Jul 9, 2018

लाभान्वित, लाभार्थी और सकाम कर्म



लाभान्वित, लाभार्थी और सकाम कर्म

एक ज़माना था जब हम अखबारों, रेडियो और पत्र-पत्रिकाओं से मानक भाषा सीखते थे और अब आलम यह है कि बच्चों से कहना पड़ता है कि अखबारों की वर्तनी पर विश्वास मत करो |हो सके तो सच जानने के लिए शब्दकोश देखो |

हम अक्सर कोई गलती नज़र आने पर एक विश्वसनीय अखबार के संपादक को फोन कर दिया करते थे  |पहले तो एक-दो बार उन्होंने हमें इस बात के लिए धन्यवाद दिया |अब चिढ़ जाते हैं और हमारा नंबर देखकर फोन काट देते हैं |ठीक भी है, जब गलत वर्तनी और गलत शब्द प्रयोग के बावजूद अखबार की बिक्री बढ़ रही है तो बिना बात का 'हिंदी की हिंदी' का टेंशन क्यों लिया जाए |

आज जब अखबार में जयपुर में मोदी जी द्वारा सरकारी योजना का लाभ प्राप्त करने वाले दो-अढाई लाख लोगों से संवाद करने का समाचार पढ़ा तो माथा ठनका  |

और कोई तो हमारी सुनता नहीं तो जैसे ही तोताराम आया, हमने उसीको पकड़ लिया और पूछा- बता, मोदी जी कल जयपुर में 'लाभार्थियों' से मिले या 'लाभान्वितों' से ?

बोला-  लाभार्थी का अर्थ होता है - वह जिसे अभी लाभ मिला नहीं |वह लाभ के लिए प्रयत्नशील है |उसकी कामना कर रहा है, कोशिश में लगा है | जैसे अध्यापक पद का अभ्यर्थी |मतलब कि अभी उसने प्रार्थना-पत्र दिया है |अभी टेस्ट, साक्षात्कार आदि की प्रक्रिया चलेगी उसके बाद चयन होगा, नियुक्ति-पत्र मिलेगा , कार्यभार सँभालेगा तब अध्यापक बनेगा |तब उसे किसी अध्यापक भर्ती-योजना का 'लाभान्वित'  कहा जाएगा |एम.ए. की परीक्षा देने वाला परीक्षार्थी होता है |जब पास हो जाएगा तब एम.ए. कहा जाएगा |यदि किसी ने किसी योजना के तहत आवेदन दिया तो वह उस योजना का लाभार्थी है |जब उसे लाभ मिल जाएगा तो वह लाभान्वित हो जाएगा |कायदे से तो यह 'लाभान्वितों' से संवाद का कार्यक्रम था न कि 'लाभार्थियों' का |लेकिन इससे फर्क क्या पड़ता है ?

हमने कहा- मानो तो फर्क तो हर बात से पड़ता है |यह बात और है कि इस देश को किसी बात से फर्क नहीं पड़ता |कोई दो हजार करोड़ लेकर भाग जाए  या किसी लड़की से सरे आम बलात्कार हो जाए या भीड़ किसी को किसी भी बहाने से मार डाले तो भी |

बोला- ये जयपुर ले जाए गए लोग लाचार थे |लाभ-हानि से इनका कोई संबंध नहीं था |जिसे गैस कनेक्शन मिला उसे कहा- चल, नहीं तो तेरा कनेक्शन ख़त्म |जिसने अर्जी दे रखी थी उससे कहा- चल, नहीं तो कनेक्शन नहीं मिलेगा |
यह असल में चुनाव में पार्टी के टिकट और पद तथा प्रमोशन के लाभार्थी नेताओं और अधिकारियों का कार्यक्रम था | भाव को समझो, भंगिमा को पहचानो |जैसे सभी नदियाँ समुद्र में जाती हैं वैसे ही सब कुछ चुनाव-चक्र है |जब भेड़िया तिलक लगाने लगे तो समझो चुनाव नजदीक है |

हमने कहा-  किसी गरीब को जनता के पैसे से एक गैस कनेक्शन दे दिया तो उसके गले में पट्टा डालकर राजधानी में घुमाएँगे, फोटो उतारेंगे |

कहते हैं नेकी कर दरिया में डाल, निष्काम कर्म करो, विनम्र भाव से सेवा करो और यहाँ जनता के करोड़ों रूपए खर्च करके अपने छोटे से काम का ढिंढोरा पीटो |यह सकाम कर्म का निकृष्ट नमूना है |

