Nov 15, 2008
तोताराम के तर्क - बुश की बिल्ली :ओबामा का कुत्ता
आज तोताराम ने आते ही पूछा- मास्टर, अपना मोती किस नस्ल का कुत्ता है? हमें हँसी आ गई, कहा- अरे, कुत्ते की भी कोई नस्ल होती है क्या? कुत्ता माने कुत्ता। सभी कुत्ते पूँछ हिलाते हैं, सभी कुत्ते तलवे चाटते हैं, सभी चोरों को देख कर चुपचाप पड़े रहते हैं और सज्जनों को भोंकते हैं। कुत्ते की अपनी कोई जाति, धर्म, नस्ल, भाषा, प्रांतीयता, राष्ट्रीयता नहीं होती। जैसा मालिक वैसा कुत्ता। नवाब का कुत्ता पूजनीय तो गरीब के कुत्ते को कोई भी पत्थर मार सकता है। बॉस का कुत्ता मुतिया नहीं, मोतीजी होता है। गरीब हीरा भी पहन ले तो काँच और अम्बानी काँच भी पहनले तो कोहिनूर। कुत्ते की नस्ल नहीं उसके मालिक का नाम पूछा जाता है। अपने देश में चुनाव में टिकट देते समय, स्कूल में प्रवेश, नौकरी में आरक्षण, सस्ता अनाज, मुफ्त बिजली देते समय भले ही जाति, धर्म पूछे जाते हों पर वैसे जाति धर्म की बात करना असंवैधानिक है। और अब जब ओबामा अमरीका के राष्ट्रपति बन गए तो समझले सारी दुनिया में नस्ल का प्रश्न बेमानी हो गया है। फिर भी आज तू कुत्तों की नस्ल के बारे में क्यों पूछ रहा है?
तोताराम बोला- भले ही ओबामा ने परिवर्तन के नाम पर जीत हासिल की हो पर व्हाइट हॉउस की परम्परा में परिवर्तन नहीं कर सकेंगे। उन्हें भी क्लिंटन और बुश की तरह कुत्ता पालना ही पड़ेगा। वैसे अभी बुश ने सलाह दी है कि कुत्ते की नस्ल जैसे महत्वपूर्ण मामले को अभी सार्वजनिक नहीं किया जाए। बुश ने अपनी बिल्ली का नाम 'इंडिया' रखा था मैं सोचता हूँ कि ओबामा को एक भारतीय नस्ल का कुत्ते भेंट करूँ और प्रार्थना करूँ कि वे उसका नाम 'भारत' रखें। इससे 'इंडिया की जगह 'भारत' की स्थापना की कामना कराने वालों की भी आत्मा शांत हो जायेगी। बुश के जाते-जाते 'इंडिया' को परमाणु समझौता मिला तो ओबामा के जाते-जाते भी भारत को भी कुछ न कुछ जरूर मिलेगा।
हमने कहा- फालतू की बातें मत सोच। कुत्ता कुत्ता ही होता है। हर कुत्ता टाँग उठाकर पेशाब करता है। कोई कुत्ता दूध नहीं देता। वे जाने उनके कुत्ते जाने। वैसे जहाँ तक इतिहास की बात है तो पिछले पचास साल में तो अमरीका ने पाकिस्तानी कुत्ते ही पसंद किए हैं। तोताराम बोला- पर यह भी तो सिद्ध हो चुका है कि पाकिस्तानी कुत्तों ने बिस्कुट तो अमरीका के खाए पर दुम हिलायी आतंकवादियों के आगे। ऐसे कुत्ते मौका लगने पर मालिक को भी काट सकते हैं। भारतीय नस्ल का कुत्ता भले ही पड़ोसी की मुर्गी चुरा कर न लाये पर मालिक को कटेगा तो नहीं। भारतीय कुत्ता अपना धर्म समझता है। खैर, ओबामा किसी भी नस्ल का कुत्ता पालें, कुत्ता पालें या गाय यह उनका आतंरिक मामला है। हमें तो इसी बात से खुश है कि तोताराम को भारतीय नस्ल के कुत्तों पर गर्व तो है।
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१२ नवम्बर २००८
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Jhootha Sach
Nov 9, 2008
तोताराम के तर्क - ज़रदारी की बीमारी
जब से समाचार पढ़ा, हम तो भरे बैठे थे । जैसे ही तोताराम आया हम उस पर ही पिल पड़े- यार, यह ज़रदारी भी अजीब आदमी है । पहले नवाज़ शरीफ़ को चरका दिया और अब अमरीका यात्रा पर गया तो पालिन को देखते ही लार टपकाने लगा । कहता है- जितना सुना था उससे ज्यादा खूबसूरत पाया आपको । इसके बाद फोटोग्राफरों ने हाथ मिलाते हुए पोज़ देने को कहा तो क्या बोलता है- ये कहें तो गले लगा लूँ । कोई बात हुई ? ठीक है, विधुर है । मात्र तरेपन बरस का है पर शिष्टाचार भी कोई चीज़ है । तीन तीन बेटे-बेटियों का बाप है । बच्चे भी क्या सोच रहे होंगे? अपने मनमोहन जी को देखो, बेचारे आँख तक नहीं उठाते- पर दारेषु मातृवत ।
