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Jul 14, 2009

तोताराम के तर्क - ब्रह्मचारी जी का आशीर्वाद


आज तोताराम आया तो उसने अपने सिर पर गमछा डाल रखा था । हमने सोचा लू से बचने के लिए ऐसा किया होगा । पर जब उसने कई देर तक गमछा नहीं उतारा तो हमने पूछ ही लिया- यार, अब तक इस खोपड़ी को क्यों कस रखा है ? क्या यहाँ कमरे के अन्दर भी लू लग रही है ?

तो बोला- इसके नीचे मैनें ब्रह्मचारी जी का आशीर्वाद छुपा रखा है । हमने उत्सुकतावश उसका गमछा खींच लिया तो पाया कि उसके सिर पर ब्राडगेज की तरह दो समानांतर पटरियाँ उभरी हुई हैं । पूछा- चोट कहाँ लगी ? कहीं लोकतंत्र की रक्षा के लिए सिर तो नहीं फुड़वा बैठे ? बोला- नहीं, यह तो ब्रह्मचारी जी के मारे हुए चिमटे का निशान है । वे जिस पर प्रसन्न होते हैं उसके सिर पर चिमटा फटकार देते हैं । और जिस पर चिमटा पड़ जाता है वह यदि प्रधानमंत्री नहीं तो कम से कम राज्य सभा का सदस्य तो बन ही जाता है ।

हमें बड़ा गुस्सा आया । आशीर्वाद देने का यह कौनसा तरीका है ! हनुमानजी से बड़ा ब्रह्मचारी कौन होगा पर वे तो किसी को आशीर्वाद के रूप में गदा नहीं मारते । बल्कि भक्त के संकट का मोचन ही करते हैं । विवेकानंद जी भी ब्रह्मचारी ही थे पर उन्होंने तो प्रेम और कर्म का संदेश दिया । यह कैसा ब्रह्मचारी है ?

पूछा- यह वही तो नहीं है जो बुज़ुर्ग महिलाओं को हिकारत से डोकरी और युवतियों को छोकरी कहता है ? तोताराम ने हामी भरी तो हमने कहा- देखो, जो सच्चे ब्रह्मचारी होते हैं वे महिलाओं को माता-बहिन कहते हैं ,बुढ़िया या गुड़िया नहीं कहते ।

तोताराम ने सफाई दी- फक्कड़ संत ऐसे ही होते हैं । वे अपने व्रत को निभाने के लिए महिलाओं से कोई रिश्ता नहीं जोड़ते । इस प्रकार के संबोधनों से वे महिलाओं से एक दूरी बना कर रखना चाहते हैं ।

हमने कहा- हमें तो ऐसा ब्रह्मचर्यव्रत आरोपित और हठयोग जैसा लगता है । यदि व्यक्ति ब्रह्मचर्य धारण करके सहज नहीं रह सके तो उसे फिर गृहस्थ बन जन चाहिए । तब व्यक्ति सहज हो जाता है। और कई ऐसी ही ब्रह्मचारिणियों को देख ले । वे कौनसी इससे कम हैं । वे भी ऐसे ही बोलती हैं जैसे कि सामने वाले को अभी झाड़ू मार देंगीं । कई लोग बड़े-बड़े सपनों के चक्कर में टाइम निकल देते हैं, बाद में कोई जुगाड़ नहीं बैठता तो ब्रह्मचर्य का नाटक करने लग जाते हैं । तुझे इन चक्करों की क्या ज़रूरत है ? आराम से पेंशन ला, शान्ति से घर में बैठ और राम-राम कर ।

पर तोताराम ने सीधे-सीधे हमारी बात नहीं मानी । बोला- चुनाव परिणाम आने तक तो इस आशीर्वाद को कायम रखता हूँ । इसके बाद जैसी परिस्थिति होगी कर लेंगे । क्या पता चांस लग ही जाए ।

हमने कहा- तेरी मर्जी । पर याद रख, तुझे कोई घास डालने वाला नहीं । बोली लगेगी भी तो जीते हुए एम.पी.यों की । ये जो अमरीका के राजदूत दिल्ली और हैदराबाद के चक्कर लगा रहे हैं, ये जो कारपोरेट जगत सक्रिय हो रहा है, ये जो काले धन वाले कवायद कर रहे हैं ये तोताराम के लिए नहीं वरन जीते हुए जनसेवकों की बिकाऊ आत्माओं के लिए कर रहे हैं । तुझ जैसे लोग केवल चिमटा खाने के लिए ही होते हैं । रही बात ड्रेसिंग करवाने की सो आज नहीं तो दो चार दिन बाद करवा लेना । पर अच्छा हो, कोई एंटीबायोटिक ही ले ले वरना यदि सेप्टिक हो गई तो तेरा सिर ही काटना पड़ेगा ।

१४-५-२००९

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Jul 11, 2009

तोताराम के तर्क - कहो जी तुम क्या क्या खरीदोगे!

यदि 'बढ़े सो पावे' (नीलामी) वाली स्थिति होती तो हमें न तो मानव देह मिलती और न ही इस भारत भूमि में जन्म जिसमें जन्म लेने के लिए देवता तरसते रहते हैं । यह तो भगवान की फ्री गिफ्ट है जो जीव को मानव पुराने वस्त्र की तरह शरीर त्यागते ही तत्काल पुनः प्राप्त हो जाती है । शरीर भी फ्री मिला और उसके साथ दूसरे स्पेयर पार्ट्स भी फ्री में ही मिले जैसे आँख, नाक, कान, दाँत, कमर, पेट आदि ।

कमर - जिसे मुहल्ले के दादा से लेकर वित्त मंत्री तक कोई भी तोड़ सकता है, पेट - जो कभी भरता ही नहीं , आँखें - जिन्हें ज्योति कलश छलकते रहने के बावजूद अँधेरा ही अँधेरा दिखता है । दांत भी फ्री ही मिले मगर एक ही सेट । शक्तिशाली लोगों की तरह दो सेट नहीं- एक खाने का और एक दिखाने का । एक ही सेट को दिखाते रहे और उसी से लोहे के चने भी चबाते रहे । कभी-कभी नाक से भी चने चबाने पड़े । पर आज हालत ख़राब थी । दाहिने तरफ़ की ऊपर-नीचे की दोनों दाढ़ों में भयंकर दर्द । सवेरे-सवेरे बैठे कनपटी पर सेक कर रहे थे कि तोताराम आ गया ।

हमारी मुद्रा देख कर बोला- क्या अडवाणी जी तरह मुँह फुला कर बैठा है । न सही असली प्रधान मंत्री , हमारे छाया मंत्री मंडल का प्रधान मंत्री तो है ही तू । आज हमें उसकी चुहल में कोई रूचि नहीं थी । हमने धीरे से कहा- तोताराम, दाढ़ में भयंकर दर्द है ।

तत्काल तोताराम ने हमारा हाथ पकड़कर उठाया, बोला- बस इतनी सी बात? चल अभी चलकर निकलवा आते हैं । हमने कहा- तोताराम, आजकल कर्नाटक, तमिलनाडु और न जाने कहाँ-कहाँ मेडिकल की सीटें नीलाम हो रही हैं । क्या पता ऐसे ही पैसे देकर बना हुआ कोई नकली डाक्टर पल्ले पड़ गया तो दाढ़ की जगह प्राण ही निकाल लेगा । मृत्यु अटल सत्य है । कब तक बचेंगे उससे । पर पैसे खर्च करके असमय मरने की बजाय अच्छा है कि घर में बैठे-बैठे शांतिपूर्वक निशुल्क ही मृत्यु को प्राप्त हों ।

तोताराम ने हमें कई सन्दर्भ दिए, बोला- खरीद, फरोख्त और नीलामी हर युग में होती रही हैं । सतयुग में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने अपने पत्नी-बच्चों को बेच दिया और ख़ुद नीलम हो गया पर उस सतयुग में भी किसी ने 'बिना गिव एंड टेक' के ज़रा सी भी मदद नहीं की । राहुल गाँधी की तरह निःस्वार्थ भाव से कलावती का कष्ट दूर करने वाला कोई भी नहीं मिला । नरसिंह राव के ज़माने में लोकतंत्र को बचाने के लिए झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसदों ने स्वयं को एक-एक करोड़ में नीलाम कर दिया । मारग्रेट अल्वा अपने बेटे के लिए चुनावों में पार्टी का टिकट नहीं खरीद पाई तो बेटे को देश सेवा का अवसर नहीं मिल सका । अब बेचारा घर में बैठा बोर हो रहा होगा । क्रिकेट की मंडी में खिलाड़ी नीलाम होते हैं ।

अगर एकलव्य के पास बोरी भरकर नोट होते तो द्रोणाचार्य की क्या मजाल थी कि एडमीशन से मना कर देता । अरे द्रोणाचार्य क्या, स्वयं धृतराष्ट्र उसे मनेजमेंट कोटे से प्रवेश दे देते । कर्ण अगर किसी मंत्री का पुत्र होता तो परशुराम उसे डिग्री दिए बिना ही भगा सकते थे ? लन्दन में एक लड़की ने इंटरनेट पर अपना कौमार्य नीलाम कर दिया । अमरीका में एक लड़की ने कालेज की फीस चुकाने के लिए इंटरनेट पर अपनी देह नीलाम कर दी । प्रसिद्ध ब्रिटिश माडल केट विंसलेट ने एक अस्पताल के लिए फंड जुटाने के लिए अपना 'किस' नीलाम कर दिया । अगर कांग्रेस को दस बीस सीटें कम मिलती और भा.ज.पा. को बीस-तीस ज़्यादा सीटें मिल जातीं तो संसद के सामने 'घोड़ा मंडी' का नज़ारा देखने को मिलता ।

तोताराम हमारे दर्द की चिंता किए बिना चालू रहा । हम सोच रहे थे कि इसके भाषण से होने वाले कष्ट से अच्छा तो दाढ़ का दर्द ही था । तोताराम ने आगे कहा- तू चिंता मत कर । ये घूस देकर एडमीशन लेने वाले इलाज नहीं करते । ये सब पैसे वालों के सपूत हैं । मेडिकल कालेज खोलेंगे । इलाज तो ठीक तरह से पढ़े हुए डाक्टर ही करेंगे । वोट और नोट की राजनीति करने वाले नेता भी भले इन से रिश्ता रखें पर इलाज तो ये भी वास्तविक डाक्टरों से ही करवाते हैं ।

हम भगवान का नाम लेकर तोताराम के साथ चल दिए ।

५-६-२००९

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Jul 10, 2009

तोताराम के तर्क - मास्टर की


गाँव के बीच में बरगद का एक पेड़ था जिसके नीचे गर्मियों में बैठे गाँव के बुज़ुर्ग दुनिया जहान की बातें किया करते थे । पालतू पशु भी दोपहर में इसी के नीचे बैठे सुस्ताया करते थे । पास के कुँए से लोग पानी भरा करते थे । वहीं दो चार घड़े रखे रहते-सार्वजनिक प्याऊ के रूप में । कुएँ की खेळ में जानवर पानी पी लिया करते ।

समय बदला । कुएँ बेकार हो गए । अगर कभी नल में पानी आता तो जितना लोग भरते उतना ही टोंटी न होने के कारण रास्ते में फैल कर कीचड़ फैलाता जिसमें मक्खी मच्छर संरक्षण पाते । पशु गलियों में धक्के खाने लगे । कुए की खेळ में कचरा और पोलीथिन भर गए । कुएँ के चबूतरे पर आवारा लोगों की चंडाल चौकडी दारू के पाउच पीने लगी । बरगद पर राजनीति के प्रेत लटक गए ।

शाम को तोताराम इसी रास्ते से स्कूल से घर लौटते थे । जब भी धुंधलके में इधर से गुजरते तो आवाज़ आती-मास्टर की चाहिए । तोताराम परेशान । किससे पूछे, किसको बताये । मन ही मन चिंतित । रात को अच्छी तरह नींद नहीं आती । अब तो बरगद के पास से निकलते हुए डर लगाने लगा । वाक्य अधूरा । मास्टर की.... क्या ? सोचकर थक जाते । मास्टर की क्या चाहिए ? मास्टर की जान चाहिए, मास्टर की खोपड़ी चाहिए, मास्टर की नौकरी चाहिए । क्या चाहिए मास्टर की ?

एक दिन देश, समाज की सेवा करनेवाले एक महाप्राण से पूछा तो बोले -मास्टर जी, यह 'की' हिन्दी का कारक चिह्न नहीं है जिसके आगे की संज्ञा आप ढूँढ़ रहे हैं । यह 'की' अंग्रेज़ी संज्ञा है 'चाबी' वाली । बरगद से आवाज़ लगाने वाली वह पुण्यात्मा किसी चाबी के बारे में पूछ रही है । सो उसे चाबी देकर पीछा छुड़ाओ ।


मास्टर तोताराम घर आकर सोचने लगे । उनके पास न साइकल, न स्कूटर, न गोदरेज की अलमारी, न कार, न सूटकेस , न ट्रंक । कोई चाबी नहीं । दो ड्रेसें हैं जिनमें से एक अलगनी पर या खूँटी पर और दूसरी इस नश्वर शरीर पर । घर में मात्र दो पुराने ताले पड़े थे जंग लगे जिनकी कभी साल छः महीने में ज़रूरत पड़ती थी तो घर के मेन पर लटका जाते थे । सो एक दिन -एक छेदवाली और एक चपटी दोनों चाबियाँ चुपचाप तालों समेत बरगद के पेड़ के नीचे रख आए जिन्हें कबाड़ी उठा ले गया । आवाज़ का आना फिर भी चालू रहा । मास्टर तोताराम परेशान ।

अब उन्होंने समस्या सुलझाने के लिए किसी पत्रिका के मनो-विश्लेषक को पत्र लिखा । वह विशेषज्ञ थोड़ा जनरल नालेज भी रखता था । उसने उत्तर दिया - हमारे पास आपकी बीमारी का कोई इलाज नहीं है । हाँ, 'मास्टर की' एक ऐसी चाबी को कहते हैं जिससे सभी ताले खुल जाते हैं । मास्टर तोताराम फिर चिंतित । तोताराम के पास जो दो ताले और चाबी थे उनका यह हाल कि कभी-कभी वे ताले अपनी चाबी से ख़ुद तोताराम से भी नहीं खुलते थे । फिर उन चाबियों से किसी और के ताले खुलने का तो प्रश्न ही नहीं था ।

