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Feb 23, 2014

पृष्ठभूमि का प्रदर्शन

ज़नाब आज़म खान,
अस्सलाम वालेकुम । आप वजीर हैं और आज़म भी फिर पता नहीं इस देश ने आपको वज़ीरेआज़म क्यों नहीं बनाया ? वैसे बनाने से क्या होता है । आदमी में दम हो तो पद न होते हुए भी हर हालत में खुद को साबित कर ही देता है । आपने बार-बार खुद को साबित किया है और जमकर साबित किया है । 


कश्मीर में राष्ट्र गान का अपमान किया जाता है, तिरंगा झंडा जलाया जाता है, वज़ीरेआज़म मनमोहन सिंह जब वार्ता करने के लिए कश्मीर जाते हैं तो उनको बैरंग लौटा दिया जाता है, फिर भी वे कुछ नहीं बोलते, उलटे कश्मीर के नेताओं और आतंकवादियों को जेब खर्च के लिए हजारों करोड़ का पॅकेज दे आते हैं । वे जानते हैं कि कश्मीर में उनकी वज़ीरेआज़मी नहीं चलती फिर भी सच नहीं कह सकते हैं लेकिन आपने स्पष्ट रूप से अपने विचार प्रकट कर दिए कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है । इसे कहते है जिगरा और कड़वा सच बोलने की हिम्मत । अगर आपमें दम नहीं होता तो क्या मुलायम आपको निकाल कर फिर मनाकर वापिस लाते ?

जब 'रामपुर का लक्ष्मण' फिल्म बनी तो हमें लगा कि ये निर्देशक ऐसी ऐतिहासिक गलतियाँ क्यों करते हैं ? अरे, 'लक्ष्मणगढ़ का लक्ष्मण' नाम नहीं रख सकते थे क्या ? और मान लो यदि रामपुर से इतना ही प्रेम था तो 'रामपुर का राम' नाम रख सकते थे लेकिन नहीं, कुछ सरप्राइज़ होना चाहिए ना । जन्म स्थान से यदि इतना ही प्रेम था तो पिताजी आपका नाम राम खान रख सकते थे । आजकल तो सब चलता है । लेकिन कोई हिन्दू अपना नाम ज़हूरबक्श रख सकता है लेकिन सच्चे मुसलमान के लिए यह संभव नहीं है । तो फिर रामपुर का नाम ही बदल आज़मगढ़ रख देते । लोकतंत्र में नाम बदलने से ही बड़ा जनकल्याण हो जाता है जैसे पूना का पुणे, कलकत्ता का कोलकाता, बनारस का वाराणसी, बंबई का मुम्बई, गाज़ियाबाद का गौतम बुद्ध नगर और फिर गाज़ियाबाद । यदि यह संभव नहीं था तो आपकी पैदाइश के समय आज़मगढ़ चले जाते । खैर, नाम में क्या रखा है ? बेईमानी तो 'हरिश्चंद्र' नाम रखकर भी की जा सकती है ।

कुछ दिनों पहले आपकी सात भैंसें खो गई थीं या घूमने चली गई थीं लेकिन आपका सुशासन देखिए कि दो दिन बाद ही वापिस लौट आईं । लालू जी वैसे तो बहुत तड़ी मारते हैं लेकिन उनकी 'चारा युग' की दुधारू भैंसें ऐसे गायब हुईं कि आज तक नहीं मिल पाईं । हमें याद है १९८१ में बंगाल के राज्यपाल गोविन्द नारायण सिंह की इज़राइली नस्ल की एक बकरी चोरी हो गई लेकिन आज तक नहीं मिली । अज्ञात व्यक्तियों के नाम रिपोर्ट लिखवाई गई । कुछ दिनों बाद चारखाने की एक लुंगी बरामद करके फ़ाइल दाखिल दफ्तर कर दी गई । ऐसे 'सिंहों' का क्या ? आपके नाम के साथ इस्लाम के कारण 'सिंह' तो नहीं लगाया जा सकता लेकिन 'शेर' तो लगा सकते हैं । आज़म खान शेर या शेरे रामपुर आज़म खान । वैसे इसके बिना भी आपका रुतबा धाँसू है ।

अब देखिए, आज ही यू.पी. असेम्बली में कुछ जनसेवकों (एम्.एल.ए.) ने कपड़े उतार दिए । लोग कहते हैं कि इससे लोकतंत्र शर्मिंदा हुआ । अरे मियाँ, लोकतंत्र का शर्मिंदगी से क्या वास्ता ? जितना नंगा, उतना ही बड़ा नेता । आजकल तो छोटा मोटा वार्ड मेम्बर और सरपंच तक सड़क से संसद तक निर्वस्त्र घूमता है । किसी के बाप में दम नहीं कि उसका कुछ बिगाड़ ले । सबको चुनाव लड़ना है तो इन्हें बर्दाश्त करना सब की मज़बूरी है । आपने इस घटना पर अपने लोकतांत्रिक विचारों को आगे बढ़ाते हुए जो वक्तव्य दिया वह आपके अलावा और कोई क्या खाकर दे सकता था । आपने कहा- 'नीचे वाले कपड़े उतार देते तो पीछे से भी दर्शन हो जाते । मर्दानगी का पता चल जाता' । वैसे आप उनकी पृष्ठभूमि देखकर ही क्या करते । लोकतंत्र में सबकी पृष्ठभूमि लगभग एक जैसी ही होती है । कपड़े उतारें या नहीं, हमें तो इस हम्माम में सब एक जैसे ही नज़र आते हैं ।
जहाँ तक पृष्ठभूमि के प्रदर्शन का प्रश्न है तो काबिल लोग वह काम शब्दों से भी कर दिखाते हैं ।

आदाब ।
१९ फरवरी २०१४


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Apr 15, 2012

राजा भैया का वर्क एक्सपीरिएंस

राजा भैया उर्फ़ रघुराज प्रताप सिंह,

उम्र में आप से दुगुने बड़े होने के कारण आशीर्वाद दे रहे हैं । वैसे हमारे आशीर्वाद के बिना भी आप खुश ही हैं । जब मायावती ने आपको जेल में डाला था तो आपके बारे में कई समाचार पढ़ने में आते थे कि आपने एक शेर भी पाल रखा है और जिस को भी मृत्यु दंड देना होता है तो उसे शेर के पिंजरे में डाल देते हैं । शेर ही शेरों को पाल सकता है । हम तो एक बार चिड़ियाघर में गए थे । जैसे ही शेर के पिंजरे के पास गए तो पता नहीं वह क्यों दहाड़ा ? हम तो उसकी दहाड़ सुन कर ही बेहोश हो गए । अब जब भी कभी जाते है तो चिडियाँ ही देख कर आ जाते हैं ।

बी.एड. में हमें पढ़ाया जाता था कि जो बच्चा कक्षा में सबसे ज्यादा शरारत करता है उसे मोनीटर बना देना चाहिए । वह इस जिम्मेदारी के कारण शरारत करना भूल जाएगा । पता नहीं, मुलायम जी ने आपको इसीलिए तो जेल मंत्री नहीं बनाया ? वैसे राजा की विशेषता इसी से पता चलता है कि वह कैसे मंत्री चुनता है । अकबर पढ़ा लिखा नहीं था लेकिन उसने जो नवरत्न चुने वही उसकी बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण है । भले ही आप मुलायम जी की पार्टी में नहीं हैं लेकिन उन्होंने आपकी योग्यता को पहचान कर आपको पहले भी मंत्री बनाया था । योग्य व्यक्ति कहीं भी मिले उसकी योग्यता का लोकसेवा में उपयोग होना ही चाहिए । कवि ने भी कहा है-

उत्तम विद्या लीजिए, जदपि नीच पे होय ।
पर्यो अपावन ठौर में, कंचन तजे न कोय । ।


रूस में रक्षा मंत्री उसे ही बनाया जाता है जो बहुत अच्छा जनरल रहा हो । अब अपने यहाँ कृष्ण मेनन को रक्षा मंत्री बनाया जो एक राइफल भी नहीं उठा सकते थे । जगजीवन राम जी भी रक्षा मंत्री बने लेकिन उनकी फिजीक ऐसी थी कि किसी दुश्मन के पीछे भाग कर उसे पकड़ना उनके बस का नहीं था । जार्ज फर्नांडीज तो कुर्ता पायजामा पहन कर सियाचिन चले गए । यह तो लोगों ने उन्हें कपड़े दे दिए, नहीं तो ऐसा निमोनिया होता कि कई दिनों दुःख पाते ।

आपको जेल का अनुभव है इसलिए आपको जेल मंत्री बनाया । अब हमें विश्वास है कि देश की हालत चाहे कैसी भी रहे लेकिन जेलों की हालत ज़रूर सुधर जाएगी । देखिए, आपने आते ही ११ अप्रैल २०१२ को जेलों में कूलर लगवाने के आदेश दे दिए । सलमान खान भी जब जोधपुर की जेल में रहा तो उसने भी बाहर निकलते समय घोषणा की कि वह जेल में टायलेट बनवाने के लिए सहायता देगा । हमें विश्वास है कि आपको तो जेल में कोई असुविधा नहीं होने दी गई होगी । आपका रुतबा ही ऐसा है । हमारे दिमाग में आपकी छवि थी कि आप लंबी-लंबी मूँछों वाले कोई खूँख्वार व्यक्ति होंगे लेकिन अब मंत्री बनने के बाद आपका फोटो देखा तो मज़ा आ गया । आप तो बड़े स्मार्ट लगे । चाहें तो अब भी किसी अच्छे-खासे हीरो की छुट्टी कर दें ।

अब जेलों में न तो कैदियों को कोई कष्ट होगा और न ही उन्हें ऐसा-वैसा भोजन दिया जाएगा । आखिर उनके भी कोई अधिकार हैं । जब कसाब को जेल में बिरयानी खिलाई जा रही है तो ये तो बेचारे कोई देशद्रोही भी नहीं हैं । बस, थोड़े से साहसी हैं । साहसी होना कोई बुरी बात नहीं है । साहसी लोग ही किसी देश की सबसे बड़ी ताकत होते हैं । यदि दुनिया के बड़े-बड़े नेता जेलों में जाने का साहस नहीं दिखाते तो क्या इस दुनिया का इतना विकास होता ? साधारण लोग तो बस अपनी नौकरी करके घर आ जाते हैं और बीवी बच्चों में मगन हो जाते हैं । ऐसे साधारण लोगों के भरोसे किसी देश में कोई बदलाव नहीं आ सकता । सभी बड़े-बड़े नेता और समाज में परिवर्तन लाने वाले लोग कभी न कभी जेल अवश्य गए हुए हैं । हमारी बात छोड़ दीजिए हमें तो कोई पुलिस वाला मज़ाक में भी नमस्ते कर लेता है तो हमारी जान सूख जाती है । हमारे एक मित्र पुलिस में अधिकारी बन गए तो हमें उनसे भी डर लगने लगा । हमारे बेटे के लिए एक पुलिस अधिकारी की बेटी का रिश्ता आया तो हम उसे भी घबरा कर मना कर बैठे ।

अब जेलों में आपको कोई गोली, मतलब कि धोखा, नहीं दे सकेगा । आप सब जानते हैं कि कैदी कौन चीज, कहाँ छुपाते हैं ? जेल में कैसे मोबाइल, शराब, सिगरेट और स्मेक पहुँचते हैं । कैसे जेलों में जन्मदिन की पार्टी आयोजित की जाती है ? वे आपको स्टाफ का आदमी ही मानते होंगे । आदमी और किसी का लिहाज करे या न करे लेकिन स्टाफ वाले का ज़रूर ध्यान रखता है । ट्रक, बस वालों को देखिए, रास्ते में कोई भी बस या ट्रक खराब मिलता है तो वे उसकी खैर-खबर लेते हैं और सब तरह की मदद करते हैं ।

हो सकता है अब कोई पकड़ा भी जाएगा तो तत्काल पुलिस वाले को कहेगा- स्टाफ । और फिर सब ठीक हो जाएगा ।

हमने एक बार पोर्ट ब्लेयर में रहते हुए जेल का एक टेंडर पढ़ा था जिसमें कैदियों के लिए फल, सब्जी, मांस, मछली आदि की सप्लाई का ज़िक्र था । हमें लगा कि आदमी जेल में घर से भी बढ़िया खाना खाता है । और अब तो आप जैसे योग्य और संवेदनशील व्यक्ति आ गए हैं इस विभाग में तो और भी सुधार होगा मगर अब हममें ही जेल जाने योग्य साहसिक कर्म करने की हिम्मत नहीं रही । अब तो इस देह रूपी जेल से आत्मा रूपी कैदी की रिहाई का समय आ रहा है ।

हाँ, यदि किरण बेदी की तरह जेल में कोई कविसम्मेलन करवाने का इरादा हो तो हमें ज़रूर याद कीजिएगा ।

१४-४-२०१२
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माई नेम इज खान की तलाशी

प्रिय शाहरुख,
हमें कई महत्त्वपूर्ण पत्र लिखने थे लेकिन जब आज समाचार पढ़ा कि अमरीका में फिर तुम्हारी तलाशी ली गई तो पहले तुम्हें ही लिखना पड़ रहा है । तुमने तत्काल ट्वीट किया और दुनिया में नहीं तो, भारत में ज़रूर हडकंप मच गया । तुम्हारा अपमान भारत का अपमान हो गया । देवकांत बरुआ तो 'इंदिरा इज इण्डिया' का नारा देकर बदनाम हो गए पर लगता है कि तुम वास्तव में ही इण्डिया के पर्याय हो गए । वास्तविकता का तो पता नहीं लेकिन मीडिया ने तो ऐसा ही दरशाया । कुछ भी हो, नाम तो हुआ । वैसे जिस लड़की की तरफ़ कोई नहीं देखता वही अपनी तरफ़ ध्यान आकर्षित करने के लिए भरी बस में किसी से भी उलझ जाती है और चिल्लाने लगती है- 'मरे, तेरे घर में माँ बहन नहीं हैं क्या ? मारूँगी जूता खेंच कर तो होश ठिकाने आ जाएँगे' । तुम्हारा तो खैर, वैसे ही सारी दुनिया में नाम है अन्यथा किसी और नायक या महानायक को क्यों नहीं बुलाया येल विश्वविद्यालय में भाषण देने के लिए?

