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Mar 6, 2012

मत मुस्कराओ, बुद्ध !



प्रभु !
तुम सदैव मुस्कराते रहते हो |
ज्योतिषियों से तुम्हारा भविष्य सुनकर
जब राजा शुद्धोदन ने तुम्हें
घेर दिया था सुंदरियों से,
फैला दिया था चारों ओर भोग का दलदल,
बाँध दिया यशोधरा के बाहुपाश में,
जब रखा गया था तुम्हारे पुत्र का नाम राहुल अर्थात 'बंधन'
तब भी तुम मुस्करा रहे थे;
वृद्ध, बीमार और मृत व्यक्तियों को देखकर भी
खेलती रही थी तुम्हारे मुख पर यही मुस्कराहट |

जब तुम्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने या
अमरत्व प्रदान करने के लिए
उकेर दिया था पहाड़ों के वक्षस्थल पर
या अजंता की पहाड़ियों के सीने में से
काटकर जीवंत कर दिया था तुम्हें
नीम अँधेरे में अपनी आत्मा की आँखों से,
या हो रहा था तुम्हारा आयात-निर्यात
एशिया के विभिन्न देशों को
तब भी तुम इसी तरह से मुस्करा रहे होगे |

आज जब तुम्हारे
अंग-प्रत्यंग में डायनामाइट भर कर शीघ्रातिशीघ्र
फतवे की तारीख़ और पवित्र त्यौहार से पहले
तुम्हारी मूर्तियों को धराशायी करने का पवित्र कार्य
सारी दुनिया के विरोध के बावज़ूद चल रहा है
तब भी तुम मुस्करा रहे हो |

और तो और तुम तो
सारनाथ के संग्रहालय में, एकांत में भी
अनंतशायी मुद्रा में मुस्करा रहे हो |



मूर्तियों को तोड़ने के बाद
बनाया जाएगा उनका चूर्ण और
अंतिम उपाय के रूप में पिला दिया जाएगा
दैत्य-गुरु को शराब में घोल कर,
तब भी तुम मुस्करा रहे होगे |

दैत्य-गुरु से ज्यादा डरे हुए हैं उनके भक्त
क्योंकि उन्हें घूरती है हर घड़ी
तुम्हारी अक्षय, अनंत मुस्कराहट |
काश, तुम डरते, भयभीत होते, उनके सामने गिड़गिड़ाते
तो इतना नहीं डरते ये मूर्ति-भंजक |
तुम बहुत विचित्र हो प्रभु,
वास्तव में अज्ञेय,
किसी भी क्रोध से अधिक डराती है तुम्हारी मुस्कराहट

डरे हुए हैं दैत्य-गुरु भी
उस आगत उदर पीड़ा से
जिसके इलाज़ के लिए संजीवनी मन्त्र सिखाकर
तुम्हें फिर निकाला जाएगा उदर चीर कर |
तब भी तुम मुस्करा रहे होगे |

और अपनी संजीवनी विद्या से दैत्य-गुरु को
जीवित करते हुए भी तुम मुस्करा ही रहे होगे प्रभु !

क्या आप कुछ देर के लिए
मुस्कराना बंद नहीं कर सकते ?
आपकी मुस्कराहट से बड़ा डर लगता है, भगवन !

७-३-२००१ (11 साल पूर्व आज ही के दिन )

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Dec 2, 2010

विकिलीक्स का असांज और हिलरी का असमंजस


हिलरी जी,
नमस्ते । हम तो आपके बहुत पहले से ही प्रशंसक हैं । तब से, जब आप मात्र एक वकील और क्लिंटन जी की पत्नी ही थीं सांसद तो खैर आप बाद में बनीं हैं । जब क्लिंटन जी उस प्रशिक्षु मोनिका वाले केस में फँस गए थे तब आपने एक सच्ची और आदर्श भारतीय पत्नी की तरह उनको बचाने के लिए मौन धारण कर लिया था और महिला स्वतंत्रता वाली औरतों के बहकावे में नहीं आईं । बड़ा समझदारी का निर्णय था । जो हो गया सो तो हो ही गया, चाहे क्लिंटन की फजीहत हो और चाहे आपका अपमान । अगर उस समय गुस्से में आकर बोल पड़तीं तो मियाँ जी की और किरकरी होती और राष्ट्रपति पद की पेंशन से भी हाथ धो बैठते । अच्छा किया । पर हम इतना ज़रूर जानते हैं कि आपने घर में उनकी अच्छी तरह से खबर ली होगी । बस उसी दिन से हम आपकी कूटनीति और ज़ब्त करने की क्षमता के कायल हो गए थे ।