एक दिन मास्टर तोताराम को अचानक याद आया कि उन्होंने कभी एक फ़िल्म देखी थी जिसमें हीरो एक चाबी रखता था जिससे घुमा फिरा कर वह सारे ताले खोल लेता था । तोताराम को हँसी आगई । ऐसी चाबी तो अलादीन के चिराग से भी ज़्यादा बड़ी चीज होती है । कोई भी ताला खोल लो । पर किसी और का ताला खोलना तो चोरी है । तोताराम ने घबरा कर यह विचार छोड़ दिया ।

एक दिन गाँव में बड़ी चहल-पहल थी । चुनाव आगए थे । मंच बना बरगद के पेड़ के नीचे । नेता जी कह रहे थे- हमें 'मास्टर की' चाहिए । जब 'मास्टर की' हमारे पास होगी तो कोई भी पार्टी हमारे बिना सरकार नहीं बना सकेगी । हम चाहेंगें तो किसी भी सरकार को कभी भी गिरा सकेंगे । मास्टर को लगा वही बरगद के पेड़ वाला प्रेत प्रकट हो गया है । अब उसे विश्वास हो गया कि 'मास्टर की' उसके पास नहीं है । वह निश्चिंत हो गया । बरगद के पेड़ के पास से गुज़रने पर वह आवाज़ अब भी आती पर तोताराम को डर नहीं लगता । उसे लोकतंत्र के सार तत्व का पता चल गया था ।

एक दिन जब तोताराम स्कूल से घर लौट रहा था तो अचानक ठोकर लगी । ठोकर खाकर उठते समय उसे अपनी छेद वाली चाबी मिल गयी । पर अब समस्या यह थी कि ताला कोई उठा ले गया था । अब मास्टर बिना ताले की चाबी लेकर घूम रहा है । उसे तो ताला नहीं मिल रहा है पर लगता है लोकतंत्र के प्रेतों को जरूर 'मास्टर की' मिल गई है ।

अब उसे ख़ुद से ज़्यादा लोकतंत्र की चिंता सता रही है ।

१०-५-२००९

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May 12, 2009

तोताराम के तर्क - ड्रीम जॉब


आज तोताराम आया तो कुछ उदास और नाराज़ था । बड़ी मिन्नतों के बाद बोला- मैं तो तुझे बड़ा भाई और अपना हितचिन्तक समझता था पर तुमने मेरे साथ धोखा किया है । सारे दिन कई-कई अख़बार चाटता रहता है पर मुझे नहीं बताया कि आस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड द्वीप में एक केयर टेकर की नौकरी निकली है । छः महीने के पचास लाख रुपये और रहना, खाना, घूमना और मौज-मज़ा मुफ़्त ! अब जब लास्ट डेट निकल गई तो पता चला कि इन शोर्ट लिस्टेड में दो भारतीय भी हैं । केयर टेकर में करना क्या पड़ता है । कुछ नहीं, घर की साफ़-सफाई करवादो । और मैं तो उस माकन में दो-चार किरायेदार रखकर पॉँच-सात लाख और कमा लेता ।

हमने कहा भइया, हमें भी आज ही ख़बर लगी है । हमने उसका दुःख दूर करने के लिए कहा- निराश होने की क्या बात है तोताराम, यह नौकरी तो मात्र छः महीने की ही थी और उसके बाद कोई पेंशन भी नहीं । अब तो अपने देश में ही चार-पाँच करोड़ सालाना आमदनी की पाँच सौ पैंतालीस नौकरियों की सूचना जारी हो गई है । और यदि महीने दो महीने बाद ही कम्पनी बंद भी हो जाए तो भी जिंदगी भर पेंशन पक्की ।

तोताराम की उत्सुकता जगी, बोला क्वालिफिकेशन क्या है ? हमने कहा- कुछ नहीं बस दलाली, हत्या, अपहरण, बलात्कार आदि का कुछ अनुभव होना चाहिए । तोताराम ने कहा- तो तेरा मतलब है कि एमपी का चुनाव लड़ लूँ । यह कम आसान नहीं है । पहले तो टिकट देने वाले ही दस-बीस लाख रखवा लेंगे । और फिर चुनाव में दो-चार करोड़ का खर्चा ऊपर से और फिर जीतने की कौनसी गारंटी है । हमने कहा- वैसे यह केयर टेकर वाला काम भी कोई आसान नहीं है पता नहीं कितना बड़ा द्वीप होगा । लोग तो सारे साधनों के बावजूद संसद, ताज होटल, क्रिकेट टीम, ट्रेड सेंटर आदि किसी की भी रक्षा नहीं कर सके । तू द्वीप की रक्षा कैसे करता ।

जैसे बदमाश बच्चे को कक्षा का मानीटर, गुंडे को नेता और धारा-प्रवाह गाली दे सकनेवाले को थानेदार बनने के उपयुक्त माना जाता है वैसे ही यह काम किसी भले आदमी का नहीं है । तुझे पता होना चाहिए कि उस पद के लिए किसी ओसामा बिन लादेन ने भी अप्लाई किया है । उसके होते कौन उपयुक्त पात्र हो सकता है । देख नहीं रहा , ज़रदारी सरकार की सुरक्षा वही कर रहा है । मुशर्रफ भी उसीकी कृपा से इतने दिन राज कर गए । उसके लिए ओसामा को सब जगह जाने की भी ज़रूरत भी नहीं है बस एक सूचना लिखवाना ही पर्याप्त है कि इसकी सुरक्षा का ठेका ओसामा के पास है । बस फिर कोई खतरा नहीं ।

तोताराम बोला - तो फिर चिदंबरम क्यों देश की सुरक्षा के लिए अरबों रुपये खर्च कर रहे हैं । दस-बीस अरब में देश की सुरक्षा ठेका ओसामा को ही क्यों नहीं दे देते ? सौदा सस्ता और गारंटीशुदा होगा ।

हमने कहा - सो तो ठीक है पर इसके लिए तो तुझे चिदंबरम जी से ही बात करनी पड़ेगी ।

६ मार्च २००९

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May 11, 2009

तोताराम की सिक्स पैक बॉडी



एक स्टूल पर चाय रखकर दूसरी स्टूल पर हम बैठे थे । तोताराम ने आते ही हमें खड़ा कर दिया और चाय चबूतरे पर एक तरफ़ रख दी । इसके बाद दोनों स्टूलों को दोनों हाथों में उठाकर ऊँचा कर दिया । स्टूलें गिरने लगीं तो हमने उन्हें थामकर एक तरफ़ रख दिया और कहा- यह क्या तमाशा है ? कहीं कंधे में झटका लग गया तो मुश्किल हो जायेगी । बुढापे में हड्डियाँ बड़ी मुश्किल से जुड़तीं हैं । तोताराम झुँझलाकर बोला- इस समय बुढापे की बातें करके मेरा मनोबल मत गिरा । अगर हड्डी टूट भी गई तो कोई बात नहीं । बस, एक बार चुनाव जीतने के बाद एम्स किसलिए है । पड़े-पड़े इलाज करवाते रहेंगें । पर चुनावों में एक बार मेरे सिक्स पैक जनता को दिखा लेने दे । अस्सी साल के ऊपर के बुड्ढे भी जब बाल रंग कर (यदि बचें हों तो) शक्तिवर्धक दवाएँ खाकर, जिम में डमबल्स उठाकर फ़ोटो खिंचवा रहे हैं कि कहीं सत्ता सुन्दरी उनकी जवानी पर फ़िदा होकर वरमाला ही डाल दे । वैसे भी जब से अमरीका में ओबामा आया है, सब तरफ़ जवानी-जवानी की गुहार लगी है । अभी मेरी उम्र ही क्या है ? वरिष्ठ नागरिक बने मात्र दो ही साल तो गुज़रे हैं । अस्सी साल पार के भी जब मुँह निकाल रहे हैं तो मैं क्या बुरा हूँ ।

हमने कहा- तोताराम, राजा और सेठ कभी बूढ़े नहीं होते । नाचने-गाने वाले तो खैर मेकप करते ही हैं । गरीब की ज़वानी बड़ी ज़ल्दी जाती है । बुढ़ापा बड़ी ज़ल्दी आता है । गरीबी का जीवन भी ज़्यादा लंबा नहीं होता । गरीब को ये नाटक शोभा नहीं देते । जब बड़े आदमी जवान दिखने का नाटक करते है तो उनके चारों तरफ़ बीसों आदमी होते हैं संभालने के लिए । यदि आज मैं नहीं पकड़ता तो दोनों स्टूलों का और तेरा कबाड़ा हो जाता ।

पर तोताराम कहाँ मानाने वाला था, बोला- चाहे जवानों की लाख गुहार मची हो पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के उम्मीदवार संन्यास आश्रम में पहुँच चुके हैं । उधर करुणानिधि, बाल ठाकरे आदि कौनसे जवान हैं ? पुराना चावल, पुरानी शराब, पुराना घी और पुरानी प्रेमिका- इनकी बात ही कुछ और है । हमने उसे ताऊ भग्गू का किस्सा याद दिलाया जो बुढापे में बच्चों के साथ कूदने का कम्पीटीशन करके पैर में स्थायी मोच खाकर आज नब्बे साल की उम्र में लंगड़ा कर चलने को मज़बूर हैं । पर उसने हमारी एक न सुनी । जिसके सिर पर मौत या इश्क सवार हो जाते हैं वह किसीकी नहीं सुनता । तोताराम ने कुरते की बाहें ऊँची करके अपने जैसे भी थे सिक्स पैक दिखाए । पर उसे पता नहीं कि दुनिया सिक्स पैक से आगे निकल कर सिक्सटी पैक तक पहुँच गयी है ।

हमने भी तोताराम को पैक करके चाय की प्याली उठायी और तोताराम के बिना ही चीयर्स करके पी गए ।

५ मार्च २००९

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May 10, 2009

असली गरीब


अंधेर नगरी के आजीवन अध्यक्ष महाराजा चौपटादित्य ने शुक्रवार की शाम को सत्य का गला घोंटकर, गले में पत्थर बाँधकर संसद के कुँए में पटक दिया । शनिवार की रात को अंधेर नगरी के सभी संभ्रांत नागरिक और कानून व्यवस्था वीक एंड मनाने में व्यस्त थे, तब महाराजा ने सत्य को ठिकाने लगाने का निश्चय किया । जैसे ही लाश को कंधे पर उठाये जनपथ पर पहुँचे तो लाश में अवस्थित बेताल ने कहा- राजन! तुम क्यों परेशान हो रहे हो ? जब तक सत्ता है मौज करो । इस अंधेर नगरी में कोई चूँ तक करनेवाला नहीं है । पर पता नहीं तुम को क्या जिद है की हर वीक एंड पर लाश को ठिकाने लगाने निकल पड़ते हो । खैर तुम मानोगे तो नहीं । सो श्रम भुलाने के लिए तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ । यदि तुमने जानबूझ कर मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे ।

"एक सबसे बड़े और संवेदनशील लोकतंत्र में एक बहुत दयालु राजा राज करता था । वह ग़रीबों के दुःख से दुःखी हो जाया करता था । एक बार उसे बताया गया कि राज्य के गरीब और बेरोज़गार लोग बहुत दुःखी हैं । तो राजा ने तत्काल देश के उन लोगों को आरक्षण प्रदान कर दिया जिनको आजतक आरक्षण प्रदान नहीं किया गया था ।
आरक्षण प्रदान करने के बाद राजा ने सोचा कि पता तो करें कि ग़रीबों की स्थिति में कितना सुधर हुआ है ? पाया गया कि गरीब लोगों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है । और उस आरक्षण का लाभ उठा कर धनवान लोग और धनवान हो गए हैं ।"

हे राजन! बताओ कि आरक्षण के बाद भी ग़रीबों की हालत में सुधार क्यों नहीं हुआ ?

महाराज चौपटादित्य ने उत्तर दिया- हे बेताल! इसमें कहीं कोई गड़बड़ी और गलती नहीं है । जिसको धन की जितनी ज़्यादा चाह है वह उतना ही गरीब है । शास्त्रों में कहा गया है कि- 'जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान' ।
जो लोग रूखी सूखी खाकर राम का नाम लेकर सो जाते हैं और फिर अगले दिन रोटी-रोजी के जुगाड़ में निकल जाते हैं उनके पास संतोष का धन है । कहा भी है कि 'जिनको कछू न चाहिए सो ही सहंसाह' । अतः तुम जिनको गरीब
समझ रहे हो वे ही सच्चे धनी और सहंसाह हैं । हर समय हाय-धन, हाय-धन चिल्लानेवाले सेठ, नेता, अधिकारी, दलाल ही वास्तव में गरीब हैं । अतः आरक्षण का लाभ वास्तव में गरीब लोगों तक ही पहुँचा है । जो इस व्यवस्था में कमी देखते हैं वे अज्ञानी है ।

चौपटादित्य के उत्तर को सुनकर बेताल की खोपड़ी के टुकड़े-टुकड़े हो गए ।

४ मार्च २००९

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Mar 17, 2009

अपनी-अपनी औकात


भारत ने पश्चिम को जाने कितना 'लगान' दिया, 'तारे ज़मीन पर' ही नहीं दिन में भी दिखाई देने लगे, पर आस्कर की 'पहेली' अपने से नहीं सुलझी । और जब गोरे हाथों ने झोंपड़पट्टी के एक कुत्ते को दुलार दिया या एक गोरी में ने कटे ओंठ वाली पिंकी को मुस्कराना सिखा दिया तो आस्करों की लाइन लग गई । इससे पहले भी गोरे एटनबरो ने एक अधनंगे फकीर को छू दिया तो आस्कर बरस पड़े । कोई बात नहीं, किसी भी रूप में भारत आस्कर से जुड़ा तो सही । हो सकता है किसी शुद्ध भारतीय फ़िल्म को भी आस्कर मिल जाए । अब तो जय हो का क्षण चल रहा है । हम उसी का जाप कर रहे थे कि तोताराम आ गया ।

आते ही तोताराम ने पूछा- कहो तो 'जय हो' के जाप में बाधा डालने की गुस्ताखी करूँ ? हमने कहा- मना करने पर भी तुम मानने वाले तो हो नहीं, कहो । तो बोला- इस टकले आस्कर में एक टकले आदमी की मूर्ति के अलावा कुछ पैसा-धेला भी मिलाता है या वैसे ही अमरीका आने-जाने का खर्चा करवा देते हैं ? हमने कहा- भाई, हमने तो सुना है कि आस्कर में पैसा धेला कुछ नहीं मिलता । बस, नाम ही नाम है । तोताराम बोला- तब तो केट विंसलेट ने ठीक ही किया । हमने पूछा- क्या ठीक किया ? तो बोला- तुझे पता है, सह अभिनेत्री का आस्कर पाने वाली केट विंसलेट ने कहा है कि वह अपने आस्कर को टायलेट में रखेगी । दिखा दी ना आस्कर को उसकी औकात !