बोला- याद रख, अब हर बुजुर्ग के माथे लिखवाया जाएगा- मोदी जी की कृपा से रेल में २५% छूट लेने वाला |


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Jul 7, 2018

मोदी, मगहर और तोताराम



   
मोदी, मगहर और तोताराम

आज तोताराम ने आते ही कहा- ज़रा, भाभी को बाहर तो बुला |

हमने कहा- अभी चाय लेकर आएगी तब बात कर लेना |यदि ज्यादा जल्दी है तो अन्दर जाकर मिल ले |

बोला- आज चाय नहीं पीनी | छह बजे की दिल्ल्ली वाली ट्रेन पकड़नी है | वहाँ से गोरखपुर की ट्रेन ले लूँगा |गोरखपुर से तो बस, ऑटो कुछ भी ले लो | घंटे पौन घंटे का रन है |  

हमने पूछा- तोताराम, यह क्या बात है ? वैसे तो तू हमसे हर छोटी-मोटी बात करता है लेकिन मगहर जाने का निर्णय कब ले लिया ?और क्यों ? कबीर तो  मरने से दो महिने पहले मगहर गए थे |काशी में मुक्ति का सस्ता सौदा बेचने वाले पाखंडियों को नंगा करने के लिए इस जिद पर गए थे कि जिसने अच्छे कर्म किए हैं उसकी मुक्ति में मगहर भी बाधा नहीं डाल सकता |फिर वे तो १२० वर्ष के लगभग होने को आए तब गए थे |उस उम्र तक पहुँचने में तो अभी चालीस-पैंतालीस साल बाकी है | यदि कबीर जी की तरह चालीस-पैतालीस साल और जीकर मोदी जी का विकास और जेतली जी बजट बिगाड़ना है तो कोई बात नहीं |लेकिन उससे पहले अस्सी में सवाई, नब्बे में ड्योढ़ी और सौ में दुगुनी पेंशन का जश्न तो यहीं हमारे साथ मना जा |

बोला- क्या मगहर जाने के लिए १२० वर्ष का होना ज़रूरी है ? मोदी जी भी तो गए हैं कि नहीं |अभी सत्तर के भी नहीं हुए हैं |

हमने कहा- अब चुनाव सिर पर आगे हैं इसलिए पूर्वी उत्तर प्रदेश और देश के विभिन्न भागों में फैले कबीरपंथियों, जिनमें दलित ही अधिक हैं, के वोट पटाने के लिए जाना पड़ा है |

बोला- वोट नहीं, कबीर के सादगी और सद्भाव के विचारों को फ़ैलाने के लिए उनके नाम पर अकादमी का शिलान्यास करने जाना ज़रूरी था |

हमने कहा- तोताराम, कबीर अकादमियों में पैदा नहीं होते |कबीर जन-सामान्य के बीच उनके दुःख-सुख में शामिल होकर सबकी मुक्ति में अपनी खोजने का नाम है | अपने अहंकार को मारकर, अपना सिर उतारकर भूमि पर रखने के बाद प्रेम के घर में प्रवेश करने का नाम है कबीर |

बोला- क्या समझते हो ? मोदी जी की कबीर के भक्त हैं | और हम मोदी जी के भक्त हैं |हम न तो मोक्ष के लिए अपना राज्य छोड़कर बनारस जाते हैं और न ही मोक्ष के लिए बनारस से चिपके रहते हैं |हम तो कर्म में विश्वास करते हैं |कर्म, कर्म और कर्म | कबीर जी ने भी तो कहा है- काल करे सो आज कर |

हमने कहा- जैसे कबीर का राम मंदिर और मंदिर की राजनीति में नहीं है वैसे ही कबीर न मगहर में है, न बनारस में है |वह तो चेतना के सतत जलते दीपक की रोशनी से जीव- जगत को प्रकाशित करते ज्ञान और उसके भक्तिपूर्वक आचरण में है |

बन्धु, जब और जहाँ तुम्हारी मर्ज़ी हो जाओ |अब कोई देश में इमरजेंसी थोड़े है | तुम्हारे कबीर के इस उद्धरण  के ज़वाब में हम तो यही कह सकते हैं कि सहज पके सो मीठा होय या रुत आए फल होय या जल्दी का काम शैतान का |ढंग से पका न होने पर खाना पेट ख़राब कर देता है |

