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Feb 23, 2014

पृष्ठभूमि का प्रदर्शन

ज़नाब आज़म खान,
अस्सलाम वालेकुम । आप वजीर हैं और आज़म भी फिर पता नहीं इस देश ने आपको वज़ीरेआज़म क्यों नहीं बनाया ? वैसे बनाने से क्या होता है । आदमी में दम हो तो पद न होते हुए भी हर हालत में खुद को साबित कर ही देता है । आपने बार-बार खुद को साबित किया है और जमकर साबित किया है । 


कश्मीर में राष्ट्र गान का अपमान किया जाता है, तिरंगा झंडा जलाया जाता है, वज़ीरेआज़म मनमोहन सिंह जब वार्ता करने के लिए कश्मीर जाते हैं तो उनको बैरंग लौटा दिया जाता है, फिर भी वे कुछ नहीं बोलते, उलटे कश्मीर के नेताओं और आतंकवादियों को जेब खर्च के लिए हजारों करोड़ का पॅकेज दे आते हैं । वे जानते हैं कि कश्मीर में उनकी वज़ीरेआज़मी नहीं चलती फिर भी सच नहीं कह सकते हैं लेकिन आपने स्पष्ट रूप से अपने विचार प्रकट कर दिए कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है । इसे कहते है जिगरा और कड़वा सच बोलने की हिम्मत । अगर आपमें दम नहीं होता तो क्या मुलायम आपको निकाल कर फिर मनाकर वापिस लाते ?

जब 'रामपुर का लक्ष्मण' फिल्म बनी तो हमें लगा कि ये निर्देशक ऐसी ऐतिहासिक गलतियाँ क्यों करते हैं ? अरे, 'लक्ष्मणगढ़ का लक्ष्मण' नाम नहीं रख सकते थे क्या ? और मान लो यदि रामपुर से इतना ही प्रेम था तो 'रामपुर का राम' नाम रख सकते थे लेकिन नहीं, कुछ सरप्राइज़ होना चाहिए ना । जन्म स्थान से यदि इतना ही प्रेम था तो पिताजी आपका नाम राम खान रख सकते थे । आजकल तो सब चलता है । लेकिन कोई हिन्दू अपना नाम ज़हूरबक्श रख सकता है लेकिन सच्चे मुसलमान के लिए यह संभव नहीं है । तो फिर रामपुर का नाम ही बदल आज़मगढ़ रख देते । लोकतंत्र में नाम बदलने से ही बड़ा जनकल्याण हो जाता है जैसे पूना का पुणे, कलकत्ता का कोलकाता, बनारस का वाराणसी, बंबई का मुम्बई, गाज़ियाबाद का गौतम बुद्ध नगर और फिर गाज़ियाबाद । यदि यह संभव नहीं था तो आपकी पैदाइश के समय आज़मगढ़ चले जाते । खैर, नाम में क्या रखा है ? बेईमानी तो 'हरिश्चंद्र' नाम रखकर भी की जा सकती है ।

कुछ दिनों पहले आपकी सात भैंसें खो गई थीं या घूमने चली गई थीं लेकिन आपका सुशासन देखिए कि दो दिन बाद ही वापिस लौट आईं । लालू जी वैसे तो बहुत तड़ी मारते हैं लेकिन उनकी 'चारा युग' की दुधारू भैंसें ऐसे गायब हुईं कि आज तक नहीं मिल पाईं । हमें याद है १९८१ में बंगाल के राज्यपाल गोविन्द नारायण सिंह की इज़राइली नस्ल की एक बकरी चोरी हो गई लेकिन आज तक नहीं मिली । अज्ञात व्यक्तियों के नाम रिपोर्ट लिखवाई गई । कुछ दिनों बाद चारखाने की एक लुंगी बरामद करके फ़ाइल दाखिल दफ्तर कर दी गई । ऐसे 'सिंहों' का क्या ? आपके नाम के साथ इस्लाम के कारण 'सिंह' तो नहीं लगाया जा सकता लेकिन 'शेर' तो लगा सकते हैं । आज़म खान शेर या शेरे रामपुर आज़म खान । वैसे इसके बिना भी आपका रुतबा धाँसू है ।

अब देखिए, आज ही यू.पी. असेम्बली में कुछ जनसेवकों (एम्.एल.ए.) ने कपड़े उतार दिए । लोग कहते हैं कि इससे लोकतंत्र शर्मिंदा हुआ । अरे मियाँ, लोकतंत्र का शर्मिंदगी से क्या वास्ता ? जितना नंगा, उतना ही बड़ा नेता । आजकल तो छोटा मोटा वार्ड मेम्बर और सरपंच तक सड़क से संसद तक निर्वस्त्र घूमता है । किसी के बाप में दम नहीं कि उसका कुछ बिगाड़ ले । सबको चुनाव लड़ना है तो इन्हें बर्दाश्त करना सब की मज़बूरी है । आपने इस घटना पर अपने लोकतांत्रिक विचारों को आगे बढ़ाते हुए जो वक्तव्य दिया वह आपके अलावा और कोई क्या खाकर दे सकता था । आपने कहा- 'नीचे वाले कपड़े उतार देते तो पीछे से भी दर्शन हो जाते । मर्दानगी का पता चल जाता' । वैसे आप उनकी पृष्ठभूमि देखकर ही क्या करते । लोकतंत्र में सबकी पृष्ठभूमि लगभग एक जैसी ही होती है । कपड़े उतारें या नहीं, हमें तो इस हम्माम में सब एक जैसे ही नज़र आते हैं ।
जहाँ तक पृष्ठभूमि के प्रदर्शन का प्रश्न है तो काबिल लोग वह काम शब्दों से भी कर दिखाते हैं ।

आदाब ।
१९ फरवरी २०१४


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Feb 22, 2014

तोताराम के तर्क और ताऊ के आँसू


तोताराम ने आते ही सांसदों को भला-बुरा कहना शुरु कर दिया- करना-धरना तो कुछ है नहीं । बिना बात २१ फरवरी २०१४ को वर्तमान संसद के अंतिम सत्र के अंतिम दिन को बेकार कर दिया । अरे, ध्वनि-मत से ही सही, दस-पाँच बिल और पास कर-करा देते तो कहने को हो जाता कि सांसद कुछ काम करते हैं ।

जब अगली संसद में इन्हीं को या इनके ही परिवार वालों को आना है तो फिर भई, जाओ अपने-अपने क्षेत्रों में, पाँच वर्ष से तरस रही जनता को दर्शन दो, लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए अपनी दो नंबर की कमाई में से थोड़ा इन्वेस्ट करो अगली टर्म के लिए । बिना बात का विदाई समारोह बना दिया ।


हमने कहा- तोताराम, सुख या दुःख कैसा भी अवसर हो, मानव एक सांस्कृतिक प्राणी है इसलिए थोड़ी-बहुत औपचारिकता आवश्यक हो जाती है । बिछड़ तो रहे ही हैं, भले ही दो चार महीने के लिए ही सही । और फिर जीवन तो जीवन है । क्या पता, इस दौरान कोई अगली संसद में आने की बजाय ऊपर वाली संसद में ही नोमिनेट हो जाए । सो क्या हो गया जो विदाई समारोह जैसा कुछ हो गया तो । और फिर आडवाणी जी १९७१ मॉडल के एकमात्र सांसद बचे है सो उन्हें अगर किसी ने फादर ऑफ़ हाउस या अपना संरक्षक कह दिया तो क्या हो गया ?

तोताराम ने बात बदलते हुए कहा- अच्छा चल, इस बारे में और बात बाद में करेंगे । पहले तो तू एक किस्सा सुन- एक आदमी रोज दारू पिया करता था । एक बार ऐसा संयोग हुआ कि दो दिन दारू नहीं मिली । अब तो उसका चलना-फिरना मुहाल । तीसरे दिन तो खाट से ही नहीं उठा । लोगों ने समझा बीमार है । पाँच-चार दिन बाद लोग हाल-चाल पूछने के लिए आने लगे । वह आदमी तो संवाद कम करता, घर वाले ही अधिक बातें किया करते थे । लोग आते और तरह-तरह के इलाज़ बताते । कोई कहता-फलाँ काढ़ा पिलाओ, कोई किसी देवता विशेष की माला फेरने को कहता तो कोई किसी ठरकी बाबा का स्पेशल शक्ति वर्द्धक रसायन पिलाने की सलाह देता । एक दिन एक व्यक्ति ने दबी जुबान में कहा- अरे भई, थोड़ी ब्रांडी मिल जाए तो वह भी पिला कर देखो । लेकिन घर वालों ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया । थोड़ी देर बाद वह आदमी उठ बैठा और बोला- सालो, बिना बात की किचर-किचर कर रहे हो, कोई इस भले आदमी के बताए इलाज़ को सीरियसली क्यों नहीं लेता ।

सो ताऊ अडवाणी कौन अभी रिटायर हो रहा है जो ऐसे विदाई दे रहे हो । कोई उनके दिल की दबी-ढकी आवाज़ को क्यों नहीं सुन रहा है ? अब ऐसे में ताऊ रोएगा नहीं तो क्या करेगा ? ताऊ कोई अपने आप थोड़े ही रोया है । इन पाजियों ने रुलाया है । और ये आँसू ख़ुशी के नहीं, मनमोहन जी की तरह खून के आँसू हैं ।

हमने कहा- तो फिर तू ही बता कि इस दिन संसद में ताऊ के साथ क्या होना चाहिए था ?

बोला- काली मिर्च-प्रक्षेपण, चाकू-प्रदर्शन जैसे संसदीय कार्य तो बंद हो ही चुके थे और माहौल भी हल्का हो चुका था तो मज़ाक में ही सही एक बार ताऊ को मनमोहन सिंह जी कुर्सी पर ही बिठा कर फोटो खींच लेते ।
२२ फरवरी २०१४

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Feb 16, 2014

हैप्पी वेल हटाइन डे, छोरे



भई अरविंद केजरीवाल,
खुश रह । तू म्हारे सबसे छोटे छोरे की उम्र का सै और मज़े की बात या सै कि म्हारे दो छोरे भी उसी आई.आई.टी में पढ़े सें जिसमें तू । जै तू केंद्रीय विद्यालय में पढ्या होता तो हम तन्ने हिंदी पढाँवते । वैसे एक रिश्ता और सै- हरियाणा म्हारी ननिहाल है और तू हरियाणा का ।

खैर, हम तो तन्ने पहले भी कई बार पत्र लिखणै की सोच रे थे क्यूंकि हमनै फिकर थी के छोरा सीधा सै, टोपी और मफलर लगाके ढक-ढूम के सलीके से रहे सै । राजधानी की बीरबानियाँ (लडकियाँ-औरतें) कहीं फाँस न लें, छोरे को । कहीं कोई चक्कर ना पड़ज्या । राजधानियाँ की इन बीरबानियाँ के घर-घराणे और उम्र का कुछ ठिकाणा भी नहीं लगता । काळी-कलूटी पाँच रुपैये की क्रीम लगाके सात दिन में गोरी बणज्या । सर्जरी करवाके एक सौ तीस बरस बूडली पच्चीस की दीखण लागज्या । हाथां में कदे गुलाब का, कदे कमल का फूल लेके पासे आके धीरे-धीरे गले में हाथ डालती-डालती गला पकड़ ले । राजधानी तैं और दूर कामरूप चल्या जा तो सुण्या है उतै की बीरबानियाँ आदमी नै फँसा के मोम की माखी बणा दे । आदमी इसा घुघ्घू बण ज्या के उठावे तो उठे और बठावै तो बैठे । जम्माये जमूरा बणज्या सै आदमी । और जै कठे बिदेस मैं जाके फँस ज्या तो बेरा ना माणस का के बणै ?

धीरे धीरे यो वेलेंटाइन डे भी आग्या तो फिकर और बढगी । पण छोरे तन्ने जी खुश कर दिया । आई लव यू कहणै की बजाय वेल ही हटा दिया । नहीं तो या तन्नै वेल मैं ही पटक देती । तू तो पढ्या लिख्या सै । वेल के और भी कई मतबल हों सै- कूआ भी और पर्दा भी । सो यो तेरा वेलेंटाइन डे न होके 'वेल हटाइन डे' होग्या । ज़रूर तन्ने वा कहानी सुणी होगी ।

एक गाँव का छोरा था । सीधा-सादा, भैंस चरावणिया और दूध-दही खावणिया । उसकी शादी होगी एक शहर की छोरी सागे । मिलतां ई छोरी बोलण लागी शहरी बोली, करण लागी किन्तु, परन्तु और थोड़ी थोड़ी देर मैं या और पूछे- के समझ्या । छोरा होग्या परेशान । बोल्या- समझग्या भई, चोकस समझग्या - तू उरे रहणी कोन्या । सो भई यो इसी ढाल होणा था सो होग्या । के तो सीता सतवंती के फरड़क रांड । इसी वेलेंटाइनाँ जाणै कितणा नैं उल्लू बणाया सै । भतेरी ज़िन्दगी पड़ी सै, और भोत मिलैंगी ढंग की वेलेंटाइनां । तू तो बस तेरा धर्म ठिकाणै राख ।
तेरा ताऊ
-रमेश जोशी ।
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Sep 30, 2012

मनमोहन सिंह की आर्थिक नीति और देश की रामायण

आदरणीय मनमोहन जी,

आपने १९ दिसंबर २००७ को राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में अगली पंचवर्षीय योजना पर विचार-विमर्श के दौरान बताया था कि महँगाई की मार के लिए तैयार रहें । धन्यवाद । और अब आपने २७ सितम्बर २०१२ को कहा है कि सुधार एक सतत प्रक्रिया है और ये जारी रहेंगे । इसलिए आज फिर से आपको अपनी इस प्रतिबद्धता के लिए बधाई देने का मन हो रहा है । स्वीकार करें ।

इस प्रसंग में एक चुटकला सुनाएँ ? एक किरायेदार ने रात के दो बजे अपने मकान मालिक को जगा कर कहा कि मैं इस महिने का किराया नहीं दे पाऊँगा । मकान मालिक ने पूछा- यह बात तुम काल सवेरे भी कह सकते थे फिर इस समय आने की क्या जरूरत थी ? किरायेदार ने उत्तर दिया- मैं अकले ही इस चिंता में परेशान क्यों रहूँ । सो आपको बताने चला आया । 


