Nov 3, 2010
ज्योति कलश छलके - हैप्पी दिवाली
[ ज्योति कलश छलके - 'भाभी की चूड़ियाँ ' फ़िल्म का सुप्रसिद्ध चित्र-पट-गीत की तर्ज़ पर आधारित ]
दीवाली पर जेब कट गई |
शोर, धुएँ से फिज़ाँ अट गई |
और पटाखों के सड़कों पर
फैले हैं छिलके | ज्योति कलश छलके |
सबके खाली टेंट हो गए |
नोट गिफ्ट की भेंट हो गए |
संबंधों पर जो खर्चे हैं
वे प्राफिट कल के | ज्योति कलश छलके |
कैसी अंधी दौड़ चल रही |
सबमें होड़ा-होड़ चल रही |
आँख मूँदकर निबल जनों से
पीछे धन, बल के | ज्योति कलश छलके |
कोई काम न करना चाहे |
माल मुफ्त का चरना चाहे |
धर्म-कर्म सब हुआ उपेक्षित
सब आशिक फल के | ज्योतिकलश छलके |
निर्धन जन से आँख चुराई |
धनिकों को दे रहे बधाई |
ऊँची, भारी बातें करते
पर मन के हलके | ज्योतिकलश छलके |
घर आगे गोबरधन रचते |
गोपालन से बचते फिरते |
गोपाष्टमी खिलाया गुड़
फिर खा कागज, छिलके | ज्योति कलश छलके |
रूप चतुर्दशी देह निहारें |
मन की कालिख नहीं उतारें |
भगत नोट के नहा रहे हैं
उबटन मल-मल के | ज्योति कलश छलके |
खेलें जुआ, सत्य ना बोले |
करें मिलावट औ' कम तोलें |
दर्पण में मुँह देख-देखकर
मुड़ -मुड़ कर मुळकें | ज्योति कलश छलके |
दो नंबर की लक्ष्मी आई |
पर इसमें आनंद न भाई |
सच्ची लक्ष्मी तब प्रकटे
जब श्रम सीकर झलकें | ज्योति कलश छलके |
मुख से बोलें राम-राम सा |
पर स्वारथ से सदा काम सा |
राम मिलेंगे धर्म-न्याय से
वन-वन चल-चल के | ज्योति कलश छलके |
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
Nov 1, 2010
मुशर्रफ पर फ़तवा
तलाल अकबर बुगती साहब,
आदाब । आपने १०-१०-१० को अपने वालिद के हत्या करवाने वाले और लाला मस्जिद पर हमला करवाने वाले मुशर्रफ की हत्या करवाने के लिए सुपारी की घोषणा की है । अच्छा दिन चुना है । इस दिन को लेकर लोगों में बड़ा क्रेज था । १०-१०-१० । तीनों दस । कई लोगों ने तो इसे शुभ दिन मानकर समय पूर्व ही बच्चों को ज़बरदस्ती जन्म दिलवा दिया । आपने भी इस 'वाजिब-उल-क़त्ल' के लिए यही शुभ दिन चुना । हमारे भविष्य में भी इस दिन के लिए आया था कि कहीं से धन की प्राप्ति होगी । सो हमें लगा कि आपके इस ऑफर में ही शायद हमारा धन-प्राप्ति का भविष्य छुपा हो । सो सोच रहे हैं कि हम आपकी यह सुपारी स्वीकार कर ही लें ।
हमें इस प्रकार की सुपारियाँ स्वीकार करने का पुराना अनुभव है । इससे पहले भी जब बुश साहब ने ओसामा के लिए सुपारी की घोषणा की थी तो हमने बुश साहब से इस बारे में पत्र व्यवहार किया था मगर उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया था । इसी प्रकार हमारे उत्तर प्रदेश के हज़ मंत्री जी ने भी मुहम्मद साहब का कार्टून बनाने वाले स्वीडिश चित्रकार का सर लाने वाले को एक बड़ी राशि और उसके वज़न के बराबर सोना देने की घोषणा की थी । हमने वह सुपारी भी स्वीकार कर ली थी मगर फिर वही किस्सा । उनका कोई उत्तर नहीं आया । अब आपका ऑफर प्रकाशित हुआ है । सो हम इसे भी स्वीकार कर रहे हैं ।
