
कुछ दिन से बरसात, ओले और ठण्ड के कारण होली का माहौल बन ही नहीं पा रहा था । होली के स्वागत के चक्कर में ठण्ड खा जाने की जोखिम उठाना उचित नहीं समझ रहे थे । आज ठण्ड थोड़ी कम है । पता नहीं, मोदी जी की गुजरात में गुड गवर्नेंस के कारण है या राहुल के क्रांतिकारी तेवर के कारण या फिर केजरीवाल के धरने की धमकी के कारण । मगर मौसम थोड़ा ठीक है सो होली के उपलक्ष्य में बनाई गई चार-पाँच मठरियाँ और चाय लेकर चबूतरे पर बैठे थे । जैसे ही मठरी का एक टुकड़ा मुँह में डालने को हुए कि किसी ने ठीक वैसे ही हमारा हाथ पकड़ लिया जैसे सुदामा के दो मुट्ठी चावल खाने के बाद रुक्मिणी ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया था । चौंक कर देखा तो तोताराम ।
हमने झुँझलाकर कहा- यह क्या बदतमीजी है ?
बोला-मेरा क्या है ? मैं तो तेरी सुरक्षा के लिए ऐसा कर रहा हूँ ।
हमने कहा- हमारी मठरियाँ, हमारी चाय और हमारा चबूतरा- और ऊपर से चुनाव का माहौल, कोई भी पार्टी और उम्मीदवार भले ही बाद में पाँच वर्ष चाहे हमारी हवा टाईट रखे लेकिन पोलिंग वाले दिन तक तो हमारे इन मानवाधिकार का हनन नहीं करेगा ।
हम जो अखबार को पढ़ रहे थे उसके पहले पेज पर अटल जी के सन २००४ के चुनाव में 'जागा है यह भारत' की तरह ऊपर की तरफ हाथ उठाए, आकाश को तौलने की मुद्रा में नरेन्द्र मोदी का फोटो था । तोताराम ने चाय की तरफ इशारा करते हुए कहा- यह क्या है ?
हमने कहा- चाय ।
फिर पूछा- ये क्या हैं ?
हमारा उत्तर था- मठरियाँ ।
फिर अखबार में मोदी जी का फोटो दिखाते हुए पूछा- यह कौन है ?
हमने चिढ़कर कहा- कौन है, मोदी है ।
तोताराम ने दीवार का सहारा लेते हुए कहा- इससे सिद्ध होता है कि तूने मोदी जी के साथ चाय पी और मोदी के साथ नाश्ता भी किया । अब चुनाव आयोग यह खर्चा मोदी के चुनाव खर्च में डालेगा और मोदी जी तुझसे इसका चार्ज वसूल करेंगे ।
हमने कहा- यह भी कोई बात हुई ? हम अपने चबूतरे पर अपनी चाय पिएँ और अपनी मठरी खाएँ इसमें किसी के बाप का क्या दखल ?
