May 27, 2018

नीरव मोदी कहाँ है



 नीरव मोदी कहाँ है 

आते ही तोताराम ने प्रश्न उछाला- नीरव मोदी कहाँ है ?

हमने कहा- हमें तो अपने वार्ड मेंबर तक का पता नहीं कि वह यहीं है या दिल्ली या फिर कहीं अनौपचारिक दौरे पर विश्व के किसी बड़े नेता से मिलने चला गया है |फोन करो तो उठाता नहीं |वैसे कहता है मास्टर जी, मैं तो आपकी जेब में हूँ |जब फोन करो तब हाजिर |लेकिन तू हमें नीरव मोदी के बारे में क्यों पूछ रहा है ? हम कोई पंजाब नॅशनल बैंक के मैनेजर हैं जिन्होंने उसे लेटर ऑफ़ अंडरस्टेंडिंग लिखने का अधिकार दे दिया था |क्या हम वित्त मंत्री हैं ? या फिर हम कोई बड़े सेवक हैं जिसके साथ उसने फोटो खिंचवाया था |

बोला- मैनें तो वैसे ही पूछ लिया |अखबार में पढ़ा था कि नीरव मोदी फरार चल रहा है |इन्डियन ब्रिटिश हाई कमिश्नर के अनुसार लन्दन में है |कोई कहता है हांगकांग में है, कोई कहता है न्यूयार्क में |  कोई स्विटज़रलैंड में बताता है |उसका भारत का पासपोर्ट रद्द हो चुका है |लगता है वह फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर रहा है |

हमने कहा- यह मत भूल कि फर्जी काम ज्यादा सही होता है क्योंकि उसमें अतिरिक्त सावधानी बरती जाती है |सही काम करने वाला तो अपने 'सही के नशे' में रहता है और नुकसान उठाता है |तुझे याद नहीं अपने साथ जो वर्क एक्सपीरिएंस का मास्टर था वह अपनी तनख्वाह जितना मेडिकल बिल उठा लेता था |उसका बिल संबंधित क्लर्क ही बनाता था बीस परसेंट के कमीशन पर |  वैसे ही नीरव मोदी जिस भी देश में गया होगा वहीं के आव्रजन अधिकारियों से ही सब कागजात बनवाए होंगे |फर्जी काम में ही सबको कुछ न कुछ मलाई मिलती है |सही काम में तो  सूखी तनख्वाह है | जमा खातिर रह |दोनों देशों की सरकारों को पता है कि बन्दा कहाँ है ? 

बोला- तो फिर क्यों यह नाटक चल रहा है ?जाओ उस देश में और ले आओ पकड़कर |लटका दो उल्टा |निकल आएगा सब कुछ |और फिर अमरीका तो इनका बड़ा चहेता मित्र है |

हमने कहा- कोई किसी का मित्र नहीं है | यदि ऐसा ही प्रेम था तो खालिस्तान के समर्थकों को क्यों ब्रिटेन और अमरीका में शरण दी गई |आज भी खालिस्तान समर्थक कनाडा में मंत्री बने हुए हैं |सबके अपने-अपने हिडन एजेंडा हैं | करने के लिए एक  एजेंडा और दिखाने के लिए दूसरा एजेंडा |लेकिन तू नीरव मोदी के लिए क्यों चिंतित है जब कि कर्नाटक में सत्ता हथियाने के चक्कर में नेताओं को तो राम तक भुला गए हैं |

बोला- मैं उसके लिए चिंतित नहीं हूँ |मैं तो यह याद दिला रहा हूँ कि कल तक सभी अखबार नीरव मोदी से भरे रहते थे और आजकल सब उसके मामले में नीरव कैसे हो गए ?

हमने कहा- इस समय तो नीरव से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण कर्नाटक में लोकतंत्र को बचाना ज़रूरी हो गया है |दस एम.एल.ए. की आत्मा को जगाने का मामला है और वह भी जल्दी से जल्दी |इसके लिए सुना है एक हजार करोड़ का बजट भी रखा गया है |

बोला- तो फिर नीरव मोदी कहीं नहीं गया |यहीं कहीं बंगलुरु में ही है |गधा-घोड़ा बाज़ार में सक्रिय होगा |




  