तो उस किरायेदार की तरह से आपने भी अपनी चिंता हमारे सर डाल दी । पर याद रखिए हम परेशान होने वाले नहीं हैं । हमें तो पहले ही पता था कि इस या उस कारण से महँगाई बढ़ने वाली ही है । इसे किसी का बाप नहीं रोक सकता । बेकारी कभी कम हुई है ? हमें तो आश्चर्य इस बात का हो रहा है कि आप परेशान और चिंतित हैं । यहाँ तो एक छोटा सा एम.एल.ए. तक चिंतित नहीं है । एक बार सरपंच का चुनाव जीतने के बाद आदमी ज़िंदगी भर जीप में घूमता है । चार चमचे साथ, हाथ में मोबाइल, झकाझक कुर्ता-पायजामा, दिन भर सिगरेट और चाय फिर शाम को दारू । आप तो प्रधान मंत्री हैं । कोई बुरी आदत भी नहीं है । खाना भी कम ही खाते है और गेंहूँ तो और भी कम भी । ज्यूस, फल, मेवे ही खाते होंगे । मोरारजी की गाय तो वह गिज़ा खाती थी कि कल्पना करना तक हमारे बस का नहीं है । और फिर आपको तो अच्छी पेंशन मिलती है । यदि अगली बार प्रधानमंत्री या सांसद भी नहीं रहे तो भी भूतपूर्व की हैसियत से अच्छी-खासी पेंशन मिलेगी । एक-दो पेंशन पहले से भी मिल रही होगी । हमें तो चालीस साल की मास्टरी के बाद कुल छः हजार रुपए पेंशन मिलती है । हम तो उसी में मस्त हैं ।

वैसे महँगाई और बेकारी की चिंता आपने खामखाँ ही की । रोजगार देना न तो सरकार की जिम्मेदारी है और न ही कभी होने वाली । जिसने चोंच दी है, चुग्गा देना उसी की जिम्मदारी है । लोग अपनी फाड़े-सिएँगे । आप तो विकास में लगे रहिए । आजकल तो यहाँ के कारखानों में ही तालाबंदी कोई बड़ी बात नहीं है फिर विदेशी कंपनियों पर तो हमारे नियम लागू भी नहीं होते । इन्हें क्यों हमारा दुःख सताने लगा ? इन्हें न शर्म है, न दया, न जिम्मेदारी । और फिर यहाँ की जनता हर हाल में मस्त है । कितनी ही महँगाई बढ़े पर गुटका, शराब, बीड़ी, सिगरेट, चाय सब चलते रहेंगे । समारोह, शादी, त्योहार, पटाखे, मेले बदस्तूर जारी रहेंगे ।

वैसे यदि बेकारी और महँगाई के कारणों का विश्लेषण करना चाहें तो सुन लीजिए । आप विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं । हमने भी आज से पैंतालीस बरस पहले बी.ए. में अर्थशास्त्र पढ़ा था । उसमें माल्थस की एक थ्योरी आती है जिसमें वे कहते है कि एक आदमी अगर एक मुँह लाता है तो दो हाथ भी लाता है । बढती जनसंख्या से डरने की जरूरत नहीं है । यह बात उसने योरप के लिए कही थी जहाँ जनसँख्या वृद्धि लगभग स्थिर सी है पर हमने मूर्खों की तरह से उसे अक्षरशः मान लिया और मूर्खों की तरह से पैंतीस करोड़ से एक सौ बीस करोड़ हो गए । और सरकार है कि उसके लिए कोई कठोर कदम उठाने से घबराती है । कौन बिना बात अपनी कुर्सी खतरे में डाले ? अपनी कौनसी जिम्मेदारी है ? जो पैदा करेगा, सो भुगतेगा ।

उलटे वोट बैंक बनाने के चक्कर में सरकारें वृद्धावस्था पेंशन, बेरोजगारी भत्ता, सस्ता अनाज, मुफ्त बिजली, धोती, टेलीविजन बाँटने जैसे हरामखोरी बढ़ाने वाले नुस्खे अपनाती हैं । कांग्रेस ने तो गुजरात में वोट के बदले तेल, दालें, अनाज और केरोसिन का वादा भी किया है । इसके स्थान पर कोई भी नेता इन लोगों को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाने की नहीं सोचता । ठीक भी है, काम की बजाय खैरात बाँटने में घपले की गुंजाइश ज्यादा निकल सकती है । आत्मनिर्भर होने पर क्या पता कोई वोट दे या न दे । दे तो सोच समझकर दे । दोनों ही स्थितियों में भ्रष्ट राजनीति को खतरा नज़र आता है ।

पहले तो मंदी का अर्थ हम यह समझते थे कि सब चीजें सस्ती हो जाएँगी पर अब पता चला कि मंदी का मतलब है- आदमी सस्ता हो जाएगा । उसे टके कोस दौड़ाया जा सकेगा । डबल मार- महँगाई और बेकारी । आपको इस स्थिति के लिए आश्चर्य हो रहा होगा पर हमें कोई शंका नहीं थी । जब यह नई आर्थिक नीति शुरु हुई थी तभी हमारा माथा ठनका था । निवेशकों को आपमें कोई खुशबू थोड़े ही आती है जो नोट लुटाएगा । उसने तो चार के चालीस बनाने के लिए धंधा किया है । अब तक तो जितना लगाया था उससे चालीस गुना कमाकर ले गए । अब तामझाम समेट भी लें तो क्या फर्क पड़ता है ? आपको इनमें कोई परोपकारी संत नज़र आया होगा । हम तो जानते हैं कि हमेशा ही उपनिवेश से पहले निवेशक आते हैं । इतिहास तो यही है । आपने, चिदंबरम जी ने, और स्वर्गीय नरसिंह राव जी ने पढ़ा या नहीं, पता नहीं ।

आप हमेशा कहते हैं कि इस मुक्त बाजार वाली आर्थिक नीति से पीछे नहीं हटा जा सकता । पता नहीं किस का क्या लेकर खा रखा है ? दृढ निश्चय हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है । क्या अंग्रेजों का जाना आसान नज़र आता था ? पर उन्हें जाना पड़ा । यह बात और है कि उनके जाने के बाद जो आए वे उनके भी बाप निकले देश को लूटने के मामले में । और अब भी नेता उन्हीं के एजेंटों के रूप में काम कर रहे हैं । कई नेता तो विदेशी कंपनियों के 'पे-रोल' पर हैं ।

कोई बात नहीं भाई साहब, आप तो रामायण-पाठ चालू रखिए । हमने तो सदा से पीठ खोल कर रखी है डंडे खाने के लिए । फिर चाहे मारने वाले आप हैं या अंग्रेज थे - क्या फर्क पड़ता है ? लोहे का स्वाद तो घोड़े को पता होता है, सवार क्या जाने ? 


खैर, 'रामायण-पाठ' वाली बात स्पष्ट करके कथा समाप्त करें । एक चरवाहा था । उसकी बकरी बीमार पड़ी । वह पंडित जी के पास गया । पंडित जी ने कहा- रामायण का पाठ किया कर । चमत्कार ! इधर रामायण शुरु और उधर एक बकरी मर गई । बेचारा चरवाहा फिर पंडित जी से पास गया । पंडित ने कहा- चिंता मत कर, भगवान पर भरोसा करके रामायण चालू रख । रामायण चलती रही और बकरियाँ मरती रहीं । अंत में सारा रेवड़ निबट गया । एक मेमना बचा । अब चरवाहे के पास कोई काम नहीं । सो घुटनों में सर दिए बैठा था कि मेमना उसके पास चला आया । मेमना तो चंचल होता ही है । लगा उसका मुँह चाटने । चरवाहे को गुस्सा आ गया । कहने लगा- साले, क्यों मरने के काम करता है ? 'रामायण' ने तो बड़े-बड़ों को निबटा दिया । तू तो एक चौपाई का भी नहीं है । 

सो आप तो आर्थिक सुधारों का 'रामायण-पाठ' चालू रखिए । रेवड़ का तो राम रखवाला है ।

२८ सितम्बर २०१२

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Sep 13, 2012

ड्रिंक और डेमोक्रेसी उर्फ़ बराक ओबामा की बीयर

ओबामा जी,
थ्री चीयर्स । आशा है चुनाव अभियान अच्छी तरह से चल रहा होगा । दिन, चुनावी वादों से लोगों को बहलाने में और शाम, बीयर पीने-पिलाने में गुजर रहे होंगे । हमें विश्वास है कि आप निश्चय ही चुनाव जीतेंगे । जब से क्लिंटन जी ने दो-दो टर्म कुर्सी पकड़े रखने का चलन शुरू किया है तब से कोई भी दो टर्म से पहले पीछा नहीं छोड़ रहा है । आपके दो टर्म के बाद फिर रिपब्लिकन आने ही हैं जैसे तमिलनाडु की जनता जयललिता और करुणानिधि के बीच पेंडुलम की तरह झूल रही है वैसे ही अमरीकी जनता डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन की बीच धक्के खा रही है । बारी-बारी से नागनाथ जी और साँपनाथ जी में से ही किसी एक को आना है । हम तो आपके जन्म (१९६१) से पहले ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव कराते रहे हैं । २००२ में रिटायर होने के बाद इस लोकतान्त्रिक कर्म से पीछा छूटा है ।

हम अपने इसी अनुभव के आधार पर कह सकते हैं कि यह चुनाव आप ही जीतेंगे । इसीलिए हमने आपको शुरु में ही थ्री चीयर्स कह दिया । यह आपकी विजय के लिए भी है और आपकी बीयर के लिए भी जिसके बारे में अभी २ सितम्बर २०१२ को समाचार आया है कि आप व्हाईट हाउस में अपनी कोई निजी नुस्खे वाली बीयर बनाते हैं और पीते हैं (वीडियो)। जिस तरह से आपने बीयर को राष्ट्रीय सम्मान दिया है वह अनोखा, अद्भुत और अभूतपूर्व है । वैसे यह ओपन सीक्रेट है कि ड्रिंक और डेमोक्रेसी का हमेशा से घनिष्ट संबंध रहा है । हमारे यहाँ तो उम्मीदवार चुनाव के लिए फार्म भरने बाद में जाता है और दारू का भण्डारण पहले करता है । सभी दारू का खुला प्रयोग करते हैं । सभी मतदाता जिससे भी मिले दारू लेते हैं और उसी मधुमती भूमिका में वोट डाल आते हैं । अब नशे की स्थिति में कौन सा बटन दबा, किसे पता ? जो जीत जाता है- सब यही कहते हैं कि हमने उसे ही वोट दिया था । मगर जीतने वाला जानता है कि जीती दारू है । हमारे एक मित्र, जिन्हें हम पूनम पांडे की तरह पूरी पारदर्शिता से जानते थे, की एक बार एक साथ कई अखबारों और पत्रिकाओं में कई गज़लें छपीं तो हमने कहा- बंधु, आजकल तो बहुत छप रहे हो तो वे सकुचाकर बड़ी ईमानदारी से बोले- भाई साहब, आप तो जानते हो । मैं क्या, बोतल छप रही है ।

सो हम तो कहते हैं कि आप पिछली बार भी दारू के बल पर ही जीते थे और इस बार भी दारू के बल पर ही जीतेंगे । आप कहेंगे कि आपने पिछले चुनावों में तो दारू की कोई बात नहीं की थी । लेकिन याद कीजिए आपने कहा था- वी कैन । आपके चुनावी नारे वाले 'कैन' का क्या मतलब होता है पता नहीं, लेकिन बीयर का 'कैन' सभी समझते हैं और उसी की आशा में लोगों ने आपको वोट दे दिया । अब आपने अपने किसी आदमी से सूचना के अधिकार के तहत एक अप्लीकेशन लगवा कर, ईमानदारी का नाटक करते हुए अपना बीयर वाला नुस्खा जग-जाहिर कर दिया । वैसे यदि आपमें जन-कल्याण का इतना ही ज़ज्बा होता तो व्हाईट हाउस में चुपचाप दारू बनवा कर मज़े से पीते रहने की बजाय अंदर बीयर का एक बड़ा सा ओवर-हैड टेंक बनवा देते और उसका एक कनेक्शन बाहर लगवा देते । जिसका मन हो नल खोले और मस्त हो जाए । यदि आप ऐसा करते तो यह नौबत ही नहीं आती । लोग वैसे ही आपको आजीवन राष्ट्रपति बना देते । वैसे इसमें जनता का जाता भी क्या । होना तो वही है जो इस देश की विभिन्न लॉबियाँ जैसे गन लॉबी, पेट्रोल लॉबी, कार लॉबी, कोल्ड ड्रिंक लॉबी, पिज्जा लॉबी आदि चाहेंगी ।
अमरीका की राजनीति में ऐसा कहा जाता है कि जनता उसी को वोट देती है जिसके साथ उसे बीयर पी सकने की उम्मीद होती है । आप जनता के इस विश्वास पर खरे उतरेंगे । बुश साहब ने तो सुनते हैं कि आखिरी वक्त में तौबा कर ली थी और इन रोमनी महाशय के बारे में तो लोग जानते ही हैं कि ये पीते नहीं ।

सोचिए बिना दारू के क्या जीवन ? कहाँ से हिम्मत आए और कहाँ से ताज़गी और कहाँ से दिन भर भौंकने और धक्के खाने की शक्ति । हमारे इलाके से तो एक सज्जन चुनाव में खड़े हुआ करते थे । उनके हर चुनाव कार्यालय में दारू का अटूट भंडार रहता था । कोई भी आए, कितनी भी पिए, पूरी छूट । वे खुद भी हर चुनाव सभा की समाप्ति पर अगली सभा के लिए जाते समय कार में बैठकर पीते हुए जाते थे । और इस तरह से हर सभा में वैसे ही तरोताज़ा और मस्त । कभी चुनाव नहीं हारे । सो आप तो दारू की सप्लाई बनाए रखिए ।

हमारे बच्चन जी ने ऐसे ही नहीं कहा है- ‘मंदिर मस्जिद बैर कराते, प्यार कराती मधुशाला’ । न पीने वाले के मन में भले ही खोट आ जाए लेकिन हम-पियाला लोगों को देखिए कैसे खुद से पहले, साथ वाले को बढ़-चढ़कर खिलाने-पिलाने की हसरत रहती है । कहने को तो कोई यह भी कह सकता है कि राष्ट्रपति होकर घर में दारू बनाते हैं । तो इसमें क्या है हमारे यहाँ भी ठाकुर लोग अपने घरों में दारू बनाया करते थे । कुछ वर्षों पहले राजस्थान में उन्हें 'रजवाड़ी दारू' के नाम से लाइसेंस दिया गया था । अमरीका में भी राष्ट्रपति को अपने नुस्खे और अपने नाम की दारू बनाने और बेचने का अधिकार होना चाहिए । वैसे तो इस साली कुर्सी में ही इतना नशा है कि आदमी को होश नहीं आता लेकिन जनता के पास तो पाँव के नीचे ज़मीन ही नहीं । ऐसे में उसमें क्या नशा ? उसके तो होश तक हिरण हो रहे हैं । इसलिए उसे तो वास्तविक दारू चाहिए गम गलत करने के लिए । सत्ताओं के भरोसे किसके गम दूर हुए हैं ?

