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Feb 19, 2012

माँगन मरण समान है - नवयुग के भिखारी

कबीर जी के गुरु जी ने उन्हें सीख दी थी-
माँगन मरण समान है मत कोई माँगों भीख ।
माँगन से मारना भला यह सत्गुरु की सीख ॥

कबीर जी ने यह सीख मानी और जीवन भर उसे निभाया । कपड़े बुनते रहे और आधी और रूखी खाते रहे । कुछ न बन पाए । ज़िंदगी भर जुलाहे के जुलाहे ही बने रहे । इसलिए उनका बेटा भी जुलाहा ही रहा । कुछ मुख्यमंत्री संत्री बन जाते तो बेटा भी उपमुख्यमंत्री बन जाता । मगर धीरे-धीरे लोगों ने खोज की कि ‘जी, भीख तो भगवान ने भी माँगी थी राजा बलि से और उस चक्कर में अपनी ऊँचाई भी घटानी पड़ी’ । मगर मज़े की यह बात हुई कि भीख मिल जाने पर फिर अपने असली रूप में आ गए । विष्णु भगवान ने यह भीख अपने लिए नहीं बल्कि परमार्थ ले लिए माँगी थी । तभी यह फार्मूला चल निकला कि

मर जाऊँ माँगूँ नहीं अपने तन के काज ।
परमारथ के कारने मोहिन आवे लाज ॥

सो लोगों ने लाज-शर्म त्याग कर परमार्थ के नाम पर माँगना शुरु कर दिया । भले ही लोग आलोचना करने लगे कि वह तो अपने बच्चों को साथ लेकर भीख माँगती है या उसे तो भीख माँगने की आदत है । मगर भीख माँगना चालू है और वह भी अपने घर से खर्चा करके, कार में बैठकर, हवाई जहाज, हेलीकोप्टर में उड़-उड़ कर । बच्चों ही नहीं, बेटे-बेटी, पत्नी और यहाँ तक कि किराए पर भीड़ जुटाकर, सुन्दरियाँ तक ला-लाकर भीख माँगना जारी रखा है जैसे कि कविसम्मेलनों में माँग कम होने पर कोई बूढ़ा कवि अपने साथ एक सुन्दर कवियित्री को रखकर कविसम्मेलन कबाड़ता है ।

लोग बेकार ही इस युग को कलयुग कहकर बदनाम कर रहे हैं जब कि परमार्थ के लिए इतने कष्ट उठाने वाले तो सतयुग में भी नहीं हुए थे । हमें सतयुग की तो याद नहीं है मगर पहले आम चुनाव की ज़रूर याद है । तब लोग माँगते भी ठसके से थे । जैसे कि हमारे मोहल्ले में एक साधु आया करते थे जो घर के आगे खड़े होकर बोलते थे- सत्त राम । कोई यदि भीख लाने में देर कर देता था तो चल पड़ते थे । वैसे ही पूरे गाँव में राजनीतिक पार्टियों के मुश्किल से दो-चार पोस्टर ही दिखाई देते थे । लिखा होता था 'कांग्रेस को वोट दो' या 'राम राज का यही निशान, उगते हुए सूर्य भगवान या फिर कहीं कहीं स्टेंसिल से दीवारों पर छपे गए हँसिया-हथौड़ा या कभी-कभी कोई रात में दीवारों पर लिख जाता था- ‘अपना वोट किसको दें, दीपक के निशान को’ आदि-आदि । यह बात और है कि अब न सूर्य है और न दीपक मगर अजीब कमाल है कि अँधेरे में ही खिलना चाहता है । अब न बैल हैं न किसान और न ही हल । एक हाथ है, पता नहीं स्टॉप का साइन है या झाँपड का संकेत । जब हल, किसान ही नहीं तो हँसिये की ज़रूरत? मगर है । पता नहीं किसी की गर्दन काटने के लिए है क्या ? अब तो हाथी घूम रहे है यदि कहीं कोई फसल उगी हुई हो तो उजाड़ने के लिए । कोई साइकिल पर पोस्टमैन की तरह लैपटॉप का आश्वासन बाँटता फिर रहा है ।

आज प्रतियोगिता इतनी बढ़ गई है कि जिसे देखो परमार्थ के लिए भीख माँगने के लिए निकल पड़ा है । अच्छे भले खानदानी भिखारियों का मार्केट बिगाड़ दिया । अब भीख माँगना भी आसान नहीं रहा । बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं । बड़ा खर्चा बढ़ गया है । पहले पार्टी का नाम लिख दिया जाता था और दयालु लोग भीख दे दिया करते थे । अब तो भीख देने वाले कहने लगे हैं कि तुम भीख लेकर सेवा करोगे और सेवा से मेवा मिलता है सो हमें तो अपने हिस्से का मेवा अभी दे जाओ; भले ही वह नकद न हो, लेपटाप के रूप में हो, साइकिल के रूप में हो, दारू के रूप में हो । अब किसको क्या-क्या दो । और देने के बाद भी वोट की कोई गारंटी नहीं है । कहीं दारू के नशे में टुन्न होकर पोलिंग के दिन सोते ही रह जाएँ । और तिस पर चुनाव आयोग का डंडा ऊपर से ।

नए-नए रूप धारण करने पड़ते हैं- कभी धर्म निरपेक्ष, कभी जातिवादी, कभी गरीब प्रेमी, कभी साम्प्रदायिकता विरोधी, कभी सिर पर पगड़ी बाँधनी पड़ती है तो कभी टोपी पहननी पड़ती है । कभी कोई तलवार थमा देता है तो कभी कोई धनुष-बाण । अब किसे चलाना आता है ? सब को टेंशन बना रहता है कि कहीं किसी की आँख न फोड़ दे या कहीं अपनी ही अँगुली न कटवा ले । भीख माँगना न हुआ नौटंकी हो गई । बहुरूपिया भी इतने वेश नहीं बदलता । पहले इतनी कठिनाई कहाँ थी- बस, फटे-पुराने कपड़े और चेहरे पर थोड़ा दीनता का भाव ले आए और हो गया काम । वैसे पहले के भिखारी धनवान होते भी नहीं थे सो ज्यादा मेकअप करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती थी । आजकल तो अधिकतर होते करोड़पति हैं और नाटक करना पड़ता है भिखारी का । बड़ा मुश्किल काम है मगर क्या किया जाए, सेवा का चस्का है ही ऐसा । एक बार लग गया तो छूटता ही नहीं, भले ही भीख न मिले तो दानदाता की कनपटी पर कट्टा ही रखना पड़े । मगर भीख तो चाहिए ही । सेवा जो करनी है ।

छः दशक पहले भीख माँगने का चक्कर ही नहीं था । साहब बहादुर डाइरेक्ट खेतों से ही भीख उठवा लिया करते थे । अब ज़रा प्रोसीज़र लंबा हो गया है । पहले सरकारी खरीदी होगी, फिर गोदामों में जाएगा, फिर नरेगा और मध्याह्न भोजन का कार्यक्रम बनेगा फिर अनाज इश्यू होगा फिर कहीं उसमें से अपने हिस्से की भीख मिलेगी । और कहीं किसी सिरफिरे ने कुछ भाँजी मार दी या किसी पत्रकार ने पोर्न गेट की तरह कैमरे में कैद कर लिया तो बिना बात की झाँय-झाँय । और फिर चुनाव भी ससुर आए दिन लगे ही रहते हैं । कभी विधान सभा तो कभी लोकसभा, कभी पंचायत तो कभी नगर निकाय । एक बार भीख माँगकर पाँच साल तसल्ली से खाने भी नहीं देते ।

क्या किया जाए । लोकतंत्र जो ठहरा । यह सब तो बर्दाश्त करना ही पड़ेगा । बिना सेवा किए मेवा तो दूर, कोई घास भी नहीं डालता । और जहाँ तक काम का सवाल है तो अपने को इसके सिवा कुछ आता तो भी नहीं । चलो कुछ भी हो, लोग कुछ भी कहें । धंधा तो धंधा है, भीख हो या जेब काटना । उठो प्यारे, चलो भीख माँगने । एक बार मिल जाए फिर कौन पूछता है कि भीख माँगने रावण आया था या सुदामा ।

एक चरवाहे की कहानी है । उसकी बकरी ब्याने वाली थी । ज़रा मुश्किल हो रही थी । कभी मेमने के पैर थोड़े से बाहर निकलते और कभी अंदर हो जाते । चरवाहा बड़ा परेशान । संकट में ही तो भगवान याद आते हैं सो बोलने लगा प्रसाद - कभी सौ का तो कभी दो सौ का । उसकी पत्नी ने कहा- तेरी बकरी तो पचास की भी नहीं है और तू प्रसाद बोल रहा है सौ-दो सौ का । क्यों घाटा खाने पर तुला हुआ है । चरवाहे ने उत्तर दिया- एक बार बच्चा बाहर आ जाने दे फिर हनुमान जी और शिवजी सब को देख लूँगा ।

सो एक बार पोलिंग हो जाने दीजिए फिर ढूँढते रहिएगा इन भिखारियों को । पता नहीं, कहाँ मुन्नी बाई से बँगलों में बैठे झंडू बाम मलवा रहे होंगे ?

१६-२-२०१२

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Aug 16, 2009

तोताराम के तर्क - लौह पुरुष तोताराम


आज तोताराम आया तो उसकी मुख-मुद्रा से खुशी और चिंता के मिश्रित भाव टपक रहे थे । जब उसे बैठने के लिए स्टूल दी तो कहने लगा- मेरे घुटने नहीं मुड़ते हैं । जब हमने उसे खड़े-खड़े ही चाय का कप पकड़ाया तो कहने लगा- क्या बताऊँ भाई साहब, मुझे तो कुहनियाँ मोड़ने में भी परेशानी हो रही है, पर खैर! किसी तरह चाय तो पीनी ही है । उसी समय जब पत्नी रसोई से बाहर निकली तो तोताराम ने गर्दन घुमाने की बजाय रोबोट की तरह पूरा घूम कर नमस्ते की । हमें लगा कि उसके लिए गर्दन घुमाना भी मुश्किल हो रहा है ।

हमने कहा- तोताराम, हड्डियों के किसी अच्छे डाक्टर को दिखा । लगता है तेरे तो सारे जोड़ ही जाम हो गए हैं ।

वह बोला- डाक्टर को दिखाने की कोई ज़रूरत नहीं है । मुझे लगता है कि मैं धीरे-धीरे लौह पुरूष होने लग गया हूँ ।

हमें चिंता की घड़ी में भी हँसी आ गई, कहा- तोताराम, लौह पुरुष तो इस देश में एक ही हुए हैं - सरदार पटेल । हाँ, आजकल कुछ और लोग भी माथे पर लौहपुरुष की चिप्पी लगा कर घूम रहे हैं । पर इससे क्या होता है । लौह पुरुष पटेल ने तो चुपचाप ही राष्ट्रीय एकता का काम कर दिया । और ये बेकार की झाँय-झाँय करके राष्ट्रीय एकता का और सत्यानाश कर रहे हैं । पतली छाछ को राबड़ी बनने लायक भी नहीं छोडेंगे । पर तेरे लौह पुरुष वाले वहम को दूर करने के लिए हम दो प्रयोग कर सकते हैं ।

तोताराम ने कहा- फटाफट बता, जिससे स्थिति के अनुसार आवश्यक कार्यवाही की जा सके । हमने कहा- पहले तो यह तय करेंगे कि तू हाड-माँस का ही बना है या किसी धातु का । इसके लिए हम तेरे सिर पर खड़ाऊँ से प्रहार करेंगे । यदि भद-भद की आवाज़ आई तो तू हाड-माँस का है । और यदि खड़ाऊँ मारने से टन-टन की आवाज़ आई तो यह सिद्ध होगा कि तू धातु का हो चुका है । धातु टेस्ट पाजिटिव निकला तो तेरे शरीर पर चुम्बक घुमा-घुमा कर देखेंगे कि चुम्बक चिपकता है या नहीं । यदि चुम्बक चिपका तो यह माना जाएगा कि तू लोहे का हो चुका है ।

आजकल दूध, घी, नोट, स्टांप आदि न जाने क्या-क्या नकली आने लगे हैं । हो सकता है लोहा और चुम्बक ही नकली हों । इसके लिए एक और बड़ा टेस्ट करना पड़ेगा पर यह टेस्ट यहाँ नहीं हो सकता । इसके लिए तो तुझे कटनी (मध्य प्रदेश) ले जाना पड़ेगा । वहाँ पारस अग्रवाल नामक भा.जा.पा.का एक कार्यकर्ता रहता है । कुछ लोग जब अडवानी जी को लौह पुरूष की जगह मोम पुरूष प्रचारित करने लगे तो पारस जी ने टेस्ट करने के लिए अपनी पादुका फेंकी । पर वह लगी नहीं इसलिए टेस्ट की प्रक्रिया आगे नहीं चली ।

पर जब तेरा चुम्बक टेस्ट हो चुकेगा तो तुझे इन्हीं पारस जी के पास ले चलेंगे । उनके स्पर्श से यदि तू सोने का बन गया तो यह माना जाएगा कि तेरा लौहीकरण शुरू हो चुका है । पर यह भी सच है कि सोना बनने की स्थिति में तू लौह पुरुष न रह कर स्वर्ण पुरुष हो जाएगा । तब पता नहीं लोग तेरे हाथ पैर ही तोड़ कर न ले जाएँ । और यह भी हो सकता है कि पारस जी ही तुझे अपनी तिजोरी में बंद कर दें ।

