स्लम डॉग मिलेनिअर को आठ ओस्कर मिल गए । भारत फिर एक बार महाशक्ति बन गया । पहले सौंदर्य के क्षेत्र में बना था, अब फ़िल्म के क्षेत्र में बन गया । बनना भारत की नियति है । लोग बनाते हैं और हम बनते हैं । बनाने का यही तरीका है । जिसको भी बनाना होता है उसे ऐसे ही चने के झाड़ पर चढ़ाया जाता है । पहले जब यहाँ की सुंदरियों को विश्व या ब्रह्माण्ड सुन्दरी बनाया गया तो देशी ही नहीं विदेशी सौंदर्य प्रसाधनों का बाज़ार चमक गया वैसे ही अब फिल्मों का बाज़ार चमकेगा । ऐसे ही बाज़ार चमक रहें हैं । जहाँ तक खाने पीने की चीजों और दवाओं और शिक्षा की बात है हालत कहीं भी ठीक नहीं है ।
अब चलो सिनेमा में भारत की जय हो गई पर यह जय भारत की कितनी है यह सोचने की बात है । इससे पहले भी अच्छी फिल्में बनीं थीं । सत्यजित राय, महबूब खान आदि की, पर ओस्कर किसी को नहीं मिला । गाँधी पर बनी फ़िल्म को कई ओस्कर मिले और अब डेनी बोयल द्वारा बनाई गई फ़िल्म स्लम डॉग को आठ ओस्कर मिले । प्रश्न उठता है कि ये फिल्में कितनी भारतीय हैं । इन फिल्मों ने 'ओस्कर' की आधी दूरी तो इस लिए तय कर ली क्योंकि इनको बनानेवाले ब्रिटिश थे । यह तो गोरे काठ के साथ काला भारतीय लोहा तर गया । यदि यही गाना और संगीत रहमान ने किसी भारतीय निर्देशक की फ़िल्म में दिया होता तो क्या उसे ओस्कर मिला होता? कभी नहीं ।
इसके अतिरिक्त इस फ़िल्म में ब्रिटिश निर्देशक ने वही किया जो अंग्रेज़ भारत में अपने शासन काल में करते रहे थे -जातीय और सांप्रदायिक चश्मे से चीजों को देखना । उपन्यास लेखक ने अपने नायक के नाम में तीन शब्द रखे हैं वे हिंदू, मुस्लिम और ईसाई हैं मतलब कि वह यह कहना चाहता है कि यह कहानी भारत की है न कि हिन्दू या मुसलमान की, मगर निर्देशक ने उसका नाम केवल मुसलमान रखा है और उस पर हमला करनेवाले हिंदू हैं । यह एकांगी और विवादास्पद बात है । मूल लेखक भारत की स्थिति को जानता है इसीलिए उसने नायक के नाम में तीनों धर्मों के शब्द रखे हैं क्योंकि वह इसे भारत के शहरी ग़रीबों की कहानी बताना चाहता है न कि किसी मुसलमान की ।
जहाँ तक गोपाल सिंह नेपाली के गीत को सूरदास का बताने की बात है वह क्षम्य हो सकती है क्योंकि आज के भारतीय लेखकों का ज्ञान इतना ही है ।
हम तो तब भी इतने ही खुश थे जब बुश ने अपनी बिल्ली का नाम इंडिया रखा था । लेकिन वो तो अब मर गयी । सो यह तो ओस्कर है । चलो खुश हो लेते हैं वरना कोई देशभक्त हमारी ठुकाई कर देगा ।
बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना । जय हो ।
२३ फरवरी २००९
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Jhootha Sach
यूँ तो नेताओं की टाँगें सामान्य से ज़्यादा लम्बी होती हैं । वे जहाँ चाहें उन्हें अड़ा सकते हैं पर अर्जुन सिंह की टाँगें कुछ ज़्यादा ही लम्बी हैं । वैसे जो भी केन्द्र में शिक्षा मंत्री होता है उसके लिए और नहीं तो कम से कम इतिहास में टाँग अड़ाना तो ज़रूरी हो ही जाता है । इतिहास में टाँग अड़ाने का सिलसिला १९७७ में जनता पार्टी के शासन में शुरू हुआ था । तब ९ वीं, १० वीं की इतिहास की पुस्तकों में से कुछ अध्याय निकलवाये गए थे । इंदिरा गाँधी का गड़वाया गया काल-पात्र भी फिर से खुदवा कर निकलवाया गया । पर शर्म की बात यह थी कि उस काल-पात्र में इंदिरा गाँधी का कहीं नाम ही नहीं था सो चुपचाप वापस गड़वा दिया गया । भाजपा ने भी शासन में आने पर इतिहास सुधारने का प्रयत्न किया । फिर तो यह परम्परा राज्यों में भी चल पड़ी । इतिहास नहीं हुआ, मज़ाक हो गया । जो इतिहास में शामिल होने लायक नहीं होते, वे चले आ रहे इतिहास से छेड़छाड़ करते हैं ।
यूँ तो कर-कमल, चरण-कमल, मुख-कमल, कमल-नयन आदि बहुत से रूपक चले आ रहे हैं । पहले तो अर्जुन सिंह जी को ध्यान ही नहीं आया कि भाजपा क्यों जीत गयी । फिर उन्हें पता चला कि भाजपा के जीतने का कारण कमल का निशान है । अब समस्या यह है कि न तो कमल को लक्ष्मी जी के नीचे से खींच कर हटाया जा सकता, न केन्द्रीय-मंत्री कमलनाथ का नाम बदला जा सकता, न ब्रह्मा जी, विष्णु, गणेश या सरस्वती जी के हाथ से कमल का फूल छीना जा सकता । वैसे पता नहीं कि उन्हें यह याद है कि नहीं कि राजीव का अर्थ भी कमल ही होता है । भले ही अर्जुनसिंह राम-मन्दिर या राम-सेतु से ख़फ़ा हों पर यदि उन्होंने गीतावली पढ़ी होगी तो वे यह अवश्य जानते होंगे कि तुलसी ने लिखा है- 'राजीवलोचन राम चले तजि बाप को राज बटाऊ की नांई' । यह सब कुछ कर पाना संभव नहीं हो रहा है तो २००८ जून में अर्जुन सिंह जी ने सोचा कि क्यों न केन्द्रीय विद्यालय संगठन के प्रतीक चिह्न में से ही कमल को निकलवा दिया जाए । केंद्रीय विद्यालय संगठन के प्रतीक में कमल ही नहीं, सूर्य भी है । मेरे ख्याल से कमल शिष्य का प्रतीक है और सूरज गुरु का, जो अपने प्रकाश से शिष्य ही नहीं वरन समस्त सृष्टि का अज्ञान का अन्धकार दूर करता है । सबसे पहले चुनावों में रामराज्य पार्टी का चुनाव-चिह्न था 'उगता हुआ सूरज '। उस समय अर्जुन सिंह जी इतने प्रभावशाली नहीं थे वरना तो सूरज का उगना भी कम से कम चुनावों में तो बन्द करवा ही देते ।
पिछले दशक में आम चुनाव के समय कुछ ऐसे ही महान लोगों के कहने पर चुनाव आयोग ने 'व्हील ' नामक वाशिंग पाउडर और एक विज्ञापन 'कमल सा खिल जाए' पर भी रोक लगा दी थी । क्या कहेंगे आप चुनाव आयोग द्वारा भारतीय-जनता के बौद्धिक स्तर के मूल्यांकन पर । क्या वह कमल का नाम सुनकर भाजपा को वोट दे देगी या व्हील पाउडर के विज्ञापन से जनता-दल को जिता देगी ? अगर ऐसा ही होता रहा तो बेचारे मुलायम के चुनाव-चिह्न के चक्कर में चुनाव के दिनों में गरीब लोगों का साइकल चलाना बन्द करवा दिया जाएगा । चुनाव के दिनों में, गावों में जहाँ बिजली नहीं आती, वहाँ भी लालटेन जलाने पर पाबंदी लगा दी जायेगी क्योंकि लालटेन लालू का चुनाव-चिह्न है ।