इसलिए आप भी सभी नेताओं की तरह केवल उजले सपनों की ही नहीं बल्कि व्हाईट हाउस की बोतल वाली रजवाड़ी बीयर पिलाते रहिए और चुनाव जीतकर लोकतंत्र को सुरक्षित रखते रहिए । वैसे लोकतंत्र हमेशा सुरक्षित रहता है- कभी डेमोक्रेट का तो कभी रिपब्लिकन का । कुल मिलाकर लोकतंत्र को कभी कोई खतरा नहीं । हो सके तो हमारे जैसे आपके शुभेच्छु को व्हाईट हाउस में खींची बीयर का एक क्रेट भिजवा दें तो यहीं घर बैठे ही आपकी जीत को अभी एडवांस में ही सेलेब्रेट कर लें वरना जीत के बाद कौन किसे याद रखता है ?

वैसे भी न तो आपको तीसरी बार चुनाव में खड़े होना और न हम रिजल्ट वाले दिन यहाँ रहने वाले क्योंकि हमारा वापसी का टिकट नवंबर में है ।

2012-09-11
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Sep 11, 2012

साइलेंस इज गोल्डन

मनमोहन जी,
आपके चुप रहने पर भारत के विरोधी दल विशेष रूप से भाजपा और उसके सहयोगी दल हल्ला मचा रहे हैं और अब तो आपकी अमरीकी अखबारों में होने वाली निंदा का सन्दर्भ भी देने लगे हैं । आजकल हम अमरीका में हैं लेकिन हमने तो कहीं भी आपकी कोई निंदा नहीं सुनी । अरे, यहाँ जब लोगों को अपने बीवी-बच्चों से बात करने की फुर्सत नहीं है तो किसके पास फुर्सत है किसी की निंदा करने की । जिनके पास कोई काम नहीं, वे ही समय बिताने के लिए ऐसी अन्त्याक्षरी कर रहे हैं । जब खुद सत्ता में आ जाएँगे तो अभिनन्दनों और विदेश यात्राओं से ही फुर्सत नहीं मिलेगी । 

यहाँ तो आपकी बात तो दूर, हमने सोनिया जी के आने-जाने की ही कोई खबर नहीं पढ़ी । वैसे भी आजकल यहीं क्या, भारत तक में अखबार और किताबें पढ़ना बंद हो चुका है फिर किसी एक दिन के कोई एक अखबार में कोई कुछ लिख देता है तो क्या फर्क पड़ता है । अब तक तो उस दिन का अखबार कूड़ा उठाने वाला ट्रक लेकर कहाँ लैंड फिलिंग में डाल चुका होगा । और फिर समझदार लोग जानते हैं कि अमरीका में आपकी आलोचना इसलिए हो रही कि आपने हवाई जहाजों का ठेका उसे देने की बजाय फ़्रांस को दे दिया । अब यह तो नहीं हो सकता कि आप सारे ठेके अमरीका को ही दे दो । और भी देश हैं । राजनीति में बेलेंस बनाकर रखना ही पड़ता हैं ।

आप अपनी आलोचना करने वालों को आपके बारे में बुश साहब और ओबामा जी द्वारा दिए गए वक्तव्य दिखा सकते हैं लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं क्योंकि जिसे आलोचना करनी है वह तो करेगा ही । आपने तो बाप-बेटे की वह कहानी पढ़ी ही होगी जिसमें वे अपने गधे के साथ बाजार जा रहे हैं । बेटा गधे पर बैठा था और बाप पैदल । उन्हें देखकर बुजुर्गों ने कहा कैसा ज़माना आ गया है कि बाप पैदल चल रहा है और बेटा गधे पर बैठा है । बेटे ने बाप को गधे पर बैठा दिया और खुद पैदल चलने लगा । आगे कुछ औरतें मिलीं और कहने लगीं- देखो, बुड्ढे को शर्म नहीं आती । खुद तो ठाठ से गधे पर बैठा है यह मासूम बच्चा पैदल चल रहा है । तो पिता-पुत्र दोनों गधे पर बैठ गए । तो लोगों ने कहा- अरे ठीक है, अपना जानवर है पर क्या बेचारे जानवर को मार ही देंगे, देखो दो-दो लदे हुए हैं । कुढ़कर दोनों पैदल चलने लगे तो लोगों ने कहना शुरु कर दिया- कैसे बेवकूफ हैं जो जानवर होते हुए भी पैदल चल रहे हैं । 


सो हमारे अनुसार आप उन आप्त वाक्यों की तरह ठीक कर रहे है- 'जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले' या 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना' । मीना कुमारी की भी एक बहुत हिट फिल्म है- मैं चुप रहूँगी । और फिर भारतीय कहावतों में ही नहीं, अंग्रेजी में भी कहा गया है- स्पीच इज सिल्वर, साइलेंस इज गोल्डन । सो ऐसे ही थोड़े कहा है ? दुनिया की सारी अर्थव्यवस्था ही सोने के आधार पर चलती है । और अगर सोने का दूसरा अर्थ लिया जाए तो अधिक सोने वाला दीर्घायु होता है जैसे कि अपने खोल में छुपा कछुआ । सोने से ताज़गी आती है, स्लीपिंग ब्यूटी सबसे सुन्दर मानी जाती है । जब डाक्टरों को कुछ समझ में नहीं आता तो वे मरीज को सोने की दवा दे देते हैं ।

आप तो नरसिंह राव जी की पसंद है और उन्हीं के आग्रह पर ही इस पिछड़े देश को अपने आर्थिक सुधारों द्वारा विश्व-पटल पर स्थापित करने के लिए मंत्रीमंडल में शामिल हुए । हमने 'राजनीति में आए' नहीं कहा क्योंकि राजनीति में तो आप न तब थे और न अब । हमें आपके दक्षिण दिल्ली से विजय कुमार मल्होत्रा के सामने लड़े गए आपके लोकसभा-चुनाव की याद है । जब 'नर सिंह' होकर भी राव साहब कभी नहीं दहाड़े तो आप ही को क्या पड़ी है । जैसे उन्होंने मौन के बल पर पाँच साल शांति से निकाल दिए तो आपके भी पन्द्रह बरस निकल जाएँगे । यदि आप भी इन्हीं लोगों की तरह झखते रहते तो उलझे रहते मगर यह मौन का ही प्रताप है कि लोग कोमनवेल्थ गेम्स, टू जी भूल चुके हैं सो कुछ दिन में यह 'कोयला' भी भूल जाएँगे ।

हमारे एक मित्र थे । वे मास्टरी के अलावा एक्स्ट्रा इनकम के लिए डाक्टरी में हाथ आजमा लिया करते थे । एक बार एक रोगी को बुखार था सो उन्होंने इंजेक्शन लगा दिया और दुर्भाग्य से वह इंजेक्शन पक गया । मरीज कहने लगा- मास्टर जी, बुखार की तो देखी जाएगी आप तो मेरा यह जो इंजेक्शन पक गया है इसे ठीक कर दो । सो आप निश्चिन्त रहिए । इसी सिद्धांत के आधार पर सब ठीक हो जाएगा ।

और फिर यह भी है कि अधिक बोलने वाले की कोई सुनता भी नहीं । जो कम बोलता है उसका एक-एक शब्द लोग ध्यान से सुनते है, तरसते है जैसे कि अटल जी के बोलते-बोलते बीच में आने वाले ब्रेक के दौरान लोग अगले शब्द की कितना उत्सुक होकर प्रतीक्षा करते थे ? जैसे कि 'पाकीज़ा' में 'पायल निगोड़ी' में । सुषमा स्वराज के लंबे और ओजस्वी भाषण पर कैसे आपका वह शे'र 'माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं' भारी पड़ा था । ऐसे ही जब कोई चंदा या भीख माँगने आता है तो जो लोग उसको समझाने लगते हैं वे उलझ जाते है और जो उनकी किसी बात का उत्तर नहीं देते उनका पीछा जल्दी छूट जाता है । कालीदास की विद्वान बनने से पहले की कहानी तो सब जानते ही हैं कि वे मौन रहे और विद्यावती से जलने वाले विद्वानों ने ही कालीदास के संकेतों का अर्थ लगाकर कैसे विद्यावती को हरा दिया और कालीदास को जिता दिया । सो आप भी दिग्विजय सिंह जैसे मनीषियों की व्याख्या-क्षमता पर विश्वास कीजिए और चुप रहिए । वैसे हमें विश्वास है कि आप हमारी सलाह के बिना भी इस व्रत और समाधि को भंग नहीं करते । हम तो कहते है कि आप तो गाँधी जी के तीन बंदरों की तरह बोलना ही क्या, सुनना और देखना भी बंद कर दीजिए । और हमारा तो मानना है कि व्यक्ति सच्चे मौन में तभी तक रह सकता है जब तक वह सुनना और देखना बंद रखता है ।

एक कहानी है । एक राजा के सिर में सींग थे लेकिन किसी को पता नहीं था । एक बार एक नाई ने उनकी हजामत बनाते हुए उन सींगों को देख लिया । उस गरीब का तो यह देखकर पेट ही फूल गया । किसी को बताए तो राजा का डर और न बताए तो पेट दर्द । अंत में सुनसान स्थान पर जाकर एक पेड़ से लिपटकर उसे अपनी बात कह दी । अब संयोग देखिए कि उस पेड़ की लकड़ी से एक कारीगर ने एक सारंगी बनाई । जब उसे बजाया जाता तो उसमें से आवाज़ निकलती- राजा के सिर में सींग । सो कहीं भी, कभी भी, कुछ भी बोला हुआ पता नहीं कब दुःख दे जाए इसलिए सबसे भली चुप ।

आप तो जानते हैं कि साधना और भक्ति में बाधा डालने के लिए इंद्र तरह-तरह के भूत-प्रेत, शैतान और अप्सराएँ भेजता है लेकिन सच्चे साधक निर्विकार भाव से साधना में लीन रहते हैं । वाचाल लोग मौन का महत्त्व क्या जानें ? जब बाहर के शोर से विरत होकर साधक स्वयं में स्थापित होता है तो 'अनहद' नाद सुनता है । तब सहस्रार से अमृत झरता है । जैसे योगासनों में सबसे कठिन है शवासन वैसे की सबसे बड़ी साधना है- मौन व्रत । गाँधी जी का भी अनशन के बाद दूसरा सबसे बड़ा हथियार मौन ही था ।

गाँधी को कुछ आलोचकों ने 'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी' कह-कह कर उन्हें एक 'प्रतीक' बना दिया । किसी का जीते जी प्रतीक बन जाना सबसे बड़ी उपलब्धि है । भले ही आपका पूनम पांडे के साथ कोई संबंध नहीं है लेकिन मान लीजिए कि जब कोई ‘चिकनी चमेली’ या ‘शीला की जवानी’ या ‘बीड़ी जलाइले’ जैसा महान गीतकर यह लिखे-
मैं पूनम पांडे हो गई रे
पप्पू तेरे कारण ।
तो पूनम पांडे का अर्थ बताने की जरूरत नहीं रह जाती । वह एक क्रिया का पर्याय बन गई है । यही जीते जी प्रतीक या मिथक बनना है । आप भी उस ऊँचाई तक पहुँच गए है सो हमारे हिसाब से तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जो महात्मा गाँधी के बाद केवल आपको ही हासिल हुई है ।

मुबारक हो ।

2012-09-08

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Jul 26, 2012

नाम और काम

नाम और काम

(अखिलेश यादव ने यू.पी.मे मायावती द्वारा बदले गए जिलों के नाम फिर से बदल दिए हैं -२१ जुलाई २०१२ )

जिले, सड़क और चौक के रहे बदलते नाम |
केवल नाटक ही किया, किया न कोई काम |
किया न कोई काम, नाम कैसे पाओगे |
जैसे आए थे वैसे ही चले जाओगे |
कह जोशी कविराय करो जनता की सेवा |
वरना नहीं मिलेगा कोई पानी देवा |

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Jul 23, 2012

माँगे का कम्बल

प्राहजी मनमोहन जी,
सतश्री अकाल । यह क्या हुआ हाल ? हमारे भारत छोड़ते ही लोग खींचने लगे खाल । चलो, अपनों की तो उन्नीस-बीस बर्दाश्त भी की जा सकती है पर अब तो जिसके जो मन में आया बक रहा है ।

बाल ठाकरे जी तो अभी तक 'बाल' हैं इसलिए वे चाहे जिस को कुछ भी कहने का बचपना कर सकते हैं । जब किसी की पत्नी मैके चली जाती है तो साठ साल के बूढ़े ठूँठ में भी दो दिन बाद कल्ले फूटने लग जाते हैं । फिर वे तो विधुर हैं इसलिए पौरुष की बातें कर सकते हैं पर यह क्या कि पाँच-सात दिन पहले आपको 'राजनीतक रूप से नपुंसक' कह दिया ? अब लोग नपुंसकता के प्रकार को तो याद नहीं रखेंगे बस उन्हें तो 'नपुंसक' ही याद रहेगा । आदमी अपनी मर्ज़ी से ब्रह्मचर्य धारण कर ले तो संत या ब्रह्मचारी जी के नाम से आदरणीय हो जाता है । स्त्री अपनी मर्जी से अपने फिगर के लिए बच्चे पैदा न करे तो यह बात और है वरना पुरुष के लिए नपुंसक और स्त्री के बाँझ सबसे बड़ी गाली है ।

हमारे एक मित्र है जो कल तक चौहत्तर वर्ष की उम्र में भी जवानों जैसी डींगें मारते थे । गत वर्ष उनकी पौरुष ग्रंथि में कुछ समस्या पैदा हो गई तो डाक्टरों के उस ग्रंथि को निकाल ही दिया । हमारे मित्र कहते हैं कि इससे उनके पौरुष पर कोई असर नहीं पड़ा पर लोगों को विश्वास हो तब ना ? लोग अब उन्हें नपुंसक मानने लगे हैं । कुछ लोग किसी ग्रंथि के कारण कुंठित होते हैं और हमारे मित्र हैं कि ग्रंथि से मुक्त होकर कुंठित रहने लग गए हैं । और फिर आपकी तो इस ग्रंथि के ऑपरेशन का समाचार सारी दुनिया में फ़ैल चुका है ।

हमें आपकी सच्चरित्रता पर पूरा विश्वास है । आप हमेशा से इतने ही सज्जन हैं । एक बुजुर्ग कह रहे थे कि हम जवानी में जितने ताकतवर थे आज भी उतने ही ताकतवर हैं । हमारी जवानी पर उम्र ने कोई असर नहीं डाला । लोगों ने आश्चर्यचकित होकर पूछा तो कहने लगे- वो पत्थर देख रहे हैं ना, वह हमसे न तब उठता था और न अब उठता है ।

जब आप १९९१ में पहली बार योरप और अमरीका की पसंद के रूप में उनकी सिफारिश पर वित्त मंत्री बनाए गए थे तब आपने इस देश की गुलाम अर्थव्यवस्था को पहली बार मुक्त किया और देश की सारी श्रम-शक्ति को बँधुआ बना दिया । परिणाम यह हुआ कि मजदूर को पीलिया हो गया और और शेयर बाजार एक छिनाल औरत या बेलगाम मुँहजोर घोड़ी की तरह अनियंत्रित हो गया । लोग कहने लगे कि अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है जब कि अब पता लग रहा है कि यह विकास किसी नाजायज़ गर्भवती औरत के निखार की तरह था । इसी रास्ते पर चल कर खुद योरप और अमरीका की हालत खराब हो रही है तो आप कौनसे ऊपर से उतर कर आए हैं ?