वैसे तुलसीदास जी ने तो लोहे को कुधातु कहा है- "पारस परस कुधातु सुहाई ।" कुधातु बनने से तो अच्छा है कि सुमनुष्य ही बना रहे । हमारे भाषण से घायल से हो चुके तोताराम की ट्यूब लाइट अचानक जली, बोला -भाई साहब, डाक्टर के पास ही चलते हैं । अडवाणी जी के कम्पीटीशन में पड़कर बिना बात खडाऊँ से टाट कुटवाने से क्या फायदा ।

२९-४-२००९

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Aug 15, 2009

तोताराम के तर्क - मंथन


सवेरे-सवेरे तोताराम के साथ घूमने निकले । जैसा कि होता है, रास्ते में तरह-तरह के बोर्ड और सूचनाएँ दिखते हैं- 'नगर परिषद के कर्मचारी काम पर हैं', 'इधर से रास्ता बंद है', 'असुविधा के लिए खेद है' । इसके अतिरिक्त कुछ और गतिविधियाँ भी बिना सूचना के चलती रहती हैं जैसे रास्ते में किसी मकान का काम चल रहा है और बजरी, ईंटें, पत्थर आदि रास्ते में पड़े हैं । पर आज जो सूचना देखी उससे बड़ा आश्चर्य हुआ, एक मकान के पास एक सूचना पट्टा रखा हुआ था- 'सावधान, अन्दर मंथन चल रहा है ।'

मंथन तो बिलोने को कहते हैं और बिलोना तो परंपरागत घरों में सवेरे-सवेरे की एक सामान्य क्रिया है । इसमें 'कुत्तों से सावधान' जैसी सूचना लिखने की क्या आवश्यकता थी । हमने तो बचपन से देखा है कि हमारे उठने से पहले ही माँ दही बिलोना शुरू कर देती थी । बीच-बीच में हमें उठाने के लिए आवाज़ भी लगा देती थी और हम थे कि उठने की बजाय बिलोने की लोरी जैसी घर्र-घर्र की मधुर आवाज़ का आनंद लेते पड़े रहते थे । और एक यह मंथन ! कौनसा खतरा है इसमें, जो लिखा है- 'सावधान, अन्दर मंथन चल रहा है ।'

हम तो सोच ही रहे थे पर तोताराम ने तो तत्काल कार्यवाही शुरू कर दी बोला- चल, अन्दर देखते हैं क्या हो रहा है ? हमारे उत्साह न दिखाने पर भी तोताराम हमें घसीटता हुआ अन्दर ले ही गया । अन्दर जा कर देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ । कई लोग सिद्धांतों का एक बड़ा सा लट्ठ कीचड़ के एक कुंड में डाल कर अपने पायजामें के नाड़ों का रस्सा बना कर उस कीचड़ को बिलोने की कोशिश कर रहे थे । कीचड़ उछल-उछल कर उनके कपड़ों और चेहरों पर गिर रहा था ।

तोताराम से रहा नहीं गया । पूछा तो बोले- मंथन चल रहा है । हमने कहा- भाई, मंथन तो दही का होता है जिसमें से मक्खन निकलता है । बड़ा ध्यान रखना पड़ता है दही के मंथन में । सावधानी से रई को घुमाना पड़ता है कि कहीं उछल कर दही बाहर न गिर पड़े । यदि बिलोते-बिलोते सारा दही ही उछल कर बाहर गिर गया तो अंत में बचेगा क्या ? बिलोने की मेहनत और बेकार जायेगी । और फिर सर्दी में गरम पानी और गर्मी में ठंडा पानी बड़े नाप-जोख से डाला जाता है । बड़े धैर्य और कलाकारी का काम है बिलोना ।

बिलोनेवाले भी लगता है थक गए थे सो हमसे बातें करने के बहाने सुस्ताना चाहते थे, बोले- यह ऐसा-वैसा मंथन नहीं है । यह तो हार के कारणों को जानने के लिए किया जा रहा है । हमने कहा समुद्र-मंथन तो सुरों और असुरों ने मिलकर किया था । और समुद्र में ही सब कुछ होता है- विष, वारुणी, अमृत, कामधेनु, कल्पवृक्ष, लक्ष्मी आदि । पर आप तो कीचड़ का मंथन कर रहे हैं तो इसमें से क्या निकलेगा । इसमें तो हैं ही जोंक, घोंघे, सेवार । इसमें मोती कहाँ से मिलेंगे ?

कबीर जी ने कहा है-
जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ ।
मैं बौरी बूडन डरी रही किनारे बैठ ।।


वे बोले- जी, मोती तो हम सब चाहते हैं पर डूबने कि रिस्क कोई नहीं उठाना चाहता ।

हमने कहा-तो फिर करते रहिये मंथन इस कीचड़ का और लिथदते रहिये ।

हम और तोताराम वहाँ से चल दिए । पीछे से फिर ज़ोर-ज़ोर से घर्र-घर्र की आवाज़ आने लगी ।

२८-६-२००९

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Aug 10, 2009

विक्रम और वेताल - सांसद की समस्या


जैसे ही वीक एंड पर अंधेर नगरी के आजीवन राष्ट्राध्यक्ष महाराज चौपटादित्य जी संसद के कुँए से सत्य के शव को निकाल कर ठिकाने लगाने के लिए राजधानी से बाहर निकले तो उसमें अवस्थित बेताल ने कहा- राजन, तुम बड़े हठी हो । तुम कभी किसी की बात मानते ही नहीं । राजा को सत्य, न्याय जैसे छोटे मोटे कामों में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए । ये काम तो उसे अपने मातहतों पर छोड़ देने चाहियें । उसे तो नृत्य देखने, गाने सुनने, उद्घाटन करने, पुरस्कार बाँटने जैसे सात्विक और सांस्कृतिक कामों पर ध्यान देना चाहिए ।

तुम जाने कितने बरसों से सत्य को ठिकाने लगाने में समय बर्बाद कर रहे पर क्या सफलता मिली ? तुम्हें पता है, यह सत्य बड़ा चीमड़ होता है । पक्का नकटा । कुटेगा, पिटेगा, जला दिया जाएगा, काट दिया जाएगा, गाड़ दिया जाएगा पर जैसे ही दो बूँद पानी पड़ेगा तो दूब की तरह जाने कहाँ से निकल आएगा । जैसी खरपतवार किसान का पीछा नहीं छोड़ती वैसे ही राजाओं को यह सत्य बड़ा परेशान करता है । तुम्हें पता है दानवों ने संजीवनी विद्या सीखने आए कच को मारकर कूँए में डाल दिया, मारकर जला दिया, राख को दारू में मिला कर शुक्राचार्य को पिला दिया तो भी, भले ही शुक्राचार्य का पेट फाड़कर ही सही पर कच के रूप में सत्य निकल ही आया ।

महाराज चौपटादित्य ने कहा- हे बेताल, तू भले ही मुझे कच के रूप में धरती में गाड़ दे पर भगवान के लिए अब और भाषण मत झाड़ । मेरा सिर दुखने लगा है । बेताल ने उत्तर दिया- ठीक है राजन, मैं तुम्हें श्रम भुलाने के लिए एक कहानी सुनाता हूँ । और उस कहानी के अंत में एक प्रश्न पूछूँगा । यदि तुमने जानते हुए भी उत्तर नहीं दिया तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे ।

बेताल सुनाने लगा- दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यों तो चुनावों में सारे पहुँचे हुए लोग ही चुनाव जीतते थे पर एक बार ऐसा हुआ की एक थोड़ा कम पहुँचा हुआ आदमी लोकसभा का चुनाव जीत गया । निरा अनुभवहीन तो वह नहीं था फिर भी सफलता औकात से ज़्यादा थी । उसके स्वागत में शहर के भूमाफियाओं, सट्टेबाजों, घूसखोरों, दलालों, चोरों, उचक्कों ने जगह-जगह गेट बनवाये , अख़बारों में बधाई के विज्ञापन छपवाए, जुलूस निकले । साधारण लोगों ने भी मौके की नजाकत को समझ कर यही कहा कि उन्होंने उसे ही वोट दिया था । भले ही वे वोट डालने ही न गए हों । जब संसद ने हिसाब लगाया तो पाया कि उसके चुनाव क्षेत्र में जितने वोट पड़े थे
उनसे ज्यादा वोट उसे मिले हैं । वह समझ ही नहीं पाया कि उसे किसने वोट दिया और किसने नहीं । उसके लिये समर्थकों और विरोधियों को पहचानना मुश्किल हो गया । हे राजन, बताओ कि वह किसको अपना माने, किसका काम पहले करे ?

महाराज चौपटादित्य ने उत्तर दिया- हे बेताल, लोकतंत्र में सब कुछ अनिश्चित है । काम करनेवाला हार जाता है,हरामी जीत जाता है । पता नहीं कब सरकार गिर जाए । इसलिए लोकतंत्र में न कोई अपना है और न कोई पराया,न कोई समर्थक है और न विरोधी । सब मतलब से स्वागत करते हैं, बधाई संदेश छपवाते हैं । हारनेवाला कैसा भी हो मगर कोई उसका हाल चल पूछने भी नहीं जाता । बहुत से तो जीते हुए को खुश करने के लिए हारे हुए को गाली तक निकालने लग जाते हैं । इसलिए उसे किसी का काम नहीं करना चाहिए । जिस काम में अपना ख़ुद का फायदा हो वह काम करना चाहिए । हर काम की नीलामी करनी चाहिए । जो ज़्यादा पैसे दे उसका काम पहले करवाए ।

उत्तर सुनते ही बेताल की खोपड़ी के टुकड़े-टुकड़े हो गए ।

२२-६-२००९

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Aug 9, 2009

चने के झाड़ पर

आदरणीय अडवानी जी,
नमस्कार । आशा है सानंद होंगे । कई महीनों से आप से सम्पर्क नहीं किया । कई कारण थे । एक तो यह कि चुनाव थे । चुनावों में तो वार्ड मेंबर तक इतना व्यस्त हो जाता है कि दम मारने तक की फुर्सत नहीं रहती तिस आप तो प्रधानमंत्री-इन-वेटिंग थे । किस्मत की बात वेटिंग और पाँच साल आगे खिंच गई ।

वेटिंग का चक्कर सबसे ज्यादा इस मनुष्य नाम के प्राणी के ही लगा हुआ है । यह जो कुछ नहीं होता वही बनने के लिए वेट करता रहता है सो इस चक्कर में जो होता है उसका भी आनंद नहीं ले पाता । कवि ने कहा है-
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, रुत आए फल होय ॥

पर मनुष्य को धीरज कहाँ । साधारण सिपाही यदि सारे दिन थानेदार बनने के सपने देखता रहता है तो अपनी हफ्ता-वसूली तक भूल जाता है । प्रेमिका के चक्कर में पत्नी भी भाग जाती है ।

ये बातें साधारण आदमियों की है । आप तो हमेशा से सदा से ही निष्काम और अनुशासित सिपाही रहे हैं । पहले संघ में
फिर जनसंघ में और उसके बाद भाजपा में । आत्मा भी मनुष्य योनी पाने के लिए चौरासी लाख योनियों में भटकती रहती है और मनुष्य योनि मिल जाने के बाद मोक्ष में चक्कर में तरह-तरह की तीर्थ यात्राएँ करती रहती है । आप ने भी तरह-तरह की यात्राएँ कीं पर वे सब सेवा के लिए थीं । विरोधी चाहे कुछ भी कहें पर हम जानते है जब आप राजस्थान की तपती रेत में गाँव-गाँव घूमते थे तब कौन सा स्वार्थ था ।

हम बुज़ुर्ग भले ही युवकों को सीधा समझें पर आजकल के युवक बड़े चालाक होते हैं । मीठी बातें करके बुजुर्गों को चने के झाड़ पर चढ़ा देते हैं और तमाशा देखते हैं । हमारे मोहल्ले के कुछ युवक है जो एक बुज़ुर्ग पंडित जी को चढ़ाकर चुनावों में खड़ा कर देते हैं, उनसे मिठाई खाते रहते हैं और हर बार पंडित जी की जमानत ज़ब्त होती रहती है । वैसे तो न आप माया में भटकते है और न इतने भोले कि ज़ल्दी से किसी की बातों में आ जाएँ । पर अति बुरी होती है । तुलसी दास जी ने भी कहा है- "अतिशय रगड़ करे जो कोई । अनल प्रकट चन्दन तें होई ॥" सो लगता है आप भी अगली कतार के कुछ नेताओं के बहकावे में आ गए और प्रधानमंत्री-इन-वेटिंग बन गए । और किस्मत की बात देखिये कि कभी चुनाव न लड़ने वाले प्रधान मंत्री बन गए ।

वैसे तो आप ज्ञानी और हिम्मत वाले हैं । गीता के ज्ञाता हैं । पर कभी-कभी हाल-चाल पूछने वाले ही इतने सक्रीय हो जाते हैं कि जान निकाल लेते हैं । एक बार एक दुकानदार एक ग्राहक से पिटते-पिटते बचा । एक मनचला यह दृश्य देख रहा था । अब तो जब भी वह दुकान पर आता यही कहता- लाला, उस दिन तो वह आपको पीट ही देता । एक दिन तंग आकर लाला बोला- वह तो पीटता या नहीं पर मुझे लगता है कि तू मुझे ज़रूर पीटेगा ।