हम तो यह मानते हैं कि कर और कमल का शाश्वत मेल है । सारे उद्घाटन और शिलान्यास के पत्थरों पर 'अमुक के कर कमलों से' लिखा हुआ है । क्या सबको उखाड़ देंगे ? हम तो सोचते थे कि सब नेताओं के कर कमल हो जायेंगे और सहयोग से काम करेंगे । लोकतंत्र की खासियत तो यही होनी चाहिए कि चुनाव लड़ो और परिणाम आने पर जो भी पार्टी सरकार बनाये काम सब मिल कर करें क्योंकि लक्ष्य तो सबका देश का विकास करना है । पर नहीं, पाँच साल तक एक दूसरे की टाँग खींचते रहेंगे । इसी तरह से साठ साल से जूतम-पैजार देख रहे हैं ।
हे प्रभु, इन सबको सद्बुद्धि दे कि ये राजनीति के कीचड़ में भी कमल की तरह उज्ज्वल रहें और केवल पार्टियों के कर और कमल ही नहीं, सारे देश के लोग एक दूसरे के हाथ थाम कर आगे बढ़ें ।
२ फरवरी २००९
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भारत के लोगों में एक बड़ी खराबी है कि हर बात में कुछ न कुछ खुन्नस ज़रूर निकालेंगे । कहीं न कहीं अस्मिता को ठेस लगनेवाली बात ढूँढ़ ही लेंगे । एक सज्जन ने तो कोर्ट में याचिका भी दायर कर दी कि 'स्लम डाग मिलिनीयर' फ़िल्म के कारण भारत के झुग्गी-झोंपडीवालों का अपमान हुआ है । अब पता नहीं, यह याचिका उसने प्रसिद्ध होने के लिए अपने पैसे से डाली है या फ़िल्म को चर्चित करवाने के लिए निर्माता ने डलवाई है । विवाद इतना बढ़ गया है इसके सामने सत्यम् का घोटाला और मुंबई हमलों की घटना भी फीकी पड़ गई । इसलिए इस मुद्दे पर सही मार्गदर्शन करने के लिए महान चिन्तक शाहरुख़ खान को समय निकालकर इस मूर्ख जनता को समझाना पड़ा । चिन्तक कहते हैं- लोग नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं । वे 'स्लम डाग' को तो देखते हैं और नाराज़ होते हैं पर इसके आगे लगे हुए शब्द 'मिलेनियर' अर्थात करोड़पति शब्द को नहीं देखते । अरे जब करोड़पति बना दिया तो उसके बाद क्या चाहिए । फिर तो चाहे जूते मारो, मुँह पर थूको या कुत्ता ही क्या चाहे कुत्ते का गू कहो । कायदे से तो गीता के देश के वासियों को तो इतना स्थितप्रज्ञ होना चाहिए कि हानि-लाभ, जीवन-मरण किसी में भी कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए । शरीर तो नश्वर है और आत्मा अमर है फिर फिक्र करने की क्या ज़रूरत है ।
पैसा आने पर गधा भी बाप हो जाता है । अच्छे-अच्छे मनीषी स्तुति गाने लगते हैं, लोग स्कूलों में मुख्य-अतिथि बना कर बुलाने लग जाते हैं । भले ही पैसेवाला कुछ न दे फिर भी लोग भाग कर उसकी कार का दरवाजा खोलने में गर्व अनुभव करते हैं । अब कोई पूछने वाला हो कि भाई यह तो बताओ इन फ़िल्म वालों ने पैसे के लिए नाचा है, गाया है, कमर मटकाई है । आज भी किसी के पास देने को मुँहमाँगा पैसा हो तो बड़े से बड़ा बादशाह और महानायक आपके कुत्ते के जन्मदिन पर नाचने के लिए आ सकता है । इनमें कोई भी हरिदास नहीं है जो अकबर को कह सके कि -
'संतन को सीकरी सों का काम ।
आवत जात पनहियाँ टूटें बिसर जात हरि नाम ॥'
अर्थात् संत को फतेहपुर सीकरी में अकबर से क्या काम, आने जाने में जूते घिसते हैं और राम का नाम भी भूल जाए । लेकिन इनके लिए तो जिसमें पैसा मिले वही सकारात्मक है ।
और फ़िल्म बनाने वाले भी कौन से संत हैं वे भी पैसे के लिए (मतलब कि फ़िल्म को हिट करवाने के लिए) कुछ भी गर्हित से गर्हित कहानी की माँग के नाम पर दिखा सकते हैं । इस फ़िल्म के निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक सब विदेशी हैं । मूल पुस्तक में कुछ ऐसे परिवर्तन किए हैं जिससे इसमें भारतीय नहीं बल्कि साम्प्रदायिक रंग आ गया है । जैसे मूल पुस्तक में लेखक विकास स्वरूप ने हीरो का नाम 'राम मुहम्मद थॉमस' जानबूझ कर रखा जिससे धर्मविशेष से परे एक आम भारतीय नज़र आए । फ़िल्म में इसका नाम 'जमाल मलिक' और समाज के 'अत्याचारी' सिर्फ़ हिंदू दिखाए गए हैं । वैसे इस देश में समस्याओं और मुद्दों और कहानियों की क्या कमी है पर किसी में माद्दा, योग्यता या भाव तो हो । एक से एक जिजीविषा वाले अद्भुत लोग और उनके कारनामे हैं कि दुनिया चकित हो जाए ।
अब जब मिस वर्ल्ड होने पर ही कोई सुन्दरी मानी जाती हो, आस्कर मिलने से ही कोई फ़िल्म श्रेष्ठ होती हो, गिनीज़ बुक में नाम आने पर ही कोई बात विशिष्ट होती हो, तो फिर ठीक है । गाँधी ने नोबल पुरस्कार को ध्यान में रखकर न कुछ किया और न नोबल के बिना गाँधी का महत्व कम होता है । गीता, रामायण, गोदान, कबीर के सबद को कोई क्या पुरस्कृत करेगा ? वे स्वयं पढ़नेवाले को धन्य करते हैं । छोटों को पुरस्कार बड़ा बनाते हैं और बड़े पुरस्कार को गरिमा प्रदान करते हैं । योरप-अमरीका के मुद्दे और बौद्धिकता दोनों भारत से अलग हैं । खैर! भारत में सुंदरियाँ पैदा होने से सौंदर्य-प्रसाधन का बाज़ार विकसित हुआ, अब चलो कुत्तों के दिन फिरेंगे । हमें तो अफसोस यही है कि अंग्रेज पहले भी कहा करते थे- 'डॉग्स एंड इंडियंस आर नोट अलाउड' । बस अब इतना फ़र्क पड़ गया है कि इंडिया के करोड़पति डाग्स अलाउड हो गए हैं । चलो कल औरों का भी भाग्य उदय होगा ।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि शाहरुख़ खान के अनुसार वहाँ के लोग इस 'डाग' के संगीत के दीवाने हो रहे हैं । वैसे संगीत तो पहले भी था इस देश में पर क्या किया जाए कि उन्हें 'डाग' का ही संगीत समझ में आता है ।
३० जनवरी २००९
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भारत, जिसने अध्यात्म, चिंतन और मानवीय संबंधों और संवेदनाओं के क्षेत्र में लंबे अध्ययन के बाद बहुत से सूक्ष्म सत्य ज्ञात किए हैं और जो जगह-जगह हमारे ग्रंथों में बिखरे पड़े हैं, आज उन्हीं के बारे में पश्चिम में हुए छोटे-छोटे अध्ययन और तथाकथित सर्वे के समाचार अंग्रेजी के अखबारों में छपने पर उनको पढ़कर हम आश्चर्य-चकित हो जाते हैं । यदि हम अपने साहित्य और प्राचीन ग्रंथों को थोड़ा सा भी पलटें तो पायेंगें कि ये वे ही बातें हैं जिन्हें हमने पिछड़ापन और अंधविश्वास मानकर हिकारत से भुला दिया था ।
