Feb 8, 2009

मुझसे मत पूछ मेरे इश्क में क्या रखा है


जब सूचना के अधिकार की बात चली थी तो क्या पता था कि 'बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी' । सोचते थे कि एक तो वैसे ही भारत की जनता डरपोक है । सरकारी विभागों में जाने से ही घबराती है । चली भी गई तो चपरासी से ही बात करके लौट जायेगी । क्लर्क तक पहुँचेगी तो कोई भी कह देगा कि बाबूजी चाय पीने गए हैं या साहब ने बुला रखा है । अगर ज़्यादा ही हुआ तो पूछ लेगी कि राशन की दुकान में चीनी नहीं आई है । कब तक आयेगी ? और जो भी उत्तर दिया जाएगा सुन कर वापस चली जायेगी । पर साहब, क्या ख़राब ज़माना आ गया है कि जनता यह तक जानना चाहती है कि न्यायाधीशों, मंत्रियों के पास कितनी संपत्ति है ।

अंग्रेजों के ज़माने में तो कोई नहीं पूछता था कि फलाँ सेठ साहब बहादुर के पास क्यों गया । मिठाई के डिब्बे में 'डाली' के नाम पर उसमें कितने नोट डाल कर दे आया । अब डेमोक्रेसी क्या आगई कि लोग घर के अन्दर झाँक कर देखना चाहते हैं । पेट फाड़ कर देखना चाहते हैं कि आज नेताजी ने क्या खाया । अरे, जो मिल गया सो खा लिया । कल जब प्याज़ से रोटी खाते थे तब तो कोई नहीं पूछने आया कि - नेताजी पेट भरा कि नहीं । आज इतने दिन पापड़ बेलने, बड़े-बड़े नेताओं के जूते उठा-उठा कर जनता की एक छोटी सी सेवा करने का मौका आया है तो सेवा भी ढंग से नहीं करने देते । अरे, जब हमारी पार्टी का शासन नहीं रहेगा तो दूसरी पार्टीवाले पाँच साल प्राण खायेंगे ही । वैसे हम जानते हैं कि होगा कुछ नहीं क्योंकि यदि ऐसा ही होने लगे तो कोई भी नेता जेल से बाहर दिखाई नहीं देगा । सब एक दूसरे को जानते हैं कि धोती के भीतर सब नंगे हैं । फिर भी अखबारों में कुछ न कुछ उछलता रहेगा । थोड़ा बहुत टेंशन तो रहेगा ही । अब तो कम से कम शान्ति से रहने देते ।

जब लोगों से पैसा उधार माँग कर चुनाव लड़ते हैं और हार जाते हैं और उधारवाले कपड़े फाड़ते हैं तब तो किसी को दया नहीं आती । जब अपने पैसे से ट्रक भर कर अमरूदों वाले बाग या बोट क्लब पर धरना या रैली करने जाना पड़ता है तो नानी याद आ जाती है । जेब से पैसे निकलते है तो कलेजा कटता है । लोग तो भगवान तक को खोटा पैसा चढ़ा कर खिसक लेते हैं । मन्दिर में दीये में शुद्ध घी की जगह डालडा जलाते हैं और मनोकामना करते हैं लाखों की लाटरी लगने की । तब तो भगवान को धोखा देते हुए नैतिकता नहीं जागती । कहते है वोट दिया है । क्या गारंटी है कि मुझे ही दिया है । वैसे भी वोट डालना लोकतंत्र में सबका कर्तव्य है । वोट डाल कर किसी पर कोई अहसान थोड़े ही किया है । कम वोट पड़ते तो भी कोई न कोई तो जीतता ही । कोई भी वोट न डाले तो भी यह कहाँ कहा गया है कि लाटरी डाल कर फैसला नहीं किया जा सकता । और ज्यादातर ने तो अडवांस में पैसे या दारू की थैली ली है ।

हाँ, जिन्होंने नक़द पैसे दिए हैं उनका काम करना है । सबसे पहले उधार चुकाई जाती है या धरम-पुण्य किया जाता है । और इसके बाद अगला चुनाव भी लड़ना है । दिन पर दिन महँगाई बढ़ती जा रही है । इन लोगों को क्या पता कि बीस-तीस लाख के बिना तो चुनाव में पार्टी का टिकट नहीं मिलता । झंडे, पोस्टर, जीपें, दारू, भाई लोगों का खर्चा पानी अलग, बूथ केप्चर करने वाले स्वयंसेवक अलग, देशी-विदेशी कट्टे - कोई मजाक नहीं है, इस अंधे काम में अंधे होकर पैसे डालना । इन नौकरी करनेवालों को क्या पता । इन्हें तो महीने की महीने तनख्वाह मिल जाती है चाहे काम करो या न करो । चाहे मास्टरों के सारे विद्यार्थी फेल हो जायें, डाक्टर के सारे मरीज़ मर जायें, पुलिस एक भी अपराधी न पकड़ पाए पर तनख्वाह पर कोई फ़रक नहीं पड़ता । ये लोग खरीदेंगें भी तो बचत पत्र- जिनमें कोई खतरा नहीं । पर हमारा तो चुनाव में सारा पैसा भी पानी में जा सकता है ।

खैर ! आपको बताया है कि राजनीति कोई इतना आसन काम नहीं है जितना आप समझ रहे हैं । वैसे पैसे के अलावा हमें कोई चिंता नहीं है क्योंकि हम ही थोड़े हैं इस लोकतंत्र में 'सूचना के अधिकार' के दायरे में । हम से भी बड़े-बड़े मगरमच्छ पड़े हैं जो चाहें भी तो हिसाब नहीं दे सकते क्योंकि उन्हें ख़ुद को ही पता नहीं कि उनके नामी या बेनामी कितने प्लाट हैं । जितना पैसा है यदि उसे ही गिनते रहें तो उमर बीत जाए । सो भइया वे ही सब रक्षा का इंतजाम करेंगे । चोर-चोर मौसेरे भाई । बड़े भाइयों के रहते अपने को क्या चिंता ।

और जब परदे पर कहानी की माँग पर सब कुछ दिखा देनेवाली नायिका ही मना कर रही है - 'मुझसे मत पूछ मेरे इश्क में क्या रखा है' ? तो हमारे ही पीछे क्यों पड़े हो भाई !

(सन्दर्भ: जज, नेता, मंत्री- कोई भी सूचना के अधिकार के तहत अपनी संपत्ति की घोषणा नहीं करना चाहता ।)

३ फरवरी २००९

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Jhootha Sach

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