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Jan 11, 2009

तुम मुझे खून दो , मैं तुम्हें बीयर दूंगा


खून के बदले बीयर - एक ख़बर
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों की क़ैद से निकल कर जर्मनी होते हुए जापान पहुँचे और जापान द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों तथा अन्य प्रवासी भारतीयों को मिलाकर आजाद हिंद फौज बनायी । जिसके राज में सूरज नहीं डूबता था उस ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देते हुए भारत के उत्तर पूर्व में युद्ध का बिगुल बजा दिया । उन्होंने नारा दिया- 'तुम मुझे खून दो मई तुम्हे आज़ादी दूँगा' ।

उस समय बाज़ार इतना विकसित नहीं हुआ था । खरीदने बेचने का सिस्टम भी इतना विकसित नहीं हुआ था । लोग अदला-बदली अर्थात् बार्टर सिस्टम से काम चलाते थे । नेताजी के पास आजादी थी और लोगों के पास गरम खून था । तब तक लोगों का खून सफ़ेद नहीं हुआ था । तब खून का रंग लाल हुआ करता था और बकौल ग़ालिब- खून रगों में दौड़ते-फिरने का कायल न होकर आंखों से टपका करता था । इसलिए लोगों ने नेताजी को खून दिया और आज़ादी का मार्ग प्रशस्त हुआ ।

आज़ादी मिली । धीरे-धीरे आज़ादी के संघर्ष की यादें धुंधली होती गईं । बाज़ार विकसित हुआ । खून के बदले बहुत सी चीजें मिलने लगीं । पहले जीवन अमूल्य था, हालाँकि जीवन-मूल्य अवश्य थे । जीवन-मूल्य उस मूल्य को कहते हैं जिसके बदले में हम अपना जीवन देने के लिए तैयार हो जाते हैं । राम ने मर्यादा की रक्षा के लिए सारा जीवन लगा दिया, भगत सिंह ने आज़ादी के लिए जीवन दे दिया, भीष्म ने धर्म की रक्षा के लिए अपनी मृत्यु का रहस्य बता दिया, दधीचि ने देवों की रक्षा और दानवों के विनाश के लिए अपनी हड्डियाँ दे दीं, राजा शिवि ने शरणागत की रक्षा के लिए अपना माँस काटकर स्वयं तराजू पर चढ़ाना शुरू कर दिया, युधिष्ठिर, बुद्ध, महाबीर, ईसा, गाँधी ने सत्य के लिए सर्वस्व होम दिया, कर्ण ने प्राण देकर भी दानवीरता को नहीं छोड़ा । राजा दिलीप ने मात्र एक गाय के लिए स्वयं को सिंह का भोजन बनाने की ठान ली ।

अब भी जीवन मूल्य हैं । बस अदला-बदली की वस्तुएँ बदल गई हैं । अब लोग किसी धर्म के लोगों से पैसा लेकर मरने के लिए भारत में घुस आते हैं, पैसे लेकर अशांति फैलाने के लिए धार्मिक स्थान तोड़कर अपना जीवन खतरे में डाल देते हैं, कोई सुपारी लेकर किसी की हत्या करने के लिए चल पड़ता है, सैनिकों को युद्ध की सार्थकता समझ में न आने पर भी युद्ध में जाना पड़ता है तनख्वाह के लिए जैसे वियतनाम, अफगानिस्तान और ईराक आदि में अमरीकी सैनिकों को । लोग दारू या कुछ धन लेकर झूठी गवाही देने में जीवन गुज़ार देते हैं, लड़कियाँ कपडे उतारने के लिए तैयार हो जाती हैं, व्यापारी वैध या अवैध दारू बेचते हैं, और लोग ऐसे दीवाने हैं कि खून बेच कर भी दारू ख़रीदते हैं । ऐसे रक्तदाताओं को प्रोफेशनल डोनर कहते हैं । कुछ संस्थाएँ रक्तदान शिविर लगवाती हैं जिनमें रक्तदान के लिए प्रेरित किया जाता है । समाज सेवकों को तो रक्त चूसने से ही फुर्सत नहीं मिलती । साधु-संत पैसों के बदले भगवान का आशीर्वाद बेचते हैं ।