हमने कहा- तोताराम, तू टायलेट को घटिया जगह मत समझ । टायलेट ही सबसे सुरक्षित जगह है । किसी बड़े आदमी को फोन करो तो पता चलता है कि साहब टायलेट में हैं । रेल में टीटी से बचने के लिए टायलेट ही सबसे सुरक्षित जगह है । बड़े आदमी टायलेट में ही अध्ययन भी करते हैं । जिसे कब्ज़ की शिकायत हो उसे बड़े-बड़े क्रांतिकारी विचार भी टायलेट में ही आते हैं जब वह मालावातरण की प्रतीक्षा कर रहा होता है । तुझे पता है, ब्रिटेन के प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर ने चेरी ब्लेयर को टायलेट में ही प्रपोज़ किया था । ब्रिटेन के एक महान प्रबंधक ने सुझाव दिया है कि प्लेन में टायलेट यूज़ करनेवाले से हर बार एक पौंड लिया जाए । वैसे किसी के कपड़े ख़राब होने लगेंगे तो वह एक क्या, दस पौंड दे देगा । अगर चिदंबरम जी को ख्याल आ जाता तो वे इसी पर टेक्स लगा कर राजकोषीय घाटा पूरा कर लेते । आज कल तो कहा जाता है कि किसी की हैसियत का अंदाज़ लगाना हो तो उसका ड्राइंग रूम नहीं, उसका टायलेट देखो । माइकल जेक्सन जब भारत आया था तो उसने ठाकरे जी का 'सामना' पढ़ने की बजाय उनका टायलेट यूज़ किया था । सो विंसलेट ने आस्कर को टायलेट में स्थापित करके आस्कर को सम्मान ही दिया है । यदि टैगोर का नोबल पुरस्कार वाला पदक टायलेट में रखा होता तो चोरी नहीं होता ।

हमने कहा- तो एक नया टायलेट ही बनवा लेते हैं । सिलसिला चालू हो गया है, पता नहीं कब कौन एक-आध आस्कर भिड़ा जाए ।

४ मार्च २००९

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Feb 23, 2009

जय हो मगर किसकी


स्लम डॉग मिलेनिअर को आठ ओस्कर मिल गए । भारत फिर एक बार महाशक्ति बन गया । पहले सौंदर्य के क्षेत्र में बना था, अब फ़िल्म के क्षेत्र में बन गया । बनना भारत की नियति है । लोग बनाते हैं और हम बनते हैं । बनाने का यही तरीका है । जिसको भी बनाना होता है उसे ऐसे ही चने के झाड़ पर चढ़ाया जाता है । पहले जब यहाँ की सुंदरियों को विश्व या ब्रह्माण्ड सुन्दरी बनाया गया तो देशी ही नहीं विदेशी सौंदर्य प्रसाधनों का बाज़ार चमक गया वैसे ही अब फिल्मों का बाज़ार चमकेगा । ऐसे ही बाज़ार चमक रहें हैं । जहाँ तक खाने पीने की चीजों और दवाओं और शिक्षा की बात है हालत कहीं भी ठीक नहीं है ।

अब चलो सिनेमा में भारत की जय हो गई पर यह जय भारत की कितनी है यह सोचने की बात है । इससे पहले भी अच्छी फिल्में बनीं थीं । सत्यजित राय, महबूब खान आदि की, पर ओस्कर किसी को नहीं मिला । गाँधी पर बनी फ़िल्म को कई ओस्कर मिले और अब डेनी बोयल द्वारा बनाई गई फ़िल्म स्लम डॉग को आठ ओस्कर मिले । प्रश्न उठता है कि ये फिल्में कितनी भारतीय हैं । इन फिल्मों ने 'ओस्कर' की आधी दूरी तो इस लिए तय कर ली क्योंकि इनको बनानेवाले ब्रिटिश थे । यह तो गोरे काठ के साथ काला भारतीय लोहा तर गया । यदि यही गाना और संगीत रहमान ने किसी भारतीय निर्देशक की फ़िल्म में दिया होता तो क्या उसे ओस्कर मिला होता? कभी नहीं ।

इसके अतिरिक्त इस फ़िल्म में ब्रिटिश निर्देशक ने वही किया जो अंग्रेज़ भारत में अपने शासन काल में करते रहे थे -जातीय और सांप्रदायिक चश्मे से चीजों को देखना । उपन्यास लेखक ने अपने नायक के नाम में तीन शब्द रखे हैं वे हिंदू, मुस्लिम और ईसाई हैं मतलब कि वह यह कहना चाहता है कि यह कहानी भारत की है न कि हिन्दू या मुसलमान की, मगर निर्देशक ने उसका नाम केवल मुसलमान रखा है और उस पर हमला करनेवाले हिंदू हैं । यह एकांगी और विवादास्पद बात है । मूल लेखक भारत की स्थिति को जानता है इसीलिए उसने नायक के नाम में तीनों धर्मों के शब्द रखे हैं क्योंकि वह इसे भारत के शहरी ग़रीबों की कहानी बताना चाहता है न कि किसी मुसलमान की ।

जहाँ तक गोपाल सिंह नेपाली के गीत को सूरदास का बताने की बात है वह क्षम्य हो सकती है क्योंकि आज के भारतीय लेखकों का ज्ञान इतना ही है ।

हम तो तब भी इतने ही खुश थे जब बुश ने अपनी बिल्ली का नाम इंडिया रखा था । लेकिन वो तो अब मर गयी । सो यह तो ओस्कर है । चलो खुश हो लेते हैं वरना कोई देशभक्त हमारी ठुकाई कर देगा ।

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना । जय हो ।

२३ फरवरी २००९

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Feb 8, 2009

मुझसे मत पूछ मेरे इश्क में क्या रखा है


जब सूचना के अधिकार की बात चली थी तो क्या पता था कि 'बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी' । सोचते थे कि एक तो वैसे ही भारत की जनता डरपोक है । सरकारी विभागों में जाने से ही घबराती है । चली भी गई तो चपरासी से ही बात करके लौट जायेगी । क्लर्क तक पहुँचेगी तो कोई भी कह देगा कि बाबूजी चाय पीने गए हैं या साहब ने बुला रखा है । अगर ज़्यादा ही हुआ तो पूछ लेगी कि राशन की दुकान में चीनी नहीं आई है । कब तक आयेगी ? और जो भी उत्तर दिया जाएगा सुन कर वापस चली जायेगी । पर साहब, क्या ख़राब ज़माना आ गया है कि जनता यह तक जानना चाहती है कि न्यायाधीशों, मंत्रियों के पास कितनी संपत्ति है ।

अंग्रेजों के ज़माने में तो कोई नहीं पूछता था कि फलाँ सेठ साहब बहादुर के पास क्यों गया । मिठाई के डिब्बे में 'डाली' के नाम पर उसमें कितने नोट डाल कर दे आया । अब डेमोक्रेसी क्या आगई कि लोग घर के अन्दर झाँक कर देखना चाहते हैं । पेट फाड़ कर देखना चाहते हैं कि आज नेताजी ने क्या खाया । अरे, जो मिल गया सो खा लिया । कल जब प्याज़ से रोटी खाते थे तब तो कोई नहीं पूछने आया कि - नेताजी पेट भरा कि नहीं । आज इतने दिन पापड़ बेलने, बड़े-बड़े नेताओं के जूते उठा-उठा कर जनता की एक छोटी सी सेवा करने का मौका आया है तो सेवा भी ढंग से नहीं करने देते । अरे, जब हमारी पार्टी का शासन नहीं रहेगा तो दूसरी पार्टीवाले पाँच साल प्राण खायेंगे ही । वैसे हम जानते हैं कि होगा कुछ नहीं क्योंकि यदि ऐसा ही होने लगे तो कोई भी नेता जेल से बाहर दिखाई नहीं देगा । सब एक दूसरे को जानते हैं कि धोती के भीतर सब नंगे हैं । फिर भी अखबारों में कुछ न कुछ उछलता रहेगा । थोड़ा बहुत टेंशन तो रहेगा ही । अब तो कम से कम शान्ति से रहने देते ।

जब लोगों से पैसा उधार माँग कर चुनाव लड़ते हैं और हार जाते हैं और उधारवाले कपड़े फाड़ते हैं तब तो किसी को दया नहीं आती । जब अपने पैसे से ट्रक भर कर अमरूदों वाले बाग या बोट क्लब पर धरना या रैली करने जाना पड़ता है तो नानी याद आ जाती है । जेब से पैसे निकलते है तो कलेजा कटता है । लोग तो भगवान तक को खोटा पैसा चढ़ा कर खिसक लेते हैं । मन्दिर में दीये में शुद्ध घी की जगह डालडा जलाते हैं और मनोकामना करते हैं लाखों की लाटरी लगने की । तब तो भगवान को धोखा देते हुए नैतिकता नहीं जागती । कहते है वोट दिया है । क्या गारंटी है कि मुझे ही दिया है । वैसे भी वोट डालना लोकतंत्र में सबका कर्तव्य है । वोट डाल कर किसी पर कोई अहसान थोड़े ही किया है । कम वोट पड़ते तो भी कोई न कोई तो जीतता ही । कोई भी वोट न डाले तो भी यह कहाँ कहा गया है कि लाटरी डाल कर फैसला नहीं किया जा सकता । और ज्यादातर ने तो अडवांस में पैसे या दारू की थैली ली है ।

हाँ, जिन्होंने नक़द पैसे दिए हैं उनका काम करना है । सबसे पहले उधार चुकाई जाती है या धरम-पुण्य किया जाता है । और इसके बाद अगला चुनाव भी लड़ना है । दिन पर दिन महँगाई बढ़ती जा रही है । इन लोगों को क्या पता कि बीस-तीस लाख के बिना तो चुनाव में पार्टी का टिकट नहीं मिलता । झंडे, पोस्टर, जीपें, दारू, भाई लोगों का खर्चा पानी अलग, बूथ केप्चर करने वाले स्वयंसेवक अलग, देशी-विदेशी कट्टे - कोई मजाक नहीं है, इस अंधे काम में अंधे होकर पैसे डालना । इन नौकरी करनेवालों को क्या पता । इन्हें तो महीने की महीने तनख्वाह मिल जाती है चाहे काम करो या न करो । चाहे मास्टरों के सारे विद्यार्थी फेल हो जायें, डाक्टर के सारे मरीज़ मर जायें, पुलिस एक भी अपराधी न पकड़ पाए पर तनख्वाह पर कोई फ़रक नहीं पड़ता । ये लोग खरीदेंगें भी तो बचत पत्र- जिनमें कोई खतरा नहीं । पर हमारा तो चुनाव में सारा पैसा भी पानी में जा सकता है ।

खैर ! आपको बताया है कि राजनीति कोई इतना आसन काम नहीं है जितना आप समझ रहे हैं । वैसे पैसे के अलावा हमें कोई चिंता नहीं है क्योंकि हम ही थोड़े हैं इस लोकतंत्र में 'सूचना के अधिकार' के दायरे में । हम से भी बड़े-बड़े मगरमच्छ पड़े हैं जो चाहें भी तो हिसाब नहीं दे सकते क्योंकि उन्हें ख़ुद को ही पता नहीं कि उनके नामी या बेनामी कितने प्लाट हैं । जितना पैसा है यदि उसे ही गिनते रहें तो उमर बीत जाए । सो भइया वे ही सब रक्षा का इंतजाम करेंगे । चोर-चोर मौसेरे भाई । बड़े भाइयों के रहते अपने को क्या चिंता ।

और जब परदे पर कहानी की माँग पर सब कुछ दिखा देनेवाली नायिका ही मना कर रही है - 'मुझसे मत पूछ मेरे इश्क में क्या रखा है' ? तो हमारे ही पीछे क्यों पड़े हो भाई !

(सन्दर्भ: जज, नेता, मंत्री- कोई भी सूचना के अधिकार के तहत अपनी संपत्ति की घोषणा नहीं करना चाहता ।)

३ फरवरी २००९

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Feb 7, 2009

कर और कमल के बीच अर्जुन सिंह की टाँग


यूँ तो नेताओं की टाँगें सामान्य से ज़्यादा लम्बी होती हैं । वे जहाँ चाहें उन्हें अड़ा सकते हैं पर अर्जुन सिंह की टाँगें कुछ ज़्यादा ही लम्बी हैं । वैसे जो भी केन्द्र में शिक्षा मंत्री होता है उसके लिए और नहीं तो कम से कम इतिहास में टाँग अड़ाना तो ज़रूरी हो ही जाता है । इतिहास में टाँग अड़ाने का सिलसिला १९७७ में जनता पार्टी के शासन में शुरू हुआ था । तब ९ वीं, १० वीं की इतिहास की पुस्तकों में से कुछ अध्याय निकलवाये गए थे । इंदिरा गाँधी का गड़वाया गया काल-पात्र भी फिर से खुदवा कर निकलवाया गया । पर शर्म की बात यह थी कि उस काल-पात्र में इंदिरा गाँधी का कहीं नाम ही नहीं था सो चुपचाप वापस गड़वा दिया गया । भाजपा ने भी शासन में आने पर इतिहास सुधारने का प्रयत्न किया । फिर तो यह परम्परा राज्यों में भी चल पड़ी । इतिहास नहीं हुआ, मज़ाक हो गया । जो इतिहास में शामिल होने लायक नहीं होते, वे चले आ रहे इतिहास से छेड़छाड़ करते हैं ।