अभी टाइम्स आफ इंडिया में एक सर्वे का समाचार छपा था कि यदि गायों को उनके नाम से पुकारा जाए, उनको परिवार के एक सदस्य के रूप में माना जाए, उनसे बातें की जाए तो वे अधिक दूध देती हैं । अब वह व्यक्ति जो गाय को केवल दूध के लिए ही पालता है, उसको खाना खिलाते समय खाने और उससे मिलने वाले दूध की कीमत का गणित सोचता रहता है तो उस व्यक्ति का गाय के प्रति सम्बन्ध बनाने या उसको प्रेम करने का भाव भी शुद्ध नहीं होगा और इसीलिए फलदायी भी नहीं होगा । आज गाय पालनेवाला गाय को तब तक ही रखता है जब तक उससे लाभ मिलता है । उसके बाद गाय को कसाई को बेचने में उसको कोई कष्ट नहीं होता । तो ऐसे में इन सूक्ष्म भावों का कोई अर्थ नहीं है । आज मुर्गी पालन, सूअर पालन आदि को फार्मिंग का नाम दिया गया है । मतलब कि वे पेड़-पौधों की खेती की तरह की ही कोई खेती हैं । विज्ञान के हिसाब से दोनों ही जीवित हैं पर क्या एक फल या सब्जी की तरह सहज भाव से हम एक सूअर या मुर्गी को काट सकते हैं ? क्या उनका बहता खून और उनका तड़पना हमें सामान्य रहने देता है ? यहाँ मैं एक सामान्य आदमी की बात कर रहा हूँ । किसी पक्के कसाई की नहीं । आज योरप और अमरीका में बाज़ार से डिब्बाबंद माँस लाकर खानेवालों को जानवरों की पीड़ा का अनुमान नहीं हो सकता । वे अन्य सामान्य सब्जी या अनाजों की तरह उन्हें खाते हैं । उन लोगों को बूचडखानों में कटते जानवरों की पीड़ा और दुर्दशा को देखने का अवसर मिले तो अधिकतर लोग माँस खाना छोड़ देंगे (इस लिंक पर कसाईखाने की सच्चाई है, देखनेवाले सावधान रहें !) । बाज़ार ने खेत और रसोई के बीच इतनी दूरी पैदा करदी है कि उसे 'मैड काऊ' का माँस खिलाया जा सकता है, दूध में सरलता से मेलेनिन पिलाया जा सकता है ।
भारत में तो पशु-पक्षी ही नहीं बल्कि पेड़-पौधों के प्रति भी संवेदनाएँ थीं । भारत के ही एक वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने अपने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में भी जीवन ही नहीं बल्कि अन्य विकसित जीवों की तरह संवेदनाएँ होती हैं । उनसे भी हजारों साल पहले से ही बैठी गाय को अकारण उसकी मर्जी के खिलाफ उठाना या हरे पेड़ को काटना भी इस देश में पाप माना जाता था । शाम के बाद तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते । मानते हैं कि रात को तुलसी सो रही होती है । रविवार को भी तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते । हो सकता है कि उसको एक दिन का विश्राम देने का भाव हो । शाम को तुलसी के नीचे दिया जलाने का विधान है । मन्दिर जाने पर तुलसी और पीपल में तथा रास्ते में पड़ने वाले पेड़ों में भी पानी डालने को पुण्य का काम समझा जाता है । समस्त सृष्टि- पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आदि सब मानव का परिवार होता था । पुराने लोगों को मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों से भी बातें करते सुनना आज के साठ-पैंसठ बरस के, ग्रामीण पृष्ठ भूमि वाले लोगों के लिए नई बात नहीं है । राजस्थान के जोधपुर जिले में बिश्नोई समाज की सौ डेढ़ सौ वर्ष पुरानी एक घटना है । वहाँ एक पेड़ पाया जाता है - खेजड़ी । यह उनके लिए एक बहु उपयोगी पेड़ है । वे उसे सूख जाने के बाद ही काटते हैं । राजा ने अपने महल के लिए लकड़ी की ज़रूरत होने पर नौकरों को खेज़डी काटने के लिए भेज दिया । गाँव वालों ने विरोध किया । वे खेजड़ी के पेड़ों से लिपट गए । और राजा के कारिंदे इतने निर्दय कि उन्होंने सैकड़ों लोगों को काट डाला । पर लोगों ने खेजड़ी को नहीं काटने दिया । इस भाव से ही हम मानवेतर, जीवित जगत से सच्चे रूपमें जुड़ सकते हैं । तभी हमारी सृष्टि वास्तव में सम्पूर्ण होगी अन्यथा तो उसे सिकोड़ते-सिकोड़ते तो हम केवल अपने तक सीमित करते ही जा रहे हैं और दुखी और अकेले होते जा रहे हैं ।
आज तथाकथित विकसित देश मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं । वे माँस के बिना भोजन की कल्पना ही नहीं कर सकते । उनके हिसाब से माँस के अलावा प्रोटीन कहाँ से मिल सकता है ? जब कि करोड़ों लोग दालों से प्रोटीन प्राप्त कर रहे हैं । जितना अनाज सूअरों को खिला कर फिर उन सूअरों को खाया जाता है उतने अन्न में तो उससे चार गुना लोगों का पेट भर सकता है और वे अन्न खाने के कारण मोटापे से भी बचे रहेंगे । लोगों का तो भला हो जाएगा पर माँस के बाज़ार का क्या होगा ? और बाज़ार इतना मूर्ख नहीं है कि उपभोक्ता को ऐसा सच समझने दे ।
क्या हमने भारत की इतनी पुरानी सभ्यता और संस्कृति से कुछ भी न सीखने की कसम खा ली है ? दुनिया योरप और अमरीका से भी बहुत पुरानी है । अपनी परम्परा को समझे बिना उसे छोड़ना और बिना सोचे समझे दूसरों की नक़ल करने प्रवृत्ति पर अपनी पुस्तक 'कर्ज़े के ठाठ "से एक कुण्डलिया छंद प्रस्तुत है -
सड़कों पर लगने लगी मल्टीनेशनल सेल ।
यह घर फूँकू खेल है जी चाहे तो खेल ।
जी चाहे तो खेल, याद रखना पर बन्दे ।
बंद तेरे उद्योग, चलेंगे उनके धंधे ।
कह जोशीकविराय दाल अच्छी है घर की ।
क्या गारंटी सड़ी न हो मुर्गी बाहर की ।
यह तो वही हुआ कि 'उल्टे बाँस बरेली को' अर्थात् 'नानी के आगे ननिहाल की बातें'
२९ जनवरी २००९
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जापान का एक समाचार था कि छंटनी का मारा एक कर्मचारी अपने फ्लेट में मरा पाया गया । उसके फ्लेट की तलाशी ली गई तो उसके फ्रिज में कुछ भी नहीं था । इसके बाद उसका पोस्ट मार्टम किया गया तो उसकी आँतों में भी कुछ नहीं निकला । इससे इतना तो तय है कि उसकी मृत्यु भूख से हुई थी । जापान दुनिया का दूसरे नंबर का धनवान देश है । क्या ज़रा सी मंदी से ऐसी नौबत आ गई कि कि आदमी इतना निराश हो जाए कि बिना किसीको बताये चुपचाप मरने के सिवा उसके पास कोई चारा न बचे । यह अर्थव्यवस्था ही नहीं सामाजिक व्यवस्था पर भी एक क्रूर प्रश्न दागता है कि व्यक्ति समाज से भी इतना निराश हो चुका है कि किसी से अपने मरने की चर्चा करने का भी साहस नहीं कर सकता । लोगों में आपसी सम्बन्ध इतने क्षीण हो गए हैं कि वे आपस में बाँटें तक नहीं कर सकते । ऐसे में समाज और जंगल में फर्क क्या रह गया ?