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May 26, 2018

लेने के देने



लेने के देने 

पचास रुपए का चारा खाकर पचास का ही दूध दे तो केवल गोबर और गौमूत्र के लिए तो कोई गाय पालने से रहा |ऐसे में गायों के थनों में दूध और तन पर मांस नहीं रहा तो सड़क के अलावा और कहाँ ठौर | गौशालाओं में गायें हैं लेकिन कागजों में | इसलिए  गायों की नियति केवल धक्के खाने से अधिक नहीं रह गई है |किसी और इलाके में कोई किसान क्या पता इन गायों को दो तिनके डालकर काम चला ले ? लेकिन उसे भी रास्ते में पता नहीं कौन गौतस्कर बताकर नाप दे |ऐसे में गायों की स्थिति बीमार, बेकार, बूढ़ी और निर्धन माँ जैसी हो रही है |

हाँ, बकरों और मुर्गों की अब भी पूछ है क्योंकि इन्हें लाते, ले जाते कोई  गाय सिद्ध नहीं कर सकता |राजस्थान से रोज दिल्ली के लिए सैंकड़ों ट्रक बकरे जाते हैं |इसलिए जिन घरों में भी बकरे होने की संभावना होती है, कसाई चक्कर लगा जाते हैं | 

आज हम और तोताराम जैसे ही बरामदे में बैठे थे एक सज्जन आगे से निकलते हुए हम दोनों की चर्चा सुनकर ठहर गए | हमारी चर्चा जैसा कि पाठक जानते हैं कौनसी 'राम-रहीम' की होती है |हमें तो 'राम' से भी 'आसा' नहीं रही |वही सरकार और सेवकों को लेकर रोना-धोना | वही चोर-उचक्कों की लम्पट लीलाएँ | 

हम इन्हें जानते हैं |पहले बकरे खरीद कर दिल्ली भिजवाया करते थे |आजकल  व्यापारी, समाजसेवक और  पोलिटीशियन तीनों का मुरब्बा हैं | हमने कहा- भैया, तुम्हें पता हैं, हम बकरी नहीं रखते इसलिए बकरे होने का सवाल ही नहीं है |जाओ, क्यों आपकी टाइम खोटी कर रहे हो ?

 बोला- आजकल हम बकरे नहीं खरीदते | हाँ, कोई छोटी-मोटी सरकार बिकाऊ हो तो बताना |चुनाव लड़ने की झंझट कौन करे |बड़ी माथाकूट है |हम तो जब जैसी ज़रूरत होती है, बनी बनाई सरकार ही खरीद लेते हैं | क्या करें, साला छोटा-मोटा धंधा भी सरकार जेब में हुए बिना नहीं चलता |

हमें बड़ा अजीब लगा | हमने कहा- तुम्हें शर्म नहीं आती |देश के लोकतंत्र का इस प्रकार मज़ाक उड़ाते |सरकारें छोटी हों या बड़ी,  सरकार होती हैं |वे बिकाऊ नहीं होतीं | जैसे कि प्रेमिका और प्रेमी बिकाऊ नहीं होते |सेवा की तरह प्रेम भी अमूल्य होता है |यह बात और है कि कुछ टुच्चे लोग, भले ही पचास करोड़ रुपए लगाएँ, लेकिन प्रेमिका की कीमत लगाने की हिमाकत करते हैं | 

बोला- मास्टर जी, लोकतंत्र के बारे में हमें मत समझाओ |आप तो पढ़े लिखे आदमी हो इसलिए कोई आपसे ऐसे मामलों में मगजपच्च्ची नहीं करता लेकिन हम तो बाज़ार में  बैठते हैं |सब चीजों के भाव जानते हैं |ये जो करोड़ों रुपए खर्च करके चुनाव लड़ते हैं तो क्या सेवा के लिए ? अरे सेवा ही करनी है तो कौन से हाथी-घोड़े जुतवाने हैं | लग जाओ, हर जगह सेवा का स्कोप है |और नहीं तो घर के आगे दो मटके पानी ही रख लो और पिलाओ आते-जाते लोगों को |असीस देंगे |लेकिन उसमें माल कहाँ ? 

