05-08 -2026
दान की बछिया के दाँत
कहते हैं मूर्ख लोग अपनी मूर्खता को छिपाने के लिए बात, बिना बात हँसने लगते हैं । वे सोचते हैं कि इससे बात की बात छुप जाएगी और लोग उन्हें बहुत हँसमुख समझ कर बहुत कुछ भुला देंगे । लेकिन मूर्खता और अज्ञान को कब तक टाला जा सकता है पोल तो खुल ही जाती है । इसीलिए कहा गया है कि मूर्ख और अज्ञानी को चुप रहना चाहिए । इससे भ्रम बना रहता है । तभी संस्कृत में चुप और बोलने दोनों को इस श्लोक से समझाया गया है-
काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसंतकाले सम्प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥
हाँ, जानवरों में ज्ञान और सौन्दर्य का कोई फंडा नहीं होता । भैंस चाहे कानी हो या एक सींग की । उसे कौन सौन्दर्य प्रतियोगिता में जाना होता है । उसका मूल्य तो दूध के कारण होता है । और दूध उम्र के हिसाब से भी कम ज्यादा हो जाता है । इसलिए उसकी उम्र जाँचने के लिए उसके दाँत गिने जाते हैं ।
लेकिन यह भी कहावत है कि दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते । मतलब कि मुफ़्त के माल में क्वालिटी देखने का किसे समय होता है । बस, यही कि जितना मिले जेब में भर लो । भूख नहीं है तो भी पेल दो, भले ही रात को कई बार दीर्घ शंका के लिए जाना पड़े ।
आज तोताराम ने आते ही फरमान सुना दिया- मास्टर, उस दिन की तरह पी-20 वाले दूध की सड़ियल चाय नहीं चलेगी । कारों का ई-20 से कितना माइलेज कम होता है पता नहीं लेकिन तेरी पी-20 वाली चाय पीकर मेरे मुंह का जायका सारे दिन खराब रहता है ।
हमने कहा- हम इसी कहावत पर विचार कर रहे थे कि दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते ।
बोला- लेकिन यह चाय कोई दान नहीं है । खून पसीने की कमाई है । अगर तुझे मन की बात सुननी पड़े तो पता चले । सिर फटने लगता है । जिसे किसी बड़े फायदे की आशा होती है वह जाड़ भींचकर पड़ा रहता है । बाकी रैली में लोग महामानव को सुनने नहीं जाते । एक सौ रुपये और एक बीड़ी के बंडल में जाते हैं । ऐसे मामलों में बहुत सावधानी रखनी चाहिए । सब कुछ एडवांस में । नहीं तो कभी कभी दान की बछिया भारी पड़ जाती है । सुना है मध्यप्रदेश में किसी तिवारी जी को एक ने बछिया दान दी । तिवारी ने न दाँत गिने और न ही कुछ और देखा समझा और ले आए बछिया को घर । तीन महीने बाद बछिया ब्याई, बछड़ा दिया । लेकिन मजे की बात, दूध एक भी बूंद नहीं । अब तिवारी जी इतने साहसी और निर्दय नहीं कि किसी अलकबीर वाले हिन्दू भाई के बूचड़खाने को बछड़ा और गाय बेच दें या घर से निकाल दें । अब डेयरी से दूध लाकर बछड़े को पिला रहे हैं ।
हमने कहा- इसीलिए हमारा मानना है कि सरकार जो दे रही है वह दान और कृपा नहीं आपका अधिकार है । कोई नेता अपनी जेब से नहीं देता है । सब जनता के टेक्स का पैसा है । इसलिए अगर पाँच किलो अनाज में तौल और क्वालिटी खराब है तो शिकायत करनी चाहिए । अच्छा हो रहा है जो जेन जी अल्फा वाले बच्चे सरकार के नेताओं और अधिकारियों के मिड डे मील वाले भ्रष्टाचार की सड़कों पर उतरकर पोल खोल रहे हैं ।
समझ ले, सारे करप्शन कल्याण में ही छुपे होते है । नकद पैसे देने वाला चार जगह देख-समझकर लेगा ।
लोगों को रोजगार दो और सरकारी नियमों के अनुसार वेतन दो । फिर वह उस पैसे का जो चाहे करे । सरकार के सामने लाभार्थी बन कर क्यों खड़ा रहे ।यह तो कुत्ते की तरह फेंके टुकड़े पर लपकना हुआ । क्यों घटिया और कम 5 किलो अनाज के थैले पर छपे नेता को बेताल की तरह अपनी पीठ पर ढोएँ ।
बोला- तो फिर भाई साहब, एक बार तुम्हारे मन की बात सुनने के लिए फुल क्रीम दूध में पत्ती और डबल चीनी डालकर बनी कम से 150 मिलीलीटर चाय और साथ में बिस्किट से कम पर बात नहीं बनेगी । अभी शीघ्र ही नगर परिषद के चुनाव आ रहे हैं । बहुत से जनसंपर्क अभियानों के निमंत्रण आ रहे हैं । मंजूर हो तो बोल, नहीं तो चलता हूँ ।
क्या करें हमने तोताराम का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया । मोदी जी और योगी जी तो अपनी इमेज के लिए देश के हजारों करोड़ खर्च कर रहे हैं । तोताराम का तो एक चाय का खर्च ही है ।
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
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