वैसे लोग कुछ भी कहें, हमें तो आज के जीवन-मूल्य ज़्यादा प्रेक्टिकल लगते हैं । फटाफट बेचो । जीवन बेचो, ईमान बेचो, मूल्य बेचो, धर्म बेचो । फटाफट कैश करो । पता नहीं कब भाव गिर जायें । और जीवन का मूल्य ही क्या हैं? कृष्ण ने शरीर को पुराना वस्त्र कहा है- पुराना वस्त्र उतार कर नया पहनने में तो फायदा ही है और फिर यह वस्त्र तो फ्री में मिलता है । पुराना उतारो और भगवान नया वस्त्र लिए तैयार खड़े हैं । इसलिए छोटी-मोटी चीजें बेचने में क्या बुराई है? पूरा जीवन बेचने की बजाय किस्तों में बेचना ज़्यादा लाभदायक है । एक आँख बेचो, एक गुर्दा बेचो, राजनीति में बार-बार निष्ठा बेचो और इल्ज़ाम दे दो आत्मा की आवाज़ को । खून बेचो, आजादी जैसी अमूर्त चीज़ के लिए नहीं वरन भौतिक वास्तु के लिए । कैसे भी पैसे कमाओ ।

हमारे उक्त दर्शन की पुष्टि हो गई है । यदि किसी भारतीय ने पुष्टि की होती तो विश्वसनीय नहीं होती पर यदि पुष्टि योरप के शहर प्राग से हुई है तो मानना ही पड़ेगा । वहाँ के स्वास्थ्य विभाग ने युवकों को रक्तदान के लिए प्रेरित करने के लिए एक मुहिम चलाई है जिसके तहत रक्तदान करने वाले को एक लीटर बीयर दी जायेगी और 'चेक बीयर' नामक पत्रिका की वार्षिक सदस्यता मुफ्त । पता चला है कि योजना काफी सफल रही है । अपने-अपने प्रोत्साहन हैं और भाँति-भाँति के भक्त । एक बार अटल जी पाकिस्तान गए तो एक पत्रकार अतिया ने अटल जी से कहा कि यदि आप कश्मीर मेहर में दे दें तो मैं आप से शादी करने के लिए तैयार हूँ । अपहरण कर्ताओं ने अमिताभ और आशा पारेख के अनुरोध के बदले ही बंधकों को छोड़ना स्वीकार कर लिया था पर चूँकि फ़िल्म वालों का तो एक वाक्य ही विज्ञापन में लाखों का बिकता है सो किसी ने अपहरण कर्ताओं से अनुरोध नहीं किया । वर्ल्ड कप के समय एक सुन्दरी ने कहा था कि वह गोल करने वाले अपने देश के खिलाड़ी को चुम्बन देगी । अब जिसके पास जो कुछ है वह वही तो देगा । कोई बीयर के बदले खून देता है । जिसके पास दाम है वह दाम देता है पर बीयर तो चाहिए ही । अब यह अलग बात है कि एक लीटर बीयर पीने के बाद यदि किसी रक्तदान करने वाले का एक की जगह दो बार खून निकल लिया जाए तो भी उसे क्या पता चलेगा । अपने यहाँ भी तो चुनाव से पहले की रात दारू की थैलियाँ बाँटी जाती हैं । अब कोई भारत को पिछड़ा न कहे । यहाँ भी योरप की तरह सब कुछ बाज़ार हो गया है । हर चीज़ को लेन-देन के दायरे में ले आया गया है । यह खून लेकर बीयर देना इस ग्लोबल विलेज का बाजारवाद नहीं, प्रतिभा-सम्मान-समारोह है ।

