Sep 13, 2015

कुछ भी खिला-पिला दे लेकिन.....

  कुछ भी खिला-पिला दे लेकिन....

हालाँकि अभी भादों का महिना चल रहा है लेकिन हमारे इलाके में वर्षा ऋतु समाप्त हो चुकी है | मई-जून की सी गरमी पड़ रही है |  दोपहर में बाहर निकला संभव नहीं है इसलिए मजबूरन घंटे-दो घंटे की झपकी ले लेते हैं | कोई दो बजे पोती ने आकर हमें जगाया- बाबा, दरवाजे पर बिना जूते, पगड़ी और फटी धोती पहने, गरीब-सा, दुबला-पतला एक आदमी खड़ा है और आपसे मिलना चाहता | अपना नाम सुदामा बताता है |

हमें नरोत्तमदास का खंड काव्य 'सुदामा चरित्र' याद आ गया जो कभी १९५४ में सातवीं क्लास में पढ़ा था | लेकिन हम तो द्वारकाधीश कृष्ण नहीं हैं और हमारा कोई सुदामा नाम का मित्र भी नहीं रहा |फिर भी उत्सुकतावश आगंतुक को बुलाया तो देखा, तोताराम ! 

हम कृष्ण की तरह दौड़ कर उसे बाहों में भरते उससे पहले ही वह हमारे चरणों में गिर पड़ा |हमने कहा- तोताराम यह क्या है ?


बोला- है क्या ? तुम्हारा नाम रमेश है और रमेश विष्णु का पर्याय होता है |विष्णु ने राम,कृष्ण के रूपों में अवतार लिए हैं | तो मेरे लिए तो तू ही राम और कृष्ण है | मैं तुम्हारा मित्र सुग्रीव हूँ, बाल-सखा सुदामा हूँ |
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हमने बात को बढ़ने से रोकने के लिए कहा- ठीक है, मित्र सुदामा | कहो, कैसे आना हुआ ? और यह तुम्हारी बगल में क्या है ? क्या भाभी ने फिर हमारे लिए चावल दिए हैं ? हमारी बात का उत्तर दिए बिना ही तोताराम अन्दर जाकर पत्नी से दो कप ले आया और अपनी बगल में दबा थर्मस खोलते हुए बोला- मित्र, आज मैं तुम्हारे लिए चाय लाया हूँ | तुम्हारी भाभी ने विशेषरूप से तुम्हारे लिए बनाकर भेजी है |कहती थी- रोज उनके यहाँ जाकर चाय पीते हो, शर्म नहीं आती ?  |आज तो उनके लिए मेरे हाथ की बनी चाय ले जाओ | 

हमने कहा- तोताराम, तू भले ही हमें मैगी खिला दे, कोकाकोला पिला दे, आंगनवाडी में पकने वाला पोषाहार खिला दे, मध्य प्रदेश में सरकारी नसबंदी शिविर में लगाया गया इंजेक्शन लगा दे | यह चाय पिए बगैर ही हमसे इसके बदले में बचा हुआ एक और लोक ले ले लेकिन हम यह चाय नहीं पी सकते |

बोला- क्यों ऐसी क्या बात है ?

हमने कहा-बन्धु, इस समय चाय इस देश के लिए बहुत भारी पड़ रही है | इसका क़र्ज़ चुकाए नहीं चुक रहा है | कल को तू कहेगा- द्रौपदी का चीर बढाया तो मेरी चाय के बल पर, गीता का उपदेश दिया तो मेरी चाय के बल पर |और अगर इस जन्म की बात करेगा तो कहेगा कि रमेश जोशी एम.ए. हिंदी में मेरिट में आया तो मेरी चाय के बल पर | इस एक चाय में तू हमारी सारी उपलब्धियों का कचरा कर देगा | हम नहीं पिएँगे तेरी चाय |

तोताराम ने हमारे पकड़ते हुए कहा- बन्धु, यह किसी नेता का वक्तव्य नहीं है जो बदल जाए ; यह तुम्हारे लघु भ्राता और बालसखा का तोताराम का वचन है | किसी से चाय की चर्चा भी कर दूँ तो तेरा जूता और मेरा सिर |