इस विश्वविद्यालय में प्रायः नोबल पुरस्कार प्राप्त लोगों को ही बुलाया जाता है भाषण देने के लिए । मगर तुम उनसे कौन से कम हो ? वे तुमसे जानना चाहते हैं कि एक आदमी शादी-विवाहों और जन्मदिन की पार्टियों में नाच-नाच कर इतना पैसा कैसे कमा सकता है ? और यह भी पता लगा है कि उन्होंने तुम्हारे द्वारा किए गए परोपकार के कामों को भी ध्यान में रखा है । हमें तो खैर, तुम्हारे दान-पुण्य के कामों का पता नहीं है । हमारे ध्यान में तो सरोज खान के पति को तुम्हारे थप्पड़ मारने की घटना ज्यादा पढ़ने में आई । हम तो कहते हैं कि यदि तुमने थोड़ा सा भी दान किया है तो उसका महत्त्व अधिक है क्योंकि तुम्हारे पैसे बड़ी मेहनत के हैं । नाच-नाच कर कमर तोड़कर कमाए हैं । कोई जुए सट्टे या लाटरी की कमाई नहीं है ।

हम भी तीन बार अमरीका गए हैं लेकिन हमें न तो कभी किसी ने रोका और न ही कोई खास तलाशी ली । एक बार हमने कहा भी कि शाहरुख की तरह हमारा भी एक्सरे लोगे क्या तो वे बोले तुम्हारी तो हड्डियाँ तक बिना एक्सरे के ही साफ दिखाई दे रही हैं । हाँ, पिछली बार जब हम डेट्रोइट से आ रहे थे तो सेक्योरिटी वालों ने हमारे सूटकेस को ज़रूर खोल लिया था । वैसे हमें इसका पता भी नहीं चलता लेकिन जब हमने यहाँ आकर अपना सूटकेस खोला तो उसमें एक पर्ची मिली जिस पर छपा हुआ था कि 'सिक्योरिटी सेव्स टाइम' ।

हम जब इसके कारणों का विश्लेषण करते हैं तो हमें लगता है कि उन्होंने हमारी अटेची इसलिए खोल ली होगी क्योंकि वही सारे सामानों में सबसे पुरानी और सस्ती रही होगी । कुछ लोग जब कीमती सामान ले जाते हैं तो वे उसे किसी पुराने थैले में रखते हैं जिससे किसी को शक नहीं हो । हमारी अटेची में उन्हें क्या मिला होगा कुछ किताबें और कुछ कुर्ते पायजामे । हमारे पास न तो ट्वीट करने की सुविधा और न हमें ट्वीट करना आता और यदि करते तो पढ़ता भी कौन ? हम फिर अमरीका जा रहे हैं और वही अटेची लेकर जाएँगे । हमें विश्वास है अब की बार उसे कोई भी खोल कर नहीं देखेगा क्योंकि वे हमें और हमारी अटेची को पहचान गए हैं ।

तुम्हें रोकने का एक कारण और भी हो सकता है कि वे तुम्हारे भक्त रहे हों जो इस बहाने अच्छी तरह से तुम्हारे दर्शन करना चाहते हों । तुम्हें पता है कि राजस्थान में काले हिरण के शिकार के केस में शामिल हीरो और हीरोइनों को वहाँ की अदालत वाले अक्सर बुलाते रहते हैं । यह सभी जानते हैं कि किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन उन्हें तो बहाना चाहिए महान आत्माओं के दर्शन का ।

कुछ महिने पहले उमर अब्दुल्ला पर किसी ने जूता फेंका तो उनके पिताजी फारूक अब्दुल्ला ने कहा था कि बुश पर भी जूता फेंका गया था सो अब उनका बेटा भी बुश की श्रेणी में आ गया है । सो बार-बार तलाशी होने से शायद तुम भी अब्दुल कलाम, अडवाणी, जार्ज फर्नांडीज आदि की श्रेणी में आ गए हो । वैसे हमारा व्यक्तिगत रूप से यह मानना है कि केवल एक बात समान होने से सब कुछ समान नहीं हो जाता । महात्मा गाँधी को गोडसे ने गोली मारी और जलियाँवाला बाग के जनरल डायर को ऊधम सिंह ने, लेकिन क्या मात्र इसीसे उधम सिंह और गोडसे तथा महात्मा गाँधी और डायर समान हो गए ?


इस बारे में एक बात और बताना चाहते हैं कि कभी-कभी किसी व्यक्ति की शक्ल और हरकतों से भी लोगों को गलतफहमी हो जाती है । हम तब नए-नए मास्टर बने थे । हम पढ़ा रहे थे तो एक बच्चा लगातार हमारी तरफ देख कर मुस्कराए जा रहा था । हमें बड़ा अजीब लगा । हमने बिना कुछ पूछे उसके कान खींच दिए और शाम को उसके बाप से भी शिकायत की । उसके बाप ने बताया कि उसके दाँत कुछ बड़े हैं और बाहर निकले हुए हैं इसलिए हर समय मुस्कराता हुआ लगता है । वैसे तो तुम कोई बुरे आदमी नहीं हो फिर भी व्यक्ति को हर समय फुदक-फुदक नहीं करना चाहिए । हो सकता है तुम उस समय कुछ ज्यादा ही कंधे उचका रहे होगे । एक स्थान पर टिक कर खड़े नहीं रहे होगे, ज्यादा ही हिल-डुल रहे होगे और हो सकता है उस समय सामान्य से कुछ अधिक ही हकला भी रहे होगे । यह सब असामान्य है और इससे उन्हें कुछ शक हो गया होगा ।

तुमने एक फिल्म बनाई थी 'मई नेम इज खान' और उसमें बार-बार कह रहे थे कि ‘माई नेम इज खान एंड आई ऍम नॉट टेरेरिस्ट’ । और अंत में दिखाया गया है कि उन लोगों ने मान लिया कि तुम टेरेरिस्ट नहीं हो । हमारे साथ एक और ही तरह का वाकया हुआ । हमारी बात किसी ने नहीं मानी । दो साल पहले अमरीका ने अच्छे तालिबानों को पैकेज देने की घोषणा की । हम पैकेज के लालच में अपने मित्र तोताराम से साथ काबुल चले गए । वहाँ जाकर बताया- हम अच्छे तालिबान हैं । हमें पैकेज दीजिए । उन्होंने हमारी शकल देखकर कहा- 'तुमसे बम रखकर या हत्याकांड करके आतंक क्या फैलाया जाएगा, तुम तो खुद ही आतंकित दिखाई दे रहे हो । लगता है हिंदी के मास्टर हो । भागो यहाँ से । यहाँ कोई खैरात बँट रही है क्या ? तुम अच्छे बने क्या ? तुम तो सदा से ऐसे ही घोंचू थे । पहले खतरनाक बनो और फिर अच्छे बनना । तुम्हें पता होना चाहिए कि बदी में से नेकी निकलती है । नेक बनने के लिए पहले बद बनो । जब कोई खूब डाका डाल लेता है और उसके बाद समर्पण करता है तो पैकेज भी मिलता है और लोकसभा का टिकट भी' ।

खैर, कुछ भी हो, नाम भी हो गया और काम भी । अब आगे की देखो कि कब और कहाँ नाचना है ।

१३-४-२०१२
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Apr 12, 2012

अमिताभ बच्चन का क्रिकेटाद्वैत

अमित जी,
जय राम जी की । इससे पहले भी हमने आप द्वारा 'कलाकार और कला के प्रति लोगों की उपेक्षा' को लेकर प्रकट की गई चिंता के बारे में लिखा था । आशा है अब आपको कल ३ अप्रैल २०१२ को आई.पी.एल. के उद्घाटन समारोह में कविता पाठ करने के बाद कला के प्रति लोगों की उपेक्षा के बारे में कोई शिकायत नहीं रही होगी । सारे देश के कला और साहित्य प्रेमी संपूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से इकट्ठा हुए थे और रस में गोते लगा रहे थे । हमारे पास तो टी.वी. है नहीं, सो उस अद्भुत कला महोत्सव को देख नहीं पाए । पहले जब 'रामायण' सीरियल नया-नया शुरु हुआ था तो हम पड़ोस में जाकर देख आया करते थे मगर अब वह ज़माना नहीं रहा । पहले लोग घर आए व्यक्ति को आदर पूर्वक बैठाया करते थे और चाय भी पिलाया करते थे । अब तो कोई घर आता है तो लोग नाक-भौंह सिकोड़ते हैं । सो हम चाह कर भी कला, साहित्य और भक्ति के इस महान कार्यक्रम को देख कर अपना जन्म सफल नहीं कर पाए ।

हमारे यहाँ तो हिंदी का एक अखबार आता है जिसमें खेल पन्ने पर आपका कविता गाते हुए फोटो तो नहीं आया । क्योंकि कुछ भी कहें, हमें लगता है कि अखबार वालों ने समझा होगा कि देखने के मामले में लोग शायद करीना और प्रियंका और केटी पेरी को अधिक प्राथमिकता देते हैं । बस, एक छोटा सा समाचार आया कि आपने एक कविता का पाठ किया जिसमें आपने पुनर्जन्म मिलने की स्थिति में किसी भी रूप में क्रिकेट से ही जुड़ने की कामना की है-
 अगर जन्म मिले दोबारा मुझे तो
इस निराले खेल का छोटा सा हिस्सा बनूँ मैं
गेंद का, बल्ले का, पिच का,
कोई हिस्सा बनूँ मैं ।


बस, इतनी ही कविता छपी थी अखबार में । कोई बात नहीं, देखने को तो कुछ था नहीं । और जहाँ तक भक्त की भावना को समझने की बात है तो हमारे लिए कविता के इतने शब्द ही पर्याप्त है । हम भी छोटे-मोटे कवि हैं । हालाँकि ऐसा अद्भुत भक्ति काव्य कभी भी हमसे नहीं लिखा गया । यह सब पूर्व जन्मों का फल और भगवान की कृपा के बिना संभव नहीं होता । आप पर भगवान की कृपा है । ऐसे ही बनी रहे और आप ऐसे ही भगवान की भक्ति करते रहें और सुख-संपत्ति प्राप्त करते रहें । मोक्ष तो दुःखी लोग माँगते हैं कि फिर से इस दुःखमय संसार में न आना पड़े । सच, बड़े-बड़े नेताओं की दुर्गति देखकर हम तो अगले जन्म में क्रिकेट का हिस्सा तो क्या, मनमोहन सरकार का हिस्सा भी नहीं बनना चाहेंगे ।

वैसे अखबार में यह नहीं बताया गया कि यह कविता किसकी थी ? क्या फर्क पड़ता है ? जब आप गा रहे थे तो आपकी ही थी । सच पूछिए तो यदि यही कविता कवि स्वयं गाता तो हो सकता है लोग सुनने के लिए ही नहीं आते । जैसे कि हमारी गज़लें यदि जगजीत सिंह गाते तो प्रसिद्ध हो जातीं और यदि छम्मक छल्लो पर फिल्माई जाती तो युगों-युगों तक युवतियाँ उस पर उछलतीं और युवक सीटियाँ बजाते । हालाँकि इस बात का महत्त्व नहीं है फिर भी हम कवि की पीड़ा जानते हैं इसलिए बताते चलें कि इसे प्रसून जोशी ने लिखा था । वैसे 'स्लम डॉग मिलेनियम' में 'दर्शन दो घनश्याम' भजन को सूरदास का बता दिया जब कि वह गोपाल सिंह नेपाली का है ।

हमने इसी प्रकार के तादात्म्य भाव से परिपूर्ण रसखान की रचना पढ़ी और पढ़ाई है । आपने भी पढ़ी होगी यदि दून स्कूल वालों ने इसे अंग्रेजी स्कूल के पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाने लायक समझा होगा तो । इसमें भी कवि किसी भी रूप में कृष्ण और ब्रज-भूमि से जुड़ना चाहता है । कविता सवैया छंद में है और उसे गाकर भी आनंद लिया जा सकता है यदि किसी के मन में 'आउट डेटेड ' कहलाने का भय नहीं हो तो । कविता इस प्रकार से है-
मानुष हौं तो वही 'रसखान' बसों ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जो खग हों तो बसेरो करों उन कालिंदी-कूल कदम्ब की डारन ।
जो पशु हों तो कहा बस मेरो चरों नित नन्द की धेनु मँझारन ।
पाहन हों तो वही गिरि को जो भयो ब्रज छात्र पुरंदर कारन ।


आप सोच रहे होंगे कि कवि ने और कुछ क्यों नहीं चाहा ? हो सकता है कि उस समय भारत में अंग्रेज नहीं आए थे और न ही क्रिकेट इस देश का धर्म बना था । यदि उस समय तक क्रिकेट भारत में आ गया होता और उसमें इतना पैसा हुआ होता तो रसखान ही क्या, स्वयं भगवान कृष्ण भी गीता में अर्जुन से यही कहते नज़र आते कि ‘हे अर्जुन, खेलों में मैं क्रिकेट हूँ ।’

यदि खेल को धर्म मानें तो उस समय इस देश में कबड्डी, खो-खो, पहलवानी, घुड़सवारी, तलवार-तीर-धनुष चलाना आदि बहादुरी वाले धर्म हुआ करते थे और तब खेलों में अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के धर्म जैसा कोई पक्षपात नहीं हुआ करता था । और तब खेलों में कोई पैसा भी खास नहीं हुआ करता था । यदि कोई सेठ या ठाकुर खुश हो गया तो किसी पहलवान को इनाम में ५१ रुपए दे देता था या फिर कोई कुश्ती या कबड्डी प्रेमी किसी खिलाड़ी को दूध पीने के लिए भैंस दे दिया करता था ।

क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों में तो हाड़ तोड़ना है और कमाई कुछ नहीं । अब बोक्सर मेरी कोम को देखिए । अब भी बेचारी कुपोषित सी लगती है । उसने कहा है कि शायद ओलम्पिक में पदक ले आने पर कुछ हालत सुधरे । आपको याद हो तो १९५० में भारत की फ़ुटबाल टीम ने वर्ल्ड कप में ब्राजील में खेलने के लिए क्वालीफाई कर लिया था लेकिन तब इतना पैसा ही नहीं था कि उन्हें बाहर भेजा जा सकता ।

अगर उस समय क्रिकेट होता और आज जितना पैसा होता तो किसे पता हमें अपने पुराने भारतीय साहित्य में ऐसी भी रचनाएँ मिलतीं जैसी कि आपने आई.पी.एल. के उद्घाटन सत्र में सुनाई । और फिर अपने-अपने भगवान हैं । जैसा भक्त, वैसे भगवान । भगवान तो कण-कण में हैं । जैसी जिसकी भावना होती है भगवान उसी रूप में दिखाई देते हैं ।
जाकी रही भावना जैसी ।
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ।।


किसी को विधर्मियों की हत्या में धर्म और भगवान की सेवा दिखाई देती है तो किसी दिलीप सिंह जू देव जैसे को पैसा भगवान से बड़ा नहीं, तो भगवान से कम भी नहीं दिखाई देता । किसी को नर में नारायण दिखाई देता है तो किसी को मंदिर में भी चुराने लायक जूते या मौका लग जाए कोई छेड़ने लायक युवती दिखाई देती है । एक सज्जन अपनी पत्नी को डराने के लिए अगले जन्म में चूहा या काक्रोच बनने की कामना की थी । कई लोग किसी हसीना का कुत्ता बनना चाहते हैं । एक पियक्कड़ को तो अपने तत्कालीन जन्म से कितनी घृणा थी यह इस शे'र से जाना जा सकता है-
या रब मुझे बनाना था भट्टी शराब की ।
इंसान बाना के क्यों मेरी मिट्टी खराब की ।


आजकल शराब की इतनी अनुपलब्धता नहीं है इसलिए लोग दस रुपए में लोकल दारू की एक सौ मिलीलीटर की थैली सूँत कर अपनी मिट्टी को खराब होने से बचा लेते हैं ।

आपने क्रिकेट के धर्म-स्थल आई.पी.एल. में पिच की घास, गेंद, बल्ला या क्रिकेट से संबंधित कुछ भी बनना चाहा । आप ही क्या, यह खेल ही ऐसा है जिसमें खेती जैसा पुण्य कार्य छोड़ कर पवार जैसे संत तक पिले पड़े हैं । इस खेल में बड़ा स्कोप है । गांगुली मैदान में पानी पिला-पिलाकर कप्तान बन गया । और तो और, लालू जी का पुत्र तेजस्वी बिना एक भी मैच खेले दस-बीस लाख रुपए ले गया ।