तोताराम ने तर्क फेंका- मनमोहनजी की भी भली कही । एक तो जन्मजात अध्यापक, दूसरे संयास की उम्र, तीसरे पौरुष ग्रंथि निकलवादी और चौथे मैडम साथ में । ज़रदारी की बात और है । एक तो उम्र 'अभी तो मैं जवान हूँ ', दूसरे ज़मींदारी खानदान, तीसरे चार-चार की परमीशन और फिलहाल एक भी नहीं । लोग तो पत्नी के मरने के बारह दिन के भीतर ही वैवाहिक विज्ञापन देखने लग जाते हैं । प्रेम का प्रतीक ताजमहल बनवाने वाले शाहजहाँ के हरम में पाँच हज़ार बेगमों का रेवड़ था । और तो और मुमताज़ महल के मरने के बाद भी कई और बेगमें कबाडी । ज़रदारी को दोष देने से पहले दुनिया के बड़े बड़े पत्नीशुदा लोगों का इतिहास तो देख ले । रीगन थेचर पर फ़िदा थे,सरकोजी समुद्र तट पर अठखेलियाँ करती ब्रूनी को देखते ही पत्नी को भूल गए, क्लिंटन महाराज की लम्पट लीलाएं तो जगजाहिर हैं ही । मियाँ भुट्टो का किस्सा भी अनजान नहीं है, नेहरू जी का भी अडविना पर माधुर्य भाव था । अटल जी ने भी अपने एक इंटरव्यू में कहा था की कुंवारा हूँ , ब्रह्मचारी नहीं । तो फिर ज़रदारी के पीछे ही दुधारी तलवार लेकर क्यों पड़ा है? और जब पालिन ने ही एतराज नहीं किया तो तू क्यों परेशान हो रहा है? और फिर ज़रदारी को तो भूलने की बीमारी है । मुशर्रफ़ के समय जाँच के दौरान ज़रदारी ने एक मनोचिकित्सक का प्रमाण पत्र भी पेश किया था की उन्हें भूलने की बीमारी है । तो हो सकता है कि भूल से पालिन को उसने कुछ और समझ लिया हो । और फिर यदि दो देशों के नेताओं में मधुर सम्बन्ध होंगें तो उन देशों के सम्बन्ध भी मधुर होंगे ही और इस प्रकार विश्वशांति को बढ़ावा मिलेगा ।
हमें तोताराम के दूसरे तर्क में दम लगा ।
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२७ सितम्बर २००८
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Jhootha Sach
तोताराम के तर्क - खेलरत्न बिपाशा बसु
आते ही तोताराम चालू हो गया, बोला- यह सरकार भी अजीब है । जिस हाकी में भारत क्वालीफाई भी नहीं कर सका उसके अधिकारियों को तो बीजिंग घूमने भेज दिया पर बेचारी बिपाशा बसु को खेल रत्न भी नहीं दिया गया । हम चौंके । क्या? बिपाशा को खेल रत्न! भई जो खेल बिपाशा खेलती है वे विज्ञापन, मीडिया और सिनेमा में तो चर्चित् हो सकते हैं पर ओलम्पिक में तो नहीं ही खेले जाते । जान अब्राहम के साथ वह जो खेल खेल रही है या पर्दे पर रिकार्ड संख्या में चुम्बन दृश्य कर रही है वे किसी और ही खेल का हिस्सा हैं । हाँ नेताओं ने ज़रूर खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए लाखों करोड़ों के नक़द पुरस्कार देने की घोषणा की है ।
तोताराम हंसा- बन गया ना उल्लू। अरे! इन पुरस्कारों में नेताओं के बाप का क्या जाता है? जनता का पैसा है। लुटाने में किसी को क्या दर्द । अपनी कमाई में से देते तो भी एक बात । बिपाशा को देख । कांस्य पदक की घोषणा होते ही उसने बिजेंद्र को फोन कर दिया कि वह उसके साथ डेटिंग करके उसे पुरस्कृत कराने के लिए तैयार है । इसमें जो शारीरिक या मानसिक ख़तरा हो सकता था उठाने के लिए तैयार हो गई । यदि उसने यह प्रस्ताव पहले दे दिया होता तो बिजेंद्र कांस्य क्या, स्वर्ण पदक ले आता ।
हमने डाँटा - क्या बात करता है । अगर यह प्रस्तावा पहले दे देती तो पदक क्या क्वालीफाई भी नहीं कर पाता । और अब उसको जिस तरह से सेलेब्रिटी बनाया जा रहा है, देख लेना अगले ओलम्पिक में गया कांस्य पदक से भी । प्रस्ताव सुनकर ही छोरे के घुटनों में पानी पड़ जाता होगा । अब हो ली मुक्केबाजी ।
