Jul 7, 2018

मोदी, मगहर और तोताराम



   
मोदी, मगहर और तोताराम

आज तोताराम ने आते ही कहा- ज़रा, भाभी को बाहर तो बुला |

हमने कहा- अभी चाय लेकर आएगी तब बात कर लेना |यदि ज्यादा जल्दी है तो अन्दर जाकर मिल ले |

बोला- आज चाय नहीं पीनी | छह बजे की दिल्ल्ली वाली ट्रेन पकड़नी है | वहाँ से गोरखपुर की ट्रेन ले लूँगा |गोरखपुर से तो बस, ऑटो कुछ भी ले लो | घंटे पौन घंटे का रन है |  

हमने पूछा- तोताराम, यह क्या बात है ? वैसे तो तू हमसे हर छोटी-मोटी बात करता है लेकिन मगहर जाने का निर्णय कब ले लिया ?और क्यों ? कबीर तो  मरने से दो महिने पहले मगहर गए थे |काशी में मुक्ति का सस्ता सौदा बेचने वाले पाखंडियों को नंगा करने के लिए इस जिद पर गए थे कि जिसने अच्छे कर्म किए हैं उसकी मुक्ति में मगहर भी बाधा नहीं डाल सकता |फिर वे तो १२० वर्ष के लगभग होने को आए तब गए थे |उस उम्र तक पहुँचने में तो अभी चालीस-पैंतालीस साल बाकी है | यदि कबीर जी की तरह चालीस-पैतालीस साल और जीकर मोदी जी का विकास और जेतली जी बजट बिगाड़ना है तो कोई बात नहीं |लेकिन उससे पहले अस्सी में सवाई, नब्बे में ड्योढ़ी और सौ में दुगुनी पेंशन का जश्न तो यहीं हमारे साथ मना जा |

बोला- क्या मगहर जाने के लिए १२० वर्ष का होना ज़रूरी है ? मोदी जी भी तो गए हैं कि नहीं |अभी सत्तर के भी नहीं हुए हैं |

हमने कहा- अब चुनाव सिर पर आगे हैं इसलिए पूर्वी उत्तर प्रदेश और देश के विभिन्न भागों में फैले कबीरपंथियों, जिनमें दलित ही अधिक हैं, के वोट पटाने के लिए जाना पड़ा है |

बोला- वोट नहीं, कबीर के सादगी और सद्भाव के विचारों को फ़ैलाने के लिए उनके नाम पर अकादमी का शिलान्यास करने जाना ज़रूरी था |

हमने कहा- तोताराम, कबीर अकादमियों में पैदा नहीं होते |कबीर जन-सामान्य के बीच उनके दुःख-सुख में शामिल होकर सबकी मुक्ति में अपनी खोजने का नाम है | अपने अहंकार को मारकर, अपना सिर उतारकर भूमि पर रखने के बाद प्रेम के घर में प्रवेश करने का नाम है कबीर |

बोला- क्या समझते हो ? मोदी जी की कबीर के भक्त हैं | और हम मोदी जी के भक्त हैं |हम न तो मोक्ष के लिए अपना राज्य छोड़कर बनारस जाते हैं और न ही मोक्ष के लिए बनारस से चिपके रहते हैं |हम तो कर्म में विश्वास करते हैं |कर्म, कर्म और कर्म | कबीर जी ने भी तो कहा है- काल करे सो आज कर |

हमने कहा- जैसे कबीर का राम मंदिर और मंदिर की राजनीति में नहीं है वैसे ही कबीर न मगहर में है, न बनारस में है |वह तो चेतना के सतत जलते दीपक की रोशनी से जीव- जगत को प्रकाशित करते ज्ञान और उसके भक्तिपूर्वक आचरण में है |

बन्धु, जब और जहाँ तुम्हारी मर्ज़ी हो जाओ |अब कोई देश में इमरजेंसी थोड़े है | तुम्हारे कबीर के इस उद्धरण  के ज़वाब में हम तो यही कह सकते हैं कि सहज पके सो मीठा होय या रुत आए फल होय या जल्दी का काम शैतान का |ढंग से पका न होने पर खाना पेट ख़राब कर देता है |

बोला- और कितना इंतजार करें |सत्तर साल से तो लोगों ने विकास की टाँगें बाँध रखी है |आखिर देश कब तक विकास के लिए तरसता रहेगा ? हमें दशकों का काम वर्षों में करना है | 

हमने कहा- ठीक है | वैसे तूने जल्दी से जल्दी घास खुदवाने के चक्कर में लोहार से खुरपी अपने पंखों पर रखवा लेने वाले कौए की कहानी तो सुनी ही होगी |

बोला- कहानी लौटकर सुनेंगे |

और तोताराम चला गया |





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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

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