अब इतनी बड़ी डील है तो ऐसे ही तो स्वीकार नहीं की जा सकती । कुछ न कुछ तो तय करना ही पड़ेगा । वैसे हम तो भगवान में विश्वास करते हैं सो ऐसे लोगों का फैसला भगवान पर ही छोड़ देते हैं । जो जैसा करेगा वैसा भरेगा । मगर आप को न तो कानून पर भरोसा करते हैं और न ही भगवान पर । सो खुद ही फैसला करना चाह रहे हैं । ठीक भी है, जब आदमी को न्याय पर भरोसा नहीं रह जाता तो फिर वह खुद ही फैसला करता है । हमारे यहाँ भी नागपुर की एक अदालत में कुछ महिलाओं ने मिल कर बलात्कार के एक अपराधी हो कोर्ट परिसर में ही मार डाला क्योंकि वे जानती थीं कि कोर्ट कुछ नहीं कर पाएगा और अपराधी अपने धन बल पर छूट जाएगा । आप भी अपने देश के कानून के बारे में ऐसी ही राय रखते हैं ।
आप नेता हैं सो पैसे की तो कोई कमी नहीं है । मुहम्मद साहब का कार्टून बनाने वाले के लिए सुपारी देने वाले हमारे यहाँ के मंत्री ने कहा था कि वह यह राशि चंदे से जुटाएगा । और यह भी तय है कि चंदा करेगा तो खाएगा भी । ऐसे लोगों पर हमें तो भरोसा नहीं है । सो अच्छा ही हुआ कि उन्होंने हमें जवाब नहीं दिया वरना तो हम काम कर भी देते और फिर पैसों के लिए उनके पीछे-पीछे चक्कर काटते रहते । आप तो यह रकम अपने पास से ही देंगे । नकद देंगे या चेक से ? भारत के अलावा रुपया पाकिस्तान और नेपाल में भी चलता है और उनके रेट में भी फर्क है । आप जो एक अरब रुपया देंगे वह भारतीय रुपया होगा या पाकिस्तानी रुपया होगा ? अगर आप चेक से देंगे तो उसमें से हमारा तो तीस प्रतिशत तो टेक्स की कट जाएगा और आपको भी कोई फायदा नहीं होगा । यह रुपया यदि स्विस बैंक में जमा करा दिया जाए तो कैसा रहे ? वहाँ हमारा खाता खुलवाने का काम भी आप ही करेंगे क्योंकि हमें उस प्रक्रिया का कुछ भी पता नहीं है ।
इसके साथ ही आपने एक हज़ार एकड़ ज़मीन भी देने की बात कही है । सो आपके यहाँ उस इलाके में ज़मीन का क्या भाव चल रहा है ? यहाँ तो ज़मीन के भावों में आग लगी हुई है । यहाँ तो बहादुर शाह ज़फर जैसी हालत हो रही है । ‘कूए यार में दो गज ज़मीन खरीदने’ की भी हैसियत नहीं रह गई ही साधारण आदमी की । तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप ज़मीन की रकम भी केलकुलेट करके इस इनाम में नकद ही जोड़ दें क्योंकि जब ज़मीन होगी तो हमें उसे सँभालने के लिए पाकिस्तान आना पड़ेगा और पाकिस्तान की हालत तो आप जानते ही हैं । जब वहाँ सुन्नी लोग अपने शिया भाइयों को ही बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं, यहाँ से १९४७ में पाकिस्तान गए लोगों को आज तक भी मुहाजिर ही मान रहे हैं और उन पर हमले कर रहे हैं तो हमें वहाँ कौन जिंदा छोड़ेगा । यह कोई भारत तो है नहीं, जहाँ वोट बैंक के चक्कर में करोड़ों बंगलादेशियों को बसा लिया, उनके राशन कार्ड बनवा दिए गए । अब उनमें से कई तो एम.एल.ए.और एम.पी. तक बन गए हैं । यदि हम किसी तरह वहाँ रह भी गए तो साल छः महिने में मुसलमान बनने के लिए बाध्य किया जाएगा । जब हिंदू कश्मीर में ही नहीं रहने दिए गए तो पाकिस्तान में कौन रहने देगा ? और फिर साहब, बचपन की बात और है । अब इस उम्र में खतना करवाने से बड़ा डर लगता है । सो यह ज़मीन का चक्कर छोड़िये । नकद ही रखिए ।
