Sep 2, 2014

रोटियाँ कैसे फूलती हैं



(सन्दर्भ: क्लिंटन ने जयपुर की रसोई 'अक्षय-पात्र' रसोई में पूछा- ये रोटियाँ फूलती कैसे हैं ?)

हमेशा राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और उच्च स्तर के प्रश्न करने वाले तोताराम ने आज नितांत निम्न स्तर का, माया-मोह में लिपटा प्रश्न किया- मास्टर, रोटियाँ कैसे फूलती है ?

अब क्या उत्तर दें ? अरे, यह रोज़ का काम है | करोड़ों घरों में रोटियाँ बिलती हैं, सिकती हैं, कुछ कच्ची रह जाती हैं, कुछ ढंग से सिक जाती हैं, कुछ जल जाती हैं |कुछ फूल जाती हैं, कुछ नहीं फूलती हैं | हर रोटी का अपना-अपना भाग्य है | कुछ तवे से उतरने से पहले ही उतावले हाथों में आकर कच्ची पक्की का विचार किए बिना ही पेट में पहुँच जाती हैं | कुछ फूली हुईं भी एक के ऊपर एक पड़ी किसी खाने वाले का इंतज़ार करते-करते सूख या सड़ जाती हैं |

यदि वैज्ञानिक उत्तर दें तो यह कि जब नीचे से बहुत तेज़ आंच लगती है तो अपनी प्राण रक्षा करने के लिए रोटी फूलकर आग को डराती है या अपना आकार बढाकर उस गरमी को इधर-उधर विस्तारित करके बचने की कोशिश करती है जैसे कि कुछ जानवर खतरा सामने आने पर कभी अपने बालों , काँटों को खड़ा करके, अपना आकार बढाकर शत्रु को डराने की कोशिश करते हैं जैसे बिल्ली, सेही | ज़मीन पर अंडा देने वाली कुछ चिड़ियाँ भी अपने अण्डों के आसपास से गुज़रने वालों को अपने पंख फुलाकर डरती हैं |

लेकिन हमने एक सामान्य और स्वाभाविक उत्तर दिया- तोताराम, रोटी का उद्देश्य है किसी भूखे की भूख मिटाना | यही उसकी सार्थकता है | और जब रोटी देखती है कि कोई अपनी भूख मिटाने के लिए उसके सिकने का इंतज़ार कर रहा है तो रोटी को अति प्रसन्नता होती है और वह ख़ुशी के मारे फूल जाती है | इसी भाव से नजीर अकबराबादी ने लिखा है -

जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ |

 फूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियाँ ||

तोताराम को इससे संतोष नहीं हुआ | बोला- बन्धु, प्रश्न इतना साधारण नहीं है | यदि ऐसा ही होता तो विज्ञान में इतने अग्रणी देश अमरीका का भूतपूर्व राष्ट्रपति यह प्रश्न पूछने के लिए दल-बल सहित जयपुर में मिड डे मील बनाने वाली संस्था 'अक्षय पात्र' की रसोई में रोटियों के फूलने के बारे में शोध करने के लिए नहीं आता |भले ही क्लिंटन ने वहाँ खाना परोसा, खाया; लेकिन न नाचा न कूदा बस, एक ही महत्त्वपूर्ण और काम का प्रश्न पूछा- ये रोटियाँ फूलती कैसे हैं ?

हमने कहा- इसमें आश्चर्य करने की क्या बात है ? अमरीका में रोटियाँ बनती ही कहाँ है ? पिज़्ज़ा, ब्रेड, बर्गर मिलते हैं जो बड़े-बड़े कारखानों में बनते हैं और दुकानों में पड़े रहते हैं | खरीदो और खाओ | जिस देश में बच्चे दूध देने वाले पशु के रूप में फ्रिज और अंडे के बारे में इतना ही जानते हैं कि अंडे पेड़ों पर लगते हैं, उन्हें रोटी के फूलने का क्या पता | उनके लिए तो जो कुछ बाज़ार खिला दे सो ठीक है |

