आज तोताराम कागजों का एक बण्डल लेकर हाज़िर हुआ और हमसे पढ़ने का आग्रह करने लगा मगर दूसरों का लिखा पढ़े वह भी लेखक होता है ? और आजकल चूँकि हम अपने को लेखक मानने लगे हैं सो उसका आग्रह अनसुना कर दिया और बड़े बेमन से कहा- तू ही सुना दे क्या लिखा है ?
तोताराम ने भी अधिक कष्ट नहीं किया और कहा- बात यह है कि मैनें एक पार्टी बनाई है ।
हमने कहा-पार्टियों की क्या कमी है पहले से ही ए. से जेड. तक सैंकडों जनता, समाज, लोक, शक्ति और कांग्रेस आदि पार्टियाँ हैं । तेरे एक और पार्टी बनाने से क्या फर्क पड़ जाएगा ? फिर भी बता दे क्योंकि तू बताए बिना तो मानेगा नहीं ।
उसने कहा- मेरी पार्टी का नाम होगा टी.डी.पी. ।
हमने कहा- इस नाम की पार्टी तो पहले से मौजूद है- तेलगू देशम पार्टी ।
बोला- है मगर यह तो शोर्ट फॉर्म है मेरी पार्टी का पूरा नाम है 'तोताराम दारू पार्टी' और उसका चुनाव चिह्न होगा 'बोतल' ।
हमने कहा- यह तो समाज विरोधी और अनैतिक है । शराब तो आत्मा और शरीर दोनों का नाश करती है । गाँधी जी ने भी कहा था कि यदि मैं एक दिन के लिए भी देश का डिक्टेटर बन जाऊँ तो शराब बंद करवा दूँगा ।
तोताराम कहने लगा- तभी तो नहीं मिला कोई भी पद । बस, राष्ट्रपिता बना कर खुश कर दिया और आजकल घर में पिता की कितनी चलती है, सब जानते हैं । राहुल गाँधी ने भी कुछ वर्षों पहले कहा था कि युवा कांग्रेस में शराब पर प्रतिबन्ध और खादी की अनिवार्यता रहेगी मगर क्या किसी ने मानी ? और अब तो २२ जनवरी २०१२ को खबर आई है कि कांग्रेस की चुनाव सामग्री भी दारू के कार्टनों में बंद होकर लखनऊ जा रही थी सो पुलिस और दारू समर्थक पीछे लग लिए ।
हमने कहा- मगर उनमें दारू थी तो नहीं ना ? लोग काला धन पूजा घर में भगवान की मूर्ति के नीचे रखते है । अवैध वस्तु सब्जी और फलों के बीच दबाकर ले जाई जाती है । अरे, दारू के खाली डिब्बे सस्ते में मिल गए होंगे सो उनमें रखकर ले गए । उनके मन में चोर होता तो ऐसा क्यों करते ?
बोला- यह एक तकनीक भी तो हो सकती है कि अगली बार जब वास्तव में ही दारू के कार्टनों में दारू ही ले जाई जाएगी तो लोग समझेंगे कि चुनाव सामग्री होगी और कोई कुछ शक नहीं करेगा । और पुलिस तो हर सत्ताधारी की सेवा करती है वरना और सब सूफी हैं क्या ? भैया, भले ही फिर चाहे पाँच साल हराम की खाएँ मगर चुनाव के दिनों में सभी पार्टियों के कार्यकर्ता हाड़ तोड़ मेहनत करते हैं । यदि दो घूँट न लें तो अगले दिन उठना भी मुश्किल हो जाए । हाथी से भी दिन भर काम लेने के बाद शाम को एक बोतल रम की दी जाती है । और फिर दारू इतनी ही बुरी है तो कौन मना करता है सभी पार्टियाँ अपने-अपने राज्यों में कर दें बंद । और बंद करने से ही कौन सा फर्क पड़ जाएगा । गुजरात में दारू बंदी है मगर जब, जहाँ जिस ब्रांड की चाहो ले लो । बस, दो पैसे ज्यादा लगेंगे । वैसे दारू से ही तो एक्साइज़ आता है जिससे जन-कल्याण के कार्य किए जाते हैं ।
हमने कहा- क्या ख़ाक जनकल्याण होता है ? अरे, दारू पीने से जितने अपराध और बीमारियाँ होती उनके इलाज में ही आमदनी से ज्यादा खर्च हो जाता है । और फिर जब हमेशा दारू बुरी नहीं है तो फिर चुनाव के समय में ही क्या खास बुराई आ गई ? बिना दारू के ही जनता कौन सी बढ़िया सरकारें चुन लेगी ? चाहे दारू पीकर चुनो, चाहे बिना पिए; आने तो वही नागनाथ के भाई साँपनाथ । फिर जनता को दो-चार दिन के लिए ही सही अच्छी दारू तो मिलेगी ।
अब तो तोताराम उछल पड़ा, बोला- देख ले, आ गया ना मेरी ही राह पर । क्यों चिंता करता है, चाहे जितने प्रबंध करने का दिखावा कर लें मगर दारू-बल, धन-बल, परिवार-बल और बाहु-बल के प्रभाव में कोई अंतर नहीं आने वाला है ।
हमने कहा- मगर चुनाव आयोग तेरी ऐसी पार्टी को मान्यता नहीं देगा जो सीधे-सीधे दारू की बात करती है ।
बोला- क्यों नहीं देगा ? जब अल्प संख्यकों को आरक्षण की घूस दी जा रही है, लेपटोप का लालच दिया जा रहा है, टी.वी., मुफ्त बिजली और पानी की बात की जा रही है तो दारू में ही क्या खराबी है ? यह तो इस देश में सच्ची शांति, सम-भाव और तनाव मुक्तता लाएगी । दारू पीने वाले कभी भी महँगाई और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन नहीं करते, एक ही प्याले में हिंदू और मुसलमान पी लेते हैं और सारी समस्याओं को दो पेग लगाते ही भूल जाते हैं । तभी इसे मधु कहा है । मधु से ही जीवन में मधुरता आएगी ।
हमने कहा- एक तो वैसे ही अब चुनाव होने वाले हैं तो पार्टी बनाने का क्या फायदा, दूसरे यदि तेरी इस पार्टी को मान्यता मिल भी गई तो एक भी सीट तुझे नहीं मिलने वाली क्योंकि नाम से ही क्या होता है वास्तव में तेरे पास मतदाताओं को दारू पिलाने के लिए पैसे हैं क्या ?
फिर भी तोताराम ने हिम्मत नहीं हारी,बोला- रामविलास के पास कौन से बीस एम.पी. हैं मगर दिल्ली में कार्यालय तो मिला हुआ है । क्या पता, मेरी पार्टी को भी दिल्ली में कार्यालय ही मिल जाए ?
हमने अब कुछ न कहना ही उचित समझा क्योंकि ऐसे आशावादी का कोई कुछ नहीं कर सकता ।
२४-१-२०१२
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भारत एक 'प्रधान' देश है इसलिए वह जब चाहे, जिस क्षेत्र में चाहे प्रधान बन जाता है । पहले वह एक कृषि प्रधान देश था । उस समय देश में भुखमरी थी । अनाज विदेशों से आता था । किसी तरह कृषि विश्वविद्यालय खुले, खाद के कारखाने खुले, बीजों में भी सुधार हुआ और कृषि उत्पादों में आत्मनिर्भरता आई । मगर उसे तो एक विकसित देश बनना था सो इतना विकसित हुआ कि अनाज निर्यात किया जाने लगा और इतना निर्यात किया गया कि फिर से उसी अनाज को, उन्हीं देशों से महँगे भावों पर फिर आयात करना पड़ा । अब हालत यह है अनाज गोदामों में सड़ रहा है और लोग भूखे मर रहे हैं । अब उसे यंत्रीकरण में उन्नति करनी थी सो यंत्रीकरण शुरु हुआ और हालत यह हो गई कि कारें बढ़ गईं और सड़कें कम पड़ गईं । कान कम पड़ गए और मोबाइल ज्यादा हो गए । मोबाइल कानों को ढूँढते फिर रहे हैं ।
उसके बाद यह देश एक लोकतंत्र-प्रधान देश बन गया । उसके सारे निर्णय लोकतंत्र के अनुसार लिए जाने लगे- चाहे वह रोटी का प्रश्न हो या फिर रोजी का । अब तो हालत यह है कि भगवान के बारे में भी और यहाँ तक कि न्याय संबंधी निर्णय भी लोकतंत्र अर्थात वोट बैंक के आधार पर लिए जाने लगे हैं । अब इस देश को विज्ञान प्रधान बनाने की जी तोड़ कोशिशें हो रही हैं हालाँकि केमेस्ट्री, भौतिकी आदि किसी के साथ भी विज्ञान नहीं लगा हुआ है जब कि विज्ञान लगा हुआ होने पर भी राजनीति विज्ञान, गृह विज्ञान, भाषा विज्ञान को कोई विज्ञान मानने के लिए तैयार नहीं । अजीब विडंबना है ।
जब से तोताराम ने न्यूटन के गुरुत्त्वाकर्षण के सिद्धांत को झूठ सिद्ध किया है तब से हमने उसे अपने छाया-मंत्रीमंडल में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त कर लिया है और विज्ञान के बारे में हम हर मामले में उसी से सलाह करते हैं । अभी कोई आठ-दस दिनों पहले कलाम साहब ने कहा कि हमारे देश में शोध और आविष्कार कम होते हैं । सो आज जैसे ही तोताराम आया हमने तोताराम के सामने समस्या रखी तो कहने लगा- कलाम साहब को देश में हो रहे आविष्कारों और खोजों के बारे में पूरी जानकारी नहीं है, यदि होती तो वे ऐसा नहीं कहते ।
हमने कहा- तोताराम, कलाम साहब तो बहुत अपडेट रहने वाले व्यक्ति हैं । यदि ऐसा कुछ होता तो उनसे क्या छुपा रहता ?
तोताराम ने कहा- कलाम साहब बहुत ऊँची बातें सोचते हैं । बड़ी-बड़ी जगहों पर जाते हैं इसलिए उन्हें सामान्य लोगों द्वारा किए जा रहे आविष्कारों की जानकारी नहीं है । वैसे जब कोयले की खानों का राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ था तब भी लोगों ने अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का चमत्कार दिखाया था । तब कागजों में जितने कोयले का उत्पादन हुआ उससे ज्यादा निर्यात कर दिया गया । यह किसी बहुत बड़े वैज्ञानिक चमत्कार से कम है क्या ?
सरकार के बैंकों में, पोस्ट आफिस में जमा करवाने पर रुपया रो-रो कर कोई आठ साल में दुगुना होता है जब कि राजस्थान में एक 'स्वर्ण-सुख' नामक कंपनी ने एक साल में रुपया पन्द्रह गुना करने का वादा किया तो क्या यह मनमोहन जी के अर्थ-विज्ञान से कम है ?
हमने प्रतिवाद किया- मगर रुपया पन्द्रह गुना कहाँ हुआ ?
तोताराम ने उत्तर दिया- पन्द्रह गुना क्या, पन्द्रह लाख गुना हो गया । पता है, कंपनी बनाने वालों ने जितना विज्ञापन और कार्यालय खोलने में खर्च किया और जितना जनता के धन की सुरक्षा करने वालों को दिया उससे तो पन्द्रह लाख गुना से भी ज्यादा हो गया । अब उससे कौन बहस करे ?
हमने विषय का एक और आयाम निकाला- कहा, यह तो धोखाधड़ी है । कोई ऐसा आविष्कार बता जिससे कोई खाने-पीने की चीज़ बढ़ी हो ।
निरुत्तर हो जाने वाला तोताराम नहीं है । कहने लगा- जिस समय देश स्वतंत्र हुआ था उस समय जितना दूध का उत्पादन होता था उससे जाने कितना गुना बढ़ गया है जब कि हमारा देश सबसे ज्यादा चमड़े का निर्यात करता है । गाएँ सड़कों पर धक्के खाती फिरती हैं, गौशालाओं में अनुदान मिलने पर भी भूखी मरती हैं । फिर भी जब कभी कोई त्यौहार आता है तो मावे और दूध की निर्बाध सप्लाई हो जाती है । जितना चाहो पनीर, बटर और घी ले लो । ऐसी घी-दूध की नदियाँ तो कृष्ण के समय में भी नहीं बहती थीं ।
हमारे पास कोई उत्तर नहीं था सो हमने कहा- बंधु, तुम्हारी इन सूचनाओं से हमारा अत्यंत ज्ञानवर्धन हुआ है और कलाम साहब का तो पता नहीं, पर विज्ञान में देश के कम उन्नति करने के कारण हमारे मन में व्याप्त हीन-भावना समाप्त हो गई है और हमें लग रहा है कि गर्व से हमारी छाती कुछ-कुछ चौड़ी भी हो रही है ।
तोताराम ने देश की वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में आगे बताया कि एक ही स्थान पर दो तरह के गुरुत्त्वाकर्षण बनाए जा सकते हैं । आज भी देश में ऐसे चमत्कारी लोग मिल जाएँगे जो सामान खरीदते समय बाट वाले पलड़े में गुरुत्त्वाकर्षण की मात्रा इतनी बढ़ा देते हैं कि पाँच किलो की जगह सात किलो सामान आ जाता है और बेचते समय सामान वाले पलड़े का गुरुत्त्वाकर्षण इतना बढ़ा देते हैं कि पाँच किलो की जगह तीन किलो सामान की ग्राहक के पल्ले पड़ता है ।
इस देश में वैज्ञानिकों ने ऐसी क्रीम बना ली है जो केवल पाँच रुपए में मिल जाती है और उपयोग करने वाली को चौदह दिन में ही इतना गोरा बना देती है कि उसे तत्काल दूल्हा मिल जाता है या किसी विमानन कंपनी में एयर होस्टेस की नौकरी मिल जाती है । आज तक कोई भी गोरा देश ऐसी क्रीम नहीं बना सका जिससे यह चमत्कार हो सके अन्यथा वे सरलता से सभी अफ्रीकियों को गोरा बना देते और जो एकता ईसाई बनाने पर भी नहीं आ सकी वह आ जाती और फिर सभी काले अफ्रीकी उन्हें अपना ही भाई समझते और गोरों को अफ्रीका से नहीं जाना पड़ता और न ही उन पर रंग भेद का आरोप लगता ।
और फिर यह तो तुम्हें मालूम ही होगा कि बिहार में पशु-पालन विभाग के कर्मचारियों ने नेताओं के निर्देशन में ऐसा स्कूटर बनाया था जिस पर बैठकर भैंस हरियाणा से बिहार जा सकती थीं । उसी काल में ऐसी क्षुधावर्द्धक दवा बना ली थी जिसे खाकर एक मुर्गी आठ सौ रुपए का चारा खा सकती थी । अब यह बात और है कि दो-चार दिन पहले ही बिहार के पशुपालन विभाग के कोई चालीस से अधिक कर्मचारियों को इस आविष्कार के लिए पुरस्कृत किया गया मगर पता नहीं बेचारे लालू जी और जगन्नाथ मिश्र को इस गौरव से क्यों वंचित कर दिया ?
आँगनबाड़ियों में सभी बच्चों को दो-पाँच रुपए में पौष्टिक भोजन खिला कर भी संचालक लोग स्वयं लखपति बन गए हैं । यह क्या किसी चमत्कारिक आविष्कार से कम है ? इतना तो द्रौपदी की अन्नपूर्णा वाली हंडिया से भी संभव नहीं था । कलाम साहब ने तो इतने वर्षों तक दिमाग खपाकर कुछ मिसाइलें बनाईं मगर अपने यहाँ तो ऐसे-ऐसे महापुरुष पड़े हैं जो हजारों किलोमीटर दूर बैठकर शब्दों से ही ऐसे-ऐसे गोले दागते हैं कि सामने वाले का मरण हो जाता है । बाजार ने ऐसे-ऐसे आविष्कार कर लिए हैं कि कोल्हू में डालने की ज़रूरत ही नहीं, दूर से ही चलते फिरते आदमी का तेल निकाल लेते हैं ।
हमने फिर भी पीछा नहीं छोड़ा और कहा- तो फिर तोताराम, हमारे इन वैज्ञानिकों को नोबल पुरस्कार क्यों नहीं मिलता ?
