Oct 31, 2019

वज़न बराबर नहीं है



वज़न बराबर नहीं है 

राम तो खीर खाकर, थोड़ा विश्राम करने के बाद वास्तविक जनकल्याण के लिए निकल गए |उनका जन कल्याण कोई सेल्फी और विज्ञापन वाला जन कल्याण तो है नहीं जो मीडिया वालों को घर बुलाकर निबटा दिया जाए |यह तो वास्तविक कल्याण का काम है जो महलों को छोड़कर वनवास में गए बिना नहीं होता |तोताराम भी अपने जन्म लग्नानुसार वृश्चिक लग्न में लक्ष्मी पूजन करने के लिए निकल लिया |हम भी खाना खाकर, लक्ष्मी जी को हाथ जोड़कर, डबल पेंशन लेने के लिए शतायु होने का आशीर्वाद माँगते हुए यथासमय सो गए |

सुबह दिवाली की राम-राम करने के लिए सबसे पहले तोताराम ही आया |आते ही बोला- मास्टर, एक दोहा सुन |

दोहा इस प्रकार था-  
होंगे जगमग दीप असंख्य, लौटेंगे घर राम |
स्वागत करने पहुँचेगा जगत अयोध्या  धाम ||


दोहा सुनाकर खुद ही वाह-वाह करने लगा |

हमने पूछा- यह किस कवि की करतूत है ? कहीं यह 'दोहा-संहार' तूने ही तो नहीं किया है ? 

बोला- क्यों क्या बात है ?



हमने कहा- यह दोहा नहीं है |और है तो अशुद्ध | इसके पहले चरण  'होंगे जगमग दीप' के आधार पर लगता है, रचनाकार का इरादा 'सोरठा' लिखने का है | दूसरे चरण  'लौटेंगे घर राम' से दोहा लगता है | तीसरा चरण 'स्वागत करने पहुँचेगा'  न सोरठा का  और न ही दोहे का |पहले और दूसरे चरण में मिलकर २६ मात्राएँ हैं | इसी तरह तीसरे और चौथे चरण को मिलाकर भी एक मात्रा अधिक है | 

बोला- भाजपा का उदार शासन है |किसी बात की कोई कमी तो नहीं रखी |भगवान राम के स्वागत के लिए खुले दिल और खुले हाथ से बजट का प्रावधान किया गया है |११३ करोड़ रुपए | दोहे की २४-२४ मात्राओं की जगह २६-२५ मात्राएँ अर्थात कुल तीन मात्राएँ अधिक ही तो रखी हैं |अब कोई गबन का आरोप नहीं लगा सकता |

हमने कहा- लेकिन तूने हिसाब लगाते समय पहले चरण में 'असंख्य' शब्द पर ध्यान नहीं दिया |विज्ञापन में दीयों की संख्या साढ़े पाँच लाख बताई गई है |इस गहमा-गहमी में कौन गिनेगा कि कितने कम दीये जलाए गए |और 'असंख्य' में तो और बड़ा घपला है |पाँच ट्रिलियन भी बताए सकते हैं |

बोला- तो क्या करें ?
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हमने कहा- कर तो कोई भी कुछ नहीं सकता |बन्दों को स्पष्ट बहुमत मिला है जो न करें सो कम |और फिर धर्म का मामला है; कोई बोले तो मरा, न बोले तो मरा |गाय भले ही सड़क पर आवारा फिरते-फिरते पोलीथिन खाकर मरे या गौशाला में भूखी रहकर लेकिन आवारा गायों और सांडों की समस्या पर कोई तार्किक बात नहीं कर सकता | 

हम तो दोहे की मात्रा और वज़न ठीक कर सकते हैं |विद्वान कहते हैं- अशुद्ध मन्त्र बोलने से हित की जगह अहित हो सकता है |और कुछ नहीं तो गलत दोहे से होने वाले अहित से तो देश को बचा लिया जाए |तो शुद्ध दोहा इस प्रकार हो सकता है-



