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Feb 2, 2013

कोतवाल सैंया


कोतवाल सैंया

आज जैसे ही तोताराम आया हमने कहा- पढ़, रात को ही लिखा यह नया व्यंग्य निबंध । तोताराम ने हमारी आशा के विपरीत उस कागज को मुचड़ कर फेंक दिया । हमारी इतने दिनों की दोस्ती और चाय का कोई लिहाज़ नहीं किया । गुस्सा तो बहुत आया लेकिन उसे पी गए । हम कोई नेता तो हैं नहीं कि किसी भी अधिकारी और कर्मचारी को थप्पड़ मार दें या किसी भी ट्रेन को कहीं भी मनमर्जी से रुकवा दें या आरक्षित सीट वाले यात्रियों को उठाकर अपने चमचों सहित उनकी सीटों पर कब्ज़ा कर लें । फिर भी हमने कहा- बंधु, तुझे आज यह क्या हो गया है ? यदि पढ़ने का मन नहीं था तो हमारा लेख लौटा देता ।

अब तोताराम असली मुद्दे पर आया, कहने लगा- यह सब तेरी सुरक्षा के लिए कर रहा हूँ । इस व्यंग्य को छोड़ और "हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई । सब आपस में भाई-भाई" लिख । भले ही ये भाई अपनी मूर्खतावश आपस में लड़ रहे हों या देश-सेवक इन्हें लड़वा रहे हों ।

फिर सतर्क होकर कहने लगा- यह भी छोड़, क्या पता इस लोकतांत्रिक देश में इस पर भी विवाद हो जाए कि सबसे पहले हिंदू का नाम क्यों रखा या इसमें जैन, बुद्ध, पारसी, यहूदी या बहाई क्यों नहीं आया ? तू तो यह लिख कि दूध पीना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है । फिर पलटा- क्या पता मेनका गाँधी ही तुझे लपेट ले कि गाय का दूध तो उसके बछड़े के लिए होता है या दूध निकालना गाय पर अत्याचार है या दूध क्या है- गाय के खून पर चढ़ा मवाद ।

हमें उबकाई सी आने लगी । हमने कहा- ये क्या जुगुप्सा की बातें कर रहा है लेकिन उसने प्रतिवाद किया- मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कह रहा हूँ । ये शब्द स्वयं मेनका जी के ही हैं ।

खैर, तोताराम ने लेखन के लिए अन्य सुरक्षित विषय बताने शुरु किए-छोड़, दूध । नहीं तो यह लिख कि गाय के चार टाँगें होती हैं । फिर उलझ गया- यार, यह भी हो सकता है कोई यह आरोप लगा दे कि यह ब्राह्मण मास्टर चार के बहाने चार वर्ण और चार वेदों की बात करके दलितों और पिछडों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाल रहा है या उन्हें उन पर अन्य तीन वर्णों द्वारा किए गए अत्याचारों की याद दिला रहा है ? अच्छा, तू तो 'झंडा ऊँचा रहे हमारा' गाया कर । नहीं, नहीं इसे भी छोड़ । क्योंकि इसमें अंत में आता है - 'देश-धर्म पर बलि-बलि जाएँ' हो सकता है इससे सरकार की धर्म निरपेक्ष छवि को नुकसान पहुँचे और अगले चुनाव पर कोई असर पड़े ।

तेरी तरह के बड़बोले लोगों का इस देश में जो हाल होता रहा है उससे तो कुछ सीख । कबीर ने एक कड़वा सच कहा था धार्मिक आडम्बर के बारे में-
कांकड पाथर जोड़ कर मस्जिद लई बनाय ।
ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय ॥ या
पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पुजूँ पहार ।
ताते या चक्की भली पीस खाय संसार ॥