बोला- और कितना इंतजार करें |सत्तर साल से तो लोगों ने विकास की टाँगें बाँध रखी है |आखिर देश कब तक विकास के लिए तरसता रहेगा ? हमें दशकों का काम वर्षों में करना है | 

हमने कहा- ठीक है | वैसे तूने जल्दी से जल्दी घास खुदवाने के चक्कर में लोहार से खुरपी अपने पंखों पर रखवा लेने वाले कौए की कहानी तो सुनी ही होगी |

बोला- कहानी लौटकर सुनेंगे |

और तोताराम चला गया |





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Jul 4, 2018

खुशामदी उत्साह के अतिरेकी प्रदर्शन की प्रतियोगिता



खुशामदी उत्साह के अतिरेकी प्रदर्शन की प्रतियोगिता 


आज तोताराम ने आते ही बड़ा अजीब प्रश्न किया- धींगामुश्ती वैद्यजी के क्या हालचाल  हैं ? 
हमने राज वैद्य, कविराज, भिषगाचार्य आदि शब्द तो सुने थे लेकिन यह 'धींगामुश्ती वैद्य जी' हमारे लिए नया शब्द था |अर्थ पूछा तो बोला- सुन-सुनाकर, बिना किसी उचित  और पूर्ण ज्ञान के काम करने वाले आधे-अधूरे लोगों के लिए है यह शब्द |इसे उर्दू में नीमहकीम भी कहते हैं|नीम भी त्रिफला की तरह रोगनाशक होता है |पर इस नीम का उस  नीम से कोई संबंध नहीं होता | 

ऐसे ही किसी वैद्य ने त्रिफला के अनन्त गुणों का वर्णन सुनकर किसी गाँव में जाकर अपनी बैदगी जमा ली | सबको हर बीमारी में त्रिफला दे देता |एक दिन उसके पास एक आदमी आया |उसकी भैंस खो गई थी |वैसे तो वैद्य जी ने ऐसी कोई बीमारी का नाम सुना नहीं था लेकिन लालच के मारे ग्राहक  को लौटाने का मन भी नहीं हुआ |सो उसे भी त्रिफला दे दी |और कुछ ज्यादा ही दे दी क्योंकि भैंस का मामला था |भैंस के मालिक को दस्त हो गए |

उन दिनों भारत अस्वच्छ नहीं था इसलिए 'स्वच्छ भारत' के तहत शौचालय वाली महामारी का फैशन भी नहीं चला था |इसलिए शुचिता के लिए घर से थोड़ा दूर जाना पड़ता था |संयोग ऐसा हुआ कि शाम को उसे गाँव के किसी खेड़े के पास खड़ी अपनी भैंस दिखाई दे गई |चमत्कारी इलाज | बैदगी जम गई |वैद्य जी पुज गए |

हमने पूछा- लेकिन इन नक्कालों को पहचानें कैसे ? 

बोला- आजकल देश में  'त्रिफला वैद्यंग' ही तो चल रही है | सभी समस्याओं- अराजकता, बेकारी और गरीबी के तीनों दोषों का 'त्रिदोषनाशक' एक ही इलाज चला हुआ है | अखबार,रेडियो, टीवी सबमें इन्हीं 'त्रिफला-वैद्यों' के विज्ञापन आते रहते हैं | स्वच्छ भारत : स्वस्थ भारत' मतलब शौचालय और है क्या ?|सब कुछ कृष्णार्पणम की तरह सब कुछ शौचालयं | गाँधी जी के  'सत्याग्रह' जैसे महान शब्द को भी हथियाकर 'स्वच्छाग्रह' बना लिया |थोड़े दिनों में इसे 'शौचाग्रह' भी बनाया जा सकता है | 
कोई यह भी नहीं कह सकता कि शौचालय बनाना अच्छी बात नहीं है | कोई यह प्रश्न भी नहीं कर सकता कि जब खाने को ही कुछ नहीं होगा तो शौचालय की ज़रूरत ही क्यों पड़ेगी | यह देश अब तक इन बंद और कमरेनुमा शौचालयों के बिना कैसे  स्वस्थ और जीवित रह लिया ?|

