Sep 14, 2015

रोटी की भाषा बनाम जीवन की भाषा

रोटी की भाषा बनाम जीवन की भाषा

जन्म से पूर्व से न भी मानें तो, जन्म के बाद से तो निश्चित रूप से शिशु अपने आसपास के व्यक्तियों की बातें, अन्य विभिन्न जीवों की आवाजें और विविध ध्वनियाँ सुनता और समझता रहता है |सुनते समय वह उन्हें देखता भी है और फिर उनके अनुकरण पर स्वयं भी संबंधित ध्वनि-अवयवों का सही उपयोग करते हुए, वांछित उतार-चढ़ावों के साथ उसका उच्चारण करने का प्रयत्न भी करता है |उनके अर्थों और भंगिमाओं को भी समाहित करता है |यह उसके जीवन की भाषा है जिसमें वह सभी अभिव्यक्तियों को समझता है और खुद को भी अभिव्यक्त करता है |उसके सुख-दुःख, उल्लास, अवसाद, संकेत, व्यंजना सभी उसके संवाद के व्यक्त और अव्यक्त अंग बनते चले जाते हैं |यह उसकी अभिव्यक्त का एक संपूर्ण और लगभग सही रूप होता है |

इसके बाद वह अपने विद्यार्थी जीवन में विभिन्न विषयों की शब्दावली और उसका उपयोग सीखता है |इसके बाद वह इस ज्ञान से अपना जीविकोपार्जन करता है |इसके दौरान वह विभिन्न प्रकार के लोगों से इसी सिलसिले में संवाद भी करता है |इस प्रकार उसकी भाषा का विस्तार होता चलता है |कभी-कभी वह अपने ज्ञान वर्द्धन, व्यापार, जीविका के लिए अन्य भाषा के संपर्क में आता है |पहले यह सभी के साथ नहीं होता था क्योंकि व्यक्ति का क्षेत्र अपने आसपास तक ही सीमित होता था |इसलिए एक भाषा से ही उसका काम चल जाता था |

पहले भी विद्वान लोग, अन्य भाषाओं में संचित ज्ञान  को प्राप्त करने और उसका लाभ अपने समाज को पहुँचाने के लिए कई-कई भाषाएँ सीखते थे |बहुभाषा-भाषी विद्वानों द्वारा विश्व में ज्ञान का प्रचार-प्रसार हुआ |भारत में इस्लाम के आगमन से पूर्व भी अरब देशों और उनके माध्यम से भारत का मध्य एशिया और योरप  से  संपर्क हुआ और ज्ञान का आदान-प्रदान हुआ |चीन आदि देशों से भी बहुत से जिज्ञासु और विद्वान भारत में आए और उनके माध्यम से भारत और पूर्वी देशों में बौद्ध धर्म, दर्शन और ज्ञान-विज्ञान का आदान-प्रदान हुआ |उस समय के विद्वान प्रायः बहुभाषी हुआ करते थे |इसके बाद योरोपीय देशों से सीधा संपर्क और फिर उनके यहाँ उपनिवेश स्थापित होने के कारण उनके प्रशासन तंत्र और व्यवस्था में  जीविका और ज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश के लिए उनकी भाषाओं का यहाँ प्रचार हुआ जिनमें अंग्रेजी प्रमुख थी |इससे भारत का सीधा विस्तार योरप में भी हुआ |फलस्वरूप दोनों ही पक्ष लाभान्वित हुए |

इतना होने के बावजूद हमारे लिए अन्य भाषाएँ मात्र ज्ञान और जीविका की भाषाएँ रहीं |  मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा या यहाँ स्थापित हो चुके विदेशी शासक की भाषा जानने वाले भी अपना जीवन अपनी भाषा में ही जीते थे और शेष समाज के साथ अपनी मातृभाषा में ही संवाद करते थे |मुग़ल काल में अरबी, फारसी आदि भाषाएँ जानने वाले भारतीय हिन्दू और मुसलमान सभी की जीवन की भाषा अपनी मातृभाषा ही रही | इसप्रकार किसी अन्य  भाषा ने कभी हमारे जीवन, संस्कृति, समाज, शिक्षा, दर्शन और मूल्यों को प्रभावित नहीं किया |इसलिए एकाधिक भाषाएँ जानने के बावजूद हम अपनी भाषा, समाज,संस्कृति और देश से विच्छिन्न नहीं हुए |

अंग्रेजों के शासन काल में एक विशेष परिवर्तन आया या उन्होंने सायास किया या यहाँ के पढ़े-लिखे लोगों ने अपने भौतिक स्वार्थों, नौकरी, हीनभावना आदि के कारण अतिरिक्त उत्साह से अपनाया |अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रम ही शुरू नहीं किए बल्कि एक सांस्कृतिक साम्राज्यवाद भी स्थापित किया जिसके तहत  भारत के समस्त ज्ञान,भाषा,संस्कृति को, योरप और विशेषकर ब्रिटिश ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता-संस्कृति और नस्लीय श्रेष्ठता आदि की तुलना में निम्नतर सिद्ध किया गया |तत्कालीन व्यवस्था में अपने आर्थिक, सामाजिक, शासकीय रुतबे को बढ़ाने के लिए उस समय के समृद्ध और शिक्षित लोगों ने अंग्रेजी भाषा, सभ्यता-संस्कृति को पूरी लगन और मन से अपनाया तथा जहाँ-जहाँ तक उनके हाथ और प्रयत्न पहुंचे, इसे स्थापित किया |