क्या हुआ उसका ? हिंदू पंडों और मुसलमान दोनों ने बारी-बारी से उसकी पिटाई का इंतजाम कर दिया । और अपने आज के महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई को ले ले । लोगों ने तुड़वा दी ना टाँगें । गाँधी जी ने बड़ी ऊँची सोच दिखाई और खा बैठे गोली । सुकरात बड़ा बुद्धिजीवी बना फिरता था उसको भी ज़बरदस्ती ज़हर पिला दिया गया कि नहीं ? मकबूल फ़िदा हुसैन ने भारत माता की निर्वस्त्र पेंटिंग बनाई तो आगे-पीछे देश निकाला भोगना ही पड़ा हालाँकि कम से कम इस मामले में तो सभी भारतीयों को बुरा लगाना चाहिए था लेकिन पता नहीं क्यों, न तो मुस्लिम कुछ बोले और न हिंदू । क्या भारत माता सबकी माता नहीं है ? धर्म चाहे कोई भी हो मातृभूमि तो यही है । जब कोई भी संकट आएगा तो कोई भी देश, धर्म के आधार पर हमें शरण नहीं देगा । वैसे हिंदू बुद्धिजीवियों की तो बौद्धिकता खैर टिकी ही हिंदू छीछालेदारी पर है । कोई और नहीं, ये खुद अपने दीर पर जूते मारकर वैश्विक बुद्धिजीवी बन जाएँगे । अन्य धर्मो का कोई विवादित मामला आते ही वे निरपेक्ष हो जाते हैं । जातियों को देखें तो सबके अपने-अपने देवता और अपने-अपने महापुरुष हो गए हैं और सबको उन्हीं के स्मारकों, मंदिरों और मानापमान की चिंता है । देश जाए भाड़ में । देश की इज्ज़त-बेइज्जती से किसी का कोई लेना-देना नहीं है । और भारत की यह पोल सभी देशों ने देख रखी है और उसका फायदा उठा रहे हैं । कुछ बोले तो मरे और चुप रहकर भी तो मरने से कम हालत नहीं है ।

तोताराम खुद ही अपनी बातों और तर्कों में उलझता जा रहा था । अंत में उसने अपने माथे पर जोर से हाथ मारा और सिर झुका कर बैठ गया । आखिर हमारा बचपन का दोस्त है और हमारा शुभचिंतक । हमने उसके सिर पर हाथ फेरा, पानी पिलाया और कहा- उदाहरण छोड़ । बस, इतना बता कि तू हमसे क्या चाहता है ? तू जो कहेगा, हम वही करेंगे ।

उसने हमारे दोनों हाथ थामे और बहुत ही दयनीय स्वर में कहने लगा कि तू यह लिखना और बोलना छोड़ दे । यह तो सच है कि कोई किसी के साथ जीता-मरता नहीं पर मैं यह नहीं चाहता कि तू बिना बात ही मारा जाए और असमय ही हमारा साथ छोड़ जाए ।

हमने कहा- ऐसी क्या बात है ? देश में लोकतंत्र है ? कश्मीर में गिलानी साहब कुछ भी बोल जाते हैं, आंध्र में ओवैसी साहब कुछ भी फरमा देते हैं और बहिन मायावती जी ने तो मान्यवर कांसीराम जी के चरण चिह्नों पर चलते हुए बहुत दिनों तक “तिलक-तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार” अर्थात ब्राह्मण, बनियों और क्षत्रियों को समान, निष्काम और प्रेमभाव से बहुत वर्षों तक जूते मारें । इस देश की सामासिक संस्कृति में और भी बहुत से महान लोग हैं और होते रहेंगे जो ऐसे ही पुण्य काम करते रहेंगे लेकिन उनका तो कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता । फिर मुझे ही क्या खतरा है ? और अभी जयपुर फेस्टिवल में आशीष नंदी ने भी तो एक विवादास्पद बयान दिया है कि एस.सी., एस.टी.आदि भ्रष्ट और अपराधी होते हैं ।

तो सुन, ये आशीष नंदी जी अब गिरफ़्तारी से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण में गए हैं । और कोर्ट भी कहाँ तक बचाएगा जब समर्पित कार्यकर्त्ता नागरिक-अभिनन्दन करने की ठान लेंगे । सरकार भी तभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करेगी जब उस वर्ग के नेता माफ कर देंगे और उसके वोट बैंक को कोई खतरा नहीं होगा । वैसे तेरे लिए यह एक ताज़ा उदहारण है चुप रहने के पक्ष में ।

