Jul 16, 2026

16-07-2026 अच्छे आचरण वाले हत्यारे


16-07-2026 

अच्छे आचरण वाले हत्यारे  




आज तोताराम ने बहुत उत्साहित होकर खबर दी कि दारा सिंह की अच्छे आचरण के कारण जेल से रिहाई की सिफारिश की गई है । 

हमने कहा- दारा सिंह जी को तो मरे हुए ही कोई दस बारह साल हो गए होंगे । अब किस रिहाई की सिफारिश ?  और फिर वे तो बहुत भले आदमी थे । बड़े पहलवान थे जिन्होंने कोई 500 कुश्तियाँ लड़ीं लेकिन एक में भी नहीं हारे   

बोला- यह दारा सिंह भी कम प्रसिद्ध नहीं है ।उस दारा सिंह ने रामायण सीरियल में हनुमान का काम किया । बहुत से राक्षसों का संहार किया और रावण की लंका को जला दिया था तो इसने भी धर्म की रक्षा के लिए बहुत बड़ा काम किया । इतिहास में धर्म की रक्षा के लिए बहुत से लोगों ने अपने प्राण दिए हैं । कृष्ण गीता में कहते हैं कि जब जब धर्म पर संकट आता है तो मैं धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेता हूँ । जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है । तभी तो धर्मपरायण सरकार धर्म की रक्षा करने वालों पर कृपालु है । 

हमने कहा- अभी तक तो हमने एक ही दारा सिंह का नाम सुना था । यह दूसरा दारा सिंह कहाँ से आगया ?

बोला- बस !  बड़ा संपादक-लेखक बना फिरता है । दारा सिंह के बारे में नहीं जानता । यह वही हिन्दू-हृदय-सम्राट है जिसने ओडिशा में हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करवाकर भारत को एक ईसाई राष्ट्र बनाने के एक आस्ट्रेलियाई पादरी के षड्यन्त्र को विफल कर दिया था । 

हमने कहा- हाँ, कुछ याद आ रहा है । यह कहीं वह दुष्ट, निर्दय दारा सिंह तो नहीं जिसने ओडिशा के क्योंझार जिले में कुष्ठ रोगियों का एक आश्रम चलाने वाले ग्राहम स्टेंस को उसके दो बेटों सहित जिंदा जला दिया था ? वह तो बहुत पुरानी बात हो गई । क्या वह अभी तक जिंदा है ? दुष्ट लोग मरते भी बहुत मुश्किल से हैं । 

बोला- दुष्ट कैसे ? अगर वह दुष्ट नहीं होता तो क्या ओडिशा राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ‘अच्छे आचरण’ के आधार पर उसकी जेल से रिहाई की सिफारिश करता ?

हमने कहा- ऐसी सिफारिश करने वाले बोर्डों की बात छोड़ । आज जब न्यायालय, चुनाव आयोग, पुलिस, परीक्षक, डॉक्टर सब संदेह के घेरे में हैं तो इस बोर्ड की क्या बिसात । सिफारिश तो 2022 में गुजरात दंगों में बिलकीस बानो के बलात्कारियों, हत्यारों की रिहाई की भी की गई थी। उन्हें संस्कारी बताया गया था । बलात्कारियों की पत्नियों तक ने उनकी आरती उतारी थी । ऐसे ही होते हैं संस्कारी ? 

जब आँखों पर धार्मिक कट्टरता का पर्दा पड़ जाता है तो बुरे से बुरा काम भी धर्म का पुण्य काम लगने लग जाता है । सबसे अधिक बुरे काम आदमी सबसे अधिक उत्साह से धर्म के नाम पर ही करता है । अगर वे सामान्य बलात्कारी होते तो उनकी पत्नियाँ उन्हें कभी माफ नहीं करती । पर वे समझ रही थीं कि हमारे पतियों ने कुकर्म धर्म की रक्षा के लिए किया था । अरे, अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली के त्रिनगर इलाके में कुछ हिंदुओं ने मुसलमानों को चिढ़ाने के लिए सूअर पाल लिए और सूअरों को वराह भगवान बताकर धन्य हो रहे थे ।

बोला- लेकिन पहले वह मदर टेरेसा भी तो सेवा के बहाने कुष्ठ रोगियों को ईसाई बना रही थी और अब वह ग्राहम स्टेंस । 

हमने कहा-  तब तो बहुत आसान काम है । अब तो मोदी जी, भागवत जी, योगी जी, अनुराग ठाकुर, धामी, हेमंत बिस्वा, सुवेन्दु अधिकारी जैसे सच्चे हिन्दू नेताओं के हाथ में है देश । सभी साधन-सुविधा भी जुटा देंगे । तुम एक ऐसा दल बनाओ जो दुनिया के विभिन्न देशों में जाए और वहाँ के ईसाई कुष्ठ रोगियों की सेवा करे और उन सबको हिन्दू बना ले । हम अपनी एक महिने की पेंशन इस पुण्य काम के लिए देने का अभी से संकल्प लेते हैं । और उसके बाद भी पाँच हजार रुपये महिना देते रहेंगे ।  

बोला- मास्टर, यह तो बहुत खतरे का काम है । 

हमने कहा- तो फिर ? 

गाँधी जी के समय में एक थे परचूरे शास्त्री जिन्हें कुष्ठ होगया था । उनके घर वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया था । गाँधी जी उन्हें अपने आश्रम में ले आये और उनके घाव धोने से लेकर अन्य सभी सेवाएं करते थे । आज के हिन्दुत्व के ठेकेदार बने संघ वाला कोई चितपावन ब्राह्मण उस समय आगे नहीं आया जबकि परचुरे शास्त्री  तो एक विद्वान, हिन्दू और उनकी जाति-गोत्र के थे । ऐसे में एक ईसाई  पादरी द्वारा एक आदिवासी कुष्ठ रोगी की सेवा ! 

‘गोली मारो सालों को’ नारे लगाना आसान है, ग्राहम स्टेंस को जल देना आसान है, गुजरात के दंगों में बजरंग बली का नाम बदनाम करने वाले बाबू भाई पटेल उर्फ  ‘बाबू बजरंगी’ की तरह लोगों के घर जला देना आसान है क्योंकि सत्ता तुम्हारे साथ है लेकिन सेवा ! 

कबीर कहते हैं-

कथनी मीठी खाँड सी करनी बिस की लोय 

कथनी तज करनी करे तो बिस अमरित होय ।। 

कोरोना काल में देखा नहीं ? कैसे लोगों ने अपने परिजनों के शव लेने से इनकार कर दिया था और भोपाल के अग्निशमन विभाग के दो मुसलमान कर्मचारी उनके अंतिम संस्कार कर रहे थे । और अभी मोहर्रम के दिन का ही वाकया है जब  केन्सर के एक मृत रोगी नारायणन का शव उसके घर वालों ने लेने से मना कर दिया तो कासरगोड की इरफाना हबीब ने  उसका अंतिम संस्कार करवाया । उसकी भी वहाँ के कुछ दुष्ट लोगों ने आलोचना की । 

सेवा में षड्यन्त्र देखना संसार की सबसे बड़ी नीचता है । 


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