पर हमें तो इस बात से सबसे अधिक दुःख हो रहा है कि कल तक जो योरप और अमरीका आपको अवतारी और चमत्कारी पुरुष बताया करते थे वे ही आज कल आपकी पगड़ी उछालने लगे हैं । कल तक ओबामा जी कहा करते थे कि उन्हें आपसे मिलने का इंतज़ार रहता है या जब मनमोहन जी बोलते हैं तो सारी दुनिया सुनती है । आपको उनके यहाँ की संस्थाओं ने कई अवार्ड दे दिए और अब टाइम मैगजीन वाले आपको अंडर अचीवर अर्थात् फिसड्डी बता रहे है । आप कहेंगे कि यह तो उस मैगजीन की अपनी राय है । इसमें ओबामा जी क्या कर सकते हैं ? यदि अमरीका की सरकार और वहाँ के मीडिया की राय अलग-अलग होती तो ९/११ के मामले में कोई तो अमरीका के खिलाफ बोलता लेकिन कोई नहीं बोला । इसका मतलब है कि आज जब टाइम वाला आपको फिसड्डी कह रहा है तो कहीं न कहीं ओबामा जी की भी यही राय है । वरना आपके चमत्कार का हाल तो तब भी यही था जब आपने ५०० अरब का परमाणु समझौता अमरीका से किया था । आप अब विमानों वाला ठेका फ़्रांस से लेकर अमरीका को दे दीजिए फिर देखिए कि आप किस तरह फिर अमरीका और उसके मीडिया के लिए चमत्कारी और अवतारी पुरुष बन जाते हैं ? मतलब कि जब तक आप उन्हें देश का पैसा लुटाते रहेंगे तब तक वे आपकी प्रशंसा करते रहेंगे । जब ओबामा जी दिवाली पर भारत आए थे तभी दुनिया के चार अन्य महारथी ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस, चीन के नेता भी आए थे परमाणु और हथियारों का सौदा करने । यह कोई कुंती द्वारा निकाला गया द्रौपदी की समस्या का हल तो है नहीं । इसमें तो पैसा खर्च करना पड़ता है जो कि पहले से ही अपनी औकात से बाहर है फिर पाँच-पाँच को संतुष्ट करना कैसे संभव है ? तो ठेका न मिलने वाले दो-तीन जनों को तो नाराज़ होना ही था सो ब्रिटेन ने भी ठेका न मिलने पर आपको सोनिया जी का गुड्डा कह दिया । हमारी अपनी लोकंतान्त्रिक व्यवस्था की बात और है । उसमें तो गुड्डा और फिसड्डी ही क्या, गाली-गलौच तक सब कुछ चलता है । सबको ऐसे वक्तव्यों से अपनी-अपनी राजनीतिक हँडिया के नीचे आँच देनी होती है । मगर हम तो कहते हैं कि ये अमरीका और ब्रिटेन वाले कौन होते हैं ?

वैसे हमें तो ये सब दुष्ट ही नहीं अज्ञानी भी लगते हैं । ये नहीं जानते कि हर जीव नियति के हाथ की कठपुतली या गुड्डा है । और यह नियति किसी के लिए किस रूप में आती है और किसी के लिए किस रूप में । जब सब ही किसी न किसी के गुड्डे हैं तो किसी के भी गुड्डे होने से क्या फर्क पड़ता है ? आपके नेतृत्त्व में जो अर्थव्यवस्था की गिलहरी इतना उछल रही थी, अब भारत की जनता की हालत दुनिया की निगाह में भी, धोने के बाद निचोड़ कर सुखाई गई बिल्ली की तरह से हो गई है । खैर, कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना । आप तो एक किस्सा सुनिए ।

एक ठाकुर साहब थे । जब से राज गया है हालत खस्ता है । बस नाम के ही ठाकुर रह गए हैं । अंदर से हालत यह है कि दो जून की रोटी भी भारी हो रही है । बस, मूँछों पर ताव देकर काम चला रहे हैं । सो एक बार ठाकुर साहब को एक शादी में अपनी ससुराल जाना था । सर्दी के दिन थे और ठाकुर साहब के पास एक कम्बल तक नहीं । सर्दी तो किसी तरह मुट्ठी काँख में दबाकर झेल जाएँ पर दिखाने के लिए, कैसा भी हो एक कंबल तो चाहिए ही । कम्बल उनके एक नाई मित्र के पास था जो शादी में साथ ले चलेने की शर्त पर कम्बल देने को तैयार हुआ । पुराना समय और गाँव का इलाका सो लोग आने-जाने वालों से बिना बात सी.बी.आई. की तरह पूछताछ करने लग जाते थे । सो ठाकुर साहब से भी लोग कुछ पूछते तो ज़वाब नाई देता । और ज़वाब भी क्या ? बड़े विस्तार से बताता- जी, हम फलाँ गाँव से आ रहे हैं और फलाँ गाँव, फलाँ के यहाँ बरात में जा रहे हैं । ये ठाकुर साहब फलाँ-फलाँ हैं और मैं इनका नाई फलाँ-फलाँ हूँ और इन्होंने अपने कंधे पर जो कम्बल रखा है वह मेरा है ।

जब भी जो भी पूछता, नाई यही ज़वाब देता । अब आप सोच लीजिए कि ठाकुर साहब की ठकुराई और रुतबे का क्या कचरा हुआ होगा ? सो भाई जान, माँगे के कम्बल से इज्ज़त में ऐसे ही इज़ाफा होता है ।

2012-07-17


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Apr 15, 2012

राजा भैया का वर्क एक्सपीरिएंस

राजा भैया उर्फ़ रघुराज प्रताप सिंह,

उम्र में आप से दुगुने बड़े होने के कारण आशीर्वाद दे रहे हैं । वैसे हमारे आशीर्वाद के बिना भी आप खुश ही हैं । जब मायावती ने आपको जेल में डाला था तो आपके बारे में कई समाचार पढ़ने में आते थे कि आपने एक शेर भी पाल रखा है और जिस को भी मृत्यु दंड देना होता है तो उसे शेर के पिंजरे में डाल देते हैं । शेर ही शेरों को पाल सकता है । हम तो एक बार चिड़ियाघर में गए थे । जैसे ही शेर के पिंजरे के पास गए तो पता नहीं वह क्यों दहाड़ा ? हम तो उसकी दहाड़ सुन कर ही बेहोश हो गए । अब जब भी कभी जाते है तो चिडियाँ ही देख कर आ जाते हैं ।

बी.एड. में हमें पढ़ाया जाता था कि जो बच्चा कक्षा में सबसे ज्यादा शरारत करता है उसे मोनीटर बना देना चाहिए । वह इस जिम्मेदारी के कारण शरारत करना भूल जाएगा । पता नहीं, मुलायम जी ने आपको इसीलिए तो जेल मंत्री नहीं बनाया ? वैसे राजा की विशेषता इसी से पता चलता है कि वह कैसे मंत्री चुनता है । अकबर पढ़ा लिखा नहीं था लेकिन उसने जो नवरत्न चुने वही उसकी बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण है । भले ही आप मुलायम जी की पार्टी में नहीं हैं लेकिन उन्होंने आपकी योग्यता को पहचान कर आपको पहले भी मंत्री बनाया था । योग्य व्यक्ति कहीं भी मिले उसकी योग्यता का लोकसेवा में उपयोग होना ही चाहिए । कवि ने भी कहा है-

उत्तम विद्या लीजिए, जदपि नीच पे होय ।
पर्यो अपावन ठौर में, कंचन तजे न कोय । ।


रूस में रक्षा मंत्री उसे ही बनाया जाता है जो बहुत अच्छा जनरल रहा हो । अब अपने यहाँ कृष्ण मेनन को रक्षा मंत्री बनाया जो एक राइफल भी नहीं उठा सकते थे । जगजीवन राम जी भी रक्षा मंत्री बने लेकिन उनकी फिजीक ऐसी थी कि किसी दुश्मन के पीछे भाग कर उसे पकड़ना उनके बस का नहीं था । जार्ज फर्नांडीज तो कुर्ता पायजामा पहन कर सियाचिन चले गए । यह तो लोगों ने उन्हें कपड़े दे दिए, नहीं तो ऐसा निमोनिया होता कि कई दिनों दुःख पाते ।

आपको जेल का अनुभव है इसलिए आपको जेल मंत्री बनाया । अब हमें विश्वास है कि देश की हालत चाहे कैसी भी रहे लेकिन जेलों की हालत ज़रूर सुधर जाएगी । देखिए, आपने आते ही ११ अप्रैल २०१२ को जेलों में कूलर लगवाने के आदेश दे दिए । सलमान खान भी जब जोधपुर की जेल में रहा तो उसने भी बाहर निकलते समय घोषणा की कि वह जेल में टायलेट बनवाने के लिए सहायता देगा । हमें विश्वास है कि आपको तो जेल में कोई असुविधा नहीं होने दी गई होगी । आपका रुतबा ही ऐसा है । हमारे दिमाग में आपकी छवि थी कि आप लंबी-लंबी मूँछों वाले कोई खूँख्वार व्यक्ति होंगे लेकिन अब मंत्री बनने के बाद आपका फोटो देखा तो मज़ा आ गया । आप तो बड़े स्मार्ट लगे । चाहें तो अब भी किसी अच्छे-खासे हीरो की छुट्टी कर दें ।

अब जेलों में न तो कैदियों को कोई कष्ट होगा और न ही उन्हें ऐसा-वैसा भोजन दिया जाएगा । आखिर उनके भी कोई अधिकार हैं । जब कसाब को जेल में बिरयानी खिलाई जा रही है तो ये तो बेचारे कोई देशद्रोही भी नहीं हैं । बस, थोड़े से साहसी हैं । साहसी होना कोई बुरी बात नहीं है । साहसी लोग ही किसी देश की सबसे बड़ी ताकत होते हैं । यदि दुनिया के बड़े-बड़े नेता जेलों में जाने का साहस नहीं दिखाते तो क्या इस दुनिया का इतना विकास होता ? साधारण लोग तो बस अपनी नौकरी करके घर आ जाते हैं और बीवी बच्चों में मगन हो जाते हैं । ऐसे साधारण लोगों के भरोसे किसी देश में कोई बदलाव नहीं आ सकता । सभी बड़े-बड़े नेता और समाज में परिवर्तन लाने वाले लोग कभी न कभी जेल अवश्य गए हुए हैं । हमारी बात छोड़ दीजिए हमें तो कोई पुलिस वाला मज़ाक में भी नमस्ते कर लेता है तो हमारी जान सूख जाती है । हमारे एक मित्र पुलिस में अधिकारी बन गए तो हमें उनसे भी डर लगने लगा । हमारे बेटे के लिए एक पुलिस अधिकारी की बेटी का रिश्ता आया तो हम उसे भी घबरा कर मना कर बैठे ।

अब जेलों में आपको कोई गोली, मतलब कि धोखा, नहीं दे सकेगा । आप सब जानते हैं कि कैदी कौन चीज, कहाँ छुपाते हैं ? जेल में कैसे मोबाइल, शराब, सिगरेट और स्मेक पहुँचते हैं । कैसे जेलों में जन्मदिन की पार्टी आयोजित की जाती है ? वे आपको स्टाफ का आदमी ही मानते होंगे । आदमी और किसी का लिहाज करे या न करे लेकिन स्टाफ वाले का ज़रूर ध्यान रखता है । ट्रक, बस वालों को देखिए, रास्ते में कोई भी बस या ट्रक खराब मिलता है तो वे उसकी खैर-खबर लेते हैं और सब तरह की मदद करते हैं ।

हो सकता है अब कोई पकड़ा भी जाएगा तो तत्काल पुलिस वाले को कहेगा- स्टाफ । और फिर सब ठीक हो जाएगा ।

हमने एक बार पोर्ट ब्लेयर में रहते हुए जेल का एक टेंडर पढ़ा था जिसमें कैदियों के लिए फल, सब्जी, मांस, मछली आदि की सप्लाई का ज़िक्र था । हमें लगा कि आदमी जेल में घर से भी बढ़िया खाना खाता है । और अब तो आप जैसे योग्य और संवेदनशील व्यक्ति आ गए हैं इस विभाग में तो और भी सुधार होगा मगर अब हममें ही जेल जाने योग्य साहसिक कर्म करने की हिम्मत नहीं रही । अब तो इस देह रूपी जेल से आत्मा रूपी कैदी की रिहाई का समय आ रहा है ।

हाँ, यदि किरण बेदी की तरह जेल में कोई कविसम्मेलन करवाने का इरादा हो तो हमें ज़रूर याद कीजिएगा ।

१४-४-२०१२
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Mar 1, 2012

जयराम रमेश - मोबाइल और लैंडलाइन

जयराम रमेश जी,
आपने १७ फरवरी २०१२ को संयुक्त राष्ट्र संघ के 'एशिया पेसिफिक आर्थिक एवं सामाजिक आयोग' के भारत की मेज़बानी में आयोजित सम्मलेन में सब को यह कहकर चौंका दिया कि भारत में महिलाओं का एक वर्ग शौचालय नहीं, मोबाइल फोन की माँग करता है । कुछ लोग हैं भारतीय राजनीति में जो अपने कामों की बजाय बयानों के लिए चर्चित रहते हैं, आप भी उनमें से एक हैं । आप झूठ थोड़े ही कह रहे होंगे । ज़रूर आप कारीगरों को लेकर भारत के गाँवों में गए होंगे शौचालय बनवाने के लिए, तभी न आपके पास इतनी पक्की और फस्ट हैंड जानकारी है ।