आज हमारी औकात छोटी हैं इसलिए आपसे बात कर रहे हैं |नहीं तो इस समय कर्नाटक में होते |जहाँ सरकार की बोली लग रही है |सेवकों की आस्थाएँ नीलम हो रही हैं |काणे-खोड़ेे, लंगड़े-लूले, चोर-उचक्के, आरोपी-सज़ायाफ्ता सब निकल पड़े हैं भुवन मोहिनी के स्वयंवर में भाग्य आजमाने | और उचक रहे हैं बन्दर बने नारद जी की तरह | जो आम्बेडकर और गाँधी की कसमें खाते नहीं थकते थे उनकी करतूतें देखकर वे बेचारे, कहीं होंगे तो, सिर धुन रहे होंगे |

जनता की सेवा का ऐसा जुनून तो सतयुग में भी नहीं देखा गया होगा | अभक्ष्य खाने को तैयार हैं, अकरणीय करने को तैयार हैं, कैसे भी हो सेवा का अवसर चाहिए |सेवा मतलब कुर्सी | एक दिन का भी उपवास या एक रात का वियोग भी बर्दाश्त नहीं हो रहा है |

तोताराम ने कहा-भैय्या, तू कहीं और जा |इस प्रकार की बातें यहाँ मत कर |हम पेंशनर लोग हैं |किसी ने सुन लिया और बात ऊपर तक पहुँच गई तो मुश्किल हो जाएगी | सुना नहीं, दो-चार दिन पहले ही चेलेंज दिया गया है- 'लेने के देने पड़ जाएँगे' | और कुछ नहीं तो गैस वाली सब्सीडी और रेल में २५% वाली छूट ही छीन लेंगे |














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May 17, 2018

भावी जनसेवक जी के साथ सेल्फी



भावी जनसेवक जी के साथ सेल्फी  


तोताराम ने आते ही हमारे चरण छुए और कहा- भाई साहब, उठिए, वार्म अप कीजिए और कूद पड़िए अखाड़े में |

हमने कहा- तोताराम, तुम्हें पता नहीं कैसे-कैसे बचकाने मजाक सूझते हैं | कूदने की उम्र में ही अखाड़े में नहीं कूदे तो अब इस चौथेपन में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे |

बोला- क्यों, मलयेशिया में ९२ वर्ष के महातिर ने घुमा दिया कि नहीं लंगोट |

हमने कहा- हमारे यहाँ अब युवाओं का ज़माना है |फिर भी यदि बताना है तो अडवानी जी को बता जिनकी चिरसंचित अभिलाषा अभी तक निदेशक मंडल के पिंजरे में तड़फड़ा रही है |

बोला- कोई बात नहीं |बड़े होने के कारण पहला चांस आपका बनता था इसलिए पूछ लिया |वैसे मैं तो जा ही रहा हूँ २०१९ के चुनावों की तैयारी के बतौर डिज़ाईनर कुरता और जैकेट सिलवाने के लिए |इसके बाद 'राष्ट्रीय वाट्स अप ग्रुप यूनिवर्सिटी' का सदस्य बनकर इतिहास का ज्ञान बढा लूँगा | फिर तो जिस किसी को भी लतियाने और धकियाने लायक बन जाऊँगा |इसके बाद जब विचारों का अजीर्ण हो जाएगा तब वक्तृत्व कला तो अपने आप आ ही जाएगी |कहीं भी चार लोग दिखाई देते ही- भाइयों, बहनों कहने का मन करने लग जाएगा |

हमने कहा- लेकिन यदि तेरा मन चुनाव लड़ने का हो  रहा है तो पहले एक अनिवार्य योग्यता तो हासिल कर ले |

बोला- क्या ?

हमने कहा- जेल हो आ |

बोला- जेल जाने के लिए कोई कुकर्म करने का मौका तो होना चाहिए |कुकर्म का मौका कोई राजनीतिक पद प्राप्त किए बिना नहीं मिल सकता क्योंकि बिना राजनीतिक पद के कुकर्म करने का साहस ही नहीं होता |

हमने कहा- हमारा मतलब वह नहीं था |हमारा मतलब तो यह था कि जैसे आजकल कर्नाटक के चुनावों में नेहरू जी एक श्रेष्ठ, महान और देशभक्त प्रधान मंत्री तो दूर, बल्कि एक विश्वसनीय प्रधानमंत्री तक नहीं माने जा सकते क्योंकि वे भगत सिंह से मिलने जेल में नहीं गए थे | 

तोताराम ने उत्तर दिया- नहीं, ऐसी बात नहीं है |नेहरू जी भगत सिंह से मिलने जेल गए थे | वैसे अब भगत सिंह और सावरकर तो हैं नहीं |नीरव मोदी और माल्या विदेश में हैं |लालू जी इलाज के लिए जमानत पर हैं |आसाराम, रामरहीम और सेंगर अपनी पहुँच से दूर हैं |कहे तो अपने सीकर की जेल में किसी चोर-उचक्के से मिल आऊँ ?

