Sep 21, 2015

वर्तनी-विवाद

  वर्तनी-विवाद   

आज आते ही तोताराम हमारे सामने एक लिफाफा रखते हुए बोला- देखा, अभी-अभी 'विश्व हिंदी सम्मेलन' में सौ-दो सौ करोड़ को बत्ती लगाकर, हिंदी का हल्ला मचाकर निबटे हैं और यह 'हिंदी की हिंदी' नहीं, आज तेरे लघु भ्राता का जुलूस निकल गया |

हमने उसके हाथ से लिफाफा लेकर देखना चाहा तो कहने लगा- बस, यह समझ ले कि किसी सरकारी या अर्द्ध सरकारी विभाग से आया है | पते में मेरा नाम लिखा है- टोटाराम  |मैंने ज़िन्दगी भर पूरा टेक्स चुकाया, कोई गलत बिल बनाकर भुगतान नहीं उठाया, कभी स्कूल का एक कागज़ या चाक तक घर नहीं लाया | और मुझे ही लिख दिया टोटाराम | क्या मेरे कारण ही इस देश में टोटा आ गया ? अरे, खेतों में बिजली नहीं और नेता जी के घर पर बीस-बीस ए.सी. चल रहे हैं- उन्हें तो कोई कुछ नहीं कहता |आठ लाख की घड़ी और चौबीस हजार के जूते पहनने वाले तथाकथित किसान नेता अपनी कॉलोनी काट चुके खेत पर फसल खराबे का मुआवजा उठा रहे हैं लेकिन कहलाते हैं जन-सेवक | 

हमने कहा- बन्धु, हो सकता है संबंधित विभाग ने तुम्हें 'टोटाराम' लिख कर गरीब होने का प्रमाण-पत्र दे दिया हो जो आगे चल कर किसी सरकारी योजना के लाभ का आधार बने | फायदा ही है | 
बोला- सरकार का इस बारे में गणित साफ़ है |अल्प संख्यक भले ही अढाई लाख रुपए वार्षिक से कम आय का प्रमाण-पत्र देकर बच्चों की पढ़ाई के लिए बिना ब्याज ऋण पाले लेकिन ब्राह्मण को एक लाख रुपए वार्षिक से कम होने पर भी बच्चों को पढ़ाने के लिए कम ब्याज पर भी ऋण नहीं मिलेगा | खैर, कर्ज़ा न दें, नाम की वर्तनी तो सही लिखें  | 

हमने कहा- लेकिन वर्तनी से क्या फर्क पड़ता है ? लड् डू में ह्रस्व उ लगा या दीर्घ- लड् डू तो लड् डू ही रहेगा |

कहने लगा- तो फिर यह 'मीणा/मीना विवाद क्या है ?

हमने कहा- यह वर्तनी का विवाद नहीं है | कोई मीणा लिखता है तो कोई मीना | और कोई मिना लिख दे तो भी न तो परीक्षा में नंबर कटते हैं और न ही तनख्वाह कम मिलती है |वैसे इसमें किसी अधिकारी या पार्टी को दोष देना उचित नहीं है |यह सारी गलती अंग्रेजों की है जिनकी लिपि में ण,ध,ढ,ढ़,ड़,ठ,त,ञ,ङ आदि ध्वनियाँ हैं ही नहीं, और न ही अ,आ,इ,ई,उ,ऊ स्वरों के लिए भी कोई निश्चित चिह्न |इसलिए ये सब चक्कर पड़ जाते हैं | यह शब्द 'मीणा' है और देवनागरी में 'मीणा' ही लिखा जाता है |किसी ने रोमन में लिखा तो mina/meena के अलावा और क्या लिखता ? लगता है, बात कुछ नहीं, किसी खुचड़ बाबू की गलती से यह तमाशा हुआ है |

बोला- वैसे 'मीणा' को 'मीना' लिखने में भी कोई गलती नहीं है क्योंकि मूल शब्द है- मीन | मीन का मतलब है -मत्स्य प्राचीन काल में मीणा राजाओं के ध्वज पर 'मीन' या 'मत्स्य' का निशान होता था | मीणा तो तद्भव है | 'मीना' तत्सम के अधिक निकट होने से अधिक शुद्ध है |