हमारे साथ भी एक बार ऐसा ही हुआ । हम खैर किसी को क्या देने लायक हैं फिर भी एक बार किसी भिखारी ने पता नहीं क्या देखकर एक रुपया माँगा, बोला साहब एक रुपया दे दो खाना खाना है । हमने कहा- भैया एक रुपए में तो एक इडली, एक फुल्का, एक गोलगप्पा या एक टॉफी भी नहीं आती, तुम एक रुपए में क्या खाना खाओगे ? दस-बीस रुपए माँगते तो भी कोई बात थी । वह थोड़ा मुस्कराया और बोला- साहब, बात तो आपकी ठीक ही है मगर माँगा भी तो सामने वाले की औकात देखकर ही जाता है, ना । तो साहब उसने हमें अपनी औकात बता दी । आपसे जिस भी ग्रामीण महिला ने फोन माँगा तो इसका भी कोई न कोई कारण रहा होगा ।

इसके कई कारण हो सकते हैं । इस पत्र में हम उन्हीं पर कुछ लिखेंगे जिससे हो सकता है आपकी दृष्टि इस बारे में कुछ साफ़ हो सके । वैसे सेवकों की दृष्टि तो साफ ही होती है । उन्हें तो अपना लक्ष्य हमेशा साफ दिखाई देता है । यह तो जनता ही है जिसे अँधेरे के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता । हो सकता है कि सरकार ठेकेदारों के थ्रू जो शौचालय बनवाती हो उनमें, जिसके यहाँ शौचालय बनवाया जाता हो, उससे भी हज़ार दो हज़ार रुपए लिए जाते हों । और यह तो सब जानते हैं कि उनमें सरकार के सब्सीडी देने के बाद कागज पर लगने वाले पाँच-चार हज़ार रुपए खर्च होने पर भी माल एक हज़ार रुपए का भी नहीं लगाया जाता होगा और वे इतने कच्चे बनते होंगे कि कभी भी धँस सकते हों । ऐसे में बताइए कौन पैसा खर्च करके खतरा मोल ले ।

एक बार राजीव गाँधी प्रधान मंत्री बनने के बाद भारत की खोज करने के लिए भारत के सभी आदिवासी इलाकों में गए । राजस्थान के एक सुदूर पश्चिमी जिले के लोगों से उन्होंने पूछा- आपको क्या परेशानी है । तो लोगों ने कहा- जी, आप तो ऐसा इंतजाम कर दीजिए कि यहाँ टी.वी. साफ़ दिखाई देने लग जाए । ऐसा तो हो नहीं सकता कि वहाँ टी.वी. के अलावा कोई समस्या हो ही नहीं । फिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा ? हमें लगता है कि जनता तब भी और अब तो और भी अधिक निराश है और उसे विश्वास नहीं है कि सरकार उनके लिए कुछ सार्थक कर सकती है । सो उसने उनसे दूरदर्शन और आपसे मोबाइल माँगा । अब देखिए ना कि खेतों में पानी नहीं पहुँचा मगर टी.वी. और मोबाइल पहुँच गए जो बाज़ार और सरकार दोनों के हथियार हैं ।

गाँव के लोग कुछ भी हो, होते बड़े स्वाभिमानी हैं । हो सकता है उसने आप से कुछ भी नहीं माँगा हो और अपनी बात व्यंजना या लक्षणा में कही हो । मोबाइल का मतलब चलता फिरता और लैंड लाइन का मतलब स्थाई-एक ही जगह पर पड़ा रहने वाला । घर में किसी बंद शौचालय में जाने का मतलब लैंड लाइन और खुले में कहीं भी जाने का मतलब मोबाइल हो । और फिर जब सारी दुनिया पी.सी. की जगह लेपटोप और लैंड लाइन की जगह मोबाइल ले रही है तो एक ग्रामीण महिला का अपने हिसाब से मोबाइल होने में क्या ऐतराज़ है ?

आपने भी कहा कि हम शौचालय बनवाते हैं पर उनका उपयोग नहीं किया जाता । सरकार के बनवाए शौचालय के बारे में हम आपको अपना एक अनुभव बताना चाहते हैं । बात किसी सुदूर या पिछड़े इलाके की नहीं है बल्कि राजधानी दिल्ली की है । कोई २५ वर्ष पुरानी बात है । एक बार रात भर यात्रा करके हम बस से पंतनगर से दिल्ली पहुँचे थे । सुबह का समय और बहुत जोर से हाज़त । आप जैसे बड़े लोगों के तो बुश साहब की तरह हर जगह मोबाइल शौचालय साथ चलता है मगर ऐसी स्थिति में एक साधारण आदमी की क्या हालत हो जाती होगी इसकी कल्पना भी आप नहीं कर सकते ।

उन दिनों सुलभ शौचालय का आविष्कार नहीं हुआ था । वैसे जिसके पास पाँच रुपए न हों तो उसके लिए तो आज भी हर शौचालय दुर्लभ है । सो साहब, किसी तरह जल्दी-जल्दी आई.एस.बी.टी. के सरकारी शौचालय तक पहुँचे । खुशी हुई कि कोई लंबी लाइन नहीं थी । मगर जैसे ही अंदर कदम रखा तो देखा कोई चार-पाँच इंच पानी भरा हुआ है । ऐसे में बैठना तो मुश्किल, सो किसी तरह कुर्सी बन कर बैठे । आपको पता होगा कि पहले स्कूलों में मास्टर मुर्गा बनाते थे और कुख्यात बालक को कुर्सी भी बना देते थे । यह कोई मंत्रियों की मज़े करने वाली कुसी नहीं होती थी । यह एक काल्पनिक कुर्सी होती थी । ऐसे झुको कि न तो बैठे और न खड़े । दस सेकंड में ही टाँगें काँपने लगती थी । पेंट खराब होने से तो यही बेहतर लगा कि कुछ भी हो, कुर्सी बनकर ही सही, इस भयंकर समस्या से तो निबटना ही है ।

अब आप लैंड लाइन और मोबाईल की तुलना कीजिए । लैंड लाइन आप जानते ही हैं कि अक्सर खराब रहता है । ठीक करने वाला भले ही बीस दिन बाद आए मगर किराया पूरे ३० दिन का लगता है । तो क्या फायदा ऐसे लैंड लाइन से । और मोबाइल तो मोबाइल है । जहाँ चाहे, जब चाहे निबटो । मोबाइल स्वतंत्रता का प्रतीक है और लैंड लाइन गुलामी का । किसी तरह स्वतंत्र हुई इस देश की जनता और विशेष रूप से ग्रामीण जनता और उसमें भी महिलाओं को, आप गुलाम बनाना चाहते हैं लैंड लाइन के चक्कर में ।

गुरुदेव ने कहा था- 'ज्ञान मुक्त हो जहाँ, प्राण मुक्त हो जहाँ । भारत को उसी स्वर्ग से तुम जागृत करो' और आप हैं कि मुक्त शौच तक पर प्रतिबन्ध लगा रहे हैं । आपने इसी प्रसंग में यह भी कहा था कि इसके पीछे कल्चरल कारण हो सकते हैं । कल्चर केवल ऊपरी दिखावा है । पश्चिमी कल्चर में कुछ तो ठण्ड के कारण और कुछ अपनी व्यक्तिवादी विचारधारा के कारण सब कुछ घर में ही निबटाने का चलन है । वैसे आपको पता है या नहीं मगर जब इंग्लैण्ड में प्लेग फैला था उसमें बहुत से लोग मर गए थे । उसका कारण यह था कि वहाँ घरों में खुले शौचालय थे जिनमें नालियों मे मल पड़ा रहता था । उनकी ढंग से सफाई नहीं होती थी । उसी गंदगी के कारण वहाँ प्लेग फैला था । वे हमें खुले में शौच करने के कारण जमीन पर हगने वाला काला आदमी कहते थे । यदि घर में शौचालय बनाते हैं तो उनकी सफाई की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए और आप जानते हैं पानी की भारत में, विशेष रूप से गाँवों में क्या हालत है ? और तो और संसद के 'वेल' तक में पानी की एक बूँद नहीं है ।

ग्रामीण महिलाओं के शौचालय की (लैंड लाइन) की बजाय खुले में (मोबाइल ) जाने को प्राथमिकता देने के और भी कई सांस्कृतिक कारण हैं । महिलाओं को शौच के बहाने ही बाहर जाने का मौका मिलता है अन्यथा घर के काम से ही फुर्सत नहीं मिलती है । यही उनका कोफ़ी हाउस है और यही उनका हेरिटेज सेंटर है । यही उनका कनाट प्लेस है । इसी समय वे स्वच्छ हवा में साँस ले सकती हैं । यहीं उन्हें अपने लोकतांत्रिक अधिकार मिलते हैं अन्यथा घरों में तो उनकी वही हालत रहती है जो कश्मीर में पंडितों की है ( यदि कोई अभी तक वहाँ बचा हो तो ) । यह मोबाइल ही तो उनका सशक्तीकरण है ।

जहाँ तक पुरुषों की बात है तो वे इसी लैंड लाइन के चक्कर में देर तक सोते रहते हैं । नहीं तो पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर एक दो किलोमीटर घूमते हुए शौच करके आते थे और रास्ते में कहीं कुँए पर हाथ मुँह धोकर, दातुन करते हुए घर पहुँचते थे । इसी बहाने आसपास के छोटे बड़ों से दर्शन मेला हो जाता था । आज हालत यह है कि सब कुछ घर में ही हो जाने के कारण लोगों का आपस में मिलना जुलना ही बंद हो गया है और यही मनुष्य की सामाजिकता कम होने का कारण है और इसी कारण, यदि किसी में मनमुटाव हो जाए तो फिर उसे मिटाने का मौका ही नहीं मिलता । पड़ोस में रह कर भी लोग अनजाने रहे आते हैं । और आप जानते ही हैं कि आजकल बूढ़े लोगों की कूल्हे की हड्डी इन्हीं लैंड लाइन शौचालयों में गिर कर टूटती है । मोबाइल शौचालय में ऐसी कोई समस्या कभी नहीं सुनी ।

और एक बात- हमने सुना है कि पश्चिम वाले लोग शौचालय में बैठकर पढ़ते हैं । अब इससे अधिक सरस्वती का अपमान और क्या होगा ? हमने तो अपने बचपन में बिना हाथ धोए कभी किताब को छुआ तक नहीं और यदि कभी ऐसे-वैसे हाथ या पैर लग गया तो सरस्वती से माफ़ी माँगते हुए किताब को माथे से छुआते थे । कम से कम खुले में जाने वाला किताब तो साथ नहीं ही ले जाएगा ।

वैसे आजकल गाँवों तक में ज़मीन नहीं बची है । वहाँ भी खेतों में प्लाट कट रहे हैं । कहीं ‘सेज़’ (SEZ) बिछ रही है । कहीं कोई देशी-विदेशी कंपनी कारखानों के लिए सरकार से मिलकर गावों में किसानों की ज़मीन कबाड़ रही है । तो अब अपने आप ही जो आप चाहते हैं वह होने वाला है । लोगों को चाहकर भी कहीं बाहर निकलने की जगह नहीं मिलेगी । जैसे कूरियर वालों ने पोस्ट ऑफिस और फोन ने पत्रों को आउट कर दिया वैसे ही महिलाओं की यह स्वतंत्रता ज्यादा नहीं चलने वाली है ।

खैर, ये तो हम अपनी आदतवश बातें बना रहे थे मगर आपको पता ही है कि कितने लोगों के पास घर हैं जहाँ वे शौचालय बनवाएँगे । और फिर जब खाने के ही लाले पड़े हुए हैं तो शौचालय में जाकर क्या चिंतन बैठक करेंगे ?

एक किस्सा सुनिए- एक व्यक्ति हकीम साहब के पास गया और कब्ज की शिकायत की । हकीम साहब ने उसे दवा दे दी मगर कुछ नहीं हुआ । दवा की मात्रा बढ़ती गई और हकीम साहब का अपने ज्ञान पर से विश्वास घटने लगा । अंत में उन्होंने उसे अपनी सबसे तेज दवा दे दी मगर फिर भी कुछ नहीं हुआ । इतने दिनों में मरीज और हकीम साहब की कुछ निकटता सी भी हो गई थी । हकीम साहब ने पूछा- मियाँ, तुम करते क्या हो ? मरीज ने कहा- हुज़ूर, मैं शायर हूँ । हकीम साहब चिल्लाए- लाहौल विला कुव्वत । पहले क्यों नहीं बताया कि तुम शायर हो । ये लो दस रुपए और कुछ खाओ । बिना खाए दस्त क्या ख़ाक लगेगा ।

सो हमें लगता है आप भी ऐसे लोगों के लिए शौचालय बनवाने के चक्कर में पड़े हैं जिनके पेट में कुछ है ही नहीं । मियाँ, ये सम्मलेन-वम्मेलन छोड़ो और यदि आपके हाथ में कुछ हो तो देश को कुपोषण और भुखमरी से बचाने का जुगाड़ करो ।

२०-२-२०१२

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Feb 24, 2012

तोताराम का सूर्य नमस्कार

आज ठंड कुछ कम थी सो तोताराम जल्दी आ गया और कहने लगा- आज चाय बाद में पियेंगे । पहले छत पर चल कर सूर्य नमस्कार करेंगे । सूर्य नमस्कार करने से कमर नहीं झुकती ।

हमने कहा- बुढ़ापे में कमर झुकना स्वाभाविक है और फिर इस दुनिया में जीने के लिए कमर का थोड़ा झुका रहना ज़रूरी भी है । जो लोकतंत्र में कमर सीधी रखना चाहता है उसे बेकार में ही बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । कमर सीधी रखने के चक्कर में ही हमें धक्के खाने पड़े । यदि कमर झुका कर चलते तो अपने शहर में ही सारी सरकारी नौकरी पूरी कर लेते ।

तोताराम बोला- तू कभी भी अभिधा में बातें नहीं करेगा । जब देखो किसी भी बात में व्यंजना झाड़ने लगता है । अरे, मैं सीधी सी बात कह रहा हूँ- सूर्य नमस्कार करने चलें । इससे स्वास्थ्य ठीक रहता है , बस ।

तोताराम का कहना मान कर छत पर चले गए और जैसे ही दोनों हाथ जोड़ कर सूर्य नमस्कार करना शुरु किया तो एक जोर की आवाज़ आई- तुम कौन हो ?