तोताराम ने हमें एक और खबर दिखाते हुए कहा- एक ही टेबल पर मोदी के साथ खाना खाने के २५ लाख, अढाई लाख में सामने की लाइन में और १ लाख में पीछे वाली लाइन में बैठकर खाने के लग रहे हैं ।
हमने कहा- हम तो मोदी से कोई हजार किलोमीटर दूर अपने चबूतरे पर बैठकर अपनी चाय और मठरी का सेवन कर रहे हैं ।
तोताराम ने कहा- यह ठीक है लेकिन जैसे आजकल हर काम में बहुत बारीक अक्षरों में 'कंडीशन्स अप्लाई' छपा होता है वैसे ही किसे पता कोई ऐसी ही कंडीशन इस डिनर की भी निकल आए कि लोकसभा चुनाव २०१४ के वोट पड़ने तक जो भी भारतीय कहीं भी बैठकर, खड़े होकर या लेटकर कुछ भी खाएगा उसे कम से कम पाँच सौ रुपए नरेन्द्र मोदी के चुनाव फंड में जमा करवाने होंगे । तब क्या कर लेगा ? बंदा गुड गवर्नेंस वाला और कड़क भी । छोड़ेगा नहीं । अब आगे तेरी मर्ज़ी । सावधान करना मेरा फ़र्ज़ था सो कर दिया ।
हमने पत्नी से कहा- इस अखबार को दरी के नीचे दबा दे या चूल्हे में फेंक दे या फिर जब तक चुनाव ख़त्म नहीं हो जाएँ तब तक रसोई के ताला लगा दे ।
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
तोताराम ने आते ही कहा- मास्टर, आज चाय नहीं पीनी है । बस, जल्दी से एक क्लीन चिट दे दे ।
हमने कहा- भई, अभी तो क्लीन चिट नहीं है । एक तरफ लिखी हुई चाहे तो तू कहे जितनी दे दें । और अगर बिलकुल ही क्लीन, मतलब दोनों तरफ से क्लीन चाहिए तो बाज़ार खुलने दे, वो भी मँगवा देंगे ।
तोताराम गुस्सा गया, बोला- तेरा दिमाग तो ठीक है, मैं कोई कागज़ का टुकड़ा माँग रहा हूँ क्या ? मुझे तो तुम्हारी माजपा और भाजपा दोनों पार्टियों से क्लीन चिट चाहिए ।
हमने कहा- हमारी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है और फिर यदि बनें भी तो एक ही घर में दो धुर विरोधी पार्टियाँ कैसे बनेंगीं ?
-अरे, भोंदू राम, मैं मार्क्सवादी जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की बात थोड़े ही कर रहा हूँ । और फिर मार्क्सवादियों की किसी भी पार्टी में जनता थी ही कब ? मैं तो तेरी 'मास्टर जनता पार्टी ' और भाभी की 'भाभी जनता पार्टी ' की बात कर रहा हूँ ।
हमने कहा- न तो तू चुनाव लड़ रहा है और न ही तेरे ऊपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप है फिर क्लीन चिट क्यों चाहिए ?
-लड़ क्यों नहीं रहा । मैंने अपनी पार्टी अजपा अर्थात 'अध्यापक जनता पार्टी' बना ली है । और दिल्ली में पार्टी कार्यालय के लिए अर्जी भी दे दी है । और कुछ नहीं तो दिल्ली में एक मकान तो मिल जाएगा । अपन नहीं रहेंगे तो किराए पर उठा देंगे, पचास हजार रुपए महिने का किराया ही आता रहेगा । और क्लीन चिट इसलिए चाहिए कि आजकल मोदी और राहुल दोनों पर अम्बानी के हेलीकोप्टर का उपयोग करने के आरोप लग रहे हैं । किसे पता कल को कोई यह आरोप ही लगा दे कि तोताराम चालीस बरस से मास्टर के यहाँ रोज़ पाँच रुपए की एक चाय पीता है और आज तक इस पर कोई टेक्स नहीं दिया । आमदनी तो है ही, कैश में नहीं तो काइंड में । सो दे ही दे एक क्लीन चिट ।
इतने में गली में जोर की आवाज़ गूँजी- क्लीन चिट ले लो, क्लीन चिट ।
हमने कहा- ले तेरी समस्या हल हो गई । लगता है रामविलास पासवान का बेटा चिराग होगा या फिर सलमान खान । जा, तू भी ले ले क्लीन चिट ।