हमने कहा- भैया, सामान्य आदमी कानून और भगवान दोनों से डरता है और शांति पूर्वक जीना चाहता है । ये अपराध तो वे करते हैं जो शक्तिशाली हैं- चाहे सत्ता के बल पर, या वोट बैंक के बल पर । जिस भी जाति धर्म का आदमी मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या कुछ और बनता है तो उस जाति में एक तरह का गर्व आ जाता है । ओछे आदमियों को वह गर्व, अन्य जाति धर्म के लोगों का अपमान करने और अपराध करने पर भी दंड न दिए जा सकने का, एक अघोषित आश्वासन देता है । तभी तो भले आदमी के साथ दो आदमी भी सच्ची गवाही देने वाले नहीं मिलेंगे जब कि अपराधी के पक्ष में सैंकडों लोग थाने या कोर्ट में तोड़फोड़ करने पहुँच जाएँगें और कानून को प्रभावित करने के लिए दबाव डालेंगे । अफज़ल गुरु के लिए फारुक अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद ने क्या वक्तव्य दिए थे कि उसे फाँसी देने पर कश्मीर में आग लग जाएगी । तो भाई, यह सुप्रीम कोर्ट किस मर्ज़ की दवा है ? किस के बल पर नेता और उनके छुटभैये फूल मालाओं से लदे, 'वी' का चिह्न बनाते हुए और हँसते हुए पुलिस की गाड़ी में सवार होते हैं ? यही जातिगत राजनीतिक बल ।

जब क्षत्रियों का राज था तो सारे क्षत्रिय अपने को राजा समझते थे और जो चाहे करते थे । राजा किस खुशी में सेठों को नज़राना देने पर मजबूर करते थे ? क्यों राजाओं की हाँ में हाँ मिलाने वाले ब्राह्मणों को अवध्य घोषित कर दिया जाता था ? क्यों राजा नन्द के अन्याय का विरोध करने वाले चणक ( चाणक्य के पिता ) को मरवा दिया गया ? कोई अपराधी नहीं होता है । जब किसी घटिया आदमी का सैंया कोतवाल बन जाता है तो उसका दिमाग फिर जाता है और फिर वह अभिमान में आकर सड़क पर मूतता फिरता है ।

और फिर भैया किसे सच मानें ? जब मायावती का राज होता है तो मुलायम सिंह जी कहते हैं कि गुंडों का राज आ गया । जब मुलायम सिंह जी का राज होता है तो मायावती जी कहती हैं कि गुंडों का राज आगया । जब जयललिता आती हैं तो करुणानिधि और जब करुणानिधि आते हैं तो जयललिता पर अत्याचार होता है । जब कांग्रेस आती है तो बी.जे.पी. के अनुसार भूख, भय और भ्रष्टाचार बढ़ जाता है और जब बी.जे.पी. आती है तो कांग्रेस के अनुसार देश पिछड़ने लगता है और धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ जाती है । हमारे लिए तो दोनों ही पक्ष सत्य हैं और दोनों ही महान हैं । जिसे भी सच न कहें वही सिर फोड़ सकता है । बस, मूल बात यह है कि जिसका भी सैंया कोतवाल बन गया, वही परम स्वतंत्र है सब कुछ करने के लिए- जोहड़, सवाय चक भूमि और अन्य सार्वजनिक ज़मीनों पर नाजायज़ कब्ज़े करने के लिए, सरकारी नौकर होने पर भी ड्यूटी पर न जाने के लिए, मनचाही जगह पर तबादला पाने के लिए, खम्भे पर तार डाल कर मुफ्त की बिजली जलाने के लिए, बिना मान्यता के कालेज चलाने के लिए, नकली दूध और घी बेचने के लिए, मिलावट करने के लिए, अतिक्रमण करने के लिए, खाता-पीता होते हुए भी बी.पी.एल. का लाभ उठाने के लिए, दारू पीकर लोगों को परेशान करने के लिए और युवा और हीरो हुआ तो लड़कियाँ छेड़ने के लिए तथा वह और भी जो कुछ करणीय समझे । कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।

हमारी लंबी बात सुनते-सुनते तोताराम को झपकी और उबासी आने लगी थी लेकिन अब अचानक उचक कर पूछने लगा- तो फिर बता, तेरा सैंया कौन ? कौन है तेरा सैंया ? है कोई तेरा सैंया ?

