताराम के बेटे प्राइवेट नौकरी करते हैं । प्राइवेट नौकरी में हालात क्या हैं यह किसी से छुपा नहीं है । मालिक का बस चले तो एक पैसा न दे और काम करवाए दिन में २५ घंटे । और तोताराम को पेंशन कितनी मिलती है यह भी हमें पता है । किसी तरह से घुटने मोड़ कर रजाई के छोटे दिखने के अहसास को भुलाए हुए हैं । २००९ में अगस्त के महिने में एक समाचार पढ़ा था कि जिनके अभिभावकों की वार्षिक आय अढ़ाई लाख रु. सालाना से कम है उनके बच्चों को उच्च अध्ययन के लिए बिना ब्याज ऋण मिलेगा । सो तोताराम के पोते को भी कालेज में भर्ती करवा दिया गया और तोताराम रोज उस योजना के आदेश आने के बारे में बैंक के चक्कर लगाने लगे ।

कुछ दिनों बाद तो हालत यह हो गई कि बैंक में घुसते ही चपरासी ही कह देता- मास्टर जी, आदेश नहीं आए । कुछ और दिन बीते तो तोताराम को पहली तारीख़ को पेंशन लेने जाने के अलावा यदि बैंक के आसपास के लोग तोताराम को देखते तो कह देते- मास्टर जी, आदेश नहीं आए । और अब मामला यहाँ तक पहुँच गया है कि यदि उसे बैंक के पास से गुजरना हो तो वह लोगों के मज़ाक से बचने के लिए पहले ही कह देता है कि बैंक नहीं, कहीं और जा रहा हूँ ।

अब तोताराम को विश्वास हो गया है कि या तो वह खबर झूठी थी या उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है जैसे कि किसी सत्ताधारी दल के नेता का भ्रष्टाचार का केस । इसके बाद जब से रेडियों और अखबारों में प्रधान मंत्री के अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए पन्द्रह सूत्री कार्यक्रम का प्रचार शुरु हुआ है तब से तोताराम को पक्का विश्वास हो गया है कि वह घोषणा वास्तव में धर्म निरपेक्ष सरकार का कोई गुप्त एजेंडा था । अब वह संतोष कर चुका है और उसने बैंक जाकर उस योजना के बारे में पूछना बंद कर दिया है ।



हमने कल रात को इंटरनेट पर जब अमरीका के एक खोजी पत्रकार हेलन रेडके द्वारा किए गए उद्घाटन के हवाले से पढ़ा कि अमरीका के साल्ट लेक सिटी के सबसे तेज़ी से बढ़ते 'जीसस क्राइस्ट ऑफ लेटर डे सेंट्स चर्च' वालों ने २७ मार्च १९९६ को महात्मा गाँधी का बपतिस्मा या दीक्षा समारोह करवा दिया है ।
और इसकी पुष्टि या कन्फर्मेशन १७ नवंबर २००७ को साओ पाउलो ब्राजील टेम्पल में हुई । दीक्षा और कंफर्मेशन के बीच कुछ समय का अंतर रखा जा सकता है क्योंकि क्या पता नहीं, जिसे संत का दर्ज़ा दिया जाए वह कहीं शैतान न निकल आए । 



चर्चों में ऐसे लम्पटों की बहुत संभावना रहती है । क्योंकि चर्च में उच्च पद पर तैनात होने वालों को विवाह करने की इजाज़त नहीं होती । वे आजीविका के लिए ब्रह्मचर्य की घोषणा तो कर देते हैं मगर बिना अधिक मेहनत के बढ़िया खाना और उनके जैसी ही पेट के लिए ब्रह्मचारिणी बनी भक्तिनियों का साथ । ऐसे में कुछ भी संभव है । चर्चों के पादरियों की लम्पटता की लाखों शिकायतें वेटिकन में विचाराधीन हैं । कुछ को दण्डित भी किया गया है । पोप भी कई बार इस बारे में माफ़ी माँग चुके हैं । उन्होंने तो पादरियों द्वारा शोषित बच्चों की पीड़ा की तुलना ईसा की क्रूसिफिकेशन की पीड़ा तक से की है । खैर, यह उन धर्माधिकारियों की निजता का मामला है । वे जाने या फिर ऊपर वाला । जो करेगा सो भरेगा । यहाँ नहीं तो वहाँ । वैसे अगर ऐसा नहीं सोचें तो कर भी क्या सकते हैं ।

आज जैसे ही तोताराम आया हमने कहा- तोताराम, आज तेरे बहुत पुराने मामले का निबटारा हो गया । तोताराम ने आश्चर्य से पूछा- क्या मामला और क्या निबटारा ?
हमने कहा- अब तू, तेरे बच्चे, पोते-पोती सभी क्या, भारत के सारे सवर्ण ईसाई हो गए हैं । अब मनमोहन जी को उन्हें भी अपने १५ सूत्री अल्पसंख्यक कल्याण कार्यक्रम में शामिल कर लेना चाहिए ।


तोताराम ने कहा- ऐसा कैसे हो सकता है ? गाँधी जी को तो मरे हुए ६४ वर्ष हो चुके हैं और जब अमरीका में यह धर्म परिवर्तन का षडयंत्र रचा गया था तब भी उनको ऊपर पहुँचे हुए ४८ वर्ष हो चुके थे ।

हमने कहा- यह तो कानून की व्याख्या करने वालों के ऊपर निर्भर है । वे चाहें तो बैक डेट से भी कुछ भी कर सकते हैं । अपने को भी तो डी.ए. की किस्त बैक डेट से मिलती है कि नहीं ?

