20-06-2026
बही लिख लिख के क्या होगा
आज तोताराम ने आते ही कहा- मास्टर, यह कांग्रेस भी कम नहीं ?
हमने कहा- कम ही है । कभी देश के सभी राज्यों में जिसकी सरकारें थीं, बिना किसी को गाली निकाले, बिना हिन्दू-मुसलमान किये केवल नेहरू जी के नाम से दो बैलों के निशान पर वोट मिल जाते थे वह बड़ी मुश्किल से विरोधी दल के दर्ज़े को पा सकी है । राम राम करके तीन चार राज्यों में सरकार है । अब और इससे क्या कम होगी ।
बोला- मैं सीटों और सत्ता की बात नहीं कर रहा हूँ । कुचरणी करने के मामले में कह रहा हूँ कि कांग्रेस भी कम नहीं । उसके पास ईडी नहीं है, यूएपीए नहीं है फिर भी कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा है कि जिस संगठन के लाखों करोड़ों अनुयायी हैं, अरबों का फंड जिसके पास है, जो दुनिया के अनेक देशों में फैली हुई है और जिसका सदस्य हुए बिना कोई इस देश का प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या और किसी बड़े पद पर नहीं बैठ सकता, जिसके प्रधान को फ्री में जेड प्लस सुरक्षा मिली हुई है और प्रधानमंत्री के अनुसार जो दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है उसे अपना हिसाब किताब देना, बताना चाहिए, आय-व्यय और गतिविधियों के लेख जोखा सार्वजनिक करना चाहिए । क्यों वह एक रहस्यमय संगठन की तरह काम करता है ।
हमने कहा- इसमें क्या बुराई है ? पारदर्शिता तो ईमानदारी का प्रमाण है । इसीसे कोई संगठन विश्वसनीय बनता है ।अगर कोई संगठन अपनी गतिविधियां, योजनाएं, हिसाब-किताब गुप्त रखता है तो वह संदेहास्पद हो ही जाता है जैसे कि तालिबान, माओवादी आदि । जब पैसा इकट्ठा करते हैं, जुलूस-जलसा करते हैं, मीटिंग-मंत्रणा करते हैं तो किसी से क्या छुपाना । गाँधी जी तो जब भी कोई कार्यक्रम, आंदोलन, जलसा-जुलूस आदि करते थे तो बाकायदा अंग्रेज सरकार को सूचित करते थे कि अमुक स्थान पर इतने लोग इस समय इस प्रकार से आंदोलन करेंगे । अब ऐसे में अंग्रेज उन्हें किस आधार पर दंडित करें । उन्हें कैसे अलोकतांत्रिक सिद्ध करें । ऐसे में उन पर अत्याचार करें तो दुनिया में बदनामी । इसी सच्चाई और पारदर्शिता के कारण उनका आंदोलन सत्याग्रह कहलाया जिसने दुनिया में प्रतिरोध का एक नया विमर्श स्थापित किया । यही गाँधी की महानता थी जिसे दुनिया ने स्वीकार किया । आज भी हमारे पास दुनिया के सामने अपने परिचय के लिए गाँधी और बुद्ध के अतिरिक्त कोई दूर दूर तक दिखाई नहीं देता ।
बोला- लेकिनसंघ है तो एक परिवार ही जिसका कोई भी सदस्य अगर किसी को कुछ देता है तो किसी को क्या परेशानी है । देने वाला गुरु दक्षिण देने से पहले टेक्स तो दे ही चुका है । फिर क्या बार बार टेक्स लिया जाएगा ?