भारत में भी सूचना प्राद्यौगिकी के क्षेत्र में बहुत से रोजगार समाप्त हो रहे हैं । मनोचिकित्सकों और एक्यूप्रेशर के चिकित्सकों के पास अचानक से मरीजों की संख्या बढ़ गई है । एक मनोचिकित्सक ने बताया है कि उसके पास आने वालों में अधिकतर आई.टी. क्षेत्र के लोग ज़्यादा हैं और उनमे भी युवा अधिक हैं । यह सच है कि आई.टी. क्षेत्र के लोगों को शुरू में ही इतनी अधिक तनख्वाह मिलती है कि वह उनकी परिपक्वता से अधिक होती है । उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि वे इस पैसे का क्या सदुपयोग करें । ऐसे में उन्हें गुमराह करने लिए बाज़ार है ही । उसे जीवन का उद्देश्य बताने के लिए विज्ञापन करने वाले अभिनेता-अभिनेत्रियाँ भी हैं ही । वे बताते जायेंगें कि यह तेल लगाओ, यह साबुन लगाओ, यह मोबाईल खरीदो, यह चश्मा लगाओ । ऐसा करते-करते सारी तनख्वाह ख़तम ।

इनकी कोई सरकारी नौकरी तो है नहीं कि छंटनी की संभावना लगभग नहीं होती है । इस बाजारवादी व्यवस्था में नौकर और मालिक का कोई सम्बन्ध नहीं होता । यह कोई विवाह थोड़े ही है यह तो डेटिंग है । ख़त्म करते क्या देर लगती है । जब नौकरी छूट जाती है तो अचानक आदमी जमीन पर ही क्या, चार हाथ नीचे चला जाता है । व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना चाहिए क्योंकि आवश्यकताएँ धन के साथ बढ़ तो जाती हैं पर धन कम होने पर उसी हिसाब से कम नहीं हो जातीं । कहा भी गया है -
बढ़त-बढ़त सम्पति सलिल, मन सरोज बढ़ जात ।
घटत-घटत पुनि न घटे, बरु समूल कुम्हलाय ॥
यदि हम थोड़ा सा पीछे जायें तो पायेंगें कि हमारी पिछली पीढी के लोगों में एक कमाता था और पॉँच -सात खाने वाले होते थे पर उनके भी सारे कम हो जाते थे क्योंकि वे मितव्ययिता से चलते थे । सौ कमाते थे तो भी बीस-तीस बचाने की सोचते थे । इसका कारण यह भी था कि वे अपने तक ही सीमित नहीं थे । वे सबके प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते थे । अंततः धनवान कौन है ? वह जो ज़्यादा खर्च करता है पर समय पर जिसके पास ज़हर खाने को भी पैसा नहीं मिलता या वह जो बुरे समय के लिए या भविष्य की ज़रूरतों के लिए दो पैसे बचा कर रखता है ?
और फिर याद रखना चाहिए कि- भोग न भुक्ता वयमेव भुक्ताः ।
जिन पदार्थों का हम उपभोग करते हैं वे हमारी शक्ति को क्षीण करते हैं । जो खाता है उसको पचाना भी तो पड़ता है । टी.वी. ले आए तो उसे देखने के लिए आँखें और समय तो आपको ही खर्च करना पड़ेगा । कान में वाकमैन का तार घुसेड़कर आप गाने तो सुन सकते हैं पर कानों की सुनने की क्षमता भी आपको ही खोनी पड़ेगी । इसीलिए डाक्टर कहते हैं कि कम खानेवाला दीर्घजीवी होता है । पैसे के साथ-साथ पैसे और समय का प्रबंधन भी आना चाहिए अन्यथा वह हमें न तो सुख प्रदान कर सकता है और न ही सार्थकता । यदि समझ हो तो कबीर की तरह थोड़े से धन में ही बहुत कुछ किया जा सकता है जैसे-
सांई इतना दीजिये जा में कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूं, साधू न भूखा जाय ॥
२८ जनवरी २००९
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पिछले छः महिने से बंगलोर में हूँ । गंगा के राष्ट्रीय नदी बनने पर लिखा था 'स्मृतियों में बहती गंगा' । सीकर (राजस्थान) से बेटे का फोन आया कि हृषिकेश से शीशी चढ़ाने वाला आया है । उसे क्या देना है ?
शीशी- मतलब गंगाजल से भरा एक पात्र जिसे शीशी चढ़ाने वाला हथेली पर रखकर गंगा के कुछ मंत्र बोलता है । हम लोग संभवतः पहाड़ से आकर राजस्थान में बसे हैं । राजस्थान में आने के बाद हो सकता पहाड़ पर जाना कम हो गया होगा । इस दूरी या कमी को पहाड़ से गंगाजल की शीशी लाने वाले ये लोग पूरी करते रहे हों । जब पहाड़ पर ठण्ड अधिक पड़ने लगती है तब ये लोग नीचे मैदानों में पहाड़ से बिछुडे लोगों तक शीशी के माध्यम से गंगा पहुँचाते रहे हैं । बचपन से इनको देखता रहा हूँ । नौकरी के सिलसिले में भारत के विभिन्न भागों में घूमते फिरने के कारण बच्चों का इनसे परिचय नहीं हुआ ।
कल मकर संक्रांति थी । वैसे ही गंगा और संगम स्नान के बारे में सोच रहा था । आज अचानक बेटे का फोन मिला तो अजीब सा अनुभव हुआ । क्या कोई टेलेपेथी है ? बेटे से उसके बारे में पूछा । बेटा बस इतना ही बता पाया कि पहले इसके पिता और उससे पहले इसके दादाजी आया करते थे । हो सकता है इस परिवार की चौथी पीढ़ी को भी मैं आते देखूँ । हृषिकेश से राजस्थान तक की यात्रा और वह भी इस ठण्ड में । कितने घरों में जा पाता होगा । कितना मिल जाता होगा इसे इस काम से ? फिर ख़ुद की सोच पर ही ग्लानि हुई । क्या यह मात्र पैसे के लिए आता है । मात्र पैसे के लिए इतनी अनिश्चित आमदनी वाला कार्य कोई करता है ? नहीं, इसके पीछे उसके मन में भी कुछ मानसिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक लगाव है । ऐसे काम केवल पैसों के बल पर हो ही नहीं सकते । अजंता की गुफाएँ बनने वाले मात्र मज़दूर या कारीगर नहीं थे । वे कहीं न कहीं भगवान बुद्ध के भक्त भी थे । पैसे से ही यदि देश को जोड़ने का काम हो सकता तो सरकारें बड़ी-बड़ी योजनायें बनाती है पर उसकी बात तो किसी तक भी नहीं पहुँचती ।
सोचता हूँ कब तक चलेगा यह सब । बाज़ार कब तक बचा रहने देगा,कष्ट उठाकर भी किसी अलाभकारी पर आत्मिक काम को । यदि किसी दिन बाज़ार ने ले लिया यह सांस्कृतिक काम तो पहले पैसा जमा करवाएगा उसके बाद शीशी हाथ पर रखेगा । हो सकता है समय-समय पर दाम भी बढ़ा दे । क्या पता शीशी हृषिकेश से न लाकर यही कहीं नल का पानी ही हाथ पर रखकर चलता बने । अब भगवान के दर्शन भी तो इंटरनेट पर करवाए जाने लगे हैं तो यह शीशी भी पता नहीं कितने दिन चलेगी ।
