Jan 17, 2010

संतत्व और आत्मयंत्रणा

स्वर्गीय पोप जॉन पॉल द्वितीय जी,
आज कल तो आप ऊपर वाली दुनिया में हैं । पता नहीं स्वर्ग में हैं या नरक में । अवश्य ही स्वर्ग में ही होंगें । वैसे तो हर मरने वाले के आगे स्वर्गीय ही लगाया जाता है । आपके नरक में होने का तो प्रश्न ही नहीं । आप तो स्वयं लोगों को स्वर्ग का टिकट देने वालों में से हैं । लोग इसे पोप-लीला कहते हैं । वे नहीं जानते बड़े लोगों की लीलाएँ ही होती हैं । छोटे लोगों के तो करम होते हैं जिनका फल उन्हें यहाँ भोगना पड़ता है और वहाँ भी । कहते हैं एक बार एक दलित बड़े आदमियों की बेगार करते-करते परेशान होकर कुएँ में कूद गया । वहाँ भी जाते ही एक मेंढक ने पूछा- तू कौन जात है । जैसे ही बेचारे ने जात बताई, मेंढक उसके सिर पर चढ़ गया और बोला- मुझे कुएँ की सैर करवा । बेचारा बड़ा पछताया, जिस बेगार से बचने के लिए कुएँ में कूदा था वह कुएँ में भी तैयार मिली । तो यह किस्मत होती है साधारण आदमी की । आपकी बात और है । आपको तो वहाँ भी वी.वी.आई.पी. क्लास मिली होगी । आशा है आप वहाँ सानंद होंगे ।

यहाँ आपने ८४ वर्ष की लम्बी उम्र पाई । २७ बरस तक पोप रहे । इतनी लम्बी उम्र और इतना लम्बा राज करने का अवसर बहुत काम लोगों को मिलता है । यहाँ आपको संत की उपाधि देने की प्रक्रिया चल रही है । वैसे आपको तो संतत्व प्रदान करने में कोई देर नहीं लगनी चाहिए । आप तो खुद लोगों को संत बनाने वाले हैं । खुद ही खुद को डिग्री प्रदान कर लेते । पर यह ठीक नहीं लगता । वैसे संत बनाने की प्रक्रिया है बड़ी लम्बी । हजारों कागजात छाने जाते हैं । सैंकड़ों गवाहों के बयान लिये जाते हैं । संत बनाना क्या हुआ, भोपाल गैस त्रासदी और राम जन्म भूमि का केस हो गया । हमारे यहाँ तो हजारों संत हो गए हैं बिना किसी धर्माधिकारी के बनाये । वैसे हमारे यहाँ संत कोई प्राधिकरण नहीं बनाता, जनता बनाती है । जिसमें भी संत के गुण देखती है उसे ही संत कहने लग जाती है । आजकल की बात और है । जिसके पास भी पैसा होता है वही मीडिया में अपने को संत प्रचारित कर देता है । अपना अखबार या पत्रिका निकालने लग जाता है । केवल एक 'श्री' से संतोष नहीं होता तो डबल 'श्री-श्री' लगाने लग जाता है । कई तो अपने नाम के आगे श्री-श्री १००८ तक लगाते हैं । हो सकता है कि प्रतियोगिता में यह संख्या लाखों-करोड़ों में पहुँच जाये । खैर ।

इनमें कुछ ही संत होते हैं, बाकी तो 'पहुँचे हुए संत' होते हैं । कुछ पार्टी विशेष के लिए वोट बैंक बनाते फिरते हैं । कुछ हथियारों की दलाली तक करते हैं । कुछ रंगरेलियाँ मनाते पकड़े जाते हैं । कुछ पर हत्या के मुकदमें चल रहे हैं । इनका करोड़पति होना तो सामान्य बात है । कुछ ने आश्रमों के नाम से अरबों रुपये की ज़मीनें घेर रखी हैं । आपके यहाँ भी सभी कोई भले आदमी थोड़े ही होते हैं । अकेले अमरीका में ही कोई तीन हज़ार पादरियों के ख़िलाफ़ बच्चों के साथ यौन दुराचरण के आरोप हैं । सारी दुनिया में तो पता नहीं, लाखों होंगे । संत या पादरी बनने वाले स्वयं को दूसरों से कुछ खास दिखाने के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत लेने का नाटक करते हैं । वास्तव में ब्रह्मचर्य सबके लिए होता भी नहीं । सबके बस का भी नहीं है यह व्रत । हमारे यहाँ तो कबीर, नानक, रैदास, तुलसी सभी गृहस्थी हुए हैं । आदमी का मन साफ हो, त्याग और संयम का स्वभाव हो तो वह भी किसी तपस्वी से कम नहीं होता, पर उसमें मुफ़्त का माल खाने को नहीं मिलता । तभी ऐसे संतों के लिए कबीर ने कहा है-
मूँड मुँडाये तीन गुण, मिटी टाट की खाज ।
बाबा बाज्या जगत में, मिल्या पेट भर नाज ॥