अब तो तोताराम गुस्सा गया- देख मज़ाक मत कर । सलमान खान सबसे महँगा स्टार है और लोक जनशक्ति एक गतिशील पार्टी । क्या वे इस तरह क्लीन चिट बाँटते फिरेंगे ? भले ही पासवान को लालू ने राज्यसभा में पहुँचाया है, खुद पासवान के अलावा कोई संसद सदस्य भी इसका नहीं है लेकिन पार्टी राष्ट्रीय है, दिल्ली में पार्टी कार्यालय जो मिला हुआ है ।
हमने कहा- यह भी कोई पार्टी है , एम.पी. एक, वह भी राज्य सभा का, सो भी किसी की मेहरबानी से और पदाधिकारी दस ।
कहने लगा- फिर भी क्लीन चिट तो क्लीन चिट है ।
इतने में पत्नी चाय ले आई और एक कोरा कागज़ तोताराम के हाथ में पकड़ाती हुई बोली- लाला, ये लो क्लीन चिट, निर्भय होकर चाय पिओ और कूद पड़ो कपड़े उतार कर इस हम्माम में । महाभारत में भी कहा है- ‘आशा बलवती राजन’ । लेकिन याद रखना , जब हम दिल्ली घूमने आएँगे तो तुम्हारी पार्टी के दफ्तर में ही ठहरेंगे और संसद की कैंटीन में रियायती खाना खाएँगे ।
तोताराम उछला- यह हुई ना बात भाभी, डन । और चाय उसके कुरते पर छलक गई ।
२५ फरवरी २०१४
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
ज़नाब आज़म खान,
अस्सलाम वालेकुम । आप वजीर हैं और आज़म भी फिर पता नहीं इस देश ने आपको वज़ीरेआज़म क्यों नहीं बनाया ? वैसे बनाने से क्या होता है । आदमी में दम हो तो पद न होते हुए भी हर हालत में खुद को साबित कर ही देता है । आपने बार-बार खुद को साबित किया है और जमकर साबित किया है ।
कश्मीर में राष्ट्र गान का अपमान किया जाता है, तिरंगा झंडा जलाया जाता है, वज़ीरेआज़म मनमोहन सिंह जब वार्ता करने के लिए कश्मीर जाते हैं तो उनको बैरंग लौटा दिया जाता है, फिर भी वे कुछ नहीं बोलते, उलटे कश्मीर के नेताओं और आतंकवादियों को जेब खर्च के लिए हजारों करोड़ का पॅकेज दे आते हैं । वे जानते हैं कि कश्मीर में उनकी वज़ीरेआज़मी नहीं चलती फिर भी सच नहीं कह सकते हैं लेकिन आपने स्पष्ट रूप से अपने विचार प्रकट कर दिए कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है । इसे कहते है जिगरा और कड़वा सच बोलने की हिम्मत । अगर आपमें दम नहीं होता तो क्या मुलायम आपको निकाल कर फिर मनाकर वापिस लाते ?
जब 'रामपुर का लक्ष्मण' फिल्म बनी तो हमें लगा कि ये निर्देशक ऐसी ऐतिहासिक गलतियाँ क्यों करते हैं ? अरे, 'लक्ष्मणगढ़ का लक्ष्मण' नाम नहीं रख सकते थे क्या ? और मान लो यदि रामपुर से इतना ही प्रेम था तो 'रामपुर का राम' नाम रख सकते थे लेकिन नहीं, कुछ सरप्राइज़ होना चाहिए ना । जन्म स्थान से यदि इतना ही प्रेम था तो पिताजी आपका नाम राम खान रख सकते थे । आजकल तो सब चलता है । लेकिन कोई हिन्दू अपना नाम ज़हूरबक्श रख सकता है लेकिन सच्चे मुसलमान के लिए यह संभव नहीं है । तो फिर रामपुर का नाम ही बदल आज़मगढ़ रख देते । लोकतंत्र में नाम बदलने से ही बड़ा जनकल्याण हो जाता है जैसे पूना का पुणे, कलकत्ता का कोलकाता, बनारस का वाराणसी, बंबई का मुम्बई, गाज़ियाबाद का गौतम बुद्ध नगर और फिर गाज़ियाबाद । यदि यह संभव नहीं था तो आपकी पैदाइश के समय आज़मगढ़ चले जाते । खैर, नाम में क्या रखा है ? बेईमानी तो 'हरिश्चंद्र' नाम रखकर भी की जा सकती है ।