हमने कहा- ठीक है, तू किसी से इसके बारे में कुछ नहीं कहेगा लेकिन आजकल इस देश में  चाय  के  साथ एक चक्कर और भी चल रहा है | लोग अपने सहयात्रियों  को नशीली चाय पिलाकर  बेहोश करके लूट भी लेते हैं | तू बुरा नहीं है फिर भी ज़माना खराब है | इसलिए चाय तो हम नहीं ही पिएँगे |

तोताराम ने चाय थर्मस में डाली, थर्मस को बगल में दबाया और बिना कुछ कहे चला गया |

Sep 11, 2015

शराब, साहित्य और शौर्य

  शराब, साहित्य और शौर्य 

इस शीर्षक में केवल समास ही नहीं एक सामासिक संस्कृति भी झलकती है | शराब विभिन्न विचारधाराओं, जातियों, समाजों,धर्मों आदि के भेद को समाप्त कर देती है |भले ही दो देश या पड़ोसी या चार भले आदमी साथ मिल बैठ नहीं सकते लेकिन चार शराबी सारे भेदों के बावजूद शाम को मिल बैठ ही लेते हैं |और जब थोड़ा शुरूर आ जाता है तो, न तो अपने गिलास का ध्यान रहता है और न ही अपने पराए का ख्याल |
जीवित तो जीवित, निर्जीवों तक के साथ अन्तरंग रिश्ते स्थापित कर लेते हैं |

 हजार नौकरी लेकिन मरने-मारने की भी क्या नौकरी ? कैसे कोई शराब के बिना किसी को मार सकता है ? तभी फिल्मों में जब कोई किसी की हत्या करने जाता है तो पहले एक बोतल बिना पानी के चढ़ाता है  | हमारे एक कवि मित्र हैं जो अपनी दो-चार कविताओं के बल पर भारत क्या विदेश-यात्रा तक कर आए हैं |भले ही लोग उनकी उम्र का लिहाज़ करके जूते नहीं फेंकते लेकिन कवि महोदय जानते हैं कि वे एक ही कविता पिछले पचास वर्षों से सुना-सुनकर श्रोताओं पर अत्याचार कर रहे हैं |पहले वे सूफी थे लेकिन एक बार उनसे मिलने गए |उस समय में वे मंच पर उतरने की तैयारी कर रहे थे अर्थात एक अन्य कवि के साथ एक ही गिलास में लगे हुए थे |हम यह पहली बार देख रहे थे |पूछने पर बोले- क्या करूँ बन्धु, अब डर लगने लगा है कि कहीं दर्शक हूट न कर दें सो थोड़ा साहस जुटा रहा हूँ |

अब विश्व हिंदी सम्मलेन से एक दिन पहले पूर्व सेना प्रमुख और वर्तमान मंत्री जी ने कह दिया कि पहले साहित्यकार सिर्फ खाने के लिए आते थे और शराब पीने के बाद ही काम के बारे में बातें करते थे | हमारे हिसाब से पहले शराब और फिर खाना होना चाहिए अन्यथा खाना खाने के बाद शराब पीने से उल्टी होने की संभावना रहती है | साहित्यकार खाने और शराब के बाद कम से कम बातें तो करते हैं |यह  बात और है कि बात क्या होती है यह न तो खुद उन्हें पता होता है , न सुनने वालों को और न ही उन्हें बुलाने वालों को |  ये बेचारे साहित्यकार कम से कम उस सलाही से तो ठीक ही हैं जो बिना बुलाए ओबामा द्वारा दी गई पार्टी में आया और शराब पीकर चला गया |