यूँ तो कर-कमल, चरण-कमल, मुख-कमल, कमल-नयन आदि बहुत से रूपक चले आ रहे हैं । पहले तो अर्जुन सिंह जी को ध्यान ही नहीं आया कि भाजपा क्यों जीत गयी । फिर उन्हें पता चला कि भाजपा के जीतने का कारण कमल का निशान है । अब समस्या यह है कि न तो कमल को लक्ष्मी जी के नीचे से खींच कर हटाया जा सकता, न केन्द्रीय-मंत्री कमलनाथ का नाम बदला जा सकता, न ब्रह्मा जी, विष्णु, गणेश या सरस्वती जी के हाथ से कमल का फूल छीना जा सकता । वैसे पता नहीं कि उन्हें यह याद है कि नहीं कि राजीव का अर्थ भी कमल ही होता है । भले ही अर्जुनसिंह राम-मन्दिर या राम-सेतु से ख़फ़ा हों पर यदि उन्होंने गीतावली पढ़ी होगी तो वे यह अवश्य जानते होंगे कि तुलसी ने लिखा है- 'राजीवलोचन राम चले तजि बाप को राज बटाऊ की नांई' । यह सब कुछ कर पाना संभव नहीं हो रहा है तो २००८ जून में अर्जुन सिंह जी ने सोचा कि क्यों न केन्द्रीय विद्यालय संगठन के प्रतीक चिह्न में से ही कमल को निकलवा दिया जाए । केंद्रीय विद्यालय संगठन के प्रतीक में कमल ही नहीं, सूर्य भी है । मेरे ख्याल से कमल शिष्य का प्रतीक है और सूरज गुरु का, जो अपने प्रकाश से शिष्य ही नहीं वरन समस्त सृष्टि का अज्ञान का अन्धकार दूर करता है । सबसे पहले चुनावों में रामराज्य पार्टी का चुनाव-चिह्न था 'उगता हुआ सूरज '। उस समय अर्जुन सिंह जी इतने प्रभावशाली नहीं थे वरना तो सूरज का उगना भी कम से कम चुनावों में तो बन्द करवा ही देते ।


पिछले दशक में आम चुनाव के समय कुछ ऐसे ही महान लोगों के कहने पर चुनाव आयोग ने 'व्हील ' नामक वाशिंग पाउडर और एक विज्ञापन 'कमल सा खिल जाए' पर भी रोक लगा दी थी । क्या कहेंगे आप चुनाव आयोग द्वारा भारतीय-जनता के बौद्धिक स्तर के मूल्यांकन पर । क्या वह कमल का नाम सुनकर भाजपा को वोट दे देगी या व्हील पाउडर के विज्ञापन से जनता-दल को जिता देगी ? अगर ऐसा ही होता रहा तो बेचारे मुलायम के चुनाव-चिह्न के चक्कर में चुनाव के दिनों में गरीब लोगों का साइकल चलाना बन्द करवा दिया जाएगा । चुनाव के दिनों में, गावों में जहाँ बिजली नहीं आती, वहाँ भी लालटेन जलाने पर पाबंदी लगा दी जायेगी क्योंकि लालटेन लालू का चुनाव-चिह्न है ।

हम तो यह मानते हैं कि कर और कमल का शाश्वत मेल है । सारे उद्घाटन और शिलान्यास के पत्थरों पर 'अमुक के कर कमलों से' लिखा हुआ है । क्या सबको उखाड़ देंगे ? हम तो सोचते थे कि सब नेताओं के कर कमल हो जायेंगे और सहयोग से काम करेंगे । लोकतंत्र की खासियत तो यही होनी चाहिए कि चुनाव लड़ो और परिणाम आने पर जो भी पार्टी सरकार बनाये काम सब मिल कर करें क्योंकि लक्ष्य तो सबका देश का विकास करना है । पर नहीं, पाँच साल तक एक दूसरे की टाँग खींचते रहेंगे । इसी तरह से साठ साल से जूतम-पैजार देख रहे हैं ।

हे प्रभु, इन सबको सद्बुद्धि दे कि ये राजनीति के कीचड़ में भी कमल की तरह उज्ज्वल रहें और केवल पार्टियों के कर और कमल ही नहीं, सारे देश के लोग एक दूसरे के हाथ थाम कर आगे बढ़ें ।

२ फरवरी २००९

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साइकिल के अंधे को भगवा ही भगवा


राजस्थान के शिक्षा विभाग की लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिलें बाँटने की योजना थी । कुछ साइकिलें बाँट दी गयीं और कुछ को बाँटा जाना बाकी था । तभी हुआ यह कि सरकार बदल गयी । पिछली सरकार भाजपा की थी और भाजपा की पितृ-पार्टी का रंग भगवा है तो सरकारी साइकिल का रंग भी भगवा होना ज़रूरी था । सो साइकिल का रंग भगवा हो गया । वैसे तो भगवा रंग भारत के तिरंगे झंडे में सबसे ऊपर है पर उसकी भी एक शर्त है कि यदि भगवा रंग है तो उसके साथ उतनी ही मात्रा में सफ़ेद और हरा रंग भी होना चाहिए । यदि यह झंडा कांग्रेस का है तो रंग तो ये ही रहेंगे पर बीच में चक्र की बजाय चरखा होना चाहिए । चक्र तो चरखे में भी है पर चरखा आज किसे चलाना आता है ? राहुल गाँधी को भावी प्रधान-मंत्री के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है तो चरखा तो चलाना आना ही चाहिए । कपड़े भले ही कोई खादी के न पहने पर गाँधी जयन्ती पर दो चार मिनट तक चरखा कातने की मज़बूरी तो है ही सो राहुल गाँधी आजकल चरखा चलाना सीख रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ चूँकि वीर संगठन है इसलिए उसने केवल भगवा रंग ही रखा है । गाँधी में ज़्यादा विश्वास न होने के कारण चरखा कातना उनके लिए आवश्यक नहीं है । यह बात और है कि हमने दिल्ली के केशव-कुञ्ज में अधिकतर बुजुर्गों को शुद्ध खादी ही पहने देखा है ।

तो बात हो रही थी साइकिल के रंग की । हमें साइकिल चलानी नहीं आती इसलिए हम साइकलों को बड़ी हसरत से देखते हैं । इस घूरने में हमने पाया कि साइकिलों का रंग प्रायः काला ही होता है । इसके बाद वाहन केवल यात्रा के ही साधन नहीं रहे, वे स्टाइल मारने के साधन भी हो गए । तो फिर उनके रंगों पर ज़्यादा ध्यान दिया जाने लगा । सो साइकिल के रंग भी लाल, नीले, हरे आदि होने लगे । पर यह सच है कि हमने अभी तक भगवा रंग की साइकिलें नहीं देखीं । सो जो बँट गई सो बँट गईं, अब जो बँटेंगी उनका रंग काला होगा । चलो हम तो कांग्रस के अशोक गहलोत की समझ और सादगी की दाद देते हैं कि उन्होंने साइकिलों का रंग तिरंगा नहीं करवाया वरना कभी न कभी ऐसी साइकिलों के कारण तिरंगे के अपमान का मुद्दा भी कोई न कोई देशभक्त उठा ही सकता था । 'ब्लेक इज फार एवर' । और काले रंग पर दूसरा रंग चढ़ भी नहीं सकता । पक्का काम । और काला किसी पार्टी का रंग भी नहीं बल्कि काले रंग से तो सब डरते हैं, चाहे काले झंडे हों या बाँहों पर काली पट्टी ।

रंगों से आदमी को ज़्यादा परेशानी होती है क्योंकि वह रंगों को स्वाभाविक नहीं रहने देता वह उन से प्रतीक बनाता है, संकेत और भाषा बनता हैं । उसे गाड़ी को चलने के लिए हरा रंग, रोकने के लिए लाल रंग चाहिए; संधि करनी हो तो सफ़ेद रंग से संकेत दिया जाता है । हालाँकि कहा जाता है सांड लाल कपड़े से चिढ़ता है पर वास्तव में सांड को रंगों के इतने भेद मालूम ही नहीं हैं । चिढ़ता तो वह अपने सामने बार-बार कपड़ा हिलाने से है । बहुत से पशुओं को केवल काला और सफ़ेद रंग ही दिखते हैं । मनुष्य को भी कभी रंग अन्धता हो जाती है । सावन के अंधे को हमेशा हरा ही हरा दीखता है । सच्चे पार्टी-भक्त को भी ऐसी ही रंग अन्धता होती है पर समझदार लोग इस चक्कर में नहीं पड़ते । वे उस पार्टी का रंग ही देखते हैं जिसकी सरकार बनने वाली होती है । वे गिरगिट से भी ज़ल्दी रंग बदल लेते हैं । गिरगिट निंदा का पात्र नहीं है क्योंकि वह तो अपनी प्राण-रक्षा के लिए रंग बदलता है मगर जो केवल सत्ताधारी पार्टी में जाकर केवल नोट कमाने के लिए रंग बदलना चाहते हैं वे गिरगिट से भी बदतर हैं ।

प्रकृति को देखो, वह रंग बदलती है- क्षण-क्षण रंग बदलती है । बताइए कौन सा रंग बुरा लगता है ? उसके सारे रंग सबकी आँखों के लिए हैं । सबको सुहाते हैं । रंगों की पार्टी मत बनाइये । हर रंग को पहचानिये । उसको समझिये । कभी आदमी खून की कमी से पीला पड़ जाता है, कभी डर से पीला पड़ जाता है, कभी प्यार से शरमा कर गुलाबी हो जाता है, कभी गुस्से से लाल-पीला हो जाता है, कभी उसकी तबियत हरी हो जाती है, कभी आँखों के आगे स्याह अँधेरा छा जाता है, कभी लहू का लाल रंग सड़कों पर बिखर जाता है, कभी खून का यही लाल रंग उसकी आँखों से टपकने लग जाता है । इन रंगों का मतलब समझकर उसके सुख-दुःख में शामिल होइए ।

अब तो प्रकृति हजारों-हज़ार रंगों में प्रकट हो रही है । ये सब हमारे ही जीवन के रंग हों । हम सब इन रंगों में रंग जाएँ । छोड़िए पार्टियों के कीचड़ में रँगे साइकिलों के रंग । साइकिल रंग से नहीं चलती, वह चलती है चलाने वाले की टाँगों की ताकत से और साइकिल के संतुलन से सो इन्हें बनाये रखने पर ध्यान दें । और यह तय करना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि साइकिल की मंजिल क्या है ?

(सन्दर्भ :राजस्थान में स्कूल जानेवाली ग्रामीण लड़कियों को सरकार द्वारा मिलनेवाली साइकिलों का जो रंग वसुंधरा राजे ने पार्टी की राजनीति करने के चक्कर में भगवा रखवाया था उसे अब दी जानेवाली साइकिलों में काला रखा जाएगा -एक समाचार, ३० जनवरी २००९ )


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Feb 6, 2009

स्लम-डोग! मिलिनीयर से सीख, मिल जाए ओस्कर की भीख !

भारत के लोगों में एक बड़ी खराबी है कि हर बात में कुछ न कुछ खुन्नस ज़रूर निकालेंगे । कहीं न कहीं अस्मिता को ठेस लगनेवाली बात ढूँढ़ ही लेंगे । एक सज्जन ने तो कोर्ट में याचिका भी दायर कर दी कि 'स्लम डाग मिलिनीयर' फ़िल्म के कारण भारत के झुग्गी-झोंपडीवालों का अपमान हुआ है । अब पता नहीं, यह याचिका उसने प्रसिद्ध होने के लिए अपने पैसे से डाली है या फ़िल्म को चर्चित करवाने के लिए निर्माता ने डलवाई है । विवाद इतना बढ़ गया है इसके सामने सत्यम् का घोटाला और मुंबई हमलों की घटना भी फीकी पड़ गई । इसलिए इस मुद्दे पर सही मार्गदर्शन करने के लिए महान चिन्तक शाहरुख़ खान को समय निकालकर इस मूर्ख जनता को समझाना पड़ा । चिन्तक कहते हैं- लोग नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं । वे 'स्लम डाग' को तो देखते हैं और नाराज़ होते हैं पर इसके आगे लगे हुए शब्द 'मिलेनियर' अर्थात करोड़पति शब्द को नहीं देखते । अरे जब करोड़पति बना दिया तो उसके बाद क्या चाहिए । फिर तो चाहे जूते मारो, मुँह पर थूको या कुत्ता ही क्या चाहे कुत्ते का गू कहो । कायदे से तो गीता के देश के वासियों को तो इतना स्थितप्रज्ञ होना चाहिए कि हानि-लाभ, जीवन-मरण किसी में भी कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए । शरीर तो नश्वर है और आत्मा अमर है फिर फिक्र करने की क्या ज़रूरत है ।

पैसा आने पर गधा भी बाप हो जाता है । अच्छे-अच्छे मनीषी स्तुति गाने लगते हैं, लोग स्कूलों में मुख्य-अतिथि बना कर बुलाने लग जाते हैं । भले ही पैसेवाला कुछ न दे फिर भी लोग भाग कर उसकी कार का दरवाजा खोलने में गर्व अनुभव करते हैं । अब कोई पूछने वाला हो कि भाई यह तो बताओ इन फ़िल्म वालों ने पैसे के लिए नाचा है, गाया है, कमर मटकाई है । आज भी किसी के पास देने को मुँहमाँगा पैसा हो तो बड़े से बड़ा बादशाह और महानायक आपके कुत्ते के जन्मदिन पर नाचने के लिए आ सकता है । इनमें कोई भी हरिदास नहीं है जो अकबर को कह सके कि -
'संतन को सीकरी सों का काम ।
आवत जात पनहियाँ टूटें बिसर जात हरि नाम ॥'

अर्थात् संत को फतेहपुर सीकरी में अकबर से क्या काम, आने जाने में जूते घिसते हैं और राम का नाम भी भूल जाए । लेकिन इनके लिए तो जिसमें पैसा मिले वही सकारात्मक है ।
और फ़िल्म बनाने वाले भी कौन से संत हैं वे भी पैसे के लिए (मतलब कि फ़िल्म को हिट करवाने के लिए) कुछ भी गर्हित से गर्हित कहानी की माँग के नाम पर दिखा सकते हैं । इस फ़िल्म के निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक सब विदेशी हैं । मूल पुस्तक में कुछ ऐसे परिवर्तन किए हैं जिससे इसमें भारतीय नहीं बल्कि साम्प्रदायिक रंग आ गया है । जैसे मूल पुस्तक में लेखक विकास स्वरूप ने हीरो का नाम 'राम मुहम्मद थॉमस' जानबूझ कर रखा जिससे धर्मविशेष से परे एक आम भारतीय नज़र आए । फ़िल्म में इसका नाम 'जमाल मलिक' और समाज के 'अत्याचारी' सिर्फ़ हिंदू दिखाए गए हैं । वैसे इस देश में समस्याओं और मुद्दों और कहानियों की क्या कमी है पर किसी में माद्दा, योग्यता या भाव तो हो । एक से एक जिजीविषा वाले अद्भुत लोग और उनके कारनामे हैं कि दुनिया चकित हो जाए ।