हमने कहा- शब्द का झगड़ा कहीं नहीं है | लाभ मिले तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य  अपने नाम के आगे 'महादलित' लिखने को तैयार हैं |

वैसे मीना कुमारी ने तो कोई लाभ नहीं उठाया |




 

Sep 19, 2015

ज्ञान-पिपासु

  ज्ञान-पिपासु 

विदेशों के कई समाचार पढ़ने को मिलते रहते हैं कि नब्बे वर्ष की एक महिला ने बीस कोशिशों में मेट्रिक की परीक्षा पास की, एक महिला ने द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लेने के लिए अपनी डाक्टरी की पढ़ाई बीच में छोड़ दी और अब आगे की पढाई पूरी करने के लिए फिर कॉलेज में प्रवेश लिया है | जब प्रौढ़ शिक्षा शुरु हुई थी तो अपने यहाँ भी बहुत से वृद्ध रात्रि पाठशाला में जाने लगे थे | हमने और तोताराम भी मध्याह्न भोजन के चक्कर में जुलाई में प्रवेशोत्सव में गए लेकिन पार नहीं पड़ी |

आज कल तो खैर, विश्व विद्यालय ही डिग्रियां बेचने लगे और नेता लोग ऐसे लोगों की  सरकारी मास्टरी में भर्ती भी कराने लगे तो न पढ़ने की ज़रूरत रही और न ही नौकरी की फ़िक्र | दो-दो साल की तनख्वाह अग्रिम दो, डिग्री और नौकरी लो | बी.एड. का यह हाल है कि फीस दो और प्रशिक्षित शिक्षक बन जाओ | प्रशिक्षु कोई और नौकरी कर रहा है और कॉलेज के पास कक्षाएँ लगाने के लिए भवन ही नहीं |दोनों को बिना हर्र फिटकरी अच्छा रंग आ रहा है |

आज जब हम और तोताराम सुबह-सुबह घूम कर आ रहे थे तो एक बालक फ्रेंच कट दाढ़ी में स्कूल ड्रेस में आता दिखा | हमने तोताराम से कहा- बन्धु, क्या तुम्हें यह महानायक जैसा नहीं लग रहा ?

बोला- लगता तो वैसा ही है लेकिन उन्होंने भले ही वरिष्ठ नागरिक बनने के बाद फिल्मों में जवानी से भी ज्यादा इश्किया हरकतें की हैं लेकिन कभी किसी फिल्म में निक्कर नहीं पहना और धर्मेन्द्र या सलमान की तरह कमीज़ भी नहीं उतारी तो फिर अब निक्कर क्या पहनेंगे ?

हमने कहा- फिर भी पूछने में क्या हर्ज़ है ?

आगे बढ़कर तोताराम ने नमस्ते की और पूछा - बेटे, तुम्हारी वेशभूषा तो विद्यार्थी जैसी है लेकिन दाढ़ी अमिताभ बच्चन जैसी  है | क्या तुम महानायक अमित जी तो नहीं है ?

बच्चा बोला- और क्या तुम्हें अनुपम खेर लगता हूँ ? दाढ़ी तो अब किसी भी हाल में नहीं कटा सकते क्योंकि यदि कटा दें घर वाले ही नहीं पहचानेंगे |और निक्कर पहनकर स्कूल में इसलिए जा रहे हैं कि हम अब भी कला के जिज्ञासु हैं |ज्ञान कभी ख़त्म नहीं होता |और हमारा तो धंधा ही ऐसा है कि नए से नए लटके न करो तो काम नहीं मिलता |
हम तो स्कूल जा रहे हैं डांस और एक्टिंग की नई टेकनीक सीखने के लिए | 

हमने कहा- लेकिन अब तो अखबारों में स्कूलों के विज्ञापन आने बंद हो गए, प्रवेशोत्सव समाप्त हो चुके |मतलब कि सीज़न बीत गया |