हमने कहा- बंधु, ऐसा तो कुछ नहीं है ।

उसने अपनी हथेली हमारे मुँह पर रख दी और बोला- चुप, खबरदार जो यह व्यंग्य-फ्यंग का तमाशा किया तो ।
मनमोहन जी से प्रेरणा ले और बाकी बचा हुआ जीवन खैरियत से जी ले ।

०१-०२-२०१३

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Jan 31, 2013

एक कुम्भ : अनास्था का


एक कुम्भ : अनास्था का

देवों और दानवों के सम्मिलित समुद्र-मंथन के फलस्वरूप अन्य रत्नों के साथ-साथ 'अमृत-कुम्भ' भी निकला था । जहाँ-जहाँ भी यह अमृत-कुम्भ छलका वहाँ-वहाँ अर्द्ध कुम्भ, पूर्ण-कुम्भ और महा-कुम्भ के मेले भरते हैं जिनमें भारत और विदेशों के करोड़ों लोग अपनी सहज श्रद्धा से अभिभूत होकर इकट्ठे होते हैं । अब तो उस बहुआयामी प्रतीक के नाम की नक़ल पर जाने कितने और कैसे-कैसे कुम्भ के मेले लगने लगे हैं- फिल्मों के कुम्भ, विज्ञापन के कुम्भ, क्रिकेट के कुम्भ और भी न जाने कितने ही कुम्भ । चोरों, लम्पटों, जुआरियों, सटोरियों, जेबकतरों, समलैंगिकों और उचक्कों के कुम्भ भी भरने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं ।

जैसे कुम्भ होंगे, वैसे ही विचार-मंथन होंगे और वैसे ही रत्न निकलेंगे । अभी जयपुर में एक कुम्भ का मेला लगा- जिसे ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ का नाम दिया गया । जैसे संत जुटेंगे वैसे संवाद होंगे और वैसे ही अमृत-तुल्य विचार रत्न निकलेंगे । सो इस कुम्भ में जो रत्न निकले वे कहीं भी आस्था के नहीं बल्कि अनास्था के रत्न (!) निकले । और फिर जब फेस्टिवल था तो वह सब कुछ भी होगा जो फेस्टिवल में होना चाहिए- शराब, सिगरेट तो खैर सामान्य हैं इनके बिना तो न आजकल चिंतन हो सकता है और न मनन । सभी आधुनिक और खाते-पीते - जिनका सामान्य आदमी और उसके सुख-दुःख से कोई संबंध नहीं - सभी 'पेज थ्री' के देखने, दिखने और दिखाने वाले लोग ।

तो इस मंथन से निकले रत्नों पर कुछ विचार किया जाए । एक हैं केरल मूल के दक्षिणी अफ्रीका के लेखक जीत थायल जिन्होंने पिछली बार सलमान रुश्दी की विवादास्पद पुस्तक 'शैतानी आयतों' का पाठ किया था । इस पुस्तक में सब जानते हैं कि आज से पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व हुए एक समाज सुधारक, जिसके करोड़ों अनुयायी हैं और जो स्वयं किसी बात का प्रतिवाद करने के लिए उपस्थित नहीं हो सकते, के बारे में अपनी कुंठाओं को मिलाकर काल्पनिक बातें लिखी गईं हैं । ऐसे लेखन से किसी का भला नहीं हो सकता बल्कि समाज का वातावरण ही बिगड़ता है । हो सकता है कि इससे एशिया और अफ्रीका में फूट डालकर राज करने वाले उपनिवेशवादियों का कोई स्वार्थ सिद्ध होता हो लेकिन हमारा तो कुछ भी हित ऐसे साहित्य से संभव नहीं है ।

इस बार इन सज्जन ने अपनी पुरस्कृत पुस्तक 'नार्कोपोलिस' के कुछ अंश पढ़े जिनमें केवल अंग्रेजी गालियाँ थीं जिन्हें न सुन पाने के कारण कुछ महिलाएँ उठकर चली गईं । लेखक का मानना है कि ये गलियाँ तो उसके पात्र ने कही हैं । किसी ने भी कही हों लिखीं और पाठकों तक तो लेखक ने ही पहुँचाईं । और भी लेखक और फ़िल्मकार हुए हैं जिन्होंने दुनिया को बदला, राह दिखाई, उन्हें तो लोगों तक पहुँचने के लिए गालियों का सहारा नहीं लेना पड़ा । आज के इन तथाकथित आधुनिक और महान! लेखकों को ही क्यों गालियों और अश्लीलता का सहारा लेना पड़ता है । या तो कला में कमी है या फिर नीयत में । श्रेष्ठ साहित्य शालीनता की रक्षा करते हुए भी सब कुछ कह सकता है । क्या रामायण और महाभारत में ऐसे नाज़ुक प्रसग नहीं है लेकिन सारी बात कहते हुए भी उन्हें शालीनता छोड़ने की मज़बूरी नहीं आई । हमारे नाट्यशास्त्र में तो न दिखाए जाने योग्य प्रसंगों का स्पष्ट विधान है फिर भी क्या उनमें संप्रेषण नहीं होता ?