हमारे यहाँ कहा गया है- रावळै को तेल तो पल्लै में ही चोखो
अर्थात राजा के यहाँ से यदि तेल मिले और आपके पास कोई बर्तन न हो तो उसे पल्ले में ले लेना भी फायदे का सौदा होता है । राजमहल का तेल जो है ! आपको तो खैर, बकायदा अच्छा-खासा पैकेज मिला होगा ।

हमने हिंदी साहित्य में भारतीय दर्शन के कई प्रकार पढ़े हैं जैसे- अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत आदि । हमारा विश्वास है कि आपने क्रिकेट के साथ अद्वैत स्थापित करके जिस दर्शन का प्रदर्शन किया है वह भी अवश्य ही भारतीय दर्शन में स्थान प्राप्त करेगा और श्रद्धालुओं का कल्याण करेगा ।

हरि ओम तत्सत् ।

४-४-२०१२
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Mar 25, 2012

पूनम पांडे का ट्वीट - बुरा न मानो कोहली है

पूनम पांडे
क्या संबोधन दें, समझ में नहीं आ रहा है । वैसे यदि तुम आज से दस बरस पहले किसी केन्द्रीय विद्यालय में ग्यारहवीं या बारहवीं कक्षा में पढ़ रही होती तो हम तुम्हें हिंदी पढ़ा रहे होते मगर तुम्हारी तो पाठशाला ही दूसरी है । तुम कबीर-स्कूल की नहीं बल्कि बिपाशा बसु की छात्रा हो जहाँ वे प्रेम की भाषा सिखाती हैं । उनके पास भी प्रेम के एक ही पेपर की डिग्री है । प्रेम के दो भाग होते हैं एक तन और दूसरा मन । सामान्यतया प्रेम तन से होकर मन तक जाता है । मन के बिना तन का प्रेम अधिक दिन तक टिकता नहीं । तुमने अपनी अन्तः प्रेरणा से ही स्वयंपाठी विधार्थी के रूप में इस छोटी सी उम्र में ही तन के प्रेम की एम.ए. और डी.लिट. कर ली है । और हालत यह है कि तुम्हारी प्रेम पाठशाला अर्थात ट्विटर पर एक लाख से भी अधिक विद्यार्थी दूरस्थ और सचित्र शिक्षा ग्रहण करने आ चुके हैं । और हमारे ब्लॉग पर हाल यह है कि बामुश्किल तीन साल में कोई अठारह हजार लोगों ने ही क्लिक किया है ।


तुमने अपने कर्त्तव्य में बहुत पारदर्शिता का परिचय दिया है । मगर हर चीज की अति बुरी होती है सो टीम इण्डिया के विश्व कप जीतने पर तुम्हारे पारदर्शी उपहार की चर्चा मात्र से ही टीम इण्डिया इतनी चकाचौंध हो गई कि अब तक हालत पतली चल रही है । जैसे बुद्ध को दान में देने के लिए जब एक बुढ़िया के पास कुछ नहीं था तो उसने अपना अधखाया अनार ही उन्हें भेंट में दे दिया । लोग समझते हैं कि तुम्हारे पास देह दिखाने के अलावा और कुछ नहीं है सो बार-बार उसी का प्रदर्शन कर रही हो । हम भी यही समझते थे । वैसे हम तुम्हारे बारे में अधिक नहीं जानते मगर क्या करें नेट पर नवभारत पढ़ते हैं और वे लोग सबसे पहले तुम्हारा ही फोटो सचित्र दिखाते हैं सो बिना कोशिश किए ही तुम्हारा परिचय मिल जाता है । अधिकतर लोग तुम्हें देह प्रदर्शन के लिए ही जानते हैं मगर तुम्हारे दो-तीन ट्वीट पढ़ कर हमें लगा कि तुममें भाषा की अच्छी समझ है जैसे कि तुमने कर्नाटक के पोर्न गेट पर जो कमेंट्री दी कि 'पार्टी ने कहा इलेक्शन के लिए तैयार रहो और माननीय सदस्य समझ बैठे कि इरेक्शन के लिए तैयार रहो' । क्या पकड़ है भाषा की ? और अब १८ मार्च २०१२ को क्रिकेट में पाकिस्तान की हार में कोहली के योगदान पर अपने ट्विटर में लिखा 'बुरा न मानो कोहली है' । क्या महीन और ज़हीन व्यंग्य है ? भाषा की अपनी इस विदग्धता का सदुपयोग करो । ऐसी पकड़ बहुत कम लोगों में होती है ।

मगर ये मीडिया वाले तुम्हें इस प्रतिभा का उपयोग नहीं करने दे रहे हैं । तुम सोचती हो कि तुम अपनी इस पारदर्शिता से पब्लिसिटी बटोर रही हो और मीडिया वाले समझ रहे हैं कि तुम्हारे नाम से उनकी साईट पर अधिक लोग क्लिक कर रहे हैं । हमें तो लगता है दो ठग मिल कर एक दूसरे को ठग रहे हैं और इस चक्कर में बेचारे पाठकों का कचूमर निकल रहा है । एक कहानी है – ‘भेड़िया आया’ । उस कहानी की तरह लोग तुम्हारे ट्विटर को अब सीरियसली नहीं ले रहे हैं और यदि कभी तुमने अपना विश्व कप वाला वादा पूरा भी कर दिया तो शायद इसे भी एक ‘कभी पूरा न होने वाला आश्वासन’ समझ कर लोग देखें ही नहीं । जैसे कि अब राखी सावंत को कोई सीरियसली नहीं ले रहा है । अब तो लोग तुम्हें पूरे कपड़ों में देख कर ज्यादा आश्चर्यचकित होते हैं ।

पता नहीं आजकल तुम क्या काम करती हो ? सुना है पहले संत शिरोमणि विजय माल्या के कलेंडर में काम किया था उसी की कमाई से काम चला रही हो । हम तुम्हें एक सलाह देना चाहते हैं कि तुम कविता करने लग जाओ । सुंदरियों का साहित्य में बहुत अभाव है । साहित्य में सुंदरियों की कमी के कारण आजकल साहित्यकारों को अधेड़ साहित्यकारिणियों से काम चलाना पड़ रहा है । बूढ़ी साहित्यकारिणियाँ अपनी रचनाओं के साथ अपने चालीस साल पुराने फोटो भेजती हैं और पाठक उन्हें ही सच मानकर रचनाएँ पढ़ लेते हैं ।

कवि सम्मेलनों में तो दो ही रस चलते हैं- हास्य-व्यंग्य और शृंगार । और तुम्हारे पास दोनों ही हैं । और हम तो कहते हैं कि सौंदर्य होने के बाद पाठक और श्रोता सारे रस अपने आप ही ढूँढ़ लेते हैं । मंचों पर संचालक और कवि द्विअर्थी वाक्यों से काम चलाते हैं जब कि तुम्हारे पास तो ऐसे-ऐसे एक-अर्थी संवाद हैं जो कई-कई अर्थ देते हैं । सच कहते हैं कि यदि एक कविसम्मेलन के एक-दो लाख भी माँगोगी तो भी लोग देंगे और सारे साल फुर्सत नहीं मिलेगी । सोच कर देखना । तुम्हें किसी को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी । अपने आप स्थापित कवि दौड़े-दौड़े आएँगे । उन्हें भी तुम्हारे जैसे सहारे की ज़रूरत है क्योंकि बूढ़े मंचीय कवियों की हालत एक कुटनी जैसी हो जाती है । तुम्हारे बहाने उन्हें भी कवि सम्मलेन मिलते रहेंगे । सोच कर देखना ।

बस, हम तुम्हें एक बात से सावधान करना चाहते हैं कि जैसे तुमने कोहली के बारे में लिखते हुए हनुमान जी का उल्लेख किया है । वे बेचारे बाल ब्रह्मचारी हैं, उन्हें तो बख्शो । उनका डिपार्टमेंट तुमसे नितांत भिन्न है । यदि उन्हें गुस्सा आ गया तो पूँछ की ऐसी फटकार लगाएँगे कि सारे ट्वीट भूल कर टर्राती फिरोगी ।

हो सके तो विराट कोहली को क्षमा करो । एक वही तो थोड़ा ठीक खेल रहा है । क्यों उसका तप-भंग करने पर तुली हो । मुम्बई में और बहुत से संत पड़े हैं, उन्हें आभारी बनाओ ।

१९-३-२०१२

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Mar 22, 2012

विजय-मद और जनता रूपी द्रौपदी


मुलायम जी,

जय बजरंगबली । भले ही यह संबोधन कुछ लोगों को हिंदुत्ववादी लगे पर हम जानते हैं कि आप अखाड़े के आदमी हैं और अखाड़े में जानी लीवरों या राजू श्रीवास्तवों से काम नहीं चलता, वहाँ तो 'बजरंगबली की जय' ही काम आती है । तो बजरंगबली ने मेहर कर ही दी । वैसे आपको भी इतनी उम्मीद तो नहीं ही थी । एक बार तो एकदम निराश से हो चले थे और यहाँ तक कह दिया था कि सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए आप कांग्रेस को समर्थन दे सकते हैं । खैर, अच्छा हुआ कि उसकी नौबत नहीं आई । पहले आपके छोटे भाई अमर सिंह जी कामरेड सुरजीत के साथ जाकर आपकी कम और खुद की ज्यादा भद्द पिटवा चुके थे । बाहर आकर बोले- 'हमारी तो वहाँ कुत्ते जैसी भी कदर नहीं हुई' । वैसे हमें लगता है कि ऐसा कहकर उन्होंने कुत्ते का अधिक अपमान किया । कुत्तों की क्या कदर होती है उन्हें पता ही नहीं । कुत्ता किसी भी सुन्दरी के गाल चाट सकता है । आपको पता है एक बार ब्रिटनी ने कहा था कि वह अपने कुत्ते के साथ दफ़न होना चाहती है । इतना तो सतीत्त्व कुंती, मंदोदरी और तारा ने भी नहीं दिखाया था । कुत्ता बनते ही आदमी किसी भी पार्टी का प्रवक्ता या महासचिव बनने के योग्य हो जाता है ।

वैसे यह जनता है बड़ी अजीब । द्रौपदी की तरह पाँच पांडवों के बीच बारी-बारी से धक्के खाती रहती है और दुशासनों से साड़ी खिंचवाती रहती है । करे भी तो क्या, स्वयंवर में आते ही ये लोग हैं । ढेरी में सारे बैंगन काने हैं । जितना चाहो उलटो-पलटो कुछ होना-जाना नहीं । आपको क्या पता था कि बात इस तरह पल्ले बँध जाएगी । यदि स्पष्ट बहुमत नहीं आता और सबसे बड़ी पार्टी के नाते जोड़-तोड़कर गठबंधन सरकार बनाते तो कम से कम यह तो कह सकते थे कि गठबंधन के चलते यह या वह संभव नहीं हो सका या लोकतंत्र की रक्षा के लिए थूक कर चाटना पड़ा मगर अब तो वह रास्ता भी नहीं बचा है । फिर भी अपन ने ऐसा कोई वादा नहीं किया है जो ज्यादा चक्कर में डाल सके । लेपटोप और बेरोजगारी भत्ता देना है सो जैसे-जैसे बजट आता जाएगा देते जाएँगे । और यदि क़र्ज़ भी लेना पड़ा तो क्या फर्क पड़ता है । कौन सा अपने को चुकाना पड़ता है । जो आगे आएगा सो भुगतेगा । और वह भी क्या भुगतेगा ? वह भी कह देगा कि पिछली सरकार खजाना ही खाली कर गई । इसी तरह पिछली सरकारों पर आरोप लगाते साठ बरस बीत गए । किसी का क्या बिगड़ा ? लोकतंत्र मज़े से चल रहा है ।

आपको बहुमत मिलने पर भक्तों ने कहा- गुरु, अब छोड़ो लखनऊ और बस, जल्दी से दिल्ली का रास्ता पकड़ो और प्रधान मंत्री बन जाओ । वैसे यदि किसी को उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत मिल जाए तो वह भारत क्या, सारे योरप या अमरीका का प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति बनने के योग्य हो जाता है । सो हम तो कहते हैं कि बड़ा सोचो और इस साल नवम्बर में अमरीका के राष्ट्रपति का नामांकन पत्र भर दो । आप कहेंगे कि यह कैसे हो सकता है ? क्यों नहीं हो सकता ? जब सारी दुनिया ग्लोबल गाँव हो गई है तो उसी गाँव का एक व्यक्ति सरपंच का चुनाव क्यों नहीं लड़ सकता ? और यदि नहीं लड़ सकता तो फिर बिना बात 'ग्लोबल गाँव-ग्लोबल गाँव' कहकर लोगों को क्यों उल्लू बना रहे हो ? ग्लोबल गाँव का केवल इतना ही अर्थ थोड़े है कि हमारी वेल्थ तो हमारी और तुम्हारी 'वेल्थ कोमन' । यह नहीं चलेगा । क्या योरप और अमरीका के हथियार और कोकाकोला हमारे यहाँ बेचने के लिए ही दुनिया ग्लोबल गाँव है क्या ?

वैसे आप हमारे डिपार्टमेंट के आदमी हैं । मूलतः आप एम.ए., बी.टी. हैं और हम एम.ए., बी.एड.हैं । और फिर जब आप बी.टी. कर रहे थे तो हमारे एक वरिष्ठ मित्र उसी बी.टी. कालेज में पढ़ाते थे । सो कुछ और भी रिश्ता बनता है मगर हम इस तरह रिश्ता जोड़कर आपसे कोई अनुचित लाभ नहीं चाहते । हम तो कोई दस बरस पहले रिटायर हो चुके हैं । आप भी यदि कहीं मास्टरी करते तो अब तक रिटायर हो ही चुके होते । अच्छा हुआ जो आपने नौकरी नहीं की । बड़े निर्दय नियम हैं नौकरी के । साठ साल का होते ही सारे संबंध भुलाकर धक्का मार देते हैं जैसे कि गौभक्त दूध निकालते ही गौमाता को बाहर जाकर पोलिथिन की थैलियाँ और गालियाँ खाने के लिए धक्का मार कर निकाल देते हैं ।

हम तो आपको एक नेक सलाह देना चाहते हैं कि यदि हो सके तो इस बहुमत का सदुपयोग कीजिए । आपके साथ तो मनमोहन जी जैसी गठबंधनीय मजबूरी भी नहीं है कि कलमाड़ी या राजा को कुछ नहीं कह सकें और दूल्हा बने दिनेश त्रिवेदी को कोलकाता से एक फोन आने पर ही घोड़ी पर से नीचे उतार दें । आपके पिछले शासन को लोग गुंडा-राज कहते हैं और आपने भी इसका कोई खास विरोध नहीं किया । माया ने तो भविष्यवाणी कर दी है कि थोड़े दिनों में ही लोग गुंडा-राज के तंग आकर उनके राज को याद करेंगे । सो आप बेटे की मदद करने के लिए यू.पी. में रहें । आपके होते हुए ही भाई लोगों ने नेताजी के विजय-जुलूस में बीच सड़क पर गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं । तो आपके दिल्ली चले जाने पर पता नहीं क्या करेंगे ?

