Mar 31, 2026

31-03-2026 भाँति भाँति के कॉपीराइट





31-03-2026 

भाँति भाँति के कॉपीराइट 

2002 में सेवानिवृत्त होकर जयपुर से सीकर बच्चों के पास आ गए । 
उन दिनों दिल्ली में अटल जी जमे हुए थे लेकिन वैचारिक भिन्नता के बावजूद कुछ भी असामान्य नहीं लगता था । मजे से आलोचना-व्यंग्य चलते थे । फिर चुनाव जीतने के लिए उनके थिंक टैंक ने गहराई में जाकर एक नारा निकाला 'फ़ील गुड' और उसके बाद 'शाइनिंग इंडिया' । उस समय के उनके चाणक्य प्रमोद महाजन ने कहा- ये बच्चे क्या चुनाव लड़ेंगे ? और मजे की बात कि लोगों को गुड़ फ़ील नहीं हुआ और अटल जी धुंधलके में चले गए और बच्चों ने अश्वमेध का घोड़ा रोक लिया और उसके बाद एक बहुत कम बोलने वाले मनमोहन जी आये । बाद का इतिहास लगभग एक जैसा ही है और सभी के ज्ञान-ध्यान-संज्ञान में है । 

इन बारह वर्षों में राज्य सरकारों के परिवर्तन के अतिरिक्त सीकर का परिवेश लगभग एक जैसा ही रहा । सब कुछ सामान्य । सभी विचारों के लोग आपस में सामान्य रूप से मिलना जुलना, हँसी मजाक सब करते रहते थे । और एक सबसे अच्छी बात यह थी कि उन दिनों लिखने पढ़ने वाले महिने दो महिने में एक बार कहीं न कहीं मिलजुल लेते थे । इन कार्यक्रमों में युवा भी आया करते थे लेकिन अब सब कुछ लगभग बंद है । सब कुछ प्रदर्शन की राजनीति से आक्रांत हो गया है ।नौकरियां कम हो गई हैं। जो कुछ निकलती हैं वे पेपर लीक, नकली परीक्षार्थी आदि घपलों में उलझी हुई हैं । विकास कहाँ हो रहा है पता नहीं लेकिन विकास के विज्ञापन हर राज्य के दिखाई दे जाते हैं । युवा भगवा रैली, विराट हिन्दू सम्मेलन और काँवड़-कलश यात्रा में अपना और देश का विकास और भविष्य तलाशने लगे हैं ।

कुल मिलाकर सारी सांस्कृतिक गतिविधियां हमारी और तोताराम की 'चाय-चर्चा' पर परनिंदा तक सीमित रह गई है और साहित्य ? ओडिशा में विश्वनाथ मिश्र के 'नरेंद्र आरोहणम्' और मधु किश्वर के 'मोदीनामा'  तक रह गया है ।और मज़े की बात यह कि समाचारों में न तो ओडिशा के इस कवि का नाम मिला और न ही फ़ोटो । मोदी का नाम और मोदी का ही फ़ोटो । मानो महत्वपूर्ण कवि और काव्य नहीं 'मोदी' हैं । शायद इसीलिए गुप्त जी ने कहा था-
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है 
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है । 
इसी तरह मधु किश्वर और उनकी पुस्तक 'मोदीनामा' का नाम भी तभी पता चला  जब उन्होंने अपने यूज किये जाने का 'मी टू' टाइप खुलासा किया ।   
 
इन सब अनुलोमों-विलोमों-और प्रतिलोमों के बीच कल एक कनिष्ठ मित्र ने बताया कि एक छोटे-मोटे कार्यक्रम से यह साहित्यिक सन्नाटा तोड़ा जा सकता है और इसके लिए उन्होंने किसी संस्था का नाम भी बताया । भारत और उसके विकास से संबंधित कुछ नाम था ।  

हालाँकि हम जानते हैं कि तोताराम एकदम निठल्ला है, उसके पास कोई काम नहीं है जिस प्रकार भारत के रेल मंत्री और गार्डों तक के पास कोई काम नहीं है । ट्रेनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना करने का काम तक मोदी जी कर लेते हैं । या फिर मास्टरों द्वारा बच्चों को परीक्षा से पूर्व गुरु मंत्र देने का काम भी मोदी जी सम्पन्न कर देते हैं । फिर भी तोताराम की ग्रन्थि को सहलाते हुए आज हमने उसके सामने यही शुभ समाचार रखते हुए कहा- तोताराम, अपने व्यस्त समय में से कुछ समय निकालकर इस रविवार को शाम फ्री रखना । 