अब जब मिस वर्ल्ड होने पर ही कोई सुन्दरी मानी जाती हो, आस्कर मिलने से ही कोई फ़िल्म श्रेष्ठ होती हो, गिनीज़ बुक में नाम आने पर ही कोई बात विशिष्ट होती हो, तो फिर ठीक है । गाँधी ने नोबल पुरस्कार को ध्यान में रखकर न कुछ किया और न नोबल के बिना गाँधी का महत्व कम होता है । गीता, रामायण, गोदान, कबीर के सबद को कोई क्या पुरस्कृत करेगा ? वे स्वयं पढ़नेवाले को धन्य करते हैं । छोटों को पुरस्कार बड़ा बनाते हैं और बड़े पुरस्कार को गरिमा प्रदान करते हैं । योरप-अमरीका के मुद्दे और बौद्धिकता दोनों भारत से अलग हैं । खैर! भारत में सुंदरियाँ पैदा होने से सौंदर्य-प्रसाधन का बाज़ार विकसित हुआ, अब चलो कुत्तों के दिन फिरेंगे । हमें तो अफसोस यही है कि अंग्रेज पहले भी कहा करते थे- 'डॉग्स एंड इंडियंस आर नोट अलाउड' । बस अब इतना फ़र्क पड़ गया है कि इंडिया के करोड़पति डाग्स अलाउड हो गए हैं । चलो कल औरों का भी भाग्य उदय होगा ।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि शाहरुख़ खान के अनुसार वहाँ के लोग इस 'डाग' के संगीत के दीवाने हो रहे हैं । वैसे संगीत तो पहले भी था इस देश में पर क्या किया जाए कि उन्हें 'डाग' का ही संगीत समझ में आता है ।

३० जनवरी २००९

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Jhootha Sach

Feb 1, 2009

फ्रिज भी खाली और आंतें भी खाली : क्यों आयी यह नौबत



जापान का एक समाचार था कि छंटनी का मारा एक कर्मचारी अपने फ्लेट में मरा पाया गया । उसके फ्लेट की तलाशी ली गई तो उसके फ्रिज में कुछ भी नहीं था । इसके बाद उसका पोस्ट मार्टम किया गया तो उसकी आँतों में भी कुछ नहीं निकला । इससे इतना तो तय है कि उसकी मृत्यु भूख से हुई थी । जापान दुनिया का दूसरे नंबर का धनवान देश है । क्या ज़रा सी मंदी से ऐसी नौबत आ गई कि कि आदमी इतना निराश हो जाए कि बिना किसीको बताये चुपचाप मरने के सिवा उसके पास कोई चारा न बचे । यह अर्थव्यवस्था ही नहीं सामाजिक व्यवस्था पर भी एक क्रूर प्रश्न दागता है कि व्यक्ति समाज से भी इतना निराश हो चुका है कि किसी से अपने मरने की चर्चा करने का भी साहस नहीं कर सकता । लोगों में आपसी सम्बन्ध इतने क्षीण हो गए हैं कि वे आपस में बाँटें तक नहीं कर सकते । ऐसे में समाज और जंगल में फर्क क्या रह गया ?

भारत में भी सूचना प्राद्यौगिकी के क्षेत्र में बहुत से रोजगार समाप्त हो रहे हैं । मनोचिकित्सकों और एक्यूप्रेशर के चिकित्सकों के पास अचानक से मरीजों की संख्या बढ़ गई है । एक मनोचिकित्सक ने बताया है कि उसके पास आने वालों में अधिकतर आई.टी. क्षेत्र के लोग ज़्यादा हैं और उनमे भी युवा अधिक हैं । यह सच है कि आई.टी. क्षेत्र के लोगों को शुरू में ही इतनी अधिक तनख्वाह मिलती है कि वह उनकी परिपक्वता से अधिक होती है । उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि वे इस पैसे का क्या सदुपयोग करें । ऐसे में उन्हें गुमराह करने लिए बाज़ार है ही । उसे जीवन का उद्देश्य बताने के लिए विज्ञापन करने वाले अभिनेता-अभिनेत्रियाँ भी हैं ही । वे बताते जायेंगें कि यह तेल लगाओ, यह साबुन लगाओ, यह मोबाईल खरीदो, यह चश्मा लगाओ । ऐसा करते-करते सारी तनख्वाह ख़तम ।


इनकी कोई सरकारी नौकरी तो है नहीं कि छंटनी की संभावना लगभग नहीं होती है । इस बाजारवादी व्यवस्था में नौकर और मालिक का कोई सम्बन्ध नहीं होता । यह कोई विवाह थोड़े ही है यह तो डेटिंग है । ख़त्म करते क्या देर लगती है । जब नौकरी छूट जाती है तो अचानक आदमी जमीन पर ही क्या, चार हाथ नीचे चला जाता है । व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना चाहिए क्योंकि आवश्यकताएँ धन के साथ बढ़ तो जाती हैं पर धन कम होने पर उसी हिसाब से कम नहीं हो जातीं । कहा भी गया है -
बढ़त-बढ़त सम्पति सलिल, मन सरोज बढ़ जात ।
घटत-घटत पुनि न घटे, बरु समूल कुम्हलाय ॥

यदि हम थोड़ा सा पीछे जायें तो पायेंगें कि हमारी पिछली पीढी के लोगों में एक कमाता था और पॉँच -सात खाने वाले होते थे पर उनके भी सारे कम हो जाते थे क्योंकि वे मितव्ययिता से चलते थे । सौ कमाते थे तो भी बीस-तीस बचाने की सोचते थे । इसका कारण यह भी था कि वे अपने तक ही सीमित नहीं थे । वे सबके प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते थे । अंततः धनवान कौन है ? वह जो ज़्यादा खर्च करता है पर समय पर जिसके पास ज़हर खाने को भी पैसा नहीं मिलता या वह जो बुरे समय के लिए या भविष्य की ज़रूरतों के लिए दो पैसे बचा कर रखता है ?

और फिर याद रखना चाहिए कि- भोग न भुक्ता वयमेव भुक्ताः

जिन पदार्थों का हम उपभोग करते हैं वे हमारी शक्ति को क्षीण करते हैं । जो खाता है उसको पचाना भी तो पड़ता है । टी.वी. ले आए तो उसे देखने के लिए आँखें और समय तो आपको ही खर्च करना पड़ेगा । कान में वाकमैन का तार घुसेड़कर आप गाने तो सुन सकते हैं पर कानों की सुनने की क्षमता भी आपको ही खोनी पड़ेगी । इसीलिए डाक्टर कहते हैं कि कम खानेवाला दीर्घजीवी होता है । पैसे के साथ-साथ पैसे और समय का प्रबंधन भी आना चाहिए अन्यथा वह हमें न तो सुख प्रदान कर सकता है और न ही सार्थकता । यदि समझ हो तो कबीर की तरह थोड़े से धन में ही बहुत कुछ किया जा सकता है जैसे-
सांई इतना दीजिये जा में कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूं, साधू न भूखा जाय ॥


२८ जनवरी २००९

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Jhootha Sach

Jan 31, 2009

फोटो लगाओ : फोटो उतारो



राजस्थान की मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे के भूतपूर्व होते ही सरकार द्वारा स्कूलों में वितरित किए जानेवाले बस्तों पर से उनका फ़ोटो हटाने की कार्यवाही चालू हो गई है । फ़ोटो हटाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही । तब तक बच्चे बस्ते का इंतजार करेंगे । पहले फ़ोटो छपवाने का खर्चा और अब फ़ोटो हटवाने का खर्चा । इसे कहते हैं अँधा न्योतो और दो बुलवाओ ।

सरकार की तरफ़ से जो भी कम होता है वह किसी व्यक्ति की तरफ से नहीं होता है इसलिए उसमें व्यक्ति शामिल नहीं होना चाहिए और न ही उसका फ़ोटो । पर हर नेता और हर सरकार जनता के ही पैसे से जनता को भीख देने का नाटक करते हैं और श्रेय ख़ुद लेना चाहते हैं । यदि सरकार की तरफ़ से कोई सहायता दी जा रही तो उस पर क्या इतना ही लिखना पर्याप्त नहीं है कि 'सरकार द्वारा भेंट' । इससे पहले अशोक गहलोत ने अपने कार्यकाल में एक नारा दिया था- 'पानी बचाओ, बिजली बचाओ, सबको पढ़ाओ' । इसमें क्या बुराई थी ? बस इतना ही था कि नीचे अशोक गहलोत का नाम था । सो २००४ के विधान सभा के चुनाव से पहले उन सब लिखे हुए नारों को मिटवाया गया । देखा जाए तो नारों और बस्तों पर फोटो में कानूनी कम और प्रभाव का फर्क ज़्यादा है ।

चुनाव से पहले सत्ता में होनेवाले सभी दल फटाफट शिलान्यास करके बड़े-बड़े बोर्ड लगवाते हैं । अखबारों में अपने फ़ोटो वाले विज्ञापन देते हैं । यह स्पष्ट रूप से सरकारी खर्चे से अपना प्रचार है । पता नहीं क्यों चुनाव आयोग का ध्यान इस तरफ़ नहीं जाता ? हो सकता है इसमें कोई कानूनी बारीकी और कोई पतली गली हो । चुनावों में हार के बाद कहा जाता है कि हम इसलिए हारे क्योंकि हम अपनी उपलब्धियों को जनता तक नहीं पहुँचा पाए । इनसे कोई पूछनेवाला हो कि भाई, यह कैसे हो सकता है कि आपने किसी को खाना खिलाया हो और उसको पता न लगा हो, जीभ पर चीनी रखी हो और उसको स्वाद न आया हो । कागजों में काम करके पैसा हज़म करनेवाली जनसेवा में ही ऐसा होता है ।

कोई मंत्री किसी कारखाने का शिलान्यास करता है तो उसके लिए सारे अख़बारों में लाखों रुपये के विज्ञापन देने का क्या अर्थ है ? जब अख़बार में अगले दिन समाचार आयेगा तो अपनेआप पता लग जाएगा या जब लोगों को काम मिलेगा, बढ़िया और सस्ता माल उपलब्ध होगा तो क्या पता नहीं लगेगा ? और तिस पर विज्ञापन में नेताओं के बड़े-बड़े फोटो, जैसे कि ये त्यागी पुरूष अपने पैसे से जनता की भलाई के लिए कारखाना लगा रहे हैं । अरे नाम ही देना है तो लगाने में कुछ नया, बढ़िया और किफायती काम कर दिखाने वाले इंजीनीयर का दीजिये ।

यदि पुराने समय को याद करें तो भारत में इतने कारखाने स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद बने पर ऐसे नाटक नहीं होते थे । नेहरूजी ने कई बार शिलान्यास मजदूर से भी करवाया था । एक बार जब उन्हें शिलान्यास के समय चाँदी की करणी दी गई तो उन्होंने अधिकारियों को डाँट दिया कि क्या मजदूर चाँदी के फावड़े से काम करेंगे ? पिलानी (राजस्थान ) में बिट्स में जब सरस्वती मन्दिर का उद्घाटन हुआ तो श्री घनश्याम दास बिरला ने कारीगरों को भी मंच पर सम्मानित किया ।

आज जिस तरह से बिना कुछ किए ही नेता लोग केवल सम्मान चाहते हैं उसका कारण वह कुंठा है जो कुछ काम न करने से पैदा होती हैं वरना काम करने वाले को विश्वास होता है कि उसने काम किया है तो उसका फल उसे ज़रूर प्राप्त होगा और सच्चा कर्मवीर तो काम करने में जो आनंद प्राप्त होता है उसी को अपना फल और पुरस्कार मान कर संतुष्ट हो जाता है । नेता लोग ज़रा-ज़रा सी बात पर रैली करते हैं लाखों करोड़ों रुपये खर्च करते हैं । बड़े-बड़े आयोजन किए जाते हैं जिनमें केवल भाषण ही होते हैं और भाषण भी केवल बकवास । ऐसे महान संदेशों या भाषणों को रेडियो या अखबार के द्वारा भी तो पहुँचाया जा सकता है । पैसे और समय की बचत होगी । पर पैसा अपनी जेब से लगे तब न दर्द हो । माल-ऐ-मुफ्त, दिल-ऐ-बेरहम ।

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि विज्ञापन हो तो उसमें न तो किसी का फोटो हो और न नाम, बस पद की ही सूचना दे दी जाए कि प्रधान मंत्री उद्घाटन करेंगे या मुख्य मंत्री शिलान्यास करेंगी । वैसे क्या किसी नेता के द्वारा उद्घाटन या शिलान्यास न करने पर काम नहीं होगा या ज़ल्दी हो जाएगा ? क्या सूर्योदय या बरसात का उद्घाटन- समापन-समारोह होता है ? क्या आत्मप्रशंसा या अमरत्व की झूठी लालसा के बिना कुछ नहीं किया जा सकता ?