हमने कहा- टेक्स तो बार बार नहीं लिया जाएगा लेकिन जब जनता का पैसा है, इतना बड़ा बजट और संगठन है, देश दुनिया में मान्यता है तो हिसाब रखना और देना अच्छा ही है । पारदर्शिता से संगठन का सम्मान और बढ़ेगा ।
बोला- जो संस्कारी होते हैं वे अपने दान-दक्षिणा का ढोल नहीं पीटते हैं । वे गुप्त दान में विश्वास करते हैं ।
हमने कहा- फिर भी हिसाब किताब तो हिसाब किताब ही होता है । मंदिर में चढ़ावे का भी हिसाब रखा जाता है । इससे मंदिर का सम्मान बढ़ता है और अगर चढ़ावे कुछ गड़बड़ी दिखाई देती है तो सम्मान में कमी आती है जैसे आजकल राम मंदिर की विश्वसनीयता खतरे में पड़ी हुई है । गाँधी जी के आश्रम में अगर किसी दिन हिसाब किताब में एक पैसे का भी अंतर होता था तो खजांची को अपनी जेब से जमा करवाकर हिसाब ठीक करना होता था । यह दंड के बतौर नहीँ बल्कि पारदर्शिता के लिए जरूरी था ।
बोला- लेकिन संघ में तो गुरुदक्षिणा होती है । अब पति-पत्नी, गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र आदि के संबंधों का भी कांग्रेस हिसाब मांगेगी ? फिर क्या शालीनता रह जाएगी इन पवित्र रिश्तों में । हमारा दर्शन तो कहता है- बही लिख लिख के क्या होगा यहीं सब कुछ लुटाना है । सजन रे झूठ मत बोलो ।
हमने कहा- लेकिन अगर हिसाब देने से सच की स्थापना होती है तो हिसाब मांगा और दिया भी जाना चाहिए । राम ने तो एक धोबी के अपने खुद में घर में रात को अपनी पत्नी के साथ झगड़े में सीता के बारे में प्रवाद करने मात्र से सीता को त्याग दिया । हालाँकि सीता की समस्त सुरक्षा का प्रबंध भी किया लेकिन राजधर्म की स्थापना और जनता के विश्वास को कायम रखने के लिए जो किया वह भी जरूरी था । इसलिए अगर दाढ़ी में तिनका या मन में चोर नहीं है तो हिसाब देने में क्या बुराई है ।
हमारे यहाँ तो ईडी आएगी तो हम बचने के लिए भाजपा में जाने की बजाय हिसाब देना बेहतर समझेंगे क्योंकि हमारे दिल में चोर नहीं है ।
आगे तुम जानो, तुम्हारी सरकार है जिसे चाहो देशद्रोही बताकर जेल में डाल दो और दस दस साल तक केस ही टेबल पर मत आने दो या चाहे जिस बलात्कारी को साल में छह महिने बेल और फरलो दे दो ।
विवाह खुल्लम खुल्ला, धूम-धड़ाके से होता है, कार्ड छपते हैं, अनेक लोग गवाह होते हैं, उसका पंजीकरण होता है । हाँ, अवैध संबंधों को छुपाया जाता है । वैसे आजकल तो ‘लिव इन’ का भी रजिस्ट्रेशन होने लगा है ।
बोला- जब हिन्दू धर्म ही रजिस्टर्ड नहीं है तो हिंदुओं की संस्थाओं का कैसा रजिस्ट्रेशन ?
हमने कहा- रजिस्ट्रेशन तो जैन, बौद्ध, ईसाइयत, इस्लाम किसी भी धर्म का नहीं है तो क्या वे कानून से ऊपर हो जाएंगे ? किसी के प्रति उनका कोई दायित्व नहीं ? ईसाइयों को विदेशी मिशनरी चंदे और मस्जिदों को पेट्रो डॉलर से जोड़ा जाता है कि नहीं ? लेकिन सब चंदे चिट्ठे का हिसाब रखते हैं । विदेशों में संघ के संगठन ‘हिन्दू सेवक संघ’ के नाम से रजिस्टर्ड है और जिनसे उसे डॉलर में चंदा मिलता है । कम से कम उसका हिसाब तो फेरा के तहत दिया ही जाना चाहिए ।
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
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