
किसी गाँव में एक सज्जन रहते थे । देखने में मोटे-ताज़े थे, ताक़त के बारे में राम जाने । उन्हें अपने पहलवान होने का भ्रम था । वे जहाँ भी उठते-बैठते, अपनी पहलवानी की डींगें हाँका करते थे, यह बात और है कि मोहल्लेवाले उनकी असलियत जानते थे । वे अपने गले में एक मोटी चेन पहना करते थे । लोग कहते- भाईसाहब, ज़माना ख़राब है । इतनी कीमती चीज़ पहनना आफत बुलाना है । पता नहीं, कब क्या हो जाए । वे सीना फुला कर कहते- किसकी हिम्मत है जो हमारी गर्दन पर हाथ डाल सके । एक दिन लोगों ने देखा कि उनके गले में चेन नहीं है, बोले- हम कहते थे ना, अब डाल दिया न किसी ने गर्दन पर हाथ ! वे पहले की तरह अकड़ कर बोले- किस साले की हिम्मत है जो हाथ डाल सके । चेन तो हमने ख़ुद ही अपने हाथों से उतार कर दे दी ।
सो अपने मन मोहन सिंह जी से कौन माई का लाल बाध्यकारी समझौता करवा सकता था । उन्होंने देश को दिया वचन बहादुरी से निभाया । किसी की लादी हुई बाध्यता को उन्होंने नहीं माना । २० प्रतिशत उत्सर्जन कम करने की बात तो उन्होंने अपनी मर्जी से घोषित की है । साँप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी । लाठी सलामत है । आगे किसी और साँप को मारने के काम आयेगी ।