स्वाधीनता के बाद होना यह चाहिए था कि हम इस देश की सभी भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान का अनुवाद करते और सभी को उनकी मातृभाषा में सर्वोच्च ज्ञान प्रदान करते | विश्व की अन्य  भाषाएँ भी सिखाते जिससे वे अपने ज्ञान का विस्तार करते और सभी प्रकार से स्वयं भी लाभान्वित होते और देश को भी लाभान्वित करते लेकिन ऐसा नहीं हुआ |ज्ञान की एक मात्र  भाषा अंग्रेजी को मान लिया गया और सभी भारतीय भाषाओं को ज्ञान और सम्मान दोनों के लिए अयोग्य  करार दे दिया गया |

अब स्थिति यह है कि लोग अपनी उन्नति और बेहतर रोजगार के लिए कोई भारतीय भाषा नहीं बल्कि अपने बच्चो को अंग्रेजी तथा  कोई अन्य विदेशी भाषा सिखाना चाहते हैं |बड़ी कंपनियों के बड़े अधिकारियों का तो यह हाल है कि उनके बच्चे ऐसे तथाकथित बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं जहाँ कोई भी भारतीय भाषा नहीं पढ़ाई जाती |अपने घरों में वे अंग्रेजी  का ही प्रयोग करते हैं |और इस प्रकार अपने बच्चों के एक बहुत ही उज्ज्वल भविष्य का सपना देखते हैं |लेकिन इस सारे प्राणायाम के बावजूद न तो वे बच्चे बहुत योग्य निकल रहे हैं, न ही उनमें सामाजिकता विकसित होती है, और न ही उनका अपने माता-पिता और परिवार के अन्य लोगों से कोई जुड़ाव बन पा रहा है | संस्कृति तो उनकी कोई है ही नहीं | वस्त्रों, फिल्मों और नए-नए मोबाइलों के अतिरिक्त उनके पास कोई विषय ही नहीं है |जीवन से भी कोई बहुत संतुष्ट हैं |कुल मिलाकर उनका जीवन बहुत एकांगी और कुंठित है |कहें तो, वे जीवन जी ही नहीं रहे हैं |इस नकली जीवन के चक्कर में वे असली जीवन से परिचित ही नहीं हो पाए | क्योंकि उनके पास जीवन की भाषा  ही नहीं थी |

उनके अभिभावकों ने एक बेहतर आर्थिक भविष्य के लिए अंग्रेजी सीखी लेकिन उनके पास अपनी एक भाषा थी, एक संस्कृति थी, एक पारिवारिक संबंधों की परंपरा थी |ये अभिभावक अपने बहुभाषी  ज्ञान, पारिवारिक संबल और संस्कृति के बल पर ठीक-ठाक नौकरियों तक पहुंचे, विदेश भी गए, आरामदायक जीवन भी जी रहे हैं |ऐसे में वे सोचते हैं कि यदि उनके माता-पिता अंग्रेजी में पढ़े होते, कई भाषाओं का बोझ नहीं रहा होता तो शायद वे आकाश के तारे तोड़ लाते |इसलिए वे अपने बच्चों को अंग्रेज बनाना चाहते हैं |फिर यह अंग्रेजी चाहे- yes, no, thank you, very good, bloody, bastard, get out तक ही हो लेकिन भारतीय भाषाओं से दूर रहें |क्योंकि उनके  जीवन में जो कुछ कमी रह गई है वह भारतीय जड़ों के कारण ही है |वे हर तरह से उससे दूर जाना चाहते हैं और अपने बच्चे की समस्त शक्ति अंग्रेजी सीखने और अंग्रेजी जीने में ही लगाना चाहते हैं |

यह सच है कि अधिकतर विद्वान,वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ एक से अधिक भाषाएँ जानते हैं और वे बहुभाषी होने के कारण एक भाषी से अधिक सक्षम होते हैं | पता नहीं, प्रवासी भारतीय बच्चे कब पूरी तरह से अमरीकी या अंग्रेज बनेंगे लेकिन उनके भारतीय संस्कृति, अपनी भाषा और जड़ों से उखड़ने का काम तो लगभग पूरा हो चुका है |हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भले ही हम हजार वर्षों तक कहीं विदेश में रह लें लेकिन हमें माना तो अपनी नस्ल के कारण भारतीय ही जाएगा |