तोताराम ने फिर शंका उठाई- ठीक है मगर गाँधी को सभी भारतीय तो बापू नहीं मानते । वे कैसे ईसाई हो जाएँगे ? और फिर बाप के हिंदू होने पर जब खुद गाँधी जी का बेटा मुसलमान हो सकता है तो 'बापू' के ईसाई बनने पर क्या ज़रूरी है हमें ओटोमेटीकली ईसाई मान ही लिया जाए । वैसे मास्टर, गाँधी जी का नाम बदल कर क्या रखा गया होगा ? एम.के. गाँधी की जगह माइकल गिंडी कर दिया गया होगा । अपने देश की तरह तो है नहीं कि ईसाई बन कर अल्पसंख्यक होने का का लाभ भी ले लो और दिखाने के लिए हिंदू भी बने रहो जैसे कि अजित जोगी, अम्बिका सोनी, महेश भूपति, ओमन चांडी, जगन रेड्डी, माला सिन्हा, कल्पना कार्तिक, सिस्टर निर्मला, आचार्य के.के. चांडी, साधु सुन्दर सिंह, आदि ।

वैसे जहाँ तक हमने गाँधी जी के धर्म संबंधी विचार पढ़े हैं तो वे तो धर्म परिवर्तन के सख्त खिलाफ थे । वे कहते हैं कि संसार में जितने जीव हैं उतने ही धर्म हैं । इस प्रकार धर्म का अर्थ 'कर्त्तव्य' हो जाता है । अपना-अपना कर्तव्य ईमानदारी से करो और मस्त रहो, भगवान सब देखता है । फिर सब को एक धर्म में शामिल करने की सनक का क्या औचित्य है ?

हमने कहा- भैया, आज कल धर्म से बड़ा कोई धंधा नहीं है । आज भी दुनिया में विभिन्न देशों की सरकारों और धनवानों की सहायता से धर्म का प्रचार और धर्म परिवर्तन करवाने का धंधा बड़े ज़ोरों से चल रहा है अन्यथा सोचो कौन किस लिए अपने देश से हजारों मील दूर, विषम परिस्थितियों में जाकर; शिक्षा, चिकित्सा आदि के नाम पर लालच देकर लोगों का धर्म परिवर्तन करवाने के लिए भटकता फिरेगा ? धार्मिक स्थानों के पास करोड़ों अरबों के खजाने हैं । कई चर्चों ने तो कई करोड़ों के शेयर खरीद रखे हैं, ब्याज पर पैसे देने का धंधा करते हैं । भले ही ये श्रद्धालुओं को स्वर्ग नरक के चक्कर में डालते हों मगर ये अपने मन में जानते हैं कि स्वर्ग और नरक यही हैं । गरीबी नरक और अमीरी स्वर्ग है । और ये किसी न किसी तरह पैसे जुटा कर यहीं स्वर्ग भोग रहे हैं और भक्तों को मरने के बाद वाले स्वर्ग की आशा बँधा कर कमाई करते रहते हैं ।

तोताराम ने कहा- हिंदू धर्म तो धर्म परिवर्तन में विश्वास करता नहीं । उसके अलावा जो धर्म परिवर्तन करवाते हैं उन्हें अपने काम के अनुरूप ग्रांट मिलती होगी । इसलिए अपने ग्रांट बढ़वाने के लिए हो सकता है ये धार्मिक संस्थान झूठी लिस्टें बनाकर भी ऊपर भेज देते होंगे जैसे कि ‘मनरेगा’ में जिस-तिस का नाम लिखकर सरपंच, परवरि, ग्रामसेवक और बी.डी.ओ. पैसा उठा लेते हैं । तुझे याद नहीं, एक बार अपने एक साथी ने जनगणना में काम चोरी करते हुए स्कूल के विभिन्न क्लासों के रजिस्टर लेकर नाम उतार दिए थे और किसी को कुछ पता नहीं चला था । दुनिया के जाने किस-किस देश में यह धर्म परिवर्तन का धंधा चल रहा है और जाने कैसे-कैसे झूठे कागज बनाकर पैसा उठाया जा रहा है । हो सकता है किसी ने गाँधी का नाम भी ऐसे ही लिख दिया हो ।

हमने कहा- खैर अब तो सुनते हैं कि वे सारे कागज जल गए है या जला दिए गए हैं । चलो झंझट खत्म ।

तोताराम ने कहा- जाली काम के बाद अक्सर ऐसा ही होता है जैसे कि 'आदर्श हाउसिंग सोसाइटी' की फाइलों वाले कमरे में आग लग गई और सारी फाइलें जल गईं । और फिर इस खबर से कोई अधिक उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं है । अनूसूचित जाति, जन जाति तो पहले से ही विशिष्ट श्रेणी में हैं । फिर अन्य पिछड़ा वर्ग का नंबर आया । अब सिक्ख, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान, जैन, पारसी आदि शामिल हो गए । इन सब को ईसाई बने बिना ही फायदा मिलने लग गया है तो फिर तेरे यह ‘सारे भारत के ईसाई हो जाने’ की बात कुछ चलेगी नहीं ।

जो नाटक हो रहा है उसे एक सभ्य नागरिक की तरह सहन कर । अगर अधिक ही उचंग उठ रही है तो संविधान की एक प्रति खरीद कर ले आ, उसे कपड़े में लपेट कर एक पतरे पर रख ले और सुबह शाम उसकी मक्खियाँ उड़ाता रह । इसी में जो थोड़ी बहुत बची है वह कट जाएगी ।

१ मार्च २०१२

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

1 comment:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति| होली की आपको हार्दिक शुभकामनाएँ|

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