अरे भाई, कैसे भी हैं , कैसे भी करके घुसे हैं , कहने को तो तुम्हारे मेहमान ही हैं | होना तो यह चाहिए था कि प्रेम से ठहराते और जाते समय सब को एक-एक क्रेट व्हिस्की का दे देते |सच मानिए, ज़िन्दगी भर सारे देश में आपके गुण गाते फिरते |एक ने तो अपनी पीड़ा भी सुना दी कि लेखकों तो सस्ते किस्म की दारू मिलती है | वैसे यदि इन सम्मेलनों से ही कुछ होता तो अब तक पता नहीं विश्व शांति, पर्यावरण सुधार, हिंदी का विकास आदि न जाने क्या-क्या हो चुका होता |ठीक है, काम निबटा |अब इसके बिल बनाएँ और अगले सम्मेलन के लिए बजट आवंटन जुगाड़ें |

वैसे यदि शराब इतनी ही बुरी है तो क्यों राष्ट्राध्यक्षों के भोज में परोसी जाती है ? इस्लाम और सिक्ख धर्म में इसे हराम माना जाता है फिर भी सेना में समान भाव सबको दी जाती है और सेवन की जाती है | यदि इतनी ही बुरी है तो इसे बंद क्यों नहीं कर दिया जाता ? लेकिन बंद कैसे करें,कमाई का जरिया जो है |बिहार के एक जिले सहरसा में ही एक अरब रुपए का राजस्व मिलता है | अब जोड़ लो सारे देश का | 

वैसे हमारा मानना है कि सबसे बड़ा नशा तो धर्म और संस्कृति  का है जिसके बल पर सारी नेतागीरी हो रही है और चुनाव जीते जा रहे हैं |लगता कुछ नहीं, करना कुछ नहीं; बस अहंकार और गर्व जागृत कर दो और लोग बावले हो जाएंगे | बस, हो गया काम |

Sep 9, 2015

धोती :व्यापक विनाश का हथियार

    धोती  :  व्यापक  विनाश का हथियार 

तमिलनाडु में क्रिकेट क्लब में आयोजित एक समारोह में उच्च न्यायालय  के एक जज  हरिपरंथम को धोती पहने हुए होने के कारण अन्दर नहीं घुसने दिया गया | इस खबर को पढ़कर हमारा तो सिर  भन्ना गया | तोताराम और हमारी दौड़ तो मस्जिद तक भी नहीं है | तो दिल्ली और इंग्लैण्ड तक कहाँ होगी ? एक दूसरे से दुःख-दर्द की बातें कर लेते हैं, बस | 
आते ही हमने अखबार उसके सामने रख दिया | 
बोला- मुझे पता है | दुःखी होने की आवश्यकता नहीं है | सबके अपने-अपने नियम हैं |इसी में संतोष कर ले कि मुख्य-द्वार पर यह नहीं लिखवाया - 
 'कुत्तों और धोती पहनने वालों का प्रवेश वर्जित है' |
अमरीका जाने वाले अडवाणी, जोर्ज फर्नान्डीज़, अब्दुल कलाम ही क्या, शंकराचार्य तक की तलाशी ली जाती है, भारतीय राजनयिक की पगड़ी और केविटी चेक हो सकती है, लेकिन पोप और इंग्लैण्ड की महारानी की कोई तलाशी नहीं ले सकता | कोई गोरा अमरीकी पिस्टल और जिंदा कारतूस लेकर प्लेन में चढ़ जाए तो उसे उसकी भूल मानकर क्षमा कर दिया जाता है |हम मंदिर या किसी की समाधि या मज़ार पर जूते उतार कर जाते हैं  लेकिन बुश के सुरक्षा दस्ते के कुत्ते सुरक्षा कारणों से गाँधी की समाधि पर चढ़ सकते हैं  |  अपने-अपने नियम हैं | अब यदि क्रिकेट क्लब वाले धोती नामक इस व्यापक विनाश के हथियार के साथ अन्दर नहीं  जाने देते तो यह उनका व्यक्तिगत मामला है | वैसे भी जो जींस न पहने, तिरंगे पर बोतल रखकर दारु न पिए, अधनंगी लड़कियों के साथ डांस न करे, जो मैच फिक्सिंग या सट्टे में शामिल न हो वह क्लब में जाए ही क्यों, दूसरों का मज़ा बिगाड़ने के लिए ?

