Oct 3, 2020

पार्टी प्रवक्ता और कुत्ता शास्त्री

पार्टी प्रवक्ता और कुत्ता शास्त्री


टी वी पर जिस प्रकार की बहस होती है वह जान बूझ कर ऐसी बनाई जाती है जिससे दर्शकों को योजनाबद्ध तरीके से मूर्ख, आक्रामक और एकांगी बनाया जा सके. और एंकर किसी न किसी पार्टी का पालतू होता है जो एक ख़ास तरीके से बहस में किसी को उखाड़ता है और किसी जो जमने और बकवास करने का मौका देता है.

इस बारे में हमें आज से साठ सत्तर बरस पहले की शादियाँ और रिश्तेदारियाँ याद आती हैं. लड़की वाले लड़के वालों से भद्दे मजाक किया करते थे. गालियाँ निकाल कर अपना संबंध व्यक्त करते थे. गाँव का जँवाई सारे गाँव का जमाई होता था. सबका उसे गाली निकालने का रिश्ता बनता था.

उस ज़माने में बारातें लड़की वाले के यहाँ कम से कम तीन दिन तो  रहती ही थीं. अब तीन दिन बिना किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम के कटते भी नहीं. सो दोपहर के जीमण होने के बाद मध्याह्न की चाय-नाश्ता और फलाहार से पहले गालियों और मज़ाक का एक नितांत फूहड़ सेशन चलता था. लड़की वाले की तरफ से गाँव के छंटे हुए लफंगे इकट्ठा होकर आते थे. उनके आते ही वर पक्ष के लफंगे भी धर्मशाला के चबूतरे पर जम जाते थे. और फिर जो दृश्य बनता था वह आजकल के भारतीय संस्कृति के मसीहाओं की चुनाव सभा से कम नहीं होता था. दूसरे पक्ष की सात पीढियां लपेट ली जाती थीं.

हमें लगता है यह वैदिक काल में प्रचलित शास्त्रार्थ की परंपरा का ही लोकतांत्रिक और तद्भव रूप हैं. इसीलिए  उस जमाने में भले ही घर के किसी बच्चे को बारात से वंचित कर दिया जाए लेकिन दो-चार गाली निकालने वाले लफंगों को बारात में ज़रूर ले जाया जाता था. आखिर लड़की वालों के बीच अपनी इज्जत का सवाल जो ठहरा. यह भी याद है जब ब्राह्मणों की बारात के संस्कृत ज्ञान की परीक्षा लेने के लिए कन्या-पक्ष के कुछ लोग श्लोक सुनाते और सुनते थे. लेकिन कम |ऐसे में पिताजी द्वारा हमें रटाए गए श्लोक बहुत काम आते थे.



Media Watch | टीवी बहस में Rajiv Tyagi के साथ ...




गत दिनों टी वी पर एक नितांत घटिया बहस देखी जो निश्चित रूप से एक पार्टी के प्रवक्ता और एंकर की मिलीभगत थी. उसका परिणाम बहुत दुखद हुआ. हो सकता है- यह 'काकतालीय न्याय' (कौए के बैठते ही डाल का टूटना ) की तरह संयोग हो लेकिन सारे कार्यक्रम को घटिया बनाने में एंकर का ही मुख्य रोल रहा. अन्यथा हमने तो बहुत शालीन बहसें भी देखी हैं और उनसे ज्ञानवर्द्धन भी हुआ.

आज जब इस बारे में जब तोताराम से बात चली तो बोला- मास्टर, इन एंकरों और प्रवक्ताओं से तो अपने 'शास्त्री जी' हजार गुना अच्छे थे.

हमने कहा- अपने गाँव में तो कई शास्त्री हुए हैं जैसे लंठ शास्त्री, लार्ड शास्त्री, कुत्ता शास्त्री, भोला शास्त्री आदि. कौन सा शास्त्री ?

बोला- इनसे तो सभी शास्त्री अच्छे थे. 'कुत्ता शास्त्री जी' को ही ले ले. आज़ादी से पहले के सभी गाँव वाले जानते हैं  कि शास्त्री जी सातवीं फेल हैं. बस, अखबार पढ़ लेते हैं, बहस कर लेते हैं और मौका आने पर लट्ठ भी चला लेते हैं. लेकिन गाँव के लड़के उनके बारे में इतना ही जानते हैं कि वे शास्त्री जी हैं और बिना संस्कृत जाने ही अपनी आक्रामकता के बल पर शास्त्रार्थ जीत सकते हैं.