अमरीका में तो दो ही तरह के फूलने की चिंता है- एक तो मोटापे के कारण वयस्कों के शरीर फूलने की और दूसरे स्कूलों में निरोध का उपयोग करने में लापरवाही करने पर वाली कुंवारी किशोरियों के पेट फूलने की |


कहने लगा- बात इतनी सरल नहीं है | तू नहीं समझेगा इस चतुर देश की दूरगामी योजना | रोटी फूलने की इस तकनीक को जानकर अब यह ऐसी चीजें बनाएगा जो दिखने में बहुत फूली और बड़ी होंगी | फिर उन्हें हमारे जैसे बेवकूफ देशों को बेचेगा लेकिन तोल कर नहीं बल्कि गिनती से | जब तक घर पहुंचोगे तब तक बीस किलो समझकर ख़रीदा माल ५०० ग्राम का हो जाएगा या जैसे यहीं के पानी में एक रूपए का पाउडर मिला कर उसमें झूठा उफान लाकर दस रूपए में बेच दिया जाता है जिससे शरीर को कीटनाशक के अलावा मिलता कुछ नहीं |

१९ जुलाई २०१४


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Jul 11, 2014

सब मिलकर पी जाएँगे सौ करोड़ का नीर (केन्द्रीय बजट २०१४ : दोहात्मक प्रतिक्रिया)



१. (नदियों के किनारे घाटों के विकास के लिए १०० करोड़ )

संसद-नदिया-घाट पर संत जनों की भीर ।
सब मिलकर पी जाएँगे सौ करोड़ का नीर ॥

२. (नदियाँ जोड़ने के अध्ययन के लिए १०० करोड़ )

नदियाँ तो जुड़ जाएँगीं पर सब चिंता-लीन ।
सौ करोड़ को किस तरह बाँटें बन्दर तीन ॥

३.(युद्ध-स्मारक के लिए १०० करोड़ )

पहले स्मारक बने अथवा पहले युद्ध ।
बँटवारा ही बन गया संकट विकट विशुद्ध ॥

४.(गंगा सफाई के लिए २०३७ करोड़ )

भोले बाबा करेंगे इनको कैसे माफ़ ।
गंगा गन्दी ही रही बजट हो गया साफ़ ॥

५. (अलग-अलग राज्यों में खेल अकादमियां)

सब राज्यों में चल पड़ा खुल्लम-खुल्ला खेल ।
नए बजट के फंड को कैसे डालें पेल ॥

६. ( नए बजट में जूते सस्ते )

जूते सस्ते हो रहे जाने क्या हो हाल ।
डर कर अपनी खोपड़ी जनता रही सँभाल ॥

७. (वरिष्ठ जनों को टेक्स सीमा में छूट )

जब आमद ही नहीं तो व्यर्थ टेक्स में छूट ।
अरुण जेतली कर रहे झूठे यश की लूट ॥

८. (नए बजट में खैनी पर टेक्स बढ़ा )

लालू खैनी रगड़कर टाइम रहे गुज़ार ।
उस पर भी कर लगाकर करते अत्याचार ॥

९. (उत्तर-पूर्व में २४ घंटे 'अरुण-प्रभा' खेल चेनल )

उत्तर-पूरब में रही प्रभा अरुण की फैल ।
हैं विकसित सरकार के सब आभासी खेल ॥

१०. (नए बजट में टी.वी. सस्ते )

टी.वी. सभी प्रकार के सस्ते मिलें, खरीद ।
हलवे से सुन्दर दिखे जिनमें सूखी लीद ॥

१० जुलाई २०१४


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२०१४ का बजट - दिल छोटा नहीं करते

अरुण जी
आपने बजट पेश किया । करना ही था । यह एक प्रकार से जनता के पसीने की कमाई का वार्षिक श्राद्ध है जिसे हर वित्त मंत्री को करना होता है । इस साल आप कर रहे हैं । सब अपने-अपने हिसाब से प्रतिक्रिया दे रहे हैं । ये सब वे हैं जिन पर किसी बजट का कोई असर नहीं पड़ता । इन सब के अपने-अपने साधन-स्रोत हैं । हम तो आपकी इस बात से खुश हैं कि शाब्दिक ही सही कुछ सहानुभूति तो ज़ाहिर की ।