८ जनवरी २००९
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Jhootha Sach

Dec 31, 2008

दरवाजे पर पड़ा हैप्पी न्यू ईयर



हमारा कमरा बाहर की तरफ़ दरवाजे के पास है । चूँकि हमारी नींद कुछ खुल जाती है सो दूध भी हमीं लेते हैं । अख़बार भी लगभग इसी समय आ जाता है । चाय के साथ अखबार के सेवन से दिनचर्या शुरू होती है । प्रायः अख़बारवाला थोड़ा पहले आ जाता है पर वह न तो दरवाजा खटखटाता है और न ही आवाज़ लगाता है । बस दरवाजे के नीचे से अखबार सरका देता है । आज उसने अख़बार डालने के बाद दरवाजा खटखटाया और आवाज़ भी लगाई- मास्टर जी,दरवाजे पर कोई हैप्पी न्यू ईयर पड़ा है, ज़रा संभाल लीजियेगा ।

'दरवाजे पर हैप्पी न्यू ईयर पड़ा है'- बड़ा अजीब-सा संदेश था । हम उत्सुकतावश उठे । दरवाजा खोला पर तब तक अख़बारवाला जा चुका था । देखा एक सज्जन सीढ़ियों के पास गिरे पड़े थे । हमने उसे हिला कर पूछा- क्यों भई क्या बात है? बोला- थोड़ा सहारा दीजिये । ज़्यादा चोट तो नहीं आई पर लगता है उछलने से पैर में मोच आ गई है । हमने उसे सहारा देकर उठाया, सीढ़ियों पर बैठाया और पूछा- कौन हो? बोला- हैप्पी न्यू ईयर हूँ । हमने कहा- हैप्पी हो तो मुस्कराते हुए आते, यह क्या ?

उसने विस्तार से बताया- मास्टर जी, क्या हैप्पी और क्या सेड । ३१ दिसम्बर को रात के ठीक १२ बजे तारीख़ बदलती है सो मुझे आना पड़ता है वरना फ़र्क तो क्या पड़ने वाला है- ३१दिसम्बर और १ जनवरी में । दोनों दिन वही ठण्ड ,वही गए साल का रोना, वही सूखी-सतही शुभकामनाओं का आदान-प्रदान, वे ही घिसे-पिटे जुमले । हमने कहा- ज़रा संभल कर चला करो । कोई बी.एम.डब्लू. कारवाले टक्कर तो नहीं मार गए? बोला- टक्कर तो मार ही जाते । पैसेवालों के ठलुए छोरे चला रहे थे गाड़ी, बड़ी तेज़ । यह तो मैं उछल कर एक तरफ़ हो गया वरना तो टक्कर मार ही जाते । वैसे उनकी भी क्या गलती । पिए हुए थे बेचारे और फिर कार और पेट्रोल भी कौन से अपनी कमाई के थे जो सोचते । बाप की कमाई है । और बाप भी कौन-सी दसों नाखूनों की कमाई करता है । वह तो भी दो नंबर का धंधा ही तो करता है। सो सपूत भी ऐसे ही होंगें । वे धन की चकाचौंध में थे और मैं भी तेज़ रोशनी से घबरा गया था । पर खैर जान बची और लाखों पाये ।

हमने 'हैप्पी न्यू ईयर' को अन्दर लिया, बैठने को कुर्सी दी और कहा- चाय का पानी चढाते हैं। जब तक दूध आए तब तक ज़रा अख़बार देख लेते हैं । हमने पूछा- जिस कार से तुम्हें टक्कर लगने वाली थी वह काले रंग की तो नहीं थी ?बोला- हाँ जी, काली ही थी । हमने उसके सामने अख़बार पटकते हुए कहा- लो, देख लो यह वही कार लगती है। खंभे से टकराकर उलट गई और उसमें सवार तीनों युवक अस्पताल में हैं । तीनों ही पिए हुए थे ।

३१ दिसम्बर २००८

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Nov 23, 2008

मधुशाला पर फ़तवा और मोबाइल मैखाने


मौलाना कादरी जी,
अस्सलाम वालेकुम । हम आपको केवल मौलाना कादरी के नम से ही संबोधन कर रहे हैं । वैसे आपका पूरा नाम जो अंग्रेज़ी के अखबार में छ्पा था वह था- मौलाना मुफ़्ती अबुल इरफ़ान अहमद जैमुल अलीम कादरी । हमें लगा मौलाना शब्द सब के साथ कॉमन है और बाकी छः आपके सप्त ऋषि मंडल के सदस्य हैं । यदि ऐसा है तो ठीक है वरना हमें क्षमा करना । यदि यह सारा आप ही का नाम है तो गज़ब है साहब! इतने लंबे नाम तो अरब के शाहों के भी नहीं होते । ठीक भी है जितना बड़ा आदमी, उतना बड़ा नाम । हमारे यहाँ तो राम, शिव जैसे छोटे-छोटे नाम होते हैं ।