मैनें बेटे से कहा था कि वह जितना माँगे उतना दे देना । शाम को बेटे का फोन आया । मैनें पूछा-उसने कितना कहा तो बेटे ने बताया कि उसने कुछ भी नहीं कहा । केवल इतना बोला कि आप जो कुछ ठीक समझें दे दें । मुझे लगा-उसके मन के पहाड़ की ऊँचाई शायद अब भी हम सबसे ज़्यादा है ।
ऐसे कामों को पैसों से नापा भी नहीं जा सकता । अब भी शायद कुछ अमूल्य बचा हुआ है ।
१५ जनवरी २००९
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Jhootha Sach
(सन्दर्भ: अंग्रेजी अखबार में एक ख़बर छपी कि केरल के कुछ पादरियों ने विदेशी पिस्तौलें खरीदीं हैं । कुछ ने लाइसेंस ले लिए हैं और कुछ ने लाइसेंस के लिए अर्जी दे रखी हैं । इसीसे सम्बंधित हमारा एक अनुभव आपकी सेवा में प्रस्तुत है । )
रविवार को सुबह सूर्योदय के साथ ही दरवाजे पर खट-खट हुई । हमने सोच अखबारवाला पैसे लेने आया होगा । दरवाजा खोल कर उनींदी आँखों से कहा- देखो भई, इस महीने में दो नागा थी सो ये रहे २८ दिन के दो रुपये के हिसाब से छप्पन रुपये । अखबारवाले की 'अच्छा मास्टर जी 'की जगह सुनाई दिया- मूर्ख मास्टर, हम अखबार वाले नहीं हैं । हम केरल के कोट्टायम जिले से पधारे हैं, पादरी पिस्तौलवाला । पादरी पिस्तौलवाला ? हमारी खोपड़ी को एक सुनामी टाइप झटका लगा । अचानक आँखें पूरी खुल गईं - कुछ भय से ,कुछ विस्मय से । देखा तो देखते रह गए- सफ़ेद चोगा, सफ़ेद टोपी, एक हाथ में पिस्तौल और दूसरे हाथ में गोलियों का पट्टा । पादरी के एक हाथ में पवित्र पुस्तक और दुसरे हाथ में माला वाली छवि एक ही झटके में ध्वस्त हो गई । हमने ईसा, डेसमंड टूटू, मदर टेरेसा, सेंट जेवियर की तस्वीरें देखी थीं पर ऐसा भयानक सौंदर्य किसी में नहीं पाया । हमने अपने गिरते मनोबल, काँपती टाँगों, भर्रायी आवाज़, और रुकती साँस को सँभाला और हिम्मत करके पूछा- महोदय, ऐसा पवित्र और प्रेमपूर्ण वेश आपने ही धारण किया है या कोई और भी हैं ? उन्होंने कहा- नहीं, और बहुतसों ने भी ले रखा है लाइसेंस । दर्जनों लाइन में लगे हुए हैं ।
हमने परिचय का दायरा और बढ़ाते हुए पूछा- आदरणीय, इस प्रेम-प्रसारक यन्त्र- पिस्तौल के बारे में और कुछ बताइए न ! उन्होंने बताया- यह पिस्तौल मेड इन बेल्जियम है, इसकी कीमत एक लाख पचास हज़ार रुपये है । हमने सुझाव दिया- हुजूर, इतने रुपये खर्च करने की क्या ज़रूरत थी । एटा, इटावा के कट्टे हज़ार बारह सौ में मिल जाते । भक्तों और हमारे जैसे मास्टर को तो खिलौने वाले पिस्तौल से भी डराया जा सकता है । उन्होंने समाधान किया- बात केवल डराने की ही नहीं, रौब की भी तो होती है । जो रुतबा ऐ.के.४७ और ऐ.के.५६ का है वह देसी कट्टे का नहीं हो सकता । और फिर तेरे जैसे मास्टरों से पाला थोड़े पड़ता है । हमें बड़ी-बड़ी खूँख्वार आत्माएँ भी मिल जाती हैं । उनके लिए विदेशी पिस्तौल ज़रूरी है ।
अब हमारी हिम्मत थोड़ी-थोड़ी बढ़ने लगी, कहा- ऐसी बात तो नहीं है मान्यवर, भगवान बुद्ध ने तो बिना पिस्तौल के ही अंगुलिमाल से भेंट कर ली और उसका हृदय-परिवर्तन कर दिया । बाल्मीकि की आँखें भी केवल शब्दों से ही खुल गईं । जयप्रकाश नारायण ने बिना पिस्तौल के ही डाकुओं से आत्मसमर्पण करवा लिया । हमारे यहाँ और भी बहुत से धार्मिक नेता, समाज सुधारक और साधु-संत हुए हैं- महावीर, बुद्ध, शंकराचार्य, रामानंद, वल्लभाचार्य, कबीर, तिरुवल्लुवर, नामदेव, नानक, गाँधी, रामसुखदास जी - सबके मुख में राम तो देखा पर बगल में छुरी किसी के नहीं देखी । और आप हैं कि पवित्र पुस्तक और माला के स्थान पर पिस्तौल और गोलियों के पट्टे के साथ पधारे हैं । वे कुछ और खुले और बोले- हम इन लोगों की तरह फक्कड़ नहीं हैं । हमारे पास अरबों रुपये की विदेशी और देशी संपत्ति है । हमें अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए हथियार चाहियें ।
हमने भी अपना ज्ञान बघारा- ऐसी बात नहीं है पादरी जी, हमारे संतों के पास भी अपार संपत्ति है । उनकी एक एक बात लाखों की होती है । ज़्यादा तो नहीं, हम तो आपको अपने सीकर जिले के बारे में बता सकते हैं । यहाँ कई संत वेद-विद्यालय चलाते हैं, आश्रम चलाते हैं, गौशाला चलाते हैं पर पिस्तौल एक भी नहीं रखता । अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से लोगों का दिल जीत लेते हैं । वे हँसे । जिसके हाथ में पिस्तौल हो और वह ठहाका लगाए तो और ज़्यादा डर लगता है । वे बोले ये जो गौशाला और वेद-विद्यालय चलाते हैं इनमें तो खर्च ही खर्च है । हम तो स्कूल और अस्पताल चलाते हैं जिनमें हाड-फोड़ कर पैसे लेते हैं । दवा, खाना, किताबें, नोटबुक, ड्रेस, जूते, मोजे, टाई सब कुछ हमारे यहीं से लेना पड़ता है, सो यह फायदा अलग । और इसके लिए लोग हमें सेवाभावी मानते है सो अलग ।
अब आगे हमें कुछ नहीं सूझा तो हमने पूछ लिया- महाशय, आपके आने का प्रयोजन क्या है ? वे बोले हम तुम्हारे उद्धार के लिए आए हैं । हमने कहा- तो आप वे ही हैं जो पिछले हज़ार साल से हमारे उद्धार के लिए एक महान मिशन लेकर योरप से आते रहे हैं ? हमारे प्राण-पखेरू तो आपकी पिस्तौल को देख कर ही उडूं-उडूं होने लग गए थे । यदि झूठ-मूठ ही खटका दबा देते तो उड़ ही जाते । सस्ते में ही उद्धार हो जाता । वैसे हम अभी उद्धार नहीं चाहते, क्योंकि हमारे नेता आतंकवाद, विदेशी हस्तक्षेप, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बेरोज़गारी, पश्चिमी अपसंस्कृति के बावजूद २०२० तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना चाहते हैं, इंडिया को शाइनिंग बनाना चाहते हैं, भारत-निर्माण करना चाहते हैं । बस हम उसी घड़ी के लिए जीवित रहना चाहते हैं । वे बोले ठीक है, २०२० में फिर आऊँगा तेरा उद्धार कराने के लिए । मतलब कि पीछा छूटना संभव नहीं ।
