Jun 7, 2026

07-06-2026 सर फोड़ना


07-06-2026 


सर फोड़ना 





आज तोताराम कुछ उदास था । कई देर चुपचाप बैठे रहने के बाद बोला- मास्टर, तू अगर मज़ाक न उड़ाये तो एक बात कहूँ ? आज मेरा रोने को जी कर रहा है । क्या तेरे कंधे पर सिर रखकर रो लूँ । हमारे प्रभु को तो अपने सात समुद्र पार के प्रभु की स्नेहिल डांट झेलने से ही फुरसत नहीं है । ऊपर से अपना रोना ही पूरा नहीं होता तो हमारा रोना क्या सुनेंगे ? 


हमने कहा- तोताराम, हम सब मनुष्य हैं । सबकी अपनी अपनी समस्याएं हैं, सुख -दुख हैं । आते जाते रहते हैं । एक दूसरे के साथ मिल बाँटकर, रो-धोकर कर जीवन काट लेते हैं । कुछ नहीं तो अपना कंधा तो तुझे दे ही सकते हैं । रो ले, जी हल्का हो जाएगा । वैसे  कल कोक्रोचों के दिल्ली में प्रदर्शन में शामिल हुए वांगचुक ने कहा है कि घर पर रोने से अच्छा है सड़क पर उतरें । तो चल, हम दोनों जयपुर रोड़ पर या कलेक्ट्रेट के सामने चल कर रोयें । क्या पता, किसी का दिल ही पसीज जाए । 


बोला- इस जमाने में किसी का दिल पसीजने वाला नहीं है। इसीलिए पाँच सौ साल पहले ही रहीम जी कह गए हैं- 


रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो गोय । 

सुन अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लैहैं कोय ।। अपना दुख मन में छुपा कर रखो। कोई मदद नहीं करेगा, सब मज़ाक उड़ाएंगे । 


तभी तो सोनिया गाँधी ने अपने जीवन के अनेक हृदयविदारक कष्ट दिल पर पत्थर रखकर चुपचाप सह लिए । क्या मिला इस देश से उसे । पहले देवर का निधन, फिर सास और पति की हत्या और स्वयंसेवी निंदकों से निरंतर निंदा- कभी बार बाला, कभी जर्सी गाय, कभी काग्रेस की विधवा । उसने अपनी जीवनी में एक पत्र में लिखा हैं- मैंने जितना जीवन राजीव के साथ बिताया है उससे अधिक जीवन इस देश में उनके बिना बिता दिया है । अगर आपको मुझसे शिकायत है तो मुझे मेरा राजीव लौटा दो, मैं इटली लौट जाऊँगी । और अगर नहीं लौटा सकते तो मुझे शांति से यहाँ की मिट्टी में मिल जाने दो । 


हमने कहा- लेकिन दुख को चुपचाप सह लेने और घर में बैठकर रो लेने से क्या फायदा हुआ ? मोदी जी को देख, अपनी गरीबी, चाय विक्रय और चतुराई से हथियाये गए ओ बी सीत्व का कार्ड खेलकर प्रधानमंत्री बन गए और अब अपनी माँ का अपमान और गालियों का कार्ड खेलकर चुनाव जीत रहे हैं । इसलिए रोओ, नकली आँसू निकालकर रोओ, दिखा दिखाकर रोओ ।घड़ियाली आँसू रोओ ऐसे आँसू नहीं निकलें तो ग्लिसरिन लगाकर रोओ ।  


बोला- लेकिन मोदी जी के पास तो गोदी मीडिया है, जनता के टेक्स का हराम का पैसा है । मैं कैसे रोने के लिए अखबार में फुल पेज का विज्ञापन छपाऊँ । वे तो मन की बात की आड़ में भी कोई न कोई मतलब का एंगल निकाल लेते हैं ।


हमने कहा- देखो गालिब ने भी यही कहा है कि अपने दुख का हाला मचाने में शर्म मत करो । जहाँ भी मौका मिले दुख को भुनाओ । जिस तिस की चौखट पर सिर फोड़ो । वह कहता है- 


वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क जब सर फोड़ना ठहरा

तो फिर ऐ संग-ए-दिल ! तेरा ही संग-ए-आस्तां क्यों हो 


इसी ट्रिक को ही सभी धर्म भी अपनाते हैं क्योंकि धर्मों के पास आपकी दुनियावी समस्याओं का कोई हल नहीं है बल्कि कहीं न कहीं धर्म ही आपकी समस्या है ।  सभी धर्म सभी समस्याओं का एक काल्पनिक हल बताने का धंधा हैं इसीलिए वे भी आपको सिर फोड़ने के लिए तरह तरह की सुविधाएं उपलब्ध करवाते हैं जैसे हिंदुओं को सिर फोड़ने के लिए मूर्तियाँ और शिवलिंग, मुसलमानों के लिए काबे का काला प्रस्तर का ढांचा,  यहूदियों के लिए रोने के लिए ‘विलाप की दीवार’, ईसाइयों के लिए तरह तरह के क्रॉस ।सरकारें भी तो किसी जाति के वोट लेने के लिए, उनके लिए शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार की सुविधा मुहय्या करवाने की बजाय  अलग अलग जातियों के लोगों के लिए उनके महापुरुषों की मूर्तियाँ स्थापित करवा देती हैं । रोओ और फोड़ो सिर और हमें जिताते रहो चुनाव । ज्यादा ही कष्ट है तो चलो तुम्हारे नेता के जन्म दिन को राजकीय अवकाश घोषित कर देते हैं । 



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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

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