Jul 26, 2010

शुद्ध के लिए युद्ध


तोताराम मंगलवार के बाद आज बृहस्पतिवार तक नहीं आया तो चिंता होना स्वाभाविक था । हालचाल पूछने गए तो देखा, तोताराम चारपाई पर लेटा है । खूँटी पर ग्लूकोज की बोतल लटकी है और बाएँ हाथ में सूई डालकर ड्रिप लगाई जा रही है । पूछा- क्या लू लग गई ? बोला- लू नहीं लगी मैं तो मंगलवार को एक सवामणी में जीमने चला गया था । वहाँ से आने के बाद उलटी और दस्त शुरु हो गए । डाक्टर ने बताया कि किसी मिलावटी घी के कारण फूड पोइजनिंग हो गया ।

हमें दुःख और आश्चर्य दोनों हुए । दुःख, तोताराम की अस्वस्थता पर और आश्चर्य, धार्मिक कार्य में भी बेईमानी होने पर । अधिकतर व्यापारी मंदिरों में दान देते हैं, भागवत कथा करवाते हैं, कलश-यात्रा में सर पर कलश रखकर जुलूस की अगवाई करते हैं, धार्मिक प्रवचन करवाते हैं और व्यापार करके पर्याप्त धन भी कमाते हैं । ठीक है, कमाएँगे नहीं तो भगवान को भोग किसका लगाएँगे । मगर हनुमान जी से थोड़े से अधिक फायदे के लिए यह बेईमानी अच्छी नहीं लगी । हम तो सोचते थे कि लोग और किसी देवता से चाहे न डरें पर हनुमान जी की गदा से तो डरते ही होंगे । अब यह भ्रम भी निकल गया । यह तो अच्छा हुआ कि हनुमान जी ने प्रसाद नहीं खाया वरना तो तोताराम की तरह ड्रिप लगवा रहे होते । देवता तो अंदर तक की सब बातें जानते हैं । जान गए कि घी मिलावटी है सो नहीं खाया । पर तोताराम तो कुछ भक्ति और कुछ स्वाद के चक्कर में खा गया और पड़ गया बीमार !

देवताओं का प्रसाद पहले भी बनाता था पर उसमें ज्यादा तामझाम नहीं होता था । गुलगुले बना लिए, पुए बना लिए, ज्यादा हुआ तो रोटियाँ चूरकर चूरमा बना लिया । सब कुछ अपने सामने, अपने हाथों से । मिलावट का प्रश्न ही नहीं । आजकल तो सारे काम ठेके पर होते हैं । सो मुनाफा मुख्य हो गया । जितना घटिया माल लगाएँगे उतना ही फायदा होगा । स्वाद और शुद्धता से किसे मतलब है । और फिर हनुमान जी कौनसे फूड इन्स्पेक्टर हैं जो नमूना लेकर आगे भेज देंगे । और आगे भेज भी दिया तो वहाँ क्या पैसा नहीं चलता । और अगर नाराज़ होंगे तो सवामणी का प्रसाद करवानेवाले से होंगे । इससे अच्छे तो बताशे और नारियल ही थे । मिलावट की संभावना नहीं होती थी ।

हमने तोताराम को समझाया- धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा । तेरी तबियत और शुद्ध चीजों की उपलब्धता । सुनते ही तोताराम भड़क गया, बोला- सरस डेरी पर नकली दूध पकड़ा गया, अलवर में तीस लाख लीटर नकली घी पकड़ा गया तब क्या सरकार सो रही थी ? अब भी उन घपलों पर किसी प्रगति का कोई समाचार नहीं है । सरकारी विद्यालयों में मुफ्त वितरण के लिए पुस्तकें दी जाती हैं तो सौ की जगह नब्बे दी जाती हैं और बची हुईं दस प्रतिशत दो नंबर में या रद्दी में बेच दी जाती हैं । डिपो पर सरकारी बसों में डीज़ल भरा जाता है तो पाँच लीटर की जगह साढ़े चार लीटर भरा जाता है और बचा हुआ दस प्रतिशत ऊपर वालों के पेट में चला जाता है । दो रुपए वाला गेहूँ बँटवाने के लिए सरकारी कर्मचारी दुकानों पर ड्यूटी देते हैं । पता नहीं उस कर्मचारी की ड्यूटी कौन देता होगा तिस पर कर्मचारियों को बार-बार बदला जा रहा है कि कहीं उनकी दुकानदार से साँठगाँठ न हो जाए । मतलब कि सरकार को अपने कर्मचारियों पर इतना भी विश्वास नहीं है । भ्रष्टाचारी स्वस्थ हैं और सरकार पस्त ।

इस स्थिति में मुझे लगता है कि मुझे ही एक जागरूक उपभोक्ता, जागरूक नागरिक और ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ करने वाला जुझारू सिपाही बनना पड़ेगा । बस थोडा सा ठीक हो जाऊँ फिर 'शुद्ध के लिए युद्ध' पर निकालूँगा । और किसी अधिकारी के झंडी दिखाने का इंतज़ार नहीं करूँगा बस, निकल ही पड़ूँगा ।

३-६-२०१०

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Jhootha Sach

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