२७ जनवरी २००९

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Jan 24, 2009

मिलीबैंड: बजा गया बैंड



ब्रिटेन के विदेश सचिव डेविड मिलीबैंड मकर संक्रांति और पोंगल पर भारत पधारे । वैसे इस काम जितनी परिपक्वता और अनुभव तो कहीं उनके चेहरे और कामों में हमें दिखाई नहीं दिया । शायद उन्हें राहुल गाँधी ने भारत में पिकनिक मनाने के लिए के लिए बुला लिया हो । तभी तो उत्तर प्रदेश के गाँवों में गायें दिखाते फिर रहे थे । भारत में लाभदायक न रहने के कारण गाय का पहले जैसा सम्मान न रहा हो फिर भी हिन्दू उन्हें काटते और खाते तो नहीं ही हैं । अब भी लोग उन्हें मकरसंक्रांति पर हरा चारा खिलाकर पुण्य कमाते हैं । कर्नाटक में गायों और बैलों को सजाया-सँवारा जाता और पूजा की जाती है जैसे उत्तर भारत में गोपाष्टमी को किया जाता है । ब्रिटेन में तो शायद ही कोई ढंग की गाय बची होगी । सबको अखाद्य पदार्थ खिला कर पागल कर दिया और फिर पागलपन के नाम पर लाखों गायों को मार दिया । हो सकता है कि अब वहाँ कोई देखने लायक विश्वसनीय गाय बची ही न हो । हो सकता है कि पास जाने पर काटने दौड़ती हो । भारत में अब भी सामान्य गायें बची हैं । वैसे तो सारा भारत ही बेचारा गाय बना हुआ है । कोई भी आकर पिटाई करदे । इसके बाद इसी को उपदेश दिया जाता है जैसे कि बलात्कृत महिला से कहा जाए कि तुम बलात्कार करने लायक दिखती ही क्यों हो । गलती तुम्हारी है । जिस की चेन खींच ली जाए उससे कहा जाए कि तुम सोना पहन कर उचक्के को ललचाती क्यों हो ? ऐसी ही मासूम सलाह दे रहे हैं मिली बैंड । कह रहे हैं कि आतंकवाद का कारण है कश्मीर समस्या । मतलब कि पहले आप इसे सुलझाओ मतलब कि कश्मीर अलगाववादियों के हवाले कर दो । यही तो अमरीका १९४८ से चाह रहा है ।

मिली बैंड आतंकवाद का ऐसा मासूम हल अमरीका को क्यों नहीं सुझाते कि ईसाई धर्म छोड़ कर मुसलमान धर्म अपना लो फिर ओसामा तुम्हें अपना भाई मान लेगा और आतंकवाद बंद कर देगा । मिली बैंड को पता नहीं क्यों वे कश्मीरी पंडित दिखाई नहीं देते जिन्हें अज़हर मसूद जैसे संतों ने पाकिस्तान की शै पर, इस्लाम की सेवा करने के नाम पर डराकर अपनी मातृभूमि छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया गया और दिल्ली की सभी सरकारें वोट बैंक के चक्कर में मौन रहीं । आख़िर एक छोटे से अधिकारी की ऐसी सलाह देने की हिम्मत कैसे हो गई ? राजस्थानी में एक कहावत है - जब दूल्हे के ही लार टपकती हो तो बारातियों को कौन पूछेगा । सो राहुल गाँधी क्या लाड़ लड़ा रहे थे इस गोरे को ? जब आप किसी को ज़्यादा सिर पर बैठाओगे तो वह सिर पर पेशाब करेगा ही ।

२४ जनवरी २००९

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Jan 17, 2009

बुश की विदाई



बुश साहब,
हाय! बाय! बाय!! अलविदा, जैराम जी की । विदाई चाहे सेवा निवृत्ति पर हो चाहे ट्रांसफर पर या मरकर दुनिया से - आदमी का इस पर कोई बस नहीं है । सरकारी नौकरी में तो आदमी को बिस्तर बाँध कर रखना पड़ता है, पता नहीं कब आर्डर आ जाए । सरकारी नौकरी में कुछ ही ऐसे भाग्यशाली होते हैं जो अपने शहर में ही ज्वाइन करते हैं, वहीं सारे प्रमोशन लेते हैं और वहीं रिटायर हो जाते हैं । अगर कभी ट्रांसफर हुआ भी तो उसी शहर में, जैसे किसी की खाट इस कमरे से उस कमरे में लगा दी जाए । ट्रांसफर तो हमारे भी हुए पर जयपुर से सीधे पोर्ट ब्लेयर- तीन हज़ार किलोमीटर दूर । इच्छित स्थान पर पूरे सेवाकाल तक बने रहने की योग्यता प्राप्त करने का न तो समय मिला, न ही लोगों ने यह ट्रेड सीक्रेट बताया ।

कुछ के ट्रांसफर पर जाने से लोग दुखी होते हैं तो कुछ के आने पर । तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के प्रारम्भ में संतों और असंतों सभी को प्रणाम किया है । उन्होंने संतों और असंतों दोनों में एक समानता भी बताई है-
मिलत एक दारुण दुःख देही ।
बिछुरत एक प्राण हर लेही ॥

आपके मामले में तो पता नहीं ऐसा क्या संयोग हुआ कि जब आप आए तो ९/११ हो गया और जाने लगे तो अमरीकी अर्थव्यवस्था की आइसक्रीम मेल्ट डाउन होकर सड़क पर गिर पड़ी । अब उसे सड़क पर से उठाना मुश्किल हो रहा है । अगर एकांत हो तो और बात है पर जब सारी दुनिया देख रही हो तो ऐसा नहीं किया जा सकता न ! ऊपर से अफगानिस्तान और ईराक वाला चक्कर अलग । चलो, अब आपका तो पीछा छूटा । अब भुगतेगा तो बेचारा ओबामा । इसी को कहते हैं - बन्दर की बला तबेले के सिर ।

हमारे यहाँ तो जो भी नया मुख्य मंत्री आता है वह यही कहता है कि पिछले वाला खजाना खाली कर गया । उसके बाद जो आता वह भी यही कहता है । हम तो दोनों को सही मानते हैं । मतलब कि लोग आते-जाते रहते हैं आफत तो खजाने पर है जो हर हालत में खाली होता रहता है । जैसे कि हर आनेवाली पीढ़ी इस दुनिया को और अधिक ख़राब करके जाती है । हमारे यहाँ एक किस्सा चलता है । एक चोर था । जब वह मरने लगा तो अपने बेटे से बोला- बेटा मैनें जिंदगी भर चोरी की है । तू कुछ ऐसा करना जिससे लोग मुझे भला कहें । बाप बड़ी-बड़ी चोरियाँ करता था । बेटे ने जूते-चप्पल चुराना शुरू कर दिया । लोग कहने लगे- इस साले से तो इसका बाप ही अच्छा था । लगता है आपसे अपने पूर्ववर्तियों को फायदा ही होगा ।

तो आपका अन्तिम भाषण भी हो गया-१५ जनवरी को । अब जै राम जी की । वैसे आपको तो ओबामा के चुने जाते ही सामान बाँधना शुरु कर देना चाहिए था । पर आदमी मरते दम तक सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहता । हमारे पड़ोस में एक बुजुर्ग-विधुर सज्जन रहते थे । जैसा कि आप जानते हैं कि पत्नी के मरते ही आदमी अपने को जवान समझने लगता है । तब हम छोटे ही थे । बरसात के दिन थे । टीलों पर खुर्रा बना कर लम्बी-कूद कूद रहे थे । वे भी दिशा मैदान को आए थे । हमें देख कर बोले -अरे, तुम डालडा खाने वाले क्या कूदोगे ? सो वे कूदे और पैर में ऐसी मोच आई कि जिंदगी भर लंगड़ाते रहे । जब कभी हम बच्चे पूछते-ताऊ, कूदोगे ? तो मारने दौड़ते । आप भी राष्ट्रपतित्व की झोंक में जाते-जाते इराक में क्या सिट्टा लेने गए थे ? करवा आए न कचरा ।

जाते हुए को कोई घास नहीं डालता । लोग तो ऐसे मौके पर खुन्नस निकालने की कोशिश करते हैं । बूढ़े शेर को तो चूहे तक परेशान कर डालते हैं । जाते समय कोई सामान बँधवाने भी नहीं आता । सब आने वाले का सामान जचवाने लग जाते हैं । पर रंडी और नेता के दिमाग से भ्रम निकलता नहीं । सत्तर साल की होकर भी बाल रँगती है और शोहदों की सीटी का इंतजार करती है । हमारे यहाँ अस्सी पार वाले भी आगामी लोकसभा चुनावों के लिए ताल ठोंक रहे हैं ।

जाते-जाते आपने स्वयं अपना मूल्यांकन किया कि आपको भारत में लोग पसंद करते हैं । औरों का पता नहीं पर हम आपको अवश्य पसंद करते हैं । हमने आज तक किसी अमरीकी राष्ट्रपति को पत्र नहीं लिखा जब कि आपके नाम हमारे पत्रों की पूरी किताब तैयार है । हाथ में आते ही पहली प्रति आपको ही भेजेंगे । हमने जानबूझ कर आपके कार्यकाल के अन्तिम दिनों को कवर नहीं किया क्योंकि उसमें मेल्ट डाउन और जूता-प्रहार जैसी अशोभनीय घटनाएँ आ रही थीं ।

आपने अपने संबोधन में कहा कि आप ने आपने कार्यकाल में जो कुछ किया वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर किया । हमारे अनुसार तो यह अंतरात्मा बड़ी 'वो' होती है जैसे नायिका के अनुसार 'आप बड़े वो हैं ' । अपने फ़ायदे के अनुसार बोलने लगती है । जब किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता तो निर्दली की आत्मा कहने लगाती है- 'जा, सरकार बना सकने वाली पार्टी में शामिल होजा' । और वह अंतरात्मा की आवाज़ सुनता और मान लेता है । बाद में अगर वहाँ भी दाल नहीं गलती तो वह पुरानी पार्टी में चला जाता है जिसे घर-वापसी कहा जाता है । अंतरात्मा किसी को सांसद खरीदने के लिए कह देती है तो किसी सांसद को एक करोड़ में बिकने के लिए प्रेरित कर देती है । हिटलर को होलोकास्ट की प्रेरणा भी अंतरात्मा ने ही दी होगी । याहया खान को मुजीब को जेल में डालने और बंगलादेश में कत्ले-आम करवाने के लिए भी अंतरात्मा ने ही उकसाया होगा । बेचारे कॉलिन पावेल ने कहा था कि इराक के पास व्यापक विनाश के हथियार नहीं पर आपकी अंतरात्मा अड़ गई । राष्ट्रपति की आत्मा के आगे एक मंत्री की आत्मा की क्या बिसात ? इसलिए हमारा तो कहना है कि अकल से काम लेना चाहिए क्योंकि आजकल आत्मा शुद्ध नहीं रह गई है । अब रिटायर होने के बाद काफी समय मिलेगा । आपने आत्मकथा लिखने का मन बना ही लिया है । हमारा कहना है कि उस में तो कम से कम सच बोल दीजियेगा । सच बोले बिना शान्ति नहीं मिलती । गाना तो कहता है कि- सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया । पर हम कहते हैं कि देर आयद भी दुरुस्त आयद होता है । अगर आप सच बोल देंगें तो शायद इस समय जो सभ्यताओं के संघर्ष की बात की जाती है उसको भी एक नया और सही आयाम मिलेगा ।

अच्छा जी, हैप्पी रिटायर्ड लाइफ । वैसे तो भूतपूर्वों को कोई नहीं पूछता फिर भी ध्यान रखियेगा । ओसामा अभी जिंदा है । हम सोच रहे थे कि जाते-जाते ओसामा को तो गिरफ्तार करवा ही लेंगे पर संयोग की बात, दुष्ट अभी तक नहीं पकड़ा गया । अंत में आपकी बिल्ली के दुखद निधन पर हमारी संवेदनाएँ । पहले तो आपके कुत्ते का भी इंटरव्यू लेने आते थे पत्रकार, पर अब पता नहीं आपको भी कोई कवर करेगा या नहीं ? पर हम इतने स्वार्थी नहीं । पहले भी हमें आपसे कुछ नहीं चाहिए था और अब भी नहीं । सो हम जैसे निस्वार्थ लोग तो आपके संपर्क में रहेंगे ही ।

१७ जनवरी २००९

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Jan 13, 2009

पादरी पिस्तौलवाला


(सन्दर्भ: अंग्रेजी अखबार में एक ख़बर छपी कि केरल के कुछ पादरियों ने विदेशी पिस्तौलें खरीदीं हैं । कुछ ने लाइसेंस ले लिए हैं और कुछ ने लाइसेंस के लिए अर्जी दे रखी हैं । इसीसे सम्बंधित हमारा एक अनुभव आपकी सेवा में प्रस्तुत है । )

रविवार को सुबह सूर्योदय के साथ ही दरवाजे पर खट-खट हुई । हमने सोच अखबारवाला पैसे लेने आया होगा । दरवाजा खोल कर उनींदी आँखों से कहा- देखो भई, इस महीने में दो नागा थी सो ये रहे २८ दिन के दो रुपये के हिसाब से छप्पन रुपये । अखबारवाले की 'अच्छा मास्टर जी 'की जगह सुनाई दिया- मूर्ख मास्टर, हम अखबार वाले नहीं हैं । हम केरल के कोट्टायम जिले से पधारे हैं, पादरी पिस्तौलवाला । पादरी पिस्तौलवाला ? हमारी खोपड़ी को एक सुनामी टाइप झटका लगा । अचानक आँखें पूरी खुल गईं - कुछ भय से ,कुछ विस्मय से । देखा तो देखते रह गए- सफ़ेद चोगा, सफ़ेद टोपी, एक हाथ में पिस्तौल और दूसरे हाथ में गोलियों का पट्टा । पादरी के एक हाथ में पवित्र पुस्तक और दुसरे हाथ में माला वाली छवि एक ही झटके में ध्वस्त हो गई । हमने ईसा, डेसमंड टूटू, मदर टेरेसा, सेंट जेवियर की तस्वीरें देखी थीं पर ऐसा भयानक सौंदर्य किसी में नहीं पाया । हमने अपने गिरते मनोबल, काँपती टाँगों, भर्रायी आवाज़, और रुकती साँस को सँभाला और हिम्मत करके पूछा- महोदय, ऐसा पवित्र और प्रेमपूर्ण वेश आपने ही धारण किया है या कोई और भी हैं ? उन्होंने कहा- नहीं, और बहुतसों ने भी ले रखा है लाइसेंस । दर्जनों लाइन में लगे हुए हैं ।

हमने परिचय का दायरा और बढ़ाते हुए पूछा- आदरणीय, इस प्रेम-प्रसारक यन्त्र- पिस्तौल के बारे में और कुछ बताइए न ! उन्होंने बताया- यह पिस्तौल मेड इन बेल्जियम है, इसकी कीमत एक लाख पचास हज़ार रुपये है । हमने सुझाव दिया- हुजूर, इतने रुपये खर्च करने की क्या ज़रूरत थी । एटा, इटावा के कट्टे हज़ार बारह सौ में मिल जाते । भक्तों और हमारे जैसे मास्टर को तो खिलौने वाले पिस्तौल से भी डराया जा सकता है । उन्होंने समाधान किया- बात केवल डराने की ही नहीं, रौब की भी तो होती है । जो रुतबा ऐ.के.४७ और ऐ.के.५६ का है वह देसी कट्टे का नहीं हो सकता । और फिर तेरे जैसे मास्टरों से पाला थोड़े पड़ता है । हमें बड़ी-बड़ी खूँख्वार आत्माएँ भी मिल जाती हैं । उनके लिए विदेशी पिस्तौल ज़रूरी है ।