१२ जनवरी २००९
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लोगों में साहित्य, विशेषकर कविता के प्रति इतनी तटस्थता हो गई है कि योरप के बुद्धिजीवियों ने एक प्रयोग किया कि शौचालय में प्रयुक्त होने वाले पोंछने के टिश्यू पेपर पर कविता छापने लगे । इस नए प्रयोग के मसीहाओं ने सोचा होगा कि शौचालय में कोई मनोरंजन के लिए नहीं आता वरन मज़बूरी में आता है और जब तक हाज़त रवाँ नहीं हो जाती अर्थात् कष्ट निवारण नहीं हो जाता या लघु या दीर्घ शंका का समाधान नहीं हो जाता तब तक बच्चू भाग कर कहाँ जाएगा ? तो इस बंधन के दौरान टिश्यू पेपर पर निगाह पड़ गई तो कुछ न कुछ पढ़ेगा ही । यदि किसी को कब्ज़ की शिकायत है तो हो सकता है कि मल के अवतरण की प्रतीक्षा में पूरा महाकाव्य ही पढ़ डाले । गाँधी जी की सभी बातें हमें अच्छी लगती हैं पर उनकी एक बात से हम कभी सहमत नहीं हुए । कहते हैं कि वे शौचालय में बैठकर पढ़ा करते थे । हमारे यहाँ तो पुस्तकें इतनी पवित्र मानी जाती हैं कि उनका अनादर पूर्वक स्पर्श भी अपराध माना गया है । पवित्र ग्रंथों की अवमानना को लेकर सांप्रदायिक दंगे तक हो जाते हैं । वैसे हमें भी याद है कि बचपन में जब पुस्तक के पैर लग जाता था तो क्षमा माँगते हुए उसे सिर से लगाते थे । मतलब कि पुस्तकें ज्ञान का स्रोत हैं और ज्ञान का सम्मान सुसंस्कृति का पहला सोपान है । पर दुर्भाग्य कि योरप ने उसी कविता को शौचालय के टिश्यू पेपर तक पहुँचा दिया । जब से मानव अधिक सभ्य हुआ तब से उसने शौचालय का ही सबसे अधिक विकास किया । अब वहाँ पुस्तकें भी रखी जाने लगीं । ज़्यादा व्यस्त लोगों के लिए हो सकता है शौचालय में मोबाइल चार्जर और इन्टरनेट कनेक्शन भी होते हों । अब शौचालय ज़ल्दी से निबटने का स्थान नहीं वरन चिंतन, मनन और अध्ययन का सुरक्षित स्थान हो गया है । पर यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि वहाँ भोजन की सोंधी-सोंधी खुशबू तो नहीं ही आती होगी । आती होगी तो गू की बदबू ही आती होगी । अब भई, हो सकता है कि तथाकथित बड़े लोगों के गू में चंदन की खुशबू आती हो । इस बारे में हम अधिकार से कुछ नहीं कह सकते क्योंकि हमें किसी बड़े आदमी के इतना पीछे पड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी क्योंकि हमें न तो प्रमोशन की महत्वाकांक्षा रही, न कोई अन्य असंतोष । अध्यापकी से ही शुरू हुए और अध्यापक ही सेवानिवृत्त हो गए । सूर्य की तरह, उगते और छिपते, दोनों स्थितियों में समान ।
जहाँ तक कविता के आर्थिक पक्ष का सवाल है तो लोग डेढ़ कविता लेकर सारे हिंदुस्तान में घूम-घूम कर कमा ही रहे हैं । प्रकाशक भी कविता की पुस्तकें छाप-छाप कर, अधिकारियों को मोटा कमीशन देकर सरकारी लाइब्रेरियों में घुसा ही रहे हैं । पर यहाँ यह हमारा विचारणीय विषय नहीं है । हम तो शौचालय में फल-फूल रहे साहित्य की बात कर रहे थे । वैसे रेल के डिब्बों और सार्वजनिक शौचालयों की दीवारों पर अंकित साहित्य से कोई भी जागरूक भारतीय साहित्यप्रेमी अपरिचित नहीं है । शौचालय का वास्तुकला और सौन्दर्यबोध से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है जिस पर किसी अन्य आलेख में विचार करेंगे । अभी तो हम शौचालय से जुड़े एक अन्य उदात्त भाव की चर्चा करेंगे ।
दान, धर्म, चेरिटी मानव की उदात्तता का एक सार्वकालिक आयाम है । पिछड़ी हुई भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि गुप्त दान सर्वश्रेष्ठ होता है । 'दातव्यं इति यद्दानं, दीयते अनुपकारिणी । देशे काले च पात्रे च, तद्दानं सात्विकं विदु ॥' (गीता)। यदि दान का प्रचार किया जाए, उस पर टेक्स रिबेट लिया जाए, कोई नाम पट्ट लगवाया जाए तो उससे मिलने वाला पुण्य और आनंद समाप्त हो जाता है । पर आज लोग पाँच रुपये के दान का प्रचार कराने के लिए पाँच सौ रुपये की नामपट्टिका लगवाते हैं और और पाँच हज़ार रुपयों का विज्ञापन अखबारों में देते हैं । दान तो दान, लोग तो धन्यवाद और बधाई का भी विज्ञापन देते हैं । ईसाई धर्म में भी कहा गया है कि यदि तुम एक हाथ से दान देते हो तो दूसरे हाथ को भी पता नहीं लगना चाहिए । दान के लिए यह भी कहा गया है कि वह अपनी मेहनत की कमाई में से दिया जाना चाहिए । भगवान बुद्ध ने एक बुढ़िया द्वारा दिए गए अधखाये अनार को सबसे बड़ा दान बताया क्योंकि वह उसका सर्वस्व था, इसके अतिरिक्त शायद उसके पास देने को कुछ था ही नहीं ।