इसलिए हमने यही सोच कर पत्र नहीं लिखा कि पता नहीं किस हालत में होंगे । पर अब जब पिछले महीने आप कर्नाटक आए और मेडम के साथ परंपरागत 'कोडावा' ड्रेस में देखा तो मन को बड़ी शान्ति मिली । दूल्हे जैसी ड्रेस लग रही थी । कहीं चेहरे पर तनाव नहीं । हमेशा से ज्यादा खुश । अगर सफ़ेद मूँछे न दिखती, क्लीन शेव्ड होते तो कोई नहीं कह सकता था कि अस्सी पार कर चुके हैं । इसके बाद जब दिल्ली में अल्पसंख्यक मोर्चे में आपका फोटो देखा तो पूरी तसल्ली हो गई कि अब पहले वाला तनाव कहीं नहीं है और आप पूरी तरह फॉर्म में आ चुके हैं । खैर, जो बीत गई सो बात गई ।

यह तो अच्छा हुआ कि आप लोगों के बहकावे में नहीं आए वरना चढ़ाने वाले बड़े दुष्ट होते हैं । आदमी का जुलूस निकलवा देते हैं । मेवाड़ के एक महाराणा ने प्रतिज्ञा कर ली कि जब तक बूँदी का किला न जीत लेंगें तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे । अब किला जीतना कोई मज़ाक तो है नही । शाम तक महाराणा जी के होंठों पर पपड़ी आगई । चमचों ने मौका देख कर कहा- हुकम, इस तरह प्राण देने से क्या फ़ायदा । किला भी जीतेंगे पर थोड़ा समय तो लगेगा ही । इसलिए जब तक असली किला न जीत लें तब तक एक नकली किला बना कर उसको जीत लेते हैं । काफी ना-नुकर के बाद महाराणा माने । पर किस्मत की बात देखिये कि जिस मकान को नकली किला बनाया गया उसमें बूँदी का एक सैनिक काम करता था सो उसने गोली चला दी । उसे मारकर नकली किला तो जीत लिया पर मज़ा तो किरकिरा होगया । इसे कहते हैं- काणी का तो काजल भी लोगों को नहीं सुहाता ।

खैर, आप ऐसे किसी नाटक के बहकावे में नहीं आए । हमारे एक मित्र हैं । उन्हें एम.पी. बनने की बड़ी लालसा है पर ना तो इतना पैसा और ना ख़ुद के सिवा कोई वोट देने वाला । भाई लोग उन्हें मज़ाक में एम.पी. साहब कहने लगे । उनका नाम है महावीर प्रसाद । बात पूरी तरह असत्य भी नहीं है । महावीर प्रसाद का शोर्ट फॉर्म बनता ही एम.पी. है । सो पूरा नहीं तो अर्द्धसत्य तो है ही । धीरे-धीरे हालत यह हो गई है कि सब उनको इसी संबोधन से पुकारते हैं ।

अगर आपकी जगह कोई दूसरा होता तो लोग उसका नाम परिवर्तन करके पूरण मल रख देते और शोर्ट फॉर्म करके पी.एम., पी.एम. पुकारने लग जाते । हमें विश्वास है कि आपने हिम्मत नहीं हारी है । हम आपको वास्तव में पी.एम. पुकारने की प्रतीक्षा में हैं ।

२५-७-२००९

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Aug 4, 2009

तोताराम के तर्क - पसीने का क़र्ज़

आज तोताराम चाय के समय गैरहाजिर था । आया तो कोई दसेक बजे । आते ही जल्दी मचाने लगा, बोला- फ़टाफ़ट तैयार हो जा, गुजरात चलाना है ।

हमने कहा- यार, गुजरात में भी अपने शेखावाटी जितनी गरमी पड़ती है । कहीं घसीटना ही था तो शिमला, मसूरी की बात करता । उत्तर मिला- शत्रु, अग्नि, बीमारी और क़र्ज़ को कभी कम नहीं आँकना चाहिए । जितना ज़ल्दी हो सके इनसे मुक्ति पा लेनी चाहिए ।

हमने कहा- जब भारत सरकार का एक सर्वे प्रकाशित हुआ था 'प्रति व्यक्ति क़र्ज़' के बारे में तो हमने पेंशन से लोन लेकर चिदंबरम का कर्जा चुका तो दिया था । जहाँ तक बीमारी का सवाल है तो बुढ़ापे में भी अपना स्वास्थ्य ठीक-ठाक ही है । आग कीमतों में लगी है सो किसी के बाप से बुझने से रही । और हमारा शत्रु अब यमराज के अलावा और कौन होगा । पर यह कर्ज़े वाली बात ज़रा साफ़ कर ।

तोताराम ने स्पष्ट किया- अडवानी जी ने पन्द्रह साल राजस्थान में जनसेवा की है, गरमी में घूम-घूम कर पसीना बहाया है । सो मोदीजी मंच से सूचना दे गए हैं कि राजस्थान को अडवानी जी के इस पसीने का क़र्ज़ चुकाना है ।

हमने कहा- यार, पसीना तो हमने भी चालीस साल मास्टरी में बहुत बहाया है पर आज तक उसके लिए किसीके सर पर सवार नहीं हए । और फिर ये मोदी जी तो ब्रह्मचारी हैं । इन्हें रुपये पैसे की बात से क्या लेना-देना । वैसे भी वे आजकल एक और बालब्रह्मचारिणी जी से देश की रक्षा और विकास की बात करने चेन्नई गए हुए होंगें ।

तोताराम बोला- तुझे याद नहीं, मोदी जी नरेन्द्र या ब्रह्मचारी होने से पहले मोदी हैं । एक-एक दाने और एक-एक बूँद का हिसाब रखने वाले । महाजनों और मोदियों से बचना संभव नहीं । अडवानी जी ने कभी इस क़र्ज़ के बारे में बात नहीं की और न कभी कोई नोटिस भेजा । पर तुझे पता होना चाहिए कि बही और हिसाब-किताब कारिंदों के पास होता है ।

हमने कहा- तोताराम, सेवा निस्वार्थ की जाती है, उसका दाम नहीं लिया जाता । और फिर अडवानी जी इतने टुच्चे भी नहीं हैं । तोताराम ने उत्तर दिया- देख मास्टर, क़र्ज़ कैसा भी हो चुका देना चाहिए, नहीं तो फिर इस मृत्युलोक में आना पड़ेगा । नो ड्यूज के बिना आगे स्वर्ग में भगवान नई ड्यूटी ज्वाइन नहीं करने देगा । तुझे पता होना चाहिए कि भगवान राम की एजेंसी अडवानी जी, नरेन्द्र मोदी और तोगडिया के पास ही है । सो क़र्ज़ तो चुकाना ही पड़ेगा ।

हमने कहा- मोदी जी ने प्रतीकात्मक क़र्ज़ की बात कही थी । उनका मतलब था कि उस कर्ज़े के बदले में भा.ज.पा. को वोट दे देना । वोट किसको दिया यह किसको पता चलेगा । कह देंगें कि वहीं दिया था जहाँ मोदी जी ने कहा था । हो गया हिसाब-किताब बराबर । तोताराम बोला- वे ऐसे नहीं मानेंगे । जब तक अडवानी जी प्रधानमंत्री नहीं बन जाते तब तक यह क़र्ज़ हमारे माथे रहेगा ही ।

हमें गुस्सा आगया । एक तो वोट देने गए तो लू लग गई । और ऊपर से ये कर्ज़े-कर्ज़े की रट लगा रहे हैं । हमने भी कह ही दिया- देख, हमने भी छः साल गुजरात में मास्टरी की है, पसीना बहाया है- चार साल पोरबंदर और दो साल राजकोट में । छत्तीस साल हमारे छोटे भाई ने पोरबंदर में पसीना बहाया है । अगर उन्हें हिसाब-किताब ही करना है तो हम दोनों भाइयों के छत्तीस जमा छः कुल बयालीस साल होते हैं । उसमें से अडवानी जी के पन्द्रह साल काटकर हमारा सत्ताईस साल का हिसाब कर दें । हमें नहीं जाना गुजरात । तुझे जाना हो तो जा ।

अब यह तो कल ही पता चलेगा कि तोताराम गुजरात गया या नहीं ।

१४-५-२००९
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Jul 15, 2009

तोताराम के तर्क - जय हो


आज तोताराम आया तो उसकी सजधज कुछ निराली ही थी । सिर पर चूनड़ी का साफ़ा, धुला प्रेस किया कुरता पायजामा, माथे पर टीका और कलाई पर मोटा सा कलावा बँधा था । हम कुछ समझ नहीं पाये । आते ही तोताराम उछल कर चबूतरे पर चढ़ गया और देश में लोकतंत्र की दुर्दशा और उसकी रक्षा के बारे में जोशीला भाषण झाड़कर ज़ोर से चिल्लाया- भारत माता की .... ।

आगे हमें बोलना था पर हम चुप रहे । तोताराम को गुस्सा आया, बोला- जिस भारत माता ने तुझे पाल पोसकर बड़ा किया, नौकरी दी और अब पेंशन दे रही है उसकी जय बोलते हुए तेरी जुबान घिस रही है, लानत है ।

हमने कहा तोताराम बात ऐसी नहीं है पर तुझे पता है कि 'जय हो' का कापीराईट कांग्रेस ने खरीद लिया है । कोई गैरकांग्रेसी अगर उसका उपयोग करे तो पता नहीं कोई चक्कर डाल दे । मैं तो इसलिए चुप था वरना भारत माता की जय तो सारे जीवन बोली है । और फिर भइया, जब से डंकल प्रपोज़ल लागू हुआ है मैंने तो नीम की दातुन करना भी छोड़ दिया है । पता नहीं , कब कोई शिकायत करदे और बुढ़ापे में कोर्ट कचहरी का चक्कर चल निकले । और फिर आजकल भारत माता कि जय कौन चाहता है । सबको चुनावों में अपनी-अपनी जीत चाहिए । अपने बच्चों की जय चाहिए । और अब तो 'जय हो' के साथ 'भय हो' भी चल निकला है । सो 'जय हो' दूसरों की, अपने को तो सदा की तरह भयभीत ही रहना है । डरोगे तो बचोगे । जनसेवकों से डरो, धर्म के ठेकेदारों से डरो । डरोगे तो बचोगे । बस कोई भी वोट मँगाने आए तो उसमे सामने हें-हें करके गरदन हिलाते रहो ।

तोताराम बोला- तुझे पता नहीं ए. आर. रहमान ने ख़ुद कह दिया है कि 'जय हो' पर किसीका एकाधिकार नहीं है ।

हमने कहा- ए. आर. रहमान के कहने से क्या होता है । क़ानून तो उसके हाथ है जिसके हाथ में ताक़त होती है । लोकतंत्र में ताक़त वोटर के हाथ में होती है । वह चाहे तो सरकारों को उलट-पलट सकता है । वोट का राज है । मैं लोगों को जगाऊँगा । बताऊँगा कि भ्रष्ट, रिश्वतखोर, अपराधियों को वोट मत देना ।

हमने कहा- ऐसा प्रचार तो अखबारों में हो रहा है । लोग संपादक के नाम पत्र लिख रहे हैं पर वास्तव में धन, दारू और बंदूक का सहारा लेने वालों को क्या कोई रोक पा रहा है ? यदि लोकतंत्र के सेवकों को पता लग गया कि तू इस प्रकार का अलोकतांत्रिक कृत्य कर रहा है तो तेरे बूथ पर पहुँचने से पहले कोई बूथ लेवल का कार्यकर्ता तेरा वोट तो डाल ही जाएगा । हो सकता है कोई अतिउत्साही तेरे हाथ-पाँव ही न तोड़ दे । फिर धरी रह जायेगी तेरी 'जय हो'। तू पलस्तर बँधाए अस्पताल में होगा और उधर लोकप्रिय सरकार बन जायेगी ।

बनी-बनाई चाय छोड़ कर तोताराम 'जय हो' चिल्लाता चला गया । हम जानते है कि जय होगी तो लल्लू पहलवान की या फिर कल्लू पहलवान की । तोताराम के तो हाथ-पैर बचे रहें यही बहुत है ।

(भय हो का वीडियो देखें)

२१-४-२००९

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Jul 14, 2009

तोताराम के तर्क - ब्रह्मचारी जी का आशीर्वाद


आज तोताराम आया तो उसने अपने सिर पर गमछा डाल रखा था । हमने सोचा लू से बचने के लिए ऐसा किया होगा । पर जब उसने कई देर तक गमछा नहीं उतारा तो हमने पूछ ही लिया- यार, अब तक इस खोपड़ी को क्यों कस रखा है ? क्या यहाँ कमरे के अन्दर भी लू लग रही है ?

तो बोला- इसके नीचे मैनें ब्रह्मचारी जी का आशीर्वाद छुपा रखा है । हमने उत्सुकतावश उसका गमछा खींच लिया तो पाया कि उसके सिर पर ब्राडगेज की तरह दो समानांतर पटरियाँ उभरी हुई हैं । पूछा- चोट कहाँ लगी ? कहीं लोकतंत्र की रक्षा के लिए सिर तो नहीं फुड़वा बैठे ? बोला- नहीं, यह तो ब्रह्मचारी जी के मारे हुए चिमटे का निशान है । वे जिस पर प्रसन्न होते हैं उसके सिर पर चिमटा फटकार देते हैं । और जिस पर चिमटा पड़ जाता है वह यदि प्रधानमंत्री नहीं तो कम से कम राज्य सभा का सदस्य तो बन ही जाता है ।

हमें बड़ा गुस्सा आया । आशीर्वाद देने का यह कौनसा तरीका है ! हनुमानजी से बड़ा ब्रह्मचारी कौन होगा पर वे तो किसी को आशीर्वाद के रूप में गदा नहीं मारते । बल्कि भक्त के संकट का मोचन ही करते हैं । विवेकानंद जी भी ब्रह्मचारी ही थे पर उन्होंने तो प्रेम और कर्म का संदेश दिया । यह कैसा ब्रह्मचारी है ?