वैसे भी प्रदेश की राजनीति अधिक अच्छी है । यदि केन्द्र में हों तो कभी अमरीका का दबाव, कभी आतंकवाद का चक्कर, कभी रेल दुर्घटना, कभी सेना की समस्या, कभी तेल के भावों में वृद्धि । अपना प्रदेश का काम ठीक है । मज़े से मनरेगा, सर्व शिक्षा अभियान, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में से शहद पीते रहो और कोई कुछ कहे तो कहा जा सकता है कि केन्द्र ने पक्षपात किया, विकास के लिए पूरी धनराशि नहीं दी आदि । और केन्द्र सरकार, जो कि गठबंधन होने के कारण हमेशा ही किसी न किसी संकट में रहेगी, तो उसका भी भयादोहन किया जा सकता है । ऐसे में उससे डरने की तो ज़रूरत ही नहीं है ।

ठीक है, खुशी में ही चलाईं मगर गोली तो गोली है पता नहीं कब किधर चल जाए ? हमने कई शादियों में ऐसे ही कई लोगों को मरते या घायल होते देखा है । मगर इन लोगों को भी कितना रोका जाए । आदमी गम छुपा सकता है मगर खुशी को छुपाना बहुत मुश्किल है । आज ही आपने पढ़ा होगा कि ममता की पार्टी की एक सांसद के गार्ड ने रेल में एक यात्री पर पेशाब कर दिया और अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गई । हम कहते हैं, न ही की जाएगी । तभी हमारे यहाँ एक कहा जाता है कि जी, फलाँ की क्या बात करते हो ? आजकल तो उनके पेशाब में चिराग जलते हैं । यह हाल तो एक सांसद के गार्ड का है, तो साहब, जो कोई खुद ही नेता बन जाए तो फिर उसका तो कहना ही क्या ? वह तो जो न करे सो थोड़ा । पास में बंदूक हो और आदमी किसी को दिखाए नहीं, यह कैसे हो सकता है ? बंदूक तो होती ही दिखाने के लिए है जिससे कि लोग पहले से ही जान जाएँ कि फलाँ के पास बंदूक है । हमारे यहाँ बहुत से रिटायर्ड फौजी हैं । वे जब भी किसी बरात में जाते हैं तो मूँछ लगाकर और वर्दी पहन कर, कंधे पर दुनाली लटकाकर जाते हैं । बताने की ज़रूरत ही नहीं होती कि वे कौन हैं ?

जब वानर सीता की खबर लेकर आए तो उन्होंने सुग्रीव के बगीचे 'मधुवन' के फल खाए और बगीचे को उजाड़ने लगे । जब रखवालों ने मना किया तो उन्हें मुक्के जमा दिए । जब रखवाले सुग्रीव के पास शिकायत लेकर गए तो सुग्रीव समझ गए कि सीता की सुधि ले आए हैं । यदि ऐसा नहीं होता तो फल खाने और बाग उजाड़ने का साहस नहीं कर सकते थे । सो यह तो उत्तर प्रदेश के विजय का उत्सव है । आजकल तो छोटे से कालेज के अध्यक्ष पद पर विजयी नेता के समर्थक विजय-जुलूस में दुकानें लूट लेते हैं । महाभारत के युद्ध के बाद विजय-मद में मस्त यादवों ने, जब कोई नहीं मिला तो खुद ही आपस में लड़कर काम निबटा दिया । विजय-मद बहुत बुरा होता है । किसी भी शराब से ज्यादा नशीला ।

बाराती जब लड़की वाले के यहाँ जाते हैं तो रसिकता दिखाना उनका अधिकार होता है । चुने हुए नेता तो एक प्रकार से उस इलाके के दामाद हो जाते हैं । हमने तो नेताओं के चहेतों और किसी शासक जाति के कर्मचारियों को स्वयं को सरकारी दामाद बताते सुना है । वे न तो ड्यूटी पर जाते और रिश्वत ऊपर से खाते हैं । अब ये तो जीते हुए नेता हैं । इनके मद का क्या ठिकाना ? जिसके चारों तरफ लोग चक्कर लगाते हों, भले ही वह अपने कर्मों से छिनाल और शक्ल से गधी हो, पर उसे इठलाने से कोई नहीं रोक सकता । सो आपको इन मतियाए सेवकों को थोड़ा नियंत्रण में रखना होगा । जिसे पीने की पक्की आदत है वह पिएगा तो सही फिर भी उसे कहा जा सकता है कि भैया, घर पर बैठकर पी लिया कर । पोर्न फिल्म देखने के लिए शाम का इंतज़ार कर लें । यह क्या कि सदन में ही चालू हो जाएँ । और यदि ऐसा करना अनिवार्य ही हो तो वहाँ से उठ जाएँ या टी.वी. वालों से बचें या फिर टी.वी. वालों को सदन में ही न आने दें । थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए । इस देश की जनता अभी पिछड़ी हुई है । कुछ भी हो यह भारत है । अब भी थोड़ी बहुत शर्म बची हुई है, कल का पता नहीं । कोई अमरीका या इटली तो है नहीं कि राष्ट्रपति क्लिंटन या प्रधान मंत्री बर्लुस्कोनी कुछ भी करें और कुर्सी पर बने रहें ।

वैसे यदि चुने हुए लोगों में दागी संतों का हिसाब लगाया जाए तो सभी दलों में आधे तो दागी हैं ही । यह पार्टियों और जनता दोनों की मज़बूरी है । उम्मीदवार जीतने वाला होना चाहिए । और इस देश में भले आदमी के लिए जीतना तो दूर, चुनाव खर्चा जुटाना भी मुश्किल है । और जब सारे ही गए-बीते हैं तो जनता किसी को वोट दे, कुर्सी पर कोई तो गया-बीता ही बैठेगा फिर चाहे वह इस पार्टी का हो या उस पार्टी का । और फिर बहुत शीघ्र ही इस देश में तमिलनाडु वाली स्थिति हो जाएगी- कभी करुणानिधि तो कभी जयललिता । वैसे ही कभी आप और कभी माया । फेयर डील । कोई विकल्प ही नहीं बचेगा । राष्ट्रीय दलों की तो जैसी हालत है वैसी किसी खजुहे कुत्ते की भी नहीं होती ।

जनता को तो मरना ही है चाहे विषाक्त भोजन खाकर मरे या भूख से या कुपोषण से या किसी सेवक की गोली से या डाक्टर की दवा से या सड़क दुर्घटना में- यही उसके लिए स्वाभाविक मौत है । और फिर ज्ञानी लोग कह गए हैं कि यदि किसी को गुड़ से मारा जा सकता है तो ज़हर का खर्चा क्यों किया जाए ?

फिर भी यदि आप विकास और प्रदेश के औद्योगीकरण के बारे में सोच रहे हैं तो अपने पास बिना गाय के दूध बनाने की अनूभूत और घरेलू तकनीक है । रामपुर के चाकू और एटा, इटावा के कट्टे हमारे राजस्थान तक प्रसिद्ध हैं । अमरीका से हथियार मँगाकर वहाँ के कारीगरों और उद्योगपतियों को फायदा पहुँचने की बजाय क्यों न अपने ही लोगों को चांस दिया जाए । और भी बहुत सी संभावनाएँ और योजनाएँ हैं हमारे पास, यदि आपके पास समय, दूर-दृष्टि और पक्का इरादा हो तो ।

२०-३-२०१२

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Dec 5, 2011

हाथ, हाथी और हाथीपाँव



दिग्विजय जी,

जय माता जी की । माताजी मतलब कि शेराँ वाली, अपन क्षत्रियों की आराध्या । आप का १७ नवंबर २०११ का ट्वीट पढ़ा । वैसे हमें यह ट्वीट वाला धंधा कुछ जँचता नहीं क्योंकि इसमें मेंढक के टर्राने की सी ध्वनि आती है या फिर तोते की टें-टें जैसी दर्दनाक आवाज़ सुनाई देती है । तुलसी बाबा होते तो इस टर्राने में भी वेद-पाठ की ध्वनि सुन लेते मगर हम में इतनी योग्यता कहाँ ? हमें लगता है कि लोग अपने ट्वीट के अनुयायियों के अनुसार अपनी लोकप्रियता मापते हैं । वैसे पाठक कम और दर्शक तो पूनम पांडे के ट्वीट पर भी बहुत जाते हैं मगर वह मामला दूसरा है । और फिर आपको किसी की फोलोइंग की ज़रूरत ही क्या है ? आप तो पहले ही 'दिग्विजय' हैं, दसों दिशाओं को जीते हुए । आजकल तो गली का कुत्ता भी जब देखता है कि गली में कोई दूसरा कुत्ता नहीं है तो अपने को गली का दिग्विजय समझने लगता है ।

हमें राजनीति में कोई रुचि नहीं है क्योंकि हमें बचपन से ही सिखाया गया है कि राजनीति सीधे लोगों के बस का काम नहीं है । इसमें बहुत उल्टा-सीधा करना, कहना पड़ता है ।

तो आपने अपने ब्लॉग में बसपा के एक नारे की पैरोडी की ।
मूल-

चढ़ गुंडों की छाती पर ।
मोहर लगाओ हाथी पर ।

आपकी पैरोडी थी-

गुंडे चढ़ गए हाथी पर ।
गोली खाओ छाती पर ।

वैसे पैरोडी को लोग साहित्य नहीं मानते और यहाँ भी आपने मूल की पैरोडी ही की है । वैसे यह मूल भी किसी पैरोडी से कम नहीं है । एक साथ दो काम कैसे होंगे ? गुंडा कोई मरा हुआ थोड़े ही है ? हिल-डुल रहा होगा । अब ऐसे में मोहर गलत जगह लगाने के चांस रहते हैं । और फिर हाथी पर मोहर लगानी है जिसके लिए कुछ तो ऊँचाई पर जाना ही होगा । यदि सावधानी नहीं रही तो हो सकता है हाथी के पाँव तले शरीर का कुछ हिस्सा कुचल ही जाए ।

खैर, न आपको हाथी पर मोहर लगानी और न हमें । पर आपकी पैरोडी की पैरोडी पढ़ कर अच्छा लगा । चलो किसी में तो कविता के कीटाणु बचे हैं वरना इससे पहले ज़फर ने शायरी की और अंग्रेजों ने रंगून की जेल में डाल दिया । अटल जी ने शायरी की तो लोगों ने उन्हें कवि सम्मेलनों में उलझा लिया । इसके बाद जसवंत सिंह जस्सोल जी ने बजट में कुछ पैरोडी के चिह्न दिखलाए यो शीघ्र ही उन्हें पूर्णतया गद्यात्मक होना पड़ा और वह भी विवादास्पद गद्य । अब आपकी बारी है ।

इब्तदा-ए-इश्क में सारी रात जागे ।
अल्ला’ जाने क्या होगा आगे ?

वैसे कविता में बहुत शक्ति होती है यदि कविता हो तो । बिहारी के एक दोहे ने जयपुर के राजा जयसिंह को अपने कर्तव्य की याद दिला दी थी । रत्नावली के एक दोहे ने तुलसीदास जी को राम भक्ति की ओर मोड़ दिया था । आजकल जो कविता होती है उससे लोग प्रभावित कम और आतंकित अधिक होते हैं और मंच पर कवि के आने से पहली ही खिसकने लग जाते हैं । आप कविता के मार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं पर आपकी कविता में राजनीति और स्वार्थ अधिक है इसलिए पता नहीं सब को अच्छी लगेगी या नहीं । यहाँ हम तो आपके इस मार्ग पर आने में ही खुश हैं ।

आपकी इस पैरोडी में वैसे तो मात्रा-दोष हो सकता है मगर कविता की तुक और मात्रा को आजकल कम देखा जाता है क्योंकि इतना समय ही किसके पास है ? बस सामने वाले को हलकान कर दे वही कविता श्रेष्ठ है । जैसे कि एक मियाँ जी ने जाट के पग्गड़ को लक्ष्य करके कहा-
जाट रे जाट, तेरे सिर पर खाट ।
जाट ने भी मियाँ की झब्बे वाली टोपी पर तत्काल उत्तर दिया-
मियाँ रे मियाँ, तेरे सिर पर कोल्हू ।

मियाँ ने गलती निकाली- मगर तुक तो नहीं मिली ।
जाट ने कहा- तुक से क्या होता है, जब उठाएगा तब पता चलेगा ।

सो आपकी पैरोडी भी वजनदार तो है ही । और साथ में इसमें आपके क्षत्रियत्व की भी झलक मिल जाती है कि गोली पीठ में नहीं, छाती पर खाओ । काश, इस गोली से बचने का उपाय भी साथ-साथ बता देते । मगर लोकतंत्र में नारे ही होते हैं । गरीब को तो गोली या जूते खाने ही पड़ते हैं चाहे सिर पर हों या पीठ पर या छाती पर । चाहे दिल्ली में हों या लखनऊ में हों । एक किस्सा सुनाते हैं । तब की बात है जब दलितों से बेगार ली जाती थी । इससे तंग आकर एक बेचारा आत्महत्या करने के लिए कुएँ में जा गिरा । वहाँ एक मेंढक ने उससे जाति पूछी और फिर कहा- चल, मुझे अपने सिर पर बैठाकर कुएँ की सैर करा । गरीब को तो कुएँ में भी बेगार । वैसे आपके लिए यह किस्सा नया नहीं होगा क्योंकि आप भी तो राज-परिवार से हैं ना और ऊपर से दिग्विजय ।

माफ करिएगा सिंह साहब, हम पता नहीं किस झोंक में विषय से बहुत दूर निकल आए । शीर्षक तो हाथ, हाथी और हाथी पाँव से शुरु हुआ था और कहाँ कविता और बेगार को ले बैठे । हमारे हिन्दी में बहुत से पर्यायवाची शब्द होते हैं । हमारे यहाँ गुण, आकार, भावना और विचार के अनुसार भी शब्द बना लिए जाते हैं । इसीलिए हिंदी में इतने पर्यायवाची हैं मगर अंग्रेजी में नहीं है । विष्णु के तो हजार नाम हैं । हम जिस तरह से हाथ से काम करते हैं उसी तरह हाथी अपनी सूँड से काम करता है तो इस सूँड को उसका हाथ मानकर उसका नाम हाथी रख दिया और फिर तो गाड़ी चल निकली जैसे हस्त से हस्ती, कर से करी ।

तो हमें तो हाथ वाले आदमी और सूँड से हाथ का कम लेने वाले हाथी में कोई फर्क नज़र नहीं आता । गिलहरी, खरगोश और कुत्ता अपने अगले पाँवों से हाथ का काम लेते हैं । कभी आपने कुत्ते को मिट्टी खोदते देखा है ? लगता है कोई मजदूर फावड़े से मिट्टी खोद कर फेंक रहा है । सूअर अपनी थूथनी से ही काम चला लेता है । कई विकलांग तो पैरों में कलम पकड़ कर लिखते हैं और परीक्षाएँ भी पास कर लेते हैं । कुत्ता तो अपनी पूँछ से ही सारे भाव व्यक्त कर देता है । इसीलिए ही दिल्ली में कुत्तों की पूँछ काटने पर पाबंदी लगा दी गई है । जाने कहाँ-कहाँ से बेचारे कुत्ते अपना भविष्य सँवारने के लिए दिल्ली आते हैं । और जब पूँछ ही नहीं होगी तो अपनी-अपनी हाई कमांड से कैसे संवाद करेंगे और कैसे रिझाएँगे ? हाथ और हाथी की राजनीति आप जानें । हम तो हिंदी के मास्टर रहे हैं सो शब्दों के चक्कर में पड़ गए ।