तोताराम ने कहा- अरे, हम ज्ञान के पुजारी हैं । न तो हम किसी पुरस्कार के पीछे भागते हैं और न ही पेटेंट लेकर किसी आविष्कार से पैसे कमाना चाहते हैं । हम तो सर्वजन-हिताय काम करते हैं ।
अब आप ही बताइए कि ऐसे ज्ञानी और तार्किक व्यक्ति से कोई कैसे जीत सकता है ? वैसे हम भी जीत कर तोताराम का मुँह बंद नहीं करना चाहते ।
१९-१-२०१२
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तोताराम और हमारा विज्ञान से संबंध कुछ वैसा ही रहा जैसा कि मायावती और ब्राह्मणों का या कुत्ते और ईंट का या अबदुल्ला और राम मंदिर का या करुणानिधि और रामसेतु का ।
पहले आठवीं के बाद ही वैकल्पिक विषय शुरु हो जाते थे । हम दोनों ने ही गणित के डर से नवीं में साइंस नहीं ली, कोमर्स ली । किसी तरह पास होने लायक नंबर आ गए । उसी दौरान पता चला कि हम दोनों की ही बेलेंस शीट के दोनों तरफ से टोटल नहीं मिलते थे हालाँकि गुरु जी ने बता दिया था कि ऐसी स्थिति में सस्पेंस अकाउंट खोल देना । पढ़ाई में तो ठीक है मगर यदि वास्तव में ही कहीं नौकरी करते हुए ऐसा किया तो जेल तक हो सकती है । हम दोनों ने ही आर्ट्स में जाना ठीक समझा । वहाँ बड़ी सुविधा है कि हिंदी में भीम में दस हजार की जगह नौ हजार हाथियों का बल लिखने पर एक दो नंबर कटने से अधिक कुछ खतरा नहीं, या दोहे में चौबीस की जगह तीस मात्राएँ लिखने पर भी कोई फाँसी लगने वाली नहीं थी । सो इस तरह से हिंदी ने हमारा या हमने हिन्दी का उद्धार किया ।
आजकल विज्ञान का युग है । होता तो पहले भी था मगर आज उसके अलावा और किसी बात पर ध्यान नहीं दिया जाता फिर भले ही उस विज्ञान को पढ़ने वाला डाक्टर किसी को कमीशन के लालच में घटिया दवाएँ ही क्यों न लिख दे या इंजीनीयर उद्घाटन से पहले ही गिर जाने वाला पुल ही क्यों न बनाए । आज कोई भाषा और साहित्य की बात नहीं करता । संवेदना तो खैर, एक प्रगति विरोधी गुण मान ही लिया गया है ।
सो हम भी लोगों की देखादेखी विज्ञान शिक्षा के गिरते स्तर के लिए चिंतिति थे । तभी तोताराम आ गया । हमने कहा- तोताराम आजकल विज्ञान का स्तर बहुत गिर गया है । लोग केवल डिग्री लेने के लिए और फिर नौकरी पाने के लिए विज्ञान पढ़ते हैं इसीलिए हमारे यहाँ दूसरे देशों की तरह कोई खोज और आविष्कार नहीं होते ।
तोताराम ने अपना मौलिक तर्क दिया । इसका एक कारण तो यह है कि स्कूलों में विज्ञान की प्रयोगशालाएँ होती हैं । इससे भी विज्ञान का स्तर गिर रहा है । हमारे लिए यह एक नया ही तर्क था । हमने कहा- विज्ञान का तो आधार ही प्रयोग है । यदि बच्चा प्रयोग नहीं करेगा तो विज्ञान को समझेगा कैसे ? और नंबर भी कैसे मिलेंगे ।
वह कहने लगा- नंबरों के लिए तो विज्ञान के टीचर से ट्यूशन पढ़ना ज़रूरी है । यदि बच्चा ट्यूशन पढ़ता है तो टीचर अच्छे नंबर दिलवा ही देगा । और फिर प्रयोगशालाएँ दिखाने के लिए होती हैं या फिर उसके उपकरणों की खरीद में पैसा खाने के लिए होती हैं । उनका विज्ञान से कोई संबंध नहीं होता ।

यह फिर आश्चर्य में डालने वाली स्थापना । हमारे आग्रह किए बिना ही तोताराम ने बताया कि दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक हुआ है आइंस्टाइन जिसने कभी प्रयोगशाला का मुँह नहीं देखा । और न्यूटन के लोग गुण गा रहे हैं उसके भी बहुत से सिद्धांत झूठे सिद्ध हो चुके हैं । मैंने कहीं पढ़ा है कि न्यूटन ने कहा था कि यदि किसी कारण से अचानक सूर्य समाप्त हो जाए तो उसी क्षण पृथ्वी अपने परिक्रमा मार्ग से विचलित हो जाएगी मगर आइंस्टाइन ने सिद्ध कर दिया कि नहीं, पृथ्वी को अपने मार्ग से विचलित होने में आठ मिनट लगेंगे क्योंकि सूर्य का प्रकाश भी पृथ्वी तक आठ मिनट में पहुँचता है और इससे तीव्र कोई प्रभाव नहीं हो सकता । अर्थात न्यूटन गलत । और सुन, न्यूटन ने पेड़ के नीचे अपनी प्रयोगशाला में सेब को ज़मीन पर गिरते हुए देखकर गुरुत्त्वाकर्षण का जो सिद्धांत दिया था वह भी झूठा सिद्ध हो गया है ।
अब तो हमारे आश्चर्य की सीमा नहीं रही । हमने कहा- हमने ऐसा कहीं नहीं पढ़ा । यह तो सर्वमान्य और सर्वसिद्ध सिद्धांत है । तोताराम ने कहा- यदि गुरुत्त्वाकर्षण के सिद्धांत को गलत सिद्ध कर दिया तो क्या देगा । हमने कहा- और तो क्या बताएँ मगर आज चाय के साथ पकौड़ी और गज़क भी खिलाएँगे ।
तो तोताराम ने कहा- देख, दिल्ली से जो साधन हमारे तक आने के लिए टपकते हैं वे हमारे तक न आकर बीच में ही कहाँ अटक जाते हैं ? हमने कहा- वे तो बंधु, पंचों, सरपंचों, एम.एल.ए., एम.पी., अधिकारियों और व्यापारियों तक ही रह जाते हैं ।
तोताराम ने जोर से ताली बजाई- तो बस, हो गया ना सिद्ध कि ऊपर से गिरने वाली चीजें धरती तक नहीं आतीं क्योंकि गुरुत्त्वाकर्षण का सिद्धांत गलत है । वैसे और भी बहुत सी चीजें ऊपर की तरफ ही जाती हैं जैसे कि तेल लगाने वाला अपने से ऊपर वाले को तेल लगाता है या नीचे की ली हुई रिश्वत या कमीशन ऊपर और बहुत ऊपर तक जाता है ।
हमारे पास कोई उत्तर नहीं था सो हमें चाय के साथ पकौड़ी बनवानी पड़ीं और गज़क बाज़ार से मँगवानी क्योंकि गज़क घर में नहीं थी । हमें अपने शर्त न हारने का विश्वास था इसलिए वैसे ही ताव में आ गए थे । खैर!
२२-१२-२०११
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लालू जी,
लोग भले ही आपको घोटालिया, भ्रष्ट, चाराचोर, परिवारवादी - कुछ भी कहें मगर हमारी निगाह में तो आप 'साधू' हैं । वैसे 'साधू' में कुछ लोग 'उ' ह्रस्व लगाते हैं, तो कुछ दीर्घ । पर मात्रा से क्या होता है ? मात्रा तो लगाने वाले पर निर्भर है- छोटी लगाए या बड़ी । असली मात्रा तो गुणों की होती है । 'साधू' में और किसी भी चीज की मात्रा चाहे कम हो मगर ज्ञान, गुण, गरिमा और जिज्ञासा की मात्रा कम नहीं होनी चाहिए । सो आपमें ये चारों गुण पर्याप्त मात्रा में हैं । कबीर ने भी अपने दोहे में 'साधू' लिखा है-
साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे थोथा देय उड़ाय ।।
इस दृष्टि से हमें आप सच्चे 'साधू' नज़र आते हैं भले ही लोगों ने आपके साले साहब को 'साधू' के नाम से प्रसिद्ध कर रखा है । यदि उसमें कोई साधूपना सचमुच में है तो वह आपके संरक्षण, संगति और सत्कर्मों का ही प्रभाव है ।
आपने अपने 'साधूपने' का प्रत्यक्ष प्रमाण संसद में अन्ना हजारे के आन्दोलन पर विचार व्यक्त करते हुए दिया । जब आप भाषण दे रहे थे तो श्रोता ऐसे सुन रहे थे जैसे कि अर्जुन भगवान कृष्ण से गीता का उपदेश सुन रहे हों । किसी के मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी । सब आपके वचनामृतों का पान कर रहे थे । किसी ने भी कोई विरोध नहीं किया क्योंकि आपके आप्त वचनों में विरोध करने जैसी कोई बात थी ही नहीं । जब कभी मंत्रमुग्ध सांसदों को थोड़ा-सा होश आता था तो मेजें थपथपा कर आपका समर्थन करते थे । भले ही हम नगरपालिका के वार्ड मेंबर तक भी कभी नहीं रहे पर संसद के कई अधिवेशनों को हमने दर्शक दीर्घा से देखा है । बहुत से चुनाव भी करवाए हैं और बच्चों को नागरिक शास्त्र भी पढ़ाया है मगर ऐसी अद्भुत, निर्मल, सकारात्मक एकता और शालीनता संसद में कभी देखने को नहीं मिली ।
भले ही कुछ निंदक संसद को चोरों का अड्डा कहें, आँकड़ेबाज़ कहें कि संसद में आधे से ज्यादा हिस्ट्रीशीटर और अभियुक्त हैं मगर हमें तो उस दिन का अधिवेशन देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कि नेमिषारण्य में भागवत कथा हो रही हो । सारे संत लोभ मोह, स्वार्थ, सुख त्याग कर केवल लोकतंत्र, संसद, संविधान की ही चिंता में मुग्ध थे । ठीक भी है - ए.राजा, कलमाड़ी, साधू यादव, पप्पू यादव, सुखराम, फूलन देवी और आप जैसे संतों ने जिस लोकतंत्र, संविधान और संसद को अपने खून पसीने से सींचा है उसे एक अन्ना हजारे जैसे सिरफिरे आदमी के कारण नष्ट-भ्रष्ट और ध्वस्त तो नहीं होने दिया जा सकता ना ।
अन्ना हजारे जैसे संविधान, संसद और लोकतंत्र के शत्रुओं से तो आप और संसद में बैठे सारे संत एकजुट होकर निबटेंगे ही पर हमने आपको शुरु में ही 'साधू' शब्द से संबोधित किया था उसकी बात तो भूले ही चले जा रहे हैं । साधू की सबसे बड़ी पहचान यही होती है कि वह व्यर्थ बातों को छोड़ कर केवल सार को ही ग्रहण करता है । अन्ना ने कितनी ही अनर्गल बातें कीं मगर आपने उसमें से एक काम की बात छाँट ली कि डाक्टरों को इस बात की जाँच करनी चाहिए कि चोहत्तर बरस का एक बूढ़ा आदमी कैसे बारह दिन तक भूखा रह सकता है ?