पूछा- यह वही तो नहीं है जो बुज़ुर्ग महिलाओं को हिकारत से डोकरी और युवतियों को छोकरी कहता है ? तोताराम ने हामी भरी तो हमने कहा- देखो, जो सच्चे ब्रह्मचारी होते हैं वे महिलाओं को माता-बहिन कहते हैं ,बुढ़िया या गुड़िया नहीं कहते ।

तोताराम ने सफाई दी- फक्कड़ संत ऐसे ही होते हैं । वे अपने व्रत को निभाने के लिए महिलाओं से कोई रिश्ता नहीं जोड़ते । इस प्रकार के संबोधनों से वे महिलाओं से एक दूरी बना कर रखना चाहते हैं ।

हमने कहा- हमें तो ऐसा ब्रह्मचर्यव्रत आरोपित और हठयोग जैसा लगता है । यदि व्यक्ति ब्रह्मचर्य धारण करके सहज नहीं रह सके तो उसे फिर गृहस्थ बन जन चाहिए । तब व्यक्ति सहज हो जाता है। और कई ऐसी ही ब्रह्मचारिणियों को देख ले । वे कौनसी इससे कम हैं । वे भी ऐसे ही बोलती हैं जैसे कि सामने वाले को अभी झाड़ू मार देंगीं । कई लोग बड़े-बड़े सपनों के चक्कर में टाइम निकल देते हैं, बाद में कोई जुगाड़ नहीं बैठता तो ब्रह्मचर्य का नाटक करने लग जाते हैं । तुझे इन चक्करों की क्या ज़रूरत है ? आराम से पेंशन ला, शान्ति से घर में बैठ और राम-राम कर ।

पर तोताराम ने सीधे-सीधे हमारी बात नहीं मानी । बोला- चुनाव परिणाम आने तक तो इस आशीर्वाद को कायम रखता हूँ । इसके बाद जैसी परिस्थिति होगी कर लेंगे । क्या पता चांस लग ही जाए ।

हमने कहा- तेरी मर्जी । पर याद रख, तुझे कोई घास डालने वाला नहीं । बोली लगेगी भी तो जीते हुए एम.पी.यों की । ये जो अमरीका के राजदूत दिल्ली और हैदराबाद के चक्कर लगा रहे हैं, ये जो कारपोरेट जगत सक्रिय हो रहा है, ये जो काले धन वाले कवायद कर रहे हैं ये तोताराम के लिए नहीं वरन जीते हुए जनसेवकों की बिकाऊ आत्माओं के लिए कर रहे हैं । तुझ जैसे लोग केवल चिमटा खाने के लिए ही होते हैं । रही बात ड्रेसिंग करवाने की सो आज नहीं तो दो चार दिन बाद करवा लेना । पर अच्छा हो, कोई एंटीबायोटिक ही ले ले वरना यदि सेप्टिक हो गई तो तेरा सिर ही काटना पड़ेगा ।

१४-५-२००९

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Jul 12, 2009

तोताराम की क्षमा-याचना

तोताराम के साथ कल की मीटिंग चबूतरे पर ही हुई थी । पत्नी के घुटनों में दर्द था । हमने चबूतरे पर से ही आवाज़ लगाई थी- चिक्की की दादी, ज़रा दो कप चाय तो दे जाना । पर उत्तर नहीं आया । उसका इन्फ़्रास्ट्रकचर भी अब पैंसठ साल पुराना हो चुका है सो हमारी आवाज़ उसके एंटीना ने नहीं पकड़ी । फिर थोड़ा ज़ोर से आवाज़ लगाई तो उत्तर आया- आप ख़ुद ही आकर ले जाओ । तभी तोताराम को जाने क्या दौरा पड़ा, बोला- तू इस घर के मंत्री मंडल का सबसे कमजोर सदस्य है । तेरा इतना भी पावर नहीं कि तेरी एक आवाज़ पर दो कप चाय भी आ जाए । और उठकर चला गया ।

तोताराम के साथ हमारा कम से कम साठ साल पुराना रिश्ता तो है ही । हँसी मजाक भी चलते रहते हैं । आज जाने उसे क्या हो गया कि इतनी घटिया बात कह गया । इसकी तो रसोई तक पहुँच है, ख़ुद जाकर भी तो चाय ला सकता था । न हम प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह हैं और न यह प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग लाल कृष्ण अडवानी है । कौन सी हमारी जायदाद बँट रही थी । रात भर मन बैचैन रहा । ठीक से नींद भी नहीं आई ।

सवेरे अख़बार पासमें रखे चबूतरे पर बैठे, पढ़ने का मन ही नहीं हो रहा था । तभी पास से आवाज़ आई- भाई साहब, अगर मेरी बात से आपको कष्ट हुआ हो तो मैं क्षमा माँगता हूँ । हम तो भरे बैठे ही थे, उबल पड़े- दो मिनट इंतज़ार नहीं कर सकता था या अन्दर जाकर ख़ुद चाय नहीं ला सकता था? तेरी भाभी के घुटनों में परसों से दर्द है । रसोई में आकर चाय ले जाने को कह दिया तो कौन सी आफ़त आगई ? कुछ कहने से पहले सोच तो लेता ।

और फिर क्षमा माँगने का यह कौन सा कूटनीतिक स्टाइल चुना है ? 'अगर कष्ट हुआ हो तो..... । क्षमा माँगने वाला अपनी भूल समझकर जब दुखी होता है तो स्वयं अपनी आत्मा की शान्ति के लिए प्रायश्चित स्वरुप क्षमा माँगता है । इसलिए क्षमा कभी अगर-मगर के साथ नहीं होती । क्षमा याचना आत्मविश्लेषण के बाद पश्चाताप-विगलित मन का गंगा-स्नान है तो धन्यवाद कृतज्ञ मन की पुण्य-प्रणति । वैसे यदि कोई व्यक्ति अभिमानी है तो उसकी क्षमा तभी पूर्ण होती है जब वह अपने अभिमान को व्यक्त और अव्यक्त रूप से मार नहीं देता ।

इसके लिए अंगद द्वारा रावण को सुझाये गए क्षमा के तरीके से समझा जा सकता है । अंगद कहता है-
दसन गहहु तृण कंठ कुठारी । परिजन सहित संग निज नारी ॥
सादर जनक सुता करि आगे । एहि विधि चलहु सकल भय त्यागे ॥

प्रणतपाल रघुवंस-मणि त्राहि-त्राहि अब मोहि ।
आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि ॥

अब आज के प्रसंग में रावण कौन है और राम कौन ? तू जाने ।

राजनीति के 'बांकों" की बातें अलग है । ये न तो लड़ते हैं, न मरते हैं, न मारते हैं । केवल नाटकबाजी करते हैं । आज स्वार्थ के लिए टुच्ची बातें करके कल क्षमा माँग कर फिर दूध के धुले बन जाते हैं । तुझे कुछ बोलना ही नहीं चाहिए था । अपनों को स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं होती और दूसरे स्पष्टीकरण पर विश्वास नहीं करते । सो चुप ही रह । साइलेंस इज गोल्ड ।

तोताराम चाय लेने अपनी भाभी के पास चला गया । लौटा तो हाथों में चाय के दो गिलास और आँखों में वही सहज चमक । हम दोनों का कल्मष धुल चुका था ।

१९-६-२००९

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Jul 10, 2009

तोताराम के तर्क - मास्टर की


गाँव के बीच में बरगद का एक पेड़ था जिसके नीचे गर्मियों में बैठे गाँव के बुज़ुर्ग दुनिया जहान की बातें किया करते थे । पालतू पशु भी दोपहर में इसी के नीचे बैठे सुस्ताया करते थे । पास के कुँए से लोग पानी भरा करते थे । वहीं दो चार घड़े रखे रहते-सार्वजनिक प्याऊ के रूप में । कुएँ की खेळ में जानवर पानी पी लिया करते ।

समय बदला । कुएँ बेकार हो गए । अगर कभी नल में पानी आता तो जितना लोग भरते उतना ही टोंटी न होने के कारण रास्ते में फैल कर कीचड़ फैलाता जिसमें मक्खी मच्छर संरक्षण पाते । पशु गलियों में धक्के खाने लगे । कुए की खेळ में कचरा और पोलीथिन भर गए । कुएँ के चबूतरे पर आवारा लोगों की चंडाल चौकडी दारू के पाउच पीने लगी । बरगद पर राजनीति के प्रेत लटक गए ।

शाम को तोताराम इसी रास्ते से स्कूल से घर लौटते थे । जब भी धुंधलके में इधर से गुजरते तो आवाज़ आती-मास्टर की चाहिए । तोताराम परेशान । किससे पूछे, किसको बताये । मन ही मन चिंतित । रात को अच्छी तरह नींद नहीं आती । अब तो बरगद के पास से निकलते हुए डर लगाने लगा । वाक्य अधूरा । मास्टर की.... क्या ? सोचकर थक जाते । मास्टर की क्या चाहिए ? मास्टर की जान चाहिए, मास्टर की खोपड़ी चाहिए, मास्टर की नौकरी चाहिए । क्या चाहिए मास्टर की ?

एक दिन देश, समाज की सेवा करनेवाले एक महाप्राण से पूछा तो बोले -मास्टर जी, यह 'की' हिन्दी का कारक चिह्न नहीं है जिसके आगे की संज्ञा आप ढूँढ़ रहे हैं । यह 'की' अंग्रेज़ी संज्ञा है 'चाबी' वाली । बरगद से आवाज़ लगाने वाली वह पुण्यात्मा किसी चाबी के बारे में पूछ रही है । सो उसे चाबी देकर पीछा छुड़ाओ ।


मास्टर तोताराम घर आकर सोचने लगे । उनके पास न साइकल, न स्कूटर, न गोदरेज की अलमारी, न कार, न सूटकेस , न ट्रंक । कोई चाबी नहीं । दो ड्रेसें हैं जिनमें से एक अलगनी पर या खूँटी पर और दूसरी इस नश्वर शरीर पर । घर में मात्र दो पुराने ताले पड़े थे जंग लगे जिनकी कभी साल छः महीने में ज़रूरत पड़ती थी तो घर के मेन पर लटका जाते थे । सो एक दिन -एक छेदवाली और एक चपटी दोनों चाबियाँ चुपचाप तालों समेत बरगद के पेड़ के नीचे रख आए जिन्हें कबाड़ी उठा ले गया । आवाज़ का आना फिर भी चालू रहा । मास्टर तोताराम परेशान ।

अब उन्होंने समस्या सुलझाने के लिए किसी पत्रिका के मनो-विश्लेषक को पत्र लिखा । वह विशेषज्ञ थोड़ा जनरल नालेज भी रखता था । उसने उत्तर दिया - हमारे पास आपकी बीमारी का कोई इलाज नहीं है । हाँ, 'मास्टर की' एक ऐसी चाबी को कहते हैं जिससे सभी ताले खुल जाते हैं । मास्टर तोताराम फिर चिंतित । तोताराम के पास जो दो ताले और चाबी थे उनका यह हाल कि कभी-कभी वे ताले अपनी चाबी से ख़ुद तोताराम से भी नहीं खुलते थे । फिर उन चाबियों से किसी और के ताले खुलने का तो प्रश्न ही नहीं था ।

एक दिन मास्टर तोताराम को अचानक याद आया कि उन्होंने कभी एक फ़िल्म देखी थी जिसमें हीरो एक चाबी रखता था जिससे घुमा फिरा कर वह सारे ताले खोल लेता था । तोताराम को हँसी आगई । ऐसी चाबी तो अलादीन के चिराग से भी ज़्यादा बड़ी चीज होती है । कोई भी ताला खोल लो । पर किसी और का ताला खोलना तो चोरी है । तोताराम ने घबरा कर यह विचार छोड़ दिया ।

एक दिन गाँव में बड़ी चहल-पहल थी । चुनाव आगए थे । मंच बना बरगद के पेड़ के नीचे । नेता जी कह रहे थे- हमें 'मास्टर की' चाहिए । जब 'मास्टर की' हमारे पास होगी तो कोई भी पार्टी हमारे बिना सरकार नहीं बना सकेगी । हम चाहेंगें तो किसी भी सरकार को कभी भी गिरा सकेंगे । मास्टर को लगा वही बरगद के पेड़ वाला प्रेत प्रकट हो गया है । अब उसे विश्वास हो गया कि 'मास्टर की' उसके पास नहीं है । वह निश्चिंत हो गया । बरगद के पेड़ के पास से गुज़रने पर वह आवाज़ अब भी आती पर तोताराम को डर नहीं लगता । उसे लोकतंत्र के सार तत्व का पता चल गया था ।

एक दिन जब तोताराम स्कूल से घर लौट रहा था तो अचानक ठोकर लगी । ठोकर खाकर उठते समय उसे अपनी छेद वाली चाबी मिल गयी । पर अब समस्या यह थी कि ताला कोई उठा ले गया था । अब मास्टर बिना ताले की चाबी लेकर घूम रहा है । उसे तो ताला नहीं मिल रहा है पर लगता है लोकतंत्र के प्रेतों को जरूर 'मास्टर की' मिल गई है ।