अब हमारी हिम्मत थोड़ी-थोड़ी बढ़ने लगी, कहा- ऐसी बात तो नहीं है मान्यवर, भगवान बुद्ध ने तो बिना पिस्तौल के ही अंगुलिमाल से भेंट कर ली और उसका हृदय-परिवर्तन कर दिया । बाल्मीकि की आँखें भी केवल शब्दों से ही खुल गईं । जयप्रकाश नारायण ने बिना पिस्तौल के ही डाकुओं से आत्मसमर्पण करवा लिया । हमारे यहाँ और भी बहुत से धार्मिक नेता, समाज सुधारक और साधु-संत हुए हैं- महावीर, बुद्ध, शंकराचार्य, रामानंद, वल्लभाचार्य, कबीर, तिरुवल्लुवर, नामदेव, नानक, गाँधी, रामसुखदास जी - सबके मुख में राम तो देखा पर बगल में छुरी किसी के नहीं देखी । और आप हैं कि पवित्र पुस्तक और माला के स्थान पर पिस्तौल और गोलियों के पट्टे के साथ पधारे हैं । वे कुछ और खुले और बोले- हम इन लोगों की तरह फक्कड़ नहीं हैं । हमारे पास अरबों रुपये की विदेशी और देशी संपत्ति है । हमें अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए हथियार चाहियें ।

हमने भी अपना ज्ञान बघारा- ऐसी बात नहीं है पादरी जी, हमारे संतों के पास भी अपार संपत्ति है । उनकी एक एक बात लाखों की होती है । ज़्यादा तो नहीं, हम तो आपको अपने सीकर जिले के बारे में बता सकते हैं । यहाँ कई संत वेद-विद्यालय चलाते हैं, आश्रम चलाते हैं, गौशाला चलाते हैं पर पिस्तौल एक भी नहीं रखता । अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से लोगों का दिल जीत लेते हैं । वे हँसे । जिसके हाथ में पिस्तौल हो और वह ठहाका लगाए तो और ज़्यादा डर लगता है । वे बोले ये जो गौशाला और वेद-विद्यालय चलाते हैं इनमें तो खर्च ही खर्च है । हम तो स्कूल और अस्पताल चलाते हैं जिनमें हाड-फोड़ कर पैसे लेते हैं । दवा, खाना, किताबें, नोटबुक, ड्रेस, जूते, मोजे, टाई सब कुछ हमारे यहीं से लेना पड़ता है, सो यह फायदा अलग । और इसके लिए लोग हमें सेवाभावी मानते है सो अलग ।

अब आगे हमें कुछ नहीं सूझा तो हमने पूछ लिया- महाशय, आपके आने का प्रयोजन क्या है ? वे बोले हम तुम्हारे उद्धार के लिए आए हैं । हमने कहा- तो आप वे ही हैं जो पिछले हज़ार साल से हमारे उद्धार के लिए एक महान मिशन लेकर योरप से आते रहे हैं ? हमारे प्राण-पखेरू तो आपकी पिस्तौल को देख कर ही उडूं-उडूं होने लग गए थे । यदि झूठ-मूठ ही खटका दबा देते तो उड़ ही जाते । सस्ते में ही उद्धार हो जाता । वैसे हम अभी उद्धार नहीं चाहते, क्योंकि हमारे नेता आतंकवाद, विदेशी हस्तक्षेप, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बेरोज़गारी, पश्चिमी अपसंस्कृति के बावजूद २०२० तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना चाहते हैं, इंडिया को शाइनिंग बनाना चाहते हैं, भारत-निर्माण करना चाहते हैं । बस हम उसी घड़ी के लिए जीवित रहना चाहते हैं । वे बोले ठीक है, २०२० में फिर आऊँगा तेरा उद्धार कराने के लिए । मतलब कि पीछा छूटना संभव नहीं ।

१२ जनवरी २००९

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Jan 12, 2009

शौचालय-संस्कृति में लिथड़ा साहित्य और दान


लोगों में साहित्य, विशेषकर कविता के प्रति इतनी तटस्थता हो गई है कि योरप के बुद्धिजीवियों ने एक प्रयोग किया कि शौचालय में प्रयुक्त होने वाले पोंछने के टिश्यू पेपर पर कविता छापने लगे । इस नए प्रयोग के मसीहाओं ने सोचा होगा कि शौचालय में कोई मनोरंजन के लिए नहीं आता वरन मज़बूरी में आता है और जब तक हाज़त रवाँ नहीं हो जाती अर्थात् कष्ट निवारण नहीं हो जाता या लघु या दीर्घ शंका का समाधान नहीं हो जाता तब तक बच्चू भाग कर कहाँ जाएगा ? तो इस बंधन के दौरान टिश्यू पेपर पर निगाह पड़ गई तो कुछ न कुछ पढ़ेगा ही । यदि किसी को कब्ज़ की शिकायत है तो हो सकता है कि मल के अवतरण की प्रतीक्षा में पूरा महाकाव्य ही पढ़ डाले । गाँधी जी की सभी बातें हमें अच्छी लगती हैं पर उनकी एक बात से हम कभी सहमत नहीं हुए । कहते हैं कि वे शौचालय में बैठकर पढ़ा करते थे । हमारे यहाँ तो पुस्तकें इतनी पवित्र मानी जाती हैं कि उनका अनादर पूर्वक स्पर्श भी अपराध माना गया है । पवित्र ग्रंथों की अवमानना को लेकर सांप्रदायिक दंगे तक हो जाते हैं । वैसे हमें भी याद है कि बचपन में जब पुस्तक के पैर लग जाता था तो क्षमा माँगते हुए उसे सिर से लगाते थे । मतलब कि पुस्तकें ज्ञान का स्रोत हैं और ज्ञान का सम्मान सुसंस्कृति का पहला सोपान है । पर दुर्भाग्य कि योरप ने उसी कविता को शौचालय के टिश्यू पेपर तक पहुँचा दिया । जब से मानव अधिक सभ्य हुआ तब से उसने शौचालय का ही सबसे अधिक विकास किया । अब वहाँ पुस्तकें भी रखी जाने लगीं । ज़्यादा व्यस्त लोगों के लिए हो सकता है शौचालय में मोबाइल चार्जर और इन्टरनेट कनेक्शन भी होते हों । अब शौचालय ज़ल्दी से निबटने का स्थान नहीं वरन चिंतन, मनन और अध्ययन का सुरक्षित स्थान हो गया है । पर यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि वहाँ भोजन की सोंधी-सोंधी खुशबू तो नहीं ही आती होगी । आती होगी तो गू की बदबू ही आती होगी । अब भई, हो सकता है कि तथाकथित बड़े लोगों के गू में चंदन की खुशबू आती हो । इस बारे में हम अधिकार से कुछ नहीं कह सकते क्योंकि हमें किसी बड़े आदमी के इतना पीछे पड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी क्योंकि हमें न तो प्रमोशन की महत्वाकांक्षा रही, न कोई अन्य असंतोष । अध्यापकी से ही शुरू हुए और अध्यापक ही सेवानिवृत्त हो गए । सूर्य की तरह, उगते और छिपते, दोनों स्थितियों में समान ।

जहाँ तक कविता के आर्थिक पक्ष का सवाल है तो लोग डेढ़ कविता लेकर सारे हिंदुस्तान में घूम-घूम कर कमा ही रहे हैं । प्रकाशक भी कविता की पुस्तकें छाप-छाप कर, अधिकारियों को मोटा कमीशन देकर सरकारी लाइब्रेरियों में घुसा ही रहे हैं । पर यहाँ यह हमारा विचारणीय विषय नहीं है । हम तो शौचालय में फल-फूल रहे साहित्य की बात कर रहे थे । वैसे रेल के डिब्बों और सार्वजनिक शौचालयों की दीवारों पर अंकित साहित्य से कोई भी जागरूक भारतीय साहित्यप्रेमी अपरिचित नहीं है । शौचालय का वास्तुकला और सौन्दर्यबोध से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है जिस पर किसी अन्य आलेख में विचार करेंगे । अभी तो हम शौचालय से जुड़े एक अन्य उदात्त भाव की चर्चा करेंगे ।

दान, धर्म, चेरिटी मानव की उदात्तता का एक सार्वकालिक आयाम है । पिछड़ी हुई भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि गुप्त दान सर्वश्रेष्ठ होता है । 'दातव्यं इति यद्दानं, दीयते अनुपकारिणी । देशे काले च पात्रे च, तद्दानं सात्विकं विदु ॥' (गीता)। यदि दान का प्रचार किया जाए, उस पर टेक्स रिबेट लिया जाए, कोई नाम पट्ट लगवाया जाए तो उससे मिलने वाला पुण्य और आनंद समाप्त हो जाता है । पर आज लोग पाँच रुपये के दान का प्रचार कराने के लिए पाँच सौ रुपये की नामपट्टिका लगवाते हैं और और पाँच हज़ार रुपयों का विज्ञापन अखबारों में देते हैं । दान तो दान, लोग तो धन्यवाद और बधाई का भी विज्ञापन देते हैं । ईसाई धर्म में भी कहा गया है कि यदि तुम एक हाथ से दान देते हो तो दूसरे हाथ को भी पता नहीं लगना चाहिए । दान के लिए यह भी कहा गया है कि वह अपनी मेहनत की कमाई में से दिया जाना चाहिए । भगवान बुद्ध ने एक बुढ़िया द्वारा दिए गए अधखाये अनार को सबसे बड़ा दान बताया क्योंकि वह उसका सर्वस्व था, इसके अतिरिक्त शायद उसके पास देने को कुछ था ही नहीं ।

शौचालय का सीधा सम्बन्ध है शुचिता से । तरह-तरह के शारीरिक विकारों और उत्सर्जनों से मुक्त होकर व्यक्ति स्वच्छ और शुच बनता है । मल-मूत्र त्याग, दंत-धावन, शौच के प्रमुख अंग हैं किंतु शरीर की सफाई के काम निरंतर चलते रहते हैं जैसे थूकना, नाक छींटना आदि । इस प्रकार शौचालयों का विस्तार सर्वत्र और सर्वदा है । एक अभिनेत्री हैं - स्कारलेट जोहानसन, जो एक टी.वी.प्रोग्राम देने गईं । सर्दी की ऋतु तिस पर अभिनेत्री होने के कारण पूरे कपड़े पहन नहीं सकती । तो साहब, जुकाम तो होना ही था । तो अभिनेत्री को छींक आगई । छींक के साथ कुछ तरल पदार्थ भी उत्सर्जित हुआ । यदि उस तरल पदार्थ को रोकने के लिए कपडे का रूमाल हुआ होता तो उस अमूल्य तरल पदार्थ को पर्स में रखकर घर ले जाया जा सकता था । पर चूंकि इस तरल पदार्थ को एक टिशू में संगृहीत करके फ़ेंक दिया गया । आखिर कब तक संभाले आदमी । सारे दिन ऐसे पदार्थ समय-समय पर, विभिन्न रूपों में निसृत होते ही रहते हैं । पर जैसे हीरे की कीमत कोई सच्चा जौहरी ही जानता है वैसे ही अभिनेत्रियों के थूक, नक्की आदि की कीमत कोई सच्चा भक्त ही जानता है । सो स्कारलेट जोहानसन की नाक से निकले इस तरल पदार्थ से लिथड़े कागज को एक जिज्ञासु, सत्यान्वेषी और परोपकारी व्यक्ति ने उठाकर सुरक्षित रख लिया । इसके बाद उसने इंटरनेट पर इसकी नीलामी की । नीलामी बढ़ते-बढ़ते ५५०० डालर पर छूटी । मतलब ३ लाख रुपये । इस राशि से २०-३० साहित्यकारों को पुरस्कृत किया जा सकता है । प्राइवेट स्कूल के एक मास्टर को तीन साल तक वेतन दिया जा सकता है । २०-३० ग़रीबों को स्वरोजगार के लिए मदद की जा सकती है ।

इस राशि का उपयोग किसी "फूड गेदरिंग चेरिटी यू.एस.ए. हार्वेस्ट" के लिए किया जाएगा । हमें पूरी तरह तो समझ नहीं आया की यह कौन सी चेरिटी है पर हमारा अनुमान है ईसाई धर्म में हार्वेस्टिंग का अर्थ है दूसरे धर्म वालों को ईसाई धर्म में दीक्षित करना । वैसे इसका असली अर्थ तो २६ दिसम्बर के टाइम्स आफ इंडिया के संपादक जानें या फिर 'दी एन्वेलप' नामक अखबार के संपादक जानें जिन्होंने सबसे पहले दान और परोपकार की यह महागाथा छापी । इस प्रक्रिया में सबसे महान और गुणग्राही तो हम उस व्यक्ति को मानते हैं जिसने इस अलौकिक पदार्थ को ३ लाख रुपये में खरीदा । अभिनेत्री तो खैर धन्यवाद् की पात्र है ही जिसने इतनी महत्वपूर्ण वस्तु परोपकार के लिए निःशुल्क उपलब्ध करवाई । भगवान करे अभिनेत्रियाँ खूब मल-मूत्र त्याग करें, थूकें, नाक छींटें, पादें और जिज्ञासु लोग उन्हें खोज कर सुरक्षित रखें और धनवान, ज्ञानी, परोपकारी और गुणग्राहक पुण्यात्माएं उन्हें लाखों, करोड़ों रुपयों में खरीदें जिससे चेरिटी यू.एस.ए, हार्वेस्ट जैसा कोई धार्मिक कार्य आगे बढ़े । अभिनेत्री के मल-मूत्रादि की तरह दान और धर्म की खुशबू संसार में सर्वत्र फैले । यदि इसी प्रकार शौचालयीन पदार्थों का धर्मार्थ कार्यों में योगदान बढ़ता रहा तो अभिनेत्रियों और भांडों के शौचालयों को धार्मिक स्थानों का दर्जा मिल जाएगा । अब यह मत पूछियेगा की अभिनेत्री के उस नक्की युक्त कागज़ का वह व्यक्ति क्या करेगा ? यह तो उसकी श्रद्धा और भक्ति पर निर्भर है । पश्चिम हमको मूर्ति पूजक कह कर पिछड़ा और असभ्य कहता है । अब उनके वहाँ के सभ्य समाज में व्याप्त इस मल-मूत्र और नक्की-प्रेम को क्या कहेंगे ?