हमने कहा- कोई बुराई नहीं है |हर अपराधी में एक महान सेवक की क्षमताएँ छुपी होती हैं |भाग्य और संयोग की बात है |क्या पता तू आज जिससे मिलकर आए वह कल राष्ट्रीय स्तर का अपराधी बन जाए | उससे मिलने के कारण हो सकता है तुझे किसी देश भक्त पार्टी का टिकट मिल जाए |लेकिन प्रमाण के बतौर सेल्फी ज़रूर ले लेना अन्यथा राजनीतिक इतिहासवेत्ता तुझे भी नेहरू जी तरह फफेड़ने लग जाएँगे |

बोला- तो फिर कुरता-पायजामा अगली पेंशन पर |अभी तो सेल्फी लेने के लिए स्मार्ट फोन खरीद लाता हूँ |वाट्सअप यूनिवर्सिटी की पढाई के लिए भी तो चाहिएगा |

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Apr 19, 2018

सुरक्षा-व्यवस्था और रोजगार सृजन

सुरक्षा-व्यवस्था और रोजगार सृजन 


(राजनीति में मूर्तियाँ बनवाना और तोडना एक फैशन और मुद्दा दोनों है |इस सन्दर्भ में सभी सेवकों को शामिल करते हुए इस एक पुराने आलेख का आनंद लिया जा सकता है |) 

मायावती जी,
नमस्कार । हम तो आपके प्रशंसक हैं ही और अब जब आपने मूर्तियों की सुरक्षा व्यवस्था के लिए सुरक्षा बल गठित करने की घोषणा की तो हम तो आपके भक्त ही हो गए । पर हम अंधभक्त नहीं हैं । हम तो आराध्य के गुण दोषों को परख कर फ़ैसला करते हैं । देखा-देखी जय बोलने वाले हम नहीं हैं ।

यूँ तो गणतंत्र दिवस पर तथाकथित जनकल्याणकारी योजनाओं की घोषणाएँ करने की परंपरा है पर हम इन घोषणाओं की पोल जानते हैं । पर २६ जनवरी २०१० को आपने अपनी, कांसीराम जी और अम्बेडकर जी की मूर्तियों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा बल गठित करने की जो घोषणा की है वह एकदम अनोखी, धाँसू और छाती पर चढ़कर बोलने वाली है । सिर पर चढ़ कर बोला हुआ क्या पता ऊपर ही ऊपर निकल जाये पर छाती पर चढ़ कर बोला गया तो सुनना ही पड़ता है । जब आप मूर्तियाँ लगवा रही थीं तो लोग कितनी तरह की बातें कर रहे थे- देश के धन का अपव्यय है, मायावती अपने प्रचार के लिए जनता का पैसा फूँक रही है । अब उन्हें समझ में आ गया होगा कि यह प्रदेश के पिछड़ों को रोज़गार देने का एक कल्याणकारी कार्यक्रम था । ये हावर्ड से पढ़कर आये लोग क्या समझें । ये देशी नुस्खे हैं- सस्ते, सुन्दर और टिकाऊ । पर हम तो जानते थे कि आप प्रचार पाने के ऐसे फालतू तरीकों में जनता का पैसा खर्च नहीं कर सकती । अब देखिये ना, हो गई सबकी बोलती बंद ।

इस तरीके से हम बिना प्रदूषण फैलाए ही अपने देश के सभी लोगों को ही नहीं, दुनिया के सभी बेरोजगारों को रोज़गार दे सकते हैं । भारत में नए-पुराने करके कोई एक सौ नेता और नेतनियाँ तो ऐसे होंगे ही जिनकी पूजा करके इस देश की जनता प्रेरणा, गौरव और शांति प्राप्त कर सके । और बारह सौ लोगों के बीच कम से कम एक मूर्ति तो चाहिए ही । और एक सौ प्रकार की महान विभूतियों की एक-एक मूर्ति तो लगेगी ही । इस प्रकार हमें अपने देश में ही सवा करोड़ मूर्तियाँ चाहियें । इसके बाद जैसे-जैसे और लोग महान होते जायेंगे वैसे-वैसे आवश्यकता भी बढ़ती जायेगी । इस प्रकार यह मूर्ति बनाने का, लगवाने का, उनकी रक्षा का, साफ़-सफ़ाई का, पूजा का काम इतना बड़ा है कि कल्पना करके ही चक्कर आने लग जाते हैं जैसे कि भगवान का विराट रूप देखकर अर्जुन को आने लगे थे ।

