Apr 10, 2026

2026-04-08 ढोल और सौभाग्य


2026-04-08 

ढोल और सौभाग्य 






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आज तोताराम आते ही शुद्ध सनातनी की तरह ज्योतिष और वास्तु में हर समस्या का समाधान बताने वाले आजकल के प्रपंची संतों की तरह बोला- 

नृपस्य चित्तं, कृपणस्य वित्तं, मनोरथाः दुर्जनमानवानाम्। 

त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यं, देवो न जानाति, कुतो मनुष्यः॥

प्रिय भक्तो,  इसका अर्थ है कि राजा का मन (निर्णय), कंजूस का धन, दुष्टों के विचार, स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य- इन पाँचों को समझना स्वयं देवताओं के लिए भी कठिन है, तो मनुष्य की क्या बिसात वह तो कुत्ता होता है ।  

हमने कहा- आजकल के अनपढ़ बाबाओं की तरह संस्कृत की आड़ में भारतीय वांग्मय के बकवासी अर्थ मत कर । हमारी डिग्रियाँ कोई नकली या एन्टायर एम ए वाली नहीं हैं । किसी कोचिंग इंस्टीट्यूट के प्रश्नोत्तरों का रट्टा लगाकर नहीं कबाड़ी है । जैसे मोदी जी चाय विक्रय, भिक्षाटन और ज्योतिष के सालिड ज्ञान के बल पर आगे बढ़े हैं, वैसे ही हमने असली टेक्स्ट बुक्स पढ़कर अपने उत्तर तैयार करके प्राप्त की है । तू अंतिम दो शब्दों का अनर्थ कर रहा है । 

‘कुतो’ का अर्थ कुत्ता नहीं बल्कि ‘कहाँ’ होता है । मतलब जब देवता ही नहीं समझ सकते तो मनुष्य ‘कहाँ’ से समझेगा ? अर्थात मनुष्य में तो इतनी बुद्धि होने का प्रश्न ही नहीं उठता । यह सच है कि अगर लंपटता की दृष्टि से देखें तो पुरुष कुत्ता ही ठहरता है । पहले अप्सराओं के लिए तपस्या किया करता था और आजकल भी दान-पुण्य, तीर्थ-व्रत हूरों और अप्सराओं के लालच में करता है । आजकल भी तो तरह तरह की देशी-विदेशी एपस्तीनी फ़ाइलें खुल रही हैं जिन्हें केरल, कश्मीर फ़ाइलों की आड़ में छुपाते छुपाते भी फ़ाइलें हैं कि खुली ही जा रही हैं और तथाकथित संस्कारी ब्लेकमेल हुए जा रहे हैं । 

बोला- पता नहीं, क्यों मेरा ही राम निकल जाता है जो तुझसे अपने मन की बात, सुख-दुख, जिज्ञासाएँ साझा करता हूँ । अच्छा हो चाय पीकर चुपचाप निकल लूँ । मैं तो पंजाब के नवाँ शहर के गुरुचरण की बात कर रहा था कि जिसका लॉटरी में पूरे डेढ़ करोड़ का इनाम निकला है । 

हमने कहा- तोताराम, यह लॉटरी का धंधा कभी जनता के फायदे का नहीं होता । 10 करोड़ के टिकट बेचकर दो करोड़ के इनाम निकाल देते हैं । कमाई लॉटरी का धंधा करने वालों की और पैसा जनता का । सभी धंधा करने वाले इसी तरह लोगों को उल्लू बनाते हैं । चुनावों में दो हजार रुपए का आश्वासन देकर जीत जाते हैं ।  कुछ लोगों को दो सौ पकड़ा कर तरह तरह नियमों की आड़ में पल्ला झाड़ लेते हैं । और फिर महंगाई बढ़ाकर उससे दोगुना फिर खींच लेते हैं ।साथ ही इससे भाग्यवाद को बढ़ावा मिलता है जो किसी समाज को पुरुषार्थ से दूर ले जाता है । ऐसे समाजों में ही धार्मिक स्थान और धर्म का धंधा और धर्म की राजनीति अधिक मिलते हैं । तभी ऐसे देशों में सरकारें स्कूल, कॉलेज, कारखाने आदि बनाने की बजाय मूर्तियाँ, धार्मिक कॉरीडोर आदि पर खरबों रुपया लुटाती हैं और अरबों डकार जाती हैं । ऐसे ही कोचिंग सेंटर वाले हजारों छात्रों से करोड़ों फीस ले लेते हैं और फिर दस-बीस झूठे सच्चे सलेक्टेड बच्चों का विज्ञापन करके फिर नए छात्रों को जुटा लेते हैं ।  