९ जनवरी २००९

सन्दर्भ समाचार

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Jan 11, 2009

तुम मुझे खून दो , मैं तुम्हें बीयर दूंगा


खून के बदले बीयर - एक ख़बर
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों की क़ैद से निकल कर जर्मनी होते हुए जापान पहुँचे और जापान द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों तथा अन्य प्रवासी भारतीयों को मिलाकर आजाद हिंद फौज बनायी । जिसके राज में सूरज नहीं डूबता था उस ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देते हुए भारत के उत्तर पूर्व में युद्ध का बिगुल बजा दिया । उन्होंने नारा दिया- 'तुम मुझे खून दो मई तुम्हे आज़ादी दूँगा' ।

उस समय बाज़ार इतना विकसित नहीं हुआ था । खरीदने बेचने का सिस्टम भी इतना विकसित नहीं हुआ था । लोग अदला-बदली अर्थात् बार्टर सिस्टम से काम चलाते थे । नेताजी के पास आजादी थी और लोगों के पास गरम खून था । तब तक लोगों का खून सफ़ेद नहीं हुआ था । तब खून का रंग लाल हुआ करता था और बकौल ग़ालिब- खून रगों में दौड़ते-फिरने का कायल न होकर आंखों से टपका करता था । इसलिए लोगों ने नेताजी को खून दिया और आज़ादी का मार्ग प्रशस्त हुआ ।

आज़ादी मिली । धीरे-धीरे आज़ादी के संघर्ष की यादें धुंधली होती गईं । बाज़ार विकसित हुआ । खून के बदले बहुत सी चीजें मिलने लगीं । पहले जीवन अमूल्य था, हालाँकि जीवन-मूल्य अवश्य थे । जीवन-मूल्य उस मूल्य को कहते हैं जिसके बदले में हम अपना जीवन देने के लिए तैयार हो जाते हैं । राम ने मर्यादा की रक्षा के लिए सारा जीवन लगा दिया, भगत सिंह ने आज़ादी के लिए जीवन दे दिया, भीष्म ने धर्म की रक्षा के लिए अपनी मृत्यु का रहस्य बता दिया, दधीचि ने देवों की रक्षा और दानवों के विनाश के लिए अपनी हड्डियाँ दे दीं, राजा शिवि ने शरणागत की रक्षा के लिए अपना माँस काटकर स्वयं तराजू पर चढ़ाना शुरू कर दिया, युधिष्ठिर, बुद्ध, महाबीर, ईसा, गाँधी ने सत्य के लिए सर्वस्व होम दिया, कर्ण ने प्राण देकर भी दानवीरता को नहीं छोड़ा । राजा दिलीप ने मात्र एक गाय के लिए स्वयं को सिंह का भोजन बनाने की ठान ली ।

अब भी जीवन मूल्य हैं । बस अदला-बदली की वस्तुएँ बदल गई हैं । अब लोग किसी धर्म के लोगों से पैसा लेकर मरने के लिए भारत में घुस आते हैं, पैसे लेकर अशांति फैलाने के लिए धार्मिक स्थान तोड़कर अपना जीवन खतरे में डाल देते हैं, कोई सुपारी लेकर किसी की हत्या करने के लिए चल पड़ता है, सैनिकों को युद्ध की सार्थकता समझ में न आने पर भी युद्ध में जाना पड़ता है तनख्वाह के लिए जैसे वियतनाम, अफगानिस्तान और ईराक आदि में अमरीकी सैनिकों को । लोग दारू या कुछ धन लेकर झूठी गवाही देने में जीवन गुज़ार देते हैं, लड़कियाँ कपडे उतारने के लिए तैयार हो जाती हैं, व्यापारी वैध या अवैध दारू बेचते हैं, और लोग ऐसे दीवाने हैं कि खून बेच कर भी दारू ख़रीदते हैं । ऐसे रक्तदाताओं को प्रोफेशनल डोनर कहते हैं । कुछ संस्थाएँ रक्तदान शिविर लगवाती हैं जिनमें रक्तदान के लिए प्रेरित किया जाता है । समाज सेवकों को तो रक्त चूसने से ही फुर्सत नहीं मिलती । साधु-संत पैसों के बदले भगवान का आशीर्वाद बेचते हैं ।

वैसे लोग कुछ भी कहें, हमें तो आज के जीवन-मूल्य ज़्यादा प्रेक्टिकल लगते हैं । फटाफट बेचो । जीवन बेचो, ईमान बेचो, मूल्य बेचो, धर्म बेचो । फटाफट कैश करो । पता नहीं कब भाव गिर जायें । और जीवन का मूल्य ही क्या हैं? कृष्ण ने शरीर को पुराना वस्त्र कहा है- पुराना वस्त्र उतार कर नया पहनने में तो फायदा ही है और फिर यह वस्त्र तो फ्री में मिलता है । पुराना उतारो और भगवान नया वस्त्र लिए तैयार खड़े हैं । इसलिए छोटी-मोटी चीजें बेचने में क्या बुराई है? पूरा जीवन बेचने की बजाय किस्तों में बेचना ज़्यादा लाभदायक है । एक आँख बेचो, एक गुर्दा बेचो, राजनीति में बार-बार निष्ठा बेचो और इल्ज़ाम दे दो आत्मा की आवाज़ को । खून बेचो, आजादी जैसी अमूर्त चीज़ के लिए नहीं वरन भौतिक वास्तु के लिए । कैसे भी पैसे कमाओ ।

हमारे उक्त दर्शन की पुष्टि हो गई है । यदि किसी भारतीय ने पुष्टि की होती तो विश्वसनीय नहीं होती पर यदि पुष्टि योरप के शहर प्राग से हुई है तो मानना ही पड़ेगा । वहाँ के स्वास्थ्य विभाग ने युवकों को रक्तदान के लिए प्रेरित करने के लिए एक मुहिम चलाई है जिसके तहत रक्तदान करने वाले को एक लीटर बीयर दी जायेगी और 'चेक बीयर' नामक पत्रिका की वार्षिक सदस्यता मुफ्त । पता चला है कि योजना काफी सफल रही है । अपने-अपने प्रोत्साहन हैं और भाँति-भाँति के भक्त । एक बार अटल जी पाकिस्तान गए तो एक पत्रकार अतिया ने अटल जी से कहा कि यदि आप कश्मीर मेहर में दे दें तो मैं आप से शादी करने के लिए तैयार हूँ । अपहरण कर्ताओं ने अमिताभ और आशा पारेख के अनुरोध के बदले ही बंधकों को छोड़ना स्वीकार कर लिया था पर चूँकि फ़िल्म वालों का तो एक वाक्य ही विज्ञापन में लाखों का बिकता है सो किसी ने अपहरण कर्ताओं से अनुरोध नहीं किया । वर्ल्ड कप के समय एक सुन्दरी ने कहा था कि वह गोल करने वाले अपने देश के खिलाड़ी को चुम्बन देगी । अब जिसके पास जो कुछ है वह वही तो देगा । कोई बीयर के बदले खून देता है । जिसके पास दाम है वह दाम देता है पर बीयर तो चाहिए ही । अब यह अलग बात है कि एक लीटर बीयर पीने के बाद यदि किसी रक्तदान करने वाले का एक की जगह दो बार खून निकल लिया जाए तो भी उसे क्या पता चलेगा । अपने यहाँ भी तो चुनाव से पहले की रात दारू की थैलियाँ बाँटी जाती हैं । अब कोई भारत को पिछड़ा न कहे । यहाँ भी योरप की तरह सब कुछ बाज़ार हो गया है । हर चीज़ को लेन-देन के दायरे में ले आया गया है । यह खून लेकर बीयर देना इस ग्लोबल विलेज का बाजारवाद नहीं, प्रतिभा-सम्मान-समारोह है ।

८ जनवरी २००९
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Jan 10, 2009

सत्यं-असत्यं : शाश्वतं-नित्यं


संसार विरोधाभासों से बना है । सत्यं है तो असत्यं भी है । वैसे सत्यं मूल शब्द है । 'अ' उपसर्ग है । अगर सत्यं नहीं है तो असत्यं को अवतार लेने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती । अगर सत्यं है तो उसका होना ही असत्यं के काम में बाधा है । यदि नियम नहीं हों तो उनको तोड़ने के प्रपंच रचने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी । इसलिए कहा जा सकता है कि सत्यं के कारण ही असत्यं है । यदि आप चाहते है कि संसार में असत्यं न हो तो सबसे पहले सत्यं का खात्मा करिए । कहते हैं सत्यं तो भगवान का रूप है, उसे नष्ट करना असंभव है । तो फिर साहब असत्यं को भी झेलना ही पड़ेगा ।

समुद्र-मंथन से पहले विष निकला । विष से सब जलने लगे पर कोई उससे मुकाबला करने को तैयार नहीं । अंत में भगवान शंकर ने विषपान किया और तबसे वे नीलकंठ-शिव कहलाने लगे । शिव का मतलब है कल्याण करने वाला । ठीक भी है दूसरों का विष पीने से ही तो उनका कल्याण होगा । विष पीने से डरने वाले न तो शिव हो सकते हैं और न किसी का कल्याण कर सकते हैं । विष के बाद निकला अमृत, जिसे पीने को सब तैयार । एक असुर तो वेश बदल कर अमृत पीने के लिए देवताओं की पंक्ति में जा बैठा । पहचान लिया गया और पकड़ा गया । विष्णु ने सुदर्शन से उसका सिर काट दिया पर थोड़ा सा अमृत पी लिया था इसलिए सिर और धड़ दोनों जीवित रहे और आज भी मुखबिरी करने वाले चंद्रमा को ग्रहण के दिन कष्ट देने आ जाते हैं ।

सत्यं बोलने वाला या उसका पक्ष लेने वाला दोनों ही असत्यं के निशाने पर होते हैं । कहते है सत्यं की रक्षा भगवान करते हैं । इसके लिए सत्यवादी हरिश्चंद्र का उदाहरण दिया जाता है । घरबार, राजपाट सब गया । पत्नी, बच्चों और यहाँ तक कि ख़ुद को भी बेचना पड़ा । ड्यूटी की पाबंदी और ईमानदारी ऐसी कि श्मशान का टेक्स वसूल करने के लिए आधे कफ़न के रूप में पत्नी की साड़ी ही फड़वा ली । ये तो साहब, विश्वामित्र जी उनकी परीक्षा ले रहे थे वरना तो हो गया था सूर्यवंशी महाराज की इज्ज़त का कचरा ।

सत्यं का एक ही रूप होता है इसलिए ज़ल्दी से पहचान लिया जाता है और पकड़ा जाता है । अब अपने सत्यवादी जगद्गुरु भारत महान को ही देख लीजिये- बस ले दे उसके पास एक ही बात है कि आतंकवादी पाकिस्तानी हैं । पर पाकिस्तान के पास हज़ार बातें हैं- 'आतंकवादी का कोई देश नहीं होता, इस्लाम में आतंकवाद है ही नहीं, सच्चा मुसलमान आतंकवादी नहीं हो सकता, हो सकता है ये किस धर्म के और किस देश के लोग हैं जो भारत में आतंक फैला रहे है, हम तो ख़ुद ही आतंकवाद से परेशान हैं , इनका कोई ठौर ठिकाना मिले तो हमें भी बताना, दोनों मिल कर कार्यवाही करेंगें ।' अब कर लो क्या करोगे इनका । पकड़ लो क्या पकड़ोगे इनका । हमारा ध्येय वाक्य है 'सत्यमेव जयते' । पता नहीं कब जीतेगा, अब तक तो जूते ही खा रहा है और दुनिया तमाशा देख रही है ।

कबीर जी ने कहा है-
आधी और रूखी भली, सारी तो संताप ।
जो चाहेगा चूपड़ी, तो बहुत करेगा पाप ॥


सो साहब जो अपनी मेहनत की खाने वाले हैं वे कभी असत्य के चक्कर में नहीं पडेंगें । पर जिसे हराम की और दो-दो चाहियें वह असत्यं के सिवा और किधर जा ही नहीं सकता । पहले पाकिस्तान को तालिबान को पालने के लिए पैसा मिलाता था । अब तालिबान से लड़ने के लिए मिल रहा है । वह न तालिबान से लड़ सकता है और न ही आतंकवाद से लड़ने नाम पर मिलने वाला पैसा छोड़ना चाहता । अमरीका के लिए ऐसा घटिया काम भारत न पहले कर सकता था न अब । सो अमरीका पाकिस्तान को छोड़ भी नहीं सकता । साँप-छछूंदर की हालत हो रही है । असत्यं में लिपटा सत्यं सबको मालूम है ।

असत्यं को भी शास्त्रों में स्थान दिया गया है । शास्त्र कहते हैं कि जुए, मजाक, स्त्रियों, प्राणों पर संकट के समय असत्यं को 'अलाऊ' किया है । आज के सन्दर्भ में यह छूट राजनीति, व्यापार, विज्ञापन ने अपने आप ले ली है । कहा गया है- प्रेम और युद्ध में सब कुछ जायज़ है उसी तर्ज़ पर कहा जा सकता है कि राजनीति, व्यापार और विज्ञापन में सब कुछ नाजायज़ है । पर इस आधार पर असत्यं को सत्यं के स्थान पर नहीं बिठाना चाहिए । दूध और खटाई का साथ नहीं निभ सकता ।

सत्यं को ईमानदारी से इतना मिल रहा था कि मज़े से रह सकता था । पर ज़्यादा चूपड़ी के चक्कर में असत्यं हो गया । इतना असत्यं हुआ कि अंत में सत्यं होना ही पड़ा । हर गुब्बारे की एक सीमा होती है उसके बाद उसे फूटना ही पड़ता है । और फिर सत्यं सबके सामने आ जाता है भले ही वह ज़रा से रबर का सिकुड़ा सा टुकड़ा ही क्यों न हो । एनरोन कैसे भारत में आई थी और कैसे गई यह भी किसी से छुपा नहीं है । लेहमैन, मेरिल लिंच सभी का यही हाल हुआ । हिटलर ने सारी दुनिया को एक टाँग पर खड़ा कर दिया था पर अंत में आत्महत्या ही करनी पड़ी । पाकिस्तान का असत्यं भी सामने आ ही गया ।

मगर उद्घाटित होने से पहले वह बहुत सा नुकसान तो कर ही देता है । ऐसे उदाहरणों से अपने आप ही सत्यं की विजय का विश्वास तो होता है पर असत्यं से निरंतर लड़ने की आवश्यकता भी समाप्त नहीं हो जाती ।

( सन्दर्भ: आई.टी. कम्पनी सत्यं की फूंक निकली- ७ जनवरी २००९ )

८ जनवरी २००९

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