वैसे भूख बहुत बुरी होती है । कहते हैं 'भूख में किवाड़ पापड़' । हमारी दादी बताया करती थी कि जब संवत १९५६ में अकाल पड़ा तो भूखे लोग पेड़ों के छिलके तक खा गए । हमें तो पता नहीं पर अपनी सत्तर साल की छोटी सी उम्र में इतना तो हमने भी देखा है कि भूख से पीड़ित जनसेवकों ने भूख मिटाने के लिए सीमेंट, चारा, कोलतार, ब्लेक-बोर्ड, चाक, बिजली के खम्भे, पत्थर, गिट्टी जैसी न खाने योग्य वस्तुएँ खाकर भी किसी तरह काम चला लिया मगर कभी किसी सड़क पर चलते मनुष्य, कुत्ते-बिल्ली को पकड़कर खाने जैसा हिंसक काम नहीं किया ।
वैसे भूख ही इस दुनिया में सबसे बड़ी बीमारी और समस्या है । लोग स्वर्ग इसीलिए जाना चाहते हैं कि वहाँ भूख-प्यास का चक्कर नहीं है । इस 'भूख' से लड़ने के लिए अन्ना हजारे ही यह 'अनशन-कला' देश हित में लाभदायक हो सकती है । आपके अलावा और किसी सांसद ने इस 'अनशन कला और विज्ञान' के महत्त्व को नहीं समझा । आपने इस सारे धुआँधार में से 'सार' को निकाल लिया । हमने आपको ऐसे ही न 'साधू' थोड़े कहा है ? यदि देश के सभी बी.पी.एल. कार्डधारी महिने में बारह क्या, आठ दिन भी सफलतापूर्वक अनशन कर सकें तो सोचिए नरेगा, सस्ता अनाज और मध्याह्न भोजन का कितना अन्न ‘सेवकों’ के खाने के लिए बच जाएगा ? सरकार सस्ता अन्न विदेशों को निर्यात करके कितनी विदेशी मुद्रा कमा सकेगी ? फिर शायद कोई भी सेवक कोई अखाद्य वस्तु खाने को विवश नहीं होगा ।
अन्ना ने अपनी इस 'भूख भगा तकनीक' का रहस्य ब्रह्मचर्य को बताया है । पर हमें लगता है कि वे सच छुपा रहे हैं । लगता है कि वे गुपचुप इसका पेटेंट करवाएँगे । हमारा तो मानना है कि जब कोई व्यक्ति किसी महान कार्य में व्यस्त हो जाता है तो वह सरलता से भूख प्यास को जीत लेता है । इसीलिए हमने कई-कई बीवियों और दसियों बच्चे वाले नेताओं के फोटो देखें है मगर उनमें वे कहीं भाषण दे रहे हैं, कहीं उद्घाटन कर रहे हैं, कहीं साफा पहने हुए हैं, कहीं शिलान्यास कर रहे हैं । नेताओं के बहुत कम फोटो हमने देखे हैं जिनमें वे खाना खा रहे हों । यदि कभी भूले से खाना खाते भी हैं तो ऐसे जैसे कि भगवान शबरी के बेर चख रहे हों ।
अन्ना की इस तकनीक का पता तो जब चलेगा, तब चलेगा मगर हमारा मानना है कि रक्षामंत्री एंटनी और वित्तमंत्री प्रणव मुकर्जी से कह कर अन्ना की पेंशन अभी से तीन चौथाई कम करवा दी जानी चाहिए क्योंकि उनके न तो बीवी है और जब बीवी नहीं है तो बाल-बच्चे भी नहीं हैं । और फिर बड़े आराम से महिने में आठ-दस दिन भूखे भी तो रह सकते हैं ।
वैसे जहाँ तक तकनीक का सवाल है तो तकनीकें तो आपके पास भी कम नहीं हैं । राबड़ी जी ने भैंस का दूध और सब्जियाँ बेचकर बच्चों को मेयो कालेज में पढ़ाया और दस-बारह बच्चों को भर पेट खाना खिलाया और चुनाव के लिए भी खर्चा जुटाया । ज़रूर आपने भैंस की कोई ऐसी नस्ल विकसित की होगी जो कामधेनु की तरह दूध क्या, सब कुछ दिए ही चली जाती है । अच्छा हो कि आप भैंस की ऐसी नस्ल विकसित करने की तकनीक देश को मुफ्त में उपलब्ध करवा दें जिससे सभी दूधिए अपने बच्चों को मेयो कालेज में पढा सकें और राजनीति करने के लिए चुनाव का खर्चा जुटा कर देश की सेवा भी कर सकें । इसी तरह से पेट्रोल की समस्या से जूझ रहे देश को उस तकनीक से भी अवगत करवा दें जिसमें एक स्कूटर हरियाणा से चार भैसों को पटना ले जा सके ।
वैसे तो भुखमरी से जूझ रही दुनिया के लिए भूख मिटाने या भगाने या अनशन की तकनीक ज्यादा ज़रूरी है मगर अब भी कुछ ऐसे सेवक हैं जिनके पास अनाप-शनाप पैसा है । वे खाने के अलावा उस पैसे का कोई उपयोग नहीं जानते । हाजमोला और दशमूलारिष्ट का सेवन करने के बाद भी पैसा है कि निबट ही नहीं रहा है । इसलिए अच्छा हो कि आप वह तकनीक ऐसे नेताओं के लिए मुफ्त में उपलब्ध करावा दें जिससे आपके कार्यकाल में एक मुर्गी एक दिन में आठ सौ रुपए का खाना खा लेती थी जो कि आज के हिसाब से कोई पाँच हज़ार रुपए का बैठता होगा । और उसे अजीर्ण भी नहीं होता था ।
खैर, ये तो छोटी बातें हैं । गरीब हो या अमीर खाना-पीना तो चलता ही रहता है । सबसे बड़ी बात आपने जो उठाई वह है संसद और संविधान की गरिमा की । लोगों ने तमाशा समझ रखा है । उन्हें पता नहीं किस तरह शहीदों ने अपने भारत को आज़ादी दिलवाई और किस तरह उस समय के महान नेताओं ने यह संविधान बनाया और आज, कैसे आप जैसे सेवाभावी नेता जाने कहाँ-कहाँ से पेट काट कर पैसे जुटाकर, सारी सुख-सुविधाएँ छोड़कर, अपने परिवार के सारे सदस्यों को इस पुनीत कार्य में लगाकर उस संविधान की रक्षा के लिए चुनाव लड़ते हैं, यह बात सरकारी नौकरी करने वाले, छोटा-मोटा व्यापार करने वाले, किसान मज़दूर क्या समझेंगे ? इन्हें इतनी बड़ी बातों की खबर ही नहीं और न ही इतना सेवा-भाव । यह तो नेता ही जानता है कि सेवा धर्म कितना कठिन है ? कौन है जो कलमाड़ी, ए.राजा. कनिमोझी, सुखराम और आपकी तरह जनता की सेवा करते हुए जेल के कष्ट भोगता है ? अन्ना हजारे, किरण बेदी सब मजे से अपनी पेंशन पेल रहे हैं और भाषण झाड़ रहे हैं । शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने कौन सी अपनी प्रेक्टिस छोड़ दी । सब अपना धंधा कर रहे हैं । ये तो आप, मुलायम और मायावती जैसे लोग हैं जो कोई अपनी खेती, कोई मास्टरी, कोई डेयरी छोड़कर देश की सेवा कर रहे हैं और संविधान की रक्षा कर रहे हैं वरना ये अन्ना हजारे जैसे लोग कब के संसद भवन की ईंटें उठा ले जाते और संविधान की किताब को रद्दी में बेच देते ।
सबसे अच्छी बात यह देखने को मिली कि संविधान की रक्षा के लिए सारे सांसद एकमत दिखाई दिए । ठीक भी है, ये आलतू-फालतू लोग और मनमोहन जी, अरुण जेतली, गुलाम नबी आज़ाद जैसे राज्य सभा के थ्रू दंड पेल रहे लोग क्या जानें कि चुनाव के खर्चे, समस्याएँ और खुराफातें क्या होती हैं, संविधान और लोकतंत्र क्या होता है ? और फिर कितना बड़ा उद्योग है संविधान की रक्षा करना ? लाखों पुलिस, लाखों नेता, करोड़ों चमचे, गुंडे, अपराधी इस काम में लगे हुए हैं । यदि संविधान को कुछ हो गया तो ये सब क्या खाएँगे, कहाँ जाएँगे और सबसे बड़ी बात यह कि हम सबसे बड़े लोकतंत्र होकर, सबसे धनवान लोकतंत्र अमरीका को क्या मुँह दिखाएँगे कि हम इतने सेवक मिल कर, इतनी बड़ी पुलिस के होते हुए भी संविधान की रक्षा नहीं कर सके ।
यदि अन्ना जैसे लोगों को अभी से नहीं रोका गया तो कल को कोई भी पूछने लग जाएगा कि फलाँ मंत्री या फलाँ नेता दिन में पाँच बार धोबी के धुले कुर्ते-पायजामे कहाँ से बदलता है ? चालीस बरस ईमानदारी से नौकरी करने वाले सेवा निवृत्त कर्मचारी के पास एक साइकल भी नहीं है और एक सरपंच कैसे पाँच सौ रुपए मानदेय के बल पर जीप में घूमता है और कैसे बिना कोई नौकरी किए ठाठ से रहता है ?
ऐसे में कोई नहीं आने वाला संविधान की रक्षा करने । फिर हम ऊपर जाकर गाँधी, नेहरू, अम्बेडकर को क्या मुँह दिखाएँगे ? इसलिए भले ही ऐसे लोगों को आधी रात को डंडे मारकर खदेड़ना पड़े, किसी के पीछे भी इनकम टेक्स वाले, सी.बी.आई. वाले लगाने पड़ें, पद या पैसे के लालच की मेनका भेज कर किसी भी विश्वामित्र की तपस्या भंग करवानी पड़े, मगर संविधान की रक्षा ज़रूर होनी चाहिए ।
आमीन ।
२८ अगस्त २०११
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बाबा रामदेव जी,
आपकी उम्र मात्र ४५ वर्ष है और एक दम छड़े । न आगे नाथ, न पीछे पगहा । वैसे आपसे भी दुगुनी उम्र के लोग देश की सेवा कर रहे हैं मगर आज तक किसी ने इतना दुन्द नहीं मचाया । चुनाव हार गए तो घर बैठे हैं और फिर से सत्ता में आने की जुगत भिड़ा रहे हैं । जब जनता को और कोई विकल्प नहीं मिलेगा तो फिर सत्ता में आ जाएँगे और फिर अपने परिवार वालों, चमचों, दबंगों को लेकर सेवा के पवित्र कर्म में लिप्त हो जाएँगे ।
पर आप तो घरती-आसमान एक किए हुए हैं । अरे भई, सबके अपने-अपने रास्ते हैं कर्म-दुष्कर्म करने के, सेवा करने के, मेवा खाने के । आप अपने रास्ते जाइए और हमें अपने रास्ते जाने दीजिए । हम आपके कामों में टाँग नहीं अड़ाते तो आप क्यों हमारे काम-धंधे में टाँग अड़ा रहे हैं । जब जैसे चाहिए लोगों को देश-विदेश में योग सिखाइए, च्यवनप्राश बनाइए और मज़े कीजिए । हम ने तो कभी आपके कामों में टाँग नहीं अड़ाई । आप पर दवा में हड्डी मिलाने के आरोप लगे, अपने कारखानों में काम करने वालों को न्यूनतम मजदूरी न देने के आरोप लगे, थोड़े से समय में करोड़ों-अरबों रुपए कमाने के आरोप लगे मगर हमने कुछ कार्यवाही की हो तो बोलो ।
और भी बहुत से तथाकथित संत हैं, आयुर्वेदिक दवाएँ, अगरबत्तियाँ बेचते हैं, अरबों की सरकारी ज़मीन कब्जाए हुए हैं, देशी-विदेशी भगोड़ों को शरण देते हैं, मारीशस से काले धन को सफ़ेद करने के ठेके लेते हैं, चेलियों के साथ बलात्कार करते हैं, सेक्स रेकेट चलाते हैं, विभिन्न चैनलों पर किसी को न समझ में आने वाले भाषण झाड़कर पैसे और प्रसिद्धि कमाते हैं, जगह-जगह अपना-अपना आध्यात्मिक सर्कस लिए घूमते हैं, कई बाबा स्कूल चलाते हैं जिनमें किसी भी अध्यापक को पूरी तनख्वाह नहीं दी जाती, आश्रमों में बच्चों की हत्याएँ हो जाती हैं मगर हमने किसी पर भी ध्यान दिया हो तो कहो । सबके अपने-अपने धर्म हैं । और गीता में कहा गया है कि धर्म परिवर्तन गलत है, सबको अपने-अपने धर्म का पालन करना चाहिए ।
सो आप अपने धर्म का पालन करें और हमें अपने धर्म का पालन करने दें । शेर घास नहीं खाता, और गाय मांस नहीं खाती । कोई किसी के भोजन की तरफ देखता तक नहीं । इसीलिए जंगल की दुनिया मानवों की दुनिया की बजाय ज्यादा शांति से चलती है ।
यह ठीक है कि वृंदा करात ने आपकी दवाओं में हड्डी होने का मामला उठाया था, रामडोस ने आपके प्राणायाम से केंसर ठीक होने के दावों को अप्रामाणिक बताया, फिर दिग्विजय सिंह ने कहा कि कल तक तो रामदेव के पास साइकल का पंचर निकलवाने के पैसे नहीं थे और अब अरबों रुपए कहाँ से आ गए ? लोगों का क्या है । लोगों का काम तो कहना है । राजेश खन्ना ने एक फिल्म में कहा भी है- 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना' । हम भी तो लोगों के कहने की परवाह नहीं करते तो आप भी किसी की परवाह किए बिना अपना काम करते रहिए । एक संत हुए हैं- रामसुख दास जी । उन्होंने कभी ऐसा कोई चक्कर नहीं चलाया । आराम से आत्मा-परमात्मा की बातें करते रहे । उनके पास तो एक धोती, एक माला, एक जोड़ी खडाऊँ, एक कमंडल था । और अधिक जानना है तो उनकी वसीयत पढ़ लीजिए । पता चल जाएगा कि संत को किस तरह से रहना चाहिए । एक हुए हैं चंद्रगुप्त के गुरु और मंत्री- चाणक्य । जो सरकारी तेल का दिया तभी जलाते थे जब कोई सरकारी काम करना होता था वरना अपने घर के तेल का दिया जलाते थे । पर अब वह बात तो है नहीं । अब न तो रामसुख दास जैसे संत हैं और न चाणक्य जैसे मंत्री । अब तो वही कहावत लागू होती है-
'जो साँभर में पड़ा सो लूण' ।
मतलब कि जो भी कुछ राजस्थान की खारे पानी की साँभर झील में गिरा सो ही नमक बन गया । सो यह समय ही ऐसा है । कहाँ चील के घोंसले में माँस खोजने चले हैं ?
आपके ज्ञानवर्धन के लिए बताते चलें कि आजकल जो भक्त होते हैं वे भी कलियुगी भक्त हैं । हमारे राजनीतक दलों में भी अनुशासित कार्यकर्त्ता, अनुशासित सिपाही होते हैं- गाँधी जी, मार्क्स, लोहिया, अम्बेडकर और सावरकर जी के तथाकथित भक्त । मगर सब को शाम को दारू चाहिए, डिजाइनर कपड़े पहनते हैं, हवाई जहाजों में चलते हैं, ए.सी. में रहते हैं, बच्चे विदेशों में हैं, बोतल का पानी पीते हैं, जुकाम भी हो तो अमरीका में इलाज़ करवाते हैं । एक बार राहुल गाँधी ने कहा था कि युवा कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं को खादी पहननी चाहिए और शराब नहीं पीनी चाहिए मगर किसने पालन किया बताइए । एक जनसेवक के बारे में तो अभी-अभी छपा है कि वे दो करोड़ की कुर्सी पर बैठते हैं । और अनुशासन और सिपाहीगिरी का हाल यह है जब तक किसी पार्टी में खाने को हराम का मिलता है तब तक उसमें रहेंगे अन्यथा उनकी आत्मा इतनी हरामी है कि तत्काल दल बदल करने की प्रेरणा देने लग जाती है ।
आपके के भी बहुत से अनुयायी हैं वे भी कलियुग के ही हैं । हम अपवाद की बात नहीं करते मगर बहुमत ऐसों का ही है । लोग आपके कार्यक्रम करवाते हैं । आधा चंदा आपको चढ़ा देते हैं और आधा खुद हजम कर जाते हैं । किसी भी आयकर विभाग वाले को पता नहीं चलता । और जो आपके कार्यक्रम करवाते हैं वे राखी सावंत और मीका के भी कार्यक्रम उसी भक्तिभाव से करवाते हैं । वे ही अपने-अपने इलाकों में भू माफिया हैं, दारू का धंधा करने वाले हैं, सट्टा खिलवाते हैं, उनके भी स्विस बैंकों में खाते हैं । इसलिए आप आज के युग में भक्तों पर ज्यादा विश्वास न करें । हम भी अपने कार्यकर्त्ताओं पर आँख मीच कर विश्वास नहीं करते । बुराई नहीं कर रहे , धंधे के गुर बता रहे हैं ।
आप विदेशों से काला धन लाने की बात पर अड़े हैं । क्या यहाँ धन की कमी है ? और फिर उस धन को विदेशों में ही पड़ा रहने दीजिए । वहाँ सुरक्षित रहेगा । यहाँ जो थोड़ा बहुत है वही ईमान खराब किए हुए है । विदेश वाला भी आ गया तो मारकाट मच जाएगी उसे भी खाने के लिए । और फिर धन तो धन ही होता है बाबा । क्या काला और क्या सफ़ेद । क्या आपने लक्ष्मी के कर-कमलों से गिरती मुद्राओं में कोई काले रंग की मुद्रा देखी ? सोना सुनहरा ही होता है । क्या अपने कभी काला सोना देखा है ? अरे, धन आने से तो कलुआ भी सोहन लाल हो जाता है । और फिर लक्ष्मी का वाहन उल्लू होता है जो अँधेरा पसंद करता है । इसीलिए पहले भी सेठ लोग धन को ज़मीन में गाड़ कर रखते थे । धन को हवा और धूप लगने से उसका क्षरण होने लगता है । इसलिए काला या सफ़ेद जैसा भी है उसे वहीं रहने दो । अभी देश पर कौन सा संकट आ रहा है ? देखते नहीं अर्थव्यवस्था कुलाँचे भर रही है । जब संकट आएगा तो देखेंगे । वैसे आपको बता दें आजकल तो बहुत से बाबा भी चेलों से डरकर अपना धन विदेशी बैंकों में रखने लग गए हैं ।
एक बात आपने और कही थी कि हजार और पाँच सौ के नोट बंद होने चाहिए । इसके बाद भी जब भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा तो आप कहेंगे कि नोट बंद करके रेजगारी ही चला दो । बाबा, आजकल पैसे की कीमत ही क्या रह गई है ? सोचो, तब आप यदि विदेश जाएँगे तो एक टिकट के पैसे देने के लिए आपको कई बोरियाँ भरकर रेजगारी ले जानी पड़ेगी और इतनी धातुएँ भी कहाँ से आएँगी सिक्के बनाने के लिए । हम तो कहते हैं कि अब एक-एक करोड़ के नोट चलाए जाने चाहिएँ जिससे कागज कम खर्च हो, पेड़ कम कटें और धरती का पर्यावरण सुरक्षित रहे । और मान लो हम आपसे ही कह दें कि बाबा, आप ही अपने शिष्यों सहित जाइए और स्विस बैंक से सारा धन एक एक रुपए के सिक्कों में ले आइए । अब आप हिसाब लगाकर हमें बताना कि आप और आपके करोड़ों शिष्य कितने जन्मों में वह धन भारत ले आएँगे ? यह मामला अनंत और सर्वव्यापी ब्रह्म को जानने से कम नहीं है जिसे आज तक कोई नहीं जान पाया ।
आपने पिछले वर्ष कहा था कि यदि प्रदूषण नहीं होता तो आप तीन-चार सौ वर्ष जी सकते थे अन्यथा भी आप डेढ़ सौ वर्ष जिएँगे । आपके पास तो बहुत समय है इस देश की सेवा करने का । हमारा तो जीवन सही-सलामत निकल जाने दीजिए फिर कर लेना यह ‘हठ’-योग । और फिर हमारे ही पीछे क्यों पड़े हुए हैं । फिर आपकी योग शक्ति का क्या ठिकाना ? पहले योगी बिना खाए, बिना पिए, एक टाँग पर खड़े होकर हजारों वर्षों तक साधना करते रहते थे सो साल-दो साल भूखे रह कर भी पता नहीं आपका कुछ बिगड़े या नहीं मगर हमारी तो जान ले ही लेंगे ना । आप कहो तो आपको भारत-रत्न दे दें, राष्ट्र संत घोषित कर दें, योग के लिए हजार दो हजार करोड़ का अनुदान दे दें, जहाँ कहो वहाँ ज़मीन दे दें ।
और फिर आप तो सच्चे योगी हैं । पहले तो योगी उड़ कर कहीं भी चले जाते थे फिर आप क्यों हेलीकोप्टर उड़ा कर प्रदूषण फैलाते हैं । और यदि आप विदेश से काला धन लाने के लिए ही अड़े हुए हैं तो फिर हमारे ही पीछे क्यों पड़े हुए हैं । हमें तो कुछ समझ में आता नहीं । आप ही अपनी योग विद्या से चुपचाप देश में लाकर, जहाँ आपकी मर्जी हो रखवा दीजिए ।
हाँ, जो काला धन आप विदेश से लाएँ उसमें से, देश हित को ध्यान में रखते हुए, ३० प्रतिशत टेक्स प्रणव मुखर्जी जी के पास जमा करवा दीजिएगा ।
२-६-२०११
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(बिहार के कोसी जिले के ५० किसानों ने शिकायत की है कि कृषि तकनीक और प्रबंधन एजेंसी के माध्यम से सरकार द्वारा सब्सीडी पर दी गई मुर्गियाँ खाकर मोटी हो गईं मगर अंडे नहीं दिए । इसी तरह पहले सरकार द्वारा दिए गए मक्का और गेहूँ के बीजों से उगाए गए पौधों में बालियों में दाने नहीं बने – २३-१-२०११)
आज तोताराम आया तो बड़ा परेशान था । कई देर तक पूछने पर बोला- यार, हद हो गई । मुर्गियाँ खाकर मोटी तो हो गईं मगर अंडा एक ने भी नहीं दिया । क्या ज़माना आ गया है ?