कौन तर्क करे कि पहले मुर्गी थी या अंडा ? मनुष्य ने भोजन पहले किया या पहले शौच गया ?इसलिए बस एक ही काम चल पड़ा है- शौचालय |एक-एक दिन में लाखों शौचालय बन रहे हैं |ज़मीन पर या कागज पर, पता नहीं |

send photo with toilet, then get salary

हमने कहा- बात तो सही है |आज कल जिसे देखो शौचालय में ही घुसा हुआ है |उत्तर प्रदेश के सीतापुर के जिला मजिस्ट्रेट ने आदेश दे दिया कि जब शौचालय के साथ फोटो भेजोगे तभी तनख्वाह मिलेगी |जैसे कि तनख्वाह काम करने की नहीं, शौच जाने की मिलती है |अपनी सक्रियता के लिए नाम कमा चुकी किरण बेदी ने पुदुचेरी की राज्यपाल की हैसियत से शौचालय न बनवाने वालों का सस्ता अनाज बंद करने का फरमान जारी कर दिया |बिहार में उत्साही पंचायत और नगरपालिका के अधिकारियों ने गांवों में खुले में शौच करने वालों के विरुद्ध 'लुंगी खोल' अभियान चलाया जा रहा है |कूड़ा फ़ैलाने वाले सफ़ेद झक्क कपड़े पहनकर झाड़ू लगाते हुए फोटो खिंचवाकर ऊपर भिजवा रहे हैं |'मन की बात' सुनने के प्रमाणस्वरूप फोटो छपवाकर ऊपर भिजवाए जा रहे हैं |आचरण का कोई हिसाब-किताब नहीं है |

अब तो अनुष्का शर्मा का किसी लग्ज़री कार से प्लास्टिक का एक टुकड़ा फेंकते हुए व्यक्ति को डाँटते हुए वीडियो आया है जो उसके पति विराट कोहली ने उसी समय बनाकर डाल दिया था |वे ठहरीं मोदी जी के स्वच्छता अभियान की ब्रांड अम्बेसडर की पत्नी |और फिर मुंबई जैसे साफ शहर में प्लास्टिक के एक टुकड़े को वे कैसे बर्दाश्त कर सकती हैं | प्लास्टिक के इस छोटे के अतिरिक्त तो पूरी मुम्बई  बिलकुल साफ हो चुकी है |पता नहीं, इस देश के आसमान में उड़ती प्लास्टिक की थैलिया किस देश से आती हैं ?कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने अनुष्का का उत्साह बढाते हुए उसका पक्ष लिया है |

बोला- तो क्या हम वास्तव में इतने सफाई पसंद हो गए हैं ?क्या हम कूड़ा न फ़ैलाने और कूड़ा प्रबंधन में इतने विकसित और सक्षम हो गए हैं जो प्लास्टिक का एक टुकड़ा हमें चिढ़ा देता है ? फिर दिल्ली के गाजीपुर इलाके में कूड़े का एवरेस्ट कैसे और क्यों जमा हुआ है ? क्या वहाँ के इलाके के लोग इसे पसंद करते हैं या इसे उन्होंने जमा किया है ? यह सब लक्ज़री कार वाले इलाकों के घरों की सफाई करके फेंका हुआ कूड़ा है | 

हमने कहा- ऊपर वालों की खुशामद के बतौर उत्साह का अतिरेक दिखाकर अपनी गोटी लाल करने का नाटक है यह सब | रास्ता तो कूड़ा सृजित न करने वाली जीवन शैली अपनाने से ही निकलेगा | अन्यथा सफाई के नाम पर बड़े लोगों का कूड़ा छोटे लोगों के इलाके में आता रहेगा |कुछ घर और इलाके नहीं, पूरी दुनिया साफ हो तो सफाई है |


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Jul 2, 2018

इमरजेंसी और यूजीसी



इमरजेंसी और यूजीसी 

अभी बरामदे में जाने ही वाले थे कि एक मरियल और फटी-सी आवाज़ सुनाई दी- इमरजेंसी मुर्दाबाद, इंदिरा गाँधी मुर्दाबाद |

हमें बड़ा अजीब लगा |मरने के बाद तो कोर्ट भी केस बंद कर देता है | मरने वाले को स्वर्गीय कहने लग जाते हैं भले ही उसके कर्म कुम्भीपाक नर्क में डाले जाने योग्य रहे हों |लोग किसी की शव यात्रा को देखकर श्रद्धांजलि स्वरूप नमस्कार  करते हैं |और आज यह कौन है जो ३४ वर्ष पहले आतंकवादियों द्वारा मार दी गई देश की लोकप्रिय प्रधान मंत्री के बारे में आज मुर्दाबाद के नारे लगा रहा है ? करुणा, अहिंसा और क्षमा वाले आध्यात्मिक देश भारत में कौन है जो इस प्रकार शत्रुता और ईर्ष्या की आग में जल रहा है ? 