अब यह विकिलीक्स वाला लफड़ा आ गया । वैसे लोग कह रहे हैं कि अमरीका की बड़ी किरकिरी हो रही है । पर आप और हम जानते हैं कि इससे कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं । यह सब तो होता ही रहता है । क्या घर में नल लीक नहीं करता ? पहले जब स्याही वाला पेन चलता था तो क्या उसकी स्याही लीक नहीं होती थी ? आपने देखा होगा कि बहुत से लोगों की सर्दियों में प्रायः नाक लीक करने लग जाती है । कुछ लोग सावधान नहीं होते तो नाक का वह द्रव पदार्थ कभी-कभी मुँह में भी प्रवेश कर जाता है । कई पशु वर्षा ऋतु में अधिक घास खा जाते हैं तो वे भी पीछे से लीक होकर सड़कें गंदी करते फिरते हैं । जिन देशों के पास बिना मेहनत के जब ज्यादा धन आ जाता है तो वे भी दुनिया में गंदगी लीक करते फिरते हैं, जैसे कि आज कल के नवधनाढ्य वर्ग के लाडले सपूत । क्या जब डेयरी के दूध की थैली लाते हैं तो कभी-कभी वह लीक नहीं होती ? क्या घर-घर की बातें ऐसे ही लीक नहीं होतीं ? मोनिका वाली बात भी तो लीक हो गई थी । निक्सन के वाटर गेट का वाटर भी तो लीक हो गया था । क्या हुआ दो-चार दिन थू-थू हुई और फिर सब ठीक हो गया । क्लिंटन जी फिर से ठहाके लगाने लग गए । सो यह विकी लीक वाला लीकेज भी बंद हो जाएगा ? ‘एम-सील’ की तरह आपके यहाँ भी लीकेज ठीक करने के लिए कुछ न कुछ ज़रूर आता होगा । हमारे यहाँ तो किसी भी केस को निबटाने का सब से बढ़िया तरीका यह है कि या तो फ़ाइल गायब करवादो या उस दफ्तर में ही आग लगवा दो । न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी । लिखने को तो हम ओबामा जी को भी लिख सकते थे मगर वे तो इधर-उधर कम ही जाते हैं मगर आपको तो ट्रेवलिंग सेल्समैन की तरह सारी दुनिया में घूमना पड़ता है । क्या पता, कब कोई, क्या सवाल कर ले ?

वैसे लीक करने को टपकना भी कहते हैं । टपकना एक निरंतर प्रक्रिया है । तभी विद्वानों ने कहा है- 'बूँद बूँद से घट भरे, टपकत रीतो होय' ।
इस सूचना-घट रूपी मोबाइल का मेसेज बोक्स समय-समय पर खाली करते रहना चाहिए । और फिर हम तो कहते हैं कि ऐसे सद्वाक्यों का संग्रह करने से क्या फायदा ? इनका तो मुखारविंद से बोलकर ही सुख लिया जाना चाहिए । मौखिक होने से कभी भी बयानों से मुकरा जा सकता है, जैसे कि हमारे नेता । जब कुछ भी, जिसे हमने अन्तरंग क्षणों में कहा है, सरे आम प्रकट हो जाए तो एक बार तो अजीब लगता ही है । किसी भले आदमी को शर्म भी आ सकती है । मगर यह कमज़ोर आदमियों की बीमारी है । नेताओं को शर्माना शोभा नहीं देता । शर्म तो कुलवधुओं का शृंगार है । वेश्या के मामले में तो यह दुर्गुण माना जाता है । सो शर्म को झटकिये और काम पर चलिए ।