यदि अंग्रेजी या कोई अन्य भाषा सीखने से हमारे लिए ज्ञान और समृद्धि के द्वार  खुलते हैं तो उसे सीखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन वह रहेगी हमारे लिए आदेश लेने और देने की भाषा ही |जीवन मात्र आदेश लेना और देना ही नहीं है |जीवन तो सम्पूर्ण रूप से एक दूसरे के कहे और अनकहे भाव लोक को समझना और उसके जीवन में शामिल होना है | और यह किसी अन्य भाषा में नहीं हो सकता |हम रोटी के लिए जीवन को न छोड़ें |रोटी ज़रूरी है लेकिन इतनी भी नहीं उसके लिए जीवन को ही भुला दिया जाए |

किसी को भी उसकी अपनी भाषा अभिव्यक्ति का वह भाव लोक प्रदान करती है जिसे मात्र शब्द और अनुवाद व्यक्त नहीं कर पाते |राजस्थान में कहावत है- मेऊ तो बरस्या  भला, होणी हो सो होय |अर्थात बरसात होना शुभ है जब कि ब्रिटेन में (अंग्रेजी में ) 'रेनी डेज़' परेशानी का समय माना जाता है |वहाँ 'सन्नी डेज़' सुख का समय है |हमारी भाषा के बिम्ब, मुहावरे, कहावतें, कविताएँ, दोहे, शे'र कुछ शब्दों में ही वह बात समझा देते हैं जिसके लिए हमें अन्य भाषा में बहुत से शब्दों की ज़रूरत पड़ेगी फिर भी बात अधूरी रह जाएगी |ग़ालिब के एक शे'र का संकेत 'कौन जीता है...', या 'आँखों में तो दम है' कह देता है वह किसी विदेशी भाषा में हम एक पैराग्राफ में भी नहीं कह सकते |यह है अपनी भाषा की व्यंजना |

पेट के लिए भाषा, संस्कृति छोड़ देने की मज़बूरी या लालच आज सभी देशों में और समाजों में दिखाई दे रहा है |इसलिए जिनकी भाषा अंग्रेजी है वे भी जीवन की भाषा वाली अंग्रेजी से दूर होते जा रहे हैं |आज सभी देशों और समाजों में जीवन की भाषाएँ समाप्त हो रही हैं | शेष है तो केवल नौकरी की भाषाएँ जिनमें  आदेश लिए और दिए जा रहे  हैं |कहीं व्यक्ति-व्यक्ति के बीच सच्चा और दिली संवाद नहीं है |सुख-दुःख में शामिल होने वाली भाषा न पढ़ी जा रही है, न बोली जा रही है |वे ही रटे-पिटे , अर्थ खो चुके शब्द हैं जिनसे किसी का कोई जुड़ाव नहीं हो पाता |हम जीवन की भाषा खोते जा रहे हैं इसलिए जीवन भी हमारे हाथों से फिसलता जा रहा है | सभी देशों के विचारवान लोगों को जीवन की भाषा, संस्कृति, परिवार और सामाजिकता खतरे में नज़र आ रही है |जीवन की  भाषा के अभाव में लोग एक भाषी होते हुए भी सही तरह से संवाद तक नहीं कर पाते |इसी कारण समस्या को समझना और समझाना मुश्किल होता जा रहा है |इसलिए छोटी-छोटी बात पर गुस्सा जाते हैं और सामान्य रूप से सुलझाई जा सकने वाली समस्या भी बड़ा विकट रूप ले लेती है |

इसलिए ज़रूरी है कि अपनी आवश्यकताओं को इतना न बढाएं कि उनकी पूर्ति के लिए दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ जाएं |जीवन, वस्तुएँ जुटाने या जीने की तैयारी का नाम नहीं है |जीवन हर पल जीने के लिए है और शांति और संतोष से जीने के लिए है |
तुलसी कहते हैं-
बिनु संतोस न काम नसाहीं |
काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं |

इसलिए सायास समय निकाल कर जीवन और उसकी भाषा से जुड़ना ज़रूरी है  |पिछली पीढ़ी के लोग कोई सुपर मैन नहीं थे जो कई भाषाएँ सीख लेते थे और नौकरी के बाद जीवन में भी लौट आते थे |जीवन की यह भाषा अपने जातीय जीवन के साहित्य, लोक गीत-संगीत, दर्शन, मुहावरे, कहावतें,उद्धरण और सुभाषितों में मिलेगी |न तो सस्ते, समय बिताऊ कहानियों, चुटकलों में मिलेगी और न ही पैसे कमाऊ फिल्मों में |

जब हम जीवन की भाषा बोलेंगे, तो शायद वे बहुत सी समस्याएँ भी कम हो जाएँगीं जो उचित संवाद के अभाव में हमें बहुत बड़ी लग रही थीं |और तब हम जीवन के सुख-दुखों को एक दूसरे के साथ मिल-बाँट कर जीवन का वास्तविक आनंद ले सकेंगे |

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पेट पालन के लिए कोई भी भाषा सीखें लेकिन  उसे जीवन की भाषा न बनाएं |  जीवन के सुखो-दुखों की अभिव्यक्ति केवल मातृभाषा में ही हो सकती है |
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