महानायक बोले- नहीं,  अभी तो आलिया भट्ट ने डांस और एक्टिंग टीचर बनने की इच्छा भर जताई है | और उसके तत्काल बाद हमने उसके विद्यार्थी बनने की इच्छा ज़ाहिर कर दी है |क्योंकि चालू होते ही तो लाइन लग जाएगी |इसलिए निराशा से बचने के लिए हम अभी से लाइन में लगने के लिए जा रहे हैं |

तोताराम ने बात का सिरा पकड़ा और महानायक से प्रश्न किया- लेकिन लाइन तो वहीं से शुरु होती है जहां आप खड़े हो जाते हैं |

बोले- ये सब 'अच्छे दिनों' वालों की तरह जुमले हैं | ज़िन्दगी की असलियत कुछ और होती है |जैसे जीतने वाली पार्टी का पूर्वानुमान लगाकर दूरदर्शी और अनुशासित सिपाही नेताओं की आत्मा समय से पूर्व 'आवाज़' दे देती है |इसलिए हम भी धंधे में बने रहने के लिए तकनीक में पिछड़ना नहीं चाहते |


हम दोनों सोच रहे थे- क्या नितांत फ़िल्मी अनुभवहीन लोगों के लिए भी एडमीशन का कोई चांस हो सकता है ?

Sep 15, 2015

तोताराम के सीने का नाप

  तोताराम के सीने का नाप 

आज तोताराम अपने नियत समय से कोई दो घंटे विलंब से प्रकट हुआ | एक बड़ा-सा थैला उसकी पीठ पर लदा हुआ था | आते ही उसने थैला बरामदे में रखा और उसमें से सामान निकालने लगा- लोहे और कपड़े के गज और मीटर , लकड़ी के दो तीन फुट, खेतों में पैमाइश करने वाली ज़रीब जिसका आजकल के बच्चे क्या बड़े तक नाम नहीं जानते, उपयोग और प्रत्यक्ष दर्शन तो दूर की बात है |और भी न जाने क्या-क्या |

हमने पूछा- क्या कोई अजायबघर खोल रहा है या फिर कबाड़ी का धंधा शुरु कर दिया है ?

बोला- तुझे धंधे की पड़ी है और यहाँ जान पर बन आई है |

पूछा- क्यों क्या किसी आतंकवादी संगठन ने तुझे मारने जितना महत्त्वपूर्ण समझ लिया है या वित्त मंत्री ने बढ़ा हुआ छः प्रतिशत डी.ए. वापिस ले लिया है ?

कहने लगा- ये सब बकवास छोड़ और नापने के इन सभी यंत्रों से मेरा सीना नाप |

हमें हँसी आ गई | पूछा-क्या तेरे सीने के साइज़ से इस देश के विकास का कोई संबंध है ? तेरा सीना तो वैसे ही २८ इंच का है अर्थात 'बिलो नार्मल'  | पता नहीं तुझे नौकरी के  समय मेडिकल में किसने पास कर दिया ?

बोला- नौकरी तो अब पूरी हुई और पेंशन के लिए मात्र जीवित होना ही  पर्याप्त है, भले कोमा में ही सही |हस्ताक्षर करने लायक नहीं रहेंगे तो अँगूठा लगवा लिया जाएगा जिसके प्रिंट पहले से ही सरकार के पास हैं | लेकिन जिस तरह की बातें सुन रहा हूँ उसको देखते हुए तो यह जीवन ही खतरे में पड़ता लगता है | 

अब तो हमें लगा- वास्तव में ही कोई गंभीर बात है |खोद-खोद कर पूछा तो कहने लगा- एक नेता ने कहा है कि वे ५६ इंच के सीने को ५.६ इंच का कर देंगे |मेरा सीना तो २८ इंच का ही है यदि इस हिसाब से सिकोड़ा गया तो २.८ इंच का ही रह जाएगा |मात्र इतने से सीने से क्या जीवित रहना संभव हो पाएगा ?क्या कहीं कुछ हो तो नहीं गया है ?
ज़रा नाप कर तो देख |

