ओबामा जी,
नमस्ते । ये मीडिया वाले भी बड़े फालतू लोग होते हैं । कहीं तो मरने जीने जैसी ज़रूरी बातों पर ध्यान नहीं देते और कहीं कुछ नेकनाम या बदनाम लोगों के गू-मूत तक के चर्चों से अखबार के फ्रंट पेज और टी.वी. के प्राइम टाइम को इतना भर देते हैं कि सारे घर में बदबू आने लगती है । पर क्या किया जाए । आदमी स्वाइन फ्लू और एड्स से बच सकता है मगर इनसे बचना मुश्किल है । हम यहाँ ऐसी बदबू फैलाने वाली चर्चा नहीं करने जा रहे हैं । हम तो आपको बताना चाहते हैं कि लोगों ने इसी बात का बतंगड़ बना दिया कि क्लिंटन दंपत्ति ने अपनी बेटी की शादी में ओबामा को नहीं बुलाया ।
हम तो कहते हैं कि अच्छा किया । अब एक महाशक्ति देश के राष्ट्रपति के पास यही काम है क्या कि शादियाँ अटेंड करता फिरे । छोटे-मोटे नेताओं की बात और है कि उन्हें कोई पूछता नहीं और न ही उनके पास कोई काम होता है सो वे तो इंतज़ार ही करते रहते हैं । कोई बुलाए या न बुलाए वे पहुँच ही जाते हैं । जैसे कि चंदा और वोट माँगने वाले शवयात्रा के साथ, कोई न कोई ग्राहक पकड़ने के लालच में, श्मशान घाट भी पहुँच जाते हैं । लोगों ने इस बात को इस तरह प्रोजेक्ट किया जैसे कि यह आपका अपमान है । अरे भई, ऐसी बातों में क्या अपमान और क्या मान । यह तो सबका निजी मामला होता है ।
हमारे यहाँ प्रियंका गाँधी की शादी हुई तो उसमें नरसिंह राव और नारायण दत्त तिवारी जैसे लोगों को भी नहीं बुलाया । मगर उन्होंने कोई बुरा नहीं माना । और घर के बाहर ही नाच कर लड्डू बाँटकर अपनी खुशी जाहिर कर ली । संवेदनशील और उत्साही लोगों को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता उन्हें तो खुश होना है सो हो लेते हैं । लोग तो कम्प्यूटर में देख कर काम चला लेते हैं । यहाँ तो शादी की मिठाइयों की खुशबू सात समंदर पार से भारत तक आ रही थी ।
हमारे यहाँ शवयात्रा और लड़की की शादी में जाना दोनों पुण्य के काम माने जाते हैं और इनमें निमंत्रण का इंतज़ार नहीं किया जाता । ये अवसर तो किसी की मदद करने के होते हैं । मगर आजकल तो शादी ही क्या अंतिम संस्कार तक के काम भी ठेके पर होने लगे इसलिए घरवाले भी पेंट की जेबों में हाथ डाले घूमते रहते हैं । पता ही नहीं चलता कि बन्दा घराती है या बराती । पहले उक्त दोनों ही कामों में लोगों की मदद की जरूरत पड़ती थी । और लोग लड़की की शादी में केवल काम करवाने जाते थे । खाने के समय जानबूझ कर खिसक लेते थे । पर आजकल तो लोग केवल खाने के लिए ही शादी में जाते हैं । आपने जब मनमोहन जी को पार्टी दी थी तब 'सलाही दंपत्ति' केवल दारू पीने ही चले आए, सारे सुरक्षा इंतजामों को धता बताकर ।
वैसे हम सोचते हैं कि आजकल आपके पास इतने काम हैं कि यदि निमंत्रण आता भी तो आपके लिए जाना कहाँ संभव हो पाता ? बड़े और राजनीतिक लोगों में बात आने-जाने की नहीं होती, बात होती है पालिसी की । सो आपको न बुलाने का फैसला किसी न किसी नीति के तहत ही लिया गया होगा । हम तो क्लिंटन साहब की जगह होते तो ऐसा पत्र लिखते कि आने वाला न तो आ ही सकता था और न ही यह कह सकता कि उसे बुलाया नहीं गया । जैसे कि लिख देते- “निमंत्रण भेज रहे हैं । आप आते तो हमें बहुत खुशी होती मगर आपके समय के महत्व और वर्तमान ज़रूरी कामों को देखते हुए बहुत ज्यादा आग्रह भी तो नहीं कर सकते । बड़े लोगों का तो आशीर्वाद ही बहुत होता है । शारीरिक उपस्थिति का क्या है, भाव महत्त्वपूर्ण होता है वैसे आप आ पाते तो वास्तव में बहुत खुशी होती” । आने लायक भी नहीं छोड़ा और शिकायत करने लायक भी नहीं छोड़ा ।