कुछ दिनों पहले आपकी सात भैंसें खो गई थीं या घूमने चली गई थीं लेकिन आपका सुशासन देखिए कि दो दिन बाद ही वापिस लौट आईं । लालू जी वैसे तो बहुत तड़ी मारते हैं लेकिन उनकी 'चारा युग' की दुधारू भैंसें ऐसे गायब हुईं कि आज तक नहीं मिल पाईं । हमें याद है १९८१ में बंगाल के राज्यपाल गोविन्द नारायण सिंह की इज़राइली नस्ल की एक बकरी चोरी हो गई लेकिन आज तक नहीं मिली । अज्ञात व्यक्तियों के नाम रिपोर्ट लिखवाई गई । कुछ दिनों बाद चारखाने की एक लुंगी बरामद करके फ़ाइल दाखिल दफ्तर कर दी गई । ऐसे 'सिंहों' का क्या ? आपके नाम के साथ इस्लाम के कारण 'सिंह' तो नहीं लगाया जा सकता लेकिन 'शेर' तो लगा सकते हैं । आज़म खान शेर या शेरे रामपुर आज़म खान । वैसे इसके बिना भी आपका रुतबा धाँसू है ।
अब देखिए, आज ही यू.पी. असेम्बली में कुछ जनसेवकों (एम्.एल.ए.) ने कपड़े उतार दिए । लोग कहते हैं कि इससे लोकतंत्र शर्मिंदा हुआ । अरे मियाँ, लोकतंत्र का शर्मिंदगी से क्या वास्ता ? जितना नंगा, उतना ही बड़ा नेता । आजकल तो छोटा मोटा वार्ड मेम्बर और सरपंच तक सड़क से संसद तक निर्वस्त्र घूमता है । किसी के बाप में दम नहीं कि उसका कुछ बिगाड़ ले । सबको चुनाव लड़ना है तो इन्हें बर्दाश्त करना सब की मज़बूरी है । आपने इस घटना पर अपने लोकतांत्रिक विचारों को आगे बढ़ाते हुए जो वक्तव्य दिया वह आपके अलावा और कोई क्या खाकर दे सकता था । आपने कहा- 'नीचे वाले कपड़े उतार देते तो पीछे से भी दर्शन हो जाते । मर्दानगी का पता चल जाता' । वैसे आप उनकी पृष्ठभूमि देखकर ही क्या करते । लोकतंत्र में सबकी पृष्ठभूमि लगभग एक जैसी ही होती है । कपड़े उतारें या नहीं, हमें तो इस हम्माम में सब एक जैसे ही नज़र आते हैं ।
जहाँ तक पृष्ठभूमि के प्रदर्शन का प्रश्न है तो काबिल लोग वह काम शब्दों से भी कर दिखाते हैं ।
आदाब ।
१९ फरवरी २०१४
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

प्रिय राहुल जी,
नमस्ते । पूर्व प्रधान मंत्री और आपके पिता राजीव जी के हत्यारों की रिहाई के समाचार ने आपको ही नहीं पूरे देश के संवेदनशील लोगों को क्षुब्ध और निराश किया है । आपके दुःख को समझना अत्यंत सरल है । केवल २१ वर्ष की आयु में सर से पिता का साया उठ जाना कितना बड़ा सदमा होता है यह कोई भुक्त भोगी ही अनुभव कर सकता है । कहावत है- जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीड़ पराई । मीरा ने भी कहा है- घायल की गति घायल जाने जो कोई घायल होय । हमारी पूरी संवेदना और सहानुभूति आपके साथ है ।
आपने कहा- जब एक पूर्व प्रधान मंत्री को न्याय नहीं मिल सका तो एक सामान्य आदमी का क्या हाल होता होगा । सामान्य आदमी के सच को जानने के बाद और उसे ईमानदारी से अनुभव करने के बाद आदमी राजा नहीं रह पाता, सिद्धार्थ की तरह राज-पाट छोड़कर बुद्ध हो जाता है । आपने सामान्य आदमी के जीवन का सच जाना ही नहीं । कैसे जानते, जानने का मौका ही नहीं मिला । आजकल राम, कृष्ण, चन्द्रगुप्त के समय जैसे राजा कहाँ होते हैं जो ऋषियों के आश्रम में रहकर, भिक्षाटन करके, जनता के बीच रहते हुए सिंहासन तक पहुँचते थे । आजकल तो राजकुमार महलों