हमने फीता लिया और नापकर कहा- ७०

तोताराम का मुँह खुला का खुला रह गया, बोला- क्या ? ७0 ? मैं क्या कोई सत्ताधारी दल  का  मलाईदार  विभाग का  मंत्री बन  गया  हूँ जो  मेरा सीना अचानक २८ के ७० हो जाएगा ? ला दिखा |लगता है कोई गड़बड़ है |

उसने फीते को उसी  जगह  से पकड़ते  हुए  उलट पलट कर देखा और बोला- एक ज़रा सा नाप नहीं लिया जाता |पता नहीं इतने साल बच्चों को क्या पढ़ाया  होगा ? अरे, यह तू इंच नहीं, सेंटीमीटर वाली साइड से देख रहा है  २८ इंच का ७० सेंटीमीटर नहीं तो और क्या दिखेगा ? यह ७० इंच नहीं, ७० सेंटीमीटर है अर्थात २८ इंच | मतलब न घटा, न बढ़ा | सब सही सलामत है |

हमने कहा- और नहीं तो क्या ? और जो तूने समझा वह तथ्य नहीं, नेता का एक जुमला मात्र था जैसे- काले धन के १५ लाख रुपए या अच्छे दिन या फिर बेटी बचाओ |

तोताराम ने एक लम्बी साँस ली और बोला- जान बची |अब इसी ख़ुशी में चाय तो मँगवा  ले |और याद रहे मोदी जी वाली नहीं, एकदम साधारण, सामान्य, हमेशा जैसी |




Sep 14, 2015

रोटी की भाषा बनाम जीवन की भाषा

रोटी की भाषा बनाम जीवन की भाषा

जन्म से पूर्व से न भी मानें तो, जन्म के बाद से तो निश्चित रूप से शिशु अपने आसपास के व्यक्तियों की बातें, अन्य विभिन्न जीवों की आवाजें और विविध ध्वनियाँ सुनता और समझता रहता है |सुनते समय वह उन्हें देखता भी है और फिर उनके अनुकरण पर स्वयं भी संबंधित ध्वनि-अवयवों का सही उपयोग करते हुए, वांछित उतार-चढ़ावों के साथ उसका उच्चारण करने का प्रयत्न भी करता है |उनके अर्थों और भंगिमाओं को भी समाहित करता है |यह उसके जीवन की भाषा है जिसमें वह सभी अभिव्यक्तियों को समझता है और खुद को भी अभिव्यक्त करता है |उसके सुख-दुःख, उल्लास, अवसाद, संकेत, व्यंजना सभी उसके संवाद के व्यक्त और अव्यक्त अंग बनते चले जाते हैं |यह उसकी अभिव्यक्त का एक संपूर्ण और लगभग सही रूप होता है |

इसके बाद वह अपने विद्यार्थी जीवन में विभिन्न विषयों की शब्दावली और उसका उपयोग सीखता है |इसके बाद वह इस ज्ञान से अपना जीविकोपार्जन करता है |इसके दौरान वह विभिन्न प्रकार के लोगों से इसी सिलसिले में संवाद भी करता है |इस प्रकार उसकी भाषा का विस्तार होता चलता है |कभी-कभी वह अपने ज्ञान वर्द्धन, व्यापार, जीविका के लिए अन्य भाषा के संपर्क में आता है |पहले यह सभी के साथ नहीं होता था क्योंकि व्यक्ति का क्षेत्र अपने आसपास तक ही सीमित होता था |इसलिए एक भाषा से ही उसका काम चल जाता था |

पहले भी विद्वान लोग, अन्य भाषाओं में संचित ज्ञान  को प्राप्त करने और उसका लाभ अपने समाज को पहुँचाने के लिए कई-कई भाषाएँ सीखते थे |बहुभाषा-भाषी विद्वानों द्वारा विश्व में ज्ञान का प्रचार-प्रसार हुआ |भारत में इस्लाम के आगमन से पूर्व भी अरब देशों और उनके माध्यम से भारत का मध्य एशिया और योरप  से  संपर्क हुआ और ज्ञान का आदान-प्रदान हुआ |चीन आदि देशों से भी बहुत से जिज्ञासु और विद्वान भारत में आए और उनके माध्यम से भारत और पूर्वी देशों में बौद्ध धर्म, दर्शन और ज्ञान-विज्ञान का आदान-प्रदान हुआ |उस समय के विद्वान प्रायः बहुभाषी हुआ करते थे |इसके बाद योरोपीय देशों से सीधा संपर्क और फिर उनके यहाँ उपनिवेश स्थापित होने के कारण उनके प्रशासन तंत्र और व्यवस्था में  जीविका और ज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश के लिए उनकी भाषाओं का यहाँ प्रचार हुआ जिनमें अंग्रेजी प्रमुख थी |इससे भारत का सीधा विस्तार योरप में भी हुआ |फलस्वरूप दोनों ही पक्ष लाभान्वित हुए |