आपको भी निमंत्रण न मिलने से कोई शिकायत नहीं हुई होगी । हमें भी जब प्रियंका की शादी में नहीं बुलाया गया तो कोई शिकायत नहीं हुई । जमाना बदल गया है । अरुण नायर ने लिज़ हर्ले के साथ अपनी शादी में आपने बाप को भी नहीं बुलाया । उनकी पहले वाली शादियों के बारे में हमें पता नहीं । अमिताभ बच्चन ने भी अभिषेक की शादी में अपने गाँव के नजदीकी रिश्तेदारों को भी नहीं बुलाया और बहाना क्या बनाया कि बच्चे नहीं चाहते कि ज्यादा भीड़ हो । क्या मासूम बहाना है ? सुना है कि क्लिंटन दंपत्ति भी नहीं चाहते थे कि दूल्हा-दुल्हन के अलावा कोई और आकर्षण का केन्द्र बने । वैसे ठीक भी है । हमने कई बार देखा है कि जब गाँव में किसी की शादी में कोई छोटा-मोटा एम.एल.ए. भी आ जाता है तो लोग वर-वधू की बजाय नेता जी के साथ फोटो खिंचाने लग जाते हैं । पर चेल्सी के मामले में यह नहीं होता क्योंकि वहाँ आने वाले सभी बड़े लोग ही होते ।
खैर, जी न बुलाया न सही आपको और बहुत से काम हैं । अपन तो सभी को आशीर्वाद दें कि दूधों नहाओ, पूतों फलो । पर हमें इसमें कुछ और ही गंध आ रही है । इसे आप राजनीति की दृष्टि से समझ कर आगे की रणनीति बनाइएगा । भले ही आप अपने को मुसलमान नहीं मानते पर लोग तो एक कूटनीति के तहत आपको मुसलमान ही प्रचारित करते हैं । वैसे हमारे यहाँ पुत्र का धर्म पिता के धर्म के अनुसार होता है और फिर आपके नाम में हुसैन भी तो लगा हुआ है और फिर आप इफ्तार की दावत भी देने लगे हैं और अब तो ग्राउंड ज़ीरो के पास एक मस्जिद का भी विरोध नहीं कर रहे हैं । और फिर दूल्हा भी यहूदी है । यहूदियों और मुसलमानों का तो सदा से साँप और नेवले का सम्बन्ध है । और आपको याद होगा कि आपके सामने हिलेरी जी ने पार्टी केंडीडेट का चुनाव भी लड़ा था जिसमें आपके कीनियाई ड्रेस वाले फोटो को भी चुनावी लाभ के लिए काम में लिया था । और फिर भले ही लाख रंगभेद का पक्ष न लेने की बात करें, मगर गोरे लोगों में आज भी काले लोगों को लेकर एक ‘कोम्प्लेक्स’ है । हमने तो वैसे ही बता दिया । जानते तो आप भी सब कुछ हैं । हमारे देश ने भी अंग्रेजों के राज में इस भेदभाव को बहुत झेला है । और आज भी कौन सा यह भेद-भाव खत्म हो गया ?
आप भी भारतीय राजनीति की तरह सर्व-धर्म-समभाव के रास्ते पर चल रहे हैं पर यह रास्ता बहुत कठिन है । जोड़ने का हर रास्ता कठिन होता है । तोड़ने का क्या है । तोड़ने के तो हजार बहाने हैं ।
१०-८-२०१०
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.Jhootha Sach
हिलेरी जी,
नमस्ते । हमने महात्मा गाँधी की पुण्य-तिथि पर अखबार में समाचार पढ़ा और फोटो भी देखे । आप सार्कोजी जी के निवास 'एलिसी पेलेस' में प्रवेश कर रही थीं कि पता नहीं, कैसे आपका जूता गिर गया । यह कोई आतंकवादी गतिविधि नहीं थी । अच्छा हुआ कि सार्कोजी जी ने आपको थाम लिया वरना तो पैर में मोच आ ही जाती । ऊँची एडी के सेंडिलों में यही एक खराबी है कि ज़रा सा बेलेंस बिगड़ा नहीं कि पैर में ऐसी मोच आती है कि बस कुछ पूछिए ही मत । और फिर आपका काम ठहरा सारी दुनिया में घूमना । सवेरे पेरिस में तो दोपहर अफगानिस्तान में, वहाँ की रिपोर्ट लेकर शाम को फिर वाशिंगटन । क्या ज़िंदगी है । भले ही कहीं भी जाओ, कैसे भी सुविधाजनक होटल में रुको, कितना भी टी.ए., डी.