हमें लगता है कि इस योजना से सारे संसार के लोगों को काम मिल जायेगा । इसके बाद भी लोग कम पड़ जायेंगे । तब तो लोगों को ज्यादा से ज्यादा जनसंख्या बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देना पड़ेगा । हमें लगता है कि तब भी आपूर्ति नहीं हो पाएगी । तब हो सकता है हमें मानव संसाधन के लिए अन्य ग्रहों में खोज करनी पड़े ।

अभी देश में जितनी मूर्तियाँ, पूजास्थल हैं वे कम पड़ रहे हैं । देश की जनसंख्या के हिसाब से इनकी संख्या नहीं बढ़ रही है । इसीलिए समाज में अशांति और तनाव है । यह तो आजकल डाक्टर भी मानने लगे हैं कि पूजा और भक्ति से मानसिक तनाव दूर होता है । पर आज तक किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया । आपने ध्यान तो दिया पर आपके पास इतने साधन भी तो नहीं हैं । इसके लिए वर्ल्ड बैंक से कर्जा लिया जाना चाहिए ।

कुछ लोग कहते हैं कि भगवान तो हमारे मन में है । उसकी मूर्तियाँ बनाने से क्या फायदा । ब्रह्म तो निर्गुण है, निराकार है, अनाम है, अरूप है । हिंदू लोग तो काफ़िर हैं । मूर्ति पूजते हैं । इनसे कोई पूछने वाला हो अरे भाई, तो फिर तुम क्यों काबा, हरमिंदर साहब, गया, चर्च, येरुसलम जाते हो । क्यों चर्चों, मस्जिदों, मंदिरों, पुस्तकों पर हमले से उबल पड़ते हो । यह सब मूर्ति पूजा नहीं तो और क्या है । मूर्ति की शक्लें अलग-अलग हो सकती हैं । वहाँ जाकर धंधा तो सब वही करते हैं । वह निर्गुण क्या बिना जीव और जगत के तुम्हारी समझ में आ जायेगा । अरे ब्रह्म के होने का पता तुम्हें किससे लगता है ? माया से ।

माया ही ब्रह्म का प्रकट रूप है । वह भी उतनी ही आराध्या है जितना कि ब्रह्म । कुछ लोग इस तथ्य को नहीं समझ पाते और कभी ब्रह्म और कभी माया की तरफ भागते हैं । और इस चक्कर में उन्हें कुछ भी नहीं मिलता । तभी कहा गया है ना- दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम । आपने जो मूर्तियाँ बनवाई हैं वे दोनों का समन्वय हैं- माया (वती) और (कांसी) राम ।

किसी भी देश में जनता को दो ही चीजें चाहियें- रोज़गार और सुरक्षा । और बाकी नाचने, गाने, लड़ने, झगड़ने, मरने, मारने, बीवी को पीटने और बच्चे पैदा करने के मामले में भारत की जनता स्वावलंबी है । इसके लिए उसे किसी विदेशी तकनीकी की ज़रूरत नहीं है । आज तक दुनिया के किसी देश ने अपनी जनता को रोज़गार देने के लिए इतनी बड़ी, सरल, पारदर्शी, और एक साथ ही आध्यात्मिक और भौतिक योजना नहीं बनाई ।

इस योजना से रोजगार मिलने की विपुल संभावनाएँ तो सिद्ध हो गईं । अब सुरक्षा की बात करें । प्राचीन काल में कहते हैं कि यह देश विकसित था, सोने की चिड़िया था । पर इसका कारण कोई नहीं जानता । इसका सीधा सा कारण था कि यहाँ दुनिया में सबसे ज्यादा मूर्तियाँ थीं । इस देश की उन्नति से जलने वाले लोग दूसरे देशों से आये और यहाँ की मूर्तियों को तोड़ डाला क्योंकि उस काल के अदूरदर्शी राजाओं ने मूर्तियों की सुरक्षा के लिए लोगों को कोई प्रशिक्षण नहीं दिया । जो अपनी मूर्तियों की रक्षा नहीं कर सकता वह देश गुलाम नहीं होगा तो और क्या होगा । इसलिए यह देश गरीब और गुलाम हो गया । अपनी रक्षा करने लायक भी नहीं रहा । किसी तरह गाँधी जी की पूजा करके आज़ाद हुआ । फिर तो देश में मूर्तियाँ लगाने का सिलसिला चालू हुआ तो अब देख लीजिए हम दुनिया की एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था बन गए हैं । चीन और पकिस्तान की छोटी-मोटी छेड़छाड़ के अलावा देश पर कोई हमला नहीं हुआ । जब इतनी मूर्तियाँ होंगी, उनकी सुरक्षा व्यवस्था होगी तो लोगों को सुरक्षा करने का अनुभव होता जाएगा तो वे देश की ही नहीं अपनी रक्षा भी अच्छी तरह से कर सकेंगे ।