हमने उत्सुकता से पूछा- क्या तुमने अब मुर्गियाँ भी पालनी शुरु कर दीं ?
झुंझुलाकर कहने लगा- अरे भले आदमी, मैंने नहीं । मैं तो बिहार का एक समाचार बता रहा हूँ ।
हमने कहा- तो क्या हुआ ? मुर्गियाँ भी तो कभी-कभी छुट्टी लेती हैं । क्या सारे साल ही अंडे देती रहेंगी ? कोई भी मुर्गी साल में ३६५ अंडे नहीं देतीं । एक आध महिने कुड़क रह कर फिर अंडे देना शुरु कर देंगी ।
तोताराम ने उत्तर दिया- अब क्या अंडे देंगी ? तीन-चार महिने से दाना खाकर मोटी हो गई हैं मगर अंडे देने का नाम ही नहीं ले रही हैं ।
हमने कहा- इतना भड़क क्यों रहा है ? सारी बात खोल कर बता ।
कहने लगा- बिहार के कोसी जिले में ५० किसानों को किसी एक 'कृषि तकनीक और प्रबंधन संस्थान' ने सरकारी सब्सीडी पर मुर्गियाँ दी थीं । वे कई महिनों तक दाना खाकर मोटी तो हो गईं हैं मगर अंडे नहीं दे रही हैं ।
हमने कहा- भैया, इन सरकारी और तकनीकी मुर्गियों का यही हाल होता है । इसमें यह हुआ होगा कि २५% नेता जी ने खा लिया होगा, २५% संस्थान वालों ने, २५% नई प्रकार की मुर्गियाँ बनाने वाले किसी विदेशी संस्थान ने और २५% किसान को सब्सीडी दी गई दिखा दी । हो गया १००% का हिसाब । अब मुर्गियाँ कहाँ से अंडे देती ? इससे पहले भी यह हो चुका है कि आन्ध्र प्रदेश के किसानों ने कपास का विदेशी बीज इस्तेमाल किया मगर उसमें टिंडे ही नहीं बने । विदेशी कीटनाशक उपयोग किया तो कीड़े तो मरे नहीं पर बची-खुची फसल ज़रूर मर गई । मज़बूर होकर किसानों ने आत्महत्या कर ली ।
अरे, पहले जब अपने बीज और अपने कीटनाशक और अपनी मुर्गियों के अण्डों से मुर्गियाँ तैयार करते थे तो कभी यह नौबत नहीं आती थी । अब भुगतो नई विदेशी तकनीक का परिणाम । कमीशन खाने वालों ने तो कमीशन खा लिया । अब अंडे नहीं देतीं तो मुर्गी पालक इन मुर्गियों को ज़ल्दी से ज़ल्दी काट कर खा लें वरना तो और खर्चा बढ़ता जाएगा । मुर्गियों को तो अंडा न कल देना था और न आज । तुझे पता है इस देश में तीन साल पहले बर्ड फ्लू के नाम पर ४०-५० लाख मुर्गियाँ मार दी गई थीं । अब ब्रिटेन वाले कह रहे हैं कि उन्होंने ऐसी मुर्गी विकसित कर ली है कि उसे बर्ड फ्लू नहीं होगा । अब मँगवाओ वहीं से नई तरह की मुर्गियाँ । बीज बाहर के, कीटनाशक बाहर के, चूजे बाहर के- लगता है हम अब इतना करने के काबिल भी नहीं रहे ।
वैसे लोकतंत्र में नेता ही नहीं मुर्गियाँ भी बदमाश हो गई हैं । नेता हराम का खूब खाते हैं मगर सेवा के नाम पर घोटालों के अलावा कुछ नहीं । इससे पहले भी तो बिहार में लालू जी के ज़माने में आठ सौ रुपए दिन का दाना खाने वाली मुर्गियाँ हुआ करती थीं । उन्होंने भी कई महिनों तक खाना खाया, मोटी हो गईं और जब अंडा देने का समय आया तो फटाक से मर गईं । अंडा देना तो दूर की बात उन्हें फिंकवाई के पैसे और लगे । अब नीतीश जी की बारी है तो भले ही मुर्गी आठ सौ रुपया रोज का न खाए मगर अंडा देने से तो मना कर ही सकती हैं । लोकतंत्र में जब आतंकवादियों तक के मानवाधिकार हैं तो क्या मुर्गियों को इतना भी अधिकार नहीं कि इस स्मार्ट युग में अंडे न देकर अपनी फिगर सलामत रख सकें ।
और जब एक पंच से लेकर प्रधान मंत्री तक अपने वेतन भत्तों और कुर्सी के लिए ही चिंतित हैं तो फिर इन बेचारी मुर्गियों के ही पीछे क्यों पड़ा है ? हो सकता है, इन्होंने भी मुक्त बाज़ार में किसी से गठबंधन कर लिया हो । और फिर गठबंधन की मज़बूरी तो तू जानता ही है । गठबंधन के सामने यह मुर्गी तो क्या, प्रधान मंत्री तक मज़बूर हैं ।
जिसको अपने जीवन, रोजगार, भले-बुरे की चिंता है उसे खुद ही सोचना और समझदार बनना होगा । न तो इन नेताओं से कुछ होने वाला है और न ही इस मुक्त बाज़ार से । इन्हें 'दुनिया मुट्ठी में' करनी है तो बस अपने लिए । और लोग हैं कि समझते हैं कि दुनिया उनकी मुट्ठी में आने वाली है । बेचारे भोले लोग ।
समझ ले मोटी मुर्गियाँ अंडे देने के लिए होती ही नहीं हैं । वे तो केवल देखने-दिखाने के लिए होती हैं । दुबली-पतली मुर्गियाँ ही अंडे देती हैं । नेताओं को देखा नहीं ? खा-खाकर मोटे हुए रहते हैं मगर किसी के ज़रा से भी काम आने के नाम पर जी निकलता है । दुबला-पतला गरीब आदमी तो फिर भी किसी के लिए कुछ करने के लिए तैयार हो जाता है । यही हाल इन मोटी मुर्गियों का है । हजारों नेताओं पर केस चले, क्या किसी का कुछ बिगड़ा ? क्या किसी से घोटाले का एक रुपया भी निकलवाया जा सका ? तो इन मुर्गियों से भी कोई अंडा निकलने वाला नहीं है । मुर्गीपालकों को चाहिए कि इन्हें काट-कूट लें ।
तोताराम कहने लगा- बंधु , मुर्गियों का और किसानों का तो पता नहीं कुछ होगा या नहीं मगर मैं तुम्हारे भाषण से ज़रूर हलाल हो जाऊँगा । हो सके तो 'लोकतंत्र का कुड़क मुर्गी पुराण' बंद कर और दो घूँट चाय पिलवा दे ।
२४-१-२०११
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७-१२-२०१०
आज कई दिनों के बाद धूप निकली थी और ठण्ड भी कुछ कम थी सो चबूतरे पर बैठ कर तोताराम के साथ चाय पी रहे थे कि एक सज्जन पधारे । आते ही बोले- सर, मैं आपको कुछ लौटने आया हूँ । हमें आश्चर्य हुआ कि आज पहली बार कोई कुछ लौटने आया है नहीं तो कोई आज तक लौट कर नहीं आया- बिना कोई गाना गाए कि 'कोई लौटा दे मेरे ...’ । लगा, शायर के विचारों के विरुद्ध गया वक्त भी लौट कर आ सकता है । मगर हमें यह ध्यान नहीं आ रहा था कि आज तक हमने इसे क्या दिया है जिसे यह लौटने आया है ?
पूछा तो बोला- मास्टर जी, मैं स्विस बैंक का मैनेजर हूँ और बैंक में जमा आपके देश का पैसा लौटाने आया हूँ ।

हमने कहा- मगर अभी तो यह भी तय नहीं हुआ है कि हमारे देश का कितना पैसा तुम्हारे यहाँ जमा है ? सरकार ने चार संस्थानों को ठेका दिया है यह पता करने के लिए कि स्विस बैंक में हमारा कितना पैसा है ? जब सही पता चल जाएगा तब उसके हिसाब से बोरे सिलवाने का टेंडर निकालेंगे, लाने के लिए किसी कंपनी को ठेका देंगे, फिर लाने का काम शुरु होगा । अभी तो संभव नहीं है ।
बोला- कुल पैसे का पता करने के लिए ठेका देने की ज़रूरत नहीं है । वह तो अभी कुछ दिन पहले जब शांताकुमार जी संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष सत्र में भाग लेने के लिए गए थे, तभी हमने उन्हें बता दिया था कि मात्र सत्तर लाख करोड़ रुपया जमा है आपके देश का । सो पता लगाने के लिए ठेका देने की ज़रूरत नहीं है । और हम तो सोच रहे हैं कि आप कहें तो हम खुद ही लाकर यहाँ डाल दें ।
हमने कहा- भाई, अब तक तो कोई यह पता भी नहीं कर सकता था कि आपके बैंक में किसका खाता है और किसके कितने पैसे जमा हैं और अब तुम खुद ही सब बताते फिर रहे हो और बताते भी क्या यहाँ लाकर पटकने के लिए उतावले हो रहे हो । क्या बात है ?
कहने लगा- साहब, हमें अब तक पता नहीं था कि यह पैसा चोरी का है । हमारे यहाँ जमा करवाने वाले तो कहते थे कि साहब किसी तरह लोगों की सेवा करके यह थोड़ा बहुत कमाया है । रखने के लिए घर भी नहीं है । सो आप अपने यहाँ रख लीजिए । जब ज़रूरत होगी तो आकर ले जाएँगे । मगर लेने कोई नहीं आया । अब तो हमारे पास रखने के लिए भी जगह नहीं है ।
हमें भी उसकी बातों में मज़ा आने लगा था सो कहा- मगर तुमने उसकी बातों पर विश्वास कैसे कर लिया ? अरे, महमूद गज़नवी, नादिर शाह, अहमद शाह अब्दाली, अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों के लूटने के बाद बचा ही क्या होगा जो लोग इतना धन जमा करवा गए और तुमने बिना सोचे-समझे जमा भी कर लिया ?
कहने लगा- सर, जमा करवाने वालों ने कहा था कि हमारा देश सोने की चिड़िया है । विभिन्न देशों द्वारा इतनी लूट के बाद भी उसकी समृद्धि में कोई कमी नहीं आई है । और आजादी के बाद तो यह चिड़िया केन्द्र में जा बैठी है और उसके पंखों से लगातार काला सोना झरता है । सत्ताधारी, जिनके हाथ लंबे हैं वे अधिक; और जो विपक्षी हैं, जिनके हाथ थोड़े छोटे हैं, वे कुछ कम; और जो बहुत छोटे लोग हैं जैसे सरपंच, पंच, नरेगा वाले, वे भी कुछ न कुछ पा ही जाते हैं । आजकल सेवा में बड़ा स्कोप है ।
तोताराम ने, जो अभी तक चुप बैठा था, चुटकी ली- तभी तुम योरप के गोरे लोग इतना कष्ट उठा कर सेवा करने के लिए एशिया, अफ्रीका गए ।
कहने लगा- वो तो प्रभु की आज्ञा थी कि ये अभागी काली आत्माएँ हैं । जाओ, इन्हें ईसाई बनाओ और इनका उद्धार करो । सो धर्म की आज्ञा का पालन करने के लिए जाना पड़ा । वैसे हमें अब भी धर्म पर पूरी श्रद्धा है । जब हमें पता चला कि यह पाप की कमाई है तो हम उसे वापिस करने के लिए बेताब हो गए । शांताकुमार लाए नहीं, नहीं तो हम उनके साथ ही भेज देते । बोले कि हम सत्ता में नहीं है इसलिए तुम दिल्ली बात करो ।
हमने कहा- तो दिल्ली जाओ ना । यहाँ क्यों आ गए ?
कहने लगा- गया था दिल्ली । अडवानी जी चुनावों के समय कह रहे थे कि काला धन वापिस लाऊँगा । सो पहले उन्हीं से मिला तो कहने लगे- अभी टाइम नहीं है । यदि मैं तुमसे काला धन लेने में लग गया तो यू.पी.ए. ससंद चला लेगा और मैं नहीं चाहता कि संसद चले । अब यही तो एक मुद्दा बचा है अगले चुनाव के लिए ।
हमने कहा - तो फिर मनमोहन सिंह जी से मिल लेते । वे भी कह रहे थे कि चुनावों के बाद सौ दिन में कार्यवाही करेंगे ।
उसने ज़वाब दिया- उनसे क्या मिलता ? वे तो जब भी संसद में कुछ उल्टा-सीधा होने लगता है तो विदेश यात्रा पर चले जाते हैं या मौन व्रत धारण कर लेते हैं ।
तो भाई, वित्त मंत्री प्रणब मुकर्जी हैं, सबसे सीनियर नेता ।

मिला था, मिला था उनसे भी । कहने लगे- यहाँ पैसे की कोई कमी नहीं है । पहले से ही इतना पड़ा है कि कामनवेल्थ गेम्स, २-जी स्केम, नरेगा, अनाज घोटाले, हथियार खरीदने, सड़कें बनवाने के बाद भी खत्म नहीं हो रहा है । विदेशी मुद्रा भण्डार उफना पड़ रहा है । और ऊपर से ग्रोथ-रेट नौ प्रतिशत से ऊपर जाए जा रही है सो अलग । अब क्या-क्या सँभालें ? अगर तुम यह पैसा दे जाओगे तो फिर कोई न कोई स्केम करने के लिए जी ललचाएगा । और फिर वैसे ही लोग दिल्ली से कर्नाटक तक ज़मीन हड़पने में लगे हुए हैं । ज़मीन है ही कहाँ जिस पर इस पैसे को रखने ले किए गोदाम बनवाएँ । अनाज रखने तक के लिए तो जगह नहीं है । वही खुले में पड़ा सड़ रहा है । अभी तुम अपने पास ही रखो ।
कहने लगा - मैं सोचता हूँ यदि यह काम निबट जाए तो क्रिसमस अपने देश जाकर ही मनाऊँ । अभी तो आप लोग चाय पीजिए । कल मैं फिर आपकी सेवा में हाज़िर होऊँगा ।
पता नहीं, भगवान क्या चाहता है ? यह कोई सामान्य स्थिति नहीं है । तोताराम और हमने चुपचाप एक दूसरे की ओर देखते रहे ।
८-१२-२०१०
आज सवेरे-सवेरे स्विस बैंक का मैनेजर तोताराम से भी पहले आ गया । कल भी उसे चाय नहीं पिलवाई थी सो तोताराम का इंतज़ार किए बिना ही चाय बनवा ली । अभी चाय चल ही रही थी कि तोताराम भी आ गया ।
हमने सुझाव दिया- जब कोई भी लेने को राजी नहीं है तो अपने पास ही रख लो ।
बोला- साहब, समझ में आने के बाद चोरी की कमाई अपने पास रखना भी चोरी करने के बराबर ही है ।
- तो फिर हमें ही यह चोरी की कमाई रखने का पाप क्यों चढ़ा रहे हो ?
- हम आपको एक सर्टिफिकेट दे देंगे कि यह धन हमने मास्टर जी को अपने पास तब तक रखने के लिए दिया है जब तक कि इसका मालिक लेने नहीं आए या सरकार इसे लेने के लिए राजी न हो जाए ।
हमने अपनी मज़बूरी बताई- भाई, देखो हमारे कब्जे में यह एक ही कमरा है जिसमें आधे में तो हमारी किताबें भरी हैं और आधे में हम मियाँ-बीवी सोते हैं । नया कमरा बनवाने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं । पेंशन में बस, राम-राम करके काम चलता है । और मान लो यदि टिन का एक कमरा बनवा भी लें तो उसमें इतने पैसे आएँगे नहीं । बरसात आई तो भीग जाएँगे या फिर लोग ही उठा ले जाएँगे । जब सरकार को पता चलेगा तो पता नहीं कौन-कौन हिसाब पूछने लगेगा ? हम कौन से मंत्री हैं जो सारे कुकर्मों के बावज़ूद बच जाएँगे । हमें तो कोई भी बेचारी नीरा यादव की तरह जेल में डाल देगा ।
- तो फिर एक उपाय है कि आप अपने यहाँ स्विस बैंक ही खोल लीजिए ।
- मगर यह तो झूठ है और पेटेंट कानून का उल्लंघन है ।
- अरे जब अमरीका हजारों वर्षों से भारत में इलाज के काम आने वाली हल्दी का पेटेंट ले सकता है, जापान कढ़ी का पेटेंट ले सकता है तो आप स्विस बैंक का नाम यूज क्यों नहीं कर सकते ?
- भाई, अमरीका की बात और है, वह तो बासमती चावल भी बेच रहा है । और फिर स्विस बैंक तो दुनिया में एक ही है और वह स्विटज़रलैंड में है ।
- कोई पूछे तो कह देना इसका फुल फॉर्म 'सकल विश्व इंडियन स्केम सहकारी बैंक' है । आपके यहाँ पहले भी तो 'उल्हासनगर सिंधी एसोसिएशन' की चीजें मेड इन यू.एस.ए. के नाम से बिका करती थीं । 'जैपान' नाम से आपके यहाँ एक कंपनी जापान का भ्रम पैदा कर रही है कि नहीं ?
हमने तंग होकर कहा- ठीक है बैंक खोल लेंगे मगर रुपया रखने को जगह तो हो ।
उसने इसका भी उपाय बताया, कहने लगा- आप यह सत्तर लाख करोड़ का चेक रख लीजिए । हमारे सर से तो यह पाप का भार उतरे, प्रतीकात्मक रूप से ही सही । जब भी कोई माँगने आए तो आप उसे डिमांड ड्राफ्ट बना कर दे दीजिएगा । और जब वह हमारे पास आएगा तो हम उसे पेमेंट कर देंगे ।
हम चुप रहे तो उसने एक तीर और फेंका, कहने लगा- सोचिए , जब इतना धन देश में आ जाएगा तो ३० साल तक टेक्स लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, पचास करोड़ लोगों को नौकरी दी जा सकेगी, ५०० पावर प्रोजेक्ट लगाए जा सकेंगे ।
अब तोताराम बोला- ठीक है, तुम्हारी मर्जी । पर हम जानते है कि चील के घोंसले में कभी मांस सुरक्षित बचा है क्या ? जब तक ये सेवक रहेंगे तब तक कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है । दो-चार बरस बाद फिर यह धन काला होकर आपके पास ही आना है । आप कहते है तो हम यह चेक रख लेते हैं । पर अगर कभी कोई झंझट पड़ा तो आपकी जिम्मेदारी होगी ।
उसने कहा- उसकी चिंता मत कीजिए । कोई झंझट पड़ा तो हम कह देंगे कि यह हमारी ही फ्रेंचाइजी है ।
उसके जाने के बाद तोताराम ने कहा- मास्टर, मुझे तो लगता है कि इसे योरप और अमरीका वालों ने भेजा है | जब काला धन यहाँ आ जाएगा तो वे लोग हमें फिर से अनाप-शनाप हथियार बेच कर यह पैसा झटक लेंगे | यदि यह पैसा स्विस बैंक के पास ही रहता तो कभी न कभी, वक्त-ज़रूरत देश के काम आ सकता था |
अब हम क्या कहते । आगे क्या होगा, राम जाने । वैसे आप की क्या राय है ?
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मनमोहन जी भाई साहब,
सत् श्री अकाल । यह ‘भाई साहब’ संबोधन आर.एस.एस. वाला नहीं है यह तो अपने डिपार्टमेंट वाला है क्योंकि आप भी मास्टर रहे और हमने भी जीवन भर राष्ट्र निर्माण ही किया । हुआ या नहीं या कितना हुआ यह तो भगवान जाने पर हमने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी । साठ के होते ही छुट्टी हो गई मगर तभी ऊपर स्वर्ग में सीट का निर्माण करने में जुट गए । कितना क्या हो पाएगा यह तो वहाँ जाकर पता चलेगा । आपको तो नौकरी से छुट्टी मिलते ही नरसिंह राव साहब ने पकड़ लिया और जोत दिया राष्ट्र निर्माण में । अच्छा भला अमरीका की तरह भारत का निर्माण करने में लगे हुए थे कि अब ये बी.जे.पी. वाले आपकी परीक्षा लेने पर उतर आए लेकिन अपने वाले बच्चे को नहीं देखते जो नक़ल करते पकड़ा गया । और परीक्षा भी ऐसी वैसी नहीं, हाईस्कूल वाली । आजकल इसे सेकेंडरी स्कूल परीक्षा कहते हैं । अपने जमाने में इसी को मेट्रिक भी कहा जाता था । तब यह बहुत बड़ी चीज हुआ करती थी । उस ज़माने में कहते हैं कि आठवीं पास भी मास्टर और यहाँ तक कि तहसीलदार बन जाया करता था । आजकल तो चपरासी बनने के लिए भी कम से कम दसवीं पास चाहिए । तभी दसवीं पास की कद्र भी चपरासी जितनी ही रह गई है ।
वैसे तो अध्यापन आपने भी किया है इसलिए परीक्षा पास करने के गुर जानते ही होंगे । पर बात यह है कि आपने कालेजों में पढ़ाया है और हमने स्कूल मास्टरी में ही जिंदगी गुजारी है सो जब २१ नवंबर के अखबार में पढ़ा कि आपको लग रहा है कि आप दसवीं की तरह एक के बाद एक टेस्ट दे रहे हैं तो सोचा कि क्यों न आपकी कुछ मदद की जाए । लोग तो तमाशा देख रहे हैं पर जो संकट के समय मदद करे वही सच्चा मित्र होता है-
धीरज, धरम, मित्र अरु नारी । आपत काल परखिए चारी । ।
तो एक सच्चे मित्र और शुभचिंतक की तरह से आपको सलाह दे रहे हैं । आशा है कुछ काम आएँगी ।
वैसे कई चीजें जो जवानी में इतना तकलीफ नहीं देतीं जितनी बुढ़ापे में, जैसे कि शादी, संतान, इश्क, परीक्षा आदि । अब सलमान रुश्दी को ही देख लीजिए, उमर साठ से ऊपर है मगर इश्क फरमाने से बाज़ नहीं आते । जवान और चालू औरतें आती हैं और उल्लू बनाकर खिसक लेती हैं । बुढ़ापे की औलाद ज्यादा लाड़-प्यार के कारण बिगड़ जाती है और बड़ी होकर बहुत दुःख देती है । वैसे आजकल तो छोटे बच्चों को भी कूट-पीट कर सुधारने का अधिकार नहीं रहा फिर जवान बेटा आप पर ही हाथ छोड़ दे तो क्या कर लेंगे । बुढ़ापे में शादी करने पर जवान पड़ोसियों का आना-जाना बढ़ जाता है और कहीं जाओ तो पीछे से चिंता लगी रहती है कि पता नहीं नई बीवी क्या गुल खिला रही होगी । बुढ़ापे की बीवी की फरमाइशें भी ज्यादा होती हैं । खुद को जवान दिखाने के लिए रोज़ बाल रँगने पड़ते हैं और अकड़ कर भी चलना पड़ता है जिससे कमर में दर्द होने लग जाता है । और बुढ़ापे में परीक्षा देना भी कम कष्ट का काम नहीं है ।
आपने तो लगातार ही सारी पढ़ाई और परीक्षाएँ निबटा दीं । हम तो बारहवीं पास करते ही मास्टर बन गए थे और फिर बी.ए., एम.ए. और बी.एड. सभी नौकरी करते हुए पास कीं । बी.ए. और एम.ए. तो खैर सत्ताईस बरस की उम्र तक निबटा दीं मगर बी.एड. काफी देर से की । हम जानते हैं कि कैसे, क्या नैया पार लगी । वैसे याद तो सब कर लेते थे मगर चूँकि लिखने का अभ्यास छूट गया था सो लगता था कि पेपर पूरा ही नहीं कर पाएँगे तीन घंटे में । अब आपको सतत्तर साल की उम्र में हाई स्कूल की परीक्षा देनी पड़ रही है । बात तो चिंता की है । एम.ए. में तो एक ही सब्जेक्ट होता है पर हाई स्कूल अर्थात मेट्रिक में तो पाँच-सात सब्जेक्ट होते हैं । इसीलिए पुराने लोग मेट्रिक को बहुत बड़ी चीज मानते थे । हमसे मास्टर बनने के बाद एक बार एक बुजुर्ग ने पूछा- कहाँ तक पढाई की रे छोरे ? हमने कहा- ताऊ. एम.ए. कर ली है । तो कहने लगे- ठीक है बेटा, अब हिम्मत करके मेट्रिक भी कर ले तो और भी अच्छी नौकरी मिल जाएगी । एक ही वाक्य में उन्होंने हमारी मेरिट से पास की एम.ए. की ऐसी-तैसी कर दी । अब कहाँ तो आपकी हार्वड या ओक्सफोर्ड की एम.ए. और डी.लिट. और कहाँ अब विपक्ष के चक्कर में मेट्रिक की परीक्षा ।
वैसे अब भी आपको कोई न कोई यूनिवर्सिटी पी.एच.डी. दे सकती है मगर ये उससे संतुष्ट होने वाले नहीं हैं । लाने को तो नकली सर्टिफिकेट भी लाया जा सकता है मगर ये स्विस बैंक की सूचना कबाड़ने वाले 'स्वामी' उस नकली सर्टिफिकेट का भी भंडा-फोड़ कर सकते हैं । एक ओपन स्कूल जैसी भी चीज आजकल चल निकली है जिसमें सुनते हैं बहुत नक़ल चलती है और परीक्षा में सारे सब्जेक्ट एक साथ पास होने का झंझट भी नहीं है । एक साल में एक सब्जेक्ट पास कर लो, वह आपका जमा हो जाएगा । इस तरह आप पाँच साल में भी मेट्रिक कर सकते हैं मगर विपक्ष वालों को तो इतना धैर्य नहीं है । वे तो अभी सर्टिफिकेट देखना चाहते हैं । इससे पहले भी हर साल रिपोर्ट कार्ड देखा करते थे ।
अपने जमाने में तो मास्टर लोग कुंजी लाने से मना करते थे मगर आजकल कई तरह की कुंजियाँ बाज़ार में आ गई हैं । मास्टर लोग खुद ही कुंजी से पढ़ाते हैं और कमीशन देने वाले प्रकाशक की कुंजी खुद बच्चों को रेफर करते हैं । कई तरह की पास बुक्स भी आजकल बाजार में आती हैं- ट्वंटी फोर आवर सीरीज, वन वीक सीरीज, स्योर शोट आदि । कई तरह के गेस पेपर भी आते हैं जिन्हें पेपर सेट करने वालों द्वारा छद्म नामों से छापा जाता है । कई स्कूल तो पास करवाने की गारंटी भी देते हैं । हम यह सब आप की काबिलियत पर शंका के कारण नहीं बल्कि शक्ति और समय बचाने की दृष्टि से कह रहे हैं । अब आपके पास इतना समय कहाँ ? देश का विकास करें कि पढाई करें या बुढ़ापे में इन बदमाश बच्चों को सँभालें । अब बच्चे तो बच्चे ही हैं ना ? सब्जी लाने के लिए पैसे दो और ये उसी पैसे में से चाकलेट खा जाएँ । ज्यादा बड़े हों तो सिनेमा देखने चले जाएँ या बीयर में ही सब्जी के पैसे लुटा आएँ । अब बाप घर सँभाले या बच्चों के पीछे घूमता रहे । एक बार जब हम बच्चे थे तो एक खेत में घुस कर चार काचर (ककड़ी) तोड़ लिए । चार थे हम लोग सो हमें तो उन चार काचरों में से एक ही हाथ लगा पर जब शिकायत पिताजी के पास पहुँची तो हमारी पिटाई पूरे चार काचरों जितनी हुई । अब एक नादान बच्चे ने १ लाख ७६ हजार करोड़ के दस काचर तोड़ लिए । शिकायत आपके पास है । अब आप भी क्या करें ? बच्चे ने दस काचर तोड़े मगर उसके हाथ तो केवल दस परसेंट ही लगे बाकी नब्बे परसेंट तो औरों ने ही खा लिए । अब आप बच्चे को उलटा भी लटका दें तो एक काचर से ज्यादा निकलने वाला नहीं । और वह भी पेट में से निकला काचर किस काम का बचा होगा ?

वैसे जहाँ तक परीक्षा की बात है तो उसमें अध्यापकों की कृपा भी बहुत काम आती है । विद्यार्थी को, कुछ भी न जानते हुए भी वे प्रेक्टिकल में पूरे नंबर दिलवा सकते हैं । और परीक्षा में भी नक़ल में मदद कर सकते हैं । आजकल मास्टर इस कृपा के बदले में ट्यूशन पढ़ने वालों को विशेष महत्व देते हैं । यदि सारे साल ट्यूशन न पढ़ सको तो मय ब्याज के पूरे साल की ट्यूशन फीस एक साथ दे दो तो भी मान जाते हैं । गुरु जी फीस न दे सकने वाले कुछ गरीब किन्तु घनघोर सेवाभावी शिष्यों पर भी अपनी कृपा दृष्टि रखते हैं ।
कुछ भी हो, आप पर तो टीचर मेडम की कृपा दृष्टि है ही सो नैया पार लग ही जाएगी । जल्दी से मेट्रिक पास करके इन विपक्षियों का मुँह बंद कर ही दीजिए ।
२३-११-२०१०
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जंगल और शेर दोनों ही घटते जा रहे हैं मगर अब भी जंगल का राजा शेर को ही कहा जाता है । कोई एक-आध बचा है तो सर्कस में तमाशे दिखा रहा है या रणथम्भौर में मुकेश अम्बानी के स्वागत में परेड कर रहा है । वैसे ठीक भी है, जंगल में तो पोचर घूम रहे हैं खाल, दाँत, माँस छीलकर एक्सपोर्ट करने के लिए । नाम राजा मगर सरकारी गाड़ी, बंगला, नौकर - कुछ नहीं मिलते । जो बजट आता है उसे वन-अधिकारी खा जाते हैं । खुद ही शिकार करके लाना पड़ता है । यदि बीमार हो जाए तो अमरीका जाकर इलाज करवाना तो दूर की बात है, पट्टी बाँधने के लिए कोई साधारण पशु-कम्पाउंडर भी नहीं मिलता । कोई आदर्श सोसाइटी ही नहीं तो फ्लेट हथियाने की भी सुविधा नहीं । राजा होकर भी पड़े रहो किसी गुफा में । सब्जियों का राजा आलू को कहा जाता है मगर भाव चढ़ रहे हैं लहसुन और प्याज के । जिन्होंने अपने खजाने को दारू और रंडियों में नहीं लुटाया और महलों में होटल खोल कर बैठ गए वे ढाबा चलाकर रोटी खा रहे हैं । नहीं तो राजा लोग या तो एयर इण्डिया के दफ्तर के आगे साठ साल से सलाम की मुद्रा में खड़े हैं या किसी दफ्तर की चौकीदारी कर रहे हैं । कई बरसों पहले पढ़ने को मिला था कि बहादुरशाह ज़फर का वंशज चाँदनी चौक में कपड़ों पर इस्त्री करता है । लखनऊ के नवाब का वंशज ताँगा चलाता है । कहा भी है- 'सबै दिन जात न एक समाना' ।

पहले क्षत्रिय ही राजा हुआ करते थे । कभी कभी कोई राजा जायज़ संतान के बिना मर जाता था और भले आदमियों की चल जाती थी तो किसी भले ब्राह्मण को गद्दी पर बैठा दिया जाता था । ब्राह्मण से कभी राज सँभला है ? सो फिर किसी बाहुबली के पास चला जाता था । बाहुबली ही क्षत्रिय होता है । यदि जन्मना न भी हो तो वह अपनी ताकत के बल पर अपने को क्षत्रिय मनवा लेता था । भारत पर विदेशियों के हमले होने लगे और एक दिन उन्होंने इस देश पर अपना राज भी जमा लिया । ये या तो राज करते थे या सैनिक होते थे । सैनिक भी राजा ही होता है । उसे राजा के नाम पर लूटने की आजादी होती है । फिर आए अंग्रेज, जो भले ही इंग्लैण्ड में जेब ही काटते रहे हों मगर यहाँ आकर तो सभी अधिकारी बन जाते थे- अंग्रेज बहादुर । जो हिंदू राजा थे वे इनको राजा मान चुके थे और मनमाना टेक्स वसूल करके इन्हें पहुँचाते थे और बचे हुए पैसों से या तो दारू पीते थे या लड़कियाँ उठवाते थे । यही स्वर्णयुग कोई दो हज़ार साल तक चला ।
इतने लंबे काल में कोई दलित राजा नहीं हुआ । काशी में था एक डोम । आज वहाँ उसे डोम-राजा कहा जाता है । डोम शब्द उस समय का 'दलित' ही रहा होगा । एक बार उसने हरिश्चंद्र नाम के एक राजा को खरीद कर अपना साम्राज्य बढ़ाना चाहा । किसी राजा को खरीदने वाला वह पहला व्यक्ति था । यह डोम राजा बहुत उदार था । उसने सवर्ण हरिश्चंद्र को सीधे ही मणिकर्णिका घाट का सी.ई.ओ. बना दिया । तभी विष्णु नाम के एक बँधुआ-मजदूरी-विरोधी कार्यकर्त्ता ने हरिश्चंद्र को मुक्त करवा दिया और डोम राजा को मुआवजा भी नहीं दिया । इसके बाद किसी दलित के राजा बनने का वर्णन नहीं मिलता ।
इसके बाद देश में लोकतंत्र आ गया और फिर तो दलितों को भी बहुत सारे अधिकार मिल गए । कई मुख्यमंत्री बने, राज्यपाल बने, राष्ट्रपति भी बने मगर रहे दलित के दलित ही । पता नहीं यह कैसा दलितत्त्व है जो कोई भी पद पाकर खत्म नहीं होता । पहले तो किसी भी जाति का हो मगर राजा बनते ही क्षत्रिय बन जाता था । लोकतंत्र में दलित होने में राजा होने से भी ज्यादा फायदे हैं । ले-दे कर अब जाकर कहीं एक राजा दलित हुआ है । तो सबके पेट में दर्द होने लगा है । कहते हैं या तो राजा रहो या दलित रहो । दोनों नहीं हो सकते । क्योंकि तुमने 'कुछ' लोगों को 'कुछ' सस्ते में 'कुछ' बेच दिया है ।

अरे भाई, राजा है, उसका राज है, जो चाहे बेच दे । लोग तो, कोई खरीदने वाला हो तो लाल किले की नकली रजिस्ट्री अपने नाम बनवाए फिर रहे हैं । मुग़ल बादशाह ने अंग्रेजो को ज़मीन बेच दी कि नहीं बंगाल में ? और वहीं से फैलाते-फैलाते उन्होंने सारे हिंदुस्तान पर कब्ज़ा कर लिया । शिवाजी ने एक कवि से एक ही कविता बावन बार सुनी और उसे बावन गाँव दे दिए । क्यों भाई, किसे पूछा था ? कृष्ण ने दो मुट्ठी चावल के बदले तो अपने क्लास-फेलो सुदामा को दो लोकों का राज दे दिया । तब किसी ने नहीं पूछा कि इतना सस्ता सौदा क्यों कर लिया ? टेंडर क्यों नहीं निकलवाए ? वह दलित नहीं था इसलिए सवर्णों ने कोई विरोध नहीं किया । अब एक दलित राजा ने 'कुछ' बेच दिया तो पीछे ही पड़ गए ।
इन सदाचारियों से कोई पूछे कि भई, क्या बेच दिया ? तो सही ढंग से बता नहीं पा रहे हैं । सोना, चाँदी, घर, मकान, ज़मीन क्या बेच दिया ? कहते हैं कोई ‘२-जी’ स्पेक्ट्रम बेच दिया । पता नहीं, कोई खाने की चीज है या पहनने की ? एस.एम.एस तक तो करना आता नहीं और बात कर रहे हैं बड़ी-बड़ी टेकनोलोजी की । अरे, पहले भी तो बिना टेंडर के ही बेच दिया था- कुछ स्पेक्ट्रम-वेक्ट्रम जैसा कुछ । 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर । शास्त्रों में भी कहा गया है “जिस रास्ते से '(प्रमोद)महाजन' जाते हैं वही सही रास्ता है” सो यह राजा भी बेचारा उसी रास्ते पर ही तो चला है । अब किसे पता था कि सूचना निकलने से पहले ही खरीदने वाले कुर्सी के नीचे छुप कर बैठे थे ।
इससे पहले भी तो सरकारी कारखाने बिके हैं और सस्ते में । कांग्रेस के राज में सिंदरी का खाद कारखाना धूल के भाव बेच दिया गया और फिर एन.डी.ए. के राज में बाल्को का अल्यूमिनियम का कारखाना पाँच सौ करोड़ में बेच दिया जिसमें पाँच हज़ार करोड़ का तो भंगार ही बताया जाता है । कहते हैं कि यह स्पेक्ट्रम बहुत महँगा बिक सकता था । तो खरीद लेते । किसने मना किया था ? पहले भी तो कभी-कभी ऐसा होता था कि कि राजा के मरने के बाद अगले दिन जो भी महल के दरवाजे पर सुबह-सुबह सबसे पहले मिलता था उसे ही राजा बना दिया जाता था । सो स्पेक्ट्रम के मामले में ऐसा हो गया तो क्या आसमान टूट पड़ा ? एक दलित है, इतने रुपए कभी न देखे, न सुने सो हजारों करोड़ की बात आते ही बेच दिया । अपने हिसाब से तो ठीक ही बेचा था । अब बनिए से तो पार पाना न किसी दलित राजा के बस का है और न किसी सवर्ण राजा के । धंधा करना तो बनिया ही जानता है । तुम लोगों से ही धंधा होता तो क्यों तो सरकारी कारखाने बेचते और क्यों सरकारी कारखाने घाटे में चलते ?

इसका फोटो देखा है ? कितना मासूम और कमसिन लगता है । इसके बस का इतने रुपए ( १ लाख ७६ हजार करोड़ ) को खाना तो दूर, हिसाब करना भी मुश्किल है । यह कौन सा हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड में पढ़ा अर्थशास्त्री है । इतने रुपए तो किसी रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने भले ही देखे हों, साधारण आदमी से तो इतनी बड़ी गिनती भी नहीं हो सकती । एक गरीब आदमी के एक बहुत बड़ी लाटरी निकल आई । लाटरी कम्पनी वालों ने सोचा- यदि इसे एक बार में ही इतने बड़े इनाम के बारे में बता दिया तो हो सकता है इसका हार्ट फेल हो जाएगा । सो एक मनोवैज्ञानिक को भेजा कि इसे ज़रा ढंग से बताना । मनोवैज्ञानिक ने उसे धीरे-धीरे बताना शुरु किया कि यदि तुम्हारे एक हजार की लाटरी लग जाए तो तुम क्या करोगे ? एक लाख की लाटरी लग जाए तो क्या करोगे ? वह भी बड़े मजे से बताता गया ? मगर परेशान ज़रूर हो रहा था । जब मनोवैज्ञानिक ने पूछा- यदि तुम्हारे एक करोड़ की लाटरी लग जाए तो क्या करोगे ? उसने चिढ़ कर कहा- आधा तुम्हें दे दूँगा । सुनते ही डाक्टर का हार्ट फेल हो गया ।
सब एक दलित के प्रति निष्करुण हो रहे हैं । यह तो भला हो करुणा के निधि का जिन्होंने अपनी करुणा के प्रताप से एक दलित को बचा लिया मगर कब तक ? जब सारा गाँव ही पीछे पड़ गया तो क्या किया जा सकता था । और तो और अम्मा, जिसे वात्सल्य की मूर्ति माना जाता है, नहीं पिघली और अंत में बाल-दिवस के उपलक्ष्य में एक राजा-बेटा की, एक राजा भैया की बलि लेकर ही मानीं । राजा एक लुप्त होती प्रजाति है और लुप्त होती प्रजातियों के बचाने के लिए वैसे भी सारी दुनिया में अभियान चल रहे हैं तो भारत में क्यों नहीं ? हमें विश्वास रखना चाहिए कि जल्दी ही कोई न कोई और ऐसा ही प्रतापी राजा भैया, राजा बेटा, राजा बाबू इस महान लोकतंत्र को प्राप्त होगा ।
१५-११-२०१०
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आज जब रोज हजारों करोड़ की रिश्वत, घोटालों और निवेश की खबरें पढ़ते है तो हमें उस दिन को याद करके हँसी आ जाती है जब हम रिटायर होने वाले थे । बड़े बाबू ने हिसाब लगाकर बताया था-गुरु जी, आपको रिटायरमेंट पर पूरे पाँच लाख मिलेंगे । हमने कहा- बड़े बाबू, उस समय आप हमारे साथ रहना क्योंकि हमारी गणित कमज़ोर है । क्या पता, गिनने में गलती हो जाए । जब बड़े बाबू ने बताया कि यह रकम आपको नकद नहीं मिलेगी बल्कि आपके बैंक खाते में जमा होगी तब कहीं जाकर तसल्ली हुई । चलो,जितना आसानी से गिना जा सके उतना ही थोड़ा-थोड़ा करके निकलवाते रहेंगे ।
तभी तोताराम ने हमारा ध्यान भंग किया- मास्टर, तेरा चश्मा कितने में बेचेगा ?
हमने कहा- बेचना क्या है, तू ऐसे ही ले जा । इसके ग्लास बोतल के पेंदे जैसे हैं और इतने भारी कि दो चार मिनट में ही नाक दुखने लग जाती है । पोती भी कह रही थी- बाबा, अब इस चश्मे को छोड़ दो नया बनवा लो । छोड़ना तो है ही ।
बोला- फिर तू अखबार कैसे पढ़ेगा ? दूसरा है क्या ?
हमने उत्तर दिया- अब अखबार पढ़ने के कोई सेन्स नहीं है । रोज एक जैसी खबरें आती हैं । सवेरे-सवेरे वही हत्या, गबन, घोटाले, एक्सीडेंट, बलात्कार, चोरी, डाका पढ़-पढ़ कर जी घबराने लगता है । और जब से यह पढ़ा है कि शहीदों की विधवाओं के मकान भी मुख्य मंत्री और जनरल हड़प गए तो डर लगने लग गया है । कलियुग क्या, महाकलियुग आ गया है । सोचते हैं, अखबार पढ़ना ही छोड़ दें । वैसे कभी कभार कोई चिट्ठी-पत्री लिखनी हुई तो देख विचारेंगे । नया बनवा लेंगे । तू तो इसे ले ही जा ।
तोतराम बोला- बंधु, मैं कोई चीज मुफ्त में नहीं लेता । तेरे चश्मे की नीलामी करते हैं । जितने मिल जाएँ, तेरे ।
अब हमें भी इस खेल में मजा आने लगा था । सो पत्नी से चश्मा मँगवाया । चश्मा हमारे सामने स्टूल पर रख दिया गया । तोताराम ने हमारी पत्नी से कहा- भाभी, आप यहीं रुको । गवाह के हस्ताक्षर भी तो होंगे । चाय नीलामी के बाद बना लेना । आप बिडर होंगी । तो बोलो, मास्टर रमेश जोशी के चश्मे की रिज़र्व प्राइस है बयालीस लाख एक रुपए ।
पत्नी भी इस खेल में शामिल हो गई और अंदर से बेलन ले आई और दो-तीन बार स्टूल पर ठोंक कर बोली- चिक्की के दादाजी के चश्मे की रिजर्व बोली है बयालीस लाख एक रुपए । जो भी सज्जन इससे ज्यादा की बोली लगाना चाहते हैं, लगा सकते हैं ।
पत्नी की आवाज़ की गूंज भी खत्म नहीं हुई थी कि तोताराम बोल पड़ा- पचास लाख । और कोई चौथा व्यक्ति उस समय आसपास भी नहीं था सो अगली बोली लगने की संभावना नहीं थी । पत्नी ने फिर तीन बार स्टूल पर बेलन ठोंका- पचास लाख एक, पचास लाख दो, पचास लाख तीन । और घोषणा कर दी कि पचास लाख में चश्मा तोताराम जी का हुआ ।
तोताराम ने कहा- भाभी, आप गवाह रहना । और अपनी जेब से चेक निकाल कर हमारे हाथ पर रख दिया । पूरे पचास लाख की रकम लिखी हुई थी ।
हमने कहा- तोताराम, यह नाटक ठीक तेरी योजना के अनुसार पूरा हुआ पर हमें यह बात अभी तक समझ में नहीं आई कि तुमने चश्मे की बोली बयालीस लाख एक रुपए ही क्यों लगाई ? इतनी बड़ी बोली में एक रुपए का क्या महत्व है ? पूरे बयालीस लाख क्यों नहीं रखा ?
कहने लगा- बात एक नहीं, एक लाख रुपए की भी नहीं है । मुझे तो अपने मास्टर का एक रिकार्ड बनवाना था सो बनवा दिया । अरे, जब सचिन का पुराना बल्ला बयालीस लाख में बिक सकता है तो एक राष्ट्र निर्माता का वह चश्मा जिससे उसने देश के लिए बड़े-बड़े सपने देखे हैं, बयालीस लाख से अधिक में क्यों नहीं बिक सकता ? इतना कह कर उसने पचास लाख का एक चेक हमारे हाथ पर रख दिया । अब तो तोताराम की इस मजाक की योजना पूरी तरह से स्पष्ट हो गई । यदि यह नाटक नहीं होता तो उसे क्या पता था कि चश्मा पचास लाख में नीलाम होगा ।
हमने कहा- तोताराम, तेरे खाते में तो पचास लाख पैसे भी नहीं हैं फिर यह चेक काटने का क्या मतलब ? मान ले यह चेक हमने बैंक में डाल दिया तो ?