इसी शब्द-परिवार से एक बीमारी भी होती है- हाथी पाँव । इसमें बीमार का पाँव हाथी के जैसे मोटा हो जाता है । वैसे वज़न कितना बढ़ता है यह तो कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है । वास्तव में इस बीमारी का मरीज भी किसी न किसी तरह चलता-फिरता और अपना काम करता ही है मगर जब यह बीमारी सरकारों को हो जाती है तो फिर वे कोई भी कदम नहीं उठा पातीं । लोग फरियाद ही करते रहते हैं कि मेरी सरकार, कोई कदम तो उठाओ, कड़ा नहीं तो पिलपिला ही सही मगर उठाओं तो सही । पर कदम है कि उठता ही नहीं । वैसे पैर तो भारी औरतों के भी होते हैं मगर वे भी कदम उठाती ही हैं मगर सरकारों के कदम पता नहीं, कितने भारी हो जाते हैं कि उठते ही नहीं । ऐसे में जनता ही कभी-कभी पकड़ कर उसके कदम उठवाती है । ऐसे में सरकार गिर भी जाती है ।

हमने कभी सुना नहीं मगर जब 'हाथी-पाँव' की बीमारी होती है तो 'हाथी-हाथ' की बीमारी भी होती ही होगी । वैसे बड़े आदमियों का तो क्या हाथ और क्या पैर जो भी भले आदमी पर पड़ जाए तो बस, मामला साफ़ ही समझो । खैर, आप हाथी पाँव के एक मरीज का किस्सा सुनिए । इस बीमारी के कारण उस आदमी का पाँव बहुत मोटा हो गया था । वह जब भी कभी गुस्सा होता तो अपनी पत्नी को कहता- देखा है ना, पाँव ? एक जमा दूँगा तो कचूमर निकल जाएगा । बेचारी डरती रहती । एक दिन उसने कहने की जगह पत्नी को एक लात जमा ही दी । उसके बाद तो पत्नी को पता चल गया कि यह पाँव बस देखने में ही मोटा है । इससे होना-जाना कुछ नहीं । अब तो वह खुद ही पति पर हावी हो गई ।

हमें लगता है कि महँगाई, भ्रष्टाचार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मनमानी के सामने सरकरों की ताकत के 'हाथी-पाँव' का भ्रम भारत में ही नहीं, अमरीका तक में खुल गया है । इसलिए झूठे पाँव पटकने की बजाय जैसे भी कदम उठते हों, उठाना चाहिए वरना बहुत विलंब हो जाएगा ।

२३-११-२०११

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Nov 21, 2011

ब्राह्मण और शंख - मायावती के ढंग


( मायावती ने लखनऊ की एक जनसभा में नारा दिया- ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जाएगा- १३-११-२०११ )

मायावती जी,
जय भीम, जय अम्बेडकर और जय मान्यवर कांसीराम जी । हम एक सेवा निवृत्त ब्राह्मण बोल रहे हैं । पहले भी आपने सोशिअल इंजीनियरिंग के तहत ब्राह्मणों को आपने साथ जोड़ा था । ठीक भी है, कोई माने या नहीं मगर ब्राह्मण भी इस देश का एक दलित ही है यह बात और है कि उसे अन्य दलितों की तरह पीट-पीट कर तो दला नहीं गया बल्कि प्रणाम, पायलागी करके दलित बनाया गया । कोई भी उत्सव, शादी-विवाह, यज्ञ हो ब्राह्मण को भी दलित की तरह है बचा-खुचा और अनुपयोगी सामान ही दिया जाता रहा है जैसे कि कहते हैं कि “सड़ा नारियल डाल होली में; बेकाम ब्राह्मण की झोली में” । ब्राह्मण को भी यही सिखाया जाता रहा है कि- भैया, दान की बछिया के दाँत नहीं देखे जाते । वैसे ब्राह्मण के पास राजपूतों की तरह न तो तलवार रही कि जबरदस्ती छीन लें और न ही व्यापारियों की तरह तराजू कि तोल और भाव दोनों में डंडी मार कर वसूल ले । आपने पहली बार पिछले चुनावों में ब्राह्मणों को दिलासा दिया तो वे आपसे चिपक गए । मगर उस समय भी हमने शंका व्यक्त की थी कि इन भोले-भाले लोगों के साथ छल मत कीजिएगा ।

आपने छल तो शायद नहीं किया होगा मगर क्या किया जाए आपको मूर्तियाँ लगवाने के चक्कर में समय ही नहीं मिला । अब समय मिला है तो आपने कह तो दिया कि गरीब सवर्णों को भी आरक्षण दिया जाएगा । आरक्षण तो जी, जिनका होता है उन्हीं का होता है । कहने की बात और है । यदि आरक्षण से ही बात बनती तो अब तक बहुत कुछ हो गया होता । मगर एक बार आरक्षण पाकर सवर्ण हो चुके लोगों का पेट ही नहीं भरता और अब उन्हीं कुछ लोगों को बार-बार आरक्षण की मलाई खा-खाकर पतले दस्त हो रहे हैं और वे आंदोलनों के रूप में जिला मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक की सड़कों पर पतले दस्त करते फिर रहे हैं ।

दो-अढ़ाई साल पहले अम्बिका सोनी और कपिल सिब्बल ने कहा था कि सभी ग़रीबों को बहुत कम ब्याज पर शिक्षा ऋण दिया जाएगा । आरक्षण तो खैर, संभव नहीं है । आप जानती हैं कि किसी के भी आरक्षण कोटे से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती । राजस्थान में गूजरों के आन्दोलन के समय मीणों को लगा था कि कहीं उनके कोटे में से तो नहीं काट लिया जाएगा सो उन्होंने पहले से ही शोर मचाना शुरु कर दिया तो किसी को उस तरफ देखने का भी साहस नहीं हुआ । तो क्या आप समझती हैं कि किसी और के कोटे में से कुछ खुरचकर आप या केन्द्र सरकार सवर्णों या ब्राह्मणों को आरक्षण दिलवा देंगे । प्रेक्टिकल बात यह है कि आप अम्बिका सोनी और कपिल सिब्बल द्वारा की गई और फिर ठंडे बस्ते में डाली गई योजना को ही चालू करवा दें । सभी ब्राह्मण और मेहनती और ईमानदार सवर्ण खुश हो जाएँगे । पर उसमें यह खतरा है कि कहीं उसका श्रेय केन्द्र सरकार न ले जाए । मगर निश्चिन्त रहिए, यदि आपने वह योजना लागू करवा दी तो लोग उसका श्रेय आपको ही देंगे क्योंकि लोग बैंकों में दो साल से पूछ-पूछ कर यह मान चुके हैं कि वह कोई योजना थी ही नहीं । बस, गरीब सवर्णों को गरीबी के जल में खड़ा रखने के लिए अकबर ने महल का दीया दिखाया था ।



तो आपने नारा दिया है कि 'ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जाएगा' । आप सोचती हैं कि दिल्ली में हाथी नहीं हैं ? हम तो समझते हैं कि सारे हाथी तो दिल्ली में ही बैठे हैं और उनका रंग सफ़ेद है । आप जिस हाथी को दिल्ली भेजना चाहती हैं वह किस रंग का है ? अब रंग से क्या लेना, सफ़ेद हो या नीला, हाथी तो हाथी है । चूहा तो है नहीं जो दो दानों से पेट भर जाएगा । खाना तो मण दो मण ही है, चाहे किसी भी रंग का हाथी हो । लोकतंत्र रूपी दानवीर सम्राट ने इस देश की गरीब जनता रूपी ब्राह्मण को यह हाथी दान में दे दिया और मर गए । अब इस हाथी का चारा जुटाते-जुटाते ब्राह्मण की लँगोटी तक उतर गई है । अब आप उससे शंख बजवाना चाहती हैं ।

शंख बजाने में बहुत जोर लगता है, मैडम । राजा की तो हाथी पर बैठकर सवारी निकलती है पर यह तो ब्राह्मण ही जानता है कि शंख बजाने में कितना जोर लगता है ? आँतें बाहर निकल आती हैं । फूँक ऊपर से ही नहीं नीचे से भी निकलने लग जाती है । कई दिन तक गला दुखता रहता है । व्यापारियों ने एक वक्त का खाना खिला कर ब्राह्मणों से अटूट लक्ष्मी का आशीर्वाद ले लिया । राजा ब्राह्मणों से शंख बजवा कर गद्दी पर सवार हो गए और ब्राह्मण वैसा का वैसा है । उसे शंख बजाने के सिवा कुछ करने लायक छोड़ा भी तो नहीं चालाक लोगों ने वरना जब ब्राह्मण के पास शस्त्र और शास्त्र दोनों थे तब तक न तो कोई उसे उल्लू बना सका और देश भी दुष्टों से बचा रहा । अब जब ब्राह्मण नेताओं का शंख बजने वाला हो गया तब से वह हाथ फैलाए ही घूमता है ।



वैसे ब्राह्मण का काम शंख बजाने का ही रहा है पर वह हमेशा ही चुनावों में शंख बजाने वाला नहीं रहा है । चाणक्य ने विलासी और दुष्ट नन्द का शंख बजा दिया था । परशुराम ने सहस्रार्जुन जैसे डाकू और नीच राजा का शंख बजा दिया था । शंख विजय पर भी ब्राह्मण ही बजाता है तो मरने पर भी शंख ब्राह्मण ही बजाता है । अब ब्राह्मणों के पास अपने शंख नहीं रह गए हैं । वे तो दूसरों के दिए हुए शंख बजा रहे हैं । कहते हैं, भूखा ब्राह्मण जोर-जोर से भजन करता है । अब आप भूखें ब्राह्मणों से शंख बजवा रही हैं । बजाएँगे ये ब्राह्मण शंख, और जोर-जोर से बजाएँगे । मगर आप हर बार इनसे भूखे पेट शंख बजवा कर इनकी फूँक ही नहीं निकलवा दीजिएगा नहीं तो फिर अंतिम समय में भी कोई शंख बजाने वाला नहीं मिलेगा ।

हमने बचपन में ब्राह्मण और शंख की एक कहानी सुनी थी । (कृपया पूरी कहानी पढ़ें, नये ट्विस्ट हैं) एक ब्राह्मण, जैसा कि होना चाहिए, गरीब था और आरक्षण आज की तरह उस समय भी उसके लिए नहीं था । मगर घर तो ब्राह्मणी को चलाना होता था सो एक दिन उसने उसे धक्का देकर घर से निकल ही दिया कि कुछ कमाकर लाओ । अब ब्राह्मण के पास कौन-सा बी.पी.एल. कार्ड था जो सस्ता अनाज ले आता या उस कार्ड को ही गिरवी रखकर सौ-दो सौ रुपए उधार ले आता । बिना सोचे समझे चल पड़ा और चलते-चलते पहुँच गया करुणा के निधि समुद्र के पास और जाप करने लगा । पता नहीं, समुद्र को दया आई या वह ब्राह्मण के जोर-जोर से किए जा रहे जाप के कारण परेशान हो गया सो उसने ब्राह्मण को वरदान माँगने के लिए कहा ।


अब ब्राह्मण कौन-सा 'राजा' की तरह लाख दो लाख करोड़ की गिनती जनता था । उसके यहाँ तो केवल भोजन की समस्या थी सो कहा- हे समुद्र देवता, मुझे और कुछ नहीं चाहिए बस, भोजन का इंतज़ाम कर दीजिए । समुद्र ने उसे एक छोटा सा पद्म नाम का शंख दिया और कहा- दिन में दो बार इसकी पूजा करके भोजन माँग लेना, मिल जाएगा । रास्ते में ब्राह्मण को एक जन सेवक के यहाँ ठहरना पड़ गया । जनसेवक ने ब्राह्मण का बहुत सम्मान किया और धीरे-धीरे बातों-बातों में सब कुछ जान लिया । रात को जब ब्राह्मण सो गया तो उसने उसका वह शंख निकाल लिया और उसकी जगह उसी आकार का एक और शंख रख दिया । अगले दिन ब्राह्मण जन सेवक को धन्यवाद देकर चला गया ।

ब्राह्मण बड़ी अकड़ से घर पहुँचा जैसे कोई घोटालिया नेता जमानत पर तिहाड़ से निकलता है । ब्राह्मणी को बड़े रोब से कहा- जल्दी से पानी गरम कर, नहा-धोकर पूजा करनी है । उसके रोब के सामने ब्राह्मणी से मना करते नहीं बना । ब्राह्मण ने बड़ी अदा से पूजा की और फिर शंख से खाने के लिए निवेदन किया मगर यह क्या ? खाना तो दूर कोई आश्वासन भी नहीं निकला । एक बार, दो बार मगर भोजन नहीं निकालना था सो नहीं निकला । ब्राह्मणी ने फिर ब्राह्मण महाराज को धक्के देकर निकल दिया ।

अब तो ब्राह्मण गुस्से में समुद्र के पास पहुँचा और बोला- मैं तो तुम्हें देवता समझता था, तू तो नेताओं का भी बाप निकला । वे आश्वासन तो देते हैं मगर इस शंख ने तो मनमोहन जी की तरह चुप्पी भी नहीं तोड़ी । समुद्र ने कहा- अब मेरे पास और कुछ तो नहीं है पर यह एक केवल आश्वासन देने वाला शंख है । इसे ले जा और उसी जन सेवक के यहाँ रुकना । शायद वह इसके चक्कर में आ जाए और तेरा वह शंख दे दे और यह ले ले क्योंकि इन दोनों की शक्ल और आकार बिलकुल एक जैसे हैं ।

ब्राह्मण उसी जनसेवक के घर रुका और अब की बार बिना बताए ही शंख निकाल कर उसकी पूजा की । शंख ने जोर से कहा- माँग ब्राह्मण, माँग । क्या चाहिए ? ब्राह्मण ने कहा- महाराज, ब्राह्मण को क्या चाहिए, बस दो रोटी । शंख ने गुस्से से कहा- अरे मूर्ख ब्राह्मण, माँगा तो भी क्या माँगा, दो रोटी । अरे, तू यदि कामनवेल्थ गेम्स की अध्यक्षता माँगता, २ जी स्पेक्ट्रम माँगता तो वह भी मिल जाता । ब्राह्मण ने कहा- ठीक है, महाराज, आपको कष्ट दिया । शांत होइए । अब यहाँ क्या, घर चल कर ब्राह्मणी से पूछ कर ही माँग लूँगा । और जनसेवक से कहा- भक्त, थोड़ा सुस्ता लेता हूँ, थोड़ी देर में जगा देना । सेवक ने शंख अपने हवाले किया और वैसा ही एक और शंख ब्राह्मण से सिरहाने रख दिया । कुछ देर बाद ब्राह्मण अपने घर के लिए चल पड़ा ।

ब्राह्मण के साथ फिर धोखा हुआ । सेवक ने जो शंख रखा था वह एकदम साधारण शंख था । न रोटी देता था और न ही आश्वासन । अब जनसेवक के पास रोटी देने वाला शंख भी था और जनता को बढ़ चढ़ कर झूठे आश्वासन देने वाला शंख भी । रोटी भी उसकी और गद्दी भी उसकी । और ब्राह्मण तो जैसा था वैसा का वैसा ही रहा ।

अब तो दोनों ही शंख आपके पास हैं । अब आप इससे जो चाहे बजवाइए मगर कुछ खाने को तो दीजिए- आधी और रूखी ही सही ।

१४-११-२०११

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Sep 10, 2011

मायावती का निजता का अधिकार

( मायावती विशेष प्लेन से मुम्बई से चप्पलें मँगवाती हैं- असांजे के विकिलीक्स ने खुलासा किया- ५ सितम्बर २०११ )