अब उसे ख़ुद से ज़्यादा लोकतंत्र की चिंता सता रही है ।

१०-५-२००९

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Jul 9, 2009

तोताराम के तर्क - पासिंग द पार्सल


जैसे पीनेवालों को पीने का बहाना चाहिए वैसे ही जुआ खेलनेवालों और शर्त लगानेवालों के लिए भी बहानों की कमी नहीं है । बरसात होगी या नहीं, कौनसी टीम जीतेगी, इस मैच में कितने छक्के लगेंगे, सचिन की सेंचुरी बनेगी या नहीं आदि-आदि । ये तो बड़े मोटे सट्टे हैं । दो आदमी यदि हों तो वे कहीं भी सट्टा खेल सकते हैं और कुछ नहीं तो यही कि चलो जूती उछालते हैं । सीधी पड़े तो यह भाव और उलटी पड़े तो यह । लोग तो यहाँ तक सट्टा खेलते हैं कि यह जो मक्खी उड़ रही है, जब यह बैठेगी तो कहाँ बैठेगी या बिना कहीं बैठे ही चली जायेगी ? ऐसों पर कौन प्रतिबन्ध लगा सकता है । जहाँ मनुष्य के मन में उत्सुकता, अनिश्चितता, उतावली है, अनुमान है, विकल्प है वहाँ सब जगह सट्टे की संभावनाएँ बनती हैं ।

इसी तरह खेल भी मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है । जिनके खून में जोश है वे ताकतवाले खेल खेलते हैं । कुछ आलसी लोग ताश, चौपड़, चर-भर जैसे खेल खेलते हैं । कुछ लोग तो इतने खेल प्रेमी होते हैं कि अकेले ही दो खिलाड़ियों के पत्ते बाँट देते है और फिर ख़ुद ही बारी-बारी से रोल बदल-बदल कर खेलते रहते हैं ।

कल शाम जब घूम कर हम और तोताराम लौट रहे थे, रास्ते में एक मकान दिखाई दिया जिस पर लिखा था पार्टी कार्यालय । पार्टी का नाम कुछ धुंधला पड़ गया था इसलिए समझ में नहीं आया । मकान की खिड़की में से अन्दर नज़र गई तो देखा कि लोग एक गोल घेरे में बैठे हैं, सबके चहरे लटके हुए हैं । मातम का सा माहौल है । उनके पास एक डिब्बा है जिसे वे एक दूसरे को पकड़ा रहे हैं । संगीत बज रहा है । जैसे ही संगीत रुका तो डिब्बा नीचे गिर पड़ा । लोग एक दूसरे पर डिब्बा गिराने का दोष लगाने लगे । अंत में फाउल मानकर फिर खेल शुरू हुआ । संगीत बजने लगा । संगीत रुका । डिब्बा किसी के हाथ में नहीं । फिर नीचे गिर पड़ा । फिर फाउल । यही तमाशा चलता रहा ।

अंत में तोताराम से रहा नहीं गया और वह दरवाज़ा खोल कर अन्दर चला गया और ऊँची आवाज़ में कहने लगा - यह क्या तमाशा है ? खेलते हो तो ढंग से खेलो । जानबूझ कर पार्सल गिरा रहे हो । अरे, जिसके पास भी पार्सल रुकता है, खोलो और उसके अनुसार करो ।

पर किसी ने नहीं सुनी । बार बार पार्सल ही गिरता रहा । अंत में तोताराम को गुस्सा आगया । उसने लपक कर पार्सल ख़ुद ले लिया । सब लोगों ने राहत की साँस ली और भाग कर तोताराम को घेर लिया । जल्दी से पार्सल खोला तभी एक ठीकरा तोताराम के सिर पर आकर गिरा । सिर पर बड़ा सा गूमड़ उभर आया ।

पार्सल में लिखा था- जिसके पास भी यह पार्सल रुकेगा उसी के सिर पर हार का ठीकरा फोड़ा जाएगा ।

तोताराम फटे में टाँग फंसाने की अपनी आदत के कारण चोट खा बैठा ।

थोड़ा आगे चले होंगे कि फिर एक कार्यालय दिखाई दिया पर वहाँ मायूसी का माहौल नही था । सबके चेहरों पर जीत की खुशी चमक रही थी । तोताराम अपने गूमड़ को भूल कर फिर अन्दर झाँकने लगा पर हमने रोक लिया । कहा- न तो दरवाजे के अन्दर चलेंगे और न ही बीच में टाँग फँसायेंगे, दूर से ही समझने की कोशिश करेंगे । अन्दर झाँक कर देखा तो यहाँ भी वही पासिंग द पार्सल वाला खेल चल रहा था । उसी तरह लोग जान बूझकर पार्सल गिरा रहे थे ।

तभी अन्दर से एक पत्रकार टाइप आदमी निकला । हमने पूछा - भाई साहब , क्या यहाँ भी हार के कारणों का ठीकरा फोड़ने का चक्कर है ? उसने कहा- नहीं, यहाँ तो ये लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जीत तो गए पर जीते किस कारण से ?

१५-६-२००९

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Jul 8, 2009

तोताराम के तर्क - फिर बसंती की इज्ज़त का सवाल


८ मई २००९ की दोपहर, भयंकर गरमी, लू चल रही है, पारा पैंतालीस के पार, कूलर भी प्रभावहीन, तिस पर बुढ़ापा । बुढ़ापे में न सर्दी सहन हो न गरमी । अपनी जान लिए पड़े थे कि तोताराम ने दरवाजा भड़भड़ाया- 'मास्टर ज़ल्दी से उठ, वोट डालने चलना है । बसंती की इज्ज़त का सवाल है । सुन नहीं रहा, दाँता रामगढ़ (जिला सीकर) से उठी गुहार अब तक वातावरण में गूँज रही है ।'

सबसे पहले 'शोले' में रामगढ़ में गब्बर सिंह के हाथों बसंती की इज्ज़त खतरे में पड़ी थी पर तब मौके पर 'बीरू' पहुँच गए थे । सो इज्ज़त बच गई और बात आई-गई भी हो गई थी । तब मीडिया भी इतना सक्रिय नही था ।

अब समय बदल गया है । अब जब गत दिसम्बर में डीग-भरतपुर में दूसरी बार बसंती की इज्ज़त खतरे में पड़ी तो दूसरे ही दिन अख़बार में चीत्कार सुनाई पड़ गई ।

तोताराम हमारे साथ बैठा चाय पी रहा था । जैसे विष्णु भगवान ग्राह-ग्रसित गजराज की करुण पुकार सुन कर नंगे पाँव दौड़ पड़े थे वैसे ही तोताराम ने चाय बीच में ही छोड़ दी । कुर्ते-पायजामें में ही डिपो की तरफ़ दौड़ पडा और डीग की बस में बैठ गया । वहाँ जाकर ठण्ड खा गया सो अब तक खाँस रहा है ।

वहाँ बसंती की इज्ज़त बचने के चक्कर में बोगस वोट डालते पकड़ा गया । अधिकारी ने उसकी उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए डाँट कर भगा दिया वरना कैद भी हो सकती थी । जैसे अनुशासनहीनता के लिए किसी को पार्टी से छः साल के लिए निकाल दिया जाता है वैसे ही तोताराम को छः साल के लिए मताधिकार से वंचित कर दिया गया । यह बात और है कि ज़रूरत पड़ने पर अगले दिन ही ऐसे अनुशासनहीन सिपाही की घर वापसी भी हो सकती है ।

हम तो घुटने के दर्द का बहाना बना कर डीग जाना टाल गए । डीग में बसंती की इज्ज़त बच गई मतलब कि दिगंबर सिंह जीत गए । वैसे जो दिगंबर हो जाए उसे कौन बेइज़्ज़त कर सकता है ? और ऊपर से सिंह, किसकी हिम्मत हो सकती है ।

हमने कहा -'तोताराम, अगर चालीस साल पहले यह पुकार आती तो साहस किया जा सकता था । अब तो यह काम नए-नए मतदाता बने युवा को किसी कैटरीना कैफ के लिए करने दे । अब तो बसंती की भी षष्ठी-पूर्ति हो चुकी है और अपन भी वरिष्ठ नागरिक बन चुके हैं ।'

पर तोताराम ने बचने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा। ऑटो लेकर आया था । हमें ऑटो में धकेल कर मतदान केन्द्र की तरफ़ चल पडा । जैसी कि संभावना थी, हमें लू लग गई । सो नीम्बू पानी पी रहे हैं और सिर पर भीगा गमछा लपेटे पड़े हैं । बैचैनी में पता नहीं कौनसा बटन दब गया । अब आगे बसंती जाने और उसकी इज्ज़त ।


हमने कहा - 'तोताराम, आगे से किसी 'बसंती की इज्ज़त', 'किसी चूनड़ी की लाज', या किसी 'पसीने के क़र्ज़' के नाम पर हमें ब्लेकमेल मत करना । सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं । काम निकलने के बाद कोई हाल-चाल पूछने भी नहीं आता । घोड़ा खाए घोड़े के धणी को । ढेरी में सारे बैंगन काने हैं । उलटा-पुलटी करने से कोई फायदा नहीं । और इज्ज़त बार-बार राजस्थान में ही क्यों खतरे में पड़ती है ? यदि राजस्थान में इतना ही खतरा है तो इतना बड़ा देश पड़ा है कहीं और लगायें मज़मा । ऐसे लोकतंत्र के लिए शहीद होने से तो अच्छा है किसी ट्रक के नीचे आ जाएँ । कम से कम कलेक्टर दस हज़ार का पैकेज तो तत्काल घोषित कर देगा । यहाँ न कोई जनकनन्दिनी है और न अपन जटायु । पहले भी कई बीरू राजस्थान में आकर, टंकी पर चढ़ कर उल्लू बना कर चले गए ।'

तोताराम ने कान पकड़ कर तौबा की । तब तक पत्नी शिकंजी ले आई ।

९-५-२००९

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Jhootha Sach

May 12, 2009

करि आए प्रभु काज


आज़ादी के तत्काल बाद से ही उनकी आत्मा विभिन्न योनिओं- पंच, सरपंच, एम.एल.ऐ., एमपी, मंत्री, राज्यपाल आदि - में भ्रमण करने ले बाद पचासी बरस की होकर अपने बड़े से ड्राइंग रूम में विराजमान थी । सेवा का मेवा उनके रोम-रोम से टपक रहा था । इतनी उमर में तो साधारण आदमी दो-दो जनम भुगत लेता है । चहरे पर चमक, दमकता भाल, अधमुँदी सी आँखें मनो कोई शेर खा-पीकर जंगल में निश्चिंत विश्राम कर रहा हो । विभिन्न प्रकार के लोग आते-जाते, प्रणाम-जुहार करते । वे किसी को आँख उठा कर देखते, किसी के लिए आँख झपका देते, किसी की तरफ़ देखते भी नहीं और किसी के लिए हाथ भी उठा देते थे । सेवा का एक प्रभा मंडल उनके चारों और जगमगा रहा था ।

लोग कहते हैं कि वे बूढ़े हो गए हैं । और वे हैं कि सेवा की ललक अब भी दिल में फुदक रही है । उनका बेटा भी उन्हीं की परम्परा को आगे बढ़ा रहा है । अब तो पोता भी पच्चीस का हो गया है । यदि युवाओं से ही कोई तीर मारा जाने वाला है तो उनके पोते में क्या कमी है । पर लोग हैं कि उन पर परिवारवाद का आरोप लगा रहे हैं । जिन्होंने जन्म के साथ ही देश की सेवा का व्रत ले लिया हो वे अब देश सेवा के अलावा और कुछ करने के काबिल भी तो नहीं रहे । अब तो देश सेवा की आदत सी हो गई है । सारे परिवार का यही हाल है कि जब तक देशसेवा न करो तो नींद ही नहीं आती । आजकल तो चोर नकली पुलिस बन कर आने लगे हैं । नकली इंसपेक्टर घूमने लगे हैं ऐसे में जब तक सेवा करने का लाइसेंस न हो तो सेवा करने में भी चक्कर पड़ने का डर रहता है । अब तो लोग यमदूतों से भी पहचान पत्र माँगने लगें हैं, पता नहीं किसी विरोधी ने ही नकली यमदूत न भेज दिया हो । क्या ज़माना आ गया है । सेवा के लिए कोई न कोई पद होना ज़रूरी हो गया है ।

वे चिंतन और चिंता के बीच की मुद्रा में तन्द्रिल होकर झूम से रहे थे । तभी एक मरियल सा आदमी हाँफता हुआ आया, बोला- हुजूर! बचाइए, गज़ब हो गया । कुछ लड़कों ने मेरी रेहड़ी लूट ली है । सारे बाज़ार में तोड़-फोड़ मचा रहे हैं । अफरा-तफरी मची हुई है । दारू भी पिए हुए हैं । उन्होंने आँखें खोली, मुस्कुराए और बोले- तूने पढा नहीं रामचरित मानस में !