आपने कहा- काश ! मैं टेक्स-पेयर को कुछ दे पाता । हम तो आपके पैदा होने के दस-बारह वर्ष पहले से देखते आ रहे हैं । सब बेचारे टेक्स-पेयर से लेने के चक्कर में ही रहते हैं । सो आप भी लें । हम तो इसे खाने से पहले अछूता निकालने की तरह दरिया में डाल देते हैं । मछली-मगरमच्छ जो चाहे खाए ।

आपने अपनी कुछ न दे पाने की मज़बूरी ज़ाहिर कर दी, हमारे लिए तो यही बहुत है । हम तो 'उल्फत न सही, नफ़रत ही सही, इसको भी मुहब्बत कहते हैं ' वाले आशिक हैं । आपने सीनियर सिटिज़न के लिए टेक्स की सीमा बढ़ाई, बहुत-बहुत धन्यवाद । यदि दस-बीस हजार घटा भी देते तो हमें हुछ फर्क पड़ने वाला नहीं था ।

आप मात्र इकसठ वर्ष के हैं । हम तो आपका खल्वाट देखकर आपको अडवाणी जी की उम्र समझते थे । और आप निकले हमसे भी दस-बारह वर्ष छोटे ।
सच, काम और बोझ की अधिकता आदमी को समय से पहले बूढ़ा बना देती है । ठीक है कि आप बहुत कर्मठ हैं लेकिन यह भी तो ठीक नहीं कि आप पर दस मंत्रियों का बोझ डाल दिया जाय । दो-दो विभाग और वे भी तगड़े वाले । तभी आज तक किसी भी वित्त मंत्री को बजट पेश करते हुए कमर दर्द नहीं हुआ । इतने लोग पड़े हैं लेकिन एक अकेले आप पर ही इतना बोझ क्यों डाला गया ?

दिन में एक सौ बीस करोड़ की चाय-बीड़ी, नमक-तेल का हिसाब रखें और रात को पकिस्तान, चीन और बंगलादेश की सीमाओं पर पहरा दें । अब कमर दर्द नहीं होगा तो क्या होगा । अब तक जो वित्तमंत्री थे वे यहीं आसपास से सामान जुटा कर रख देते थे । पर ‘अच्छे दिनों’ के चक्कर में मोदी जी ने आपको द्रोणाचल से संजीवनी लाने भेज दिया । हनुमान जी की बात और थी । वे तो वज्र के थे । हम तो साधारण आदमी हैं । ठीक है, आप में उत्साह और लगन है लेकिन आदमी की शक्ति की भी एक सीमा होती है । कमर की भी क्या गलती । उठाने वाला एक और बोझ एक सौ बीस करोड़ आदमियों का । लोगों के लिए एक छोटा-सा परिवार चलाना मुश्किल हो जाता है ।
यह कमर-दर्द भी दाँत-दर्द की तरह बहुत गन्दी तकलीफ़ है । ‘जाके पैर न फटी बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई ’ । हमें पता है । बाहर से कुछ नहीं दीखता लेकिन ज़रा-सा भी पोस्चर गड़बड़ हुआ तो दर्द का ऐसा काँटा-सा चुभता है कि बस ।

खैर, आपको विभाग दिए तो महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन ये ही वे दो विभाग हैं जिनमें सबसे अधिक आलोचना झेलनी पड़ती है । अब तक हमने देखा है कि सब वित्त मंत्री आज तक घाटे का बजट बनाते रहे हैं । अरे, जब है ही घाटा तो किससे क्या उम्मीद कर रहे हो ? और आपको पता है कि सारे झगड़े होते ही घाटे के हैं । जब अनाप-शनाप पैसा हो तो किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं रहती । चाहे दो सौ करोड़ खर्च करके पत्नी का जन्मदिन मनाओ या बेटे को दो करोड़ की कार भिड़ा देने के लिए दे दो ।

अब जब पैसा लिमिटेड हो और देश को बनाना हो पेरिस और लन्दन, तो खींचतान तो होगी ही । इस देश के लोग भी वास्तव में बड़े लीचड़ हैं । न मूर्तियाँ देखकर खुश होते हैं, और न टी.वी. से, न कम्प्यूटर से, न आधुनिकतम सेल-फोन से । हर समय आलू-प्याज, रोटी-पानी । पता नहीं, किस अकाल की पैदाइश हैं ये लोग !

