Feb 15, 2011

बाज़ार के भरोसे


अभी दो दिन पहले १२ फरवरी को समाचार था कि सीकर जिले में कुछ किसानों ने अपने चने के खेतों में खरपतवार नष्ट करने वाले रसायन का छिड़काव किया जिससे खरपतवार का तो कुछ नहीं बिगड़ा मगर चने के पौधे मर गए । इससे पहले भी ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं जब बाजार के बीजों, खाद, कीटनाशक आदि ने किसानों को धोखा दिया और कई राज्यों में तो नौबत यहाँ तक पहुँच गई थी कि किसानों को आत्महत्याएँ तक करनी पड़ी थीं ।

इससे पहले भी लाखों वर्षों से दुनिया में खेती होती रही है और पारंपरिक किसानों में खेती का अपना अनुभव है । किसानों ने ही अपनी स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार समय पर बीज, खाद, कीटनाशक, संकर पौधे विकसित और संरक्षित किए हैं । खेती की नई तकनीकें विकसित कीं, बीज और अन्न संरक्षण के तरीके खोजे । आज अचानक सारी दुनिया में यह क्या, कैसे और क्यों हो गया कि किसान खाद, बीज, कीटनाशन के लिए जाने किन-किन ज्ञात-अज्ञात कम्पनियों वाले बाजार पर आश्रित, और कहें तो गुलाम, हो गया ।

खेती को सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि अन्न के बिना किसी का काम नहीं चलता । इसीलिए अन्न को ब्रह्म कहा गया है । कृषि को गौण मानकर या उपेक्षित करके कोई भी देश सही अर्थों में स्वावलंबी नहीं हो सकता । साइबर महाशक्ति का दंभ भरने वाले भारत को कृषि को उपेक्षित करने के कारण ही खाद्य पदार्थों की महँगाई और कमी झेलनी पड़ रही है । दुनिया के सभी देश अपने किसानों को सब्सीडी देते हैं और खाद्य पदार्थों के मामले में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करते हैं । जब किसान किसी और के लिए खेती करने लग जाता है या मिश्रित खेती छोड़ कर एक ही नकद फसल उगाने लग जाता है तो वह बाजार का गुलाम हो जाता है । इसीलिए कई बार देखा जाता है कि किसी एक वस्तु का उत्पादन इतना हो जाता है कि उसके भाव गिर जाते हैं और किसान को उसे यूँ ही फेंकना पड़ता है । इस लिए कृषि संतुलित और मिश्रित होनी चाहिए । आजकल राजस्थान में लोग बीयर के लिए जौ उगा रहे हैं । यह न तो कृषि का उद्देश्य है और न ही भूमि का सदुपयोग । यह सब बाजार के चक्कर में हो रहा है ।


हम सबको और किसानों को समझ लेना चाहिए कि बाजार बहुत निर्दय होता है । उसे केवल अपने मुनाफ़े से मतलब है । आप गाँव के छोटे व्यापारी पर तो स्थानीय दबाव बना भी सकते हैं मगर इन बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर किसी का जोर नहीं चलता । इन कंपनियों पर सत्ता का वरद-हस्त रहता है । कहीं कही तो ये इतनी प्रभावशाली हो जाती हैं कि सत्ता परिवर्तन तक करवा देती हैं । भारत में इसका अनुमान ‘भोपाल गैस कांड’ में सरकार की दयनीय स्थिति से लगाया जा सकता है ।

इसका सबसे उचित उपाय है कि किसान अपनी ही तकनीक, बीज, खाद और कीटनाशक तैयार करे । इसके लिए अपनी पारंपरिक तकनीक का पुनरुद्धार करे । सरकार को अपने ही गोरखधंधों से फुर्सत नहीं सो उसके भरोसे रहने से कोई फ़ायदा नहीं । भारत में कृषि का बहुत प्रायोगिक ज्ञान है और उसे बहुत से समझदार और प्रगतिशील किसान काम में ला भी रहे हैं । किसानो को उनसे संपर्क करना चाहिए । ये पारंपरिक उपाय सस्ते भी होंगे और प्रभावशाली भी । और कम से कम सीकर वाले कीटनाशक की तरह उलटे प्रभाव वाले तो नहीं ही होंगे ।

किसानों को उचित मूल्य भी मिले, इससे सरकार को कोई मतलब नहीं है । वह वोट के चक्कर में केवल नाटक करती है । यदि किसान समझे, और उपभोक्ता किसान के महत्त्व को समझे, तो सब कुछ ठीक हो सकता है किसान सुरक्षित तकनीक से अन्न उगाए और लोग उसके अन्न का उचित मूल्य सहर्ष दें । जब सब कुछ महँगा हो रहा है तो किसान को ही क्यों दबाया जाए । उपभोक्ता और किसान की जितनी निकटता बढ़ेगी, उतना की किसान और उपभोक्ता दोनों को फायदा होगा । बिचौलियों के कारण पिछले दिनों कुछ खाद्य पदार्थो की कीमतें बढ़ीं मगर उससे किसान को कोई फायदा नहीं हुआ ।

उपभोक्ता, किसान और देश, सभी की भलाई के लिए यह आवश्यक हो गया है कि उपभोक्ता और किसान के बीच सीधा संपर्क हो, देसी तकनीक अपनी जाए और उपभोक्ता किसान को सीधे-सीधे उचित मूल्य देने में संकोच न करे । किसान को भी चाहिए कि वह व्यापारियों और बड़ी कंपनियों के चक्कर में न पड़े । इस समय बाजार बहुत शक्तिशाली और आक्रामक हो गया है । उससे व्यक्ति या वर्ग विशेष को बचाने की ही नहीं, इस संसार को बचाने की ज़रूरत है । और यह सबके मिलने और समझने से ही संभव है ।

१४-२-२०११


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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

1 comment:

  1. एक्दम सही. लेकिन असर नहीं होता यहां किसी पर..

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