वैसे मुशर्रफ के सर का आप करेंगे क्या ? इसकी खोपड़ी में तो खुराफात ही भरी हुई है । बुरे आदमी का तो नाम ही बुरा होता है । हमारे मोहल्ले में ब्राह्मणों की एक उपजाति है । कहते हैं कि वे जहाँ होते हैं वहाँ लड़ाई झगड़े ज़रूर होते हैं । इस लिए लोग उन्हें अपनी बारात में भी ले जाने से कतराते हैं । एक बार एक बारात में उस उपजाति का एक भी व्यक्ति बारात में नहीं था फिर भी बस रेत में फँस गई । दूल्हे के बाप ने पूछा- अरे, कोई उस जाति का तो नहीं है बरात में । एक आदमी ने कहा- जी, आदमी तो कोई नहीं है मगर मेरे पास उस जाति के एक आदमी का गमछा ज़रूर है । दूल्हे के बाप ने कहा- गमछा फेंक । हम तुझे दूसरा दिला देंगे । उसने गमछा फेंका तब कहीं जाकर बस चली । सो जनाब, यह महान आत्माओं का प्रभाव । जब एक गमछा ही इतना प्रभाव दिखा सकता है तो फिर आप तो मुशर्रफ का सर पाकिस्तान में मँगवा रहे हैं । आपके देश में पहले से ही बहुत सी पुण्यात्माएँ कल्याण करने में लगी हुईं हैं फिर यह नई आफत क्यों पाल रहे हैं । वैसे आप निश्चिन्त रहिए । वे अब पकिस्तान में नहीं आ पाएँगे क्योंकि उनको बाहर रखने में, आपसे ज्यादा रुचि, ज़रदारी को है ।
फिर भी आपको उसके सर से ही ज्यादा प्रेम है तो हमें क्या । शर्तों पर विचार करके शीघ्र लिखिएगा ।
१५-१०-२०१०
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हैप्पी दिवाली, ओबामा जी
ओबामा जी,
नमस्ते । इस बार आप दिवाली पर भारत में होंगे । धन्न भाग । आपसे पहले बुश साहब ने भी दिवाली की शुरुआत की थी मगर मेन व्हाईट हाउस में नहीं बल्कि उससे जुड़ी इमारत 'इंडियन ट्रीटी रूम' में । यह वैसे ही था जैसे हमारी भाभी लहुसन नहीं खातीं तो भाई साहब को लहसुन की चटनी स्टोव पर और अलग से रखे बर्तनों में बनानी पड़ती है, फिर भी हम तो इसी में धन्य हो गए थे । इसके बाद आपने १४ अक्टूबर २००९ को धन तेरस को व्हाईट हाउस के ईस्ट रूम में दीया जलाकर दिवाली मनाई और अब आप ७ नवंबर को मुम्बई में दिवाली मनाएँगे । वैसे बताते चलें कि वास्तव में दिवाली ५ नवंबर को है लेकिन अमरीका में त्यौहार अपने आसपास के संडे के हिसाब से मनाया जाता है । बिना बात एक कार्य दिवस का व्यापारी को नुकसान क्यों हो ? आपके यहाँ भारत मूल के कोई तीस लाख लोग हैं मगर एक दिन के लिए भी दिवाली की छुट्टी नहीं होती । हमारे यहाँ की बात और है । यहाँ तो क्रिसमस की छुट्टी २५ दिसंबर को ही होती है । किसी आसपास के संडे पर नहीं टरकाया जाता । स्कूलों में तो कम से कम एक हफ्ते की छुट्टियाँ होती हैं । कुछ भी हो, आपका आना खुशी की बात तो है ही । और कहें तो खुशी से मर जाने का दिन है ।
दरअसल बात यह है कि इस देश को एक हज़ार साल से विभिन्न आक्रमणकारियों के जूते खाने का दारुण अनुभव है सो यह ज़रा सी सहानुभूति और आदर से ही गदगदायमान हो जाता है । भले ही भारत में हिंदी की दुर्गति हो रही हो मगर जब एक अंतरिक्ष यान में कई देशों के साथ भारत का भी झंडा और हिदी में लिखे दो शब्द चन्द्रमा पर भेजे गए तो हम बल्लियों उछले थे । जब आप चुनाव लड़ रहे थे तो लोग खबर उड़ा लाए कि आप हनुमान जी के भक्त हैं क्योंकि आपके हाथ में जो ब्रेसलेट है उसमें एक बंदर की शक्ल जैसी कोई चीज है । इससे उत्साहित होकर एक हनुमान-भक्त ने आपको हनुमान जी की सोने का पानी चढ़ी एक मूर्ति भी भिजवा दी थी । अब यह पता नहीं कि वह आप तक पहुँची या नहीं ।