हमने कहा- लेकिन वहाँ कोई क्रिकेट का कार्यक्रम नहीं था | वहाँ तो किसी पुस्तक का विमोचन होना था | और फिर यह बता, धोती कोई आर.डी.एक्स. है या ए.के. ४७ है जिससे किसी को खतरा हो सकता है ? 

बोला- इसे तू क्या समझेगा ? इसे क्रिकेट की जन्मभूमि ब्रिटेन ही समझ सकता है या फिर उसके मानस-पुत्र | और फिर जब धोती आती है तो उसके साथ और भी बहुत सी खतरनाक चीजें आ जाती हैं जैसे- टोपी, पगड़ी, देसी जूते, खादी, मातृभाषा, भारतीय संस्कृति, स्वदेशी, स्वाभिमान आदि | धोती पहनने वाले  तिलक, गोखले, लाला लाजपतराय, गाँधी, राजेंद्र प्रसाद, पटेल आदि ने ही तो  अंग्रेज बहादुर का जीना हराम कर दिया था | जिन्ना जैसों से उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं रही |और फिर इन धोती वालों की देखा-देखी एशिया और अफ्रीका के देशों को भी स्वाधीनता की बीमारी लग गई और देखते ही देखते योरप के सारे उपनिवेश हाथ से निकल गए | 

आज भी धोती वाले अन्ना जैसे लोग ही उपभोक्तावाद,  बाजारवाद और आर्थिक उपनिवेशवाद के लिए खतरा बने हुए हैं | इन्हें विज्ञापन और विलासिता के साधनों से उल्लू नहीं बनाया जा सकता | इस प्रकार के लोगों की क्लब और माल्स में कोई रुचि नहीं होती | ये हजारों रुपए खर्च करके न होटल में जाना पसंद करते हैं और न ही क्रिकेट मैच देखना |ये हर समय मितव्ययिता के बारे में सोचते हैं | इनके भरोसे अर्थव्यवस्था का विकास नहीं किया जा सकता | धोती एक वस्त्र नहीं, एक मनोवृत्ति का प्रतीक है जो भारत को विकसित बनाने की राह में सबसे बड़ी बाधा है |

हमने कहा-तोताराम, हम तो तुम्हारे तर्क से कनफ्यूज़  हो गए हैं कि अच्छे दिन धोती पहनकर आएँगे या भारत की धोती उतरवाकर  ? 
 

Sep 7, 2015

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

आज तोताराम ने आते ही कहा-आज एक और जुमले का हस्र सुन | 
हमने कहा- बन्धु, आजकल  तो सभी तरह से समाचार देने के बावजूद कुछ अखबार 'नो निगेटिव न्यूज' का जुमला जोड़ने लगे हैं तो तू क्यों हमारे दिन की शुरुआत 'भ्रम-भंजन' से करना चाहता है ? कम से कम चाय तो शांति से पी लेने दे | 

बोला- चाहे रस्सी हो या साँप,  जितना जल्दी पता चल जाए, ठीक है | बिना बात का टेंशन तो ख़त्म हो |बात एक तरफ हो जानी चाहिए | अपने राजस्थानी में कहावत है- के तो सीता सतवंती, के फरड़क राण्ड |घिचपिच नहीं |

हमने  कहा- यदि भ्रम दूर हो गया तो फिर न तो लम्पट बाबाओं को कोई भगवान मानेगा, न नेताओं को सेवक और रक्षक | जन्नत का अस्तित्त्व भी तो भ्रम के बल पर ही  है | सुंदरी भी तभी तक सुंदरी है जब तक मेकअप का भ्रम है | भ्रम नहीं रहेगा तो कौन शादी के बूर (चोकर ) के लड्डू कौन खाएगा ?