रखवारे जब बरजन लागे ।
मुष्टि प्रहार होने तब लागे ॥
जो न होति सीता सुधि पाई ।
मधुबन के फल सकहि कि खाई ॥

लगता है कि पोते को पार्टी का टिकट मिल गया है ।

५ मार्च २००९

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May 11, 2009

तोताराम की सिक्स पैक बॉडी



एक स्टूल पर चाय रखकर दूसरी स्टूल पर हम बैठे थे । तोताराम ने आते ही हमें खड़ा कर दिया और चाय चबूतरे पर एक तरफ़ रख दी । इसके बाद दोनों स्टूलों को दोनों हाथों में उठाकर ऊँचा कर दिया । स्टूलें गिरने लगीं तो हमने उन्हें थामकर एक तरफ़ रख दिया और कहा- यह क्या तमाशा है ? कहीं कंधे में झटका लग गया तो मुश्किल हो जायेगी । बुढापे में हड्डियाँ बड़ी मुश्किल से जुड़तीं हैं । तोताराम झुँझलाकर बोला- इस समय बुढापे की बातें करके मेरा मनोबल मत गिरा । अगर हड्डी टूट भी गई तो कोई बात नहीं । बस, एक बार चुनाव जीतने के बाद एम्स किसलिए है । पड़े-पड़े इलाज करवाते रहेंगें । पर चुनावों में एक बार मेरे सिक्स पैक जनता को दिखा लेने दे । अस्सी साल के ऊपर के बुड्ढे भी जब बाल रंग कर (यदि बचें हों तो) शक्तिवर्धक दवाएँ खाकर, जिम में डमबल्स उठाकर फ़ोटो खिंचवा रहे हैं कि कहीं सत्ता सुन्दरी उनकी जवानी पर फ़िदा होकर वरमाला ही डाल दे । वैसे भी जब से अमरीका में ओबामा आया है, सब तरफ़ जवानी-जवानी की गुहार लगी है । अभी मेरी उम्र ही क्या है ? वरिष्ठ नागरिक बने मात्र दो ही साल तो गुज़रे हैं । अस्सी साल पार के भी जब मुँह निकाल रहे हैं तो मैं क्या बुरा हूँ ।

हमने कहा- तोताराम, राजा और सेठ कभी बूढ़े नहीं होते । नाचने-गाने वाले तो खैर मेकप करते ही हैं । गरीब की ज़वानी बड़ी ज़ल्दी जाती है । बुढ़ापा बड़ी ज़ल्दी आता है । गरीबी का जीवन भी ज़्यादा लंबा नहीं होता । गरीब को ये नाटक शोभा नहीं देते । जब बड़े आदमी जवान दिखने का नाटक करते है तो उनके चारों तरफ़ बीसों आदमी होते हैं संभालने के लिए । यदि आज मैं नहीं पकड़ता तो दोनों स्टूलों का और तेरा कबाड़ा हो जाता ।

पर तोताराम कहाँ मानाने वाला था, बोला- चाहे जवानों की लाख गुहार मची हो पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के उम्मीदवार संन्यास आश्रम में पहुँच चुके हैं । उधर करुणानिधि, बाल ठाकरे आदि कौनसे जवान हैं ? पुराना चावल, पुरानी शराब, पुराना घी और पुरानी प्रेमिका- इनकी बात ही कुछ और है । हमने उसे ताऊ भग्गू का किस्सा याद दिलाया जो बुढापे में बच्चों के साथ कूदने का कम्पीटीशन करके पैर में स्थायी मोच खाकर आज नब्बे साल की उम्र में लंगड़ा कर चलने को मज़बूर हैं । पर उसने हमारी एक न सुनी । जिसके सिर पर मौत या इश्क सवार हो जाते हैं वह किसीकी नहीं सुनता । तोताराम ने कुरते की बाहें ऊँची करके अपने जैसे भी थे सिक्स पैक दिखाए । पर उसे पता नहीं कि दुनिया सिक्स पैक से आगे निकल कर सिक्सटी पैक तक पहुँच गयी है ।

हमने भी तोताराम को पैक करके चाय की प्याली उठायी और तोताराम के बिना ही चीयर्स करके पी गए ।

५ मार्च २००९

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Feb 8, 2009

मुझसे मत पूछ मेरे इश्क में क्या रखा है


जब सूचना के अधिकार की बात चली थी तो क्या पता था कि 'बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी' । सोचते थे कि एक तो वैसे ही भारत की जनता डरपोक है । सरकारी विभागों में जाने से ही घबराती है । चली भी गई तो चपरासी से ही बात करके लौट जायेगी । क्लर्क तक पहुँचेगी तो कोई भी कह देगा कि बाबूजी चाय पीने गए हैं या साहब ने बुला रखा है । अगर ज़्यादा ही हुआ तो पूछ लेगी कि राशन की दुकान में चीनी नहीं आई है । कब तक आयेगी ? और जो भी उत्तर दिया जाएगा सुन कर वापस चली जायेगी । पर साहब, क्या ख़राब ज़माना आ गया है कि जनता यह तक जानना चाहती है कि न्यायाधीशों, मंत्रियों के पास कितनी संपत्ति है ।

अंग्रेजों के ज़माने में तो कोई नहीं पूछता था कि फलाँ सेठ साहब बहादुर के पास क्यों गया । मिठाई के डिब्बे में 'डाली' के नाम पर उसमें कितने नोट डाल कर दे आया । अब डेमोक्रेसी क्या आगई कि लोग घर के अन्दर झाँक कर देखना चाहते हैं । पेट फाड़ कर देखना चाहते हैं कि आज नेताजी ने क्या खाया । अरे, जो मिल गया सो खा लिया । कल जब प्याज़ से रोटी खाते थे तब तो कोई नहीं पूछने आया कि - नेताजी पेट भरा कि नहीं । आज इतने दिन पापड़ बेलने, बड़े-बड़े नेताओं के जूते उठा-उठा कर जनता की एक छोटी सी सेवा करने का मौका आया है तो सेवा भी ढंग से नहीं करने देते । अरे, जब हमारी पार्टी का शासन नहीं रहेगा तो दूसरी पार्टीवाले पाँच साल प्राण खायेंगे ही । वैसे हम जानते हैं कि होगा कुछ नहीं क्योंकि यदि ऐसा ही होने लगे तो कोई भी नेता जेल से बाहर दिखाई नहीं देगा । सब एक दूसरे को जानते हैं कि धोती के भीतर सब नंगे हैं । फिर भी अखबारों में कुछ न कुछ उछलता रहेगा । थोड़ा बहुत टेंशन तो रहेगा ही । अब तो कम से कम शान्ति से रहने देते ।

जब लोगों से पैसा उधार माँग कर चुनाव लड़ते हैं और हार जाते हैं और उधारवाले कपड़े फाड़ते हैं तब तो किसी को दया नहीं आती । जब अपने पैसे से ट्रक भर कर अमरूदों वाले बाग या बोट क्लब पर धरना या रैली करने जाना पड़ता है तो नानी याद आ जाती है । जेब से पैसे निकलते है तो कलेजा कटता है । लोग तो भगवान तक को खोटा पैसा चढ़ा कर खिसक लेते हैं । मन्दिर में दीये में शुद्ध घी की जगह डालडा जलाते हैं और मनोकामना करते हैं लाखों की लाटरी लगने की । तब तो भगवान को धोखा देते हुए नैतिकता नहीं जागती । कहते है वोट दिया है । क्या गारंटी है कि मुझे ही दिया है । वैसे भी वोट डालना लोकतंत्र में सबका कर्तव्य है । वोट डाल कर किसी पर कोई अहसान थोड़े ही किया है । कम वोट पड़ते तो भी कोई न कोई तो जीतता ही । कोई भी वोट न डाले तो भी यह कहाँ कहा गया है कि लाटरी डाल कर फैसला नहीं किया जा सकता । और ज्यादातर ने तो अडवांस में पैसे या दारू की थैली ली है ।

हाँ, जिन्होंने नक़द पैसे दिए हैं उनका काम करना है । सबसे पहले उधार चुकाई जाती है या धरम-पुण्य किया जाता है । और इसके बाद अगला चुनाव भी लड़ना है । दिन पर दिन महँगाई बढ़ती जा रही है । इन लोगों को क्या पता कि बीस-तीस लाख के बिना तो चुनाव में पार्टी का टिकट नहीं मिलता । झंडे, पोस्टर, जीपें, दारू, भाई लोगों का खर्चा पानी अलग, बूथ केप्चर करने वाले स्वयंसेवक अलग, देशी-विदेशी कट्टे - कोई मजाक नहीं है, इस अंधे काम में अंधे होकर पैसे डालना । इन नौकरी करनेवालों को क्या पता । इन्हें तो महीने की महीने तनख्वाह मिल जाती है चाहे काम करो या न करो । चाहे मास्टरों के सारे विद्यार्थी फेल हो जायें, डाक्टर के सारे मरीज़ मर जायें, पुलिस एक भी अपराधी न पकड़ पाए पर तनख्वाह पर कोई फ़रक नहीं पड़ता । ये लोग खरीदेंगें भी तो बचत पत्र- जिनमें कोई खतरा नहीं । पर हमारा तो चुनाव में सारा पैसा भी पानी में जा सकता है ।

खैर ! आपको बताया है कि राजनीति कोई इतना आसन काम नहीं है जितना आप समझ रहे हैं । वैसे पैसे के अलावा हमें कोई चिंता नहीं है क्योंकि हम ही थोड़े हैं इस लोकतंत्र में 'सूचना के अधिकार' के दायरे में । हम से भी बड़े-बड़े मगरमच्छ पड़े हैं जो चाहें भी तो हिसाब नहीं दे सकते क्योंकि उन्हें ख़ुद को ही पता नहीं कि उनके नामी या बेनामी कितने प्लाट हैं । जितना पैसा है यदि उसे ही गिनते रहें तो उमर बीत जाए । सो भइया वे ही सब रक्षा का इंतजाम करेंगे । चोर-चोर मौसेरे भाई । बड़े भाइयों के रहते अपने को क्या चिंता ।

और जब परदे पर कहानी की माँग पर सब कुछ दिखा देनेवाली नायिका ही मना कर रही है - 'मुझसे मत पूछ मेरे इश्क में क्या रखा है' ? तो हमारे ही पीछे क्यों पड़े हो भाई !

(सन्दर्भ: जज, नेता, मंत्री- कोई भी सूचना के अधिकार के तहत अपनी संपत्ति की घोषणा नहीं करना चाहता ।)

३ फरवरी २००९

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Feb 7, 2009

कर और कमल के बीच अर्जुन सिंह की टाँग


यूँ तो नेताओं की टाँगें सामान्य से ज़्यादा लम्बी होती हैं । वे जहाँ चाहें उन्हें अड़ा सकते हैं पर अर्जुन सिंह की टाँगें कुछ ज़्यादा ही लम्बी हैं । वैसे जो भी केन्द्र में शिक्षा मंत्री होता है उसके लिए और नहीं तो कम से कम इतिहास में टाँग अड़ाना तो ज़रूरी हो ही जाता है । इतिहास में टाँग अड़ाने का सिलसिला १९७७ में जनता पार्टी के शासन में शुरू हुआ था । तब ९ वीं, १० वीं की इतिहास की पुस्तकों में से कुछ अध्याय निकलवाये गए थे । इंदिरा गाँधी का गड़वाया गया काल-पात्र भी फिर से खुदवा कर निकलवाया गया । पर शर्म की बात यह थी कि उस काल-पात्र में इंदिरा गाँधी का कहीं नाम ही नहीं था सो चुपचाप वापस गड़वा दिया गया । भाजपा ने भी शासन में आने पर इतिहास सुधारने का प्रयत्न किया । फिर तो यह परम्परा राज्यों में भी चल पड़ी । इतिहास नहीं हुआ, मज़ाक हो गया । जो इतिहास में शामिल होने लायक नहीं होते, वे चले आ रहे इतिहास से छेड़छाड़ करते हैं ।

यूँ तो कर-कमल, चरण-कमल, मुख-कमल, कमल-नयन आदि बहुत से रूपक चले आ रहे हैं । पहले तो अर्जुन सिंह जी को ध्यान ही नहीं आया कि भाजपा क्यों जीत गयी । फिर उन्हें पता चला कि भाजपा के जीतने का कारण कमल का निशान है । अब समस्या यह है कि न तो कमल को लक्ष्मी जी के नीचे से खींच कर हटाया जा सकता, न केन्द्रीय-मंत्री कमलनाथ का नाम बदला जा सकता, न ब्रह्मा जी, विष्णु, गणेश या सरस्वती जी के हाथ से कमल का फूल छीना जा सकता । वैसे पता नहीं कि उन्हें यह याद है कि नहीं कि राजीव का अर्थ भी कमल ही होता है । भले ही अर्जुनसिंह राम-मन्दिर या राम-सेतु से ख़फ़ा हों पर यदि उन्होंने गीतावली पढ़ी होगी तो वे यह अवश्य जानते होंगे कि तुलसी ने लिखा है- 'राजीवलोचन राम चले तजि बाप को राज बटाऊ की नांई' । यह सब कुछ कर पाना संभव नहीं हो रहा है तो २००८ जून में अर्जुन सिंह जी ने सोचा कि क्यों न केन्द्रीय विद्यालय संगठन के प्रतीक चिह्न में से ही कमल को निकलवा दिया जाए । केंद्रीय विद्यालय संगठन के प्रतीक में कमल ही नहीं, सूर्य भी है । मेरे ख्याल से कमल शिष्य का प्रतीक है और सूरज गुरु का, जो अपने प्रकाश से शिष्य ही नहीं वरन समस्त सृष्टि का अज्ञान का अन्धकार दूर करता है । सबसे पहले चुनावों में रामराज्य पार्टी का चुनाव-चिह्न था 'उगता हुआ सूरज '। उस समय अर्जुन सिंह जी इतने प्रभावशाली नहीं थे वरना तो सूरज का उगना भी कम से कम चुनावों में तो बन्द करवा ही देते ।