कहने लगा- मास्टर, ऐसा मत करना नहीं तो मुझे जेल की सजा हो जाएगी । इस देश में भले ही करोड़ों-अरबों का घपला करने वालों पर कार्यवाही न हो, देशद्रोहियों को फाँसी देने का निर्णय लेने में बरसों लग जाए मगर चेक अनादरण के मामले में फटाफट सजा हो जाएगी । प्लीज, बैंक में मत डाल देना ।
हम इस चेक को कौन सा बैंक में डालने वाले थे हम तो तोताराम से मज़ाक कर रहे थे । हमने वह चेक पता नहीं कहाँ रख दिया जैसे कि बच्च्चों के चूरण की पुड़िया में निकलने वाले खेलने के नोट ।
३१-१०-२०१०
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[ ज्योति कलश छलके - 'भाभी की चूड़ियाँ ' फ़िल्म का सुप्रसिद्ध चित्र-पट-गीत की तर्ज़ पर आधारित ]
दीवाली पर जेब कट गई |
शोर, धुएँ से फिज़ाँ अट गई |
और पटाखों के सड़कों पर
फैले हैं छिलके | ज्योति कलश छलके |
सबके खाली टेंट हो गए |
नोट गिफ्ट की भेंट हो गए |
संबंधों पर जो खर्चे हैं
वे प्राफिट कल के | ज्योति कलश छलके |
कैसी अंधी दौड़ चल रही |
सबमें होड़ा-होड़ चल रही |
आँख मूँदकर निबल जनों से
पीछे धन, बल के | ज्योति कलश छलके |
कोई काम न करना चाहे |
माल मुफ्त का चरना चाहे |
धर्म-कर्म सब हुआ उपेक्षित
सब आशिक फल के | ज्योतिकलश छलके |
निर्धन जन से आँख चुराई |
धनिकों को दे रहे बधाई |
ऊँची, भारी बातें करते
पर मन के हलके | ज्योतिकलश छलके |
घर आगे गोबरधन रचते |
गोपालन से बचते फिरते |
गोपाष्टमी खिलाया गुड़
फिर खा कागज, छिलके | ज्योति कलश छलके |
रूप चतुर्दशी देह निहारें |
मन की कालिख नहीं उतारें |
भगत नोट के नहा रहे हैं
उबटन मल-मल के | ज्योति कलश छलके |
खेलें जुआ, सत्य ना बोले |
करें मिलावट औ' कम तोलें |
दर्पण में मुँह देख-देखकर
मुड़ -मुड़ कर मुळकें | ज्योति कलश छलके |
दो नंबर की लक्ष्मी आई |
पर इसमें आनंद न भाई |
सच्ची लक्ष्मी तब प्रकटे
जब श्रम सीकर झलकें | ज्योति कलश छलके |
मुख से बोलें राम-राम सा |
पर स्वारथ से सदा काम सा |
राम मिलेंगे धर्म-न्याय से
वन-वन चल-चल के | ज्योति कलश छलके |
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कल तोताराम आया तो पता नहीं क्यों ओठों को गोल करके सीटी बजाता रहा । चाय भी सीटी बजा-बजा कर ही ठंडी की । हमें तो वैसे ही लग रहा था जैसे कि कई लोग बैठे-बैठे टाँग हिलाते रहते है मानों लकवे का दौरा पड़ने वाला हो । मगर जब ऐसे व्यक्तियों के साथ रोज बैठना हो तो फिर इतना अजीब नहीं लगता । सो हमें भी तोताराम की अजीब हरकतें इतनी अजीब नहीं लगती जितना कि किसी और को लग सकती हैं ।
आज तो उसकी सीटी बजाने की अदा कुछ ज्यादा ही अजीब थी । सीटी बजाने के साथ-साथ वह कमर भी मटका रहा था और दाएँ हाथ की तर्जनी में चाबी का एक छल्ला भी घुमाता जा रहा था । और कोई दिन होता तो शायद हमें इतना बुरा नहीं लगता मगर हुआ यूँ कि कल रात सपने आते रहे । कभी हाजी मस्तान, कभी हर्षद मेहता, कभी तेलगी, कभी लालू, कभी सुखराम, कभी शिबू सोरेन, कभी ललित मोदी, कभी जय ललिता और भी जाने कौन-कौन दिखते रहे । सब कुछ होच-पोच । मगर यह तय है कि नींद ठीक से नहीं आ पाई । इसलिए सर भारी था । सो हमने चिढ़कर तोताराम की कमर में अंगुली से घोंचा मारा- यह क्या जनखों की तरह कमर हिला रहा है ? सीटी बंद कर और ठीक से खड़ा रह ।
तोताराम भी चिढ़ गया, बोला- 'यह सरकारी आज्ञा है । १ नवंबर तक तो यह सीटी ऐसे ही बजेगी । उसके बाद देखी जाएगी' । सीटी बजाने की सरकारी आज्ञा ! हमारी कुछ समझ में नहीं आया । और पूछा तो कहने लगा- सरकार ने २५ अक्टूबर से १ नवंबर तक 'सीटी बजाओ सप्ताह' घोषित किया है । और एक टोल फ्री नंबर भी दिया है । यदि मुझे ज्यादा परेशान करेगा तो उसी नंबर पर फोन कर दूँगा ।
हम अपनी हँसी नहीं रोक सके, कहा- क्या उस विज्ञापन को ध्यान से पढ़ा ? वह यह सीटी बजाने के लिए नहीं है । उस सीटी का मतलब है- 'व्हिसल ब्लोइंग' कि यदि आपको कहीं भ्रष्टाचार की जानकारी मिले तो इस नंबर पर फोन कीजिए । जिससे सरकार को भ्रष्टाचार से लड़ने में मदद मिले । क्योंकि सरकार तो अब भ्रष्टाचार से लड़ नहीं सकती क्योंकि सरकार में तो खुद सारे के सारे कीचड़ में धँसे लोग बैठे हैं । कोई एक आध है भी तो बेचारा लंका में विभीषण की तरह अपनी जान बचाए नौकरी कर रहा है । कहाँ का भ्रष्टाचार-निरोध और कैसी व्हिसल ब्लोइंग ।
तुझे याद नहीं, स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में एक इंजीनीयर था सत्येन्द्र दुबे । उसने बहुत चुपके से भ्रष्टाचार के खिलाफ व्हिसल बजाते हुए तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी जी को एक पत्र लिखा था । जिसे उन्होंने उन्हीं सरकारी अधिकारियों को जाँच के लिए भेज दिया जिनकी मिली भगत और छत्रछाया में यह सब चल रहा था । बस फिर क्या था, जाँच तो हुई नहीं बल्कि वह खबर ठेकेदारों तक पँहुच गई और उन्होंने दो छोटे-मोटे अपराधियों को सुपारी दे दी और फिर व्हिसल बजाने वाले इंजीनीयर का बाजा बज गया । वरना सीधी सी बात है कि इन छोटे-मोटे अपराधियों को स्वर्णिम चतुर्भुज से क्या लेना-देना । मगर उन दोनों को फाँसी की सजा देकर कानून ने अपना चेहरा उजला कर लिया । इसलिए याद रख, कोई भी भ्रष्टाचार पूरे तंत्र की मिलीभगत के बिना नहीं चल सकता । इसलिए क्यों व्हिसल बजा कर मरने के काम कर रहा है । बड़े भ्रष्टाचार को तो छोड़ । तू खम्भे पर कुण्डी डालकर किसी बिजली चोरी करने वाले की खबर बिजली विभाग को करके देख । चेकिंग करने वाले पहले उस चोरी करने वाले को फोन करेंगे कि 'भैया, तोताराम ने तेरी शिकायत की है सो अपनी कुण्डी हटा ले । हम आ रहे हैं' । चोर तो नहीं पकड़ा जाएगा पर शाम तक वह चोर तेरी टाँगें ज़रूर तोड़ देगा ।

तोताराम फिर भी सीटी बजाता रहा । हमने पूछा तोताराम, तुझे डर नहीं लगता ? कोई भ्रष्ट तेरा सर फोड़ दे तो ?तोताराम बोला- नहीं, मैं किसी से नहीं डरता ।
तभी दरवाजे पर एक जोर की ठोकर लगी और दहाड़ती आवाज़ आई- 'अरे, यो कोण सिटी बजा रिया है ? के गड़बड़ हो री है' ? बाहर निकल कर देखा तो एक नेतानुमा ठेकेदार खड़ा था ।
उसे देखकर तोताराम कहने लगा- अजी ठेकेदार जी, यहाँ कौन सीटी बजाएगा । मैं तो इस मास्टर को 'थ्री इडियट्स' वाला गाना सुना रहा था- ऑल इज वेल भैया, ऑल इज वेल । भला आपके होते क्या गड़बड़ हो सकती है ? सब कुछ वेल ही होगा ।
अब तोताराम की सीटी ही नहीं फूँक भी बंद हो चुकी थी ।
२७-१०-२०१०
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किसी भी कार्यक्रम के दो भाग होते हैं मगर वे एक दूसरे से भिन्न नहीं होते जैसे कि जन्म और मरण, आदि और अंत, रेल का गार्ड और ड्राइवर, उठाला और द्वादशा । स्कूलों में वार्षिक उत्सव के समय प्रिंसिपल स्वागत करता है और अंत में वाइस-प्रिंसिपल धन्यवाद ज्ञापन करता है । कई स्वागत करने वाले और धन्यवाद ज्ञापन करने वाले इतने महान या विनीत होते हैं कि उनके स्वागत और धन्यवाद 'कार्यक्रम' से भी लंबे हो जाते हैं जैसे कि वी.पी. सिंह की 'मंजिल से ज्यादा सफ़र' या किसी चूहे से ज्यादा उसकी लंबी पूँछ । स्कूल के वार्षिकोत्सव में एक और भी महत्वपूर्ण कार्यक्रम होता है प्रिंसिपल द्वारा वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करना । यह स्वागत और धन्यवाद से भी अधिक रोचक होता है इसलिए संचालक पहले ही घोषणा करता है कि अभी प्राचार्य महोदय विद्यालय का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करेंगे मगर आप कहीं जाइएगा नहीं क्योंकि उसके बाद आज का सबसे मनोरंजक कार्यक्रम अमुक-अमुक होगा ।
तो कॉमन वेल्थ गेम्स का उद्घाटन हो गया । सबसे पहले कलमाड़ी जी बोले । जिसमें स्वागत, धन्यवाद, सफाई, माफ़ी सब कुछ था । बीच-बीच में जहाँ दर्शक 'हो-हो' कर रहे थे उसके अर्थ वे और दूसरे सभी समझ रहे थे । अब इस के बाद द्वादशवें दिन कौन क्या बोलेगा पता नहीं पर ऐसा लग रहा है कि सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा । उद्घाटन के इस अवसर पर तो कलमाड़ी जी तथा और सब ने भी ऐसे बहुतों का उल्लेख छोड़ दिया जो बहुत ज़रूरी था । खेलों से पहले मणिशंकर जी ने कहा था कि वे इन खेलों कि असफलता की कामना करते हैं मगर जब हमने उन्हें समझाया कि आप पहले भी खेल-मंत्री रह चुके हैं और किसे पता है कि आगे इस देश में ओलम्पिक खेल भी हों और उनका भार आपको ही सँभालना पड़ जाए सो इतना ताव नहीं खाना चाहिए । उन्होंने हमारी बात को समझा और इंद्र देव को आदेश दिया कि वे खेलों के समय वर्षा करके बाधा न डालें । और चूँकि इंद्रदेव उनके अंडर में ही आते हैं सो उन्होंने वर्षा करके खेल नहीं बिगाड़ा । सो कलमाड़ी जी को सबसे पहले तो मणिशंकर जी को धन्यवाद देना चाहिए था । क्योंकि अभी तो और ग्यारह दिन बाकी हैं, सो जल्दी से भूल सुधार लें । और यह तो सब जानते हैं कि - “ब्याह बिगाड़ें दो जने, के मूँजी, के मेह” (शादी तो दो जने बिगाड़ते हैं, कंजूस या बारिश)
इसके बाद उन कुत्तों को धन्यवाद दिया जाना चाहिए जिन्होंने एक हफ्ते से खेल-गाँव में प्रवेश नहीं किया । यदि प्रवेश किया भी तो बिस्तरों पर नहीं चढ़े । यदि बिस्तरों पर चढ़े भी तो पैर पोंछ कर चढ़े । टॉयलेट में गए नहीं, गए तो मल-मूत्र नहीं किया, यदि किया तो करने के बाद फ्लश चला दिया । मक्खी-मच्छरों को भी धन्यवाद दिया जाना चाहिए था कि खिलाड़ियों के आने के बाद से वे किसी कमरे में नहीं घुसे । यदि घुसे भी तो बी.बी.सी. वालों की नज़र बचाकर क्योंकि इन खेलों की सारी व्यवस्था की फ़िक्र सबसे ज्यादा बी.बी.सी. वालों को ही है । तभी तो वे एक-एक कमरे में घुस-घुस कर देखते रहे कि कहाँ क्या हो रहा है । अब भी वे कल ही खबर लाए हैं कि एक खिलाड़ी को डेंगू हो गया है । हम तो कहते हैं कि यदि किसी खिलाड़ी को दस्त नहीं लगें या दो से ज्यादा दस्त लग जाएँ तो इसमें कलमाड़ी की गलती है और भारत की अक्षमता । यदि यहाँ से जाने के बाद यदि किसी खिलाड़ी को एक साल तक बुखार भी हो जाए तो यह भारत की ही अक्षमता मानी जानी चाहिए । इसलिए बी.बी.सी. वालों को भी धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उन्होंने डेंगू का एक ही मरीज ढूँढ़ा । अगर दस-बीस ढूँढ़ लेते तो कोई क्या कर सकता था ? इसी तरह से किसी कमरे से किसी मच्छर की फोटो ही ले आते तो ? वे चाहते तो किसी कुत्ते से कोई रहस्योद्घाटक साक्षात्कार भी ले सकते थे ।
कार्यक्रम शांति से समाप्त होने पर पड़ोसी, पुलिस, जनता और भी कई भूले-भटके प्रेतों को धन्यवाद दिया जाना चाहिए पर अभी तो कार्यक्रम शुरू ही हुआ है । हम तो इस कार्यक्रम के उद्घाटन के बारे में एक बात कहना चाहते हैं कि एक लाख किलोमीटर के करीब यात्रा करके जो बेटन लाया गया उसके बारे में कहा गया था कि इसमें महारानी का सन्देश है जिसे प्रिंस चार्ल्स पढ़ कर सुनाएँगे । बेचारे खिलाड़ी उस बेटन को बड़ी सावधानी से उठाए हुए थे कि कहीं महारानी का सन्देश गिर न पड़े । सावधानी के चक्कर में बेचारे खिलाड़ी ढंग से दौड़ भी नहीं पा रहे थे । बेटन लिए हुए दौड़ते खिलाड़ियों की वही हालत हो रही थी जैसी कि विष्णु भगवान द्वारा दिए गए तेल के कटोरे को ब्रह्मा जी तक पहुँचने में नारद जी की हो रही थी । पर जब सुशील कुमार ने बेटन प्रिंस चार्ल्स को दिया तो उन्होंने उसे एक तरफ अटका दिया और जेब से महारानी का सन्देश निकाल कर पढ़ने लगे । भाई, यदि उस बेटन में महारानी का सन्देश था ही नहीं तो पहले ही बताना चाहिए था । बेचारे खिलाड़ी बिना बात ही तनकर-अकड़कर दौड़ रहे थे । यदि पहले ही पता होता तो कम से कम खिलाड़ी ज़रूरत पड़ने पर उसे बगल में दबाकर शंका-समाधान भी कर सकते थे । बेचारे वैसे ही दाबे दौड़ रहे थे ।