में रहकर, विदेशों में पढ़कर, बिना जनता को जाने गद्दी पर स्थापित कर दिए जाते हैं । आज देश में सभी पार्टियों में नेताओं के परिवार वालों को देख लीजिए । सभी बिना किसी अनुभव, योग्यता और सामान्य जन के संपर्क में आए बिना ही राजनीति और लाभ के पदों पर जमे हुए हैं । उनके पास समाधान के रूप में ब्रेड की जगह केक का विकल्प है । जो नीचे से उठकर ऊपर पहुँचे हैं उनमें भी अधिकतर अपने गुणों के बल पर कम और औद्योगिक घरानों और गुंडों के बल पर ज्यादा आश्रित रहे हैं । जो अपने बल पर पहुँचते हैं उन्हें भी भ्रष्ट राजनीति भ्रष्ट होने के लिए विवश कर देती है या वे खुद ही दुखी होकर छोड़ जाते हैं । भले और वास्तव में जन के बीच से निकले, संवेदनशील आदमी का राजनीति में बने रहना असंभव है ।
हम आपकी व्यक्तिगत बात नहीं कर रहे हैं लेकिन यह सच है कि हर आदमी की दृष्टि को उसका व्यवसाय प्रभावित अवश्य करता है । सच्चे सेवकों की बात हम नहीं करते । सुरेश आमटे आदिवासियों के बीच निस्वार्थ भाव से काम करते हैं । उनका धर्म है कि सभी लोग स्वस्थ रहें लेकिन जिसने पैसे कमाने के लिए दवाई का कारखाना लगाया, अस्पताल खोला है या जिसने केवल पैसे कमाने के लिए डाक्टरी पढ़ी है वे सभी यही चाहेंगे कि अधिक से अधिक लोग बीमार हों, उन्हें महँगी और अनावश्यक दवा लिखी जाए और अधिक से अधिक धन कमाया जाए । विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कुछ वर्षों पहले स्वाइन फ्लू का डर फैलाया और फिर एक विशेष कम्पनी की महँगी दवाइयाँ विभिन्न देशों को भेजी गई । इसकी सिफारिश करने वाले वे अधिकारी थे जिनके इन दवा कंपनियों में शेयर थे या वे इन कंपनियों में मैनेजर रह चुके थे । गरीब आदमी यदि उनके सामने तड़प रहा है लेकिन उसके पास देने को पैसे नहीं हैं तो वे उसका इलाज नहीं करेंगे । संवेदना गई भाड़ में । ट्यूशनिया मास्टर स्कूल में नहीं पढ़ाएगा । यदि ऐसा करेगा तो ट्यूशन कौन पढ़ेगा ? राजनीति वाले भी जीतने या विपक्षी को बदनाम करने के लिए मुद्दे ढूँढ़ते हैं, सामान्य आदमी की पीड़ा का उनके लिए इतना ही महत्त्व है वरना सहानुभूति और जन-कल्याण की खाज चुनाव के दिनों में ही क्यों चलती है ।
गाँधी जी इसीलिए कांग्रेस में शामिल होना चाहने वाले हर व्यक्ति को पहले कुछ महीनों अपने आश्रम में रखते थे जिससे वह सामान्य आदमी बन सके । आज की तरह यह नहीं कि जिधर भी पद और पैसा दिखा उसी दल की टोपी पहन ली और नाम दे दिया 'आत्मा की आवाज़' ।
हमने तो देश की स्वतंत्रता से लेकर आज तक यही देखा है कि न्याय, सुविधाएँ और मानवाधिकार सब कुछ शक्तिशालियों, नेताओं, सेठों और गुंडों के लिए है । सामान्य आदमी को कोई भी छोटा-मोटा कर्मचारी, अधिकारी और नेता गरिया देता है जब कि गुंडों, नेताओं पर कोई कानून नहीं चलता । नेताओं को पुलिस बड़े आदर से जेल में ले जाती है । जेल में ऐसे नेताओं के पैर छूते हुए पुलिस अधिकारियों के फोटो आपको भी याद होंगे । जेल में नेताओं को उनके मनपसंद भोजन, फोन, अखबार की सुविधा, जन्म दिन मनाने और रंडियाँ नचवाने की सुविधा मिलती है । सामान्य आदमियों को ऐसा नहीं तो कम से कम दुर्व्यवहार तो न मिले । क्या कभी इतनी गारंटी भी मिलेगी ?