तो आप ऐन दिवाली के दिन नहीं भी तो उसके आसपास आ रहे हैं, यही बहुत है । दिवाली के बाद महाजन नई बही शुरु करते हैं । अच्छा है - नई बही और दस बीस हज़ार करोड़ के सौदे से शुरुआत । आपसे पहले हमारे पुराने राजा ब्रिटेन के प्रधान मंत्री कैमरून साहब भी आए थे और तीन हज़ार करोड़ का सौदा कर गए । और इस सौदे से पहले दो चार अच्छी-अच्छी बातें करनी थीं सो वे भी कीं । अच्छी बातें मतलब कि भारत से 'पाकिस्तान नामक बीमारी' के बारे में सहानुभूति दिखाना । वैसे सौदा करके यहाँ से ब्रिटेन पहुँचते ही ज़रदारी का स्वागत बड़े जोश-ओ-खरोश से किया और थूक कर चाटने जैसा एक बयान दे दिया क्योंकि धंधा तो उसके साथ भी करना है । सुनार को ग्राहक और चोर दोनों का ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि चोर से चोरी का सोना सस्ते में खरीदना है और ग्राहक को खोट मिलाकर मार्केट रेट पर बेचना है । उसके लिए तो दोनों ही महत्वपूर्ण हैं । कैमरून से पहले, जब ब्लेयर प्रधान मंत्री थे तब वे भी आए थे और चार हजार करोड़ का सौदा कर गए थे ।
आपके बाद छः दिसंबर को फ़्रांस के राष्ट्रपति आ रहे हैं । उन्हें भी कोई न कोई सौदा पटाना है । फिर आएँगे दिसंबर मध्य में रूस के राष्ट्रपति । वे भी कोई न कोई सौदा करके ही जाएँगे । दिसंबर में ही चीन के प्रधान मंत्री को भी बुलाने की कोशिश हो रही है क्योंकि वह भी जब-तब छेड़-छाड़ करता रहता है सो उसे भी कहना है कि भाई, क्यों ज्यादा परेशान कर रहा है ? तू भी दो-पाँच हजार करोड़ का माल हमें टिका दे । वैसे भी चीन का घटिया माल इस देश में चोरी छुपे और खुले भी आ ही रहा है । अब कोई विदेशी माल का बहिष्कार करके स्वदेशी आन्दोलन तो गाँधी की तरह चलाना नहीं है । सस्ते माल में मुनाफा ज्यादा होता है । और व्यापारी को मुनाफे से मतलब है फिर चाहे वह अमरीका का हो या भारत का । देश का क्या है ?
सो आप भी सौदा करने आ रहे है । पहले जब शीत युद्ध का ज़माना था तब अमरीका का कोई भी राष्ट्रपति न तो भारत की इतनी मुँहदेखी बड़ाई करता था और न ही इतनी जल्दी-जल्दी भारत आता था क्योंकि तब भारत रूस से हथियार खरीदता था । तब भी हमें इसलिए हथियार खरीदने पड़ते थे क्योंकि आप पकिस्तान को मुफ्त में या सस्ते में हथियार दिया करते थे । वैसे अब भी आपने कौनसा उसे हथियार देना बंद कर दिया । उसे देंगे तो हमें भी शक्ति संतुलन के नाम पर हथियार खरीदने ही पड़ेंगे । अब यही तो तरीका बच गया है, दुनिया में अपने उपनिवेश बनाकर शोषण करने वाले गोरों के लिए, अपनी आमदनी बनाए रखने का । वैसे सभी जानते हैं कि इन देशों को हथियारों से ज्यादा औजारों और मितव्ययी होने की ज़रूरत है ।
राजस्थानी में एक कहावत है- ‘गाँव बावळी नै बदै ना और बावळी गाँव नै बदै ना' मतलब कि पगली की गाँव नहीं सुनता और पगली गाँव की नहीं सुनती । सो हमारी भी कोई नहीं सुनेगा क्योंकि सबको अपने-अपने धंधे से मतलब है मगर क्या बताएँ, हम भी आदत से मजबूर हैं । तो आप आ रहे हैं और अखबार आपकी भव्यता का आतंक फैलाने वाली खबरें छाप कर गौरवान्वित हो रहे हैं । अखबारों का क्या है ? वे तो मोनिका लेवेंस्की, ब्रिटनी और लेडी गागा सभी की चड्डी-चोलियों को उसी भक्ति भाव से छापते हैं जिस तत्परता से होली-दिवाली के विज्ञापनी परिशिष्ट । जब मंदिर ही प्रसाद और दर्शन कराने का धंधा करते हैं, तथाकथित संत टिकट लगाकर योग सिखाते हैं या च्यवनप्राश बेचते हैं तो फिर मीडिया में तो सेठों का अरबों रुपया लगा है । वह समाज सुधार के लिए है क्या ? दो पैसे कमाने के लिए है । और सेक्स, सनसनी और अजूबे बेचने से अच्छा और सुरक्षित कुछ नहीं हो सकता ।