बेताल की तरह हम भी आपको लीक करने, मतलब कि टपकने, के बारे में एक कहानी सुनाते हैं । एक बुढ़िया थी । उसकी झोंपड़ी टपकती थी । एक बार सर्दी का मौसम था । बारिश के आसार बनने लगे । बुढ़िया बड़बड़ाने लगी- मुझे शेर से भी इतना डर नहीं लगता जितना टपूकड़े से लगता है । बरसात में भीगता-भीगता एक शेर उस झोंपड़ी के पास खड़ा था । उसने सोच- यह टपूकड़ा तो लगता है कि मुझ से भी खतरनाक जानवर है । तभी एक कुम्हार अपने गधे को ढूँढता हुआ वहाँ आ गया । बिजली की कौंध में उसने शेर को अपना गधा समझा और कान पकड़ कर घर ले गया । शेर ने उसे टपूकड़ा समझ कर चूँ तक नहीं की ।

सो टपूकड़े को इतना खतरनाक समझने से कभी-कभी उस शेर जैसी हालत हो सकती है । इसलिए आप इससे बिलकुल भी मत घबराइए । वैसे हमें विश्वास है कि आप घबरा भी नहीं रही होंगी । इतने बड़े देश को पता नहीं क्या-क्या करना पड़ता है ? ऐसे ही घबराने लगे तो हो ली दुनिया की थानेदारी ।



अब कोई पूछने वाला तो हो भाई क्या है उस विकीलीक में ? यही कि किसी को 'कुत्ता' कह दिया, किसी को नंगा । अजी हमारे यहाँ कहावत है- ‘हमाम में सभी नंगे होते हैं' । सभी अपनी निजी बातों में ऐसी ही ‘संसदीय-भाषा’ का प्रयोग करते हैं । पहले किसिंगर और निक्सन के निजी वार्तालाप में हमारी नेता इंदिरा जी को 'बूढ़ी चुड़ैल' कहा गया था । यह 'प्रशंसा' तो बहुत पहले लीक हो गई थी मगर किसी भी देश भक्त या कांग्रेस भक्त ने कोई विरोध प्रकट नहीं किया । वैसे आप जानती हैं कि विरोध प्रकट करके भी हम क्या कर लेते ? यह बात और है कि अब, जब सुदर्शनजी ने सोनियाजी के बारे में कुछ कहा तो भक्तों ने बड़ा हल्ला मचाया और एक ने तो कोर्ट में केस भी कर दिया । गोरे लोगों की बात और है । उनकी गाली को हमने कभी गाली नहीं माना । वे हमें प्यार से 'ज़मीन पर हगने वाला काला आदमी' और 'कुत्ता' कहा करते थे । और हम 'यस सर' कह दिया करते थे । ठीक भी है, गोरे लोगों का हगा हुआ तो गुरुत्वाकर्षण के नियमों के विरुद्ध कहीं अंतरिक्ष में चला जाता है ।

वैसे जहाँ तक कुत्ते की बात है तो ओबामा जी ने खुद स्वीकार किया है कि विरोधी पार्टी वाले उन्हें 'कुत्ता' कहते हैं । कुत्ता कोई बुरा शब्द नहीं है । एक फिल्म में तो राजेश खन्ना शर्मीला टैगोर को 'कुत्ती चीज' कहता है । प्यार में इस शब्द के बड़े अध्यात्मिक मायने हैं । कबीर दास तो अपने को 'राम की कुतिया' कहते हैं-
कबीर कुतिया राम की मुतिया मेरो नाउँ ।
गले राम की जेवड़ी जित खेंचे तित जाउँ । ।
राजनीति में इतनी भक्ति और समर्पण संभव नहीं है फिर भी कभी न कभी अपने स्वार्थ ले किए किसी न किसी का कुत्ता बनना ही पड़ता है ।

यदि यह विकिलीक वाला लीकेज नहीं भी होता तो भी सारी दुनिया जानती ही है कि किस देश का क्या चरित्र है । एक बार अमरीका ने रूस की जासूसी करने के लिए यू.टू. नामक बहुत ऊँचाई पर उड़ने वाला एक विमान भेजा जो ज़मीन पर से किसी भी राड़ार की पकड़ में नहीं आता था । यह बात आइजनहावर के ज़माने की है । रूस ने कहा- अमरीका हमारी जासूसी करने के लिए विमान भेज रहा है । अमरीका ने मना किया । रूस ने फिर कहा- हमने उसे मार गिराया है । तो अमरीका ने कहा- हाँ, हमारा एक विमान रास्ता भटक गया था, हो सकता है यह वही विमान रहा हो । रूस ने फिर कहा- हमने उस विमान को गिरा लिया है, उसका पाइलट जिंदा है, हमारी हिरासत में है और उसने सब कुछ कबूल लिया है । तो अमरीका अपने वाली पर उतर आया और कहा- हाँ, हमने जासूसी की है और करते रहेंगे । रूस ने कहा- 'अब की बार जब कोई विमान हमारे यहाँ आया तो हम उस अड्डे को ही नष्ट कर देंगे जिससे वह उड़ कर आया होगा' । इसके बाद अमरीका ने कोई विमान नहीं भेजा । खैर, अभी तो ऐसी कोई चुनौती है नहीं । अगर इस विकिलीक के कारण ऐसी कोई समस्या आई तो देखेंगे । अभी से क्या परेशान होना ।