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बोला- मास्टर, कोई बहुत बड़ा लालच या भय न हो तो अब बाहर निकलने में ही भला है । वैसे ही साहसी युवा मोबाइल पर बतियाते, मोटर साइकल दौड़ाते, राह चलते लोगों को डराते, सबको पीछे छोड़कर जाने कहाँ पहुंचना चाहते हैं । या फिर घर से बाहर कोई कलश-यात्रा, काँवड़-यात्रा, देश भक्ति के रंग वाले झंडे फहराते वाहन । अच्छा है ऐसे में घर में ही रहना । कहीं मर मरा गए तो संभालने वाला भी नहीं मिलेगा । उत्साही भीड़ और त्योहारों का सांस्कृतिक जुनून ऐसा ही होता है । कोई जय श्रीराम का घोष करता है तो लगता है कि अब आया कोई पत्थर । 

हमने कहा- नहीं, ऐसा कुछ नहीं है । बहुत दिनों बाद किसी विकास-विकूस जैसी किसी संस्था का कवि गोष्ठी का कोई कार्यक्रम है । 

बोला- क्या अपने यहाँ के किसी कवि ने 'मोदी चालीसा' या 'मोदी माहात्म्य' लिखा है क्योंकि जहाँ भी विकास होगा वहाँ मोदी जी के अतिरिक्त और कौन हो सकता है ? जहाँ कोई विकास दुबे हो या बुलडोज़र हो  वहाँ योगी जी के अतिरिक्त कोई और हो ही नहीं सकता । 

हमने कहा- ऐसा कुछ नहीं । कविता-शविता होगी । सुन सुना लेंगे, कुछ चेंज हो जाएगा । 

बोला- मैं तो कुछ व्यस्त हूँ लेकिन तू हो आ लेकिन सुनने-सुनाने में जरा सावधानी रखना । 

हमने कहा- कविता सुनने सुनाने में कैसी सावधानी । अपनी अपनी अभिव्यक्ति, अपनी स्वतंत्रता । 

बोला- अब वह बात नहीं रही । बहुत सोचना-विचारना पड़ता है । देखा नहीं, मध्यप्रदेश में 'भाइयो, बहनो' कहकर कुछ मिमिक्री करने वाला निलंबित कर दिया गया । कई लोगों के लिपटने-चिपटने और ही ही, खे खे करने वाले वीडियो हटवा दिए गए हैं । 

हमने कहा- भाइयो, बहनो, कहकर तो आज से कोई 132 वर्ष पहले विवेकानंद ने शिकागो में अमेरिकावासियों का दिल जीत लिया था । लेकिन उन्होंने या विवेकानंद मिशन वालों ने तो इस पर कोई कॉपीराइट नहीं जताया । 

बोला- जताते भी कैसे ? उनका नाम भी नरेंद्र था । वे ही फिर 1950 में जन्म लेकर आये हैं । 

हमने कहा- लेकिन उन्होंने 'लेडीज़ ऐंड जेन्टलमेन' कहा था । यह पश्चिम की संस्कृति है जबकि हमारे यहाँ पुरुष का नाम पहले आता है । इसीलिए मोदी जी 'भाइयो और बहनो'  बोलते हैं । 

बोला- मेरा काम बताना था सो बता दिया । अब आगे तू है और तेरे कर्म । जैसा कर्म करेगा वैसा फल देंगे अंधभक्त । ये तो मोदी जी हैं । उनकी तुलना में अत्यंत सामान्य लोगों तक ने अपने अपने छोटे छोटे कामों के पेटेंट करवा रखे हैं । 

हमने पूछा- जैसे ?

बोला- जैसे अनिल कपूर ने अपने एक शब्द 'झक्कास' का, जैकी श्रॉफ ने 'भीड़ू' और अमिताभ बच्चन ने 'देवियो और सज्जनो' का पेटेंट करवा रखा है । 

हमने कहा- तो फिर हम भी 'मास्टर' और 'तोताराम'  का पेटेंट करवा लेते हैं । फिर देखते हैं हमारी स्वीकृति के बिना कोई कैसे 'मास्टर स्ट्रोक' लगाता है  और कैसे 'अपने मुँह मियां मिट्ठू' बनता है । 



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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

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