फिर भी मजबूरन, लगभग ठंडी होने को आ रही चाय एक तरफ रखते हुए, हमने तोताराम को  कविता में स्वीकृति दी-
हे भ्रम-भंजक, हे लघु भ्राता |
जुमला-सत्य सुनावहु ताता |

कहने लगा- शायद तुमने समाचार नहीं पढ़ा | समाचार,  विश्वसनीयता का दावा करने वाले एक अखबार ने छापा है |स्थान का नाम तो नहीं दिया लेकिन केन्द्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी के अनुसार दुष्कर्म, छेड़छाड़ और महिलाओं के साथ मारपीट की घटनाएँ तब तक होती रहेंगी जब तक  दुनिया में मर्द और औरत हैं |जैसे कि कभी गृहमंत्री होते हुए अडवाणीजी ने कहा था- आतंकवाद तो ग्लोबल फिनोमिना है |सो इन्होंने भी एक ग्लोबल फिनोमिना बता दिया | अब जो अटल सत्य है उसके लिए इनको कुछ दोष भी तो नहीं दिया जा सकता |

हमने कहा- और यह कभी संभव नहीं हो सकता कि किसी देश या समाज में केवल मादा ही रहें या नर ही नर रहें | और मान ले यदि ऐसा संभव हो भी गया इन सत्कर्मों के लिए तो देश के न्यायालयों तक ने विपरीत लिंगी होने की बाध्यता भी ख़त्म कर दी है | लेकिन मंत्री हैं, सेवक है, विकास और सुशासन के मुद्दे पर चुने गए हैं तो यह नहीं हो सकता कि कोई उपाय नहीं बताया हो |

बोला- बताया है ना | कहा है- देश के हर गाँव में बारहवीं पास और इक्कीस वर्ष के अधिक की आयु की एक लड़की को पुलिस की ट्रेनिंग दी जाएगी | फिर यह लड़की उस गाँव की लड़कियों को सेल्फ डिफेन्स (आत्म-रक्षा )की ट्रेनिंग देगी |

हमने कहा- यह तो ज़िम्मेदारी से बचने वाली बात हुई जैसे कि खुद में तो रोजगार के अवसर सृजित करने की क्षमता है नहीं सो विदेशी उद्योगपतियों को बुला लो | वे लोगों को कम वेतन देंगे, हाड़-तोड़ काम लेंगे और जब जी चाहेगा निकाल देंगे |और श्रेय ये ले लेंगे कि देखो बेरोजगारी कम कर दी | 

कहने लगा-देश में कम से कम पाँच लाख गाँव  हैं  | सो  पाँच लाख लड़कियों को नौकरी तो मिलेगी | उसके बाद भी सफलता नहीं  मिली तो हर छेड़ी जा सकने योग्य लड़की को सरकारी सब्सीडी से एक-एक बंदूक दिलवा दी जाएगी |यह  बात और है कि  वे गोलियाँ और बंदूकें काम करेंगी या नहीं जैसे कि मध्य प्रदेश में परिवार नियोजन शिविर वाली दवाइयों ने जान बचाने की बजाय  महिलाओं जान  ही ले ली |लेकिन  'मेक  इन  इण्डिया'  के  तहत  विदेशी निवेश तो आ जाएगा |

हमने कहा- वैसे तोताराम, हमें लगता है- सरकार  ने  बहुत सफाई से अपने नारे में ही सब कुछ स्पष्ट लिख दिया है जैसे चतुर  कम्पनियां 'कंडीशन्स अप्लाई' के बहाने पतली गली निकल लेती हैं | 
 'बेटी बचाओ' का अर्थ है- हे अभिभावको, बेटी को बदमाशों से बचाने की ज़िम्मेदारी आपकी ही है |सरकार के भरोसे मत रहना  |सरकार को और भी बहुत से महत्त्वपूर्ण काम हैं |
और  'बेटी पढाओ' का अर्थ है- हे अभिभावको, अपनी बेटी को पढ़ाओ भी तुम खुद ही  क्योंकि हमने  परीक्षा और भर्ती घोटाले  करके  जो अध्यापक लगवाए हैं  उनके वश का पढ़ाना नहीं है  |