देखा तो तोताराम |

हमने पूछा- यह क्या तमाशा है ? इंदिरा जी ने तेरा क्या बिगाड़ा है ?

बोला- लोकतंत्र का गला घोंट दिया |संविधान की हत्या कर दी |मैं उसे कैसे माफ़ कर सकता हूँ |

हमने पूछा- नेताओं को जेल में डाल दिया |नसबंदी में ज्यादतियाँ हुईं; उसका दंड जनता ने उनकी पार्टी ही नहीं खुद उन्हें हरा कर दे तो दिया | उनके गलत काम का उचित दंड दे दिया |जब आलोचना करने वाले, लोकतंत्र के तथाकथित रखवाले दाल के लिए जूतम-पैजार करने लगे तो जनता ने फिर इंदिरा जी को चुन लिया |जनता ने सजा दी और जनता ने माफ़ कर दिया |अब उस पर फैसला देने वाला तू कौन होता है ?

बोला- मैं एक स्वतंत्र देश का नागरिक हूँ |अपनी बात कहने का मुझे हक़ है |

हमने पूछा- यह बता नेताओं को जेल में डालने के अतिरिक्त सामान्य आदमी को क्या कष्ट हुआ ? क्या किसी ने किसी को गौतस्करी और गौमांस के शक में मार डाला ? क्या सरे राह किसी दूसरे धर्म या नीची जाति के दूल्हे के हाथ पैर इसलिए तोड़ दिए गए कि उसने हरिजन होकर घोड़ी पर बैठने की जुर्रत की ? क्या कोई हजारों करोड़ लेकर भाग गया या संदेहास्पद रूप से कोई रात भर में करोड़पति बन गया ?  

बोला- इंदिरा ने जो चाहा अपनी मर्जी से कर लिया |जनता को विश्वास में लेना चाहिए था |जब खुद ही सब कुछ करना है तो लोकतंत्र का क्या मतलब ?

हमने कहा- लेकिन क्या दो साल पहले नोटबंदी तुझसे पूछकर की गई थी ? क्या बात-बिना बात किसी भी तरह का कोई भी सेस लगाकर पैसा खसोटकर उससे अपना प्रचार करने और छवि चमकाने का कार्यक्रम चुनाव अभियान में  बताया था ? तू इमरजेंसी के नाम से इंदिरा को ख़ारिज करना चाहता है लेकिन जब जनता ने उन्हें क्षमा कर दिया तो तू फतवा जारी करने वाला कौन होता है ? १९७७ में लोगों ने इंदिरा जी द्वारा गड़वाया हुआ काल पात्र इस शक में निकलवाया कि इंदिरा ने ज़रूर उसमें अपना और अपने परिवार का यशगान किया होगा |और मजे की बात कि उसमें इंदिरा का नाम ही नहीं था |और आज तुम जैसे लोग चमचों से खुद को राम और विष्णु प्रचारित करवा रहे हैं | 

बोला- भाई साहब , कुछ भी हो |हमारा तो 'साफ नियत और सही विकास' का फंडा है |चाहते तो यू जी सी को चुपचाप बदल देते और उसकी जगह कोई भी वैदिक या महाभारतकालीन विज्ञान और पद्धति लागू कर देते |लेकिन नहीं |  सच्चे लोकतांत्रिक लोग हैं तभी तो समाचार छपवाया है कि प्रबुद्ध लोग यू जी सी के स्थान पर, बेहतर शिक्षा और व्यवस्था के लिए प्रस्तावित नई संस्था के बारे में सरकार को ७ जुलाई तक अपने सुझाव भेजें | 

हमने कहा- तो दे ही दे सुझाव |नहीं हो तो दिल्ली चला जा जावडेकर जी को सुझाव देने के लिए |एक तरफ का किराया हम दे देंगे |आते समय यह भी पूछ आना कि अढाई वर्ष तरसाने के बाद जिस पे कमीशन का आदेश निकाला है, वह २०१९ के चुनाव परिणाम से पहले मिल जाएगा या कोई दूसरी सरकार  देगी |















 

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