मिडिया छाप रहा है कि आप जिस कमरे में ठहरेंगे, उस कमरे में मैडम के लिए विदेशों से मँगवा कर सौंदर्य प्रसाधन रखे गए हैं और आपके लिए विशेष शराबें रखी गई हैं जिनके एक गिलास की कीमत ३००० हज़ार रुपए है । वैसे हमने कुछ दिन पहले एक समाचार पढ़ा था कि व्हिस्की की एक बोतल दो करोड़ में नीलाम हुई है । हमारे यहाँ भी गाज़ियाबाद में दिवाली पर भ्रष्टों द्वारा भ्रष्टों को उपहार में दिए जाने के लिए चाँदी की बोतल में पेक की गई ७५० मिलीलीटर व्हिस्की ५१ हज़ार में बिक रही है । विजय माल्या ने भी पिछली दिवाली को सभी सांसदों को ब्लेक डॉग की एक-एक बोतल व्हिस्की भेंट दी थी । प्रभात झा नाम के एक सांसद ने बोतल लौटा दी । मगर और किसी ने भी चूँ तक नहीं की । चुपचाप दिवाली सेलेब्रेट करते रहे । मतलब कि झा को छोड़ कर सारे के सारे बेवड़े हैं ।
आपके बारे में और भी छापा गया है कि मुख्य रसोइए हेमंत ओबेराय आपकी मनपसंद डिशें तैयार कर रहे हैं और उनका मार्ग दर्शन करने के लिए आपका विशेष रसोइया आ रहा है । यहाँ आपकी सवारी के लिए जो कार आ रही है उसके बारे में भी बहुत कुछ छापा है जिसका वर्णन करना कुछ ज्यादा ही विस्तार हो जाएगा मगर इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह कार मौत के अलावा सभी खतरों से सुरक्षित है । वैसे जब बुश यहाँ आए थे तो सुना है कि वे अपना पानी भी अपने साथ अमरीका से लाए थे और उनका मल-मूत्र भी एक विशेष टायलेट में विसर्जित हुआ और जिसे वापिस अमरीका ले जाया गया । साँस लेने के लिए हवा का हमें पता नहीं कि वे अमरीका से ही लाए थे या यहीं की हवा में साँस ली । आज से साढ़े दस साल पहले होली के मौके पर क्लिंटन भी आए थे मगर न तो हिलेरी को साथ लाए और न ही मोनिका लेवेंस्की को । सारा मज़ा किरकिरा कर लिया होली का । शायद इसी गम में मौर्या होटल में विशेष रूप से रखी गई शराब को भी हाथ तक नहीं लगाया ।
आप भी उसी मौर्या होटल में ठहरेंगे । जब क्लिंटन आए थे तब हम दिल्ली में ही थे, दिल्ली कैंट में । सो धौला कुआँ की तरफ आना-जाना होता रहता था । एक दिन हमने देखा कि मौर्या होटल के सामने की सड़क पर लोग फूलों के गमले रख जा रहे हैं । कारण पूछने पर पता लगा कि क्लिंटन आने वाले हैं । सो अब भी वह इलाका सज रहा होगा । एक दिन जुलाई की दोपहर को हम अपने मित्र के स्कूटर के पीछे बैठे इसी मौर्या होटल के सामने से गुजर रहे थे । हल्की-हल्की बूँदाबाँदी हुई थी । सड़क का पानी ढलक कर बरसाती नाले में जा रहा था । एक पागल सा लगने वाला गरीब आदमी उस पानी को अपनी अँजुरी में भरकर पी रहा था । उन दिनों पानी का एक गिलास पचास पैसे का मिलता था और निश्चित ही उस आदमी के पास इतने पैसे नहीं थे । और पानी की प्याऊ लगवाना तो पुराने ज़माने की पिछड़ी बात है । उसका इस उपभोक्तावाद और मुक्त बाज़ार में कहाँ स्थान ? इस पानी पीने का कारण उसका पागलपन नहीं, गरीबी थी क्योंकि कोई भी इतना पागल नहीं होता । तब भी यह देश एक उभरती शक्ति और सबसे बड़ा लोकतंत्र और सबसे बड़ा बाज़ार था । अब तो राष्ट्र मंडल खेलों के चक्कर में ऐसे ग़रीबों को दूर ले जाकर पटक दिया था । अब तक तो क्या लौट कर आए होंगे ? आ गए होंगे तो भी मौर्या होटल तक तो उनका पहुँचना असंभव है ।