शौचालय का सीधा सम्बन्ध है शुचिता से । तरह-तरह के शारीरिक विकारों और उत्सर्जनों से मुक्त होकर व्यक्ति स्वच्छ और शुच बनता है । मल-मूत्र त्याग, दंत-धावन, शौच के प्रमुख अंग हैं किंतु शरीर की सफाई के काम निरंतर चलते रहते हैं जैसे थूकना, नाक छींटना आदि । इस प्रकार शौचालयों का विस्तार सर्वत्र और सर्वदा है । एक अभिनेत्री हैं - स्कारलेट जोहानसन, जो एक टी.वी.प्रोग्राम देने गईं । सर्दी की ऋतु तिस पर अभिनेत्री होने के कारण पूरे कपड़े पहन नहीं सकती । तो साहब, जुकाम तो होना ही था । तो अभिनेत्री को छींक आगई । छींक के साथ कुछ तरल पदार्थ भी उत्सर्जित हुआ । यदि उस तरल पदार्थ को रोकने के लिए कपडे का रूमाल हुआ होता तो उस अमूल्य तरल पदार्थ को पर्स में रखकर घर ले जाया जा सकता था । पर चूंकि इस तरल पदार्थ को एक टिशू में संगृहीत करके फ़ेंक दिया गया । आखिर कब तक संभाले आदमी । सारे दिन ऐसे पदार्थ समय-समय पर, विभिन्न रूपों में निसृत होते ही रहते हैं । पर जैसे हीरे की कीमत कोई सच्चा जौहरी ही जानता है वैसे ही अभिनेत्रियों के थूक, नक्की आदि की कीमत कोई सच्चा भक्त ही जानता है । सो स्कारलेट जोहानसन की नाक से निकले इस तरल पदार्थ से लिथड़े कागज को एक जिज्ञासु, सत्यान्वेषी और परोपकारी व्यक्ति ने उठाकर सुरक्षित रख लिया । इसके बाद उसने इंटरनेट पर इसकी नीलामी की । नीलामी बढ़ते-बढ़ते ५५०० डालर पर छूटी । मतलब ३ लाख रुपये । इस राशि से २०-३० साहित्यकारों को पुरस्कृत किया जा सकता है । प्राइवेट स्कूल के एक मास्टर को तीन साल तक वेतन दिया जा सकता है । २०-३० ग़रीबों को स्वरोजगार के लिए मदद की जा सकती है ।
इस राशि का उपयोग किसी "फूड गेदरिंग चेरिटी यू.एस.ए. हार्वेस्ट" के लिए किया जाएगा । हमें पूरी तरह तो समझ नहीं आया की यह कौन सी चेरिटी है पर हमारा अनुमान है ईसाई धर्म में हार्वेस्टिंग का अर्थ है दूसरे धर्म वालों को ईसाई धर्म में दीक्षित करना । वैसे इसका असली अर्थ तो २६ दिसम्बर के टाइम्स आफ इंडिया के संपादक जानें या फिर 'दी एन्वेलप' नामक अखबार के संपादक जानें जिन्होंने सबसे पहले दान और परोपकार की यह महागाथा छापी । इस प्रक्रिया में सबसे महान और गुणग्राही तो हम उस व्यक्ति को मानते हैं जिसने इस अलौकिक पदार्थ को ३ लाख रुपये में खरीदा । अभिनेत्री तो खैर धन्यवाद् की पात्र है ही जिसने इतनी महत्वपूर्ण वस्तु परोपकार के लिए निःशुल्क उपलब्ध करवाई । भगवान करे अभिनेत्रियाँ खूब मल-मूत्र त्याग करें, थूकें, नाक छींटें, पादें और जिज्ञासु लोग उन्हें खोज कर सुरक्षित रखें और धनवान, ज्ञानी, परोपकारी और गुणग्राहक पुण्यात्माएं उन्हें लाखों, करोड़ों रुपयों में खरीदें जिससे चेरिटी यू.एस.ए, हार्वेस्ट जैसा कोई धार्मिक कार्य आगे बढ़े । अभिनेत्री के मल-मूत्रादि की तरह दान और धर्म की खुशबू संसार में सर्वत्र फैले । यदि इसी प्रकार शौचालयीन पदार्थों का धर्मार्थ कार्यों में योगदान बढ़ता रहा तो अभिनेत्रियों और भांडों के शौचालयों को धार्मिक स्थानों का दर्जा मिल जाएगा । अब यह मत पूछियेगा की अभिनेत्री के उस नक्की युक्त कागज़ का वह व्यक्ति क्या करेगा ? यह तो उसकी श्रद्धा और भक्ति पर निर्भर है । पश्चिम हमको मूर्ति पूजक कह कर पिछड़ा और असभ्य कहता है । अब उनके वहाँ के सभ्य समाज में व्याप्त इस मल-मूत्र और नक्की-प्रेम को क्या कहेंगे ?
९ जनवरी २००९
सन्दर्भ समाचार
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खून के बदले बीयर - एक ख़बर
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों की क़ैद से निकल कर जर्मनी होते हुए जापान पहुँचे और जापान द्वारा बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों तथा अन्य प्रवासी भारतीयों को मिलाकर आजाद हिंद फौज बनायी । जिसके राज में सूरज नहीं डूबता था उस ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देते हुए भारत के उत्तर पूर्व में युद्ध का बिगुल बजा दिया । उन्होंने नारा दिया- 'तुम मुझे खून दो मई तुम्हे आज़ादी दूँगा' ।
उस समय बाज़ार इतना विकसित नहीं हुआ था । खरीदने बेचने का सिस्टम भी इतना विकसित नहीं हुआ था । लोग अदला-बदली अर्थात् बार्टर सिस्टम से काम चलाते थे । नेताजी के पास आजादी थी और लोगों के पास गरम खून था । तब तक लोगों का खून सफ़ेद नहीं हुआ था । तब खून का रंग लाल हुआ करता था और बकौल ग़ालिब- खून रगों में दौड़ते-फिरने का कायल न होकर आंखों से टपका करता था । इसलिए लोगों ने नेताजी को खून दिया और आज़ादी का मार्ग प्रशस्त हुआ ।
आज़ादी मिली । धीरे-धीरे आज़ादी के संघर्ष की यादें धुंधली होती गईं । बाज़ार विकसित हुआ । खून के बदले बहुत सी चीजें मिलने लगीं । पहले जीवन अमूल्य था, हालाँकि जीवन-मूल्य अवश्य थे । जीवन-मूल्य उस मूल्य को कहते हैं जिसके बदले में हम अपना जीवन देने के लिए तैयार हो जाते हैं । राम ने मर्यादा की रक्षा के लिए सारा जीवन लगा दिया, भगत सिंह ने आज़ादी के लिए जीवन दे दिया, भीष्म ने धर्म की रक्षा के लिए अपनी मृत्यु का रहस्य बता दिया, दधीचि ने देवों की रक्षा और दानवों के विनाश के लिए अपनी हड्डियाँ दे दीं, राजा शिवि ने शरणागत की रक्षा के लिए अपना माँस काटकर स्वयं तराजू पर चढ़ाना शुरू कर दिया, युधिष्ठिर, बुद्ध, महाबीर, ईसा, गाँधी ने सत्य के लिए सर्वस्व होम दिया, कर्ण ने प्राण देकर भी दानवीरता को नहीं छोड़ा । राजा दिलीप ने मात्र एक गाय के लिए स्वयं को सिंह का भोजन बनाने की ठान ली ।
अब भी जीवन मूल्य हैं । बस अदला-बदली की वस्तुएँ बदल गई हैं । अब लोग किसी धर्म के लोगों से पैसा लेकर मरने के लिए भारत में घुस आते हैं, पैसे लेकर अशांति फैलाने के लिए धार्मिक स्थान तोड़कर अपना जीवन खतरे में डाल देते हैं, कोई सुपारी लेकर किसी की हत्या करने के लिए चल पड़ता है, सैनिकों को युद्ध की सार्थकता समझ में न आने पर भी युद्ध में जाना पड़ता है तनख्वाह के लिए जैसे वियतनाम, अफगानिस्तान और ईराक आदि में अमरीकी सैनिकों को । लोग दारू या कुछ धन लेकर झूठी गवाही देने में जीवन गुज़ार देते हैं, लड़कियाँ कपडे उतारने के लिए तैयार हो जाती हैं, व्यापारी वैध या अवैध दारू बेचते हैं, और लोग ऐसे दीवाने हैं कि खून बेच कर भी दारू ख़रीदते हैं । ऐसे रक्तदाताओं को प्रोफेशनल डोनर कहते हैं । कुछ संस्थाएँ रक्तदान शिविर लगवाती हैं जिनमें रक्तदान के लिए प्रेरित किया जाता है । समाज सेवकों को तो रक्त चूसने से ही फुर्सत नहीं मिलती । साधु-संत पैसों के बदले भगवान का आशीर्वाद बेचते हैं ।