हमने कहा- तोताराम, यह तो कमाल हो गया । स्वास्थ्य-वास्थ्य की तो बाद में देखी जाएगी मगर यहाँ तो हाथ जोड़ते ही भगवान से कनेक्शन जुड़ गया । हम दोनों ने गद्गद् होकर कहा- प्रभु, हम आपके भक्त हैं ।

उधर से आवाज़ आई- भक्त-वक्त कुछ नहीं, तुम दोनों का धर्म और जात क्या है ?

हमने कहा- भगवन, अमरीका से लेकर भारत तक सभी देश धर्म निरपेक्ष हैं इसलिए आप धर्म और जात की बातें करके संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन न करें । बिना बात कोई कार्यकर्त्ता आप पर जनहित याचिका डाल देगा और आप बिना बात तारीखें भरते फिरोगे । कोई वरदान-शरदान देना हो तो हम अपनी लिस्ट निकालें ।

सूर्य भगवान भी जिद पर आ गए, कहने लगे- यदि ब्राह्मण हो तो ठीक है, नहीं तो कोई न कोई फतवा या धर्माज्ञा ज़ारी हो जाएगी और तुम दोनों भागते फिरोगे ।

हमने कहा- प्रभु, आप तो सारी दुनिया के हो । आपको नमस्कार करके तो मनुष्य आप के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है और मान लीजिए यदि कोई इतना ही कृतघ्न हो कि आपको प्रणाम भी न करे तो भी इस ऊपर-नीचे होने से व्यायाम तो हो ही जाएगा । और ईश्वर तो सब को दिखाई नहीं देता और उसे अनुभव करना कृतज्ञता और ज्ञान के बिना संभव नहीं है मगर आप तो साक्षात् देवता हो । रोज सुबह शाम दिखाई देते हो । यदि रात को यहाँ दिखाई नहीं देते तो दुनिया के दूसरे भाग में चमकते हो । आप न हों तो यह दुनिया ठंड में जम कर खत्म हो जाएगी । यदि आप नहीं हों तो पृथ्वी पर जीवन ही नहीं होगा । आप तो सब के हो । किसी एक धर्म या जाति के थोड़े ही हो ।

सूर्य भगवान कहने लगे- यह मुझसे क्या पूछते हो ? जिन्हें सूर्य नमस्कार से ऐतराज़ है उनसे पूछो ।

हमने कहा- प्रभु, सारे धर्म मानते हैं कि ईश्वर एक है । और आप तो एक हो यह सब को दिखाई देता ही है । आपके बारे में तो शंका का प्रश्न ही नहीं है । यदि पानी हिंदू है, आब मुसलमान है और वाटर क्रिश्चियन है तो बात और है । वैसे इसका भी रास्ता निकला जा सकता है । हिंदू सूर्य नमस्कार कर लें, मुसलमान 'अफताब-आदाब' कर लें और क्रिश्चियन 'सन-सेल्यूटेशन' कर लें । फिर तो हमारे खयाल से कोई झगड़ा नहीं रहेगा ।

अब तो सूर्य भगवन को थोड़ा स गुस्सा आ गया और थोड़ी तेज आवाज़ में बोले- यह अपनी मास्टरी वाले नाटक छोड़ो और राजनीति को समझो । यदि लोग इसी तरह से अपने विवेक से निर्णय लेने लगे तो धर्म का धंधा करने वाले क्या खाएँगे और नेताओं का वोट बैंक कैसे बनेगा ? फिर तो देश-दुनिया के सारे काम ही उचित-अनुचित के आधार पर होने लगेंगे । लोग ऐसे ही सोच समझकर निर्णय करने लगे तो हथियारों के तो कारखाने ही बंद हो जाएँगे । दुनिया का सारा बना-बनाया सिस्टम ही होच-पोच हो जाएगा ।

बस, यदि हिंदू और ब्राह्मण हो तो नमस्कार करो वरना अपनी चटाई समेटो और नीचे जाकर चाय पिओ और फालतू की चर्चा करो ।

हम दोनों ने तत्काल नीचे चले जाने में ही भलाई समझी । आस्तिक होने के कारण हमें डर भी लग रहा था और टाँगें भी काँप रही थीं ।

२३-२-२०१२
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Feb 22, 2012

तोताराम की टी.डी.पी.


आज तोताराम कागजों का एक बण्डल लेकर हाज़िर हुआ और हमसे पढ़ने का आग्रह करने लगा मगर दूसरों का लिखा पढ़े वह भी लेखक होता है ? और आजकल चूँकि हम अपने को लेखक मानने लगे हैं सो उसका आग्रह अनसुना कर दिया और बड़े बेमन से कहा- तू ही सुना दे क्या लिखा है ?

तोताराम ने भी अधिक कष्ट नहीं किया और कहा- बात यह है कि मैनें एक पार्टी बनाई है ।
हमने कहा-पार्टियों की क्या कमी है पहले से ही ए. से जेड. तक सैंकडों जनता, समाज, लोक, शक्ति और कांग्रेस आदि पार्टियाँ हैं । तेरे एक और पार्टी बनाने से क्या फर्क पड़ जाएगा ? फिर भी बता दे क्योंकि तू बताए बिना तो मानेगा नहीं ।

उसने कहा- मेरी पार्टी का नाम होगा टी.डी.पी. ।

हमने कहा- इस नाम की पार्टी तो पहले से मौजूद है- तेलगू देशम पार्टी ।

बोला- है मगर यह तो शोर्ट फॉर्म है मेरी पार्टी का पूरा नाम है 'तोताराम दारू पार्टी' और उसका चुनाव चिह्न होगा 'बोतल' ।

हमने कहा- यह तो समाज विरोधी और अनैतिक है । शराब तो आत्मा और शरीर दोनों का नाश करती है । गाँधी जी ने भी कहा था कि यदि मैं एक दिन के लिए भी देश का डिक्टेटर बन जाऊँ तो शराब बंद करवा दूँगा ।

तोताराम कहने लगा- तभी तो नहीं मिला कोई भी पद । बस, राष्ट्रपिता बना कर खुश कर दिया और आजकल घर में पिता की कितनी चलती है, सब जानते हैं । राहुल गाँधी ने भी कुछ वर्षों पहले कहा था कि युवा कांग्रेस में शराब पर प्रतिबन्ध और खादी की अनिवार्यता रहेगी मगर क्या किसी ने मानी ? और अब तो २२ जनवरी २०१२ को खबर आई है कि कांग्रेस की चुनाव सामग्री भी दारू के कार्टनों में बंद होकर लखनऊ जा रही थी सो पुलिस और दारू समर्थक पीछे लग लिए ।

हमने कहा- मगर उनमें दारू थी तो नहीं ना ? लोग काला धन पूजा घर में भगवान की मूर्ति के नीचे रखते है । अवैध वस्तु सब्जी और फलों के बीच दबाकर ले जाई जाती है । अरे, दारू के खाली डिब्बे सस्ते में मिल गए होंगे सो उनमें रखकर ले गए । उनके मन में चोर होता तो ऐसा क्यों करते ?

बोला- यह एक तकनीक भी तो हो सकती है कि अगली बार जब वास्तव में ही दारू के कार्टनों में दारू ही ले जाई जाएगी तो लोग समझेंगे कि चुनाव सामग्री होगी और कोई कुछ शक नहीं करेगा । और पुलिस तो हर सत्ताधारी की सेवा करती है वरना और सब सूफी हैं क्या ? भैया, भले ही फिर चाहे पाँच साल हराम की खाएँ मगर चुनाव के दिनों में सभी पार्टियों के कार्यकर्ता हाड़ तोड़ मेहनत करते हैं । यदि दो घूँट न लें तो अगले दिन उठना भी मुश्किल हो जाए । हाथी से भी दिन भर काम लेने के बाद शाम को एक बोतल रम की दी जाती है । और फिर दारू इतनी ही बुरी है तो कौन मना करता है सभी पार्टियाँ अपने-अपने राज्यों में कर दें बंद । और बंद करने से ही कौन सा फर्क पड़ जाएगा । गुजरात में दारू बंदी है मगर जब, जहाँ जिस ब्रांड की चाहो ले लो । बस, दो पैसे ज्यादा लगेंगे । वैसे दारू से ही तो एक्साइज़ आता है जिससे जन-कल्याण के कार्य किए जाते हैं ।

हमने कहा- क्या ख़ाक जनकल्याण होता है ? अरे, दारू पीने से जितने अपराध और बीमारियाँ होती उनके इलाज में ही आमदनी से ज्यादा खर्च हो जाता है । और फिर जब हमेशा दारू बुरी नहीं है तो फिर चुनाव के समय में ही क्या खास बुराई आ गई ? बिना दारू के ही जनता कौन सी बढ़िया सरकारें चुन लेगी ? चाहे दारू पीकर चुनो, चाहे बिना पिए; आने तो वही नागनाथ के भाई साँपनाथ । फिर जनता को दो-चार दिन के लिए ही सही अच्छी दारू तो मिलेगी ।

अब तो तोताराम उछल पड़ा, बोला- देख ले, आ गया ना मेरी ही राह पर । क्यों चिंता करता है, चाहे जितने प्रबंध करने का दिखावा कर लें मगर दारू-बल, धन-बल, परिवार-बल और बाहु-बल के प्रभाव में कोई अंतर नहीं आने वाला है ।

हमने कहा- मगर चुनाव आयोग तेरी ऐसी पार्टी को मान्यता नहीं देगा जो सीधे-सीधे दारू की बात करती है ।

बोला- क्यों नहीं देगा ? जब अल्प संख्यकों को आरक्षण की घूस दी जा रही है, लेपटोप का लालच दिया जा रहा है, टी.वी., मुफ्त बिजली और पानी की बात की जा रही है तो दारू में ही क्या खराबी है ? यह तो इस देश में सच्ची शांति, सम-भाव और तनाव मुक्तता लाएगी । दारू पीने वाले कभी भी महँगाई और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन नहीं करते, एक ही प्याले में हिंदू और मुसलमान पी लेते हैं और सारी समस्याओं को दो पेग लगाते ही भूल जाते हैं । तभी इसे मधु कहा है । मधु से ही जीवन में मधुरता आएगी ।

हमने कहा- एक तो वैसे ही अब चुनाव होने वाले हैं तो पार्टी बनाने का क्या फायदा, दूसरे यदि तेरी इस पार्टी को मान्यता मिल भी गई तो एक भी सीट तुझे नहीं मिलने वाली क्योंकि नाम से ही क्या होता है वास्तव में तेरे पास मतदाताओं को दारू पिलाने के लिए पैसे हैं क्या ?

फिर भी तोताराम ने हिम्मत नहीं हारी,बोला- रामविलास के पास कौन से बीस एम.पी. हैं मगर दिल्ली में कार्यालय तो मिला हुआ है । क्या पता, मेरी पार्टी को भी दिल्ली में कार्यालय ही मिल जाए ?

हमने अब कुछ न कहना ही उचित समझा क्योंकि ऐसे आशावादी का कोई कुछ नहीं कर सकता ।

२४-१-२०१२
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Nov 13, 2011

नेता और कामी waicharik nibandh

आज राजस्थान को भँवरी के भँवर ने अपनी लपेट में ले रखा है लेकिन यह कोई पहला और एकमात्र किस्सा नहीं है । पद, प्रभुता,धन पाकर बहुत कम लोगों का दिमाग ही ठिकाने रहता है । अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति क्लिंटन, इटली के विदा होने वाले प्रधान मंत्री बर्लुस्कोनी, अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व अध्यक्ष, इज़राइल के सज़ा भुगत रहे प्रधान मंत्री, पूर्व राज्यपाल तिवारी, उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी या दिल्ली के युवा नेता सुशील शर्मा की सुशीलता किसी को भूली नहीं है । ये कुछ नाम हैं जो आज के नेताओं के चरित्र की एक झलक देते हैं ।

चाणक्य ने जब चंद्रगुप्त को उस पर लगने वाले प्रतिबंधों और उसके कर्तव्यों के बारे में बताया तो उसने कहा कि फिर राजा बनने से क्या फायदा ? तो चाणक्य ने कहा- तुम राजा अपने सुख के लिए नहीं बनोगे । राजा का कर्त्तव्य तो सेवा करना है । उसे जितेन्द्रिय होना चाहिए । सदाचार राजा ही नहीं बल्कि समाज के सभी सदस्यों के लिए अभिप्रेत है । संयम और आत्मानुशासन के बिना न तो व्यक्ति सुखी और सम्मानित हो सकता है और न ही राजा अपनी प्रजा के सामने कोई आदर्श उपस्थित कर सकता है ।

गोस्वामी तुसलीदास जी ने अपने रामचरित मानस में स्थान-स्थान पर इसी प्रकार के सदाचार की बात कही है । यह बात और है कि तथाकथित प्रगतिशील या दलित-हितैषी उनकी निंदा करते नहीं अघाते, किन्तु यदि ध्यान से सोच-विचार किया जाए तो तुलसी की बात शत-प्रतिशत सही है । रामचरित मानस किसी अदृश्य स्वर्ग के लिए नहीं वरन इसी जीवन को स्वर्ग के समान बनाने के लिए श्रवणीय और आचरणीय है । स्थान-स्थान पर वे ऐसे संकेत देते हैं । इस आलेख में हम उन्हीं पर विचार करना चाहेंगे ।

उत्तरकांड में काकभुशुंडी जी गरुड़ जी से कहते हैं  - जिसके मन में हित चिंतन है वह कभी दुखी नहीं होता क्योंकि हम प्रायः अपने दुःख से दुखी नहीं होते बल्कि दूसरों के सुख से अधिक दुखी होते हैं; जिसके पास (भक्ति रूपी ) पारस मणि हैं वह दरिद्र कैसे हो सकता है, दूसरों से द्रोह करने वाला कभी निश्चिन्त नहीं हो सकता, और काम-लोलुप कभी अकलंकित नहीं रह सकता क्योंकि उसकी कामुकता कभी न कभी उसे कलंकित कर ही देती है -

परद्रोही कि होहिं निःसंका । 
कामी पुनि कि रहहिं अकलंका ।

अरण्य कांड में जब राम सूर्पनखा को लक्ष्मण के पास भेजते हैं तो लक्ष्मण उसे कहते हैं कि मैं तो राम का दास हूँ और तुम उस दास के साथ कैसे सुखी हो सकती हो-

सेवक सुख चह मान भिखारी । 
व्यसनी धन शुभ गति व्यभिचारी ।
अर्थात सेवक को सुख, भिखारी को मान, बुरी आदत वाले को धन, व्यभिचारी को शुभ गति, लोभी को यश और अभिमानी को सदाचार नहीं मिलता । यदि ये इनकी आशा करते हैं तो वह आकाश से दूध निकालने के समान है ।