लौटेंगे  वनवास  से  लक्ष्मण  सीता    राम |
स्वागत करने के लिए चलो अयोध्या धाम ||

तोताराम ने खड़े होकर ताली बजाते हुए कहा- कुछ भी हो मास्टर, इस थोड़े से परिवर्तन से दोहे में पूर्णता, प्रवाह, सरलता और भावाकुलता आ गई है |
अब इस 'स्टेंडिंग ओवेशन' के लिए चाय तो हो जाए |





















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Oct 27, 2019

मैं राम हूँ



मैं राम हूँ 


कहते हैं दिवाली पर रात को दरवाजे खुले छोड़कर सोना चाहिए |दरवाजे बंद हुए तो लक्ष्मी कैसे आएगी ?इस चक्कर में प्रायः यह होता है कि लक्ष्मी आए न आए चोर-उचक्के ज़रूर कुछ न कुछ उठा ले जाते हैं |और फिर नगर निकाय के चुनाव आने वाले हैं |क्या पता, दिवाली के बहाने वोट माँगने वाला कोई सेवक जाते समय जूते ही न उठा ले जाय |सावधानी हटी और दुर्घटना घटी- ऐसे ही मांगलिक अवसरों के लिए कहा गया है | इसलिए दरवाजा बंद किए हुए थे |कहीं ज्यादा तेल न पी जाएँ इसलिए दीयों को पानी में भीगने के लिए रखकर दिया और बत्तियाँ बनाने बैठ गए |

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई |हमने बैठे-बैठे ही पूछा- कौन है ? 

उत्तर आया- राम |

हमने कहा-  तेरी तुला राशि है इसलिए तेरे लिए तो सभी लग्न और मुहूर्त एक जैसे हैं लेकिन हम पोती के जन्म लग्न 'मेष' के हिसाब से पौने छह से सात बजे तक पूजा करेंगे इसलिए थोड़ा व्यस्त हैं |बत्तियाँ बना रहे हैं | या तो आ जा बत्तियाँ बनवा दे या फिर पूजा कर आ, फिर बैठेंगे |

प्रत्युत्तर आया- मैं राम हूँ |

हमने कहा- क्या हमें पता नहीं है ?खुद को राम कह या बलराम, जगजीवन राम कह या राम नाइक क्या फर्क पड़ता है |रहेगा तो तोताराम ही |अपने मुँह मिट्ठू बनने वाला |

फिर उत्तर आया- मैं तोताराम नहीं, राम हूँ |अयोध्या वाला राम |

हमने कहा- भगवन कहीं हमसे कोई छल तो नहीं हो रहा है ? पता नहीं आप कौन हैं ?
कहीं अन्दर आकर हमारी आँखों में मिर्च झोंककर या कनपटी पर तमंचा रखकर कुछ उठा-उठू न ले जाओ |

घर आए के लिए दरवाज़ा न खोलना भी तो गलत है; सो हिम्मत की, बजरंगबली का स्मरण किया, राम का नाम स्मरण कर आगंतुक को अन्दर लिया |कमरे से प्लास्टिक वाली कुर्सी लाकर रख दी |आगंतुक बैठ गए |

हमने पूछा- प्रभु विश्वास नहीं हो रहा कि आप हैं ? शबरी और गीध की तरह हमारी सुध लेने चलकर आए हैं |लेकिन आप ?  किसके राम ? वाल्मीकी के राम, तुलसी के राम, कबीर के राम, तोगड़िया-अडवानी या योगी जी के राम ? केवल राम ?न श्री राम, न मर्यादा पुरुषोत्तम, न रघुकुलतिलक, न रघुवंश शिरोमणि |बस राम ? 

बोले- क्या मैं कलियुग के संतों की तरह बेशर्म होकर खुद ही अपने नाम से पहले  श्री-श्री, श्री-श्री एक सौ आठ, एक हजार आठ, ....शिरोमणि, ....सम्राट विशेषण लगाऊँ |तुलसी 'मानस' में मुझसे कहलवाते हैं-नाम राम लछिमन दोउ भाई |
और सच्चे भक्त भी मुझे राम ही कहते हैं |और फिर घट-घट में वास करना रघुकुल तिलक, दशरथनंदन, मर्यादा पुरुषोत्तम आदि भारीभरकम नामों के साथ संभव नहीं है |

कुछ देर बात करने के बाद विश्वास हो गया |बत्तियाँ बनाना भूल गए और पूछा- प्रभु, इस समय तो आपको अयोध्या में होना चाहिए था, यहाँ कैसे ?
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 बोले- इस समय अयोध्या में किसे फुर्सत है ?मेरे अयोध्या पहुँचने से पहले ही सरयू पार से हेलिकोप्टर पर सवार होकर पूरा राम-मंत्रीमंडल स्वागत-स्थल  पर पहुँच गया था |सो विशिष्ट जन तो स्वागत,फोटो खींचने-खिंचवाने में व्यस्त हो गए |शेष लोग दीये गिन रहे थे, जला रहे थे और तेल का हिसाब लगा रहे थे |

वैसे मुझे अभी अयोध्या जाना भी नहीं है |पहले तो एक रावण था |आज तो गली-गली में तरह-तरह के रावण में तरह-तरह के गर्हित कामों में लगे हुए हैं |उस रावण ने तो प्रतिशोध के लिए सीता का केवल हरण किया था लेकिन आज महिलाएँ ही क्या, कन्याएँ तक घर-बाहर, स्कूल कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं | सरकार तक को 'बेटी बचाओ' का नारा देना पड़ रहा है |और लोग हैं समझ नहीं पा रहे हैं कि बेटियों को किस-किस से बचाएँ ? 

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई |हमने कहा- अब कौन ? हनुमान, लक्ष्मण, सुग्रीव, जामवंत, कौन है ?

तभी तोताराम अन्दर प्रवेश करते हुए बोला- क्या अयोध्या की तरह 'राममय' हो रहा है ? यहाँ कहाँ राम ? यहाँ तोताराम के अतिरिक्त कौन राम हो सकता है ?

हमने कहा- तोताराम, हम मज़ाक नहीं कर रहे हैं |तुम्हारे सामने कुर्सी राम ही तो बैठे हैं |

तोताराम तो तोताराम |बोला- अच्छा किया प्रभु, जो यहाँ चले आए |अब कुछ दिन यहाँ रुकिए |जब अयोध्या में सब कुछ सामान्य हो जाए तब जाइएगा |दीयों के फैले तेल से फिसलने का भी डर है | और इस समय तो वहाँ बहुत प्रदूषण हो रहा होगा, सवा पाँच दीये जो जलाये गए हैं |

हमने कहा- पोल्यूशन तो कोयला, पेट्रोल-डीज़ल, टायर-पोलीथिन आदि जलाने से होता है | अयोध्या में तो घी के दीये जल रहे होंगे वे भी गाय के घी के |इससे तो हवा शुद्ध होगी |

बोला- कुछ भी जले, थोड़ा या कम कार्बन निकलेगा तो ज़रूर |और फिर आजकल पानी-हवा तक तो शुद्ध मिलते नहीं और तू शुद्ध घी की बात कर रहा है | तभी तो मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्र में कहा था- भारत ने दुनिया को युद्ध नहीं, बुद्ध दिए |इसके अनुप्रास में वे 'शुद्ध' नहीं कह सके क्योंकि उन्हें पता है कि जिस देश में गाँधी में गोडसे की मिलावट की जा रही हो, वहाँ शुद्ध के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए |हाँ, एक बात ज़रूर है कि इस कार्यक्रम से उतना प्रदूषण नहीं फैलेगा जितना तू सोचता है |

हमने पूछा- क्या इसलिए कि यह एक धार्मिक कार्यक्रम है ?

बोला- नहीं |यह एक सरकारी कार्यक्रम है इसलिए | पाँच लाख की जगह दो लाख दीये जलाए जाएँगे और तेल डाला जाएगा ५० मिलीलीटर की बजाय १५ मिलीलीटर |

लगता है प्रभु बोर हो गए थे, बोले- तो अब क्या कार्यक्रम है भगतो ?

हमने कहा- प्रभु, थोड़ी-सी खीर खा लें | |कुछ भी नकली नहीं है |सुबह ही आँखों के आगे निकलवाकर दूध लाए हैं |चावल, चीनी में मिलावट की संभावना नहीं |उसके बाद खिड़कियाँ बंद करके विश्राम करें क्योंकि यहाँ भी प्रदूषण कम नहीं है ||दिवाली की सफाई के नाम पर लक्ष्मी भक्तों ने 'स्वच्छ भारत' के अंतर्गत घर का साल भर का कूड़ा सड़क पर डाल दिया है और नगर परिषद 'स्वच्छ भारत का इरादा' वाले कैसेट बजवाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है |









रमेश जोशी प्रधान सम्पादक, 'विश्वा', अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए.








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Oct 25, 2019

चमचागीरी के खतरे



चमचागीरी के खतरे 

शास्त्रों में कहा गया है- शंका और ईर्ष्या दोनों ही बहुत कष्टकारक होती हैं। कोई खतरा न होते हुए भी व्यक्ति को डराती रहती है। यदि किसी को शंका या आशंका हो जाए कि पता नहीं, छत से लटकता पंखा कब गिर पड़े तो क्या वह व्यक्ति सो सकता है? चोर तो कोई एक-दो होते हैं लेकिन यदि आप सबकी ईमानदारी पर शंका करने लगें तो रेल में बर्थ रिजर्व होने पर भी नींद नहीं आ सकती। इसी तरह यदि आप दूसरों से ईर्ष्या करते हैं तो जिससे ईर्ष्या करते हैं वह तो आराम से सोता है और आप रात भर कुढ़ते रहते हैं।  
य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्ये कुलान्वये। सुखसौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तकः।।
 -जो व्यक्ति दूसरों की धन-सम्पति, सौंदर्य, पराक्रम, उच्च कुल, सुख, सौभाग्य और सम्मान से ईर्ष्या व द्वेष करता है वह असाध्य रोगी है। उसका यह रोग कभी ठीक नहीं होता। नौकरी में हमारे साथ यही हुआ। बहुत से ऐसे साथी थे जिनके विषयों की बोर्ड की परीक्षा नहीं होती थी और उनका क्या पाठ्यक्रम होता था वे ही जानें। ऐसे में उन्हें न तो रिजल्ट की चिंता रहती थी और न ही टेस्ट और कापियां जांचने का झंझट। अन्य कामों के लिए पर्याप्त शक्ति और समय उनके पास होता था जैसे चुगली, षड्यंत्र,  झूठे मेडिकल टीए, डीए के बिल बनाना, प्राचार्य की खुशामद करना आदि। हमें उन विषयों के अध्यापकों से भी बहुत ईर्ष्या होती थी जिनके विषयों में प्रैक्टिकल परीक्षाएं होती थीं। 
उन अध्यापकों के पास प्रैक्टिकल में कम नंबर देने या अधिक नंबर देने के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रकार के हथियार होते थे। इसी कारण से उनकी क्लास में बच्चे चुप बैठे रहते थे। हमें तो मेहनत से पढ़ाने का ही सहारा था। सारा रिजल्ट हमारी और बच्चों की मेहनत तथा बोर्ड की परीक्षा पर निर्भर रहता था। चमचागीरी करके हरामखोरी करने का सौभाग्य कभी नहीं मिला। ज़िन्दगी भर अध्यापक ही रहे इसलिए कभी भी पढ़ने और क्लास लेने से मुक्ति नहीं मिली। इस कारण हम प्रिंसिपलों से भी ईर्ष्या करते रहे। कुछ समय के लिए नंबर दो अर्थात उप प्राचार्य बने लेकिन तब भी चैन नहीं मिला। कारण किसी का बुरा या भला करने का अधिकार तो प्राचार्य के पास रहा तो इस झूठे पद से कौन डरे।
कहा भी गया है- बसे बुराई जासु तन, ताही को सनमान। भलो भलो कहि छांडिये, खोटे ग्रह जप दान। सो  ‘न ख़ुदा ही मिला, न बिसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे’। इसी व्यर्थता-बोध में कुढ़ते हुए बरामदे में बैठे थे। पता ही नहीं चला कब तोताराम आया। अच्छा हुआ, यदि तोताराम की जगह कोई दुर्वासा होता तो शकुंतला की तरह हमें श्राप दे गया होता। खैर। 
बोला क्या वित्तमंत्री की तरह जीडीपी को लेकर चिंतित हो रहा है?
हमने कहा वित्त मंत्री को कोई समस्या नहीं है। उनकी सुख-सुविधाओं और रुतबे पर कोई आंच नहीं आने वाली। कोई सरकार का चहेता अधिकारी हजार-दो हजार करोड़ इधर-उधर कर भी देगा क्या हुआ रिज़र्व बैंक से लेकर भरपाई कर देंगे। मरना तो उनका है जिनका पैसा पंजाब-महाराष्ट्र बैंक में था। हम तो इस जीवन की व्यर्थता के बारे में सोच रहे थे कि न तो चमचागीरी करके हरामखोरी का मज़ा लिया और न ही किसी से मक्खन लगवाने सुख भोगा। 
बोला अच्छा रहा जो इस कीचड़ में नहीं उतरना पड़ा। सबको दूसरे की थाली में घी अधिक दिखाई देता है। जो घर नहीं देखा वही भला।
हमने कहा हो सकता है चमचागीरी करने में लोग मज़ाक उड़ाएं या कुछ शर्म महसूस हो लेकिन चमचागीरी करवाने में तो वैसा ही आनंद आता होगा जैसे भयंकर ठंड में हीटर लगे कमरे में सुआना बाथ लिया जाए या गुदगुदे हाथों से हलके-हलके सारे शरीर की अच्छी तरह से मसाज करवाई जाए। बोला-गुप्त जी की पंक्तियां याद कर, कहते हैं सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है दोनों ही स्थितियों में कष्ट हैं, बस प्रकार का अंतर होता है। कब्र का हाल मुर्दे को ही पता होता है। आज देखा नहीं, एक जनसभा में एक चमचे से हरियाणा के मुख्यमंत्री कट्टर जी ने ….|
हमने तोताराम को वाक्य पूरा करने से पहले ही पकड़ लिया और कहा– कट्टर नहीं खट्टर। 
बोला हां, ठीक है; खट्टर ।  वे अपने विचारों पर दृढ़ रहने वाले हैं इसलिए कट्टर भी चल सकता है। हाँ, तो मैं कह रहा था कि खट्टर जी को ‘आशीर्वाद यात्रा’ के दौरान एक भक्त ने फरसा भेंट किया। खट्टर जी जोश में आ गए और दहाड़े-  दुश्मनों का नाश करने के लिए…। 
हमने कहा यह तो ‘आशीर्वाद यात्रा’ थी इसमें यह क्रोध क्यों? बोला- बात से भटका मत और सुन। जब खट्टर जी भाषण दे रहे थे तो एक और भक्त जो उनके लिए मुकुट लाया था पीछे से उनको पहनाने लगा।


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खट्टर जी को बड़ा अजीब लगा और अनिष्ट की आशंका भी हुई। उन्होंने उस भक्त की तरफ फरसा तानते हुए कहा-  गर्दन काट दूंगा तेरी। अब बता। कम खतरा है, चमचागीरी में? बाल ब्रह्मचारी, ऊपर से मुख्यमंत्री। एक ही झटके में गर्दन धड़ से अलग ना हो जाती। धरा रहा जाता चुनाव का टिकट। 
हमने कहा- लेकिन चमचागीरी करवाने में क्या खतरा है? बोला- खतरा क्यों नहीं है। तूने राजा का किस्सा नहीं सुना जिसकी नाक पर बैठने वाली मक्खी से उसका सेवक इतना क्रोधित हो गया कि मक्खी को भगाने के लिए तलवार चला दी। मक्खी कहाँ तलवार से मरने वाली थी। हां, राजा जी की नाक ज़रूर साफ़ हो गई। इसी तरह एक बार एक सेवक बड़े मंत्री जी के सिर पर छाया करता हुआ छाता लेकर उनके साथ चल रहा था। मंत्री जी ऊंचे लम्बे और सेवक ठिगना। सो लग गई आँख में छाते ही तानी। हो गया एक बल्ब फ्यूज़। आज तक मंत्री जी धूप का चश्मा लगाते हैं।


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Oct 21, 2019

यह नोबेल भी कोई नोबेल है

यह नोबेल भी कोई नोबेल है 


पीयूष गोयल जी
नमस्ते। वैसे सच तो यह है कि आपके जन्म के समय हमें अध्यापक बने हुए तीन वर्ष हो चुके थे। उम्र में हमारे दोनों बड़े बेटे आपसे बड़े हैं। हमारे शिष्य दादा-नाना बन चुके हैं। लेकिन उम्र का क्या है? बड़ा होता है पद और पद में आप देश के 130 करोड़ लोगों से बड़े हैं।
आप देश की व्यापारिक राजधानी मुंबई में जन्मे-पले-बढ़े-पढ़े, चार्टड अकाउंटेंट हैं, देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई. से जुड़े रहे हैं, एक बार बजट भी पेश कर चुके हैं, अब रेल और वाणिज्य के मंत्री हैं, जाति से वैश्य हैं, आपके पिता वेदप्रकाश जी अटल जी की सरकार में शिपिंग मंत्री थे जो सेठों के इलाके हरियाणा से मुंबई गए थे। अब अर्थशास्त्र की कौन सी डिग्री बाकी रह गई। आपके सामने कौटिल्य, ऐडम्स, माल्थस भी क्या चीज हैं ?
इसी महीने भारत के अमरीका में मास्टरी कर रहे, मास्टर माता-पिता की संतान अभिजीत बनर्जी को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला है। उसकी आर्थिक विचारधारा के बारे में आपने टिप्पणी की है लेकिन उसके बारे में आगे बात करेंगे।
पहले संतोष जी के कॉमेंट के बारे में दो शब्द कहते चलें।
पहले इसलिए कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संगठन मंत्री हैं जो पूरे भारत में एक ही पद होता है। बीजेपी में तो सत्ता के गणित के हिसाब से कुलदीप सेंगर जैसे संत भी घूमते-फिरते आते-जाते रहते हैं लेकिन संघ-परिवार एक शुद्ध-सात्त्विक, अपना और असली संगठन है। उसके संगठन मंत्री होने के कारण वे अति विशिष्ट हैं। फिर अभिजीत के बारे में उनका कॉमेंट भी आपसे पहले आया है। जहां तक संतोष जी के अर्थशास्त्र की बात है तो हमें उसके बारे में कुछ पता नहीं है। फिर भी यदि ऐसी कुछ योग्यता होती तो उन्हें कहीं का वित्तमंत्री या पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया गया होता। खैर।
संतोष जी वास्तव में संतोषी हैं, यथा नाम तथा गुण। तभी उनका कॉमेंट देखिए, कहते हैं- ‘हरियाणा और महाराष्ट्र में मतदान की तारीखें नजदीक आते ही फिर से ‘इको सिस्टम’ काम पर लग गया है। मनमोहन सिंह 19 अक्टूबर को प्रेस को संबोधित करेंगे, अभिजीत बनर्जी ने भी साक्षात्कार देने शुरू कर दिए हैं, इतने वर्षों बाद अचानक पराकला प्रभाकर भी बाहर निकले हैं। पांच दिन की प्रसिद्धि के लिए इन सभी का स्वागत करें।’
इसमें जो बातें ध्यान देने योग्य हैं वे हैं- ये सब चुनाव को ध्यान में रखकर सक्रिय हुए हैं। इनका देश और अर्थव्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है। और जब ऐसा है तो इनकी अर्थशास्त्र की समझ को कैसे मान्यता दें। यह प्रभाकर वैसे तो देश की वित्तमंत्री का पति है लेकिन जब ऐसी बात करेगा तो फिर कोई भी हो। और फिर इसका जो सरनेम है वह  ‘परकला’ नहीं ‘परकाला’ (आफत का परकाला) होना चाहिए। कोई बात नहीं मना लें चार दिन खुशियां, दे लें इधर-उधर इंटरव्यू फिर कौन पूछता है।  क्या कोई सामान्य आदमी तो दूर, नेता भी बता सकता है कि अब तक दुनिया में कितनों को अर्थशास्त्र का नोबेल मिल चुका है ? याद रखने लायक कोई काम भी तो हो। जिन्होंने देश के बड़े हित के लिए बलिदान दिया उन्हें लोग हमेशा याद रखेंगे। जैसे गांधी को भले ही कोई याद करे या नहीं लेकिन गोडसे को कोई कैसे भूल सकता है? जब तक सूरज चांद रहेगा ….|
तो संतोष जी से यहीं संतोष करते हुए फिर आपसे मुखातिब।
राजस्थान-हरियाणा वाले जो कोलकाता-मुंबई में जाकर बसे हैं वे जानते हैं व्यापार और अर्थशास्त्र। बंगाल को  लें। क्या है बंगाल में। दिन में एक बार दाल-भात बना लेंगे और दिन भर उसी को खाते रहेंगे। शेष समय में चाय, पान, सिगरेट और बक-बक जिसे वे बौद्धिकता कहते हैं। कहने को तीन-तीन नोबेल दिए- दो अर्थशास्त्र के (अमर्त्य सेन, अभिजीत बनर्जी)  और एक साहित्य का (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) को। अर्थशास्त्र का एक और नोबेल उसी इलाके के एक बांग्लादेशी मुसलमान को मिला। इसके अतिरिक्त कुछ दक्षिण भारत मूल के लोगों को नोबेल मिला लेकिन क्या बंगाल और दक्षिण भारत ने एक भी बिरला, पोद्दार, बांगड़, बजाज, अदानी, अम्बानी दिया ? क्या देश के हृदय स्थल बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात की तरह देश को अवतारी नेता दिए ?
अपने राजस्थान-हरियाणा के व्यापारियों के बारे में कहा जाता है कि वे लोटा-डोरी लेकर निकले थे और देश के अनेक भागों में जाकर करोड़पति बन गए।  इसे कहते हैं अर्थशास्त्र।  यदि अर्थशास्त्र का नोबेल भारत से किसी को देना था तो उक्त राज्यों के अर्थशास्त्रियों की ओर कोई ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
और फिर आजकल पुरस्कारों की औकात सब जानते हैं। पैसा दो और पुरस्कार लो। और मान भी लें कि इन दो बंगालियों को इनकी योग्यता के बल पर यह पुरस्कार मिला तो फिर इस देश की जनता ने इनके अर्थशास्त्र को नकार क्यों दिया? इस बनर्जी से पूछकर कांग्रेस ने अपनी ‘न्याय’ योजना बनाई लेकिन क्या हुआ उस योजना का? जब कांग्रेस उस योजना के बल पर जीत नहीं सकी तो बनर्जी का अर्थशास्त्र फेल।

नार्वे सरकार को बनर्जी से यह पुरस्कार वापिस ले लेना चाहिए। और धोखाधड़ी के आरोप में सीबीआई से जांच भी करवानी चाहिए। ऐसे लोगों के पुरस्कार के पीछे हो सकता है कांग्रेस या पाकिस्तान का कोई षड्यंत्र हो जिन्होंने नार्वे की सरकार से मिलकर बनर्जी को पुरस्कार दिलवा दिया हो।  इस बनर्जी को आपने वामपंथी कहा है। थोड़ा और ध्यान से देखिए, हमें तो यह देशद्रोही लगता है।
हो सकता है लोग कहें कि फिर इस बनर्जी को मोदी जी ने और आपने बधाई क्यों दी? अब इतना असभ्य भी तो नहीं हुआ जा सकता कि किसी भारतीय मूल के व्यक्ति को नोबेल मिले और बधाई भी न दी जाए।
क्या करें अपने भारत मूल का है इसलिए बधाई तो दुनिया को दिखाने के लिए देनी ही पड़ती है।

वैसे इससे अधिक निहाल तो यह देश गुल पनाग के बेटे निहाल द्वारा मोदी जी का फोटो पहचानने पर हो गया था।  बनर्जी को दी गई बधाई भी कोई बधाई है। बकौल अमिताभ- यह जीना भी कोई जीना है लल्लू।


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