पिछले दशक में आम चुनाव के समय कुछ ऐसे ही महान लोगों के कहने पर चुनाव आयोग ने 'व्हील ' नामक वाशिंग पाउडर और एक विज्ञापन 'कमल सा खिल जाए' पर भी रोक लगा दी थी । क्या कहेंगे आप चुनाव आयोग द्वारा भारतीय-जनता के बौद्धिक स्तर के मूल्यांकन पर । क्या वह कमल का नाम सुनकर भाजपा को वोट दे देगी या व्हील पाउडर के विज्ञापन से जनता-दल को जिता देगी ? अगर ऐसा ही होता रहा तो बेचारे मुलायम के चुनाव-चिह्न के चक्कर में चुनाव के दिनों में गरीब लोगों का साइकल चलाना बन्द करवा दिया जाएगा । चुनाव के दिनों में, गावों में जहाँ बिजली नहीं आती, वहाँ भी लालटेन जलाने पर पाबंदी लगा दी जायेगी क्योंकि लालटेन लालू का चुनाव-चिह्न है ।

हम तो यह मानते हैं कि कर और कमल का शाश्वत मेल है । सारे उद्घाटन और शिलान्यास के पत्थरों पर 'अमुक के कर कमलों से' लिखा हुआ है । क्या सबको उखाड़ देंगे ? हम तो सोचते थे कि सब नेताओं के कर कमल हो जायेंगे और सहयोग से काम करेंगे । लोकतंत्र की खासियत तो यही होनी चाहिए कि चुनाव लड़ो और परिणाम आने पर जो भी पार्टी सरकार बनाये काम सब मिल कर करें क्योंकि लक्ष्य तो सबका देश का विकास करना है । पर नहीं, पाँच साल तक एक दूसरे की टाँग खींचते रहेंगे । इसी तरह से साठ साल से जूतम-पैजार देख रहे हैं ।

हे प्रभु, इन सबको सद्बुद्धि दे कि ये राजनीति के कीचड़ में भी कमल की तरह उज्ज्वल रहें और केवल पार्टियों के कर और कमल ही नहीं, सारे देश के लोग एक दूसरे के हाथ थाम कर आगे बढ़ें ।

२ फरवरी २००९

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साइकिल के अंधे को भगवा ही भगवा


राजस्थान के शिक्षा विभाग की लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिलें बाँटने की योजना थी । कुछ साइकिलें बाँट दी गयीं और कुछ को बाँटा जाना बाकी था । तभी हुआ यह कि सरकार बदल गयी । पिछली सरकार भाजपा की थी और भाजपा की पितृ-पार्टी का रंग भगवा है तो सरकारी साइकिल का रंग भी भगवा होना ज़रूरी था । सो साइकिल का रंग भगवा हो गया । वैसे तो भगवा रंग भारत के तिरंगे झंडे में सबसे ऊपर है पर उसकी भी एक शर्त है कि यदि भगवा रंग है तो उसके साथ उतनी ही मात्रा में सफ़ेद और हरा रंग भी होना चाहिए । यदि यह झंडा कांग्रेस का है तो रंग तो ये ही रहेंगे पर बीच में चक्र की बजाय चरखा होना चाहिए । चक्र तो चरखे में भी है पर चरखा आज किसे चलाना आता है ? राहुल गाँधी को भावी प्रधान-मंत्री के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है तो चरखा तो चलाना आना ही चाहिए । कपड़े भले ही कोई खादी के न पहने पर गाँधी जयन्ती पर दो चार मिनट तक चरखा कातने की मज़बूरी तो है ही सो राहुल गाँधी आजकल चरखा चलाना सीख रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ चूँकि वीर संगठन है इसलिए उसने केवल भगवा रंग ही रखा है । गाँधी में ज़्यादा विश्वास न होने के कारण चरखा कातना उनके लिए आवश्यक नहीं है । यह बात और है कि हमने दिल्ली के केशव-कुञ्ज में अधिकतर बुजुर्गों को शुद्ध खादी ही पहने देखा है ।

तो बात हो रही थी साइकिल के रंग की । हमें साइकिल चलानी नहीं आती इसलिए हम साइकलों को बड़ी हसरत से देखते हैं । इस घूरने में हमने पाया कि साइकिलों का रंग प्रायः काला ही होता है । इसके बाद वाहन केवल यात्रा के ही साधन नहीं रहे, वे स्टाइल मारने के साधन भी हो गए । तो फिर उनके रंगों पर ज़्यादा ध्यान दिया जाने लगा । सो साइकिल के रंग भी लाल, नीले, हरे आदि होने लगे । पर यह सच है कि हमने अभी तक भगवा रंग की साइकिलें नहीं देखीं । सो जो बँट गई सो बँट गईं, अब जो बँटेंगी उनका रंग काला होगा । चलो हम तो कांग्रस के अशोक गहलोत की समझ और सादगी की दाद देते हैं कि उन्होंने साइकिलों का रंग तिरंगा नहीं करवाया वरना कभी न कभी ऐसी साइकिलों के कारण तिरंगे के अपमान का मुद्दा भी कोई न कोई देशभक्त उठा ही सकता था । 'ब्लेक इज फार एवर' । और काले रंग पर दूसरा रंग चढ़ भी नहीं सकता । पक्का काम । और काला किसी पार्टी का रंग भी नहीं बल्कि काले रंग से तो सब डरते हैं, चाहे काले झंडे हों या बाँहों पर काली पट्टी ।

रंगों से आदमी को ज़्यादा परेशानी होती है क्योंकि वह रंगों को स्वाभाविक नहीं रहने देता वह उन से प्रतीक बनाता है, संकेत और भाषा बनता हैं । उसे गाड़ी को चलने के लिए हरा रंग, रोकने के लिए लाल रंग चाहिए; संधि करनी हो तो सफ़ेद रंग से संकेत दिया जाता है । हालाँकि कहा जाता है सांड लाल कपड़े से चिढ़ता है पर वास्तव में सांड को रंगों के इतने भेद मालूम ही नहीं हैं । चिढ़ता तो वह अपने सामने बार-बार कपड़ा हिलाने से है । बहुत से पशुओं को केवल काला और सफ़ेद रंग ही दिखते हैं । मनुष्य को भी कभी रंग अन्धता हो जाती है । सावन के अंधे को हमेशा हरा ही हरा दीखता है । सच्चे पार्टी-भक्त को भी ऐसी ही रंग अन्धता होती है पर समझदार लोग इस चक्कर में नहीं पड़ते । वे उस पार्टी का रंग ही देखते हैं जिसकी सरकार बनने वाली होती है । वे गिरगिट से भी ज़ल्दी रंग बदल लेते हैं । गिरगिट निंदा का पात्र नहीं है क्योंकि वह तो अपनी प्राण-रक्षा के लिए रंग बदलता है मगर जो केवल सत्ताधारी पार्टी में जाकर केवल नोट कमाने के लिए रंग बदलना चाहते हैं वे गिरगिट से भी बदतर हैं ।

प्रकृति को देखो, वह रंग बदलती है- क्षण-क्षण रंग बदलती है । बताइए कौन सा रंग बुरा लगता है ? उसके सारे रंग सबकी आँखों के लिए हैं । सबको सुहाते हैं । रंगों की पार्टी मत बनाइये । हर रंग को पहचानिये । उसको समझिये । कभी आदमी खून की कमी से पीला पड़ जाता है, कभी डर से पीला पड़ जाता है, कभी प्यार से शरमा कर गुलाबी हो जाता है, कभी गुस्से से लाल-पीला हो जाता है, कभी उसकी तबियत हरी हो जाती है, कभी आँखों के आगे स्याह अँधेरा छा जाता है, कभी लहू का लाल रंग सड़कों पर बिखर जाता है, कभी खून का यही लाल रंग उसकी आँखों से टपकने लग जाता है । इन रंगों का मतलब समझकर उसके सुख-दुःख में शामिल होइए ।

अब तो प्रकृति हजारों-हज़ार रंगों में प्रकट हो रही है । ये सब हमारे ही जीवन के रंग हों । हम सब इन रंगों में रंग जाएँ । छोड़िए पार्टियों के कीचड़ में रँगे साइकिलों के रंग । साइकिल रंग से नहीं चलती, वह चलती है चलाने वाले की टाँगों की ताकत से और साइकिल के संतुलन से सो इन्हें बनाये रखने पर ध्यान दें । और यह तय करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि साइकिल की मंजिल क्या है ?

(सन्दर्भ :राजस्थान में स्कूल जानेवाली ग्रामीण लड़कियों को सरकार द्वारा मिलनेवाली साइकिलों का जो रंग वसुंधरा राजे ने पार्टी की राजनीति करने के चक्कर में भगवा रखवाया था उसे अब दी जानेवाली साइकिलों में काला रखा जाएगा -एक समाचार, ३० जनवरी २००९ )


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Dec 30, 2008

तोताराम के तर्क: आतंकवाद का अंतुले-सिद्धांत



वैसे तो राजनीति में आने और पद पाने के बाद अंतुले ही क्या, कुत्ता भी जय जैवन्ती गाने लग जाता है, सूअर भी डायरिया होने के डर से बोतलबंद पानी पीने लग जाता है, गधा भी अंगूर छील कर खाने लग जाता है । हम तो अपनी 'आधी और रूखी' में ही खुश हैं पर जब अंतुले ने मुम्बई कांड के बाद संसद में आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कानून बनाए जाने के दौरान १७ दिसम्बर को जो अप्रासंगिक बात निकाली उससे बड़ी कोफ़्त हुई । अगले दिन जैसे ही तोताराम आया, हम चालू हो गए- यह क्या तोताराम, सभ्य समाज में चार आदमियों के बीच बैठा आदमी छींकते समय नाक के आगे रूमाल रख लेता है, उबासी लेते समय मुँह के आगे हाथ कर लेता है, आदमी सड़क की तरफ़ पीठ करके पेशाब करता है, कुत्ता भी सड़क के बीच पेशाब नहीं करता बल्कि एक किनारे कहीं झाडी-कूड़े पर जाकर टाँग उठाता है, खाना खाते समय आदमी सोचता है कि ज़्यादा आवाज़ न हो, भले आदमियों के बीच साला पादने का भी एक सलीका होता है पर इस अंतुले को देखो, अस्सी साल की उमर हो गई पर इतना होश नहीं कि संसद में बैठ कर क्या बोल रहे हैं । सारी दुनिया देख-सुन रही है और ये महाशय कितनी खतरनाक और अनर्गल बात मुँह से निकल गए । अगर उचित-अनुचित का होश नहीं है तो आदमी चुप बैठे, बोलना क्या ज़रूरी है ? कहा भी है, -
बोली एक अमोल है, जो कोई बोले जानि ।
हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि ॥

तोताराम मुस्कराया, बोला- मास्टर, यह राजनीति है, इसमें उचित-अनुचित, समय-असमय कुछ नहीं होता । राजनीति में कभी-कभी असम्बद्ध लगने वाली बात भी बड़ी सोची समझी होती है और उसके भी बड़े दूरगामी परिणाम निकलते हैं । यह तो तुझे मालूम ही होगा कि विचार और शब्द कभी नष्ट नहीं होते । वे सृष्टि के सर्वर में ई-मेल की तरह सुरक्षित रहते हैं और कम्प्यूटर खोलते ही प्रकट हो जाते हैं । इसलिए अपने मतलब की बात वक्त-बेवक्त छोड़ते रहना चाहिए । यह राजनीति का 'अंतुले-सिद्धांत' है । अंतुले -सिद्धांत के अनुसार हेमंत करकरे को मरवाने के लिए किसी संघ समर्थक ने उसे ताज होटल की बजाय हॉस्पिटल भिजवा दिया जहाँ आतंकवादियों ने नहीं वरन किसी और (?) ने उसकी हत्या कर दी । इस 'और' का मतलब तो तू समझता ही है । मतलब की करकरे की हत्या के लिए पाकिस्तान से आए आतंकवादी नहीं बल्कि मालेगाँव बम-काण्ड के आरोपी लोग ज़िम्मेदार हैं ।

हमें बड़ी कोफ़्त हुई, कहा- इस अंतुले-सिद्धांत के अनुसार तो हिटलर को बदनाम कराने के लिए यहूदियों ने स्वयं को गैस चेम्बरों में बंद करके आत्महत्या करली, बुश ने आतंकवाद से लड़ने के बहाने दो टर्म तक अपनी कुर्सी पक्की करने के लिए ख़ुद ही ९/११ वाली घटना करवा दी, हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए नरेन्द्र मोदी ने स्वयं ही गोधरा कांड करवा दिया और कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने लिए मुसलमानों को मरवा दिया, भा.जा.पा. ने चुनावी मुद्दा खड़ा करने के लिए मुम्बई-कांड करवा दिया । छी, क्या घटिया सोच-विचार है!