बोला- मुझे अब चाय भी नहीं पीनी । मैं चलता हूँ । मैं कोई लॉटरी का टिकट बेचने थोड़े ही आया था ।  

हमने कहा- फिर भी तोताराम, हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभव से ज्ञान की बहुत सी बातें एक साथ इतने बढ़िया ढंग से कही हैं कि बस । अब देख राजा के बारे में कहा है कि राजा हजार ‘मन की बात’ करे लेकिन उसके मन का कुछ पता नहीं चलता । जाने कब कहाँ, कितना टेरिफ़ बढ़ा दें, कब नोटबंदी कर दे । इसी तरह कंजूस आदमी का कुछ पता नहीं चलता । कब किसी बैंक से लोन लेकर खुद को दिवालिया घोषित करके हजारों करोड़ लेकर विदेश भाग जाए । इसी तरह दुष्ट का कोई ठिकाना नहीं कि कब किस नेकी का बदला बदी से चुका दे । कब लालच में अपनी पितृ पार्टी को छोड़कर सत्ताधारी पार्टी में चला जाए । लेकिन पुरुष के मामले में भाग्य की बात से हम सहमत नहीं हैं क्योंकि जिसे भाग्य कहा जाता है वह या तो संयोग है या फिर सिंधिया, अशोक चव्हाण, शुभेन्दु अधिकारी, चिराग पासवान, हिमन्त बिस्वा आदि की सफलता एक शुद्ध सौदा है ।  लेकिन स्त्रियों पर लगाए गए इकतरफा आरोप से हम सहमत नहीं हैं ।  

बोला- क्यों ?

हमने कहा- क्योंकि इसमें स्त्री की अकेली की ही गलती नहीं होती । उसे पुरुष भ्रष्ट करता है । क्या अहिल्या अकेली ही दोषी थी ? क्या उसमें गौतम द्वारा उसकी जरूरतों को न समझना और इन्द्र की लंपटता का कोई रोल नहीं था ?

बोला- लेकिन ऋषि मुनि तो अप्सराओं के पास नहीं जाते थे । वे ही तरह-तरह से लुभाकर उनका तप भंग करती थीं । 

हमने कहा- वे क्या करें । वे कौन अपनी मर्जी से आती थीं । उन्हें तो इन्द्र की एप्सटीन फ़ाइल के तहत आना पड़ता था । 

बोला- तो ढोल का सौभाग्य से कोई संबंध हो सकता है क्या  ?

हमने कहा- यह तुमने एक वैज्ञानिक प्रश्न पूछा है । विज्ञान है ही कार्य-कारण का संबंध जानने का नाम । एक होता है अपनी रोटी-रोजी के लिए किसी के लिए भी एक तय रकम के बदले ढोल बजाने वाला । उसकी सीमित आमदनी होती है । दूसरा होता है किसी के एजेंडे के तहत ढोल बजाने वाला जैसे विदेशों में प्रभु के स्वागत में हो-ही, हो-ही चिल्लाने वाला । वह कैजुअल लेबर की तरह होता है । ढोल बजाओ । कभी किसी का तो कभी किसी का । ढोल  का धंधा न मिले तो किसी खास रंग के झंडे की रैली निकालो तो कभी किसी धार्मिक स्थान के आगे डी जे की धुन पर नाचो ।कोई पहचान नहीं ।  

सबसे सही वह होता है जो किसी पर भरोसा नहीं करता बल्कि अपना ढोल खुद बजाता है । हो सकता है कुछ समय कुछ भी न मिले लेकिन जब मौका लग जाता है तो वारे-न्यारे हो जाते हैं । सड़क से सीधा संसद पहुँच जाता है । इसीलिए तुमने देखा होगा कि अच्छे भले इंजीनीयर, डॉक्टर अपना काम छोड़कर अपने खर्चे से बड़े सेवकों के होर्डिंग लगवाते हैं, उनके जन्म दिन पर अखबारों में बधाई संदेश छपवाते हैं, यात्रा-रैली निकालते हैं, सम्मेलन करवाते हैं । और एक दिन सेवा का अवसर पा ही जाते हैं । 

सेवा का मतलब तो तू समझता ही है । बकवास करो और जनता के टेक्स के पैसे की बंदरबाँट में शामिल हो जाओ । 

-रमेश जोशी 



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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

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