आप अपने कार्यक्रम में मुम्बई में मणि भवन के उस संग्रहालय को भी देखेंगे जिसमें महात्मा गाँधी कभी रहे थे और स्वदेशी, खिलाफत और असहयोग जैसे आन्दोलनों की रूपरेखा बनाई थी । देख लीजिए । अब इस देश में गाँधी इतना ही बच गया है ? हो सकता है कि किसी दिन इतना भी न बचे क्योंकि हम बड़ी तेजी से प्रगति कर रहे हैं और इस प्रगति में उस बूढ़े के लिए कोई जगह नहीं है । अब हमारे यहाँ भी स्कूल और कालेज के ४० प्रतिशत बच्चे दारू पीने लगे हैं, पढ़ाई की जगह स्कूलों में सौंदर्य प्रतियोगिताएँ और सेक्स एज्यूकेशन शुरु हो गई है, विश्वविद्यालयों में कंडोम बेचने वाली मशीनें लग गई हैं, कुँवारे मातृत्व, समलैंगिकता और लिव-इन-रिलेशनशिप के पक्ष में तथाकथित बुद्धिजीवी अभियान चला रहे हैं ।
आपका स्वर्ण-मंदिर जाने का कार्यक्रम भी था मगर आपके वहाँ के बुद्धिजीवियों ने बताया कि इससे गलत सन्देश जा सकता है । सर पर कपड़ा बाँधने से मुसलमान की सी झलक आ सकती है जो कि अमरीका के मुस्लिम-विरोधी लोगों को पसंद न आए । इससे पहले भी आपके नाइजीरिया में वहाँ की ड्रेस पहने हुए फोटो को लेकर चुनाव प्रचार में बड़ा हल्ला मचाया गया था । यह ठीक है कि आपके स्वर्णमंदिर जाने से सरदार प्रकाश सिंह बादल का कद कुछ और बढ़ जाता पर आप यहाँ न तो चुनाव के लिए कोई सर्व-धर्म-सम-भाव के लिए आ रहे हैं और न ही किसी तीर्थ यात्रा पर और न ही किसी का कद बढ़ाने । आप तो धंधा करने आ रहे हैं । सो उसी पर ध्यान देना है । फालतू के चक्करों में पड़ने से क्या फायदा । हाँ, यदि कोई दस-बीस हज़ार करोड़ का सौदा होता तो बात और थी । तब तो गुरूद्वारे में क्या, गटर में भी जाया जा सकता था ।
हमारे यहाँ की बात और है । हमारे यहाँ के नेताओं को ऐसे सर्व-धर्म-समभाव के नाटक करने में ही अपना भविष्य दिखाई देता है । जिसे देखो इफ्तार की दावत देने लग जाता है, भले ही कोई उन्हें एकादशी पर फलाहार न करवाए । हज़ पर सब्सीडी तो खैर मिलती ही है । वैसे हम आपको अपने बचपन की बातें बताते चलें । ये बातें आजादी के दस-पन्द्रह साल बाद तक की हैं । तब न तो किसी मुसलमान को किसी खास तरह की दाढ़ी रखने की ज़रूरत महसूस होती थी और न ही किसी हिंदू को चोटी और तिलक की । हम बीमार होते थे तो माँ मस्जिद में जाकर मुल्ला जी से डोरा बनवा लाती थी । शीतला माता के मेले में हिंदू मुसलमान सभी गाते हुए जाते थे । हमारे एक शायर मित्र हैं जो पूजा करते हैं । एक और कवि हैं बशीर अहमद मयूख जिन्होंने वेदों का उर्दू में अनुवाद किया है । वे अपने घर में राम, कृष्ण, शिव की मूर्तियाँ रखकर मंदिर बनाए हुए हैं । हमारे एक सहपाठी का नाम लीलाधर था । उसके यहाँ शादी में वे ही गीत गाए जाते थे जो हिंदुओं के यहाँ गाए जाते हैं । अब भी हमारे इलाके में बहुत से मुसलमानों के सरनेम पवार, चौहान, गौड़ आदि हैं । पर जब से अमरीका ने रूस को घेरने के लिए मध्यपूर्व में कट्टर पंथी इस्लाम को बढ़ावा दिया, मुसलमान काम के लिए अरब देशों में जाने लगे और उनके साथ पेट्रो डालर और कट्टरता आने लगी और फिर उसके ज़वाब में हमारे यहाँ के कुछ हिंदुओं ने कट्टरता में अपना राजनीतिक भविष्य देखना शुरु किया और उसकी परिणति मंदिर विवाद में हुई तब से इस देश की एकता को असली झटका लगा । जिसकी धमक आज सारी दुनिया में सुनाई दे रही है । और अमरीका भी अपने पैदा किए हुए इस जिन्न से बुरी तरह से घबराया हुआ है । सच पूछें तो साधारण आदमी आज भी कट्टर नहीं है और मिल कर रहना चाहता है ।