काबुल में लोगों ने बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ तो बनवा लीं पर सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की तो लोगों ने तोड़ ही डाली ना । इसलिए जितना मूर्तियाँ बनवाना ज़रूरी है उतना ही सुरक्षा व्यवस्था करना भी ज़रूरी है । मूर्तियों के बारे में हम आपको एक सलाह और देना चाहते हैं । आप अमरीका नहीं गईं । हम जाकर आये हैं । हमने वहाँ कई राष्ट्रपतियों की मूर्तियाँ पहाड़ों में उकेरी गईं देखी हैं जैसे कि काबुल में बुद्ध की मूर्तियाँ जिन्हें तालिबानों ने तोड़ दिया था ।

अमरीका में कोई राष्ट्रपति तीन-तीन बार राष्ट्रपति नहीं बना और जिन की मूर्तियाँ बनी हैं उनके समय अमरीका की जनसँख्या यू.पी. के बराबर भी नहीं थी । आप तीन-तीन बार यू.पी. की मुख्य मंत्री बनीं तो इस उपलब्धि के लिए क्या आपकी मूर्ति किसी पहाड़ पर नहीं उकेरी जा सकती ? पर क्या बताया जाये सारे पहाड़ तो उत्तरांचल में चले गए । बुंदेलखंड में कुछ पहाड़ बचे हैं तो आप बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने की बात कह रही हैं । बुंदेलखंड बने उससे पहले किसी पहाड़ पर पहले अपनी मूर्ति तो उकेरवा लीजिए । वैसे समय का कुछ पता नहीं । ईराक में सद्दाम की मूर्तियों को तोड़ कर घसीटा गया । रूस में मार्क्स की मूर्तियाँ हटवा दी गईं । कुछ निराशावादी लोग कहते हैं-
बादे फ़ना फजूल है नामो निशाँ की फ़िक्र
जब हम नहीं रहे तो रहेगा मज़ार क्या ।
पर इतनी सी बात के लिए वर्तमान कर्तव्य को तो नहीं छोड़ा जा सकता न ।

इसलिए भले ही आपसे जलने वाले कुछ लोग इसका विरोध करें । पर हम पूरे मन से आपके साथ हैं । अगर ज़रूरत हो तो हम आपका मुक़दमा भी लड़ सकते हैं पर क्या बताएँ हमारे पास डिग्री नहीं है । फिर भी हम आपके पक्ष में लेख तो लिख ही सकते हैं । पर सारे अखबार और पत्रिका वाले तो मनुवादी हैं । आपके पक्ष में हमारा लिखा हुआ कौन छापेगा । पर हम छपने के लिए सत्य के साथ समझौता तो नहीं कर सकते ।

इस सन्दर्भ में हम आपको यह भी बताना चाहते हैं कि हमने कई महीनों पहले आपको एक पत्र लिखा था जिसमें हमने बताया था कि कैसे मूर्तियाँ लगवाने और उनकी रक्षा के लिए गार्ड नियुक्त करके किस प्रकार देश की बेरोज़गारी की समस्या हल की जा सकती है । पहले तो हम यही सोचते रहे कि पत्र आपके तक पहुँचा नहीं होगा इसीलिए तो कोई कार्यवाही नहीं हुई । और बेकार में ही डाक विभाग वालों को दोष देते रहे । हम उनके भी आभारी हैं कि उन्होंने पत्र पहुँचा दिया । और आपके भी कि आपने ऐसे अच्छे सुझाव को महत्व देकर उस पर ठोस कार्यवाही भी की ।

क्या इस उपलब्धि के प्रचार के लिए, बेरोजगार व असुरक्षित लोगों के कल्याण की योजनाओं पर समर्थन जुटाने के लिए एक अखबार नहीं निकाला जा सकता ? हमारी प्रतिभा का अनुमान तो आपको हमारे सुझावों से हो ही गया होगा । हमसे अधिक योग्य व्यक्ति ऐसे अखबार के लिए और कौन हो सकता है । हम इसके लिए अपनी संपादकीय सेवा देने के लिए तैयार हैं । संपादकों ने हमारी बहुत सी रचनाएं लौटाई है । हम उनसे तो बदला नहीं ले सकते पर यह कुंठा किसी और पर तो उतार ही सकते हैं ।

२-२-२०१०



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