मायावती जी,
२०१२ के चुनाव को ध्यान में रखते हुए आपके विरुद्ध एक बहुत बड़ा षडयंत्र किया जा रहा है । हमें लगता है कि ब्राह्मणवादी, मनुवादी, कांग्रेस, भाजपा, मुलायम, पुरुषवादी सभी आपके पीछे पड़े हुए हैं । एक तो आप महिला, फिर दलित और ऊपर से कुँवारी । न किसी के मन में दया है और न ममता । दुनिया का तो हमें पता नहीं मगर रज़िया सुलतान को उसी के दरबारियों ने केवल इसलिए षडयंत्र का शिकार बनाया कि वह महिला थी ।

जनसंख्या की दृष्टि से दुनिया के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री और वह भी एक नहीं कई-कई बार । दुनिया में इतने छोटे-छोटे देश हैं कि बीसियों को मिला दो तो जनसंख्या में अपने उत्तर प्रदेश के बराबर न हों । और यह स्थिति तो उत्तरांचल को निकाल देने के बाद है । ऐसी शक्तिशाली, लोकप्रिय और जनाधार वाली नेत्री पर आरोप कौन लगा रहा है ? दो करोड़ की जनसंख्या वाले एक छोटे से देश आस्ट्रेलिया का, ब्रिटेन में शरण लिया हुआ, कैद में पड़ा, एक अविवाहित व्यक्ति । उसे क्या पता कि सेवा क्या होती है ? और कितना बलिदान देना पड़ता है उसके लिए । अरे, उसी में कोई गुण होते तो क्यों ब्रिटेन की जेल में होता । अपने देश में रहता, कोई ढंग का काम करता ।

अब कोई पूछने वाला हो कि यह भी कोई काम है कि आप ढूँढते फिरो कि किसने, किसको, क्या कहा ? कौन कहाँ गया ? किसने, किस होटल में खाना खाया ? किसने, कितने रुपए के मोज़े पहने ? किस को कब दस्त लगे या किसे, कितने दिनों से कब्ज है । जब सोनिया जी की बीमारी के बारे में किसी को कुछ भी जानने का अधिकार नहीं है तो आपकी निजता का इतना उल्लंघन क्यों ? आप अपनी मर्जी की चप्पलें तक नहीं पहन सकतीं ? लोग तो जाने कहाँ-कहाँ से सामान मँगाते हैं और आपने मुम्बई से एक जोड़ी चप्पलें क्या मँगवा लीं कि आसमान टूट पड़ा ।

देश स्वतंत्र होने के बाद की बात है । राजाओं का राज जा चुका था । पोरबंदर की महारानी वहाँ के महाराजा की अति रसिकता के कारण नाराज़ हो गईं तो उन्होंने पोरबंदर का पानी पीना तक छोड़ दिया । उनका पानी उनके पीहर गोंडल से आता था । जयपुर के महाराजा जब इंग्लैण्ड जाते थे तो अपने साथ चाँदी के बड़े-बड़े बर्तनों में भर कर गंगाजल ले जाया करते थे । वहाँ का पानी तक नहीं पीते थे । आपने कभी कोई ऐसा मूर्खतापूर्ण कार्य नहीं किया ।

हमने तो सुना है कि जब लालू जी रेल मंत्री थे तब उनकी भैंस के लिए रोज पटना से हरा चारा कटकर, बिहार केडर के एक प्रशासनिक अधिकारी की देखरेख में, ए.सी. कोच में लदकर दिल्ली आता था । मुलायम सिंह जी जब रक्षामंत्री थे तो वायु सेना के प्लेन से अपने घर से छाछ मँगवाया करते थे । छाछ तो रोजाना की चीज है मगर चप्पलें तो कोई साल दो साल में एक बार खरीदनी होती हैं । हम दिन में दो बार मंदिर जाते हैं और एक बार सब्जी लेने तो भी हमारी चप्पलें दो-तीन साल चल जाती हैं । आप तो प्लेन से आती जाती हैं तो एक कार्यकाल में एक जोड़ी चप्पलें बहुत । जय ललिता जी के पास तो सुना है कोई सात हजार जोड़ी सेंडिल और चप्पलें हैं मगर उन्हें तो कोई कुछ नहीं कहता । यह ब्राह्मण और दलित के बीच भेदभाव है कि नहीं ?

मान लीजिए यदि आप चप्पल लेने मुम्बई जातीं तो भी तो उतना ही पेट्रोल लगता जितना कि अब लगा होगा । यदि आप ट्रेन से जातीं तो यू.पी. के बीस करोड़ लोगों को आप द्वारा मिलने वाली एक दिन की सेवा का नुकसान उठाना पड़ता मतलब कि बीस करोड़ मानव दिवसों का नुकसान । जीवन को ही चार दिन का माना गया है और इतने दिन तो मुम्बई से चप्पल लाने में ही बीत जाएँगे । फिर जनता की सेवा कब करेंगी । यदि बस से बरेली या कानपुर जाओ तो भी एक डेढ़ दिन लग ही जाता है । और फिर जिसने सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है उसे चप्पल खरीदने जैसे छोटे काम में अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए । गाँधी जी सूत कातने जैसे छोटे-छोटे कामों में ही लगे रहे इसलिए देश के लिए कुछ खास नहीं कर पाए । जीवन भर सूत कात कर भी दो-चार ढंग के सूट नहीं सिलवा सके । ऐसे ही अधनंगे ब्रिटेन गए और वहाँ की जनता के बीच भारत की इज्जत का कचरा करवा आए । आप जैसी रुआब वाली कोई हस्ती जाती और ब्रिटेन के सम्राट को हड़काती तो बच्चू के होश ठिकाने आ जाते और फटाफट आज़ादी दे देता । और ऊपर से माफ़ी माँगता सो अलग । अब बताइए कि आपका चप्पल लेने जाना सस्ता और समझदारी का काम है कि आपका चप्पल मँगवाना ?

अब यह हमारी तरह कोई रिटायर्ड मास्टर का चप्पल खरीदना या उसकी मरम्मत करवाना थोड़े ही है कि कहीं भी पटरी के किनारे उकड़ू बैठ कर हो गया । मान लीजिए कि हमारी नई चप्पल दो दिन काटे भी तो क्या फर्क पड़ता है । मगर प्रधान मंत्री के जूते काटने लगें या किसी मुख्यमंत्री की चप्पलें काटने लगें तो वहाँ की सारी जनता लंगड़ाने लग जाएगी । और फिर आज के ज़माने में आदमी के गुणों को समझने की फुर्सत किसे है ? आजकल तो आदमी जूतों और कपड़ों से ही तो पहचाना जाता है । वैसे जहाँ तक जूतों और चप्पलों का प्रश्न है लोग अपने प्रिय नेता को जब चाहे माला बनाकर पहनाने को तत्पर रहते हैं या फिर पास जाने की सुविधा न मिलने पर दूर से ही प्रक्षेपित कर देते हैं । ऐसे अवसरों पर प्राप्त होने वाले जूते या चप्पल प्रायः एकवचन में ही होते हैं । इनका द्विवचन के बिना उपयोग भी तो नहीं किया जा सकता और फिर इनकी क्वालिटी प्रायः अच्छी नहीं होती ।

अपने देश में तो शाहजहाँ नामका एक बादशाह हुआ है जो आज से तीन सौ बरस पहले बीस करोड़ की कुर्सी पर बैठता था जो आज के हिसाब से एक लाख करोड़ की होगी । आपने एक जोड़ी चप्पल मँगवा लीं तो गुनाह हो गया । और फिर यह भी नहीं कि आपने कोई वैसे ही चप्पलें उठवा ली हों जैसे कि कोई पुलिस वाला सड़क के किनारे किसी ठेले से केले उठा कर खा जाए । बाकायदा पैसे दिए हैं । नेता होने का यह मतलब तो नहीं कि आदमी अपनी पसंद की चप्पलें भी नहीं पहन सके । अब आप देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री क्या ममता या मेधा पाटकर की तरह से हवाई चप्पल फटकारती अच्छी लगेंगी ?

जहाँ तक दुनिया की बात है तो आधे से ज्यादा पागल है । एक असांजे के लिए ही क्या दिमाग खराब करना । कितनों को पागलखाने में डालेंगे ? लोगों का क्या, कुछ काम तो है नहीं, बस निठल्ले बैठे बातें बनाते रहेंगे । और कुछ नहीं तो दिल्ली में बैठकर अनशन करने लग जाएँगे । अरे भाई, यदि खाने को रोटी नहीं है तो बताओ । बी.पी.एल. कार्ड बनवा देंगे । इनकी बातें मानने लगे तो चल लिया देश । सुरक्षित हो लिया लोकतंत्र । इनकी बातें मानने की जरूरत भी नहीं है । त्रेता में राम ने इनकी बातें मानी तो क्या हुआ ? सब जानते हैं । बड़ी मुश्किल से चौदह बरस का बनवास काट कर कहीं सुख के दिन आए थे कि गर्भवती पत्नी को वन में भेजना पड़ा । आप इन असान्जों पर ध्यान न दें । यह तो चाहता ही यह है कि आप इसे आगरे के पागलखाने में डाल दें तो यह ब्रिटेन की जेल से छूटे और फिर यहाँ के डाक्टरों से मिल कर अस्पताल में ही मज़े करे जैसे कि अपने यहाँ तरह-तरह के भैया और पप्पू और साधू जेलों में जन्मदिन मनाते हैं, कैबरे करवाते हैं, मोबाइल से अपना धंधा चलाते हैं । इसने तो अमरीका के बारे में जाने कितने लाख पेज फोटो स्टेट करके भेजे थे ? कुछ हुआ क्या ? लोकतंत्र में ऐसी छोटी-मोटी आतिशबाजियाँ होती ही रहती हैं । होनी भी चाहिएँ । इससे माहौल बना रहता है वरना तो लोगों को पता भी नहीं चलता कि कौन कब मर गया या कौन कब, कहाँ का मुख्यमंत्री बन गया ? जिस अभिनेत्री के बारे में कुछ भी नहीं छपता उसे फ़िल्में मिलनी बंद हो जाती हैं ।

और भी एक बात लाया है यह असांजे । कहता है कि आप खुद खाने से पहले कुछ आदमियों को खाना चखावाती हैं कि कहीं खाने में ज़हर तो नहीं है । दोष देखने वालों को क्या कहा जाए । बड़े आदमी केवल अपने लिए ही नहीं जीते । वे पहले चार आदमियों को खिला कर खाते हैं । ब्राह्मण खाने से पहले दो-चार ग्रास कुछ अछूता निकालते हैं वैसे ही आप खाने से पहले यदि दो आदमियों का पेट भरती हैं तो यह आलोचना की बात हो गई ? आज तक मरा है क्या कोई आपके खाने में से खाना खाने से ? आप उन लोगों में से नहीं हैं जो अपना खाना खाने का खर्च बचाने के लिए किसी गरीब के घर जा धमकें और बेचारे का किसी तरह से जुटाया खाना चट कर आएँ ।

और कहा गया है कि जो कुछ आदमी अपने हाथ से दान कर जाता है वही उसके साथ जाता है । तो आप तो वैसा भी कुछ नहीं कर रही है कि जनता के पैसे से अपने लिए स्वर्ग में कुछ जमा करवा रही हैं । जहाँ तक बैंक बैलेंस की बात है या मकान की बात है या चप्पलों का सवाल है तो ये क्या आप अपने साथ ले जाएँगी ? कितने हैं जो जनता की सेवा के लिए ब्रह्मचर्यव्रत धारण करते हैं ? लोग तो सरकारी खर्चे पर बच्चों का उत्पादन कर रहे हैं । आपके तो कोई बालबच्चे भी नहीं हैं जो आपके पीछे से भोगेंगे यह सब । जो कुछ है वह सब इसी देश में रह जाएगा । इसी जनता के काम आएगा । और वैसे भी मरने के बाद जूते-चप्पल ही क्या, मृतक का सारा सामान ही दान कर दिया जाता है

अब पता नहीं, लोग क्या सोच कर आपकी आलोचना कर रहे हैं । हमारी तो समझ में आता नहीं । आप तो गौतम बुद्ध, साहू जी महाराज, अम्बेडकर जी, कांसीराम जी का नाम लेकर इसी तरह से निःस्वार्थ भाव से, बिना एक भी पल फालतू के कामों में व्यर्थ किए, लगी रहिए सेवाकार्य में । बड़े भाग्य से मिलता है जनसेवा का अवसर । वैसे भी जनता तो पैदा ही सेवा करवाने के लिए होती है । आप नहीं करेंगी तो कोई और यू.पी. की जनता का 'कल्याण' करने के लिए 'मुलायम' होकर 'अमर' हो जाएगा । तो फिर आप ही क्या बुरी हैं ।

६ सितम्बर २०११

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Aug 29, 2011

संविधान संरक्षक, संत शिरोमणि, साधू लालू प्रसाद यादव



लालू जी,
लोग भले ही आपको घोटालिया, भ्रष्ट, चाराचोर, परिवारवादी - कुछ भी कहें मगर हमारी निगाह में तो आप 'साधू' हैं । वैसे 'साधू' में कुछ लोग 'उ' ह्रस्व लगाते हैं, तो कुछ दीर्घ । पर मात्रा से क्या होता है ? मात्रा तो लगाने वाले पर निर्भर है- छोटी लगाए या बड़ी । असली मात्रा तो गुणों की होती है । 'साधू' में और किसी भी चीज की मात्रा चाहे कम हो मगर ज्ञान, गुण, गरिमा और जिज्ञासा की मात्रा कम नहीं होनी चाहिए । सो आपमें ये चारों गुण पर्याप्त मात्रा में हैं । कबीर ने भी अपने दोहे में 'साधू' लिखा है-


साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे थोथा देय उड़ाय ।।

इस दृष्टि से हमें आप सच्चे 'साधू' नज़र आते हैं भले ही लोगों ने आपके साले साहब को 'साधू' के नाम से प्रसिद्ध कर रखा है । यदि उसमें कोई साधूपना सचमुच में है तो वह आपके संरक्षण, संगति और सत्कर्मों का ही प्रभाव है ।

आपने अपने 'साधूपने' का प्रत्यक्ष प्रमाण संसद में अन्ना हजारे के आन्दोलन पर विचार व्यक्त करते हुए दिया । जब आप भाषण दे रहे थे तो श्रोता ऐसे सुन रहे थे जैसे कि अर्जुन भगवान कृष्ण से गीता का उपदेश सुन रहे हों । किसी के मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी । सब आपके वचनामृतों का पान कर रहे थे । किसी ने भी कोई विरोध नहीं किया क्योंकि आपके आप्त वचनों में विरोध करने जैसी कोई बात थी ही नहीं । जब कभी मंत्रमुग्ध सांसदों को थोड़ा-सा होश आता था तो मेजें थपथपा कर आपका समर्थन करते थे । भले ही हम नगरपालिका के वार्ड मेंबर तक भी कभी नहीं रहे पर संसद के कई अधिवेशनों को हमने दर्शक दीर्घा से देखा है । बहुत से चुनाव भी करवाए हैं और बच्चों को नागरिक शास्त्र भी पढ़ाया है मगर ऐसी अद्भुत, निर्मल, सकारात्मक एकता और शालीनता संसद में कभी देखने को नहीं मिली ।

भले ही कुछ निंदक संसद को चोरों का अड्डा कहें, आँकड़ेबाज़ कहें कि संसद में आधे से ज्यादा हिस्ट्रीशीटर और अभियुक्त हैं मगर हमें तो उस दिन का अधिवेशन देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कि नेमिषारण्य में भागवत कथा हो रही हो । सारे संत लोभ मोह, स्वार्थ, सुख त्याग कर केवल लोकतंत्र, संसद, संविधान की ही चिंता में मुग्ध थे । ठीक भी है - ए.राजा, कलमाड़ी, साधू यादव, पप्पू यादव, सुखराम, फूलन देवी और आप जैसे संतों ने जिस लोकतंत्र, संविधान और संसद को अपने खून पसीने से सींचा है उसे एक अन्ना हजारे जैसे सिरफिरे आदमी के कारण नष्ट-भ्रष्ट और ध्वस्त तो नहीं होने दिया जा सकता ना ।

अन्ना हजारे जैसे संविधान, संसद और लोकतंत्र के शत्रुओं से तो आप और संसद में बैठे सारे संत एकजुट होकर निबटेंगे ही पर हमने आपको शुरु में ही 'साधू' शब्द से संबोधित किया था उसकी बात तो भूले ही चले जा रहे हैं । साधू की सबसे बड़ी पहचान यही होती है कि वह व्यर्थ बातों को छोड़ कर केवल सार को ही ग्रहण करता है । अन्ना ने कितनी ही अनर्गल बातें कीं मगर आपने उसमें से एक काम की बात छाँट ली कि डाक्टरों को इस बात की जाँच करनी चाहिए कि चोहत्तर बरस का एक बूढ़ा आदमी कैसे बारह दिन तक भूखा रह सकता है ?