वैसे कोई भी राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री हो, आजकल उसे अपने देश के सेठों के लिए सामान बेचने का काम ही करना पड़ता है । चाहे आप हों या क्लिंटन या फिर किसी और देश का राष्ट्रपति हो । हम आपको कोई हथियार, कारें, कोकाकोला बेचकर तो पैसे कमा नहीं सकते । हमारे पास तो बेचारे पढ़े लिखे लड़के हैं जो सस्ते दामों पर आपके देशों में नौकरी कर रहे हैं और ऊपर से नस्ली घृणा का शिकार हो रहे है सो अलग । तिस पर मुक्त बाज़ार के मसीहा आप अपने ओहायो राज्य में आउट सोर्सिंग पर प्रतिबन्ध लगाते हैं । और अपने बच्चों के यह कहते हैं कि ये भारत वाले तुम्हारी नौकरियाँ छीन रहे हैं जैसे कि ये कोई डाकू हों । आपके देश को तो माल बिकवाने वाला चाहिए । उसे और किसी अच्छी बुरी बात से कोई मतलब नहीं , भले ही कोई राष्ट्रपति क्लिंटन की तरह लम्पट ही क्यों ना हो ।
खैर, जी आप बुरा नहीं मानिएगा । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, भले ही विकिलीक वाले को आपके देश में जान का खतरा हो ।
तो दिवाली की फिर बधाई । जय राम जी की ।
२९-१०-२०१०
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अरुंधती की आड़ में
फारुक अब्दुल्ला जी,
संबोधन तो आपको क्या दें । आप एक जगह टिकें तब ना कुछ तय किया जाए । आज के अखबार में आपका स्टेटमेंट पढ़ा । यह स्टेटमेंट आपने अपनी मर्जी से ही दिया होगा क्योंकि आपसे कोई ज़बरदस्ती स्टेटमेंट तो ले नहीं सकता । स्टेटमेंट तो आप पहले भी देते रहे हैं । जब अफज़ल गुरु को फाँसी की बात उठी थी तब भी आपने कहा था कि अफज़ल को फाँसी देने से इस देश का क्या नुकसान हो सकता है ? गिलानी ने भी अफज़ल को फाँसी नहीं देने की शर्त रखी थी । गुलाम नबी आज़ाद ने भी कहा था कि अफज़ल को फाँसी देने से कश्मीर में आग लग सकती है । एक अफज़ल को, जिसने संसद पर हमले की साजिश रची थी, को फाँसी देने पर कश्मीर में आग लग सकती है मगर लाखों कश्मीरी पंडितों को ज़बरन भगा दिए जाने और उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लेने से कश्मीर में आग नहीं लग सकती क्योंकि इन बेचारे पंडितों को न अमरीका का समर्थन है, न पाकिस्तान का और न ही उनके पास हथियार हैं और न ही पेट्रो-डालर का दम । इन्हें तो अब दिल्ली और जम्मू में दो हज़ार रुपए महिने में टीन की छतों के नीचे दिन गुजारने पड़ रहे हैं जब कि इससे दस गुना तो कश्मीर में रहने वाले, कुछ भी काम न करने वाले, अलगाव की बात करने वालों को वैसे ही मिल जाता है ।
कितनी मज़े की बात है कि अफज़ल के बारे में आपके, गुलाम नबी और गिलानी के बयान कितने समान हैं ? क्या यह मात्र संयोग है ? नहीं, यह आप सबकी मिलीभगत है । केन्द्र से पैकेज आता रहता है और सारे नेता मिल कर खाते रहते हैं । अलगाववादी भी इसी धन पर पल रहे हैं और अपनी गतिविधियाँ चला रहे हैं वरना अस्सी साल के गिलानी के पास कौन सा खजाना गड़ा हुआ है जो दो सौ रुपए रोज में पत्थर फेंकने वाले हजारों स्वयंसेवक रखे हुए हैं । इतने आतंकवाद के बावज़ूद आप लोगों को कभी गरम हवा तक भी क्यों नहीं लगी ?