वैसे दुहरा आचरण करने वाले की भी बड़ी समस्याएँ होती हैं । सच बोलने वाले को कुछ भी याद नहीं रखना पड़ता । चाहे आधी रात को उसे उठाकर पूछो तो भी कोई समस्या नहीं । वही बोलना है जो हमेशा बोलता है । मगर झूठ बोलने वाले को बहुत याद रखना पड़ता है कि किसको, कब, क्या बताया था ? जब अमरीका सारी दुनिया में तरह-तरह के धंधे करता है तो कई तरह की बहियाँ रखनी पड़ती हैं, कई तरह के उलटे-सीधे काम करने पड़ते हैं, जाने किस-किस को क्या-क्या कहना पड़ता है । कभी भी, कुछ भी लीक होने का डर रहता है । नामी-बेनामी प्रोपर्टी का धंधा करने वाले के सैंकड़ों प्लाट होते हैं । तो कभी-कभी चक्कर में भी पड़ ही जाता है । मगर ऐसी छोटी-मोटी बातों के कारण धंधा तो नहीं छोड़ा जा सकता ना ।

खैर, अमरीका की इस स्थिति के बारे में फिर कभी बात करेंगे । अभी तो इस लीकेज को ठीक करवाइए । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाटक का मुखौटा उतार कर, किसी न किसी तरह इस विकी लीक वाले जूलियन असांजे को ठिकाने लगवाइए । वैसे इंटरपोल ने वारंट जारी करके इस शुभ कार्य का श्रीगणेश कर तो दिया है । और आपके बगलबच्चे कनाड़ा के प्रधान मंत्री के सलाहकार कॉलेज के प्रोफ़ेसर टॉम फ्लेनेगन ने तो असांज की हत्या करने की नेक और लोकतांत्रिक सलाह भी साफ़-साफ़ दे ही दी है । यदि ज्ञान के पुजारी एक गुरु ने ही सत्य का गला घोंटने की सलाह दी है, तो ये पश्चिम का पढ़ा-लिखा तालिबान ही है ? अब देर किस बात की- शुभस्य शीघ्रं ।

१-१२-२०१०

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Feb 14, 2010

अच्छा तालिबान


[सन्दर्भ- अमरीका ने अफगानिस्तान के थ्रू अच्छे तालिबानों को हथियार छोडने के बदले नकद, ज़मीन, नौकरी और राजनीति में हिस्सेदारी देने की पेशकश की, २७-१-२०१ ]

1.
हुआ यूँ कि रात को दो बजे ही नींद खुल गई । जब कई देर तक नींद नहीं आई तो सोचा कि कुछ पढ़ ही लें । पढ़ते-पढ़ते चार बज गए । सोचा अब क्या सोएँगे । सो किताब बंद करके लेट गए कि थोड़ी देर में दूध वाला आएगा तो चाय बनायेंगे । पर ऐसी नींद लगी कि पता नहीं कि कब दूधवाला आ गया और कब अखबारवाला । पत्नी ने धीरे से कान के पास मुँह लाकर कहा- सुनते हो, किसी ने बाहरसे आवाज़ दी पर तुम्हारी तो नींद ही नहीं खुली । मुझे रसोई में आवाज़ सुनी तो दरवाज़ा खोला । तो क्या देखती हूँ कि एक पतला सा दाढ़ी वाला आदमी दरवाजे पर खड़ा है, कह रहा है- क्या उस्ताद साहब घर पर तशरीफ फ़रमा हैं ? उन्हें बाहर भेजिए । मैनें पूछा तुम कौन हो तो बोला- हम अच्छे तालिबान हैं ।