आप तो अपनी गति से चलते रहिए जैसे अब तक के वित्तमंत्री चलते रहे हैं । हाथी को अपनी मस्ती में चलते रहना चाहिए । भौंकने वाले ऐसे ही भौंकते रहते हैं । घाटे का बजट बनाइए, और टेक्स लगाइए और जो कमियाँ हैं उनके लिए पिछली सरकार को दोष दीजिए । यही भारत की राजनीति की समृद्ध परम्परा है ।

आपने कुछ न कर पाने का अफसोस जता कर हमारे दुखते घुटनों पर महानारायण तेल लगा दिया । अब आप जो संजीवनी लाए हैं वह सडसठ साल से बेहोश लक्ष्मण को जिंदा करने के लिए सूर्योदय से पहले पहुँचेगी या नहीं यह विधाता जाने । हो सके तो इस संजीवनी की दो बूँदें आत्महत्या कर चुके किसानों, भूख और कुपोषण से मर चुके बच्चों के नाम से भी आकाश में छींट दीजिएगा । क्या पता, अब तक नेतृत्वों का पाप प्रक्षालन हो जाए ।

हमने तो जो सुख देखने थे सो इन बहत्तर वर्षों में देख लिए ।

११ जुलाई २०१४

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Jun 22, 2014

तोताराम के तर्क और ज्योतिष-सम्राट श्री श्री शीतलाप्रसाद

भारत में जनवरी २०१४ में एक चाय शुरू हुई थी जिसने दिल्ली पहुँच कर दम लिया । अब बच गया खाली कप जिसके लिए ब्राज़ील में मारामारी चल रही है । खिलाड़ियों के सात्त्विक उत्साह की वृद्धि करने और ब्राजील की अर्थव्यवस्था के विकास में सहयोग देने के लिए एक लाख वेश्याएँ भी तैयार हो रही हैं । सुनते हैं कोई ३० लाख गुण-ग्राहक भी पहुँच चुके हैं । इस कुम्भ में सब एक महीने तक स्नान करके, पुराने पाप धोकर, फिर नए पाप बटोरने के लिए चार साल के लिए अपने-अपने धामों को चले जाएँगे ।

दीन-दुनिया की समस्याएँ तो ज़िन्दगी से जुड़ी हैं, यह नहीं तो वह । इनका क्या रोना-गाना ? सो इराक और उत्तर-प्रदेश में बलात्कार जैसी छोटी-मोटी समस्याओं को दरकिनार करके हम चार वर्ष में एक बार आने वाले इस कप के बारे में विचार कर रहे थे कि गाली-गलौच, टँगड़ी, लँगड़ी और छाती में सिर की टक्करों आदि के बाद अंततः इस धर्म-युद्ध में कौन विजयी होगा ?

पिछली बार २०१० में दक्षिण अफ्रीका में हुए वर्ल्ड कप में कोई 'पॉल बाबा' नाम के ऑक्टोपस और 'हैरी' नामक एक मगरमच्छ टीमों की जीत-हार का भविष्य बता रहे थे तो इस बार ब्राजील में इसी काम के लिए सेबेकाओ नाम की एक २५ वर्षीय आत्मा ने कछुए के रूप में अवतार लिया है । सुना है चीन में भी, 'पंडित' नाम का भ्रम पैदा करने वाले एक पांडा भी भविष्य बताने के लिए तैयार हैं । संयुक्त अरब अमीरात में एक ऊँट महोदय भी इस काम में लगे हुए । वहाँ सब शाह ही होते हैं तो इन ऊँट महोदय का नाम भी 'शाहीन' है । वैसे हमारे राजस्थान में 'ऊँट' को मूर्खता का प्रतीक माना जाता है । मूर्खों का भविष्य हमेशा ऊँट से जुड़ा हुआ रहता है और हमेशा अनिश्चित रहता है क्योंकि पता नहीं, ऊँट किस करवट बैठेगा, खुद ऊँट को भी नहीं ।