 शास्त्री जी के इस नाम की भी एक कहानी है.  बचपन में टी वी तो दूर, पूरे गाँव में रेडियो सेट भी केवल दो थे और रेडियो स्टेशन पर किसी कार्यक्रम में जा पाना तो लोगों के लिए स्वप्न के समान था.  ऐसे में वे अपनी प्रतिभा के बल पर मोहल्ले के कुत्तों का दल बनाकर दूसरे मोहल्ले के कुत्तों से शास्त्रार्थ के लिए ले जाते थे. कई देर तक ऊँची आवाज़ में बहस होती थी. रास्ते आते-जाते लोग रुककर आनंद लेते थे. उस शास्त्रार्थ में संलग्न कुत्तों ने कभी किसी को काटा नहीं. उस युग के कुत्ते भी शालीन हुआ करते थे. कुछ समय बाद शास्त्री जी अपने शिष्यों को लेकर मोहल्ले में लौट आते थे.

हमने कहा- तो फिर ये अपने को पढ़ा-लिखा और अनुशासित पार्टी के प्रवक्ता कहते हैं और आचरण शास्त्री जी के कुत्तों से भी गया गुजरा करते हैं.

बोला- शास्त्री जी भी सच्चे स्वयंसेवक थे और उनके शिष्य भी. उन्हें किसी प्रकार का कोई लालच नहीं था. न धन का, न पार्टी में किसी पद का |वे जो कर रहे थे वह शुद्ध सांस्कृतिक कार्यक्रम था. लेकिन ये तो लालच में लुच्चापन कर रहे हैं. जितनी गन्दगी फैलाएंगे उतना चर्चित होंगे. जहां तक तथ्यों और इतिहास की बात है तो जब इनके नेताओं को ही पता नहीं है तो इनसे क्या आशा करना. बस, मामला उस गाने की तरह है-

'तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम पे ख़तम'   की तरह सब कुछ

'हमारे नाम से शुरू, हमारे नाम पे ख़तम'.

हमने कहा- छुटभैय्यों की तो हम नहीं कह सकते लेकिन उस्ताद लोग सब जानते-समझते हैं. याद रखो, ताला बनाने वाले इंजीनीयर से ताले की नकली या डुप्लीकेट चाबी बनाने वाला अधिक चतुर होता है. 
 


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Oct 2, 2020

मोरिंगा के परांठे


मोरिंगा के परांठे 


जैसे ही तोताराम आया, हमने पूछा- हे प्रिय तोताराम, इस उम्र में भी तुम्हारी फिटनेस का रहस्य क्या है? कृपया हमें इस रहस्य से अवगत करवाने का कष्ट करें.

बोला- यह संस्कृतनिष्ठ भाषा ! क्या चक्कर है ? लगता है आज चाय का कोई जुगाड़ नहीं है. जब किसी को बहलाना या बहकाना होता है तब लोग इसी भाषा में बोलते हैं. सच कहूँ, मुझे इस तत्सम हिंदी से बड़ा भय लगता है. मोदी जी ने भी 'मन की बात' में बड़ी मनमोहक बातों में लगाकर चुपके से रसोई गैस पर सब्सीडी बंद कर दी. 

हमने कहा- तुझे कहाँ से मिली सूचना ? 

बोला- अपनी बैंक की पास बुक ध्यान से देखाकर. उसमें पिछले चार महिने से सब्सीडी नहीं आ रही है. वैसे जहाँ तक सूचना देने की बात है तो मोदी जी के पास ऐसी छोटी-मोटी बातों की सूचना देने के लिए समय कहाँ है ?

हमने कहा- ऐसी बात नहीं है. उन्हें देश के हित की छोटी से छोटी बात का भी ध्यान रहता है. आज ही उन्होंने विराट कोहली, पोषण विशेषज्ञ रुजुता दिवेकर, मिलन्द सोमण, देवेन्द्र झाझड़िया से उनकी फिटनेस का राज़ पूछा और अपनी फिटनेस का राज़ बताया. इससे फिटनेस में रुचि रखने वाले और उत्साहित होंगे और हमारे जैसे आलसी फिटनेस के लिए प्रेरित होंगे. फिट इण्डिया : हिट इण्डिया. 