इतना होने के बावजूद हमारे लिए अन्य भाषाएँ मात्र ज्ञान और जीविका की भाषाएँ रहीं |  मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा या यहाँ स्थापित हो चुके विदेशी शासक की भाषा जानने वाले भी अपना जीवन अपनी भाषा में ही जीते थे और शेष समाज के साथ अपनी मातृभाषा में ही संवाद करते थे |मुग़ल काल में अरबी, फारसी आदि भाषाएँ जानने वाले भारतीय हिन्दू और मुसलमान सभी की जीवन की भाषा अपनी मातृभाषा ही रही | इसप्रकार किसी अन्य  भाषा ने कभी हमारे जीवन, संस्कृति, समाज, शिक्षा, दर्शन और मूल्यों को प्रभावित नहीं किया |इसलिए एकाधिक भाषाएँ जानने के बावजूद हम अपनी भाषा, समाज,संस्कृति और देश से विच्छिन्न नहीं हुए |

अंग्रेजों के शासन काल में एक विशेष परिवर्तन आया या उन्होंने सायास किया या यहाँ के पढ़े-लिखे लोगों ने अपने भौतिक स्वार्थों, नौकरी, हीनभावना आदि के कारण अतिरिक्त उत्साह से अपनाया |अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रम ही शुरू नहीं किए बल्कि एक सांस्कृतिक साम्राज्यवाद भी स्थापित किया जिसके तहत  भारत के समस्त ज्ञान,भाषा,संस्कृति को, योरप और विशेषकर ब्रिटिश ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता-संस्कृति और नस्लीय श्रेष्ठता आदि की तुलना में निम्नतर सिद्ध किया गया |तत्कालीन व्यवस्था में अपने आर्थिक, सामाजिक, शासकीय रुतबे को बढ़ाने के लिए उस समय के समृद्ध और शिक्षित लोगों ने अंग्रेजी भाषा, सभ्यता-संस्कृति को पूरी लगन और मन से अपनाया तथा जहाँ-जहाँ तक उनके हाथ और प्रयत्न पहुंचे, इसे स्थापित किया |

स्वाधीनता के बाद होना यह चाहिए था कि हम इस देश की सभी भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान का अनुवाद करते और सभी को उनकी मातृभाषा में सर्वोच्च ज्ञान प्रदान करते | विश्व की अन्य  भाषाएँ भी सिखाते जिससे वे अपने ज्ञान का विस्तार करते और सभी प्रकार से स्वयं भी लाभान्वित होते और देश को भी लाभान्वित करते लेकिन ऐसा नहीं हुआ |ज्ञान की एक मात्र  भाषा अंग्रेजी को मान लिया गया और सभी भारतीय भाषाओं को ज्ञान और सम्मान दोनों के लिए अयोग्य  करार दे दिया गया |