तभी तोताराम प्रकट हुआ, पूछने लगा- क्या मंथन हो रहा है ?
हमने कहा- अब अगले पाँच साल के लिए मंथन का काम सैंकड़े से दहाई, दहाई से इकाई और इकाई से शून्य सीटों में रह गए नेताओं का है । अपन तो अब अच्छे दिनों के स्वागत की तैयारी करेंगे, फिलहाल फ़ुटबाल वर्ल्ड कप के विजेता के बारे में सोच रहे थे कि किसकी भविष्यवाणी सही निकलेगी- कछुआ जी की, पांडा जी की या ऊँट महोदय की ?

बोला- मास्टर, क्या हमारे यहाँ भविष्य वक्ताओं की कमी है जो इन विदेशी जानवरों पर आश्रित हो रहा है ? हर चेनल पर, हर अखबार में, हर गली-नुक्कड़ पर; कोई तोते से कार्ड निकलवाकर, कोई हाथ देखकर, कोई बैल से सिर हिलवाकर, कोई फूल का नाम पूछकर आदमी, देश, टीम ही नहीं, तुम्हारे कुत्ते, भैंस और साइकल तक का भविष्य बताने वाले मौजूद हैं । चल, बाहर चल । तेरी उत्सुकता का शमन करने के लिए विश्व प्रसिद्ध, ज्योतिष सम्राट, पंडित श्री श्री शीतलाप्रसाद पधारे हैं ।

जल्दी से ज्योतिषी जी का स्वागत करने के लिए तोताराम के साथ बाहर निकले तो कोई दिखाई नहीं दिया । पूछा- कहाँ है सम्राट ?


कूड़े के ढेर के पास खड़े एक मरियल से गधे की और संकेत करके बोला- ये कौन हैं ? ये ही तो हैं शीतलाप्रसाद जी ।


हमने कहा- यह तो गधा है ।



बोला- सीधा है इसलिए तुझे गधा दिखाई दे रहा है लेकिन याद रख, सभी ज्ञानी और महान लोग सीधे ही होते हैं । चमक-दमक तो नकली और लम्पट लोग करते हैं । पिछले जन्म में शीतला माता का वाहन था इसलिए शीतलाप्रसाद नाम है ।

अरे, भविष्य में क्या है ? दो का मैच हो या दो बड़ी पार्टियाँ चुनाव मैदान में हों तो दोनों को ही गुप-चुप और अलग-अलग लेकर जीत का भविष्य बता दो । एक तो जीतेगा ही । हारने वाला भले ही कुछ नहीं बोले लेकिन जीतने वाला तुम्हारे चमत्कार के गुण गाता फिरेगा और तुम्हारा धंधा चल निकलेगा । लेकिन ये औरों की तरह लोगों को उल्लू नहीं बनाते ।

वैसे ये भविष्य बताने की अपेक्षा, भविष्य बनाने-बिगाड़ने में अधिक रुचि रखते हैं । पिछले चौसठ साल से सरकारें बनाते-गिराते आ रहे हैं । ध्यान से देखो, इनकी बाईं जाँघ पर अमिट स्याही का अमिट गोल निशान । यही नहीं, इनके किसी भी सजातीय भारतीय बन्धु के यह निशान मिलेगा, विदेशी नस्लों का पता नहीं ।

यदि फ़ुटबाल वर्ल्ड कप के बारे में जानना चाहते हो तो मैच खेल रही दो टीमों को नंबर दे दो- एक और दो । और फिर इनके पीछे खड़े होकर श्रद्धा भाव से इनकी पूँछ के बालों को सहलाओ । यदि ये बाईं लात फटकारें तो एक नंबर की टीम जीतेगी और दाईं लात फटकारें तो दो नंबर की टीम जीतेगी । यदि दोनों लातें एक साथ फटकारें तो मैच ड्रा होगा ।

यदि इस प्रक्रिया में प्रश्नकर्त्ता के घुटने फूट जाएँ तो उसके लिए तोताराम उत्तरदायी नहीं होगा ।


१४ जून २०१४


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