जब राम द्वारा खर दूषण के वध के बाद सूर्पनखा रावण के दरबार में अपना दुःख सुनाती है तब भी वह कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त करती है, वैसे उसका खुद का आचरण भी कोई अच्छा नहीं था । यहाँ वास्तव में तुलसीदास जी ही बोल रहे हैं-
संग ते जती, कुमंत्र से राजा । 
मान ते ज्ञान, पान ते लाजा ।
अर्थात कुसंग से तपस्वी, बुरी सलाह से राजा, अभिमान से ज्ञान और मदिरा पान से लज्जा नष्ट हो जाती है । जितने भी तथाकथित बड़े लोग अपमानित हुए हैं उनके साथी या सलाहकार बुरे व्यक्ति थे और वे स्वयं शराब पीते थे और कलंकित व्यक्ति भी । इसीलिए कहा गया है राजा को भले व्यक्तियों को अपने साथ रखना चाहिए मगर जब राजा या नेता खुद भले होंगे तभी तो उनके आसपास भले लोग इकट्ठे होंगे ना । जैसे नेता, वैसे ही उनके छुटभैय्ये ।

दशरथ के मरने के बाद वसिष्ठ जी भरत को समझाते हुए कहते हैं कि राजा दशरथ चिंतनीय और सोचनीय नहीं हैं उन्होंने तो अपने व्रत का पालन किया है और राम के प्रेम में अपना शरीर त्यागा है । सोचनीय तो वेद न जानने वाला ब्राह्मण; धर्म छोड़कर विषयासक्त होने वाला; नीति न जानने वाला राजा; बूढ़ा और धनवान किन्तु कंजूस; वाचाल, ज्ञान का अभिमान करने वाला; गुरु की आज्ञा न मानने वाला और व्रत तोड़ने वाला विद्यार्थी; पति को धोखा देने वाली, कलहप्रिय और मनमर्जी करने वाली स्त्री हैं क्योंकि वे अवश्य ही अपने दुष्कर्मों के कारण नष्ट, दुखी और अपमानित होंगे । ऐसे मामलों में शामिल स्त्रियाँ भी कहीं न कहीं ऐसी ही स्त्रियों की श्रेणी में आती हैं ।

इसीलिए तुलसीदास जी इन सब संकटों का उपाय बताते हुए कहते हैं-

बिनु संतोष न काम नसाहीं । 
काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं ।
संतोष अपने परिवार, पत्नी, धन, पद, जन्म, पति सब के अर्थ में है ।

क्या यह संभव है कि लोकतंत्र में हम नेता का चुनाव इन गुणों के आधार करें और क्या पार्टियाँ टिकट इन गुणों के आधार पर न देकर, जाति-धर्म-धन और बदमाशी के नाम पर देती हैं और येन केन प्रकारेण जीतने वालों का एक झुण्ड बना कर अपने और उनके स्वार्थ और लिप्साओं की पूर्ति का दुष्चक्र रचती हैं ?

११-११-२०११


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Nov 12, 2011

'अग्नि'पुराण - मिट जाते सब भेद



मिट जाते सब भेद
( स्वामी बिग बॉस से बाहर- ११-११-२०११ )

निभता बोलो किस तरह स्वामी-सुन्दरि संग ।
इनका चोला लूज़ है उनकी चोली तंग ।
उनकी चोली तंग, भंग दोनों ने खाई ।
उधर रूप का नशा, इधर ऊँची संताई ।
कह जोशी कविराय त्याग देते सब कपड़े ।
मिट जाते सब भेद, खतम हो जाते झगड़े ।







 कपिल-कील 
( अग्निवेश अन्ना से पैर पकड़ कर क्षमा माँगने को तैयार मगर पहले बताना होगा कि -'वह कपिल कौन है' -११-११-२०११ )

सुंदरियों में गए थे बन कर बहुत दबंग ।
दो दिन में ढीले पड़े, स्वामी जी के रंग ।
स्वामी जी के रंग, काफ़िये तंग हो गए ।
हीरो बनने के सब सपने भंग हो गए ।
जोशी, स्वामी भले पैर पड़ माफ़ी माँगें ।
माफ करें अन्ना पर 'कपिल-कील' पर टाँगें ।


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Sep 10, 2011

मायावती का निजता का अधिकार

( मायावती विशेष प्लेन से मुम्बई से चप्पलें मँगवाती हैं- असांजे के विकिलीक्स ने खुलासा किया- ५ सितम्बर २०११ )

मायावती जी,
२०१२ के चुनाव को ध्यान में रखते हुए आपके विरुद्ध एक बहुत बड़ा षडयंत्र किया जा रहा है । हमें लगता है कि ब्राह्मणवादी, मनुवादी, कांग्रेस, भाजपा, मुलायम, पुरुषवादी सभी आपके पीछे पड़े हुए हैं । एक तो आप महिला, फिर दलित और ऊपर से कुँवारी । न किसी के मन में दया है और न ममता । दुनिया का तो हमें पता नहीं मगर रज़िया सुलतान को उसी के दरबारियों ने केवल इसलिए षडयंत्र का शिकार बनाया कि वह महिला थी ।

जनसंख्या की दृष्टि से दुनिया के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री और वह भी एक नहीं कई-कई बार । दुनिया में इतने छोटे-छोटे देश हैं कि बीसियों को मिला दो तो जनसंख्या में अपने उत्तर प्रदेश के बराबर न हों । और यह स्थिति तो उत्तरांचल को निकाल देने के बाद है । ऐसी शक्तिशाली, लोकप्रिय और जनाधार वाली नेत्री पर आरोप कौन लगा रहा है ? दो करोड़ की जनसंख्या वाले एक छोटे से देश आस्ट्रेलिया का, ब्रिटेन में शरण लिया हुआ, कैद में पड़ा, एक अविवाहित व्यक्ति । उसे क्या पता कि सेवा क्या होती है ? और कितना बलिदान देना पड़ता है उसके लिए । अरे, उसी में कोई गुण होते तो क्यों ब्रिटेन की जेल में होता । अपने देश में रहता, कोई ढंग का काम करता ।

अब कोई पूछने वाला हो कि यह भी कोई काम है कि आप ढूँढते फिरो कि किसने, किसको, क्या कहा ? कौन कहाँ गया ? किसने, किस होटल में खाना खाया ? किसने, कितने रुपए के मोज़े पहने ? किस को कब दस्त लगे या किसे, कितने दिनों से कब्ज है । जब सोनिया जी की बीमारी के बारे में किसी को कुछ भी जानने का अधिकार नहीं है तो आपकी निजता का इतना उल्लंघन क्यों ? आप अपनी मर्जी की चप्पलें तक नहीं पहन सकतीं ? लोग तो जाने कहाँ-कहाँ से सामान मँगाते हैं और आपने मुम्बई से एक जोड़ी चप्पलें क्या मँगवा लीं कि आसमान टूट पड़ा ।

देश स्वतंत्र होने के बाद की बात है । राजाओं का राज जा चुका था । पोरबंदर की महारानी वहाँ के महाराजा की अति रसिकता के कारण नाराज़ हो गईं तो उन्होंने पोरबंदर का पानी पीना तक छोड़ दिया । उनका पानी उनके पीहर गोंडल से आता था । जयपुर के महाराजा जब इंग्लैण्ड जाते थे तो अपने साथ चाँदी के बड़े-बड़े बर्तनों में भर कर गंगाजल ले जाया करते थे । वहाँ का पानी तक नहीं पीते थे । आपने कभी कोई ऐसा मूर्खतापूर्ण कार्य नहीं किया ।

हमने तो सुना है कि जब लालू जी रेल मंत्री थे तब उनकी भैंस के लिए रोज पटना से हरा चारा कटकर, बिहार केडर के एक प्रशासनिक अधिकारी की देखरेख में, ए.सी. कोच में लदकर दिल्ली आता था । मुलायम सिंह जी जब रक्षामंत्री थे तो वायु सेना के प्लेन से अपने घर से छाछ मँगवाया करते थे । छाछ तो रोजाना की चीज है मगर चप्पलें तो कोई साल दो साल में एक बार खरीदनी होती हैं । हम दिन में दो बार मंदिर जाते हैं और एक बार सब्जी लेने तो भी हमारी चप्पलें दो-तीन साल चल जाती हैं । आप तो प्लेन से आती जाती हैं तो एक कार्यकाल में एक जोड़ी चप्पलें बहुत । जय ललिता जी के पास तो सुना है कोई सात हजार जोड़ी सेंडिल और चप्पलें हैं मगर उन्हें तो कोई कुछ नहीं कहता । यह ब्राह्मण और दलित के बीच भेदभाव है कि नहीं ?

मान लीजिए यदि आप चप्पल लेने मुम्बई जातीं तो भी तो उतना ही पेट्रोल लगता जितना कि अब लगा होगा । यदि आप ट्रेन से जातीं तो यू.पी. के बीस करोड़ लोगों को आप द्वारा मिलने वाली एक दिन की सेवा का नुकसान उठाना पड़ता मतलब कि बीस करोड़ मानव दिवसों का नुकसान । जीवन को ही चार दिन का माना गया है और इतने दिन तो मुम्बई से चप्पल लाने में ही बीत जाएँगे । फिर जनता की सेवा कब करेंगी । यदि बस से बरेली या कानपुर जाओ तो भी एक डेढ़ दिन लग ही जाता है । और फिर जिसने सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है उसे चप्पल खरीदने जैसे छोटे काम में अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए । गाँधी जी सूत कातने जैसे छोटे-छोटे कामों में ही लगे रहे इसलिए देश के लिए कुछ खास नहीं कर पाए । जीवन भर सूत कात कर भी दो-चार ढंग के सूट नहीं सिलवा सके । ऐसे ही अधनंगे ब्रिटेन गए और वहाँ की जनता के बीच भारत की इज्जत का कचरा करवा आए । आप जैसी रुआब वाली कोई हस्ती जाती और ब्रिटेन के सम्राट को हड़काती तो बच्चू के होश ठिकाने आ जाते और फटाफट आज़ादी दे देता । और ऊपर से माफ़ी माँगता सो अलग । अब बताइए कि आपका चप्पल लेने जाना सस्ता और समझदारी का काम है कि आपका चप्पल मँगवाना ?

अब यह हमारी तरह कोई रिटायर्ड मास्टर का चप्पल खरीदना या उसकी मरम्मत करवाना थोड़े ही है कि कहीं भी पटरी के किनारे उकड़ू बैठ कर हो गया । मान लीजिए कि हमारी नई चप्पल दो दिन काटे भी तो क्या फर्क पड़ता है । मगर प्रधान मंत्री के जूते काटने लगें या किसी मुख्यमंत्री की चप्पलें काटने लगें तो वहाँ की सारी जनता लंगड़ाने लग जाएगी । और फिर आज के ज़माने में आदमी के गुणों को समझने की फुर्सत किसे है ? आजकल तो आदमी जूतों और कपड़ों से ही तो पहचाना जाता है । वैसे जहाँ तक जूतों और चप्पलों का प्रश्न है लोग अपने प्रिय नेता को जब चाहे माला बनाकर पहनाने को तत्पर रहते हैं या फिर पास जाने की सुविधा न मिलने पर दूर से ही प्रक्षेपित कर देते हैं । ऐसे अवसरों पर प्राप्त होने वाले जूते या चप्पल प्रायः एकवचन में ही होते हैं । इनका द्विवचन के बिना उपयोग भी तो नहीं किया जा सकता और फिर इनकी क्वालिटी प्रायः अच्छी नहीं होती ।

अपने देश में तो शाहजहाँ नामका एक बादशाह हुआ है जो आज से तीन सौ बरस पहले बीस करोड़ की कुर्सी पर बैठता था जो आज के हिसाब से एक लाख करोड़ की होगी । आपने एक जोड़ी चप्पल मँगवा लीं तो गुनाह हो गया । और फिर यह भी नहीं कि आपने कोई वैसे ही चप्पलें उठवा ली हों जैसे कि कोई पुलिस वाला सड़क के किनारे किसी ठेले से केले उठा कर खा जाए । बाकायदा पैसे दिए हैं । नेता होने का यह मतलब तो नहीं कि आदमी अपनी पसंद की चप्पलें भी नहीं पहन सके । अब आप देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री क्या ममता या मेधा पाटकर की तरह से हवाई चप्पल फटकारती अच्छी लगेंगी ?

जहाँ तक दुनिया की बात है तो आधे से ज्यादा पागल है । एक असांजे के लिए ही क्या दिमाग खराब करना । कितनों को पागलखाने में डालेंगे ? लोगों का क्या, कुछ काम तो है नहीं, बस निठल्ले बैठे बातें बनाते रहेंगे । और कुछ नहीं तो दिल्ली में बैठकर अनशन करने लग जाएँगे । अरे भाई, यदि खाने को रोटी नहीं है तो बताओ । बी.पी.एल. कार्ड बनवा देंगे । इनकी बातें मानने लगे तो चल लिया देश । सुरक्षित हो लिया लोकतंत्र । इनकी बातें मानने की जरूरत भी नहीं है । त्रेता में राम ने इनकी बातें मानी तो क्या हुआ ? सब जानते हैं । बड़ी मुश्किल से चौदह बरस का बनवास काट कर कहीं सुख के दिन आए थे कि गर्भवती पत्नी को वन में भेजना पड़ा । आप इन असान्जों पर ध्यान न दें । यह तो चाहता ही यह है कि आप इसे आगरे के पागलखाने में डाल दें तो यह ब्रिटेन की जेल से छूटे और फिर यहाँ के डाक्टरों से मिल कर अस्पताल में ही मज़े करे जैसे कि अपने यहाँ तरह-तरह के भैया और पप्पू और साधू जेलों में जन्मदिन मनाते हैं, कैबरे करवाते हैं, मोबाइल से अपना धंधा चलाते हैं । इसने तो अमरीका के बारे में जाने कितने लाख पेज फोटो स्टेट करके भेजे थे ? कुछ हुआ क्या ? लोकतंत्र में ऐसी छोटी-मोटी आतिशबाजियाँ होती ही रहती हैं । होनी भी चाहिएँ । इससे माहौल बना रहता है वरना तो लोगों को पता भी नहीं चलता कि कौन कब मर गया या कौन कब, कहाँ का मुख्यमंत्री बन गया ? जिस अभिनेत्री के बारे में कुछ भी नहीं छपता उसे फ़िल्में मिलनी बंद हो जाती हैं ।

