2026-03-20
चाय और गंगाजल
आज तोताराम ने आते ही पूछा- मास्टर, तेरे पास थोड़ा गंगाजल पड़ा हुआ है क्या ?
हमने कहा- गंगाजल की अभी क्या जरूरत आ पड़ी । अभी तो शतक लगाएंगे और मोदी जी के सपनों का 2047 वाला विकसित भारत भी देखेंगे । वैसे गंगाजल का क्या है ? पीकर मरने के लिए और भी बहुत कुछ उपलब्ध है । कफ सीरप पीकर मर सकता है, देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर का पानी पीकर मर सकता है, किसी जुलूस-जलसे के हुड़दंग में जाकर मर सकता है, किसी धनबली या बाहुबली के सुपुत्र की कीमती तेज रफ्तार कार के नीचे आकर मर सकता है, स्वदेसी दारू पीकर मर सकता है, धार्मिक उत्साह और उन्माद में मर सकता है । वैसे भी अमर कौन है ? कुछ नहीं करेगा तो भी एक दिन मरना तय है । इसीलिए गालिब ने ठीक ही कहा है-
मौत का एक दिन मुअय्यन हैं
नींद क्यों रात भर नहीं आती
बोला- मुझ पर कौन देश के एक सौ चालीस करोड़ की जिम्मेदारी है और कौनसा पितृभूमि इजराइल के साथ खड़ा होना है जो रात भर नींद नहीं आएगी । मैं तो इसलिए पूछ रहा था कि अब किसी पोस्ट ऑफिस से या कहीं और से कोई गंगाजल मँगवाने का धरम नहीं रहा ।सुना है बनारस में कुछ मुसलमानों ने गंगा में रोजा इफ्तारी करके गंगाजल को अपवित्र कर दिया है । अब उसे पीकर तो जैसा थोड़ा बहुत धर्म बचा होगा वह भी भ्रष्ट हो जाएगा ।
हमने कहा- तोताराम, धर्म न तो किसी पुस्तक में है और न ही किसी कर्मकांड में । धर्म तो हमारे सत्कर्मों में है, प्रेम और भाईचारे में हैं, शांति और करुणा में है । मिलकर रहेंगे तो शांति से जियेंगे, लड़ेंगे तो दुखी होकर तनाव में मरेंगे । और जहाँ तक पवित्रता की बात है तो वह आस्था की एक अवधारणा है । वैसे जो हम खाएं पीएं वह वस्तु साफ-सुथरी और स्वच्छ हो । मंदिर के प्रसाद को भक्त पवित्र और पूज्य मान सकता है लेकिन अगर उसमें किसी अखाद्य पदार्थ की मिलावट होगी या वह बासी होगा तो उससे फूड पॉइजनिंग हो जाएगी और फिर मरने से कोई ईश्वर या खुदा नहीं बचा सकेगा । बहुत बार सुनते हैं कि नहीं कि प्रसाद खाने से लोगों को उलटी-दस्त हो गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा ।
दुनिया में न धर्म बचा है और न कर्म बचा है । अब तो लालच बचा है पब्लिसिटी का, धन का, पद का । इसलिए पवित्रता का चक्कर छोड़ो स्वच्छता का ध्यान रखो । और नदियों को पूजने का नाटक करने की बजाय उनकी सफाई पर ध्यान देना चाहिए भक्तों को भी और सरकार को भी ।गंगा दुनिया की सबसे प्रदूषित नदी है इस पर शर्म आनी चाहिए । रिश्ता जोड़ना एक काव्यात्मक और मिथकीय भावना हो सकती है लेकिन उस भावना मात्र से कुछ नहीं होता । उसे व्यवहार में भी उतरना चाहिए । वास्तव में योरप में न तो नदियों को माँ माना जाता है और न ही उनकी आरती उतारी जाती है लेकिन उनकी सफाई का ध्यान रखा जाता है ।
बोला- लेकिन क्या गंगा में इफ्तार पार्टी करना और वीडियो बनाकर डालना क्या उचित है ।
हमने कहा- बिल्कुल नहीं। धर्म और उसके कर्मकांड सबका निजी मामला है । उसे अपने घर या धार्मिक स्थान पर शालीनता और शांति से मनाना चाहिए । किसी प्रकार का अनावश्यक प्रदर्शन, धूम-धड़ाका, डी जे, यात्रा, जुलूस, रँग-बिरंगी रैलियाँ और लफंगई सर्वथा गलत है फिर चाहे वह बहुसंख्यकों द्वारा हो या फिर अल्पसंख्यकों द्वारा । धर्म आतंक, राजनीति और चुनाव का हथियार नहीं होना चाहिए ।
बच्चों को क्या दोष दें । आजकल तो बड़े-बूढ़े भी अपने गू मूत करने तक में अनेक फोटोग्राफरों को बुलाते हैं और अपने फ़ोटो, वीडियो तरह तरह से वाइराल करवाते हैं और फिर उसका चुनाव में फायदा उठाते हैं । अन्यथा क्या नेताओं को हम सरकारी खर्चे पर वी आई पी तीर्थयात्रा करने के लिए चुनते हैं ? अरे, तीर्थ यात्रा करनी है तो राजनीति को छोड़ो और जाओ चुपचाप पदयात्रा करते हुए चारों धाम । यह क्या कि अपनी ड्यूटी छोड़कर कभी किसी नदी में स्नान, कभी किसी धार्मिक कॉरीडोर का उद्घाटन, कभी किसी गुफा में ध्यान और साथ में सौ सौ फ़ोटो ग्राफर ।
मौज मज़ा, पर्यटन, खेल तमाशा और आध्यात्मिकता में कुछ तो अंतर होना चाहिए कि नहीं ? क्या गरबा पहले नहीं होता था लेकिन अब वह बाजार द्वारा संचालित एक प्रदर्शन पूर्ण व्यवसाय हो गया है । वही हाल अन्य त्योहारों का हो गया है । इसके लिए जरूरी है कि आध्यात्मिक और सच्चे धार्मिक नेता इस अश्लील प्रदर्शन से अपने अपने धर्मों और समाजों को बचाएं । लेकिन वे क्या बचाएंगे वे तो खुद अपराधों,अय्याशी, प्रदर्शन और राजनीति के कीचड़ में लिथड़े हुए हैं । वैसे सच में तो सभी उत्सव हमें जोश में भी होश कायम रखना सिखाने के लिए होते हैं ।
बोला- मास्टर, आज तो तूने बिना गैस के ही अपने मन की बात से मुझे मरणांतकता तक पका दिया है । अब कम से कम चाय तो पिला दे ।
हमने कहा- चाय भी पिला देंगे लेकिन समझ ले कि चाय भी गंगाजल की पवित्रता की तरह एक अवधारणात्मक मामला है । किसे पता कि चाय पिलाने वाला जो चाय और उसकी पत्ती को ताज़ा बताकर तुम्हें पिला रहा है वह किसी रेलवे स्टेशन की 65 साल पुरानी चाय हो ।
बोला- अब बकवास मत कर और जैसी भी है पिला पिलू दे और साथ में सिर दर्द की कोई गोली हो तो वह भी ले आना ।
हमने कहा- तोताराम, कौन किसे गोली दे रहा है अगर यही समझ आ जाए तो कहीं भी लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ेगा । लोग इतने मूर्ख है कि गोली और जुमलों को ही मास्टर स्ट्रोक समझ और समझा देते हैं ।
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
No comments:
Post a Comment