वैसे अब तो टेक्नोलोजी इतनी विकसित हो गई है कि उद्घाटन के समय वे सीधा ही लन्दन से बोल सकती थीं और सभी दर्शक उसे उसी समय सुन सकते थे । मगर उस स्थिति में हमारे महाप्रभु ब्रिटेन का इतना प्रचार कैसे हो पाता ? इसी लिए सारे साधन होते हुए भी चुनावों में नेता लोग रोड़ शो करते हैं फिर चुनाव जीतने के बाद भले ही पाँच साल तक अपने कमरे में दलालों के अलावा किसी को घुसने हीं दें । अमेरिका में भी राष्ट्रपति का चुनाव नवंबर में होने के बावज़ूद राष्ट्रपति शपथ लेता है जनवरी में क्योंकि किसी समय, जब आवागमन के तेज साधन नहीं थे, तब चुने हुए राष्ट्रपति को राजधानी पहुँचने में जनवरी आ गई होगी । मगर आज जब चुना हुआ राष्ट्रपति वहीं है और नई ड्रेस पहन कर राष्ट्रपति भवन के चक्कर लगा रहा है, कि कब मौका मिले और अंदर घुसूँ, तब भी वह अंदर जनवरी में ही घुस पाएगा क्योंकि पहले की कोई मजबूरी में शुरु हुई प्रथा आजतक चल रही है । यदि हम कोई पुराना रीति-रिवाज मानते हैं तो उसे पिछड़े हुए लोगों का अंधविश्वास कहा जाएगा ।
चलो जी, भगवान की दया से सब काम ठीक-ठाक निबट जाए और बेचारे कलमाड़ी जी को फाँसी पर नहीं चढ़ना पड़ा । रही बात खेलों के संपन्न होने के बाद जाँच-पड़ताल की, तो 'जो बीत गई सो बात गई' या 'बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेय', मतलब कि अब ओलम्पिक की सोच कि किसे, किसका ठेका मिलेगा ? अपना काम तो देश पर गर्व करना है सो अब भी कर रहे हैं और तब भी करेंगे । रही बात महँगाई की तो वह तो इन खेलों के बाद और बढ़ेगी जैसे कि बँगला देश की स्वतंत्रता के बाद बढ़ी थी । खेल देखने की बात है तो या तो वे देखेंगे जिन्हें फ्री पास मिले हैं या जिनका खर्चा सरकार भरेगी या जिन के पास दो नंबर का पैसा है । आपके-हमारे लिए तो इतनी महँगी टिकट खरीदना और फिर दिल्ली में इस समय कहीं ठहरना संभव हो नहीं सकता । कल किसी के घर जाकर उद्घाटन-समारोह देख लिया, यही क्या कम है ? और फिर शास्त्रों ने कहा है कि व्यक्ति को द्रष्टा होना चाहिए और इस दुनिया को खेल मानकर तटस्थ भाव से देखना चाहिए सो देख रहे हैं । ग़ालिब के शब्दों में- 'होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे' ।
बाज़ार से गुजरना पड़ रहा है और खरीददार हो पाना संभव नहीं है ।
४-१०-२०१०
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पहले राजा लोग नाक के लिए लड़ते थे । कभी अपनी नाक बचाने के लिए तो कभी दूसरे की नाक काटने के लिए । इस चक्कर में ज़्यादातर दोनों की ही नाक कट जाती थी । मुगलों के आने के बाद अधिकतर राजाओं ने तो अपनी नाक बचाने के लिए उसे छोटा करवा लिया । महाराणा प्रताप, शिवाजी, छत्रसाल, दुर्गादास, और अमर सिंह जैसों ने अपनी नाक के लिए सर कटवाना ज्यादा ठीक समझा । इसके बाद जब अंग्रेज़ आए तो सभी राजाओं और नवाबों ने अपनी नाक को सुरक्षित रखने के लिए उसे अंग्रेजों के पास ही जमा करवा दिया । जब अपने दरबार में जाना होता या अपनी प्रजा पर रोब ज़माना होता तो लॉकर में से निकल कर ले आते थे और काम करने के बाद फिर लॉकर में जमा कर आते थे । आम आदमी की नाक तो अपने छोटे-छोटे कामों के लिए दफ्तरों में घिसने में ही खत्म हो जाती है । पर अब तो न मुगलों का शासन है और न अंग्रेजों का । अब तो नाक कटने, काटने और कटवाने का झंझट ही नहीं है । फिर भी जब बी.बी.सी. से खबर सुनी और कॉमनवेल्थ गेम्स के मकानों की लेट्रीनों की तस्वीरें देखीं तो लगा वास्तव में ही नाक कट गई है क्योंकि वाशबेसिनों में लाल-लाल सा कुछ बिखरा हुआ था । कुछ लोग उसे पान की पीक बताते हैं पर हमें तो लगता है कि यह उसी कटी हुई नाक का खून है ।
हम नाक के बारे में सोच ही रहे थे कि तोताराम आ गया । हमने कहा- तोताराम, यदि इनके बस का नहीं था तो नहीं करवाते खेल, मगर अब कटवा ली ना नाक ? तोताराम ने कहा- मास्टर, जब देश में लोकतंत्र होता है तो कटने वाली नाक, नेताओं को चुनने वाली जनता की होती है और जो नोट आते हैं वे नेताओं और अधिकारियों की जेब में जाते हैं । सो अगर तुझे लगता है कि नाक कटी है तो वह तेरी ही है । जा, ड्रेसिंग करवा और भविष्य में ध्यान रखना । सँभाल कर नहीं रखेगा तो फिर यही होगा । नेताओं और अधिकारियों की नाक तो सलामत है । किसी के चेहरे पर शिकन देखी क्या ? और अपने ही क्या किसी भी देश के नेता की नाक ऐसे ही कटने लगी तो फिर तो हो ली देश-सेवा । अमरीका वियतनाम में पिट कर भागा पर क्या उसकी नाक कटी ? अब अफ़गानिस्तान से निकल पाने का कोई बहाना नहीं मिल रहा पर नाक तो सब की सलामत है । पड़ोस में मिस्टर दस परसेंट की नाक पर क्या तुझे कहीं से भी खरोंच लगी दिखाई दी ? नाक शर्मादारों की होती है और उन्हीं की कटती है । ये लोग तो नाक कटाकर स्वर्ग देखने वाले लोग हैं ।
हमने कहा- तोताराम, अबकी बार मामला वास्तव में गंभीर है । बड़े-बड़े नेताओं ने कह दिया है कि खेल समाप्त होने पर कठोर कार्यवाही होगी और किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा ।
तोताराम बोला- यह तो पुराना मुहावरा है । आज तक किसे सजा मिली है, कौन-घपला पकड़ा जाकर अपने अंजाम पर पहुँचा है जो यह पहुँचेगा । बाद में तो जो होता है, वही होगा- 'खेल खतम और पैसा हज़म' । बिल तो पहले ही पास हो गए और कम्पलीशन सर्टिफिकेट भी ले लिए गया होगा । अब खँगालते रहो कागज । पहले ज़माने में जब पहाड़ खोदा जाता था तो कम से कम साला कोई चूहा तो निकलता था अब तो देख लेना चूहा भी नहीं निकलने वाला । इसके बाद तो जैसे कनाडा को एक मिलियन डालर खिला कर कामनवेल्थ गेम्स लाए थे वैसे की किसी न किसी को एक बिलियन खिला कर ओलम्पिक की परमीशन ले आएँगे । अब की बार सत्तर हजार करोड़ को बत्ती दिखाई है, ओलम्पिक में दो लाख करोड़ का चपड़ा कर देंगे । किसी के बाप का क्या जाता है ? माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम । छोड़ ये सब बातें । यह बता केबल कब लगवा रहा है ?
हमें तोताराम का यह असमय मज़ाक बुरा लगा । हमने ज़रा नाराज़ होकर कहा- तोताराम, तुझे मज़ाक सूझ रहा है और कई देश हैं जो यहाँ खेलने आने से मना कर रहे हैं । जब लोग खेलने ही नहीं आयेंगे तो और भी भद्द पिटेगी ।
तोताराम बोला- अच्छा है, कम देश खेलने आयेंगे तो अपने को ज्यादा पदक मिलने के चांस रहेंगे । अच्छा हो, एक भी नहीं आये और अपन ही सारे पदक जीत जाएँ । जब १९८० में मास्को ओलम्पिक में अमरीका ने बहिष्कार किया था तो क्या खेल नहीं हुए थे ? वैसे ये देश फालतू का नाटक कर रहे हैं कि ‘पलंगों पर मिट्टी के पैर लेकर चढ़े कुत्तों के पैरों के निशान देखे गए हैं’ । गोरे लोग तो सुना है अपने कुत्तों को साथ लेकर सो जाते हैं । और यह ज्यादा ही बड़ी बात लग रही है तो सभी कमरों में पलंगों के पास पैर पोंछने वाला मैट रखवा देंगे जिससे कुत्ते पैर पोंछ कर चढेंगे । और रही बात कमोड और वाशबेसिन की तो उनमें हगना, मूतना और थूकना ही तो है । कौनसा उनमें खाना खाना है । बिना बात की सफाई पसंदगी दिखा रहे हैं । हम जानते हैं, कई देशों के लोग तो ठंडी में महिनों तक नहीं नहाते । ऊपर से पाउडर और इत्र छिड़क कर भभका मारते हैं ।
हमने पूछा- और सुरक्षा व्यवस्था का क्या होगा ?
तोताराम ने कहा- सुरक्षा व्यवस्था में क्या खराबी है ? जिसकी मौत आ गई वह तो सीढ़ियों से गिर कर मर जाएगा और जिसकी नहीं आई उसे कौन मार सकता है ? जीवन-मरण सब विधाता के हाथ है, आदमी के नहीं । और इतना ही डर लगता है तो अपने घर बैठें । हमारे विद्यार्थी सारे खतरे उठाकर आस्ट्रेलिया पढ़ने के लिए जाते हैं कि नहीं ? लगता है जिन देशों की तैयारी अच्छी नहीं है, जिनमें खेल भावना नहीं है वे ही ऐसे बहाने बना रहे हैं । जयपाल रेड्डी ने कह तो दिया कि खेल होंगे और शानदार ढंग से होंगे और प्रधान मंत्री जी ने भी तो काम फटाफट करने का अल्टीमेटम दे दिया है ।
अब भी किसी को विश्वास नहीं हो तो कोई क्या कर सकता है ? जिन्हें 'जूँओं के बहाने घाघरा खोलना' है, वे खोलें ।
२४-९-२०१०
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सवेरे-सवेरे तोताराम के साथ घूमकर लौटे और चबूतरे पर बैठे ही थे कि पीछे-पीछे एक सज्जन भी आकर बैठ गए । सज्जन थके हुए लग रहे थे सो पूछने की धृष्टता करने की बजाय कहा- आओ, बैठो भाई, थोड़ी देर रुको, अभी चाय आएगी तो पीकर चले जाना । तभी तोताराम ने कहा- मास्टर तुझे पता है 'नो बोल' किसे कहते हैं ? हमने कहा- इसमें क्या है । 'नो बोल' मतलब 'नहीं बोल' । बोला- अरे, हिंगलिश में नहीं शुद्ध इंग्लिश में पूछ रहा हूँ । हमने कहा- तो 'नो बोल' मतलब कि 'बोल नहीं' जैसे कि हमारे हाथ में बोल नहीं है तो 'नो बोल' हो गई ।
तोताराम हमारे अज्ञान पर चिढ़ने की बजाय दुःखी हुआ । कहने लगा- जब कोई बोलर ऐसी बोल फेंके जिससे विकेट उड़ जाने पर भी बैट्समैन आउट नहीं हो और उसकी टीम को एक रन भी मिल जाए और बोलर थके सो व्यर्थ में, उसे नो बोल कहते हैं । हमने कहा- तोताराम और तो हम नहीं जानते पर यह तय है कि हमने आज तक जो भी दो-चार बोल फेंकी हैं वे 'नो बोल' ही थीं । चाहे साहित्य की हो, चाहे स्वयं सेवा की । पूरी सेवा करने के बावज़ूद खबरों में हमारा नाम हर जगह 'आदि' में ही आता था जैसे कि फलाँ कार्यक्रम में सर्वश्री ए,बी,सी आदि या एक्स, वाई, जेड आदि मौजूद थे । इन सबमें यह 'आदि' हमीं थे । और तोताराम, बचपन में तूने भी कई बार बैटिंग की पर रन एक भी नहीं बनाया ।
अब तक चाय भी आ गई और बात की दिशा बदल गई । हमने अपने पीछे वाले सज्जन की तरफ देखा जो अब तक हमारी बात ध्यान से सुन रहे थे । हमने पूछा- तो कहिए, श्रीमान जी कहाँ से आ रहे हैं ? कहने लगे- हम तो सीधे इंग्लैण्ड से आ रहे हैं इसीलिए थोड़ा थक गए हैं । वैसे तो आगे क्रिकेट के सेवकों के पास जाना था पर अब लगता है जरूरत नहीं पड़ेगी ।
हमने कहा- हम तो क्रिकेट के दुश्मन हैं । हम तो चाहते हैं कि क्रिकेट में दुनिया भर की खुराफातें हों और यह बदमाशी का धंधा बंद हो । क्रिकेट ही क्या सारे खेलों के सेवक तो दिल्ली में बैठे हैं और अढ़ाई हजार की चीज चार लाख में खरीद कर स्विस बैंक में पैसा जमा करवा रहे हैं ।
सज्जन बोले- हम तो थर्ड पार्टी सेवक हैं । हम तो न किसी क्रिकेट बोर्ड में हैं और न ही खेलते हैं और न ही कोई सामान खरीदते हैं । हम तो 'नो बोल' फिंकवाते हैं और जैसा कि आपकी बात से पता चला है कि आपकी सारी ही बोलें 'नो बोल' होती हैं तो समझिए हमें आपसे ही काम है । अब दिल्ली, मुम्बई जाने की क्या जरूरत है ? अब की बार हम सट्टा करवाएँगे कि सारा मैच ही 'नो बोल' से जीता जाएगा । टीम में आप दोनों को घुसाने की जिम्मेदारी हमारी । आप बोलिंग करेंगे और तोताराम जी बैटिंग करेंगे । और बिना एक भी विकेट गिरे और एक भी ओवर पूरा हुए मैच पूरा हो जाएगा । वंडरफुल मैच, वंडरफुल रिकार्ड । अब आप दोनों अपनी फिक्सिंग की घूस बताइए कितनी होगी ?
बड़ा धर्म संकट आ गया । क्या बताएँ । हमारी तो गिनती ही अब पेंशन के कारण ग्यारह हजार तक रह गई है । तोताराम ने कहा- देखो भाई, हम नकद तो लेंगे नहीं । क्या पता पकड़े गए तो पेंशन से और जाएँगे । तुम तो ऐसा करना कि हमारे राशन वाले दुकानदार को दस साल तक हमारा दोनों का राशन-पानी का बिल जमा करवाते रहना । और हाँ, यदि इस बीच शरद पवार जी की कृपा से चीजों के दाम बढ़ जाएँ तो बढ़े हुए दाम चुकाना भी तुम्हारी जिम्मेदारी होगी ।
वे सज्जन उठ कर चलने लगे तो हमने पूछा- क्या हुआ ? कहने लगे होना क्या था ? यह ठीक है कि हम धंधा करते हैं मगर क्रिकेट की गरिमा का ध्यान रखना भी तो ज़रूरी है । कल को यदि फिक्सिंग के इस घोटाले का पर्दाफाश हो गया तो तुम्हारा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा मगर अरबों के इस खेल की इज्जत का कचरा ज़रूर हो जाएगा । दो खिलाड़ियों की फिक्सिंग और वह भी मात्र बारह लाख की । ओह नो !
और वह चाय अधूरी ही छोड़ गया ।
७-९-२०१०
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