ए. मिले पर घर का सुख तो घर का ही होता है । पर क्या किया जाये, देश और मानवता की सेवा तथा विश्वशांति के लिए महान लोग कष्ट उठाते ही हैं । यह कोई बड़ी घटना नहीं है पर मीडिया वालों को तो अपना अखबार बेचना है इसलिए, जिसका दुनिया के भले-बुरे से कुछ भी सम्बन्ध भले ही न हो पर बतियाने के लिए लोगों को कुछ न कुछ मिल जाये, ऐसा कुछ न कुछ, परोसते ही रहते हैं । यह दुनिया बातों से ही अपना दिल बहला कर जी रही वरना उसके लिए स्वार्थी राजनीति ने कुछ छोड़ा ही नहीं है ।
अरे भई, जूता निकल गया, आपने उसे उठाकर फिर पहन लिया । आदमी दिन में दस बार जूते उतारता है और पहनता है । यह भी कोई समाचार है । पर बड़े लोगों और वे भी अमरीका के, उनका छींकना, खाँसना भी दुनिया को इधर-उधर कर सकता है । अच्छा हुआ कि जूता वहीं गिरा और सही सलामत मिल गया वरना तो खिसकी चीज़ वापिस कहाँ आती है ? हमें इस बारे में कुछ नहीं कहना । पर यह भी है कि किसी घटना से आदमी को अपने अनुभव याद आ जाते हैं और फिर तो दिमाग चलने लग जाता है ।
एब बार दिल्ली में बस से उतरते हुए हमारी एक चप्पल बस में ही छूट गई । हम चिल्लाते ही रह गए पर बस वाले ने हमारी फ़रियाद नहीं सुनी । हम कई दिनों तक उसी समय उस बस को देखने स्टेंड पर जाते । लोगों ने पता नहीं क्या-क्या नहीं कहा । कइयों ने तो यहाँ तक आरोप लगा दिया कि मास्टर पता नहीं, किसके चक्कर में बस स्टेंड पर खड़ा दिखता है । हालाँकि हमारी चप्पल डेढ़ सौ रुपये की ही थी पर हमारे लिए तो उस समय डेढ़ सौ भी बहुत थे । चूँकि एक ही जोड़ी थी सो उसी समय नई खरीदनी पड़ी । सुनते हैं कि बड़े लोगों के पास तो बीस-तीस जोड़ी जूते होते हैं और एक जोड़े की कीमत कई हज़ार रुपये होती है । खैर जी, भगवन का शुक्र है कि न तो चोट आई और न ही जूते को कोई नुकसान पहुँचा ।

हमारे यहाँ मंदिर में जूते उतार कर जाना पड़ता है । बड़े लोगों को दर्शन कराने में तो पुजारी भेदभाव कर जाते हैं पर जूते उतारने के मामले में कोई रियायत नहीं होती । आपके तो चर्च में भी लोग जूते पहन कर चले जाते हैं । सर्दी भी तो बहुत पड़ती है । अगर जूते उतारने की शर्त रख दी जाये तो हो सकता है कि सर्दी-सर्दी लोग चर्च में ही न जाएँ ।
जब बुश यहाँ आये तो उनका राजघाट जाने का प्रोग्राम भी बना और जब बुश साहब कहीं जा रहे हैं तो सुरक्षा चेकिंग तो तगड़ी होगी ही । और ऊपर से 9/11 का कटु अनुभव । हालाँकि गाँधी जी ने अंग्रेजों को सत्याग्रह से ही भगाया था पर जिसने इतने बड़े साम्राज्य को परेशान कर लिया उसके पास पता नहीं व्यापक विनाश का कौन सा नया हथियार निकल आये । सो राजघाट पर सुरक्षा चेकिंग के लिए आपके वहाँ के कुत्ते और सुरक्षा अधिकारी गए । हालाँकि वेतन और सुविधाओं को देखते हुए तो वे कुत्ते भी किसी अधिकारी से कम नहीं थे । वे सभी गाँधी जी की समाधि पर जूतों सहित चढ़ गए । लोगों ने बड़ी आलोचना की क्योंकि वे यह नहीं जानते कि आप लोगों के यहाँ जूते उतारने की आदत नहीं है । पर मेरे ख्याल से किसी की समाधि पर तो वहाँ भी लोग जूते लेकर क्या चढ़ते होंगे ।
हमारी मंशा कहीं भी इस घटना से मज़े लेने की नहीं है । किसी की परेशानी पर हँसना भला कहाँ की इंसानियत है । हम तो वैसे ही बात कर रहे हैं । हमें बचपन में अपने बड़े भाई के पुराने जूते पहनने के लिये दिए गए । जूते हमारे नाप के नहीं थे । बार-बार निकल जाते थे । अब हम दस बरस के बच्चे, जूते सँभालें कि अपना बस्ता । भाई साहब ने एक बड़ा सरल उपाय बता दिया । सो हम आपको भी बता देते हैं । जेब में थोड़ी सी रुई या कोई पुराना कपड़ा रखना चाहिए और जब भी लगे कि जूता ढीला है और निकल सकता है तो झट से जूता खोला, कपड़ा ठूँसा और फिर पहना और बस हो गया । ये हमारे देसी नुस्खे हैं । आप लोग क्या जानें ।