हमारा तो दिमाग चकरा गया । तालिबान और अच्छे । वकील और सच्चा, डाक्टर और संवेदनशील, नेता और ईमानदार । कैसा विरोधी बातों का संगम है । लोग कहते हैं कि अधिकतर साँप ज़हरीले नहीं होते पर भाई साहब, ज़हरीला है कि नहीं यह तो बाद में पता चलेगा पर उससे पहले ही आदमी डर के मारे मर जायेगा । तालिबान तो तालिबान है क्या अच्छा और क्या बुरा । कहा भी है- 'काटे, चाटे स्वान के दुहूँ भांति विपरीत ' । न डरने का नाटक करते हुए कहा- अच्छा तालिबान है तो उसे कुर्सी पर बैठाओ और चाय बना दो । पर उसके सामने काला कम्बल ओड़कर जाना क्योंकि सुनते हैं कि वे परदे के बड़े पाबंद होते हैं । पढाई को भी पसंद नहीं करते सो पूछे तो कह देना कि मैं तो अंगूठा छाप हूँ । नहीं तो पता नहीं तुम्हें गोली ही न मार दे ।

बाहर आकर देखा तो आकार प्रकार से लगा कि एक तालिबान के दो पीस कर दिए हों । लगता था कि वह खड़ा हुआ भी ओसामा की कमर तक ही आएगा । फिर भी सावधानी बरतते हुए ढंग से ही बात शुरू की- तो अच्छे तालिबान साहब, आप खड़े क्यों हैं । तशरीफ़ फ़रमायें ।

उसने अपना टोपा कुर्सी पर रख दिया । हमने फिर कहा- अजी, तशरीफ़ रखिये । तो उसने अपना कोट उतार कर कुर्सी पर रख दिया । बड़ा अजीब लगा कि यह शख्स क्या कर रहा है । हमने ज़रा जोर से कहा- अरे मियाँ, तशरीफ़ रखिये ना । इस पर उसे भी ताव आगया । कहने लगा- अब इससे ज्यादा तशरीफ़ रखकर सर्दी में मरना है क्या ?

हमने उसे पहचान लिया और उसकी दाढ़ी खींचते हुए कहा- अरे तोताराम ! यह क्या नाटक है ।

बोला- अफगानिस्तान जा रहा था, सो आ गया । तू चले तो तुझे भी ले चलूँ । चलना है तो तैयार हो जा ।

हमने कहा- तेरा दिमाग खराब है क्या ? एक तो वैसे ही बिना पासपोर्ट के क्या, पासपोर्ट होने पर भी सीमा पर कोई भी पाकिस्तानी पुलिस वाला पकड़ कर जेल में डाल देगा ।

तोताराम बोला- अब वह बात नहीं है, अब तो अमरीका ने पकिस्तान को कह दिया है कि कहीं से भी, कोई भी अच्छा तालिबान मिले तो तुरंत पकड़ कर हाज़िर करो । हम कह देंगे कि हम अच्छे तालिबान हैं और हम अफगानिस्तान की मुख्य धारा में शामिल होना चाहते हैं । बस वे हमें नेटो सेना के कमांडर के सामने हाज़िर कर देंगे और वह हमें दस-बीस लाख रुपये और बीस-तीस बीघा ज़मीन दे देगा ।

हमने कहा - तोताराम हमें न तो पश्तो आती है और न ही फ़ारसी, और फिर उन उजड्ड लोगों के बीच अपनी पार भी नहीं पड़नी । पाँच-सात बरस बचे हैं सो यही काट लेंगे ।

तोताराम बोला- तो क्या मुझे बसना है वहाँ । अरे, नकद पैसे जेब के हवाले करेंगे और ज़मीन जितने में बिकेगी बेच-खोच अपना आ जायेंगे इधर ।

हमने कहा- पर अगर उसने कहा- बंदूक जमा करवाओ तो क्या कहेंगे ।

तोताराम बोला- इसमें क्या है । कह देंगे- अजी, हम तो आपका प्रस्ताव सुनकर ही इतने अच्छे बन गए कि बंदूक वहीं फेंक दी और पूरे सूफ़ी बन कर आगये आपकी शरण में ।

हमने कहा- तोताराम, अभी तो प्रस्ताव आया है । ज़रा इंतज़ार करलें । ठंडा करके कहना ठीक रहेगा वरना मुँह जल जायेगा ।