तोताराम बोला- सौ प्रतिशत इसी तरह न हो तो भी राजनीति हमेशा अपना ही हित देखती है । कौए की दृष्टि हमेशा गंदगी पर ही रहती है । मुम्बई कांड से ज़्यादा लोग तो रोजाना भूख से मर जाते होंगे । बात जनता का मरना नहीं है, जनता तो मरती ही रहती है । जनता को तो मरना ही है । आतंकवादी नहीं मारेंगें तो किसी नेता के जन्म-दिन के लिए फंड जुटाने वाले कार्यकर्ता मारेंगे । अब चाहे अंतुले माफी माँग लें पर उनके सिद्धांत ने चुनाव से पहले संकेत तो भेज ही दिया अपने वोट बैंक के पास । शक के कीटाणु एक बार दिमाग में घुसने के बाद कभी समाप्त नहीं होते ।

याद रख बन्दर कितना ही बूढ़ा हो जाए गुलाटी मारना कभी भूलता । यह कुत्ते वाली पूँछ है । कहा भी है, 'राखो मेलि कपूर में हींग न होए सुगंध ।'

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२७ दिसम्बर २००८



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Dec 22, 2008

जूते की नोक पर


(फरवरी २००८ में मायावती जी की आत्मकथा प्रकाशित हुई थी जिस के लिए हमने उन्हें बधाई देते हुए पुस्तक की काल्पनिक समीक्षा 'जूते की नोक पर' शीर्षक से की थी । वही संतों के रसास्वादन के लिए यहाँ प्रस्तुत है । )

मायावती जी,
बधाई हो । हमारी पेंशन में से पैसा बिल्कुल नहीं बचता वरना हम अखबारों में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छपवा कर आपको बधाई देते । आप हमारी मज़बूरी समझती होंगी । मात्र एक पत्र लिख कर ही काम चला रहे हैं । आशा है आप इसे सुदामा के चावल, शबरी के बेर, विदुर पत्नी का शाक और करमा बाई की खिचड़ी मान कर स्वीकार करेंगी । बधाई के दो कारण हैं- एक तो आपकी आत्मकथा का प्रकाशन और आपकी साफगोई । नरसिंह राव ने एक उपन्यास पंद्रह साल में पूरा किया । अपने इतने व्यस्त जीवन में से समय निकलकर लिखा जो आने वाले समय में लेखकों को, और राजनीति में उच्च मूल्यों को अपनाने के लिए भावी नेताओं को, प्रेरणा देगा । अज्ञेय जी ने पचास पृष्ठों की एक पुस्तक- 'कितनी नावों में कितनी बार' लिखी । उस पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया । हम जानते हैं कि आपकी इस एक हज़ार पृष्ठ की पुस्तक पर ये मनुवादी ज्ञानपीठ पुरस्कार तो दूर की बात है, अकादमी अवार्ड भी नहीं देंगें । पर कोई बात नहीं, प्रेमचंद और निराला को भी कोई पुरस्कार नहीं मिला था । सच्चा पुरस्कार तो जनता का प्यार होता है ।

गाँधी जी की आत्मकथा संसार की सर्वश्रेष्ठ आत्मकथाओं में से एक मानी जाती है क्योंकि उन्होंने इसमें ईमानदारी का परिचय दिया है । हमें तो आपकी आत्मकथा में गाँधी जी से भी ज़्यादा ईमानदारी और साफगोई लगी । आजकल के राजनीतिज्ञ बड़े घाघ, ढोंगी और झूठे होते हैं । एक दूसरे को देख कर ऊपर से हाथ मिलायेंगें, मुस्करायेंगे और अन्दर से गला दबाने की सोचेंगे । आपने ऐसा झूठ नहीं बोला । आपने तो साफ कहा है कि मैंने भारतीय जनता पार्टी को हमेशा जूते की नोक पर रखा है । वैसे जब कल्याण सिंह के साथ छः-छः महीने का समझौता हुआ था तब भी हमने उसी दिन लिख दिया था कि जब कल्याण सिंह का बैटिंग करने का नंबर आएगा तो आप पारी डिक्लेयर कर देंगी । और वही हुआ ।

हिट जोडी है ओपनर, माया-कांसीराम ।
पेवेलियन में जप रही, बी.जे.पी. श्रीराम ।
बी.जे.पी. श्रीराम, आयगी जब तक बारी ।
तब तक ये दोनों, घोषित कर देंगे पारी ।
कह जोशी कविराय, मारती माया छक्के ।
औ कल्याण गली में, ताकें हक्के-बक्के ॥

लोकतंत्र की शक्ति का, कैसा ठोस प्रमाण ।
क्रमशः कुर्सी पर रहें, माया और कल्याण ।
माया औ कल्याण, आज माया की बारी ।
छः महीने में उभर, आयगी फिर बीमारी ।
कह जोशी कविराय, हमें होती आशंका ।
सूर्पनखा फुँकवा ना दे, भाई की लंका ।
(संसदीय इतिहास का अनूठा प्रयोग । माया व कल्याण बारी-बारी से मुख्यमन्त्री होंगे । एक समाचार-२० मार्च १९९७ )


वास्तव में सच ही कहा है- 'ग्रेट मेन थिंक अलाइक' बस फर्क इतना ही हैं कि आपकी एक हज़ार पेज की पुस्तक छप गई और हमारे कुण्डलिया छंद 'संपादक के नाम पत्र' तक ही पहुँच पाए । वैसे कल्याण सिंह आपके राखीबन्द भाई हैं । उन्होंने आपको मुलायम सिंह के गेस्ट हाउस कांड से बचाया था पर इसके लिए अपने आभार प्रकट कर तो दिया और क्या चाहिए । आभार अपनी जगह और राजनीति अपनी जगह । प्रारंभिक दिनों में 'तिलक, तराजू और तलवार...' काव्य पंक्तियों में भी आपने स्पष्टता का परिचय दिया था । आशा करें कि वर्तमान में ब्राह्मणों पर दिखाया जा रहा प्रेम राजनीति नहीं बल्कि वास्तविक होगा ।

बात जूतों की । पहले राजपूत नुकीले जूते पहना करते थे कि यदि कभी हथियार उठाने का समय नहीं मिले तो जूतों की नोक पर, नहीं तो जूतों की नोक से ही शत्रु को घायल कर दें । शोले फ़िल्म में संजीव कुमार गब्बर सिंह को एक साथ दोनों जूतों से मारते हैं पर हमें यह फ़ोटोग्राफ़ी का करिश्मा ही अधिक लगता है । एक साथ दोनों जूतों से मारने से बेलेंस बिगड़ने का खतरा रहता है । ठोकर मारने या किक मारने में भी एक बार में एक ही पैर काम में आता है जिसका जो भी पैर चलता हो । सभी के दोनों पैर सामान भाव से नहीं चलते । बच्चा जब रास्ते में पत्थरों को ठोकर मारता चलता है तो माता-पिता उसे मना करते हैं क्योंकि इससे जूते टूटते हैं और जूते आपको पता है कि बहुत मँहगे आते हैं । आजकल जूते होते भी बहुत कोमल हैं । जूते की नोक पर मारने के लिए चमरौधे के जूते ठीक रहते हैं । वज़नदार, मज़बूत, खुरदरे और सस्ते भी । हमारे यहाँ अब भी गावों में चमरौधे के जूते बनते हैं जिनको पहन कर लोग काँटों की बाड़ पर भी चल लेते हैं । कहें तो भिजवायें दस-बीस जोड़ियाँ क्योंकि जब आप प्रधान मंत्री बन जायेंगी तो जूतों का कंज़म्पशन और भी बढ़ जाएगा ।

भारतीय राजनीति में इस कला को जयललिता ने भी काफी ऊँचाई प्रदान की है । उन्होंने इस कला से कभी कांग्रेस, कभी भा.जा.पा., कभी करूणानिधि सबको सम्मानित किया है । यहाँ तक कि शंकराचार्य को भी नहीं बख्शा । सुना हैं उनके पास दस हज़ार जोड़ी सेंडिल और चप्पलें हैं । आपके पास कितने जोड़ी हैं ? हमारे पास तो बस हवाई चप्पलों की एक जोड़ी है जो फट-फट तो बहुत करती पर उसमें मारक क्षमता बिल्कुल नहीं है ।

हमने जूतों के बारे में एक लेख लिखा था जो कादम्बिनी में छपा भी था । उसमें हमने जूतों के माहात्म्य का वर्णन किया था- बिना जूतों के सुदामा से लेकर मधु सप्रे और मिलिंद सोमण के जूतों के विज्ञापन तक का । उसमें हमने जूतों को अस्त्र और शस्त्र दोनों माना है- हाथ में लेकर मारो तो शस्त्र और फ़ेंक कर मारो तो अस्त्र । चाँदी का जूता ब्रह्मास्त्र होता है । दम लगाने पर भी 'जूते की नोकपर मारने' वाली बात उसमें छूट ही गई । वैसे जूता विवाद और संवाद, संधि और विग्रह- दोनों में काम आता है फ़र्क बस इतना है कि संधि और संवाद में जूतों में दाल बँटती है और विग्रह और विवाद में चाँद गंजी होती है । दूल्हे के जूतों को राजस्थानी में बिनोटा कहते हैं और गरीब के जीर्ण-शीर्ण जूतों को खूँसड़ा कहते हैं । जैसे कि उल्टी-सीधी हरकतें करने वाले बड़े आदमी को परमहंस कहते हैं और यदि वे ही हरकतें कोई गरीब आदमी करे तो उसे पागल कहा जाता है ।

हम आपके साहस और स्टाइल की दाद देते हैं लेकिन कामना भी करते हैं कि सब जगह से उपेक्षित ब्राह्मणों को अपनाने के बाद आप भाजपा की तरह से उनको भी जूतों की नोक पर नहीं मारेंगीं ।

आपका प्रशंसक,
रमेश जोशी

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Dec 18, 2008

चौथा जूता - भाग १


(बुश पर जूता प्रक्षेपण प्रकरण के बाद से सर्वत्र जूते ही जूते चलते दिखाई दे रहे हैं । जूतों की इस हवा में हमारा २२ दिसम्बर २००६ को सृजित यह चौथा जूता आपकी सेवा में प्रस्तुत है । )



परम आदरणीया मायावती बहिन जी,

जय भीम, जय दलित । इस संसार में जूते का बड़ा महत्त्व है । जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में जूता हाथ में लेकर इस धरा पर अवतरित होते हैं और अधर्मियों को जूता मार-मार कर ठीक कर देते हैं । वैसे हमने देवताओं को प्रायः नंगे पैरों ही देखा है । इसके कई कारण हो सकते हैं । एक तो यह कि उनको धरती पर पाँव नहीं रखने पड़ते । आप जैसे जनसेवकों की तरह वे भी अपने-अपने वाहनों में उड़ते रहते हैं । साधारण आदमी की तरह यदि बस या ट्रेन की सवारी करनी पड़े तो धूल कीचड़ से गुजरना पड़ता है । भीड़ में पैरों का स्वरूप बनाये रखने के लिए भी पैरों में जूतों का होना ज़रूरी है । पर विडंबना देखिये कि उनके पास ही जूते नहीं होते । टूटी-फूटी हवाई चप्पलों से काम चलाते हैं । देवताओं के जूते न पहनने का एक कारण यह भी हो सकता है कि जूते मौजे पहने-पहने पैरों में बदबू आने लगती है और उस बदबू से भक्तों के भाग जाने का खतरा रहता है । वैसे तो सच्चे भक्त को अपने आराध्य के पैरों ही क्या पाद में भी चंदन की गंध आती है ।

भगवान जब-जब मानव के रूप में अवतार लेते हैं तो जूते भी पहनते हैं । पहले जूतों की जगह पादुकाओं का फैशन था । वन में राम-भरत मिलन के समय भरत ने भगवान राम से और कुछ न माँगकर पादुकाएँ ही माँगीं । इससे जूतों के महत्त्व का पता चलता है । कभी-कभी छोटे आदमी बड़े आदमी के जूतों में पैर डालने की कोशिश करते हैं । बड़े आदमियों के जूते बड़े मँहगे होते हैं इसलिए बड़े आदमियों के जूतों में पैर डालने के चक्कर में छोटे आदमियों के कपड़े तक उतर जाते हैं । विकासशील देशों के कपड़े उतरने का कारण अमरीका की नक़ल ही है । अभी भगवान का कल्कि अवतार होना बाकी बताया जाता है । हमें लगता है कि वह हो चुका । भगवान ने मछली, कछुआ, सूअर, नृसिंह अदि रूपों में अवतार लिया- अबकी बार वे जूते के रूप में अवतरित हुए हैं, तभी आजकल चाँदी का जूता, सिफारिश का जूता, सत्ता का जूता, जाति का जूता, भाषा का जूता, रंग का जूता आदि खूब चल रहे हैं । पुलिस, प्रशासन, पर्यटन आदि सभी इन जूतों को नत मस्तक होकर स्वीकार कर रहे हैं । यदि जूता चाँदी का हो तो पूरी पार्टी की पार्टी ही सरेंडर होने को तैयार हो जाती है जैसे भजन लाल जी की पार्टी, फिर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसदों का हृदय परिवर्तन । पर हम तो साक्षात् देशी चमरौधे जूतों के उपासक हैं । ठीक है कि गाँधीजी ने जनता को अंग्रेजों के विरुद्ध जागृत किया पर इसमें क्रांतिकारियों के सीधे सादे जूतों का योगदान भी कम नहीं है । चीन, वियतनाम, क्यूबा आदि ने जूतों के बल पर ही आजादी प्राप्त की । आज भी सब तालिबान, लश्करे तैयबा, नक्सली, ईरान आदि की तरफ़ जूते की ताक़त के कारण ही ध्यान दे रहे हैं ।

... अभी शेष है ...

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