१० नवम्बर २००८ को मध्य प्रदेश के एक मुस्लिम संगठन ने आपकी अदालत में, हरिबंश राय बच्चन की मधुशाला की एक प्रति के साथ विचारार्थ एक मामला रखा । मधुशाला जैसी कृति का मूल्यांकन करने के लिए आपसे बेहतर साहित्य प्रेमी और हो भी कौन सकता था । आपने इस पुस्तक को इस्लाम विरोधी पाया और शैक्षणिक संस्थाओं के पाठ्यक्रम में रखे जाने के अनुपयुक्त पाया । वैसे यह कोई धार्मिक पुस्तक नहीं है । गुजरात को छोड़ कर भारत के सभी राज्यों में शराब का व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है । मिलाने को तो सब तरह की शराबें गुजरात में भी खूब मिलती हैं पर शराब-बंदी होने के कारण थोड़े दाम ज़्यादा देने पड़ते हैं । इतिहास पर नज़र डालें तो महान न्यायप्रिय बादशाह जहाँगीर रोजाना एक बोतल शराब पीता था । ऐसा संतोषी संत कैसा न्याय करता होगा ये तो अनुमान ही लगाया जा सकता है । बाबर जब राणा सांगा के साथ युद्ध में हारने लगा तो उसने मन्नत माँगी कि यदि वह युद्ध में जीत गया तो वह शराब पीना छोड़ देगा । इसका मतलब की वह पहले पीता था । बाद में उसने छोड़ी कि नहीं पता नहीं । अपने यहाँ नवाबी युग में तो शराब की नदियाँ बहती थीं । यहाँ के राजाओं, नवाबों ने शासन चलाने का काम तो अंग्रेज़ों को सौंप दिया था तो शराब पीने के अलावा और काम ही क्या रह गया था ।

स्थिति यह है कि न तो आप देश में शराब बनानेवालों को रोक सकते हैं और न बेचने वालों को । हमारे हिसाब से तो करनेवाले की बजाय किसी काम की प्रेरणा देनेवाला ज़्यादा बड़ा गुनाहगार होता है । एक युद्ध में कुछ सैनिकों को बंदी बना लिया गया । सबकी पेशी हुई और पूछताछ की गई । अंत में जिसका नंबर आया उसके पास कोई हथियार नहीं था । थी तो मात्र एक ढोलक थी । पूछा गया कि तू सेना में क्या काम करता था तो बोला- हुज़ूर मैं तो ढोलक बजा कर गाता था उससे जोश में आकर सैनिक लड़ते थे । पूछताछ करनेवाले अधिकारी ने कहा- सैनिकों को छोड़ दो और इस ढोलक बजाने वाले को फाँसी दे दो । यही सारी खुराफ़ात की जड़ है । सो बनाने, पीने, पिलाने और बेचनेवालों को छोड़ कर आपने इस सारी खुराफात की जड़ को धर दबोचा, अच्छा किया ।

वैसे दंड तो पीनेवालों को भी मिलना चाहिए । अरब में एक ख़लीफा हुए हैं । वे शराब को बहुत बुरा मानते थे । शराब पीने वालों को एक सौ कोड़ों की सज़ा तय कर रखी थी । शराबियों की आफ़त । उन्होंने एक योजना बनी । किसी तरह उन्हीं के बेटे को शराब पिला दी, गिरफ़्तार भी करवा दिया और अंत में सिफ़ारिश भी करने पहुँच गए- हुज़ूर बच्चा है, माफ़ कर दीजिये । पर ख़लीफा उनकी चाल समझ गए । बोले- नहीं, कोड़े लगेंगे और पूरे एक सौ । और कोड़े भी हम लगायेंगे । पचास कोड़ों में ही साहबजादे बफ़ात पा गए । उसी दिन दफ़ना भी दिया गया । अगले दिन ख़लीफा को ख्याल आया कि कोड़े पचास ही लगाये थे । सो लाश को कब्र से निकलवाया गया और पचास कोड़े और लगाये ।