जामिया विश्वविद्यालय के व्याख्याता अजय नेवरिया का क्रन्तिकारी दर्शन था कि या तो गाँवों में तकनीकी विकास करके उन्हें मेट्रो सिटी बना दिया जाए या या फिर गाँवों को आग लगा दी जाए । क्या उपाय है ? घर में मच्छर हों तो घर को जला दिया जाए यदि खाट में खटमल हों तो खाट को ही फूँक दो । गाँवों में गंदगी के सिवा कुछ नहीं है । संयुक्त परिवार सबसे बड़ी गंदगी है । बहुत खूब, बाज़ार भी ठीक यही चाहता है कि संयुक्त क्या एकल परिवार भी टूट जाएँ जिससे बाज़ार का हर तरह का धंधा चले- रोटी, कपड़ा, श्रम बचाने और फिर बचे हुए समय को काटने के सभी साधन भी वही बेचे और श्रम न करने से होने वाली बीमारियों का इलाज भी वही बेचे । बुढ़ापे में जब कोई किसी को सँभालने वाला न हो तो परिचारक भी कोई कंपनी ही सप्लाई करे । माँ के हाथ का खाना क्या ज़रूरी है- मेकडोनाल्ड और के.एफ.सी. हाजिर है ना, कुछ भी उल्टा-सीधा खाना घर पहुँचाने के लिए । यदि इन श्रीमान के माता-पिता ने ऐसी ही संवेदनशीलता से इनका पालन किया होता तो पता चलता । परिवार के बुज़ुर्गों के अभाव का क्या असर पड़ता है और बुढ़ापे में अपनी संतानों का क्या महत्त्व होता है यह इनको अभी पता नहीं चल रहा है । पर चलेगा अवश्य । मगर तब तक पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा ।

और इन सज्जन को यह पता नहीं है कि ये वातानुकूलित कमरों में बैठकर जिस दूध, सब्जी, फल अनाज का सेवन करते हैं वह मॉल, कम्प्यूटर, मोबाइल से न आज निकल रहा है और न कल निकलेगा । खेती अमरीका, योरप सभी जगह होती है क्योंकि अन्न किसी देश की आत्मनिर्भरता का पहला आधार है । बिना मिट्टी के अनाज नहीं उगेगा और न ही कोई गाय ऐसी होती है जो गोबर न करे । पता नहीं, किस दुनिया में हैं ये तथाकथित बुद्धिजीवी जी महाराज । विचारक समाज में निरंतर और शनैः-शनैः सुधार करते हैं । न तो कोई चीज एक दिन में बिगड़ती और न एक दिन में सुधरती है । तभी गाँधी जी कहते थे कि सब को शारीरिक परिश्रम करना चाहिए । अनाज के एक-एक दाने की कीमत किसान से पूछो । ऐसे आयोजनों के प्रायोजक को ‘लिकर किंग’ माल्या जी को अधनंगी सुंदरियों के कैलेण्डर बेचने से ही फुर्सत नहीं है । और वही हाल है ऐसे आयोजनों में चेहरा दिखाने के लिए तरसते बुद्धिजीवियों का ।

एक लेखिका प्रीता भार्गव कह गईं कि स्त्रियों को आज़ादी होनी चाहिए कि वे जिससे चाहें सेक्स करें । बाद में जब कुछ लोगों को यह बात नहीं पची और विरोध हुआ तो व्याख्या की गई कि यह बयान उन्होंने सेक्स वर्कर के बारे में दिया था । किसी भी कल्याणकारी समाज का लक्ष्य तो यही होना चाहिए कि उसमें कोई सेक्स वर्कर हो ही नहीं । अपनी इच्छा के विरुद्ध शरीर बेचने के लिए मजबूर होना कोई मानवीय गरिमा नहीं है । और फिर यदि सेक्स वर्करों को तसल्ली से पूछा जाए तो यही पता चलेगा कि वे इस पेशे में स्वयं को न तो गरिमामय अनुभव करती हैं और न ही यह कोई उनका सशक्तीकरण है ।