वैसे भूख बहुत बुरी होती है । कहते हैं 'भूख में किवाड़ पापड़' । हमारी दादी बताया करती थी कि जब संवत १९५६ में अकाल पड़ा तो भूखे लोग पेड़ों के छिलके तक खा गए । हमें तो पता नहीं पर अपनी सत्तर साल की छोटी सी उम्र में इतना तो हमने भी देखा है कि भूख से पीड़ित जनसेवकों ने भूख मिटाने के लिए सीमेंट, चारा, कोलतार, ब्लेक-बोर्ड, चाक, बिजली के खम्भे, पत्थर, गिट्टी जैसी न खाने योग्य वस्तुएँ खाकर भी किसी तरह काम चला लिया मगर कभी किसी सड़क पर चलते मनुष्य, कुत्ते-बिल्ली को पकड़कर खाने जैसा हिंसक काम नहीं किया ।

वैसे भूख ही इस दुनिया में सबसे बड़ी बीमारी और समस्या है । लोग स्वर्ग इसीलिए जाना चाहते हैं कि वहाँ भूख-प्यास का चक्कर नहीं है । इस 'भूख' से लड़ने के लिए अन्ना हजारे ही यह 'अनशन-कला' देश हित में लाभदायक हो सकती है । आपके अलावा और किसी सांसद ने इस 'अनशन कला और विज्ञान' के महत्त्व को नहीं समझा । आपने इस सारे धुआँधार में से 'सार' को निकाल लिया । हमने आपको ऐसे ही न 'साधू' थोड़े कहा है ? यदि देश के सभी बी.पी.एल. कार्डधारी महिने में बारह क्या, आठ दिन भी सफलतापूर्वक अनशन कर सकें तो सोचिए नरेगा, सस्ता अनाज और मध्याह्न भोजन का कितना अन्न ‘सेवकों’ के खाने के लिए बच जाएगा ? सरकार सस्ता अन्न विदेशों को निर्यात करके कितनी विदेशी मुद्रा कमा सकेगी ? फिर शायद कोई भी सेवक कोई अखाद्य वस्तु खाने को विवश नहीं होगा ।

अन्ना ने अपनी इस 'भूख भगा तकनीक' का रहस्य ब्रह्मचर्य को बताया है । पर हमें लगता है कि वे सच छुपा रहे हैं । लगता है कि वे गुपचुप इसका पेटेंट करवाएँगे । हमारा तो मानना है कि जब कोई व्यक्ति किसी महान कार्य में व्यस्त हो जाता है तो वह सरलता से भूख प्यास को जीत लेता है । इसीलिए हमने कई-कई बीवियों और दसियों बच्चे वाले नेताओं के फोटो देखें है मगर उनमें वे कहीं भाषण दे रहे हैं, कहीं उद्घाटन कर रहे हैं, कहीं साफा पहने हुए हैं, कहीं शिलान्यास कर रहे हैं । नेताओं के बहुत कम फोटो हमने देखे हैं जिनमें वे खाना खा रहे हों । यदि कभी भूले से खाना खाते भी हैं तो ऐसे जैसे कि भगवान शबरी के बेर चख रहे हों ।

अन्ना की इस तकनीक का पता तो जब चलेगा, तब चलेगा मगर हमारा मानना है कि रक्षामंत्री एंटनी और वित्तमंत्री प्रणव मुकर्जी से कह कर अन्ना की पेंशन अभी से तीन चौथाई कम करवा दी जानी चाहिए क्योंकि उनके न तो बीवी है और जब बीवी नहीं है तो बाल-बच्चे भी नहीं हैं । और फिर बड़े आराम से महिने में आठ-दस दिन भूखे भी तो रह सकते हैं ।

वैसे जहाँ तक तकनीक का सवाल है तो तकनीकें तो आपके पास भी कम नहीं हैं । राबड़ी जी ने भैंस का दूध और सब्जियाँ बेचकर बच्चों को मेयो कालेज में पढ़ाया और दस-बारह बच्चों को भर पेट खाना खिलाया और चुनाव के लिए भी खर्चा जुटाया । ज़रूर आपने भैंस की कोई ऐसी नस्ल विकसित की होगी जो कामधेनु की तरह दूध क्या, सब कुछ दिए ही चली जाती है । अच्छा हो कि आप भैंस की ऐसी नस्ल विकसित करने की तकनीक देश को मुफ्त में उपलब्ध करवा दें जिससे सभी दूधिए अपने बच्चों को मेयो कालेज में पढा सकें और राजनीति करने के लिए चुनाव का खर्चा जुटा कर देश की सेवा भी कर सकें । इसी तरह से पेट्रोल की समस्या से जूझ रहे देश को उस तकनीक से भी अवगत करवा दें जिसमें एक स्कूटर हरियाणा से चार भैसों को पटना ले जा सके ।

वैसे तो भुखमरी से जूझ रही दुनिया के लिए भूख मिटाने या भगाने या अनशन की तकनीक ज्यादा ज़रूरी है मगर अब भी कुछ ऐसे सेवक हैं जिनके पास अनाप-शनाप पैसा है । वे खाने के अलावा उस पैसे का कोई उपयोग नहीं जानते । हाजमोला और दशमूलारिष्ट का सेवन करने के बाद भी पैसा है कि निबट ही नहीं रहा है । इसलिए अच्छा हो कि आप वह तकनीक ऐसे नेताओं के लिए मुफ्त में उपलब्ध करावा दें जिससे आपके कार्यकाल में एक मुर्गी एक दिन में आठ सौ रुपए का खाना खा लेती थी जो कि आज के हिसाब से कोई पाँच हज़ार रुपए का बैठता होगा । और उसे अजीर्ण भी नहीं होता था ।

खैर, ये तो छोटी बातें हैं । गरीब हो या अमीर खाना-पीना तो चलता ही रहता है । सबसे बड़ी बात आपने जो उठाई वह है संसद और संविधान की गरिमा की । लोगों ने तमाशा समझ रखा है । उन्हें पता नहीं किस तरह शहीदों ने अपने भारत को आज़ादी दिलवाई और किस तरह उस समय के महान नेताओं ने यह संविधान बनाया और आज, कैसे आप जैसे सेवाभावी नेता जाने कहाँ-कहाँ से पेट काट कर पैसे जुटाकर, सारी सुख-सुविधाएँ छोड़कर, अपने परिवार के सारे सदस्यों को इस पुनीत कार्य में लगाकर उस संविधान की रक्षा के लिए चुनाव लड़ते हैं, यह बात सरकारी नौकरी करने वाले, छोटा-मोटा व्यापार करने वाले, किसान मज़दूर क्या समझेंगे ? इन्हें इतनी बड़ी बातों की खबर ही नहीं और न ही इतना सेवा-भाव । यह तो नेता ही जानता है कि सेवा धर्म कितना कठिन है ? कौन है जो कलमाड़ी, ए.राजा. कनिमोझी, सुखराम और आपकी तरह जनता की सेवा करते हुए जेल के कष्ट भोगता है ? अन्ना हजारे, किरण बेदी सब मजे से अपनी पेंशन पेल रहे हैं और भाषण झाड़ रहे हैं । शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने कौन सी अपनी प्रेक्टिस छोड़ दी । सब अपना धंधा कर रहे हैं । ये तो आप, मुलायम और मायावती जैसे लोग हैं जो कोई अपनी खेती, कोई मास्टरी, कोई डेयरी छोड़कर देश की सेवा कर रहे हैं और संविधान की रक्षा कर रहे हैं वरना ये अन्ना हजारे जैसे लोग कब के संसद भवन की ईंटें उठा ले जाते और संविधान की किताब को रद्दी में बेच देते ।

सबसे अच्छी बात यह देखने को मिली कि संविधान की रक्षा के लिए सारे सांसद एकमत दिखाई दिए । ठीक भी है, ये आलतू-फालतू लोग और मनमोहन जी, अरुण जेतली, गुलाम नबी आज़ाद जैसे राज्य सभा के थ्रू दंड पेल रहे लोग क्या जानें कि चुनाव के खर्चे, समस्याएँ और खुराफातें क्या होती हैं, संविधान और लोकतंत्र क्या होता है ? और फिर कितना बड़ा उद्योग है संविधान की रक्षा करना ? लाखों पुलिस, लाखों नेता, करोड़ों चमचे, गुंडे, अपराधी इस काम में लगे हुए हैं । यदि संविधान को कुछ हो गया तो ये सब क्या खाएँगे, कहाँ जाएँगे और सबसे बड़ी बात यह कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र होकर, सबसे धनवान लोकतंत्र अमरीका को क्या मुँह दिखाएँगे कि हम इतने सेवक मिल कर, इतनी बड़ी पुलिस के होते हुए भी संविधान की रक्षा नहीं कर सके ।

यदि अन्ना जैसे लोगों को अभी से नहीं रोका गया तो कल को कोई भी पूछने लग जाएगा कि फलाँ मंत्री या फलाँ नेता दिन में पाँच बार धोबी के धुले कुर्ते-पायजामे कहाँ से बदलता है ? चालीस बरस ईमानदारी से नौकरी करने वाले सेवा निवृत्त कर्मचारी के पास एक साइकल भी नहीं है और एक सरपंच कैसे पाँच सौ रुपए मानदेय के बल पर जीप में घूमता है और कैसे बिना कोई नौकरी किए ठाठ से रहता है ?

ऐसे में कोई नहीं आने वाला संविधान की रक्षा करने । फिर हम ऊपर जाकर गाँधी, नेहरू, अम्बेडकर को क्या मुँह दिखाएँगे ? इसलिए भले ही ऐसे लोगों को आधी रात को डंडे मारकर खदेड़ना पड़े, किसी के पीछे भी इनकम टेक्स वाले, सी.बी.आई. वाले लगाने पड़ें, पद या पैसे के लालच की मेनका भेज कर किसी भी विश्वामित्र की तपस्या भंग करवानी पड़े, मगर संविधान की रक्षा ज़रूर होनी चाहिए ।

आमीन ।

२८ अगस्त २०११

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Aug 23, 2010

मनमोहनजी का डबल धमाका

मनमोहन जी,
सत् श्री अकाल । बधाई हो । आप सोच रहे होंगे कि हम किस बात की बधाई दे रहे हैं जब कि इस समय तो आफतें ही आफतें चल रही हैं । कश्मीर में दुनिया भर के पैकेज देने के बाद भी लोग हैं कि मान ही नहीं रहे हैं । पहले कश्मीरी पंडितों को निकाल बाहर कर दिया और अब सिक्खों को कश्मीर से निकालने की धमकियाँ दे रहे हैं । कल को कहेंगे कि सारे हिंदू भारत छोड़कर चलें जाएँ । अब यह तो नहीं हो सकता कि देश की सारी जी.डी.पी. ही इन्हें दे दें और तब भी ये नहीं मानें । उधर अमरीका कह रहा है कि वार्ता करो और इधर ये अलगाववादी हैं कि वार्ता करने जाओ तो बड़ी असभ्यता से मना कर देते हैं । बड़ी आफत में जान है । इधर दिल्ली में राष्ट्र मंडल खेलों का तमाशा । टाइम नजदीक आ रहा है और तैयारी कुछ नहीं । भाई लोगों ने काम की बजाय बिल बनाने, ठेके देने, कमीशन खाने में ही सारा समय निकाल दिया । आदत के मुताबिक ३१ मार्च रात १२ बजे तक का टाइम समझ लिया जो कि बिल पास करने की डेड लाइन है । माल भले ही आए या नहीं । अब खेल वाले बिल देखेंगे या खेलने की जगह चाहेंगे । स्टेडियमों में पानी टपक रहा है । कहीं ऐसा तो नहीं है कि उन्होंने टेनिस की जगह स्विमिंग पूल बनाने का विचार कर लिया हो । इधर संसद में लालू छाया मंत्रीमंडल की तर्ज पर प्रधान मंत्री बन बैठे हैं । सांसद तनख्वाह के मामले में अम्बानी से तुलना करने लग गए हैं ।

जब राजनीति में आ ही गए हैं तो इन सब खुराफातों और दुष्टों से जूझना भी पड़ेगा ही । बच कर विदेश यात्रा पर भी कितना जाया जा सकता है । जरदारी बाढ़ से बच कर ब्रिटेन चले गए मगर कितने दिन । आखिर आना ही पड़ा । सो आप इन बातों की चिंता ना करें और हमारे बधाई देने के कारण को पढ़ें और आनंदित हों । बाराती को, लड़की वाले की चिंता न करके, जब तक टाँगों में जान है भंगड़ा पाते रहना चाहिए ।

सो भाई जान, बधाई के दो कारण हैं- पहला यह कि आपको खुशवंत सिंह जी ने सबसे अच्छा प्रधान मंत्री मान लिया है और दूसरा वाशिंगटन की पत्रिका ने आपको 'दुनिया के लीडरों का चहेता लीडर' का खिताब दिया है । मतलब कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों मान्यताएँ एक दिन के आगे-पीछे । १८ अगस्त को खुशवंत जी वाली और १९ को वाशिंगटन वाली । हमें अखबार से एक दिन बाद मिली हैं, प्रेस वालों को एक दिन पहले और आपको हो सकता है उससे भी पहले मिल गई हों । पर आप इतने संकोची हैं कि किसी को बताया भी नहीं वरना लोग तो जरा सी बात को भी आपने खर्चे से अखबारों में छपवाते हैं । एक सज्जन अपने खर्चे से सिंगापुर घूमने गए और वहाँ से आने पर अपने ही खर्चे से समाचार छपवा दिया कि 'अमुक जी का सिंगापुर घूम कर भारत आने पर हार्दिक स्वागत' । खैर, अब हमारी तरफ से बधाई स्वीकार करें ।