पर केवल मूँड मुँडाने से ही कुछ नहीं होता । तभी वे आगे कहते हैं-
मूँड मुँडाये हरि मिले, तो सब कोई लेय मुँडाय ।
बार-बार के मूँडते, भेड़ न बैकुंठ जाय ॥


आपके संतत्व के समाचार में ही यह भी पढ़ा कि आप अपने को नियमित रूप से कोड़े मारा करते थे- पापों के पश्चाताप और अपराधबोध-स्वरूप । ऐसा आपके निकट रहने वाली नन तोबिआना सोबोद्का ने बताया और इसकी पुष्टि आपके सेक्रेटरी एमेरी कोबोंगो ने भी की है । आप ऐसा क्यों करते थे हमें किसी सूचना के अधिकार के तहत जानने का अधिकार नहीं है । यह आपका नितांत निजी मामला है । हम तो इतना ही कह सकते हैं कि यदि व्यक्ति से कोई अपराध हो जाये और वह सच्चे हृदय से ईश्वर से क्षमा माँग ले तो भगवान उसके अपराध क्षमा कर देते हैं । वैसे हमें नहीं लगता कि आपसे ऐसा कोई जघन्य अपराध हुआ होगा जिस के लिए कोड़े खाए जाएँ ।

बड़े-बड़े अपराध करने वालों तक को किसी प्रकार का पश्चाताप नहीं होता । दुनिया के बहुत से देशों पर राज करने और वहाँ के लोगों पर अत्याचार करने के बावजूद ब्रिटेन के लोगों को किसी प्रकार की ग्लानि नहीं है । जब ब्रिटेन की महारानी यहाँ जलियाँवाला बाग में आईं तो उन्होंने जलियाँवाला बाग हत्याकांड के लिए क्षमा नहीं माँगी । अमरीका ने दुनिया भर से काले गुलामों को पकड़ कर उनसे काम करवाया और उन पर जाने कितने अत्याचार किये पर क्षमा आज तक नहीं माँगी । जर्मनी को भी लाखों यहूदियों को मारने का पश्चाताप नहीं है । पाकिस्तान ने भी बंगलादेश में कोई दसियों लाख लोगों का कत्लेआम कर दिया पर देखिये चहरे पर कोई शिकन नहीं है । आपका पोलैंड ही योरप का एक ऐसा देश है जिसने एशिया या अफ्रीका में अपना उपनिवेश नहीं बनाया ।

दुनिया में सभी मनुष्य गलतियों के पुतले होते हैं । प्रयत्न से ही व्यक्ति अपने में सुधार करता है । आपसे भी कुछ गलतियाँ हुई होंगी पर उनके लिए स्वयं को इतनी यातना देने की ज़रूरत नहीं थी और फिर बुढ़ापे में कहीं जोश-जोश में ज़रा ज़ोर से कोड़ा लग जाये तो मुश्किल हो जाये । पर खैर, अब तो आप इस संसार के सुख-दुखों से मुक्त हुए । वैसे आपको बता दें कि भगवान इतना क्रूर नहीं है । हमारे भगवान तो बड़े कंसीड्रेट हैं । तुलसी की रामचरितमानस में जब विभीषण राम से मिलने के लिए आया तो राम उससे कहते हैं- 'जो छल, कपट, अभिमान, मोह छोड़कर मेरी शरण में आता है मैं तत्काल उसे साधु के समान बना देता हूँ । जो सबको समान समझता है, ऐसा सज्जन मुझे उसी प्रकार से प्रिय है जैसे कि लोभी व्यक्ति को धन प्रिय होता है ।'

भगवान के प्रति यही समर्पण और शरणागतभाव महत्वपूर्ण है और यही सभी धर्मों का सार है । आप तो सब जानते हैं । आपको क्या समझाना । मास्टर हैं ना, सो समझाने लगे । धृष्टता के लिए क्षमा चाहते हैं ।

इटली में एक चित्रकार ने ईसा को काले रंग का बना दिया । उस पर बड़ा बावेला मचा था । आपने तो वहाँ देखा ही होगा कि भगवान किसी प्रकार का रंगभेद नहीं मानता । उसके बेटे तो सभी रंगों और नस्लों के हैं, फिर भेदभाव कैसा । पर लोगों को समझ आये तब ना । यहाँ मलेशिया में भी गोड और अल्लाह को एक साथ दिखाने के लिए मौलवियों ने अभी तक मंजूरी नहीं दी है ।

अभी इस दुनिया में सच्चे धर्म और ईश्वर को समझने के लिए बहुत कुछ किया जाना ज़रूरी है । भगवान से कहियेगा कि कुछ ठीक-ठाक सा इंतजाम करें । दुनिया धर्मों के झगड़ों से बहुत परेशान है ।

२५-११-२००९

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Jhootha Sach

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