2.
अगर समझाने से ही मान जाये तो तोताराम ही क्या । बोला- मास्टर यह ज़माना धीरज का नहीं है । चतुर सम्पादक किसी नेता के मरने का इंतज़ार नहीं करते, वे तो उसके बीमार होते ही देहांत का विशेष परिशिष्ट तैयार कर लेते हैं । समझदार माता-पिता बच्चा पैदा होते ही एडमीशन के लिए उसके नाम का रजिस्ट्रेशन करवा देते हैं । आजकल समय का बड़ा महत्व है । सुना नहीं, नायक कहता है- मेहंदी लगाके रखना, डोली सजाके रखना, लेने तुझे ओ गोरी, आयेंगे तेरे सजना, । पता नहीं कौनसा सर्वार्थ-सिद्धि योग मिस हो रहा है ।

हमने सोचा कि यह मानने वाला नहीं है । हमारा मन भी अपने बाल-सखा को अकेले अफगानिस्तान जाने देने का नहीं हो रहा था सो दोनों तरफ के किराये और खाने-खर्चे के लिए दो हज़ार रुपये जेब में डाले और कम्बल कंधे पर डाल चल पड़े तोताराम के साथ अफगानिस्तान के लिए ।

सोच रहे थे कि पता नहीं बार्डर पार करने में कितनी परेशानी आयेगी । पर वहाँ तो नज़ारा ही कुछ और था । लाइन लगी हुई । वाघा बार्डर पर इतना ही पूछा- क्या अच्छे तालिबान हो ? हमने एक स्वर से कहा- जी हाँ । और आगे बढ़ गए । उस तरफ मतलब कि पाकिस्तान में भी यही हाल था । वहाँ भी चेकिंग-वेकिंग कुछ नहीं बल्कि बड़े आदर से स्वागत किया- 'खुशामदीद, अच्छे तालीबान जी ' । हमारा तो दिल गदगद हो गया । सीमा पर पता नहीं क्यों लोग गोलीबारी की झूठी खबरें फैलाते हैं । यहाँ तो बड़ा सभ्य वातावरण है । कितने प्यार से पेश आ रहे हैं लोग जैसे कि हम शादी में आये हैं । हमने पूछा- बिरादर, आपको कैसे पता चला कि हम अच्छे तालिबान हैं । उसने उत्तर दिया- यहाँ तो २७ जनवरी की रात से ही आने वालों का ताँता लगा हुआ है । सभी अच्छे तालिबान हैं । हमें लगा कि अमरीका तालिबानों को बिना बात ही बदनाम कर रहा है । दूर-दूर तक कहीं भी कोई बुरा तालिबान दिखाई नहीं देता ।

प्रहरी ने हमारी तन्द्रा भंग की- अरे भई अच्छे तालिबानों, क्या सोच रहे हो । वो सामने जो बस खड़ी है उसमें घुस जाओ वरना भीड़ और बढ़ जायेगी । पर बस में भी कहाँ जगह थी । किसी तरह छत पर चढ़ गए । अफगानिस्तान जाकर देखा तो नज़ारा ही कुछ और था । हजारों लोग कम्बल ओढ़े एक मैदान में बैठे थे । हम भी उनमें शामिल हो गए । शाम को जाकर कहीं हमारा नंबर आया ।

तम्बू में दाखिल हुए । वहाँ एक अमरीकी अधिकारी बैठा था । उसने जाते ही फटाफट पूछा-
अधिकारी- तुम्हारा नाम ?
तोताराम ने कहा-जी, मेरा नाम 'तोताराम अच्छा तालिबान' है ।
हमने कहा- जी मेरा नाम रमेश जोशी है । इसके अलावा हमारे दोनों के रेज्यूमे एक ही हैं । सो तोताराम ही ज़वाब दे देगा ।
अधिकारी- तुमने अब तक बुरका न पहनने के जुर्म में कितनी महिलाओं के नाक-कान काटे ?
तोताराम- जी हमने ऐसा कोई काम नहीं किया ।
अधिकारी- कितने मदरसों को बम से उड़ाया ?
तोताराम- जी हमने कहा ना हम अच्छे तालिबान हैं । हम ऐसा कैसे कर सकते हैं ।
अधिकारी- कितने भीड़ भरे स्थानों पर बम रखे और उस हादसे में कितने लोग मरे ?
तोताराम- जी, हम वास्तव में अच्छे तालिबान हैं ।