तोताराम बोला- सौंदर्य में बड़ी शक्ति होती है । देखता नहीं, हीरोइन के सौंदर्य के बल पर ही तो हीरो विलेन और उसके दस-दस हट्टे-कट्टे साथियों को पछाड़ देता है । बिजेंद्र नहीं तो और लाखों युवक इस प्रस्ताव को सुनकर सर और थोबडा तुड़वाने के लिए तैयार हो जायेंगें और हो सकता है, कोई न कोई पदक ले ही आए । यदि पदक नहीं भी आए तो भी बिपाशा के इस खेल प्रेम की तो प्रशंसा की ही जानी चाहिए ।
हम चुप हो गए, क्या करते ।
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२२ अक्टूबर २००८
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Jhootha Sach
Nov 6, 2008
मोती का डर
मोती हमारी गली का एक वरिष्ठ कुत्ता है । हालांकि उसका रंग काला है पर मन मोती की तरह उजला । हो सकता है इसीलिए बच्चों ने उसे मोती नाम दिया हो । मोती शुरु में हमारे घर के आँगन के एक कोने में गड्ढा खोद कर सोता था| थोड़ा बड़ा होने पर उसने गली के एक नुक्कड़ पर बने बिना दरवाजे के पम्प हॉउस को अपना मुख्यालय बनाया| यहीं से वह गली में आने जाने वाले संदेहास्पद लोगों पर सतर्क दृष्टि रखा करता है। वह रोटी के टुकड़े के लिए कभी कुत्तों की तरह नहीं लड़ता । उसने कभी बंगलादेशी या पाकिस्तानी घुसपैठियों की तरह दूसरी गली में अवैध प्रवेश नहीं किया । अनावश्यक रूप से भौंकता भी नहीं । अनावश्यक रूप से दुम भी नहीं हिलाता । कोई आहट होती है तो थोड़ा सा आँखे खोल कर देख लेता है कि कहीं कोई अवांच्छित तत्व तो नहीं है, बस ।
आज जैसे ही हम घर में घुसने लगे तो मोती हमारे साथ ही दरवाजे में घुसने लगा । हमें कुछ अस्वाभाविक सा लगा पर हमने मोती को रोका नहीं । बरामदे में रखी स्टूल पर बैठे तो वह हमारे पैरों के पास आकर बैठ गया और हमें घूरने लगा । हमें लगा जैसे मोती कुछ कहना चाहता है । यह क्या? मोती मनुष्यों की बोली में बोलने लगा- मास्टरजी, आप कुछ दिनों के लिए मुझे अपने चौक के एक कोने में सोने की अनुमति प्रदान कीजिए । हमने पूछा क्या बाहर ठण्ड लगती है या डर लगता है? उसने उत्तर दिया- ऎसी कोई बात नहीं है पर ऐसा है कि शीघ्र ही चुनाव होने वाले हैं और मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता ।
हमें आश्चर्य हुआ । तुम्हें चुनाव से क्या मतलब? न तो तुम्हारा नाम वोटर लिस्ट में है और न तुम कुत्तों की तरह लड़ते हो फिर तुम्हे चुनाव से क्या ख़तरा? वह बोला- मैं कल घूमता घामता एक पार्टी के चुनाव कार्यालय में चला गया था । वहाँ कुछ कार्यकर्ता बातें कर रहे थे कि चाहे काले कुत्ते का गू ही क्यों न खाना पड़े चुनाव अवश्य जीतना है । सो गुरुजी, क्या पता गू के चक्कर में कहीं मेरी आंतें ही न फाड़ डालें । हमें हँसी आगई, कहा- मोती यह साहित्यिक भाषा है । तुमने इसका शाब्दिक अर्थ ले लिया । कुत्ते के गू का मतलब है कि नीच से नीच काम करना । वे चुनाव जीतने के लिए कुछ कराने के लिए तैयार हैं जैसे-जातिवाद, धर्म, भाषा, प्रांत भेद फैलाना, दारू और पैसे से वोट खरीदना, ह्त्या, अपराध, दंगे करवाना, नकली वोट डलवाना, बूथ पर कब्जा करना आदि ।
मोती उदास हो गया, बोला- गुरुजी फिर तो यह काले कुत्ते का गू खाने से भी गया गुजरा काम है । हम मोती की बात से सहमत थे पर क्या कर सकते थे । हमारा लोकतंत्र साठा होकर पाठा जो हो गया था ।
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२० अक्टूबर २००८
छः राज्यों में चुनावों की घोषणा
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