अब स्थिति यह है कि लोग अपनी उन्नति और बेहतर रोजगार के लिए कोई भारतीय भाषा नहीं बल्कि अपने बच्चो को अंग्रेजी तथा  कोई अन्य विदेशी भाषा सिखाना चाहते हैं |बड़ी कंपनियों के बड़े अधिकारियों का तो यह हाल है कि उनके बच्चे ऐसे तथाकथित बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं जहाँ कोई भी भारतीय भाषा नहीं पढ़ाई जाती |अपने घरों में वे अंग्रेजी  का ही प्रयोग करते हैं |और इस प्रकार अपने बच्चों के एक बहुत ही उज्ज्वल भविष्य का सपना देखते हैं |लेकिन इस सारे प्राणायाम के बावजूद न तो वे बच्चे बहुत योग्य निकल रहे हैं, न ही उनमें सामाजिकता विकसित होती है, और न ही उनका अपने माता-पिता और परिवार के अन्य लोगों से कोई जुड़ाव बन पा रहा है | संस्कृति तो उनकी कोई है ही नहीं | वस्त्रों, फिल्मों और नए-नए मोबाइलों के अतिरिक्त उनके पास कोई विषय ही नहीं है |जीवन से भी कोई बहुत संतुष्ट हैं |कुल मिलाकर उनका जीवन बहुत एकांगी और कुंठित है |कहें तो, वे जीवन जी ही नहीं रहे हैं |इस नकली जीवन के चक्कर में वे असली जीवन से परिचित ही नहीं हो पाए | क्योंकि उनके पास जीवन की भाषा  ही नहीं थी |

उनके अभिभावकों ने एक बेहतर आर्थिक भविष्य के लिए अंग्रेजी सीखी लेकिन उनके पास अपनी एक भाषा थी, एक संस्कृति थी, एक पारिवारिक संबंधों की परंपरा थी |ये अभिभावक अपने बहुभाषी  ज्ञान, पारिवारिक संबल और संस्कृति के बल पर ठीक-ठाक नौकरियों तक पहुंचे, विदेश भी गए, आरामदायक जीवन भी जी रहे हैं |ऐसे में वे सोचते हैं कि यदि उनके माता-पिता अंग्रेजी में पढ़े होते, कई भाषाओं का बोझ नहीं रहा होता तो शायद वे आकाश के तारे तोड़ लाते |इसलिए वे अपने बच्चों को अंग्रेज बनाना चाहते हैं |फिर यह अंग्रेजी चाहे- yes, no, thank you, very good, bloody, bastard, get out तक ही हो लेकिन भारतीय भाषाओं से दूर रहें |क्योंकि उनके  जीवन में जो कुछ कमी रह गई है वह भारतीय जड़ों के कारण ही है |वे हर तरह से उससे दूर जाना चाहते हैं और अपने बच्चे की समस्त शक्ति अंग्रेजी सीखने और अंग्रेजी जीने में ही लगाना चाहते हैं |

यह सच है कि अधिकतर विद्वान,वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ एक से अधिक भाषाएँ जानते हैं और वे बहुभाषी होने के कारण एक भाषी से अधिक सक्षम होते हैं | पता नहीं, प्रवासी भारतीय बच्चे कब पूरी तरह से अमरीकी या अंग्रेज बनेंगे लेकिन उनके भारतीय संस्कृति, अपनी भाषा और जड़ों से उखड़ने का काम तो लगभग पूरा हो चुका है |हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भले ही हम हजार वर्षों तक कहीं विदेश में रह लें लेकिन हमें माना तो अपनी नस्ल के कारण भारतीय ही जाएगा |

यदि अंग्रेजी या कोई अन्य भाषा सीखने से हमारे लिए ज्ञान और समृद्धि के द्वार  खुलते हैं तो उसे सीखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन वह रहेगी हमारे लिए आदेश लेने और देने की भाषा ही |जीवन मात्र आदेश लेना और देना ही नहीं है |जीवन तो सम्पूर्ण रूप से एक दूसरे के कहे और अनकहे भाव लोक को समझना और उसके जीवन में शामिल होना है | और यह किसी अन्य भाषा में नहीं हो सकता |हम रोटी के लिए जीवन को न छोड़ें |रोटी ज़रूरी है लेकिन इतनी भी नहीं उसके लिए जीवन को ही भुला दिया जाए |

