Feb 7, 2009

कर और कमल के बीच अर्जुन सिंह की टाँग


यूँ तो नेताओं की टाँगें सामान्य से ज़्यादा लम्बी होती हैं । वे जहाँ चाहें उन्हें अड़ा सकते हैं पर अर्जुन सिंह की टाँगें कुछ ज़्यादा ही लम्बी हैं । वैसे जो भी केन्द्र में शिक्षा मंत्री होता है उसके लिए और नहीं तो कम से कम इतिहास में टाँग अड़ाना तो ज़रूरी हो ही जाता है । इतिहास में टाँग अड़ाने का सिलसिला १९७७ में जनता पार्टी के शासन में शुरू हुआ था । तब ९ वीं, १० वीं की इतिहास की पुस्तकों में से कुछ अध्याय निकलवाये गए थे । इंदिरा गाँधी का गड़वाया गया काल-पात्र भी फिर से खुदवा कर निकलवाया गया । पर शर्म की बात यह थी कि उस काल-पात्र में इंदिरा गाँधी का कहीं नाम ही नहीं था सो चुपचाप वापस गड़वा दिया गया । भाजपा ने भी शासन में आने पर इतिहास सुधारने का प्रयत्न किया । फिर तो यह परम्परा राज्यों में भी चल पड़ी । इतिहास नहीं हुआ, मज़ाक हो गया । जो इतिहास में शामिल होने लायक नहीं होते, वे चले आ रहे इतिहास से छेड़छाड़ करते हैं ।

यूँ तो कर-कमल, चरण-कमल, मुख-कमल, कमल-नयन आदि बहुत से रूपक चले आ रहे हैं । पहले तो अर्जुन सिंह जी को ध्यान ही नहीं आया कि भाजपा क्यों जीत गयी । फिर उन्हें पता चला कि भाजपा के जीतने का कारण कमल का निशान है । अब समस्या यह है कि न तो कमल को लक्ष्मी जी के नीचे से खींच कर हटाया जा सकता, न केन्द्रीय-मंत्री कमलनाथ का नाम बदला जा सकता, न ब्रह्मा जी, विष्णु, गणेश या सरस्वती जी के हाथ से कमल का फूल छीना जा सकता । वैसे पता नहीं कि उन्हें यह याद है कि नहीं कि राजीव का अर्थ भी कमल ही होता है । भले ही अर्जुनसिंह राम-मन्दिर या राम-सेतु से ख़फ़ा हों पर यदि उन्होंने गीतावली पढ़ी होगी तो वे यह अवश्य जानते होंगे कि तुलसी ने लिखा है- 'राजीवलोचन राम चले तजि बाप को राज बटाऊ की नांई' । यह सब कुछ कर पाना संभव नहीं हो रहा है तो २००८ जून में अर्जुन सिंह जी ने सोचा कि क्यों न केन्द्रीय विद्यालय संगठन के प्रतीक चिह्न में से ही कमल को निकलवा दिया जाए । केंद्रीय विद्यालय संगठन के प्रतीक में कमल ही नहीं, सूर्य भी है । मेरे ख्याल से कमल शिष्य का प्रतीक है और सूरज गुरु का, जो अपने प्रकाश से शिष्य ही नहीं वरन समस्त सृष्टि का अज्ञान का अन्धकार दूर करता है । सबसे पहले चुनावों में रामराज्य पार्टी का चुनाव-चिह्न था 'उगता हुआ सूरज '। उस समय अर्जुन सिंह जी इतने प्रभावशाली नहीं थे वरना तो सूरज का उगना भी कम से कम चुनावों में तो बन्द करवा ही देते ।


पिछले दशक में आम चुनाव के समय कुछ ऐसे ही महान लोगों के कहने पर चुनाव आयोग ने 'व्हील ' नामक वाशिंग पाउडर और एक विज्ञापन 'कमल सा खिल जाए' पर भी रोक लगा दी थी । क्या कहेंगे आप चुनाव आयोग द्वारा भारतीय-जनता के बौद्धिक स्तर के मूल्यांकन पर । क्या वह कमल का नाम सुनकर भाजपा को वोट दे देगी या व्हील पाउडर के विज्ञापन से जनता-दल को जिता देगी ? अगर ऐसा ही होता रहा तो बेचारे मुलायम के चुनाव-चिह्न के चक्कर में चुनाव के दिनों में गरीब लोगों का साइकल चलाना बन्द करवा दिया जाएगा । चुनाव के दिनों में, गावों में जहाँ बिजली नहीं आती, वहाँ भी लालटेन जलाने पर पाबंदी लगा दी जायेगी क्योंकि लालटेन लालू का चुनाव-चिह्न है ।

हम तो यह मानते हैं कि कर और कमल का शाश्वत मेल है । सारे उद्घाटन और शिलान्यास के पत्थरों पर 'अमुक के कर कमलों से' लिखा हुआ है । क्या सबको उखाड़ देंगे ? हम तो सोचते थे कि सब नेताओं के कर कमल हो जायेंगे और सहयोग से काम करेंगे । लोकतंत्र की खासियत तो यही होनी चाहिए कि चुनाव लड़ो और परिणाम आने पर जो भी पार्टी सरकार बनाये काम सब मिल कर करें क्योंकि लक्ष्य तो सबका देश का विकास करना है । पर नहीं, पाँच साल तक एक दूसरे की टाँग खींचते रहेंगे । इसी तरह से साठ साल से जूतम-पैजार देख रहे हैं ।

हे प्रभु, इन सबको सद्बुद्धि दे कि ये राजनीति के कीचड़ में भी कमल की तरह उज्ज्वल रहें और केवल पार्टियों के कर और कमल ही नहीं, सारे देश के लोग एक दूसरे के हाथ थाम कर आगे बढ़ें ।

२ फरवरी २००९

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Jhootha Sach

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