यह कोई बड़ी घटना नहीं थी । आप अब तक भूल भी गयी होंगी । पर हमारे ऐसी घटनाएँ बड़े दूरगामी प्रभाव रखती हैं । एक सुन्दरी का झुमका गिर गया और वह भी बरेली के बीच बाज़ार में । एक तो झुमका वैसे ही झूमता और चाहने वालों को झुमाता रहता है । हो सकता है कि झुमका नया-नया हो जिसे दिखाने के लिए सुन्दरी जान बूझ कर भी गर्दन हिला रही होगी । ऐसे में झुमके को तो गिरना ही था । अब मेडम, झुमके जैसी कीमती चीज और वह भी बाजार में, कहाँ मिलने वाली थी, ना मिली । अब आलम यह है कि पचास साल बाद भी वह आपको गाती मिल जायेगी- 'झुमका गिरा रे, बरेली के बाजार में' । अब कोई क्या करे, तुम्हारी गलती, तुम्हीं भुगतो ।
एक और भोली बालिका का किस्सा है । वह भी कोई पिछले पचास बरसों से चिल्ला रही है- 'ढूँढो-ढूँढो रे साजना, मोरे कान का बाला' । अब साजना अपना घर संभालें कि उसका बाला ढूँढे । पर वह है कि अब भी गा रही है- ढूँढो रे साजना । साजना अस्सी के हो गए हैं और वे सत्तर की । पर बाला का वह बाला है कि अभी तक नहीं मिला । हम मदद भी करना चाहते तो कैसे करते । हम तो उस समय बीस साल के नहीं थे । पर किसी ज़रूरतमंद की मदद करना इंसान का फ़र्ज़ तो है ही ।
हम मौके का इंतज़ार करते रहे । मौका भी आया पर उस समय हम सेवानिवृत्ति के करीब पहुँच चुके थे फिर भी हमने हौसला किया और उस करुण पुकार की तरफ दौड पड़े । बालिका चिल्ला रही थी- 'भरतपुर लुट गया हाय मोरी अम्मा' । हमने कहा- बालिके, घबराओ नहीं हम आ गए हैं । कौन है जिसने तुम्हारा भरतपुर लूटा है ? किधर भागा है? पर आश्चर्य, बालिका हँसने लगी और बोली- ताऊ, तू जा यहाँ से । यह भरतपुर ना तो अम्मा के बस का है और ना ही तेरे बस का । क्यों दाल-भात में मूसलचंद बन रहा है ।
अब देख लिया ना ? भलाई का तो ज़माना ही नहीं रहा । इसीलिए अब चाहे किसी का भरतपुर लुटे या रामपुर,अपन किसी के फटे में टाँग नहीं फँसाते । छोरी जाने और उसका भरतपुर जाने ।
पर आपका मामला दूसरा है । आप तो विश्व शांति के लिए भागी फिर रही हैं । अब जूता निकला या निकाला पर बाहर तो आ ही गया । अब इसका सदुपयोग कीजिए । जूते में बड़ी शक्ति है । जूते मार-मार कर अंग्रेजों ने भारत के सभी लोगों में भाईचारा पैदा दिया । अब उनके जाते ही हम किसी जूते के अभाव में फिर से बिखरने लगे हैं । एक नेत्री तीन वर्णों को चार जूते मारकर मुख्य मंत्री बन गई । एक पत्रकार ने गृहमंत्री पर एक जूता उछाल कर दो सांसदों की उम्मीदवारी केंसिल करवा दी ।
और जिन तालिबानों को पैसा देकर आप मनाने के लिए सोच रही हैं वे कोई ऐसे-वैसे नहीं है । आप क्या उन्हें जानती नहीं ? आपके ही तो सिखाये-पढ़ाये हुए हैं । अब हिम्मत है तो इस जूते से ही उनका इलाज़ कीजिए । वियतनाम की तरह मैदान छोड़ कर मत भागिए वरना तो लोग आप से डरना बंद कर देंगे ।
हमारे यहाँ तो कहावत है- 'लातों के भूत बातों से नहीं मानते' । आगे आपकी मर्जी । हम तो उत्तर पश्चिम से आने वाली इस आफत से, जैसे भी बन पा रहा है, निबट ही रहे हैं ।
२-२-२०१०
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.
Jhootha Sach