बोला- कहीं यह मिलिंद सोमण वही तो नहीं है जिसने आज से कोई २५ वर्ष पहले मधुसप्रे के साथ बिना कपड़ों के किसी कंपनी के जूतों का विज्ञापन किया था ? 

हमने कहा- हाँ, है तो वही लेकिन अब ५५ साल की उम्र में भी अपनी फिटनेस के बल पर अपने से २५ साल छोटी अंकिता कँवर के साथ पारिवारिक जीवन बिता रहा है. लेकिन बात तो तेरी फिटनेस के रहस्य की थी. 

बोला- गरीब की क्या फिटनेस ? गरीबी ही उसकी फिटनेस का रहस्य है. कम खाते हैं, गम खाते हैं. बुढ़ापे में भी पेट के लिए दौड़ना पड़ता है और लोग समझते हैं बूढ़ा इस उम्र में भी फिट है. वही बुढ़िया वाली बात. किसी ने कहा- बुढ़िया, बहुत तेज़ दौड़ रही है. बुढ़िया बोली- मैं क्या दौड़ रही हूँ, कुत्ते पीछे पड़े हैं, दौड़ा रहे हैं. 

नेता का तो रास्ते चलते भी यदि आराम करने का मन हो जाए तो एम्स में घुस जाता है और चेकिंग के बहाने लक्ज़री कोटेज में खूबसूरत नर्सों की मुस्कान युक्त सेवा से फिट हो जाता है. मुझे लोग पूछते हैं आपकी स्लिमनेस का क्या राज़ है ? क्या बताऊँ ? अधभूखे आदमी पर क्या चर्बी चढ़ेगी ? मोटापा तो मुफ्त के मनमाने माल पर आता है. 

हमने कहा- ऐसा नहीं है. सस्ते में भी व्यक्ति पौष्टिक भोजन कर सकता है और मोदी जी की तरह स्वस्थ रह सकता है. 

बोला- मैंने तो कुछ साल पहले पढ़ा था कि मोदी जी के स्वास्थ्य का रहस्य अस्सी हजार रुपए किलो का कोई मशरूम है जो हिमालय में पाया जाता है. 

हमने कहा- ये सब अफवाहें हैं. उसकी कीमत ८० नहीं मात्र ३० हजार रुपए किलो है. 

बोला- ३० हजार भी कोई कम है क्या ? मेरी तो पेंशन भी इतनी नहीं बनती.


 


हमने कहा- इस बार उन्होंने एक बहुत ही सस्ता नुस्खा बताया है. वे सप्ताह में दो दिन  मोरिंगा के पत्तों के परांठे खाते हैं. तू चाहे तो, हमारे पिछवाड़े में लगा है, सारे पत्ते तोड़ ले जा.  

बोला- क्या यह मोरिंगा मोर या उसे दाना चुगाने जैसी थेरेपी तो नहीं है ? 

हमने कहा- नहीं, मोरिंगा का मोर से कोई संबंध नहीं है, यह तो अपने सहजन, सैंजना का वानस्पतिक नाम है- ओरिंगा ओलिफेरा. अपने राजस्थान के वीरवर महाराणा प्रताप भी अपने बच्चों को शायद इसी घास की रोटी खिलाते थे.

बोला- बड़े आदमी कभी पूरी बात नहीं बताते फिर चाहे वे महाराणा प्रताप हों या मोदी जी. जब  मोदी जी के शेफ संजीव कपूर से पूरी रेसिपी पूछोगे तो पता चलेगा कि सहजन के तो चार पत्ते होते हैं बाकी तो काजू, किशमिश, बादाम, पिस्ते और पीले रंग की देशी गाय का शुद्ध घी होता होगा. और शहद के साथ खाते होंगे.



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Sep 28, 2020

सूट, बूट की सरकार


सूट, बूट और  सरकार 


कल दिन बड़ा चिपचिपा और सड़ियल रहा. रात को भी लग रहा था कि यह सब अनिश्चितकालीन कोरोना-कर्फ्यू की तरह लम्बा चलेगा लेकिन सुबह धूप निकल ही आई. हम भी विधायक रूपी कुलवधुओं को भाजपा के शोहदों द्वारा भगाए जाने के भय से क्षणिक मुक्ति पाए मुख्यमंत्री की तरह बरामदे में मगन-मन बैठे थे. तोताराम कब आया हमें पता ही नहीं चला जैसे कि त्रिपुरा में बिप्लव देब के शपथ-ग्रहण समारोह में मोदी जी को पता ही नहीं चला कि जिनके राम-रथ की खिड़की से लटककर वे अयोध्या पहुंचे थे वे अडवानी जी भी वहीँ मंच पर प्रणाम की मुद्रा में खड़े हैं.     

हमने पत्नी को आवाज़ लगाई- लगता है, आज तोताराम नहीं आएगा |उसकी चाय भी हमें ला दो. 

पत्नी आई और बोली- आप भी अजीब बातें कर रहे हो. यह बरामदे में कोने में कौन बैठा है ? तोताराम ही तो है. 

तोताराम ने मरी आवाज़ में कहा- अब मेरा क्या तो होना और क्या नहीं होना. मैं तो अवसादग्रस्त हूँ. हीनभावना से मरा जा रहा हूँ. बस, पेंशन के लालच में जिंदा हूँ नहीं तो लटक जाता बास्केट बॉल के खम्भे से. 

हमने कहा-  कोरोना के कारण सरकार के अतिरिक्त सारा देश ही अवसाद में है लेकिन तुझे लटकने के लिए बास्केट बॉल का खम्भा ही क्यों चाहिए ? सच्चा आत्महत्या करने वाला किसी खम्भे विशेष को नहीं ढूँढ़ता. वह तो किसी भी ट्रक के नीचे सिर दे देता है. धर्मेन्द्र की तरह टंकी पर चढ़कर हल्ला मचाकर जनता और मौसी को इकठ्ठा नहीं करता. जब तूने मोदी जी द्वारा तीन साल तक सातवें पे कमीशन के बारे में चुप्पी साधे रखने के बावजूद हताशा नहीं दिखाई तो आज ऐसा क्या हो गया कि तू अवसादग्रस्त हो गया ?

बोला- आज ही स्मार्ट फोन पर एक समाचार देखा कि अमरीका के प्रसिद्ध बास्केट बॉल खिलाड़ी माइकल जॉर्डन के ३५ साल पुराने जूते ४.६० करोड़ रुपए में नीलाम हुए जबकि हमारे १३५ करोड़ के हृदय-सम्राट, विकास-पुरुष, विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली नेता मोदी जी का सूट मात्र ४.३१ करोड़ रुपए में नीलाम हुआ. मोदी जी तो खैर, फकीर हैं, अपने सभी उपहार नीलाम करके वह राशि भी जनहित के कामों के लिए दान दे दी. वे सभी प्रकार के मान-अपमान से परे हैं, संत हैं लेकिन मैं तो साधारण आदमी हूँ. मैं तो अपने नेता के सूट के केवल ४.३१ करोड़ रुपए में नीलाम होने से शर्म के मारे मरा जा रहा हूँ. 


PM Modi's Suit Most Expensive Sold At Auction, Rules Guinness Records



अरे, ३५ साल पुराने बूट और वे भी एक काले आदमी के जिसे कोई भी गोरा पुलिस वाला मात्र २० डॉलर के एक नकली नोट के चक्कर में अपने घुटने से गरदन दबाकर मार सकता है, मोदी जी की सूट से भी महँगे नीलाम हुए. वह सूट जिसमें कम से कम  एक दो लाख के तो सोने के तार ही लगे हुए होंगे. जाने कितनी मेहनत और मन से किसी कलाकार ने बनाया होग. और ये जूते. एक तो साइज़ में ही इतने बड़े कि किसी के पैर में फिट न बैठें  और फिर खिलाड़ी के जूते. पसीने में सड़ रहे होंगे. 


jORDAN SHOES

हमने तोताराम की पीठ पर हाथ रखा और कहा- दिल छोटा मत कर. महानता का मूल्यांकन पैसों से थोड़े ही होता है. सभी महान और अमूल्य चीजें सस्ती ही नहीं बल्कि मुफ्त मिलती हैं जैसे धूप, हवा, रोशनी और यहाँ तक कि जीवन भी. घटिया और फालतू चीजों का ही ज्यादा हल्ला मचाया जाता है. क्लिंटन और मोनिका लेवेंस्की के अन्तरंग क्षणों से अभिषिक्त वह ड्रेस गाँधी जी के चश्मे से दस गुना दामों में बिकी तो क्या गाँधी का महत्त्व कम हो जाता है ? धन के आधार पर मूल्यांकन तो अतिसामान्य लोगों का काम है. 

बोला- मास्टर, इस सूट और बूट की बात से मुझे एक बात ध्यान में आई कि जब मोदी जी ने सूट नीलम ही कर दिया तो राहुल मोदी जी की सरकार को सूट-बूट की सरकार क्यों कहते हैं.  

हमने कहा- इस हिसाब से तो मोदी जी को बूट भी नीलम कर देने चाहियें तो फिर राहुल उन्हें केवल 'सरकार' कह कर बुलाएँगे. कितना शालीन, रौबदार और दिल छू लेने वाला मस्त संबोधन है- 'सरकार'. जॉर्डन के बूट और मोदी जी के सूट की अब तक की बात और है लेकिन यदि आज के दिन मोदी जी अपने बूट नीलम करें तो करोड़ों रुपए क्या, अरबों डॉलर बरस जाएँगे. 

बोला- लेकिन बूट के बिना सरकारें नहीं चलतीं. तभी तो मोदी जी ने राम मंदिर के शिला पूजन के समय कहा था-

भय बिन होय न प्रीत. 

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Sep 25, 2020

सच्चे हिन्दू की पहचान


सच्चे हिन्दू की पहचान 


सबसे छोटा भाई अपने बेटे-बहू के साथ सिंगापुर रहता है. परसों उसका फोन आया कि उसे पोता हुआ है. हालांकि इतनी दूर से तो बिना प्लेन के कोरोना भी नहीं आ सकता लेकिन सौरी (स्यावड़)ज़रूर इतनी दूर आ ही जाती है. परिवार में पास या दूर  किसी भी जन्म, मृत्यु और विवाह के बाद घर के मिट्टी के बरतन बदले जाते हैं. पुरुष अपनी जनेऊ भी बदलते हैं. हम इन बातों में बहुत विश्वास नहीं करते फिर भी जनेऊ बदलना कोई महँगा काम तो है नहीं सो धर्म और संस्कृति का नाटक करने में क्या बुराई है. 

जैसे ही तोताराम आया, हमने कहा- तोताराम, इन दो-चार दिनों में जब भी बाज़ार जाए तो हमारे लिए दो जोड़े जनेऊ ले आना, बदलेंगे. सिंगापुर वाले भाई के यहाँ पोता हुआ है. 

बोला- जनेऊ तो ले आऊँगा लेकिन न तो तू संध्या वंदन करता और न ही गायत्री मन्त्र का जाप. यह बिना बात का नाटक करने से क्या फायदा ? तुझे कौनसा हिन्दू वोटरों को लुभाने के लिए राहुल गाँधी की तरह जनेऊ दिखाने की ज़रूरत पड़ने वाली है. 

हमने कहा- सो तो नहीं पड़ने वाली लेकिन क्या पता, कभी किन्हीं सच्चे हिन्दुओं में फँस जाएँ तो जान बचाने के लिए जनेऊ का सहारा लेना पड़ सकता है  ? 

बोला- तो क्या तू समझता है जनेऊ दिखाने या टीका लगाने मात्र से तुझे हिन्दू मान लिया जाएगा ? जनेऊ तो रुपए की तीन आती हैं |कोई भी पहनकर हिन्दू या ब्राह्मण बन जाएगा. 

हमने कहा- मोहन भागवत जी तो कहते हैं कि भारत में जन्म लेने वाला हर मनुष्य हिन्दू ही है. 

बोला- जब उनसे भी डिटेल में बात करेगा तो सच का पता चलेगा |कुछ सच ऐसे होते हैं जो संगठन के बड़े लोग मंचों पर नहीं बोलते;  प्रवक्ताओं से बुलवाए जाते हैं जैसे १२ अगस्त को एक टीवी बहस में संबित पात्रा ने कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी से कहा- कि वह (वे नहीं) जैचंद है |तिलक लगाने से ही कोई सच्चा हिन्दू नहीं हो जाता. 
तो ऐसे में क्या गारंटी है कि तू जनेऊ पहनकर अपने को सच्चा हिन्दू सिद्ध कर सकेगा. 

तुझे पता होना चाहिए कि तथाकथित सच्चे हिन्दू गैर हिन्दुओं की 'घर वापसी' की बात तो बहुत करते हैं लेकिन जब कोई पूछता है कि घर वापसी के बाद इन्हें कहाँ फिट किया जाएगा ? तो कोई उत्तर नहीं मिलता. 'एक नूर ते सब जग उपज्या' वालों में ही देख ले सभी सिक्ख समान नहीं हैं. सब अपने मूल के अनुसार रविदसिया, जट और रामगढ़िया आदि रहते हैं. देश के गृहमंत्री रहे बूटासिंह भी अपनी मूल हिन्दू जाति के अनुसार दलित ही रहे. अभी हाल में ही अमरीका में एक गोरे पुलिस वाले द्वारा गरदन दबाकर मार दिया गया जोर्ज फ्लोयड क्या क्रिश्चियन बनने के बाद भी गोरे क्रिश्चियन के समान देखा-समझा गया. जब भंगी ही रहना है तो क्या हिन्दू भंगी, क्या मुसलमान भंगी, क्या सिक्ख भंगी और क्या ईसाई भंगी |इंसान का दर्ज़ा दो, तो बात बने. 

हमने कहा- तोताराम, तुम्हारी बात में दम है. बता, हम अपने को एक सच्चा हिन्दू और वह भी ब्राह्मण सिद्ध करने के लिए क्या करें ?

बोला- इस बारे में संबित पात्रा ने कोई नियमावली तो सार्वजनिक नहीं की है फिर भी किसी खास पार्टी को वोट देने, किसी खास नेता की जय बोलने से शायद तुझे सच्चा हिन्दू मान लिया जाए. 

हमने कहा- बन्धु, हमारा जैकारा सच के अतिरिक्त किसी और के लिए नहीं हो सकता. हम तो अपने संविधान के ध्येय वाक्य 'सत्यमेव जयते' ही बोलेंगे. 

बोला- एक उपाय और है; यदि तू एक ख़ास परिवार को गाली निकाल सके तो भी तुझे सच्चा हिन्दू और देशभक्त भी माना जा सकता है. 

हमने कहा- हमसे तो वह भी नहीं हो सकता. 

बोला- तो फिर 'घर मैं चुपचाप बैठ और 'राम रक्षा स्तोत्र' का पाठ कर. इस लोकतान्त्रिक देश में वे ही शायद तेरी जान बचा लें.  

हमने कहा- तोताराम, तुम्हारा यह  पात्रा तो सुना है वास्तव में इलाज करने वाला डाक्टर है तो फिर सारे दिन टी वी पर क्यों झाँय-झाँय करता है. देश में वैसे ही डाक्टरों की बहुत कमी है. कोरोना में तो और भी ज़रूरत है |क्यों किसी अस्पताल में जाकर इलाज नहीं करता ?

बोला- वह संभव नहीं है क्योंकि यह केवल सच्चे हिन्दू की बीमारियों को जानता है और उन्हीं का इलाज करता है.  मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध, दलित, सिक्ख, शूद्र, कांग्रेसी, सपाई, बसपाई, कम्यूनिस्ट, दक्षिण की पार्टियों आदि को निकालने के बाद हिन्दू बचेंगे ही कितने ? और उनमें भी सच्चे हिन्दू कितने होंगे ? और जो बचेंगे वे ज़रूरी नहीं कि इससे ही इलाज करवाएं. और भी तो कई देशभक्त और सच्चे हिन्दू डाक्टर हैं. फिर क्या पता, कब ओपरेशन करते-करते कह दे कि जनेऊ दिखा नहीं तो काटे पेट की सिलाई नहीं करूँगा. 

 वैसे भी 'अनभ्यासे विषं विद्या' |

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