आप और भी कई तरह के वक्तव्य देते रहते हैं । जब आप सत्ता में होते हैं तो कुछ और बोलते हैं और जब सत्ता में नहीं होते तो कुछ और । जब सत्ता में नहीं होते तो अपनी ससुराल इंग्लैण्ड चले जाते हैं और चुनाव के समय फिर श्रीनगर आ जाते हैं और कश्मीरियों की अस्मिता की बातें करने लग जाते हैं । अब जब गिलानी ने कुछ ज्यादा ही हल्ला मचाया तो आपके 'सुपुत्र' की गद्दी कुछ हिलने सी लगी तो उसने भी कुछ और ही तरह का वक्तव्य दे दिया वैसे न देते तो भी कुर्सी के साधकों के वक्तव्यों और मंतव्यों को समझना कोई कठिन नहीं है । जब राहुल बाबा ने उनका समर्थन कर दिया तो चिदंबरम भी ढीले पड़ गए । आपने इस पर कुछ कहा तो नहीं । कहते भी क्या ? इधर पड़ें तो कुआँ और उधर पड़ें तो खाई । मगर अब इस अरुंधती ने आपको फिर से देशभक्त बनने का मौका दे दिया । आपने कहा- 'हमारे यहाँ इतनी आजादी है कि हमारे लोग ही हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर देंगे' ।
वैसे जहाँ तक बेड़े की बात है तो मियाँ, उसे गर्क करने में किसी ने कोई कमी नहीं रखी है । ६३ साल से सारे के सारे जनसेवक गर्क करने में ही लगे हुए हैं । जब कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो फिर कैसा तो स्पेशल दर्जा, कैसा स्पेशल पैकेज और कैसी वार्ता । जैसे देश के सारे राज्य हैं वैसे ही कश्मीर । आपके सुपुत्र ने वार्ता में पाकिस्तान को शामिल करने की बात की तो पाकिस्तान का क्या लेना देना है । उसने तो कश्मीर के एक हिस्से पर नाजायज़ कब्ज़ा कर रखा है । होना तो यह चाहिए था कि आप सब लोग उस हिस्से की मुक्ति की बात करते मगर उसके लिए बड़ा दिल और बड़ी हिम्मत चाहिए । जब पाकिस्तान ने उसमें से एक बड़ा हिस्सा पहले अमरीका को अड्डे बनाने के लिए और अब चीन को सड़कें बनाने के लिए दे दिया तब आप कुछ नहीं बोले । जब मुसलमानों के इस देश में आने से भी पहले के निवासी कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से निकल बाहर किया गया तब भी आपकी आत्मा मौन ही रही ।
आपको ही क्या कहें सारी पार्टियाँ ही अपने चुनावी गणित भिड़ाती रहती हैं वरना गिलानी के वक्तव्य पर लालू, मुलायम, मुफ्ती, आप, कांग्रेस कोई नहीं बोला । चुनाव जो चल रहे हैं । भाजपा भी रस्म अदायगी सी ही कर रही है, यह सोच कर कि क्या पता फिर कभी पहले की तरह आपसे समर्थन लेना पड़ जाए । अब इस अरुंधती के कारण गिलानी नेपथ्य में चले गए और यह देशद्रोही हो गई । वैसे इस महिला की बीमारी यह है कि यह अपने कुछ अच्छे और चर्चित वक्तव्यों के कारण लाइट में आ गई सो इसने समझ लिया कि यह बहुत बड़ी ज्ञानी है । मगर इसे भारत के इतिहास का ज्ञान नहीं है और न ही इसकी नसों में यहाँ का उतना हवा पानी, केवल किताबी ज्ञान है वरना वह यह नहीं कहती । फिर भी उसमें एक करुणा और ईमानदारी तो है ही पर आप तो सब कुछ जानते हैं । आपका तो रोम-रोम इस मिट्टी का ऋणी है । जयपुर में रह कर पढ़े हैं । भजन भी गा लेते हैं । आपके पुरखे भी हिंदू ही थे । आप हिंदुत्व की उदारता को अच्छी तरह से जानते हैं । हिंदू धर्म ही संसार में ऐसा है जो सबको गले से लगा लेता है । वरना साठ साल पहले भारत छोड़ कर पाकिस्तान गए मुसलमानों को आज तक भी पाकिस्तान के कट्टरपंथियों ने अपना नहीं माना है । और तो और, शियाओं पर आज भी कहर क्यों बरसाया जा रहा है पाकिस्तान में ।
आप सोच रहे होंगे कि हमने आपके सुपुत्र को जम्मू-कश्मीर का प्रधान मंत्री कहने की बजाय सुपुत्र क्यों कहा । सो मियाँ, यहाँ कोई जनता का नेता नहीं है । सब किसी न किसी के पुत्र/पुत्री हैं चाहे उमर हों या अजय चौटाला, अभिषेक यादव हों या तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे हों या महबूबा, प्रिय सुले हों या स्टालिन । सबके अपने-अपने देश हैं, अपने-अपने दल, अपने-अपने बैंक बेलेंस, अपनी-अपनी कुर्सी । हमें तो लगता है कि अब इस देश के खंडित होने के दिन आ गए हैं । और इसमें आपका भी योगदान कम नहीं है ।
भगवान इस देश की आप सेवकों से हिफाज़त करे ।
२७-१०-२०१०
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
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