सो कादरी साहब, फ़तवा हो तो ऐसा, सज़ा हो तो ऐसी और क्रियान्वयन हो तो भी ऐसा ही । वैसे मधुशाला लिखनेवाले बच्चन साहब तो इस दुनिया में हैं नहीं । यदि आप कोड़े लगाने कि सज़ा देते भी तो किसे, वे तो पंचतत्त्व में विलीन हो चुके । यह सुविधा तो दफ़नाने वाले समाजों में ही है । सैंकडों साल बाद भी चाहो तो कब्र में से कंकाल निकलवा कर उसकी मिट्टी पलीद कर दो । अब देखिये ना, पॉप साहब ने केरल की एक नन को संत का दर्जा दिया तो उसकी मिट्टी खुदवा कर वेटिकन में मँगवा ली । किसी हिंदू को मृत देह के अभाव में संत का दर्जा नहीं दिया जा सकता है कि भारत में कोई हिंदू संत बनने के काबिल है ही नहीं ।

आप इन साहित्य वालों की एक मत सुनना । ये कुछ कह देते हैं और फिर कहते हैं यह तो प्रतीक था या यह तो रूपक था । हम आपको कुछ उदहारण देते हैं आप इन पर भी विचार करके बैक डेट से फ़तवे सुना दीजियेगा । कबीर का एक पद है- पीले ना प्याला, हो मतवाला । उमर खैयाम ने तो जो रुबाइयाँ लिखी हैं उनसे तो आप वाकिफ़ होंगे ही । दारू के अलावा कुछ नहीं । गुरु नानक जी जब एक बार मक्का-मदीना की यात्रा पर जा रहे थे तो रस्ते में उनको एक रईस ने शराब पेश की तो गुरु बोले- हम ने तो ऐसी शराब पी रखी है जिसका नशा कभी उतरता ही नहीं । अब आपको और क्या प्रमाण चाहिए । ग़ालिब तो पक्का शराबी था ही । एक बार ग़ालिब दरी बिछा कर नमाज़ पढ़ने की तैयारी कर रहा था । लोगों को आश्चर्य । ग़ालिब और नमाज़? तभी ग़ालिब ने दरी समेटी और चल दिये । लोगों ने पूछा- मियाँ यह क्या? ग़ालिब बोले- जिसके लिए नमाज़ पढ़ रहा था वह तो ख़ुदा ने अता फरमा ही दी तो नमाज़ पढ़ कर क्या करना । लोगों ने देखा की गली के नुक्कड़ पर ग़ालिब का दोस्त शराब की बोतल हिला-हिला कर ग़ालिब को बुला रहा था । लाहौल विला कुव्वत! उसी ग़ालिब की कब्र दिल्ली में है । खुदवा कर उसकी मिट्टी पलीद करें । हम आपके साथ हैं । यदि आधुनिक युग में सुधार करना चाहें तो बड़े-बड़े सूफियों का खून टेस्ट करवाएँ । अल्ला कसम! सबके खून में लाल परी दौड़ती मेलेगी । वैसे ये शराब का धंधा करने वाले, पीने और पिलाने वाले हैं बड़े जालिम । शरबती आँखों से ही पी पिवा लेते हैं । ऐसे मोबाइल मैखानों को कहाँ तक कंट्रोल करेंगे? अच्छा हो कि अपन भी एक-एक पैग दबा लें । फिर दुनिया जाए भाड़ में ।

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मधुशाला की जिन पंक्तियों पर एतराज़ जताया गया है वो इस प्रकार हैं —

शेख कहाँ तुलना हो सकती मस्ज़िद की मदिरालय से,
चिर विधवा है मस्ज़िद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला ।

बजी नफीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीने वाला ।

शेख बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को,
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला ।

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१७ नवम्बर २००८

बी-बी-सी की ख़बर - कराची में तो शराब पीने वालों में अधिकतर मुसलमान हैं, पत्रिका की ख़बर


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