पहले खुशवंत सिंह जी वाली बात- उन्होंने अपने कालम में लिखा है कि १९९९ में जब मनमोहन सिंह जी ने दक्षिण दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़ा तो उनके दामाद मुझसे दो लाख रुपए उधार ले गए थे जो चुनाव हार जाने के दो-चार दिन बाद ही मनमोहनजी ने खुद जाकर वापिस कर दिए । लेन-देन नकद हुआ था । मतलब कि कोई सबूत नहीं । ऐसे तो हम भी जैन डायरी वाले सज्जन की तरह कह सकते हैं कि हमने भी राव साहब को सरकार बचाने के लिए खर्च किए गए चार करोड़ उधार दिए थे मगर तब चिदंबरम जी हमारा गला पकड़ लेते कि इतने रुपए कहाँ से आए ? और इतनी आमदनी थी तो टेक्स क्यों नहीं दिया ? पर खुशवंत सिंह जी की बात और है वे जो कुछ भी लिख देते हैं वह छप ही जाता है क्योंकि इलस्ट्रेटेड वीकली के ज़माने के संपर्क हैं । उनके पास एक-दो लाख रुपए ऐसे ही पड़े रहना कोई बड़ी बात नहीं ।

हम तो दोनों को ही महान मानते हैं । उन्होंने माँगते ही दे दिए और आपने जल्दी ही वापिस कर दिए । हमें लगता है कि आपको अंदाज हो गया था कि जीतना मुश्किल है सो आपने फालतू पैसा खर्च नहीं किया । वैसे हम तो कहते हैं कि चुनाव क्या आदमी को फ़ार्म भरने का भी पैसा खर्च नहीं करना चाहिए । आदमी चुनाव जीतने के लिए जितना पैसा खर्च करेगा, चुनाव जीतने के बाद जल्दी से जल्दी उस पैसे को वसूल करना चाहेगा । चुनाव में ज्यादा पैसा खर्च करने वाले ही ज्यादा भ्रष्टाचार करते हैं । इसीलिए आपने बिना खर्च का राज्य सभा वाला रास्ता अपनाया । हमें तो लगता है कि आपने चुनाव लड़ने के लिए पार्टी से मिला पैसा भी खर्च नहीं किया होगा और वापस लौटा दिया होगा ।

खुशवंत सिंह ने तो केवल लिखा और पढ़ा है पर हम तो उस समय आपके चुनाव क्षेत्र में थे- सदर बाज़ार दिल्ली केंट में । आप सदर बाजार वाले गुरुद्वारे में मत्था टेकने के लिए आए थे और उसके बाद पालम एयर पोर्ट की तरफ जाने वाली सड़क पर ट्रक में खड़े होकर जा रहे थे । आपके पीछे छः-सात लोग और खड़े थे । हमें लगा कि आप चुनाव तो नहीं जीतेंगे पर हम आपकी सादगी पर जरूर फ़िदा हो गए । वह ट्रक भी हमें लगता है कि बिना पैसे का होगा जो किसी काम से इधर आया होगा और उसने आपको लिफ्ट दे देगी होगी । भले ही आप चुनाव न जीतें हों पर आपका अपने चुनाव का विश्लेषण बिलकुल ठीक था । अच्छा है बिना बात पैसा खर्च नहीं किया वरना फिर कैसे लौटाते ।

नहीं खर्च किया तो तत्काल लौटा दिया और ईमानदार व्यक्ति का खिताब पा लिया । यदि खर्च कर देते तो लौटाने में कुछ टाइम तो लग ही जाता । तब हो सकता है कि यह ख़िताब न मिलता । मगर खुशवंत जी ने इस बात को इतना बड़ा कैसे मान लिया ? लगता है कि उनके नेताओं के बारे में विचार अच्छे नहीं है । या तो पहले भी कोई नेता उनसे पैसे ले गया होगा और लौटाए नहीं होंगे । क्या किसी नेता की ईमानदारी केवल दो लाख रुपए के बराबर ही है ? आप पर तो उन्हें विश्वास रहा होगा तभी दे दिए बिना किसी लिखा-पढ़ी के । वरना बिना कोई चीज गिरवी रखे कौन देता है । देगा तो चार गवाह और बनाएगा । चाणक्य नीति में भी कहा गया है कि किसी को दो पैसे भी दो तो किसी न किसी बहाने चार लोगों के सामने दो और लौटने वाले के लिए भी कहा गया है कि चार लोगों के सामने लौटाओ । पर यहाँ तो दोनों तरफ विश्वास था सो किसी तरह की लिखा-पढ़ी की जरूरत नहीं पड़ी । पर जब इतना ही विश्वास था तो अब किस लिए उस गड़े मुर्दे को उखाड़ रहे हैं ? आपकी ईमानदारी या अपनी दरियादिली दिखाने के लिए ?

खुशवंत सिंह जी की इस महानता और दरियादिली के संदर्भ में एक किस्सा याद आ गया । पहले देश में बहुत गरीबी हुआ करती थी । है तो अब भी मगर दिल्ली में बैठ कर या सेंसेक्स का चश्मा लगाने के बाद दिखाई नहीं देती । सो उन दिनों लोगों के पास छोटी-मोटी चीजें भी नहीं हुआ करती थीं और उन्हें माँग कर काम चला लिया जाता था । इसे बुरा भी नहीं माना जाता था । शादी में भी बाराती तो क्या दूल्हे तक के लिए लोग कपड़े माँग कर काम चला लिया करते थे । सो ऐसे ही युग में एक ठाकुर साहब थे । कहने को ठाकुर मगर मूँछों के अलावा और कोई बड़ी संपत्ति नहीं थी । एक बार ससुराल में कोई शादी थी । सर्दी का मौसम और ठाकुर साहब के पास कम्बल भी नहीं । उनके एक पड़ोसी मित्र नाई के पास कम्बल था । था तो पुराना ही, किसी जजमान का दिया हुआ, मगर था तो । सो ठाकुर साहब ने नाई को बारात में चलने का निमंत्रण दिया, कम्बल उधार देने की शर्त पर ।

ठाकुर साहब अपने एक मरियल से टट्टू पर सवार होकर, कम्बल कंधे पर रख कर ससुराल चले । नाई ठाकुर के साथ पैदल चला । कारण दो थे- एक तो टट्टू में इतना दम नहीं था कि दो का बोझा उठा लेता । दूसरा नाई ठाकुर साहब के साथ कैसे बैठ सकता था । रस्ते में मिलने वाले लोग पूछ ही लिया करते थे कि कौन हैं, किस गाँव के हैं, कहाँ जा रहे हैं ? आजकल की तरह नहीं कि पूछ लिया तो प्राइवेसी का हनन हो गया । आज कल तो आतंकवादियों तक के मानवाधिकार हो गए भले ही वे मानव की श्रेणी में नहीं आते हों । सो लोग पूछते- कहाँ से आ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं । ठाकुर साहब रुतबे के मारे सो जवाब देता नाई । कहता- भैया, फलाँ गाँव जा रहे हैं, ठाकुर साहब साहब के साले की शादी है । यह टट्टू ठाकुर साहब का है और इन्होंने जो कम्बल अपने कंधे पर रख रखा है वह हमारा है । साहब, साहब करते हुए भी अंत में ठाकुर साहब की इज्जत का कचरा कर देता । ठाकुर साहब अपने ससुराल में अपनी ऐसी इज्ज़त अफ़जाई नहीं चाहते थे सो कंबल वापिस देकर नाई को विदा कर दिया ।

सो आपकी ईमानदारी की चर्चा करते हुए भी खुशवंत सिंह जी ने आपकी अध्यापकी, रिजर्व बैंक की गवर्नरी, वर्ल्ड बैंक की साहबी और प्रधान मंत्रित्व की, मात्र दो लाख रुपए और वे भी दस-बीस दिन के लिए उधार देकर, मिट्टी कर दी । उन्हें पता नहीं कि रिजर्व बैंक में करोड़ों-अरबों रुपए ऐसे ही जमीन पर पड़े पैरों में रुळते रहते हैं । सो इसे कहते हैं ‘नादाँ की दोस्ती, जी का जंजाल’ । हमें तो लगता है कि आपके दामाद साहब ने रुपए आपको बताए बिना ही उधार ले लिए होंगे कि चुनाव में इतना खर्चा तो एक पञ्च का ही हो जाता है । वरना यदि वे आपसे पूछ लेते तो आप कभी भी उधार नहीं लेते । कुछ अपवादों की बात हम नहीं करते, पर अधिकतर मास्टर अपनी चादर जितने ही पैर फैलाते हैं । हमारे पिताजी कहा करते थे कि किसी से कभी उधार मत लेना और यदि कभी ऐसी मजबूरी आ भी जाए तो जितना जल्दी हो सके चुका देना, नहीं तो अगले जन्म में कोल्हू का बैल बन कर चुकाने पड़ेंगे ।

आपके ख्याल भी कर्ज के बारे में हमारे पिताजी जैसे ही हैं । अच्छी बात है । मगर यह क्या बात है कि जब आप वित्त मंत्री बन गए तो घाटे का बजट बनाने लगे । एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि यह घाटा कैसे पूरा होगा । हमने तो बी.ए. तक ही अर्थशास्त्र पढ़ा था और पास भी राम-राम करके हुए थे सो आगे नहीं पढ़ा । और प्रेक्टिकल में तो कभी अर्थशास्त्र को नहीं आजमाया । सारी तनख्वाह लाकर पत्नी को दे दिया करते थे, वह जाने और उसका अर्थशास्त्र जाने । हमें तो राजस्थान के पहले मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री हीरालाल शास्त्री की याद है । उन्होंने जब बजट बनाया तो घाटा तो दूर बचत ही दिखाई । क्या पता अब मुक्त अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण के कारण यह नियम बन गया हो कि प्रत्येक देश को घाटे का ही बजट बनाना पड़ेगा ।

बधाई की दूसरी बात कि वाशिंगटन की एक मैगजीन 'न्यूज़ वीक' के अनुसार आप नेताओं के चहेते नेता हैं । बुश साहब भी आपको बहुत मानते थे । ओबामा जी ने तो आपको 'गुरु' कह कर संबोधित किया था । उनका कहना है कि जब आप बोलते हैं तो दुनिया सुनती है । और इसी चक्कर में हजारों करोड़ का परमाणु समझौता कर लिया । जब टोनी ब्लेयर भारत आए थे तो उन्होंने कहा था कि वे बार-बार भारत आना पसंद करेंगे । और चार हजार करोड़ का बिजनेस कर गए । अब नए ब्रिटिश प्रधान मंत्री आए । पाकिस्तान को चेतावनी देकर आप को खुश कर दिया और साढ़े तीन हजार करोड़ का सौदा कर गए और उसके बाद जाते ही जरदारी जी को भोज खिलाने लग गए । उसके बाद जरदारी जी ने कहा कि गलतफहमियाँ दूर हो गईं हैं । वाह, क्या सादगी है । मगर चीन किसी का सामान खरीदने की बजाय अपना सामान उसे भिड़ाने की फिराक में रहता है । पकिस्तान के किसी नेता से कोई मिलेगा तो वह सहायता माँगने लग जायेगा । और मजे की बात यह कि जब हिसाब माँगों तो केवल बिल थमा देता है सो भी दस प्रतिशत काट कर । मजबूरी की बात और है पर वास्तव में ऐसे नेताओं को कौन पसंद करेगा ।

आपकी बात और है । बिक्री भी करवाते हैं, बोलते भी धीरे-धीरे हैं और मीठा । जब भी बुलाओ नाश्ते भर के लिए अमरीका भी चले जाते हैं । कभी खाना भी खिलाएँगे ओबामा जी तो मात्र बैंगन के भुरते और दो चपाती में ही आपका काम चल जाता है । दूसरे तो पूरा मुर्गा खाते हैं, एक बोतल दारू पी जाते हैं और कर्जा ऊपर से माँगते हैं । और अगर आते समय कोई चम्मच-छुरी न उठा लें तो गनीमत । सो उनके मुकाबले आप से अच्छा नेता और कौन होगा । पर हम तो कहते हैं कि इन लोगों का चहेता बनने की बजाय देश को दो पैसे की कमाई करवाने की सोचिए भले ही ये नेता आपको कितने ही नंबर दें । अच्छा अर्थशास्त्र वही है जिससे दो पैसे बचें । नेताओं के प्यारे बनने से बड़ी बात है अपने आम लोगों का प्यारा बनना । वैसे इन देशों ने महात्मा गाँधी जी को नंगा फकीर और इंदिरा जी को बूढ़ी चुड़ैल कहा था क्योंकि उन्होंने इन्हें दो पैसे की बिक्री करवाने की बजाय आत्मनिर्भर बनने का झंडा उठाया था ।

फिर भी सम्मान तो सम्मान ही है । वैसे राणा जी ने मीरा को कृष्ण के चरणामृत के नाम से ही जहर भेजा था । यह तो मीरा थी जो बच गई पर सब तो मीरा नहीं होते ।

चलिए पत्र खत्म करने से पहले एक छोटी सी कहानी सुनाते हैं । एक कौआ था । कई दिन तक कुछ खाने को नहीं मिला । बहुत भूखा था । एक दिन सवेरे-सवेरे सौभाग्य से रोटी का एक टुकड़ा मिल गया । जल्दी-जल्दी उड़ कर पेड़ पर जा बैठा और जैसे ही खाने लगा एक लोमड़ी वहाँ आ गई । न तो वह भूखी थी और न ही उसके पास खाने की कमी थी पर सारे जंगल का खाना वह अपने पास भरकर रखना चाहती थी । सो इस लोभ के कारण हर समय कुछ न कुछ जुगत भिड़ाती रहती । इस कारण वह बहुत चालक हो गई थी । उसने कौए को रोटी लिए देखा तो उसकी रोटी झटकने की सोची । उसने बड़े प्यार से कहा- हे महान गायक कौए जी, क्या हाल चाल है ? लगता है खाने की बड़ी जल्दी है । पर यह समय तो राग विहाग का है । और इस जंगल में आपसे अच्छा विहाग गाने वाला कौन है । वैसे भी आजकल पश्चिमी संगीत के प्रभाव के कारण शास्त्रीय संगीत लुप्तप्राय सा होता जा रहा है । अच्छे शास्त्रीय संगीत के गाने और सुनने वाले तो बस इक्के-दुक्के ही बचे हैं । कई दिनों से सम्पूर्ण राग विहग सुना ही नहीं । क्या आप कृपा करके मेरे कानों की प्यास बुझाने के लिए कुछ गुनगुना देंगे ?

कौए के लिए यह नया, रोमांचकारी और अंदर तक गदगद कर देने वाला अनुभव था । अब तक कौए को अपने गाने के लिए कभी प्रशंसा तो दूर की बात है, केवल दुत्कार ही मिली थी । हालाँकि कौआ भी कम चालाक नहीं होता पर प्रशंसा ऐसी ग्रीस होती है जो अच्छे-अच्छों को भी रपटा देती है । सो कौआ भी रपट गया और आलाप लेने के लिए जैसे ही चोंच खोली..... । अब आगे की कहानी तो सब जानते ही हैं । हमीं सुना कर क्या करेंगे । आप भी कहेंगे कि हम यह बच्चों की मामूली सी कहानी क्यों सुना रहे हैं । इसे तो सब जानते हैं । बस, इसी भ्रम में लोग मार खा जाते हैं । जानते तो सब हैं पर गुन कर समय पर काम लेना विरले लोगों का काम है । ऐसे विरले ही चाणक्य या गाँधी बनते हैं ।

शेष फिर कभी ।

२१-८-२०१०

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