और भी एक बात लाया है यह असांजे । कहता है कि आप खुद खाने से पहले कुछ आदमियों को खाना चखावाती हैं कि कहीं खाने में ज़हर तो नहीं है । दोष देखने वालों को क्या कहा जाए । बड़े आदमी केवल अपने लिए ही नहीं जीते । वे पहले चार आदमियों को खिला कर खाते हैं । ब्राह्मण खाने से पहले दो-चार ग्रास कुछ अछूता निकालते हैं वैसे ही आप खाने से पहले यदि दो आदमियों का पेट भरती हैं तो यह आलोचना की बात हो गई ? आज तक मरा है क्या कोई आपके खाने में से खाना खाने से ? आप उन लोगों में से नहीं हैं जो अपना खाना खाने का खर्च बचाने के लिए किसी गरीब के घर जा धमकें और बेचारे का किसी तरह से जुटाया खाना चट कर आएँ ।

और कहा गया है कि जो कुछ आदमी अपने हाथ से दान कर जाता है वही उसके साथ जाता है । तो आप तो वैसा भी कुछ नहीं कर रही है कि जनता के पैसे से अपने लिए स्वर्ग में कुछ जमा करवा रही हैं । जहाँ तक बैंक बैलेंस की बात है या मकान की बात है या चप्पलों का सवाल है तो ये क्या आप अपने साथ ले जाएँगी ? कितने हैं जो जनता की सेवा के लिए ब्रह्मचर्यव्रत धारण करते हैं ? लोग तो सरकारी खर्चे पर बच्चों का उत्पादन कर रहे हैं । आपके तो कोई बालबच्चे भी नहीं हैं जो आपके पीछे से भोगेंगे यह सब । जो कुछ है वह सब इसी देश में रह जाएगा । इसी जनता के काम आएगा । और वैसे भी मरने के बाद जूते-चप्पल ही क्या, मृतक का सारा सामान ही दान कर दिया जाता है

अब पता नहीं, लोग क्या सोच कर आपकी आलोचना कर रहे हैं । हमारी तो समझ में आता नहीं । आप तो गौतम बुद्ध, साहू जी महाराज, अम्बेडकर जी, कांसीराम जी का नाम लेकर इसी तरह से निःस्वार्थ भाव से, बिना एक भी पल फालतू के कामों में व्यर्थ किए, लगी रहिए सेवाकार्य में । बड़े भाग्य से मिलता है जनसेवा का अवसर । वैसे भी जनता तो पैदा ही सेवा करवाने के लिए होती है । आप नहीं करेंगी तो कोई और यू.पी. की जनता का 'कल्याण' करने के लिए 'मुलायम' होकर 'अमर' हो जाएगा । तो फिर आप ही क्या बुरी हैं ।

६ सितम्बर २०११

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Dec 2, 2010

विकिलीक्स का असांज और हिलरी का असमंजस


हिलरी जी,
नमस्ते । हम तो आपके बहुत पहले से ही प्रशंसक हैं । तब से, जब आप मात्र एक वकील और क्लिंटन जी की पत्नी ही थीं सांसद तो खैर आप बाद में बनीं हैं । जब क्लिंटन जी उस प्रशिक्षु मोनिका वाले केस में फँस गए थे तब आपने एक सच्ची और आदर्श भारतीय पत्नी की तरह उनको बचाने के लिए मौन धारण कर लिया था और महिला स्वतंत्रता वाली औरतों के बहकावे में नहीं आईं । बड़ा समझदारी का निर्णय था । जो हो गया सो तो हो ही गया, चाहे क्लिंटन की फजीहत हो और चाहे आपका अपमान । अगर उस समय गुस्से में आकर बोल पड़तीं तो मियाँ जी की और किरकरी होती और राष्ट्रपति पद की पेंशन से भी हाथ धो बैठते । अच्छा किया । पर हम इतना ज़रूर जानते हैं कि आपने घर में उनकी अच्छी तरह से खबर ली होगी । बस उसी दिन से हम आपकी कूटनीति और ज़ब्त करने की क्षमता के कायल हो गए थे ।

अब यह विकिलीक्स वाला लफड़ा आ गया । वैसे लोग कह रहे हैं कि अमरीका की बड़ी किरकिरी हो रही है । पर आप और हम जानते हैं कि इससे कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं । यह सब तो होता ही रहता है । क्या घर में नल लीक नहीं करता ? पहले जब स्याही वाला पेन चलता था तो क्या उसकी स्याही लीक नहीं होती थी ? आपने देखा होगा कि बहुत से लोगों की सर्दियों में प्रायः नाक लीक करने लग जाती है । कुछ लोग सावधान नहीं होते तो नाक का वह द्रव पदार्थ कभी-कभी मुँह में भी प्रवेश कर जाता है । कई पशु वर्षा ऋतु में अधिक घास खा जाते हैं तो वे भी पीछे से लीक होकर सड़कें गंदी करते फिरते हैं । जिन देशों के पास बिना मेहनत के जब ज्यादा धन आ जाता है तो वे भी दुनिया में गंदगी लीक करते फिरते हैं, जैसे कि आज कल के नवधनाढ्य वर्ग के लाडले सपूत । क्या जब डेयरी के दूध की थैली लाते हैं तो कभी-कभी वह लीक नहीं होती ? क्या घर-घर की बातें ऐसे ही लीक नहीं होतीं ? मोनिका वाली बात भी तो लीक हो गई थी । निक्सन के वाटर गेट का वाटर भी तो लीक हो गया था । क्या हुआ दो-चार दिन थू-थू हुई और फिर सब ठीक हो गया । क्लिंटन जी फिर से ठहाके लगाने लग गए । सो यह विकी लीक वाला लीकेज भी बंद हो जाएगा ? ‘एम-सील’ की तरह आपके यहाँ भी लीकेज ठीक करने के लिए कुछ न कुछ ज़रूर आता होगा । हमारे यहाँ तो किसी भी केस को निबटाने का सब से बढ़िया तरीका यह है कि या तो फ़ाइल गायब करवादो या उस दफ्तर में ही आग लगवा दो । न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी । लिखने को तो हम ओबामा जी को भी लिख सकते थे मगर वे तो इधर-उधर कम ही जाते हैं मगर आपको तो ट्रेवलिंग सेल्समैन की तरह सारी दुनिया में घूमना पड़ता है । क्या पता, कब कोई, क्या सवाल कर ले ?

वैसे लीक करने को टपकना भी कहते हैं । टपकना एक निरंतर प्रक्रिया है । तभी विद्वानों ने कहा है- 'बूँद बूँद से घट भरे, टपकत रीतो होय' ।
इस सूचना-घट रूपी मोबाइल का मेसेज बोक्स समय-समय पर खाली करते रहना चाहिए । और फिर हम तो कहते हैं कि ऐसे सद्वाक्यों का संग्रह करने से क्या फायदा ? इनका तो मुखारविंद से बोलकर ही सुख लिया जाना चाहिए । मौखिक होने से कभी भी बयानों से मुकरा जा सकता है, जैसे कि हमारे नेता । जब कुछ भी, जिसे हमने अन्तरंग क्षणों में कहा है, सरे आम प्रकट हो जाए तो एक बार तो अजीब लगता ही है । किसी भले आदमी को शर्म भी आ सकती है । मगर यह कमज़ोर आदमियों की बीमारी है । नेताओं को शर्माना शोभा नहीं देता । शर्म तो कुलवधुओं का शृंगार है । वेश्या के मामले में तो यह दुर्गुण माना जाता है । सो शर्म को झटकिये और काम पर चलिए ।

बेताल की तरह हम भी आपको लीक करने, मतलब कि टपकने, के बारे में एक कहानी सुनाते हैं । एक बुढ़िया थी । उसकी झोंपड़ी टपकती थी । एक बार सर्दी का मौसम था । बारिश के आसार बनने लगे । बुढ़िया बड़बड़ाने लगी- मुझे शेर से भी इतना डर नहीं लगता जितना टपूकड़े से लगता है । बरसात में भीगता-भीगता एक शेर उस झोंपड़ी के पास खड़ा था । उसने सोच- यह टपूकड़ा तो लगता है कि मुझ से भी खतरनाक जानवर है । तभी एक कुम्हार अपने गधे को ढूँढता हुआ वहाँ आ गया । बिजली की कौंध में उसने शेर को अपना गधा समझा और कान पकड़ कर घर ले गया । शेर ने उसे टपूकड़ा समझ कर चूँ तक नहीं की ।

सो टपूकड़े को इतना खतरनाक समझने से कभी-कभी उस शेर जैसी हालत हो सकती है । इसलिए आप इससे बिलकुल भी मत घबराइए । वैसे हमें विश्वास है कि आप घबरा भी नहीं रही होंगी । इतने बड़े देश को पता नहीं क्या-क्या करना पड़ता है ? ऐसे ही घबराने लगे तो हो ली दुनिया की थानेदारी ।



अब कोई पूछने वाला तो हो भाई क्या है उस विकीलीक में ? यही कि किसी को 'कुत्ता' कह दिया, किसी को नंगा । अजी हमारे यहाँ कहावत है- ‘हमाम में सभी नंगे होते हैं' । सभी अपनी निजी बातों में ऐसी ही ‘संसदीय-भाषा’ का प्रयोग करते हैं । पहले किसिंगर और निक्सन के निजी वार्तालाप में हमारी नेता इंदिरा जी को 'बूढ़ी चुड़ैल' कहा गया था । यह 'प्रशंसा' तो बहुत पहले लीक हो गई थी मगर किसी भी देश भक्त या कांग्रेस भक्त ने कोई विरोध प्रकट नहीं किया । वैसे आप जानती हैं कि विरोध प्रकट करके भी हम क्या कर लेते ? यह बात और है कि अब, जब सुदर्शनजी ने सोनियाजी के बारे में कुछ कहा तो भक्तों ने बड़ा हल्ला मचाया और एक ने तो कोर्ट में केस भी कर दिया । गोरे लोगों की बात और है । उनकी गाली को हमने कभी गाली नहीं माना । वे हमें प्यार से 'ज़मीन पर हगने वाला काला आदमी' और 'कुत्ता' कहा करते थे । और हम 'यस सर' कह दिया करते थे । ठीक भी है, गोरे लोगों का हगा हुआ तो गुरुत्वाकर्षण के नियमों के विरुद्ध कहीं अंतरिक्ष में चला जाता है ।

वैसे जहाँ तक कुत्ते की बात है तो ओबामा जी ने खुद स्वीकार किया है कि विरोधी पार्टी वाले उन्हें 'कुत्ता' कहते हैं । कुत्ता कोई बुरा शब्द नहीं है । एक फिल्म में तो राजेश खन्ना शर्मीला टैगोर को 'कुत्ती चीज' कहता है । प्यार में इस शब्द के बड़े अध्यात्मिक मायने हैं । कबीर दास तो अपने को 'राम की कुतिया' कहते हैं-
कबीर कुतिया राम की मुतिया मेरो नाउँ ।
गले राम की जेवड़ी जित खेंचे तित जाउँ । ।
राजनीति में इतनी भक्ति और समर्पण संभव नहीं है फिर भी कभी न कभी अपने स्वार्थ ले किए किसी न किसी का कुत्ता बनना ही पड़ता है ।

यदि यह विकिलीक वाला लीकेज नहीं भी होता तो भी सारी दुनिया जानती ही है कि किस देश का क्या चरित्र है । एक बार अमरीका ने रूस की जासूसी करने के लिए यू.टू. नामक बहुत ऊँचाई पर उड़ने वाला एक विमान भेजा जो ज़मीन पर से किसी भी राड़ार की पकड़ में नहीं आता था । यह बात आइजनहावर के ज़माने की है । रूस ने कहा- अमरीका हमारी जासूसी करने के लिए विमान भेज रहा है । अमरीका ने मना किया । रूस ने फिर कहा- हमने उसे मार गिराया है । तो अमरीका ने कहा- हाँ, हमारा एक विमान रास्ता भटक गया था, हो सकता है यह वही विमान रहा हो । रूस ने फिर कहा- हमने उस विमान को गिरा लिया है, उसका पाइलट जिंदा है, हमारी हिरासत में है और उसने सब कुछ कबूल लिया है । तो अमरीका अपने वाली पर उतर आया और कहा- हाँ, हमने जासूसी की है और करते रहेंगे । रूस ने कहा- 'अब की बार जब कोई विमान हमारे यहाँ आया तो हम उस अड्डे को ही नष्ट कर देंगे जिससे वह उड़ कर आया होगा' । इसके बाद अमरीका ने कोई विमान नहीं भेजा । खैर, अभी तो ऐसी कोई चुनौती है नहीं । अगर इस विकिलीक के कारण ऐसी कोई समस्या आई तो देखेंगे । अभी से क्या परेशान होना ।

वैसे दुहरा आचरण करने वाले की भी बड़ी समस्याएँ होती हैं । सच बोलने वाले को कुछ भी याद नहीं रखना पड़ता । चाहे आधी रात को उसे उठाकर पूछो तो भी कोई समस्या नहीं । वही बोलना है जो हमेशा बोलता है । मगर झूठ बोलने वाले को बहुत याद रखना पड़ता है कि किसको, कब, क्या बताया था ? जब अमरीका सारी दुनिया में तरह-तरह के धंधे करता है तो कई तरह की बहियाँ रखनी पड़ती हैं, कई तरह के उलटे-सीधे काम करने पड़ते हैं, जाने किस-किस को क्या-क्या कहना पड़ता है । कभी भी, कुछ भी लीक होने का डर रहता है । नामी-बेनामी प्रोपर्टी का धंधा करने वाले के सैंकड़ों प्लाट होते हैं । तो कभी-कभी चक्कर में भी पड़ ही जाता है । मगर ऐसी छोटी-मोटी बातों के कारण धंधा तो नहीं छोड़ा जा सकता ना ।

खैर, अमरीका की इस स्थिति के बारे में फिर कभी बात करेंगे । अभी तो इस लीकेज को ठीक करवाइए । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाटक का मुखौटा उतार कर, किसी न किसी तरह इस विकी लीक वाले जूलियन असांजे को ठिकाने लगवाइए । वैसे इंटरपोल ने वारंट जारी करके इस शुभ कार्य का श्रीगणेश कर तो दिया है । और आपके बगलबच्चे कनाड़ा के प्रधान मंत्री के सलाहकार कॉलेज के प्रोफ़ेसर टॉम फ्लेनेगन ने तो असांज की हत्या करने की नेक और लोकतांत्रिक सलाह भी साफ़-साफ़ दे ही दी है । यदि ज्ञान के पुजारी एक गुरु ने ही सत्य का गला घोंटने की सलाह दी है, तो ये पश्चिम का पढ़ा-लिखा तालिबान ही है ? अब देर किस बात की- शुभस्य शीघ्रं ।

१-१२-२०१०

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