हो सकता है लेखिका का मंतव्य यह नहीं रहा हो लेकिन लेखक और विचारक में अपनी बात इस तरह से कहने की क्षमता होनी चाहिए कि उसके कई या नितांत भिन्न अर्थ नहीं लगाए जा सकें । और नहीं, तो इसे अभिव्यक्ति की कमी तो माना ही जाना चाहिए । नौकरी और नग्नता के बहाने नारी का शिकार करने वाला, तथाकथित नारीवादी लम्पट वर्ग इस नारी-स्वातंत्र्य की आड़ में भी, नारी को घर-परिवार से बाहर निकालने को प्रेरित करके उसका शिकार ही करना चाहता है । परिवार और अगली पीढ़ी का निर्माण करने में नारी की बहुत बड़ी भूमिका होती है । जो काम माँ कर सकती है वह लाख रुपया महिने लेने वाली नौकरानी भी नहीं कर सकती । हर चीज न तो बाज़ार उपलब्ध करवा सकता है और न ही बाज़ार हर मामले में विश्वसनीय होता है ।

क्या नारी कुतिया या सूअरी की तरह अपने पीछे पाँच-सात बच्चों को लिए गलियों में घूमेगी तब उसका सशक्तीकरण होगा ? क्या लिज़ हर्ले, ब्रिटनी स्पीयर और एलिजाबेथ टेलर के अलावा नारी सशक्तीकरण का कोई और उदहारण नहीं है हमारे पास ? संभव हो तो शांतनु की पत्नी सत्यवती, कुंती, द्रौपदी के बारे में कुछ पढ़ा जा सकता है । परिवार मानव की एक अद्भुत खोज है जो उसे अधिक विकसित और सुरक्षित बनाती है । उसे नष्ट करके मानव समाज का भला तो नहीं होगा । हाँ, बाज़ार को इस बहाने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी नाजायज़ घुसपैठ करने का मौका अवश्य मिल जाएगा । हमारे अनुसार तो ये तथाकथित विचारक बाज़ार के इशारे पर खेल रहे हैं । जिन देशों ने नारी स्वातंत्र्य के नाम पर परिवार को ही नष्ट होने दिया, अमरीका और योरप के उन देशों के आधे से अधिक एकल पेरेंट और विशेषकर उनके बच्चों की मानसिक, शैक्षणिक और संपूर्ण हालत का अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि परिवार को तोड़ना कितना घातक हो सकता है । अपराधी और समाज पर बोझ बने अधिकतर बच्चे ऐसे खंडित परिवारों के ही हैं ।

चाणक्य के अर्थशास्त्र और बदनाम की गई मनुस्मृति में स्त्री के अधिकारों के बारे में पढ़ें तो पता चलेगा कि हमारे यहाँ स्त्रियों को पर्याप्त स्वतंत्रता और अधिकार रहे हैं । यदि किन्हीं कारणों से उनमें विकृति आ गई है उसके कारणों का विश्लेषण करके उन्हें सुधारा जाए । यह तो कोई तर्क नहीं है कि कोई भोजन करके बीमार हो जाए तो भोजन करना ही बंद कर दिया जाए बल्कि भोजन में काम लिए गए पदार्थों, उनकी शुद्धता, बनाने या भण्डारण की कमियों की जाँच की जानी चाहिए ।

हमारे अनुसार तो यह कुम्भ उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के हिमालय से निकली कुंठा और भ्रम की धाराओं के संगम पर लगा अनास्था का महाकुम्भ है और भारतीय चिंतन को न समझने वाले, गणेश को एलीफेंट गोड, हनुमान को मंकी गोड, कृष्ण को ईवटीज़र और महाकुम्भ को पिचर फेस्टीवल तक ही समझ पाने वालों का मौज-मस्ती के लिए लगा जमावड़ा है । इससे अधिक और कुछ नहीं । इससे किसी को कोई दिशा मिलने वाली नहीं है ।

२९ जनवरी २०१३


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