अधिकारी ने खा जाने वाली नज़रों से तोताराम को देखा और चिल्लाता हुआ सा बोला- तो फिर क्यों यहाँ हमारी खोपड़ी खाने आ गया । यहाँ कोई खैरात बँट रही है क्या । चला आया अच्छा तालिबान । तेरे जैसे अच्छे तालिबान हमारे यहाँ क्या कम हैं । पैसा ही लुटाना होता तो उन्हीं को न दे देते पैकेज । अरे, हम तो उन लोगों को ढूँढ रहे हैं जो हमारी जान खा रहे हैं , जिनके कारण हम यहाँ फँसे पड़े हैं । जितना खर्चा हो रहा है उसको देखते हुए तो यह पैकेज देना सस्ता सौदा है । हो सकता है कि पैसे के लालच में ये लोग आ जाएँ । पहले भी तो पैसे के बल पर ही तो इनको तालिबान बनाया था । अब ये अच्छे तालिबान बन जाएँ तो हम यहाँ से बोरिया बिस्तर समेटें । दस साल हो गए इस साँप-छछूँदर के खेल में हलकान होते हुए ।

तोताराम ने कहा- तो हुजूर, हमारे लिए क्या हुक्म है ?
अधिकारी- हुक्म यही है कि जल्दी से खिसक लो । तुम लोग वास्तव में भले आदमी लगते हो नहीं तो बिना पासपोर्ट घुस आने के जुर्म में कभी का अंदर करवा दिया होता ।

हम और तोताराम इतना डर गए थे कि पता नहीं कब बस में बैठे और कब वाघा बार्डर पहुँच गए ।


3.
बार्डर वाले ने हमें पहचान लिया और बोला- लगता है भागते-भागते आये हो । ज़रा सुस्ता लो । उसने हमारे लिए चाय मँगवाई । किसी तरह जान में जान आई । हमारे मन में उसके लिए बड़ा आदर उमड़ आया । हमने कहा- भैया, कुछ भी कहो, अपने वाला अपने वाला ही होता है । भले ही हमें राजनीति ने अलग कर दिया पर आज से बासठ साल पहले हम एक देश के नागरिक थे । आखिर कुछ तो रिश्ता है ही । उस अमरीकी ने तो ऐसा डाँटा कि बस कुछ मत पूछो । और एक तुम हो कि चाय पिला रहे हो ।


उसने बात बदली- तो पैकेज कितना मिला ?
हमने अपना दुखड़ा रो दिया- अरे कैसा पैकेज । जान बच गई सो क्या कम है ? बिना बात दो हज़ार की चपत लग गई । अब तक आने और खाने में एक हज़ार खर्च हो गए । अब जो एक हज़ार बचे हैं वे जाते में खर्च हो जायेंगे ।
उसने कहा- जान बच गई सो बड़ी बात है । जान है तो ज़हान है । पैसा का क्या, पैसा तो हाथ का मैल है । क्या जान बचने की खुशी सेलेब्रेट नहीं करेंगे ?

और उसने हम दोनों की जेब से सारे रुपये निकाल लिए और हँसते हुए बोला- बिरादर, अब इसे आप चाहे जान बचने का शुकराना समझ लो, चाहे बिना पासपोर्ट सीमा पार करने का जुर्माना, चाहे हमारे क्रिकेट खिलाड़ियों को आई.पी.एल. में न खरीदने का हरजाना समझलो । आखिर उनका भी तो टी.ए.डी.ए. खर्च हुआ था भारत आने-जाने में ।

इधर आये तो हमारा फुल बाडी एक्सरे हुआ । जैसे ही एक्स रे केबिन से बहार निकले तो अधिकारी ने घूरा- पैकेज कहाँ है ? हमने कहा- पैकेज । अरे साहब, कहाँ का पैकेज । हमारे एक हज़ार तो जाते समय खर्च हो गए और जो आने के लिए एक हज़ार रखे थे वे पकिस्तान के अधिकारी ने ले लिए ।

अधिकारी ने कहा- कोई बात नहीं । कुछ नहीं तो इधर से गुजरने के शुल्क के रूप में अपनी-अपनी कम्बलें यहाँ रख दो ।

अब बिना पैसे और कम्बल के ये दो बुद्धू कब और कैसे घर लौटेंगे ? भगवान ही जानता है ।


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Jhootha Sach