वैसे लोग कुछ भी कहें, हमें तो आज के जीवन-मूल्य ज़्यादा प्रेक्टिकल लगते हैं । फटाफट बेचो । जीवन बेचो, ईमान बेचो, मूल्य बेचो, धर्म बेचो । फटाफट कैश करो । पता नहीं कब भाव गिर जायें । और जीवन का मूल्य ही क्या हैं? कृष्ण ने शरीर को पुराना वस्त्र कहा है- पुराना वस्त्र उतार कर नया पहनने में तो फायदा ही है और फिर यह वस्त्र तो फ्री में मिलता है । पुराना उतारो और भगवान नया वस्त्र लिए तैयार खड़े हैं । इसलिए छोटी-मोटी चीजें बेचने में क्या बुराई है? पूरा जीवन बेचने की बजाय किस्तों में बेचना ज़्यादा लाभदायक है । एक आँख बेचो, एक गुर्दा बेचो, राजनीति में बार-बार निष्ठा बेचो और इल्ज़ाम दे दो आत्मा की आवाज़ को । खून बेचो, आजादी जैसी अमूर्त चीज़ के लिए नहीं वरन भौतिक वास्तु के लिए । कैसे भी पैसे कमाओ ।
हमारे उक्त दर्शन की पुष्टि हो गई है । यदि किसी भारतीय ने पुष्टि की होती तो विश्वसनीय नहीं होती पर यदि पुष्टि योरप के शहर प्राग से हुई है तो मानना ही पड़ेगा । वहाँ के स्वास्थ्य विभाग ने युवकों को रक्तदान के लिए प्रेरित करने के लिए एक मुहिम चलाई है जिसके तहत रक्तदान करने वाले को एक लीटर बीयर दी जायेगी और 'चेक बीयर' नामक पत्रिका की वार्षिक सदस्यता मुफ्त । पता चला है कि योजना काफी सफल रही है । अपने-अपने प्रोत्साहन हैं और भाँति-भाँति के भक्त । एक बार अटल जी पाकिस्तान गए तो एक पत्रकार अतिया ने अटल जी से कहा कि यदि आप कश्मीर मेहर में दे दें तो मैं आप से शादी करने के लिए तैयार हूँ । अपहरण कर्ताओं ने अमिताभ और आशा पारेख के अनुरोध के बदले ही बंधकों को छोड़ना स्वीकार कर लिया था पर चूँकि फ़िल्म वालों का तो एक वाक्य ही विज्ञापन में लाखों का बिकता है सो किसी ने अपहरण कर्ताओं से अनुरोध नहीं किया । वर्ल्ड कप के समय एक सुन्दरी ने कहा था कि वह गोल करने वाले अपने देश के खिलाड़ी को चुम्बन देगी । अब जिसके पास जो कुछ है वह वही तो देगा । कोई बीयर के बदले खून देता है । जिसके पास दाम है वह दाम देता है पर बीयर तो चाहिए ही । अब यह अलग बात है कि एक लीटर बीयर पीने के बाद यदि किसी रक्तदान करने वाले का एक की जगह दो बार खून निकल लिया जाए तो भी उसे क्या पता चलेगा । अपने यहाँ भी तो चुनाव से पहले की रात दारू की थैलियाँ बाँटी जाती हैं । अब कोई भारत को पिछड़ा न कहे । यहाँ भी योरप की तरह सब कुछ बाज़ार हो गया है । हर चीज़ को लेन-देन के दायरे में ले आया गया है । यह खून लेकर बीयर देना इस ग्लोबल विलेज का बाजारवाद नहीं, प्रतिभा-सम्मान-समारोह है ।
८ जनवरी २००९
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हमारा कमरा बाहर की तरफ़ दरवाजे के पास है । चूँकि हमारी नींद कुछ खुल जाती है सो दूध भी हमीं लेते हैं । अख़बार भी लगभग इसी समय आ जाता है । चाय के साथ अखबार के सेवन से दिनचर्या शुरू होती है । प्रायः अख़बारवाला थोड़ा पहले आ जाता है पर वह न तो दरवाजा खटखटाता है और न ही आवाज़ लगाता है । बस दरवाजे के नीचे से अखबार सरका देता है । आज उसने अख़बार डालने के बाद दरवाजा खटखटाया और आवाज़ भी लगाई- मास्टर जी,दरवाजे पर कोई हैप्पी न्यू ईयर पड़ा है, ज़रा संभाल लीजियेगा ।
'दरवाजे पर हैप्पी न्यू ईयर पड़ा है'- बड़ा अजीब-सा संदेश था । हम उत्सुकतावश उठे । दरवाजा खोला पर तब तक अख़बारवाला जा चुका था । देखा एक सज्जन सीढ़ियों के पास गिरे पड़े थे । हमने उसे हिला कर पूछा- क्यों भई क्या बात है? बोला- थोड़ा सहारा दीजिये । ज़्यादा चोट तो नहीं आई पर लगता है उछलने से पैर में मोच आ गई है । हमने उसे सहारा देकर उठाया, सीढ़ियों पर बैठाया और पूछा- कौन हो? बोला- हैप्पी न्यू ईयर हूँ । हमने कहा- हैप्पी हो तो मुस्कराते हुए आते, यह क्या ?
उसने विस्तार से बताया- मास्टर जी, क्या हैप्पी और क्या सेड । ३१ दिसम्बर को रात के ठीक १२ बजे तारीख़ बदलती है सो मुझे आना पड़ता है वरना फ़र्क तो क्या पड़ने वाला है- ३१दिसम्बर और १ जनवरी में । दोनों दिन वही ठण्ड ,वही गए साल का रोना, वही सूखी-सतही शुभकामनाओं का आदान-प्रदान, वे ही घिसे-पिटे जुमले । हमने कहा- ज़रा संभल कर चला करो । कोई बी.एम.डब्लू. कारवाले टक्कर तो नहीं मार गए? बोला- टक्कर तो मार ही जाते । पैसेवालों के ठलुए छोरे चला रहे थे गाड़ी, बड़ी तेज़ । यह तो मैं उछल कर एक तरफ़ हो गया वरना तो टक्कर मार ही जाते । वैसे उनकी भी क्या गलती । पिए हुए थे बेचारे और फिर कार और पेट्रोल भी कौन से अपनी कमाई के थे जो सोचते । बाप की कमाई है । और बाप भी कौन-सी दसों नाखूनों की कमाई करता है । वह तो भी दो नंबर का धंधा ही तो करता है। सो सपूत भी ऐसे ही होंगें । वे धन की चकाचौंध में थे और मैं भी तेज़ रोशनी से घबरा गया था । पर खैर जान बची और लाखों पाये ।
हमने 'हैप्पी न्यू ईयर' को अन्दर लिया, बैठने को कुर्सी दी और कहा- चाय का पानी चढाते हैं। जब तक दूध आए तब तक ज़रा अख़बार देख लेते हैं । हमने पूछा- जिस कार से तुम्हें टक्कर लगने वाली थी वह काले रंग की तो नहीं थी ?बोला- हाँ जी, काली ही थी । हमने उसके सामने अख़बार पटकते हुए कहा- लो, देख लो यह वही कार लगती है। खंभे से टकराकर उलट गई और उसमें सवार तीनों युवक अस्पताल में हैं । तीनों ही पिए हुए थे ।
३१ दिसम्बर २००८
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