किसी को भी उसकी अपनी भाषा अभिव्यक्ति का वह भाव लोक प्रदान करती है जिसे मात्र शब्द और अनुवाद व्यक्त नहीं कर पाते |राजस्थान में कहावत है- मेऊ तो बरस्या  भला, होणी हो सो होय |अर्थात बरसात होना शुभ है जब कि ब्रिटेन में (अंग्रेजी में ) 'रेनी डेज़' परेशानी का समय माना जाता है |वहाँ 'सन्नी डेज़' सुख का समय है |हमारी भाषा के बिम्ब, मुहावरे, कहावतें, कविताएँ, दोहे, शे'र कुछ शब्दों में ही वह बात समझा देते हैं जिसके लिए हमें अन्य भाषा में बहुत से शब्दों की ज़रूरत पड़ेगी फिर भी बात अधूरी रह जाएगी |ग़ालिब के एक शे'र का संकेत 'कौन जीता है...', या 'आँखों में तो दम है' कह देता है वह किसी विदेशी भाषा में हम एक पैराग्राफ में भी नहीं कह सकते |यह है अपनी भाषा की व्यंजना |

पेट के लिए भाषा, संस्कृति छोड़ देने की मज़बूरी या लालच आज सभी देशों में और समाजों में दिखाई दे रहा है |इसलिए जिनकी भाषा अंग्रेजी है वे भी जीवन की भाषा वाली अंग्रेजी से दूर होते जा रहे हैं |आज सभी देशों और समाजों में जीवन की भाषाएँ समाप्त हो रही हैं | शेष है तो केवल नौकरी की भाषाएँ जिनमें  आदेश लिए और दिए जा रहे  हैं |कहीं व्यक्ति-व्यक्ति के बीच सच्चा और दिली संवाद नहीं है |सुख-दुःख में शामिल होने वाली भाषा न पढ़ी जा रही है, न बोली जा रही है |वे ही रटे-पिटे , अर्थ खो चुके शब्द हैं जिनसे किसी का कोई जुड़ाव नहीं हो पाता |हम जीवन की भाषा खोते जा रहे हैं इसलिए जीवन भी हमारे हाथों से फिसलता जा रहा है | सभी देशों के विचारवान लोगों को जीवन की भाषा, संस्कृति, परिवार और सामाजिकता खतरे में नज़र आ रही है |जीवन की  भाषा के अभाव में लोग एक भाषी होते हुए भी सही तरह से संवाद तक नहीं कर पाते |इसी कारण समस्या को समझना और समझाना मुश्किल होता जा रहा है |इसलिए छोटी-छोटी बात पर गुस्सा जाते हैं और सामान्य रूप से सुलझाई जा सकने वाली समस्या भी बड़ा विकट रूप ले लेती है |

इसलिए ज़रूरी है कि अपनी आवश्यकताओं को इतना न बढाएं कि उनकी पूर्ति के लिए दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ जाएं |जीवन, वस्तुएँ जुटाने या जीने की तैयारी का नाम नहीं है |जीवन हर पल जीने के लिए है और शांति और संतोष से जीने के लिए है |
तुलसी कहते हैं-
बिनु संतोस न काम नसाहीं |
काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं |

इसलिए सायास समय निकाल कर जीवन और उसकी भाषा से जुड़ना ज़रूरी है  |पिछली पीढ़ी के लोग कोई सुपर मैन नहीं थे जो कई भाषाएँ सीख लेते थे और नौकरी के बाद जीवन में भी लौट आते थे |जीवन की यह भाषा अपने जातीय जीवन के साहित्य, लोक गीत-संगीत, दर्शन, मुहावरे, कहावतें,उद्धरण और सुभाषितों में मिलेगी |न तो सस्ते, समय बिताऊ कहानियों, चुटकलों में मिलेगी और न ही पैसे कमाऊ फिल्मों में |

जब हम जीवन की भाषा बोलेंगे, तो शायद वे बहुत सी समस्याएँ भी कम हो जाएँगीं जो उचित संवाद के अभाव में हमें बहुत बड़ी लग रही थीं |और तब हम जीवन के सुख-दुखों को एक दूसरे के साथ मिल-बाँट कर जीवन का वास्तविक आनंद ले सकेंगे |

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पेट पालन के लिए कोई भी भाषा सीखें लेकिन  उसे जीवन की भाषा न बनाएं |  जीवन के सुखो-दुखों की अभिव्यक्ति केवल मातृभाषा में ही हो सकती है |
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