जाति, आरक्षण-व्यवस्था और पार्टी पोलिटिक्स के चलते कितने लोगों के साथ और कैसा अन्याय होता है, उन्हें कैसी पीड़ा झेलनी पड़ती है इसकी कल्पना आप नहीं कर सकते । ट्रांसफर, प्रमोशन और नौकरी में कैसे-कैसे और किस तरह के भेद-भाव और अन्याय होते हैं उसका पता तो आपको तब चलता जब आप सामान्य आदमी के रूप में नौकरी कर रहे होते । हमने १९८१ में जयपुर में अजमेरी गेट पर पुलिस कार्यालय के सामने एक यातायात अधिकारी को एक सिरे से वाहनों को रोकते और एक जाति विशेष के लोगों के अतिरिक्त शेष सभी वाहन वालों को परेशान करते देखा है । आपको इसकी कोई कल्पना नहीं है । कभी, वास्तव में इस तरह वेश बदलकर कि कोई पहचान न सके, जनता में जाइए और फिर देखिए कि देश की क्या हालत है । इस समय देश, गरीब, सामान्य आदमी, विकास, सेवा आदि की जो बातें चल रही हैं उसका एक कारण तो है चुनाव की मजबूरी और दूसरा यह केजरीवाल का 'आम आदमी' वरना किसे फुर्सत है धन सूँतने और ऐश करने से ।
'वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे'
हम तो चाहते हैं कि भगवान आपको वह सौभाग्य प्रदान करे कि आप वास्तव में 'वैष्णव जन' बनें और लोगों की पीड़ा को समझें । तब आपको कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी । सच्चा प्रेम तो पशु भी समझता है । और देश का आदमी अभी पशु से भी गया बीता नहीं हो गया है ।
जहाँ तक न्याय की बात है तो छोटे मियाँ, बस इतना समझ लीजे कि सामान्य आदमी के लिए न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी बँधी हुई है लेकिन जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति सामने आता है तो वह चुपके से पट्टी खिसका कर, तिरछी नज़र से भाँप लेती है कि कैसे व्यवहार करना है । और फिर उसका तराजू बिना किसी बाट (वज़न का माप) रखे हुए एक तरफ झुका हुआ है । जब साला तराजू में ही पासंग हो तो पूरा कैसे तुलेगा ?
हम आपकी भावनाओं को समझते हैं और आशा करते हैं कि भविष्य में आम आदमी के प्रति हो रहे सब प्रकार के अन्यायों के प्रति आपकी यह संवेदना और भावना बनी रहेगी । जय ललिता की छोडिए, उनकी भी अपनी राजनीतिक मजबूरी है ।
कभी समय मिले तो स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना वाले माफ़िया द्वारा मारे गए सत्येन्द्र दुबे, महाराष्ट्र के तेल माफ़िया द्वारा मारे गए यशवंत सोनवने और बिहार में सैंकड़ों लोगों से सामने मार डाले गए आंध्र के जी. कृष्णैया को मिले न्याय और नेताओं द्वारा लज्जित किए गए अशोक खेमका और दुर्गाशक्ति नागपाल के बारे में भी सोचिएगा । आपकी न्यायप्रियता क्या कहती हैं ? वैसे राजीव गाँधी जी के सामने तो ये कीड़े-मकोड़े हैं ।
चलिए, अच्छा हुआ, हमारा पात्र समाप्त होते-होते चालीस घंटे के रिकार्ड तोड़ विलंब के बाद ही सही, न्याय मिला तो ।
२१ फरवरी २०१४
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach