Jun 2, 2011

अपना रस्ता लो बाबा

बाबा रामदेव जी,
आपकी उम्र मात्र ४५ वर्ष है और एक दम छड़े । न आगे नाथ, न पीछे पगहा । वैसे आपसे भी दुगुनी उम्र के लोग देश की सेवा कर रहे हैं मगर आज तक किसी ने इतना दुन्द नहीं मचाया । चुनाव हार गए तो घर बैठे हैं और फिर से सत्ता में आने की जुगत भिड़ा रहे हैं । जब जनता को और कोई विकल्प नहीं मिलेगा तो फिर सत्ता में आ जाएँगे और फिर अपने परिवार वालों, चमचों, दबंगों को लेकर सेवा के पवित्र कर्म में लिप्त हो जाएँगे ।

पर आप तो घरती-आसमान एक किए हुए हैं । अरे भई, सबके अपने-अपने रास्ते हैं कर्म-दुष्कर्म करने के, सेवा करने के, मेवा खाने के । आप अपने रास्ते जाइए और हमें अपने रास्ते जाने दीजिए । हम आपके कामों में टाँग नहीं अड़ाते तो आप क्यों हमारे काम-धंधे में टाँग अड़ा रहे हैं । जब जैसे चाहिए लोगों को देश-विदेश में योग सिखाइए, च्यवनप्राश बनाइए और मज़े कीजिए । हम ने तो कभी आपके कामों में टाँग नहीं अड़ाई । आप पर दवा में हड्डी मिलाने के आरोप लगे, अपने कारखानों में काम करने वालों को न्यूनतम मजदूरी न देने के आरोप लगे, थोड़े से समय में करोड़ों-अरबों रुपए कमाने के आरोप लगे मगर हमने कुछ कार्यवाही की हो तो बोलो ।

और भी बहुत से तथाकथित संत हैं, आयुर्वेदिक दवाएँ, अगरबत्तियाँ बेचते हैं, अरबों की सरकारी ज़मीन कब्जाए हुए हैं, देशी-विदेशी भगोड़ों को शरण देते हैं, मारीशस से काले धन को सफ़ेद करने के ठेके लेते हैं, चेलियों के साथ बलात्कार करते हैं, सेक्स रेकेट चलाते हैं, विभिन्न चैनलों पर किसी को न समझ में आने वाले भाषण झाड़कर पैसे और प्रसिद्धि कमाते हैं, जगह-जगह अपना-अपना आध्यात्मिक सर्कस लिए घूमते हैं, कई बाबा स्कूल चलाते हैं जिनमें किसी भी अध्यापक को पूरी तनख्वाह नहीं दी जाती, आश्रमों में बच्चों की हत्याएँ हो जाती हैं मगर हमने किसी पर भी ध्यान दिया हो तो कहो । सबके अपने-अपने धर्म हैं । और गीता में कहा गया है कि धर्म परिवर्तन गलत है, सबको अपने-अपने धर्म का पालन करना चाहिए ।
सो आप अपने धर्म का पालन करें और हमें अपने धर्म का पालन करने दें । शेर घास नहीं खाता, और गाय मांस नहीं खाती । कोई किसी के भोजन की तरफ देखता तक नहीं । इसीलिए जंगल की दुनिया मानवों की दुनिया की बजाय ज्यादा शांति से चलती है ।

यह ठीक है कि वृंदा करात ने आपकी दवाओं में हड्डी होने का मामला उठाया था, रामडोस ने आपके प्राणायाम से केंसर ठीक होने के दावों को अप्रामाणिक बताया, फिर दिग्विजय सिंह ने कहा कि कल तक तो रामदेव के पास साइकल का पंचर निकलवाने के पैसे नहीं थे और अब अरबों रुपए कहाँ से आ गए ? लोगों का क्या है । लोगों का काम तो कहना है । राजेश खन्ना ने एक फिल्म में कहा भी है- 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना' । हम भी तो लोगों के कहने की परवाह नहीं करते तो आप भी किसी की परवाह किए बिना अपना काम करते रहिए । एक संत हुए हैं- रामसुख दास जी । उन्होंने कभी ऐसा कोई चक्कर नहीं चलाया । आराम से आत्मा-परमात्मा की बातें करते रहे । उनके पास तो एक धोती, एक माला, एक जोड़ी खडाऊँ, एक कमंडल था । और अधिक जानना है तो उनकी वसीयत पढ़ लीजिए । पता चल जाएगा कि संत को किस तरह से रहना चाहिए । एक हुए हैं चंद्रगुप्त के गुरु और मंत्री- चाणक्य । जो सरकारी तेल का दिया तभी जलाते थे जब कोई सरकारी काम करना होता था वरना अपने घर के तेल का दिया जलाते थे । पर अब वह बात तो है नहीं । अब न तो रामसुख दास जैसे संत हैं और न चाणक्य जैसे मंत्री । अब तो वही कहावत लागू होती है-
'जो साँभर में पड़ा सो लूण' ।
मतलब कि जो भी कुछ राजस्थान की खारे पानी की साँभर झील में गिरा सो ही नमक बन गया । सो यह समय ही ऐसा है । कहाँ चील के घोंसले में माँस खोजने चले हैं ?

आपके ज्ञानवर्धन के लिए बताते चलें कि आजकल जो भक्त होते हैं वे भी कलियुगी भक्त हैं । हमारे राजनीतक दलों में भी अनुशासित कार्यकर्त्ता, अनुशासित सिपाही होते हैं- गाँधी जी, मार्क्स, लोहिया, अम्बेडकर और सावरकर जी के तथाकथित भक्त । मगर सब को शाम को दारू चाहिए, डिजाइनर कपड़े पहनते हैं, हवाई जहाजों में चलते हैं, ए.सी. में रहते हैं, बच्चे विदेशों में हैं, बोतल का पानी पीते हैं, जुकाम भी हो तो अमरीका में इलाज़ करवाते हैं । एक बार राहुल गाँधी ने कहा था कि युवा कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं को खादी पहननी चाहिए और शराब नहीं पीनी चाहिए मगर किसने पालन किया बताइए । एक जनसेवक के बारे में तो अभी-अभी छपा है कि वे दो करोड़ की कुर्सी पर बैठते हैं । और अनुशासन और सिपाहीगिरी का हाल यह है जब तक किसी पार्टी में खाने को हराम का मिलता है तब तक उसमें रहेंगे अन्यथा उनकी आत्मा इतनी हरामी है कि तत्काल दल बदल करने की प्रेरणा देने लग जाती है ।

आपके के भी बहुत से अनुयायी हैं वे भी कलियुग के ही हैं । हम अपवाद की बात नहीं करते मगर बहुमत ऐसों का ही है । लोग आपके कार्यक्रम करवाते हैं । आधा चंदा आपको चढ़ा देते हैं और आधा खुद हजम कर जाते हैं । किसी भी आयकर विभाग वाले को पता नहीं चलता । और जो आपके कार्यक्रम करवाते हैं वे राखी सावंत और मीका के भी कार्यक्रम उसी भक्तिभाव से करवाते हैं । वे ही अपने-अपने इलाकों में भू माफिया हैं, दारू का धंधा करने वाले हैं, सट्टा खिलवाते हैं, उनके भी स्विस बैंकों में खाते हैं । इसलिए आप आज के युग में भक्तों पर ज्यादा विश्वास न करें । हम भी अपने कार्यकर्त्ताओं पर आँख मीच कर विश्वास नहीं करते । बुराई नहीं कर रहे , धंधे के गुर बता रहे हैं ।

आप विदेशों से काला धन लाने की बात पर अड़े हैं । क्या यहाँ धन की कमी है ? और फिर उस धन को विदेशों में ही पड़ा रहने दीजिए । वहाँ सुरक्षित रहेगा । यहाँ जो थोड़ा बहुत है वही ईमान खराब किए हुए है । विदेश वाला भी आ गया तो मारकाट मच जाएगी उसे भी खाने के लिए । और फिर धन तो धन ही होता है बाबा । क्या काला और क्या सफ़ेद । क्या आपने लक्ष्मी के कर-कमलों से गिरती मुद्राओं में कोई काले रंग की मुद्रा देखी ? सोना सुनहरा ही होता है । क्या अपने कभी काला सोना देखा है ? अरे, धन आने से तो कलुआ भी सोहन लाल हो जाता है । और फिर लक्ष्मी का वाहन उल्लू होता है जो अँधेरा पसंद करता है । इसीलिए पहले भी सेठ लोग धन को ज़मीन में गाड़ कर रखते थे । धन को हवा और धूप लगने से उसका क्षरण होने लगता है । इसलिए काला या सफ़ेद जैसा भी है उसे वहीं रहने दो । अभी देश पर कौन सा संकट आ रहा है ? देखते नहीं अर्थव्यवस्था कुलाँचे भर रही है । जब संकट आएगा तो देखेंगे । वैसे आपको बता दें आजकल तो बहुत से बाबा भी चेलों से डरकर अपना धन विदेशी बैंकों में रखने लग गए हैं ।

एक बात आपने और कही थी कि हजार और पाँच सौ के नोट बंद होने चाहिए । इसके बाद भी जब भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा तो आप कहेंगे कि नोट बंद करके रेजगारी ही चला दो । बाबा, आजकल पैसे की कीमत ही क्या रह गई है ? सोचो, तब आप यदि विदेश जाएँगे तो एक टिकट के पैसे देने के लिए आपको कई बोरियाँ भरकर रेजगारी ले जानी पड़ेगी और इतनी धातुएँ भी कहाँ से आएँगी सिक्के बनाने के लिए । हम तो कहते हैं कि अब एक-एक करोड़ के नोट चलाए जाने चाहिएँ जिससे कागज कम खर्च हो, पेड़ कम कटें और धरती का पर्यावरण सुरक्षित रहे । और मान लो हम आपसे ही कह दें कि बाबा, आप ही अपने शिष्यों सहित जाइए और स्विस बैंक से सारा धन एक एक रुपए के सिक्कों में ले आइए । अब आप हिसाब लगाकर हमें बताना कि आप और आपके करोड़ों शिष्य कितने जन्मों में वह धन भारत ले आएँगे ? यह मामला अनंत और सर्वव्यापी ब्रह्म को जानने से कम नहीं है जिसे आज तक कोई नहीं जान पाया ।

आपने पिछले वर्ष कहा था कि यदि प्रदूषण नहीं होता तो आप तीन-चार सौ वर्ष जी सकते थे अन्यथा भी आप डेढ़ सौ वर्ष जिएँगे । आपके पास तो बहुत समय है इस देश की सेवा करने का । हमारा तो जीवन सही-सलामत निकल जाने दीजिए फिर कर लेना यह ‘हठ’-योग । और फिर हमारे ही पीछे क्यों पड़े हुए हैं । फिर आपकी योग शक्ति का क्या ठिकाना ? पहले योगी बिना खाए, बिना पिए, एक टाँग पर खड़े होकर हजारों वर्षों तक साधना करते रहते थे सो साल-दो साल भूखे रह कर भी पता नहीं आपका कुछ बिगड़े या नहीं मगर हमारी तो जान ले ही लेंगे ना । आप कहो तो आपको भारत-रत्न दे दें, राष्ट्र संत घोषित कर दें, योग के लिए हजार दो हजार करोड़ का अनुदान दे दें, जहाँ कहो वहाँ ज़मीन दे दें ।

और फिर आप तो सच्चे योगी हैं । पहले तो योगी उड़ कर कहीं भी चले जाते थे फिर आप क्यों हेलीकोप्टर उड़ा कर प्रदूषण फैलाते हैं । और यदि आप विदेश से काला धन लाने के लिए ही अड़े हुए हैं तो फिर हमारे ही पीछे क्यों पड़े हुए हैं । हमें तो कुछ समझ में आता नहीं । आप ही अपनी योग विद्या से चुपचाप देश में लाकर, जहाँ आपकी मर्जी हो रखवा दीजिए ।

हाँ, जो काला धन आप विदेश से लाएँ उसमें से, देश हित को ध्यान में रखते हुए, ३० प्रतिशत टेक्स प्रणव मुखर्जी जी के पास जमा करवा दीजिएगा ।

२-६-२०११

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

6 comments:

  1. भाई वाह, इसे कहते हैं व्यंग..... उपर से हँसते रहो और अंदर अंदर बैठ कर रोओ...

    नमन आपकी लेखनी को.

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  2. गजब का व्यंग लेखन...भिगो भिगो के लपेट लपेट के मारा है...मारा है और रोने भी नहीं दिया है...कमाल किया है आपने...

    नीरज

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  3. किसी को हो न हो, मुझे तो बाबा से ही उम्मीदें हैं..

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  4. इतना शानदार लेख कि मेरी जबान से शब्द नहीं वाह-वाह-वाह के सिवाये,

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  5. ek hi artical mein sarkar aur baba dono ki watt laga dali hai

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  6. जोशी जी प्रणाम
    मेरे मित्र (और आपके भतीजे) श्री सुभाष जोशी जी से सुन कर आपके ब्लॉग पर पहुंचा हूँ.
    पहले तोता-राम पर आपकी एक किताब भी पढी थी.
    आपकी लेखनी की प्रशंसा करना धृष्टता होगी पर फिर भी एक साधारण पाठक की हैसियत से प्रेषित मेरा साधुवाद शायद आप अन्यथा नहीं लेंगे.
    मेरी कम समझ में, सरल और सटीक लेखन सबसे मुश्किल काम है, जिसे आप बखूबी निभा रहे हैं. राम देव और ओसामा पर लिखे व्यंग करारे वार करते हैं.
    आपके ब्लॉग पर आता रहूँगा.
    सादर
    राहुल गौड़

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